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रविवार, 30 दिसंबर 2018

राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 400 : RAG BASANT






स्वरगोष्ठी – 400 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 15 : राग बसन्त

पण्डित भीमसेन जोशी से बसन्त का खयाल और इसी राग पर आधारित फिल्म ‘स्त्री’ का गीत सुनिए




पण्डित भीमसेन जोशी
आशा भोसले और महेन्द्र कपूर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पन्द्रहवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की पन्द्रहवीं और समापन कड़ी में आज हमने राग बसन्त चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग बसन्त की एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे।



राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम है। इस राग के गायन-वादन का सटीक समय रात्रि के चतुर्थ प्रहर में 3 बजे से साढ़े 4 बजे के मध्य है। परन्तु बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। इस राग के बाद ललित, भैरव आदि रागों का समय आरम्भ होता है। पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार विरह या चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति, तनाव, कुण्ठा, फोबिया, पैनिकडिसार्डर, हिस्टीरिया, विषाद एवं अनेक मनोदैहिक विकृतियों का उपचार राग सोहनी से करने के बाद मन की शान्ति और निद्रा का अनुभव हो तो राग बसन्त का उपचार सर्वथा उपयोगी हो सकता है। रात्रि के चतुर्थ प्रहर में शान्त, शीतल और सुखदायी वातावरण में राग बसन्त का प्रभाव मन और शरीर पर अवश्य पड़ता है। ऐसा विश्वास है कि उपरोक्त समस्याओं के निदान में राग बसन्त का श्रवण करने पर काफी शान्ति व सुख की प्राप्ति हो सकती है। ‘नान रैपिड आई मूवमेंट स्लीप’ का आनन्द मरीज को प्राप्त हो सकता है। एक महीने तक रागात्मक प्रक्रिया के अन्तर्गत यदि उपचार किया जाए तो पीड़ित को इन समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। अब हम आपको राग बसन्त की एक रचना सुनवाते हैं। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं; ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न के स्वर में एक रचना सुनते हैं। अब आप सुनिए; पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम तलवलकर ने संगति की है।

राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स, ग, म॑, ध(कोमल), नि, सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं, नि, ध, प, म॑, ग, रे, स। इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है। अब आप राग बसन्त पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनिए। वर्ष 1961 में वी. शान्ताराम की फिल्म “स्त्री” का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म का एक गीत; “बसन्त है आया रंगीला...” राग बसन्त पर आधारित है। गीत को स्वर दिया है आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों और संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बसन्त : “बसन्त है आया रंगीला...” : आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 401 और 402 को हम पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों पर केन्द्रित रखेंगे। अतः अंक संख्या 400 और 401 में हम आपके लिए पहेली का प्रकाशन नहीं कर रहे हैं। पहेली का नियमित प्रकाशन हम अंक संख्या 402 से करेंगे। पहेली संख्या 399वें अंक की पहेली का सही उत्तर और विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 401 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

“स्वरगोष्ठी” की 398वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में निर्मित किन्तु अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से राग की छाया लिये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सिन्दूरा अथवा काफी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया। इस बार की पहेली में अधिकतर प्रतिभागी एक अप्रचलित राग को पहचानने में भ्रमित हुए हैं। ऐसे प्रतिभागियों ने थाट की सही पहचान अवश्य की है। जिन प्रतिभागियों ने राग काफी कान्हड़ा अथवा राग काफी के रूप में पहचान की है, हमने उन्हें पूरे-पूरे अंक दिये हैं। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पन्द्रहवीं और समापन कड़ी में आपने राग बसन्त का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार सी. रामचन्द्र द्वारा संगीतबद्ध 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से एक गीत आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में सुना। “स्वरगोष्ठी” के नये वर्ष 2019 के पहले और दूसरे अंक में हम पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों को शामिल कर रहे हैं। अगले अंक में हम विजया राजकोटिया, शुभा खाण्डेकर और डॉ. किरीट छाया की प्रस्तुतियाँ उनके परिचय के साथ प्रकाशित कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 400 : RAG BASANT : 30 दिसम्बर, 2018

रविवार, 21 अक्तूबर 2018

राग गुणकली : SWARGOSHTHI – 390 : RAG GUNKALI






स्वरगोष्ठी – 390 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 5 : राग गुणकली

लता मंगेशकर से फिल्म का एक गीत और संजीव अभ्यंकर से राग गुणकली में खयाल सुनिए




संजीव अभ्यंकर
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हमने राग गुणकली चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर के स्वर में 1974 में प्रदर्शित फिल्म “फ्री लव” से राग गुणकली पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित संजीव अभ्यंकर के स्वर में राग गुणकली में निबद्ध एक खयाल रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


राग गुणकली को भैरव थाट जन्य माना गया है। इसमें ऋषभ और धैवत कोमल तथा तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होने के कारण इसकी जाति औड़व होती है। वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। कुछ मतानुसार वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज भी माना जाता है। यह भैरव अंग का राग है, जो प्रातःकाल सन्धिप्रकाश के समय गाया-बजाया जाता है। उत्तरांग वादी तथा गायन समय दिन के उत्तर अंग में होने के बावजूद इस राग का चलन पूर्वांग प्रधान होता है और मन्द्र तथा मध्य सप्तकों के पूर्वांग में इसका चलन विशेष रूप होता है। भैरव अंग दिखाने के लिए कभी-कभी शुद्ध गान्धार कण के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग गुणकली की प्रकृति गम्भीर होती है। अब हम आपको राग गुणकली का स्पर्श करते हुए एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने वर्ष 1974 में प्रदर्शित फिल्म “फ्री लव” से लिया है। दादरा ताल में निबद्ध इस गीत को सुविख्यात गायिका लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। संगीत लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने दिया है।

राग गुणकली : “हम कशमकश-ए-गम से गुज़र क्यों नहीं जाते...” लता मंगेशकर : फिल्म – फ्री लव


संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग गुणकली, राग भैरव से अधिक गम्भीर है। मींड़ में मध्यम से ऋषभ स्वर तक जाते समय गान्धार स्वर का जरा सा भी स्पर्श नहीं होना चाहिए। इससे राग जोगिया की छाया आएगी। राग जोगिया में करुण भाव निहित है, जबकि राग गुणकली की प्रवृत्ति गुरु-गम्भीर होती है। मध्यम और कोमल ऋषभ स्वर को मींड़ द्वारा लेने पर गम्भीर भाव कायम होगा। यह पूर्वांग प्रधान राग है। पूर्वांग के स्वरों का प्रयोग गाम्भीर्य भाव की उत्पत्ति के लिए सहायक सिद्ध होता है। इस राग की रचना विलम्बित और मध्यलय उपयुक्त होगी। द्रुतलय की रचना इस राग के भाव में व्यवधान उत्पन्न करेगा। राग गुणकली का गाम्भीर्य डिप्रेशन और चिन्ताविकृति को दूर का रास्ता दिखाएगा और शान्ति कायम करेगा। पीड़ित व्यक्ति को इस राग के श्रवण से अपार शान्ति मिलेगी और वह धीरे-धीरे वह स्वस्थ और सामान्य हो सकता है। अब हम आपको सुविख्यात गायक पण्डित संजीव अभ्यंकर के स्वर में राग गुणकली में निबद्ध एक रचना सुनवाते हैं। इस प्रस्तुति में हारमोनियम पर प्रमोद मराठे और तबला पर भरत कामत ने संगति की है।

राग गुणकली : “डमरू हर कर बाजे...” : पण्डित संजीव अभ्यंकर



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 390वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 27 अक्तूबर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 392वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 388वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1942 में प्रदर्शित फिल्म “तानसेन” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मेघ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – खुर्शीद बानो

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पाँचवीं कड़ी में आपने राग गुणकली का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने पण्डित संजीव अभ्यंकर के स्वर में राग के यथार्थ स्वरूप का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग में पिरोया संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल द्वारा स्वरबद्ध फिल्म “फ्री लव” का गीत लता मंगेशकर से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग गुणकली : SWARGOSHTHI – 390 : RAG GUNKALI : 21 अक्तूबर, 2018

रविवार, 16 सितंबर 2018

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 385 : RAG BHAIRAVI






स्वरगोष्ठी – 385 में आज

राग से रोगोपचार – 14 : सदा-सुहागिन राग भैरवी

अस्वाभाविक शारीरिक और मानसिक समस्याओं से मुक्ति दिलाता है यह राग





विदुषी परवीन सुल्ताना
पण्डित भीमसेन जोशी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की चौदहवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गायन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला की इस समापन कड़ी में आज हम राग भैरवी के स्वरों से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग भैरवी में निबद्ध दो खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1981 में प्रदर्शित फिल्म “कुदरत” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के प्रभाव से उत्पन्न हारमोन्स रस की ऊर्जा से उदर विकार, वायु विकार, हृदय रोग, स्नायु सम्बन्धी अस्वाभाविकता, ज्वर, डिप्रेशन, फोबिया, तनाव, अनिद्रा आदि की समस्याओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हमने राग भैरवी में निबद्ध दो खयाल का चुनाव किया है। इन खयाल में स्वर पण्डित भीमसेन जोशी के हैं।

राग भैरवी : विलम्बित ‘फुलवन गेंद से...’ और द्रुत खयाल- ‘हमसे पिया...’ : पं. भीमसेन जोशी


सम्पूर्ण जाति का राग भैरवी, भैरवी थाट का ही आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है।

नौवें दशक के आरम्भिक वर्ष अर्थात वर्ष 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ प्रदर्शित हुई थी। इसके संगीतकार राहुलदेव बर्मन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग के लिए राग भैरवी के स्वरों में एक गीत की धुन बनाई। फिल्म में यह गीत दो भिन्न प्रसंगों में और दो भिन्न आवाज़ों में शामिल किया गया है। गीत का एक संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज़ में है तो दूसरा संस्करण विदुषी परवीन सुल्ताना की आवाज़ में है। आज हम आपको परवीन जी की आवाज़ में राग भैरवी के स्वरों में पिरोया वही गीत सुनवाते हैं। बेगम परवीन सुल्ताना का नाम देश की शीर्षस्थ गायिकाओं में शामिल है। उनका जन्म नौगाँव, असम में 10 जुलाई 1950 को एक संगीतप्रेमी परिवार में हुआ था। बचपन में ही उन्हें संगीत की शिक्षा अपने दादा मोहम्मद नजीब खाँ से मिली। बाद में बंगाल के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया। पटियाला घराने की परम्परागत गायकी का मार्गदर्शन उन्हें उस्ताद दिलशाद खाँ ने प्रदान किया। बाद में उस्ताद दिलशाद खाँ से ही उनका विवाह हुआ। दोनों का पहला सार्वजनिक जुगलबन्दी गायन का प्रदर्शन अफगानिस्तान के जाशीन समारोह में हुआ था। परवीन जी का पहला एकल गायन का प्रदर्शन 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में हुआ था और 1965 से ही उनके संगीत की रिकार्डिंग होने लगी थी। भारत सरकार ने उन्हें 1976 में ‘पद्मश्री’ सम्मान और इसी वर्ष यानी 2014 में ‘पद्मभूषण’ सम्मान प्रदान किया है। इसके अलावा 1986 में देश के प्रतिष्ठित ‘तानसेन पुरस्कार’ और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से भी अलंकृत किया जा चुका है। परवीन सुल्ताना जी ने खयाल, ठुमरी, भजन के साथ ही कुछ फिल्मों में भी गीत गाये हैं। फिल्म ‘कुदरत’ के अलावा ‘दो बूँद पानी’, ‘पाकीजा’ और ‘गदर’ जैसी फिल्मों के गीत गाये हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में फिल्म कुदरत का जो गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसके बोल हैं- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते...’। जैसा कि हमने पूर्व में उल्लेख किया है, इस गीत का एक और संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज में है। उस वर्ष के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए गीत के दोनों संस्करण नामित हुए थे, किन्तु पुरस्कार मिला, महिला वर्ग में परवीन जी के गाये इसी गीत को। इसके अलावा फिल्म के लेखक और निर्देशक सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार चेतन आनन्द को सर्वश्रेष्ठ लेखन का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। इस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी हैं। परदे पर यह गीत सुप्रसिद्ध अभिनेत्री अरुणा ईरानी पर फिल्माया गया है। लीजिए, आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरवी : ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ : फिल्म – कुदरत : विदुषी परवीन सुल्ताना



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 385वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस उस्ताद गायक के हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 22 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 387वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 383वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म “चाचा ज़िंदाबाद” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और मन्ना डे

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फिनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडीया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की चौदहवीं और समापन कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग भैरवी का परिचय प्राप्त किया। आपने पण्डित भीमसेन जोशी द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी के दो खयाल रचनाओं का रसास्वादन किया। साथ ही आपने विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “कुदरत” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 385 : RAG BHAIRAVI : 16 सितम्बर, 2018

रविवार, 9 सितंबर 2018

राग ललित : SWARGOSHTHI – 384 : RAG LALIT






स्वरगोष्ठी – 384 में आज

राग से रोगोपचार – 13 : सूर्योदय से पूर्व का राग ललित

नवचेतना, आशा और मनोबल का संचार करने में सहायक है यह राग




उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की तेरहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गायन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी में आज हम राग ललित के स्वरों से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई के स्वरों में राग ललित की एक मोहक रचना प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1959 में प्रदर्शित फिल्म “चाचा ज़िन्दाबाद” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



दुखद परिस्थिति से पीड़ित मन को भोर में साढ़े चार बजे से पाँच के दौरान नींद से जागने पर जब राग ललित का भावप्रधान गायन या वादन सुनने का अवसर मिलता है, तब उसके मन को काफी शान्ति प्राप्त होती है। उसके मन में नवचेतना, आशा और मनोबल का संचार होता है। राग ललित का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग में दोनों प्रकार के मध्यम स्वर का उपयोग होता है। जब शुद्ध मध्यम से तीव्र मध्यम का स्वर संयोग करते हैं तो एक श्रुत्यान्तर का तीव्र मध्यम प्रयोग किया जाता है। परन्तु जब गान्धार या कोमल धैवत पर लौटना हो तो दो श्रुत्यान्तर तीव्र मध्यम प्रयोग होगा। प्रथम प्रयोग से अपार शान्ति मिलेगी तथा दूसरे प्रयोग से आशा और नवचेतना का संचार होगा। तनाव, चिन्ताविकृति, डिप्रेसन आदि को दूर का रास्ता दिखाने तथा उक्त मनःस्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक विकारों; जैसे धड़कन में वृद्धि, श्वास की समस्या, उदर विकार, सिर में दर्द आदि परेशानियों का निदान करने की क्षमता राग ललित में है। आपको राग ललित का उदाहरण सुनवाने के लिए हमने विश्वविख्यात शहनाईनवाज उस्ताद बिस्मिलाह खाँ की शहनाई को चुना है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ अपनी शहनाई पर राग ललित में तीनताल की निबद्ध गत प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए, आप भी इस मधुर शहनाई पर राग ललित का रसास्वादन कीजिए।

राग ललित : शहनाई पर तीनताल की गत : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


आज के अंक में अब हम आपसे राग ललित की संरचना पर कुछ चर्चा कर रहे हैं। राग ललित, भारतीय संगीत का अत्यन्त मधुर राग है। यह राग पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ, कोमल धैवत तथा दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह दोनों में पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति षाड़व-षाड़व होती है। अर्थात, राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वरों का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने राग ललित में शुद्ध धैवत के प्रयोग को माना है। उनके अनुसार यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत आता है। राग ललित की जो स्वर-संरचना है उसके अनुसार यह राग किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है। मारवा थाट के स्वरों से राग ललित के स्वर बिलकुल मेल नहीं खाते। राग ललित में शुद्ध मध्यम स्वर बहुत प्रबल है और यह राग का वादी स्वर भी है। इसके विपरीत मारवा में शुद्ध मध्यम सर्वथा वर्जित होता है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है।

मन्ना डे
आज हमने इस राग के फिल्मी उदाहरण के लिए संगीतकार मदन मोहन के जिस गीत को हमने चुना है, वह है फ़िल्म ’चाचा ज़िन्दाबाद’ से। लता मंगेशकर और मन्ना डे की युगल आवाज़ों में "प्रीतम दरस दिखाओ..." शास्त्रीय संगीत पर आधारित बनने वाले फ़िल्मी गीतों में विशेष स्थान रखता है। 1959 में निर्मित इस फ़िल्म का गीत-संगीत बिल्कुल असाधारण था। फ़िल्म में एक स्थिति ऐसी थी कि नायिका अपने गुरु से शास्त्रीय संगीत सीख रही है। इस स्थिति के लिए मदन मोहन ने राजेन्द्र कृष्ण से "प्रीतम दरस दिखाओ..." गीत लिखवा कर राग ललित में उसे स्वरबद्ध किया। उनकी इच्छा थी कि इस गीत को उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब और लता मंगेशकर गाएँ। लेकिन जब लता जी के कानों में यह ख़बर पहुँची कि मदन जी उनके साथ उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब को गवाने की सोच रहे हैं, वो पीछे हो गईं। उन्होंने निर्माता ओम प्रकाश और मदन मोहन से कहा कि उन्हें इस गीत के लिए माफ़ कर दिया जाए और किसी अन्य गायिका को ख़ाँ साहब के साथ गवाया जाए। मदन मोहन अजीब स्थिति में फँस गए। वो लता जी के सिवाय किसी और से यह गीत गवाने की सोच नहीं सकते थे, और दूसरी तरफ़ ख़ाँ साहब को गवाने की भी उनकी तीव्र इच्छा थी। जब उन्होंने लता जी से कारण पूछा तो लता जी ने उन्हें कहा कि वो इतने बड़े शास्त्रीय गायक के साथ गाने में बहुत नर्वस फ़ील करेंगी जिनकी वो बहुत ज़्यादा इज़्ज़त करती हैं। लता जी ने भले उस समय यह कारण बताया हो, पर कुछ और कारण भी थे। वो नहीं चाहती थीं कि उनके साथ ख़ाँ साहब की तुलनात्मक विश्लेषण लोग करे। अन्ततः "प्रीतम दरस दिखाओ...” को मन्ना डे और लता जी ने गाया। लीजिए, अब आप राग ललित के स्वरों में यह प्यारा युगल गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग ललित : ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 384वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1980 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।






1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत को किस विदुषी गायिका ने स्वर दिया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 15 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 386वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 382वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बसन्त, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और महेन्द्र कपूर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, फिनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडीया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, नवीन मुम्बई, महाराष्ट्र से शिरीष ओक और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की तेरहवीं कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग ललित का परिचय प्राप्त किया। आपने उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत राग बसन्त की एक रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने मन्ना डे और लता मंगेशकर के स्वर में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “चाचा ज़िन्दाबाद” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग ललित : SWARGOSHTHI – 384 : RAG LALIT : 9 सितम्बर, 2018

रविवार, 2 सितंबर 2018

राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 383 : RAG BASANT






स्वरगोष्ठी – 383 में आज


राग से रोगोपचार – 12 : ऋतु प्रधान राग बसन्त


गहरी निद्रा दिलाने में राग सोहनी का पूरक है राग बसन्त



पण्डित भीमसेन जोशी
आशा भोसले और महेन्द्र कपूर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गायन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम राग बसन्त के स्वरों से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग बसन्त की एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।

राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम है। इस राग के गायन-वादन का सटीक समय रात्रि के चतुर्थ प्रहर में 3 बजे से साढ़े 4 बजे के मध्य है। परन्तु बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। इस राग के बाद ललित, भैरव आदि रागों का समय आरम्भ होता है। विरह या चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति, तनाव, कुंठा, फोबिया, पैनिकडिसार्डर, हिस्टीरिया, विषाद एवं अनेक मनोदैहिक विकृतियों का उपचार राग सोहनी से करने के बाद मन की शान्ति और निद्रा का अनुभव हो तो राग बसन्त का उपचार सर्वथा उपयोगी हो सकता है। रात्रि के चतुर्थ प्रहर में शान्त, शीतल और सुखदायी वातावरण में राग बसन्त का प्रभाव मन और शरीर पर अवश्य पड़ता है। ऐसा विश्वास है कि उपरोक्त समस्याओं के निदान में राग बसन्त का श्रवण करने पर काफी शान्ति व सुख की प्राप्ति हो सकती है। ‘नान रैपिड आई मूवमेंट स्लीप’ का आनन्द मरीज को प्राप्त हो सकता है। एक महीने तक रागात्मक प्रक्रिया के अन्तर्गत यदि उपचार किया जाए तो पीड़ितको इन समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। अब हम आपको राग बसन्त की एक रचना सुनवाते हैं। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं; ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न के स्वर में एक रचना सुनते हैं। अब आप सुनिए; पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम तलवलकर ने संगति की है।

राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : स्वर – पण्डित भीमसेन जोशी




राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स, ग, म॑, (कोमल), नि, सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं, नि, (कोमल), प, म॑, ग, रे, स। इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है। अब आप राग बसन्त पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनिए। वर्ष 1961 में वी. शान्ताराम की फिल्म “स्त्री” का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म का एक गीत; “बसन्त है आया रंगीला...” राग बसन्त पर आधारित है। गीत को स्वर दिया है आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों और संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बसन्त : “बसन्त है आया रंगीला...” : आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 383वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत को किन युगल गायकों ने स्वर दिया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 8 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 385वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 381वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आजम” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फिनिक्स, अमेरिका से मुकेश लढ़िया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की बारहवीं कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग बसन्त का परिचय प्राप्त किया। आपने पण्डित भीमसेन जोशी द्वारा प्रस्तुत राग बसन्त की एक रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “स्त्री” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 383 : RAG BASANT : 2 सितम्बर, 2018

रविवार, 26 अगस्त 2018

राग सोहनी : SWARGOSHTHI – 382 : RAG SOHANI






स्वरगोष्ठी – 382 में आज

राग से रोगोपचार – 11 : अन्तिम प्रहर का राग सोहनी

गहरी निद्रा का आनन्द दिलाता है यह राग





पण्डित उल्हास  कशालकर
उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गायन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में आज हम राग मालकौंस के स्वरों से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको पण्डित उल्हास कशालकर के स्वरों में राग सोहनी की दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आजम” से इसी राग में ठुमरी अंग में पिरोया एक मधुर गीत उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



राग सोहनी का वादी स्वर शुद्ध धैवत और संवादी स्वर शुद्ध गान्धार है। राग के गायन और वादन का सटीक समय रात्रि के 3 बजे से 4 बजे के बीच होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। विरह या चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति के पीड़ित मन के भाव इस राग में दृष्टिगत होते हैं। जब रात्रि में मध्यम रागों का प्रयोग करने से भी रोगी का आवेग कम नहीं हो रहा हो और उसे निद्रा नहीं आरही हो, तब राग सोहनी का गायन-वादन या श्रवण से गहरी निद्रा का आनन्द प्राप्त होता है। तनावविकृति, कुण्ठा, फोबिया, पैनिक डिसआर्डर, हिस्टीरिया, विषाद तथा अनेक मनोदैहिक विकृतियों का समुचित उपचार जब मध्यम प्रधान रागों से नहीं हो पाता तब राग सोहनी सेवन सर्वथा उपयोगी होता है। यह राग व्यक्ति की पीड़ा को कुछ देर के लिए शान्त कर सकता है। यह उपचार एक माह तक निरन्तर किया जाना चाहिए। अब हम आपको राग सोहनी के यथार्थ शास्त्रीय स्वरूप की अनुभूति कराने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में इस राग में निबद्ध दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। मध्यलय खयाल के बोल हैं – “जियरा रे कल नाहि पावे....” और द्रुतलय खयाल के बोल हैं – “देख वेख मन ललचाए...”। यह रिकार्डिंग हमें लखनऊ की सुप्रसिद्ध संगीत संस्था ‘आकर्षण’ के सौजन्य से प्राप्त हुई है। इस संस्था द्वारा 2007 में आयोजित संगीत सभा में पण्डित उल्हास कशालकर को आमंत्रित किया था। आप राग सोहनी के खयाल सुनिए।

राग सोहनी : “जियरा रे...” और “देख वेख मन ललचाए...” पण्डित उल्हास कशालकर


राग सोहनी मारवा थाट का बेहद लोकप्रिय राग है। पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। इस राग का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है। पहले प्रकार, औडव-षाड़व जाति के अन्तर्गत आरोह में ऋषभ और पंचम तथा अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता। राग के दूसरे स्वरूप के आरोह में ऋषभ और अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं होता। राग सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रे(कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी, कर्नाटक संगीत के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया जाता है।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की। खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने अपने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत नौशाद और के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत गाया - ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए। लीजिए, आप उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में ढला यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग सोहनी : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : फिल्म – मुगल-ए-आजम



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 382वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 1 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 384वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 380वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मोहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फिनिक्स, अमेरिका से मुकेश लढ़िया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की दसवीं कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग सोहनी का परिचय प्राप्त किया। आपने पण्डित उल्हास कशालकर द्वारा प्रस्तुत राग सोहनी की दो रचनाओं का रसास्वादन किया। साथ ही आपने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “मुगल-ए-आजम” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग सोहनी : SWARGOSHTHI – 382 : RAG SOHANI : 26 अगस्त, 2018

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