गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

"लारा लप्पा लारा लप्पा...." - याद है क्या लता की आवाज़ में ये सदाबहार गीत आपको ?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 66

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आज तक हमने आपको ज़्यादातर मशहूर संगीतकारों के नग्में ही सुनवाये हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि इन मशहूर संगीतकारों का फ़िल्म संगीत के विकास में, इसकी उन्नती में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन इन बड़े संगीतकारों के साथ साथ बहुत सारे कमचर्चित संगीतकार भी इस 'इंडस्ट्री' मे हुए हैं जिन्होने बहुत ज़्यादा काम तो नहीं किया लेकिन जितना भी किया बहुत उत्कृष्ट किया। कुछ ऐसे संगीतकार तो अपने केवल एक मशहूर गीत की वजह से ही अमर हो गये हैं। आज हम एक ऐसे ही कमचर्चित संगीतकर का ज़िक्र इस मजलिस में कर रहे हैं और वो संगीतकार हैं विनोद। विनोद का नाम लेते ही जो गीत झट से हमारे जेहन में आता है वह है फ़िल्म 'एक थी लड़की' का "लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा". संगीतकार विनोद की पहचान बननेवाला यह गीत आज प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। यह गीत न केवल विनोद के संगीत सफ़र का एक ज़रूरी मुक़ाम था बल्कि लताजी के कैरियर के शुरुआती लोकप्रिय गीतों में से भी एक था।

इससे पहले कि आप यह गीत सुनें, संगीतकार विनोद के बारे में कुछ कहना चाहूँगा। विनोद का जन्म २८ मई १९२२ को लाहौर में हुआ था। धर्म से इसाई, उनका असली नाम था एरिक रॉबर्ट्स । संगीत का शौक उन्हे बचपन से ही था, इसलिए उस ज़माने के मशहूर संगीतकार पंडित अमरनाथ के शिष्य बन गये जिन्होने शास्त्रीय रागों से उनका परिचय करवाया और वायलिन पर धुनें बनानी भी सिखाई. १९४५ में पंडित अमरनाथ के अचानक बीमार हो जाने पर उनकी अधूरी फ़िल्मों के संगीत को पूरा करने का ज़िम्मा आ पड़ा विनोद के कंधों पर। और इस तरह से 'ख़ामोश निगाहें', 'पराये बस में' और 'कामिनी' जैसी फ़िल्मों के संगीत से एरिक रॉबर्ट्स, अर्थात विनोद का फ़िल्मी सफ़र शुरु हो गया। देश के बँटवारे के बाद जब फ़िल्मकार रूप शोरे लाहौर से बम्बई चले आये तो वो अपने साथ विनोद और गीतकार अज़िज़ कश्मीरी को भी ले आये और यहाँ आ कर इन तीनों ने एक साथ कई फ़िल्मों में काम किया। १९४९ की 'एक थी लड़की' भी ऐसी ही एक फ़िल्म थी जिसमें इन तीनों का संगम था। इस फ़िल्म में रूप शोरे की पत्नी मीना शोरे नायिका थीं और नायक बने मोतीलाल। बदकिस्मती विनोद की, कि इस कामयाब फ़िल्म के बावजूद उन्हे कभी बड़ी बजट की फ़िल्मों में संगीत देने का मौका नहीं मिला और वो कमचर्चित फ़िल्मकारों के सहारे ही अपना काम करते रहे। केवल ३७ वर्ष की आयु मे ही गुर्दे की बीमारी से विनोद का देहान्त हो गया लेकिन अपनी छोटी सी इस ज़िन्दगी में उन्होने कुछ ऐसा सुरीला काम किया कि सदा के लिए अमर हो गये। आज विनोद को गये ५० साल गुज़र चुके हैं, लेकिन वो कहते हैं न कि कलाकार और उसकी कला कभी बूढ़ी नहीं होती, वो तो हमेशा जवान रहती है, सदाबहार रहती है, तो विनोद भी अमर हैं अपने संगीत के ज़रिये। आज भी जब फ़िल्म 'एक थी लड़की' का यह चुलबुला सा गीत हम सुनते हैं तो वही गुदगुदी एक बार फिर से हमें छू जाती है एक ताज़े हवा के झोंके की तरह। तो सुनते हैं लता मंगेशकर, जी. एम. दुर्रानी और साथियों की आवाज़ो में यह छेड़-छाड़ भरा नग्मा । यह गीत समर्पित है संगीतकार विनोद की स्मृति को।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. गीता दत्त का गाया एक बेमिसाल दर्दीला गीत.
२. गीतकार रजा मेहंदी अली खान साहब की पहली फिल्म का है ये गीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"बेदर्द".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
एक और नए विजेता मिले हैं अटलांटा, अमेरिका से हर्षद जांगला के रूप में. एक दम सही जवाब है आपका. सुमित जी कल नीलम जी ने आपको वो कह दिया जो दरअसल हम बहुत दिनों से कहना चाह रहे थे. अगर आप लता की आवाज़ नहीं पहचानते, और लता- आशा की आवाजों में फर्क नहीं देख पाते तो वाकई कानों के इलाज की जरुरत है....वैसे ये नीलम जी की सलाह है जिसका हम समर्थन करते हैं, आपकी तलाश जोरों पर है संभल के रहिये...हा हा हा...
भरत पण्डया ने भी अंतोगत्वा अपना सर खुजलाते-खुजलाते सही जवाब दे ही दिया। बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


तुम बोलो कुछ तो बात बने....जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश और महफ़िल-ए-बंदिश

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०९

मिट्टी दा बावा नईयो बोलदा वे नईयो चालदा....इस नज़्म ने न जाने कितनों को रूलाया है,कितनों को हीं किसी खोए अपने की याद में डूबो दिया है। अपने जिगर के टुकड़े को खोने का क्या दर्द होता है, वह इस नज़्म में बखूबी झलकता है। तभी तो "गायिका" मिट्टी का एक खिलौना बनाती है ताकि उसमें अपने खोए बेटे को देख सके, लेकिन मिट्टी तो मिट्टी ठहरी, उसमें कोई जान फूँके तभी तो इंसान बने। यह गाना बस ख़्यालों में हीं नहीं है, बल्कि यथार्थ में उस गायिका की निजी ज़िंदगी से जु्ड़ा है। ८ जुलाई १९९० को अपने बेटे "विवेक" को एक दु्र्घटना में खोने के बाद वह गायिका कभी भी वापस गा नहीं सकी। संगीत से उसने हमेशा के लिए तौबा कर लिया और खुद में हीं सिमट कर रह गई। उस गायिका या कहिए उस फ़नकारा ने अब अध्यात्म की ओर रूख कर लिया है,ताकि ईश्वर से अपने बेटे की गलतियों का ब्योरा ले सके। भले हीं आज वह नहीं गातीं, लेकिन फ़िज़ाओं में अभी भी उनकी आवाज़ की खनक मौजूद है और हम सबको यह अफ़सोस है कि उनके बाद "जगजीत सिंह" जी की गायकी का कोई मुकम्मल जोड़ीदार नहीं रहा। जी आप सब सही समझ रहे हैं, हम "जगजीत सिंह" की धर्मपत्नी और मशहूर गज़ल गायिका "चित्रा सिंह" की बात कर रहे हैं।

चित्रा सिंह, जिनका वास्तविक नाम "चित्रा दत्ता" है, मूलत: एक बंगाली परिवार से आती हैं। घर में संगीत का माहौल था इसलिए ये भी संगीत की तरफ़ चल निकलीं। १९६० में "द अनफौरगेटेबल्स" एलबम की रिकार्डिंग के दौरान जगजीत सिंह के संपर्क में आईं और वह संपर्क शादी में परिणत हो गया। जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने एक साथ न जाने कितनी हीं गज़लें गाई हैं; जगजीत सिंह का संगीत और दो सदाबहार आवाज़...इससे ज्यादा कोई क्या चाह सकता है। इनकी गज़लें बस हिंदी तक हीं सीमित नहीं रही..इन्होंने पंजाबी और बंगाली में भी बेहतरीन नज़्में और गज़लें दी हैं। यह तो हुई दोनों के साथ की बात...अब चलते हैं चित्रा सिंह के सोलो गानों की ओर। "ये तेरा घर, ये मेरा घर","तुम आओ तो सही","वो नहीं मिलता मुझे","सारे बदन का खून","दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है","दिल हीं तो है","हर एक बात पर कहते हो",ये सारी कुछ ऎसी नज़्में और गज़लें हैं, जो बरबस हीं चित्रा जी की मखमली आवाज़ का दीवाना बना देती हैं। इनकी आवाज़ में है हीं ऎसा जादू कि कोई एक बार सुन ले तो फिर इनका फ़ैन हो जाए। इससे पहले कि इस जादू का असर कम हो, हम आपको आज की गज़ल से मुखातिब कराते हैं।

आज की गज़ल चित्रा जी के संगीत सफ़र के अंतिम दिनों की गज़ल है। १९९० में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की साथ में एक एलबम आई थी.. "समवन समवेयर(someone somewhere)"| इस एलबम में शामिल सारी गज़लें एक से बढकर एक थीं। यूँ तो हर गज़ल का मजमून मु्ख्तलिफ़ होता है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं कि हरेक गज़ल में कोई न कोई चीज एक जैसी हो। आप खुद मानेंगे कि दुनिया में प्यार एक ऎसी हीं चीज है, जो ना चाहते हुए भी सब कुछ में शामिल है। "फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं" -यह गज़ल भी इसी प्यार के कोमल भावों से ओत-प्रोत है। "शमिम करबानी" साहब ने हर प्रेमी की दिली ख़्वाहिश कागज़ पर उतार दी है। कहते हैं कि अगर आपके पास प्यार है तो आपको और कुछ नहीं चाहिए। शायद यही विश्वास है जो किसी प्रेमी को दुनिया से बगावत करा देता है। मंझधार में फ़ँसा आशिक बस अपने इश्क और अपने खुदा को पुकारता है, नाखुदा की तरफ़ देखता भी नहीं। और वैसे भी जिसकी पु्कार इश्क ने सुन ली उसे औरों की क्या जरूरत...फिर चाहे वह "और" कोई खुदा हीं क्यों न हो!!!

तो अगर आपका इश्क चुप है, आपका हबीब खामोश है तो पहले उसे मनाईये, खुदा का क्या है,इश्क उसे मना हीं लेगा:
तुम बोलो कुछ तो बात बने,
जीने लायक हालात बने।


ये तो हुए मेरे जज़्बात, अब हम "शमिम" साहब के जज़्बातों में डूबकी लगाते हैं और जगजीत-चित्रा के मौज़ों का मज़ा लेते हैं:

फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं,
मुझसे तुम जुदा सही, दिल से तो जुदा नहीं।

आसमां की फ़िक्र क्या, आसमां खफ़ा सही,
आप ये बताईये, आप तो खफ़ा नहीं।

कश्तियाँ नहीं तो क्या, हौसले तो पास हैं,
कह दो नाखुदाओं से, तुम कोई खुदा नहीं।

लीजिए बुला लिया आपको ख़्याल में,
अब तो देखिये हमें, कोई देखता नहीं।

आईये चराग-ए-दिल आज हीं जलाएँ हम,
कैसी कल हवा चले कोई जानता नहीं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ____ को तुम,
थोडी बहुत तो जेहन में नाराजगी रहे...


आपके विकल्प हैं -
a) दिल , b) मन , c) खुद, d) सब

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल में जम कर शायरी हुई, "रात" शब्द ने लगता है सभी को रूमानी बना दिया, कुछ झलकियाँ पेश है -
मनु जी ने फरमाया -

सहर पूछे है शबे ग़म की कहानी मुझसे,
क्या कहूँ क्या क्या ज़हर रात पिया है मैंने,

तो पहली बार पूजा जी भी हरकत में आई इस शेर के साथ -

कहीं सूरज आकर चुरा ना ले मेरा चाँद,
हम रात भर "रात" को थामे रहे.

शन्नो जी ने बातों ही बातों में कई राज़ खोल डाले तो नीलम जी भी कहाँ पीछे रहने वाली थी -

रात -ए मौजूं देखा किये, न जाने किन रवानियों में बहते रहे |
वो चले, वो रुके थे, मगर कदम न जाने क्योँ उनके बढ़ते ही गए

सलिल साहब ने तो कई रातों का जिक्र कर डाला कुछ फ़िल्मी गीतों के मुखड़े भी गुनगुना डाले, तब उन्हें याद आये ये शेर-

ये खुली-खुली सी जुल्फें, ये उडी-उडी सी रंगत.
तेरी सुबह कह रही है, तेरी रात का फ़साना..

सलिल जी पूरे मूड में दिखे, अपनी जवानी के दिनों को याद कर कहा -

पाक दामन दिख रहे हैं, दिन में हम भी दोस्तों.
रात का मत ज़िक्र करना, क्या पता कैसे-कहाँ?

सलिल जी जम कर रंग जमाया तो उनकी शिष्य शन्नो जी ने भी महफ़िल की आखिरी शमा कुछ यूँ कह कर बुझा दी -

किसी खिताब की ना ही ख्वाहिश है ना काबिल हैं उसके
बस इस रात की महफ़िल में कुछ लम्हे काटने आ जाते हैं.

तो युहीं आते रहें...हम तो बस यही चाहेंगे, एक गुजारिश है बस कि जो ग़ज़ल हम आपके लिए लेकर आते हैं उसके बारे में भी कुछ फ़रमाया कीजिये.....

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

जवानियाँ ये मस्त मस्त बिन पिए....रफी साहब की नशीली आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 65

फ़िल्म जगत और ख़ास कर फ़िल्म संगीत जगत के लिए १९५५ का साल बहुत महत्वपूर्ण साल रहा है क्योंकि इसी साल एक ऐसी तिकड़ी बनी थी तीन कलाकारों की जिन्होने मिल कर फ़िल्म संगीत को एक नयापन दिया, और फ़िल्मी गीतों को एक नये लिबास, एक नये अंदाज़ में पेश किया। ये तिकड़ी थी अभिनेता शम्मी कपूर, संगीतकार ओ. पी. नय्यर और गायक मोहम्मद. रफ़ी की। ये तीनों पहले से ही फ़िल्म जगत में सक्रीय थे लेकिन अब तक तीनों कभी एक साथ में नहीं आए थे। १९५५ की वह पहली फ़िल्म थी 'मिस कोका कोला' जिसमें शम्मी कपूर के साथ नायिका बनी थीं गीता बाली। और आपको यह भी बता दें कि इसी साल शम्मी कपूर और गीता बाली की शादी भी हुई थी। 'मिस कोका कोला' 'हिट' तो हुई लेकिन बहुत ज़्यादा भी नहीं। जिस फ़िल्म से इस तिकड़ी ने फ़िल्म जगत में हंगामा मचा दिया वह फ़िल्म थी १९५७ की 'तुमसा नहीं देखा'. फ़िल्मिस्तान के बैनर तले बनी इस फ़िल्म का निर्देशन किया था नासिर हुसैन ने और शम्मी कपूर की नायिका इस फ़िल्म में बनीं अमीता। इसी फ़िल्म से शम्मी कपूर की उन जानी-पहचानी ख़ास अदाओं, और उन अनोखे 'मैनरिज़म्स' की शुरुआत भी हुई थी। फ़िल्म 'ब्लाक्बस्टर' साबित हुई और इस कामयाबी के बाद इस तिकड़ी ने कई ऐसे लाजवाब 'म्युज़िकल' फ़िल्में हमें दीं। 'तुमसा नहीं देखा' के सभी गाने ख़ूब चले और उस ज़माने में हर गली, हर चौराहे पर गूंजे, और आज भी अकसर रेडियो पर सुनाई दे जाते हैं। ये वो दौर था दोस्तों जब ओ. पी. नय्यर सबसे महँगे संगीतकार बन चुके थे।

'तुमसा नहीं देखा' फ़िल्म का जो गीत आज हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए चुना है वो रफ़ी साहब की एकल आवाज़ में है। यह गीत एक नौजवान दिल के जज़्बात बयाँ करता है। बचपन बीतने के बाद जवानी के आते ही दिल किस तरह से मचल उठता है किसी साथी की तलाश में, उसी का लेखा-जोखा है यह गीत। मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत में जवानी के इसी मोड़ को अपने हसीन शब्दों में पिरोया है। गाने में एक अजीब नशीलापन है जो रफ़ी साहब की आवाज़ में ढलकर और भी मादक बन पड़ा है। जहाँ तक इस गीत के 'और्केस्ट्रेशन' की बात है, तो नय्यर साहब ने पूरे गाने में 'क्लेरिनेट', 'मेंडोलिन' और 'स्टिंग्स‍' का सुन्दर प्रयोग किया है। तो सुनिये "जवानियाँ ये मस्त मस्त बिन पीये", लेकिन ज़रा संभल के, कहीं लड़खड़ाकर गिर ना जाना!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. संगीतकार विनोद का सबसे हिट गीत.
२. लता की आवाज़ में एक नटखट नग्मा.
३. मुखड़े में शब्द है - "झूठे"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नए विजेता हैं आज, अनिल जी सही गीत पहचानने के लिए बधाई, अटलांटा से आये हर्षद जी और मनु जी ने भी सही जवाब दिया, फिल्म का नाम तो अब तक पता चल ही गया होगा. भरत पंड्या जी, सलिल जी और सुमित ने भी दूसरी कोशिश में सही जवाब दिया है. पराग जी, त्रुटि सुधार के लिए धन्यवाद. आपकी पसंद का "ठंडी हवा काली घटा" गीत भी ओल्ड इस गोल्ड पर आ चुका है, उसे भी सुनियेगा....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


असली गीता दत्त की खोज में...

जब मैं गीता दत्त के गाने सुनता हूँ तब दुविधा में पड़ जाता हूँ. "मैं तो गिरिधर के घर जाऊं" गानेवाली वो ही गायिका हैं क्या जिसने कहा था "ओह बाबू ओह लाला". जो एक छोटे बालक की आवाज़ में फल तथा सब्जी बेच रही थी "फल की बहार हैं केले अनार हैं" वो ही एक विरहन के बोल सुना रही थी "आओगे ना साजन आओगे ना"! शास्त्रीय संगीत की मधुर लय और तानपर "बाट चलत नयी चुनरी रंग डारी" की शिकायत हो रही थी और तभी जनम जन्मांतर का साथ निभाने वाला गीत "ना यह चाँद होगा ना तारे रहेंगे मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेंगे" गाया जा रहा था.

"कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ" में सचमुच किसी दूर कोने से एक बिरहन की वाणी सुनाई आ रही थी और साथ ही "चंदा चांदनी में जब चमके क्या हो, आ मिले जो कोई छम से पूछते हो क्या हमसे?" यह सवाल किया जा रहा था. रेलगाडी की धक् धक् पर चलती हुई रेहाना गीता की आवाज़ पर थिरक कर गा रही थी" धक् धक् करती चली हम सब से कहती चली जीवन की रेल रे मुहब्बत का नाम हैं दिलों का मेल रे". अपने आप से सवाल किया जा रहा था "ए दिल मुझे बता दे तू किस पे आ गया हैं?" और सखी को छेड़ने की नटखट अदा थी "अँखियाँ भूल गयी हैं सोना". सोलह साल की लड़की का बांकपन था "चन्दा खेले आँख मिचौली बदली से नदी किनारे, दुल्हन खेले फागन होली" और "तोरा मनवा क्यों घबराएँ रे" में एक अनुभव की पुकार थी. "मेरा सुन्दर सपना बीत गया" गानेवाली "मेरा नाम चिन चिन चू" के जलवे बिखर रही थी. उसी वक्त "कल रात पिया ने बात कहीं कुछ ऐसी, मतवाला भंवरा कहे कली से जैसी" के मदहोश बोल सुनाये जा रहे थे.

युगल गीतों की बात की जाए तो एक तरफ "कल साजना मिलना यहाँ, हैं तमाम काम धाम रे आज ना आज ना" की स्वाभाविक शिकायत की जा रही थी वहीँ दूसरी ओर "तुमसे ही मेरी ज़िन्दगी मेरी बहार तुम" के स्वर गूँज रहे थे. "अरमां भरे दिल की लगन तेरे लिए हैं" के सुरीले स्वरों के साथ "ख्यालों में किसीके इसी तरहे आया नहीं करते" की तकारार हो रही थी. "रात हैं अरमान भरी और क्या सुहानी रात हैं, आज बिछडे दिल मिले हैं तेरा मेरा साथ हैं" के रोमांचक ख्यालों के साथ साथ राधा और कृष्ण के रंग में डूबा हुआ "आन मिलो आन मिलो श्याम सांवरे ब्रिज में अकेली राधे खोयी खोयी फिरे" की व्याकुल पुकार भी थी.

"मेरा दिल जो मेरा होता पलकों पे पकड़ लेती" के आधुनिक और काव्यात्मक खयालों के साथ साथ "धरती से दूर गोरे बादलों के पार आजा आजा बसाले नया संसार" की सुन्दर कविकल्पना भी थी. "मिया मेरा बड़ा बेईमान मेरी निकली रे किस्मत खोटी" की नोक-झोंक के साथ "मुझको तुम जो मिले ये जहां मिल गया" की खुशियाँ भी शामिल थी. "मोसे चंचल जवानी संभाली नहीं जाए" के लगभग कामुक भावों के साथ साथ "मेरे मुन्ने रे सीधी राह पे चलना जुग जुग तक फूलना फलना" का आशीर्वाद भी था.

नायक को कह रही थी "राजा मोहे ले चल तू दिल्ली की सैर को" और फिर कोई नटखट साजन "लखनो चलो अब रानी बम्बई का बिगडा पानी" की शिकायत करा रहा था. सखियों के साथ "चलो पनिया भरन को पतली कमरिया पे छलके गगरिया हो" गाकर नदी किनारे जाने की बातें और शादी में बिदाई के समय "बाबुल का मोरे आँगन बिछडा छूटी रे मोरी सखियाँ" की व्याकुलता थी. नायक के साथ सीटी बजाना सीखते सीखते "सुन सुन सुन जालिमा" गाया जा रहा था और गाँव की लोकधुन पर "नदिया किनारे मोरा डेरा मशाल जले सारी रतिया" गुनगुनाया जा रहा था.

"गायें गायें हम नए तराने गायें" के आधुनिक स्वरों के साथ "जमुना के तीर कान्हा आओ रो रो पुकारे राधा मीठी मीठी बंसिया बजाओ" की पुकार भी थी. हौले हौले ..हाय डोले.. के बोलों में बंगाल का जादू था और उड़ पुड जानिया में पंजाब की मिटटी की खुशबू थी. प्यार की प्यास के हिंदी गाने (उत्तर में हैं खडा हिमालय) में "आमार शोनार बांगला देश" की मधुर तान छेड़ रही थी और बंगाली फिल्म में "तेरे लिए आया हैं लेके कोई दिल" के हिंदी बोल सुना रही थी. "तालियों ना ताले" के सुरों पर गरबा का रास रचाया जा रहा था और मराठी में "गणपति बाप्पा मोरया, पुढल्या वर्षी लौकर या" गाकर गणेश भगवान् की आरती कर रही थी. माला सिन्हा की बनाई हुई नेपाली फिल्म में गाने गाये और फिर "जान लेके हथेली पे चल बैं जमाने से ना डरबएं राम" भोजपुरी में गा रही थी.

ममता गा रही थी "नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना" और एक नर्तिका की आवाज़ थी "माने ना माने ना माने ना , तेरे बिन मोरा जिया ना माने". "गुनगुन गुनगुन गुंजन करता भंवरा तुम कौन संदेसा लाये" की पार्वती थी और "एक नया तराना एक नया फ़साना एक नयी कहानी हूँ मैं, एक रंग रंगीली एक छैल छबीली मदमस्त जवानी हूँ मैं" की क्लब डांसर भी थी. मोरनी बनकर कह रही थी "आजा छाये कारे बदरा" और "आज नहीं तो कल बिखरेंगे ये बादल ओह रात के भूले हुए मुसाफिर सुबह हुई घर चल अब घर चल रे" गाकर हौसला बढा रही थी.

पाश्चात्य धुन पर थिरकता हुआ गीत "मुझे हुज़ूर तुमसे प्यार हैं तुम्हीं पे ज़िन्दगी निसार हैं" और हिंदुस्थानी संगीत का असर था "मेरे नैनों में प्रीत मेरे होंठों पे गीत मेरे सपनों में तुम ही समाये". ऐसे कई अलग अलग प्रकार के भावों के गीत गाती थी कि सुननेवाला दंग रह जाएँ. "कभी अकड़ कर बात न करना हमसे अरे मवाली " गानेवाली गायिका उसी संगीतकार के साथ मिल कर "जय जगदीश हरे" को अजरामर कर देती थी. रफी साहब के साथ तो ऐसे रसीले और सुरीले गीत गाये हैं कि उनका कोई जवाब नहीं. "अच्छा जी माफ़ कर दो, थोडा इन्साफ कर दो" गाया था फिल्म मुसाफिरखाना के लिए और उन्हीं के साथ "चुपके से मिले प्यासे प्यासे" जैसा तरल और स्वप्नील गीत भी गाया. बालक के जन्मदिन के शुभ अवसरपर एक बढिया सा गीत गाया था "पोम पोम पोम बाजा बोले ढोलक धिन धिन धिन, घडी घडी यह खुशियाँ आये बार बार यह दिन".

गीता को हमसे दूर जाकर पैंतीस से भी ज्यादा साल गुज़र चुके हैं. वैसे तो १९५० के मध्य से ही कुछ न कुछ कारणवश वो फ़िल्मी दुनिया से धीरे धीरे अलग हो रही थी. आज की तारीख में कल का बना हुआ गाना पसंद न करने वाले लोग भला ऐसे गानों को क्यूँ याद रखे और सुने जो शायद उनके जन्म लेने से भी पहले बने थे. सीधी सी बात यह हैं कि उन गीतों में अपनापन हैं, एक मिठास हैं और एक शख्सियत हैं जिसने हरेक गाने को अपने अंदाज़ में गाया. नायिका, सहनायिका, खलनायिका, नर्तकी या रस्ते की बंजारिन, हर किसी के लिए अलग रंग और ढंग के गाने गाये. "नाचे घोड़ा नाचे घोड़ा, किम्मत इसकी बीस हज़ार मैं बेच रही हूँ बीच बाज़ार" आज से साठ साल पहले बना हैं और फिर भी तरोताजा हैं. "आज की काली घटा" सुनते हैं तो लगता है सचमुच बाहर बादल छा गए हैं.

मुग्ध कन्या भानुमती पर फिल्माया गए गाने "कबूतर आजा आजा रे" और "झनन झनन झनवा मोरे बिछुआ झनन बाजे रे" ऐसी मिठास से बने हैं कि बार बार सुनने को दिल चाहता हैं. जाल के लिए साहिर साहब की रचना "जोर लगाके हैय्या पैर जमाके हैय्या" आज भी याद किया जाता है जब कोई कठिन काम करने के लिए लोग मिल जाते हैं. "सुन सुन मद्रासी छोरी के तेरे लिए दिल जलता" का जवाब दिया "चल हट रे पंजाबी छोरे के तू मेरा क्या लगता?". अलग किस्म के गाने , अलग कलाकार, अलग संगीतकार, अलग सहयोगी गायक, और अलग उन गानों के लेखक; मगर गीता दत्त का अपना ही अंदाज़ था. किसी ने कहा कि उनकी आवाज़ में शहद की मिठास और मधुमक्खी की चुभन का मिश्रण था. कोई कह गया कि ठंडी हवा में काली घटा समाई हुई थी. कोई कहता हैं गीता गले से नहीं दिल से गाती थी!

बीस से भी कम उम्र में मीराबाई के और कबीर के भजन जिस भाव और लगन से गाये उसी लगन से "दिल की उमंगें हैं जवाँ" जैसा फड़कता हुआ और मस्ती भरा गाना भी गाया. (इसी गाने में उन्हों ने कुछ शब्द भी कहें जो सुनाने लायक हैं). एक तरफ "जवानियाँ निगोडी यह सताएं, घूँघट मोरा उड़ उड़ जाएँ" और उसी फिल्म में गाया" अब कौन सुनेगा हाय रे दुखे दिल की कहानी". ऐसे कितने ही गाने हैं जो पहली बार सुनने के बावजूद भी लगता हैं कि कितना दिलकश गाना हैं, वाह वाह! "बूझो बूझो ए दिल वालों कौन सा तारा चाँद को प्यारा" बिलकुल संगीतकार पंकज मलिकके अंदाज़ में गाया था फिल्म ज़लज़ला में!

भले गाना पूरा अकेले गाती हो या फिर कुछ थोड़े से शब्द, एक अपनी झलक जरूर छोड़ देती थी. "पिकनिक में टिक टिक करती झूमें मस्तों की टोली" ऐसा युगल गीत हैं जिसमें मन्ना डे साहब और साथी कलाकार ज्यादा तर गाते हैं , और गीता दत्त सिर्फ एक या दो पंक्तियाँ गाती हैं. इस गाने को सुनिए और उनकी आवाज़ की मिठास और हरकत देखिये. ऐसा ही गाना हैं रफी साहब के साथ "ए दिल हैं मुश्किल जीना यहाँ" जिसमे गीता दत्त सिर्फ आखिरी की कुछ पंक्तियाँ गाती हैं. "दादा गिरी नहीं चलने की यहाँ.." जिस अंदाज़ में गाया हैं वो अपने आप में गाने को चार चाँद लगा देता हैं. ऐसा ही एक उदाहरण हैं एक लोरी का जिसे गीता ने गया हैं पारुल घोष जी के साथ. बोल हैं " आ जा री निंदिया आ", गाने की सिर्फ पहली दो पंक्तियाँ गीता के मधुर आवाज़ मैं हैं और बाकी का पूरा गाना पारुल जी ने गाया हैं.

बात हो चाहे अपने से ज्यादा अनुभवी गायकों के साथ गाने की (जैसे की मुकेश, शमशाद बेग़म और जोहराजान अम्बलावाली) या फिर नए गायकोंके साथ गाने की (आशा भोंसले, मुबारक बेग़म, सुमन कल्याणपुर, महेंद्र कपूर या अभिनेत्री नूतन)! न किसी पर हावी होने की कोशिश न किसीसे प्रभावित होकर अपनी छवि खोना. अभिनेता सुन्दर, भारत भूषण, प्राण, नूतन, दादामुनि अशोक कुमार जी और हरफन मौला किशोर कुमार के साथ भी गाने गाये!

चालीस के दशक के विख्यात गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ तो इतने ख़ूबसूरत गाने गाये हैं मगर दुर्भाग्य से उनमें से बहुत कम गाने आजकल उपलब्ध हैं. ग़ज़ल सम्राट तलत महमूद के साथ प्रेमगीत और छेड़-छड़ भरे मधुर गीत गायें. इन दोनों के साथ संगीतकार बुलो सी रानी द्वारा संगीतबद्ध किया हुआ "यह प्यार की बातें यह आज की रातें दिलदार याद रखना" बड़ा ही मस्ती भरा गीत हैं, जो फिल्म बगदाद के लिए बनाया गया था. इसी तरह गीता ने तलत महमूद के साथ कई सुरीले गीत गायें जो आज लगभग अज्ञात हैं.

जब वो गाती थी "आग लगाना क्या मुश्किल हैं" तो सचमुच लगता हैं कि गीता की आवाज़ उस नर्तकी के लिए ही बनी थी. गाँव की गोरी के लिए गाया हुआ गाना "जवाब नहीं गोरे मुखडे पे तिल काले का" (रफी साहब के साथ) बिलकुल उसी अंदाज़ में हैं. उन्ही चित्रगुप्त के संगीत दिग्दर्शन में उषा मंगेशकर के साथ गाया "लिख पढ़ पढ़ लिख के अच्छा सा राजा बेटा बन". और फिर उसी फिल्म में हेलन के लिए गाया "बीस बरस तक लाख संभाला, चला गया पर जानेवाला, दिल हो गया चोरी हाय..."!

सन १९४९ में संगीतकार ज्ञान दत्त का संगीतबद्ध किया एक फडकता हुआ गीत "जिया का दिया पिया टीम टीम होवे" शमशाद बेग़म जी के साथ इस अंदाज़ में गाया हैं कि बस! उसी फिल्म में एक तिकोन गीत था "उमंगों के दिन बीते जाए" जो आज भी जवान हैं. वैसे तो गीता दत्त ने फिल्मों के लिए गीत गाना शुरू किया सन 1946 में, मगर एक ही साल में फिल्म दो भाई के गीतों से लोग उसे पहचानने लग गए. अगले पांच साल तक गीता दत्त, शमशाद बेग़म और लता मंगेशकर सर्वाधिक लोकप्रिय गायिकाएं रही. अपने जीवन में सौ से भी ज्यादा संगीतकारों के लिए गीता दत्त ने लगभग सत्रह सौ गाने गाये.

अपनी आवाज़ के जादू से हमारी जिंदगियों में एक ताज़गी और आनंद का अनुभव कराने के लिए संगीत प्रेमी गीता दत्त को हमेशा याद रखेंगे.

प्रस्तुति - पराग संकला
(पराग गीता जी के बहुत बड़े भक्त हैं, उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर एक वेबसाइट भी बनाई है जो गीता जी की अमर आवाज़ को समर्पित है...गीता दत्त के जीवन से जुडी तमाम जानकारियाँ आप उनकी साईट पर पा सकते हैं, पता है -
गीता दत्त. कॉम




उपर पराग जी ने जिन गीतों का जिक्र किया है उनमें से अधिकतर गीतों को बहुत से श्रोताओं ने शायद कभी नहीं सुना होगा, तो लीजिये इनमें से कुछ बेहद अनसुने से दुर्लभ गीत आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं...गीता जी के और भी गीत हम समय समय पर आपको सुनवाते रहेंगें, ये वादा है...आज सुनिए ये चुनिन्दा नग्में -

बुलबुल मेरे चमन के...


आओगे न सजन आओगे न...


आज की काली घटा...


चलो पनिया भरन को...


एक रात की ये प्रीत...


और अंत में सुनिए ये लाजवाब गीत - उत्तर में खडा हिमालय....

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी...रफी साहब पूछ रहे हैं गीता दत्त से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 64

पुराने ज़माने की फ़िल्मों में नायक-नायिका की जोड़ी के अलावा एक जोड़ी और भी साथ साथ फ़िल्म में चलती थी, और यह जोड़ी हुआ करती थी दो हास्य-कलाकारों की। जॉनी वाकर एक बेहद मशहूर हास्य अभिनेता हुआ करते थे उन दिनो और हर फ़िल्म में निभाया हुआ उनका चरित्र यादगार बन कर रह जाता था। उन पर बहुत सारे गाने भी फ़िल्माये गये हैं जिनमें से ज़्यादातर रफ़ी साहब ने गाये हैं। जॉनी वाकर के बेटे नासिर ख़ान ने एक बार कहा भी था कि उनके पिता के हाव भाव की नक़ल गायिकी में रफ़ी साहब के सिवाय और दूसरा कोई नहीं कर पाता था। कुछ उदहारण देखिये रफ़ी साहब और जॉनी भाई की जोड़ी के गानों की "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये", "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ", "ऑल लाइन किलियर", "जंगल में मोर नाचा किसी ने ना देखा", "ये दुनिया गोल है", और "मेरा यार बना है दुल्हा" इत्यादि। ऐसी ही एक और फ़िल्म आयी थी 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' जिसमें जॉनी वाकर और कुमकुम पर एक बहुत ही मशहूर युगल-गीत फ़िल्माया गया था और जिसमें रफ़ी साहब के साथ गीत दत्त ने आवाज़ मिलाई थीं। कुछ मज़ेदार सवालों और उनके शरारती जवाबों को मिलाकर मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत को बड़े ही मज़ेदार अंदाज़ में लिखा था। और ओ. पी. नय्यर साहब ने भी वैसा ही संगीत दिया जैसा कि इस गीत की ज़रूरत थी। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पेश है "जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी अभी यहीं था किधर गया जी"। फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह गीत 'रोमांटिक कॉमेडी' की एक अद्‍भुत मिसाल है।

जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही पता चलता है 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' सन् १९५५ की फ़िल्म थी जो बेहद कामयाब रही। १९५४ में फ़िल्म 'आर-पार' की अपार कामयाबी के बाद अगले ही साल गुरु दत्त ने अपने ही बैनर तले 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' बनाई और ख़ुद नायक बने और मधुबाला बनीं नायिका। इस हास्य फ़िल्म के ज़रिए गुरु दत्त देश में चल रही सामाजिक और राजनैतिक अवस्था को परदे पर लाना चाहते थे और कुछ हद तक कामयाब भी रहे। गीत-संगीत के लिए भी वही टीम बरक़रार रही जो 'आर-पार' में थी, यानी कि नय्यर और मजरूह साहब, और गायकों की सूची में शमशाद बेग़म, गीता दत्त और महम्मद. रफ़ी। प्रस्तुत गीत ओ. पी नय्यर के संगीत में गुरु दत्त साहब का सब से पसंदीदा गीत रहा है, यह बात ख़ुद नय्यर साहब ने एक बार विविध भारती के 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में कही थी। उन्होने उसी कार्यक्रम में यह भी कहा था कि गुरु दत्त साहब ने एक बार कहा था कि "O.P. Nayyar translates lyrics into music". यह एक संगीतकार के लिए बहुत बड़ी तारीफ़ थी। तो लीजिए गुरु दत्त, नय्यर और मजरूह साहब, रफ़ी साहब और गीता दत्त, तथा जॉनी वाकर और कुमकुम को याद करते हुए आज का यह गुदगुदानेवाला गीत सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ओपी नय्यर, शम्मी कपूर और मोहम्मद रफी की तिकडी.
२. मजरूह साहब के दिलकश बोल.
३. मुखड़े में शब्द है - "मस्त मस्त"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी, सुमित जी और सलिल जी, एकदम सही जवाब.....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


आलसी सावन बदरी उडाये...भूपेन दा के स्वरों में

बात एक एल्बम की # 04

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


बतौर संगीतकार अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' (1974) साईन में उन्होंने लता से 'नैनों में दर्पण है' गवाया. इस गाने के बारे में भूपेन दा बताते है "एक दिन जब मैं रास्ते से गुजर रहा था तब एक पहाड़ी लडके को गाय चराते हुए इस धुन को गाते सुना इस गाने से मै इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उसी समय इस गाने की टियून को लिख लिया. हालांकि मैंने उसकी हू -बहू नक़ल नही किया मगर उसका प्लाट वही रखा ताकि उसकी आत्मा जिन्दा रहे.

और एक लम्बे अंतराल के बाद हिंदी में आई उनकी फिल्म "रुदाली" में एक बार फिर लता ने स्वर दिया उस अमर गीत को. 'दिल हूँ हूँ करे..." इस फिल्म में आशा ने अपनी आवाज़ से एक सजाया था बोल थे ...."समय धीरे चलो...". १९९२ में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वापस आते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ. "मैं और मेरा साया" में मूल असामी बोलों को हिंदी में तर्जुमा किया गुलज़ार साहब ने. गुलज़ार साहब ने इन सुंदर गीतों को हिंदी भाषी श्रोताओं को पेश कर बहुत उपकार किया है. इस एल्बम से गुजरना यानी भूपेन दा के मधुर स्वरों और शब्दों के असीम आकाश में विचरना. सच में एक अनूठा अनुभव है ये. आज इस अंतिम कड़ी में सुनिए ये तीन गीत -

ये किसकी सदा है ....


आलसी सावन बदरी उडाये....


और अंत में ये शीर्षक गीत - मैं और मेरा साया....


एल्बम "मैं और मेरा साया" के अन्य गीत यहाँ सुनें -

डोला रे डोला...
एक कली दो पत्तियां...
उस दिन की बात है रमैया...
हाँ आवारा हूँ...
कितने ही सागर....

भूपेन दा हिंदी फिल्म "एक पल" के सभी गीतों को सुनने के लिए यहाँ जाएँ -
दुर्लभ गीत फिल्म "एक पल" के

साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


सोमवार, 27 अप्रैल 2009

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दे....रोशन के संगीत में लता की आवाज़ पुरअसर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 63

फ़िल्म 'अनोखी रात' का मशहूर गीत "ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में" संगीतकार रोशन के संगीत से सजा आख़री गीत था। रोशन १६ नवंबर १९६७ को इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिये छोड़ गए, लेकिन पीछे छोड़ गए अपनी दिलकश धुनों का एक अनमोल ख़ज़ाना। फ़िल्म 'बहू बेग़म' भी उनके संगीत सफ़र के आख़री फ़िल्मों में से एक है। यह फ़िल्म भी १९६७ को ही प्रदर्शित हुई थी। एम. सादिक़ निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, मीना कुमारी और प्रदीप कुमार। यह फ़िल्म एक 'पिरियड ड्रामा' है जिसमें पुरुष प्रधान समाज का चित्रण किया गया है, और उन दिनो नारी को किस तरह से दबाया - कुचलाया जाता था उसका भी आभास मिलता है इस फ़िल्म में। मीना कुमारी की सशक्त अभिनय ने इस फ़िल्म को उतना ही यादगार बना दिया है जितना कि इस फ़िल्म के गीत-संगीत ने। आज इसी फ़िल्म का गीत सज रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। लता मंगेशकर की आवाज़ में "दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें, तुमको ना हो ख्याल तो हम क्या जवाब दें" फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने की एक ऐसी मोती है जिसकी चमक आज ४० सालों के बाद भी वैसी की वैसी बरकरार है।

"पूछे कोई कि दर्द-ए-वफ़ा कौन दे गया, रातों को जागने की सज़ा कौन दे गया, कहने से हो मलाल तो हम क्या जवाब दें" - साहिर लुधियानवीं के ऐसे ही सीधे सादे लेकिन बड़े ही ख़ूबसूरत और सशक्त तरीके से पिरोये हुए शब्दों का इस्तेमाल इस ग़ज़ल की खासियत है। और लताजी की मधुर आवाज़ और रोशन के पुर-असर धुन को पा कर तो जैसे यह ग़ज़ल जीवंत हो उठी है। भले लताजी ने ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लें बहुत कम गायीं हैं, उनकी शानदार और असरदार फ़िल्मी ग़ज़लों को सुनकर यह कमी भी पूरी हो जाती है। रात के सन्नाठे में कभी इस ग़ज़ल को सुनियेगा दोस्तों, एक अलग ही समां बंध जाता है, एक अलग ही संसार रचती है यह ग़ज़ल। यह ग़ज़ल है तो ३ मिनट की ही, लेकिन एक बार सुनने पर इसका असर ३ हफ़्ते तक रहता है। फ़िल्म में नायिका के दिल की दुविधा, समाज का डर, दिल की बेचैनी, शर्म-ओ-हया, सभी कुछ समा गया है इस छोटी सी ग़ज़ल में। समात फ़रमाइए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. जॉनी वाकर पर फिल्माया गया ओ पी नय्यर का रोमांटिक कॉमेडी गीत.
२. रफी और गीता दत्त की आवाजें.
३. गाने में कुछ खो गया है जिसे ढूँढने की कोशिश की जा रही है.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी सही जवाब है, नीलम जी भी पहचान गयी और मनु जी भी.भारत पंड्या जी ने फिल्म का नाम गलत बताया पर गाना एक दम सही है भाई..नीलम जी नाराज़ मत होईये...अभी तो महफिल सजी है आपकी पसंद का गाना भी ज़रूर सुनाया जायेगा....फिलहाल ये बताएं कि आज का गाना कैसा लगा. और हाँ जाईयेगा नहीं....आपके बिना तो महफिल का रंग ही बेरंग हो जायेगा :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


चाहा था एक शख़्स को .....महफ़िल-ए-तलबगार में आशा ताई की गुहार

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०८

कुछ कड़ियाँ पहले मैने मन्ना डे साहब का वास्तविक नाम देकर लोगों को संशय में डाल दिया था। पूरा का पूरा एक पैराग्राफ़ इसीपर था कि दिए गए नाम से फ़नकार को पहचानें। आज सोच रहा हूँ कि वैसा कुछ फिर से करूँ। अहा... आप तो खुश हो गए होंगे कि मैने तो इस आलेख का शीर्षक हीं "आशा ताई की गुहार" दिया है तो चाहे कोई भी नाम क्यों न दूँ फ़नकार तो आशा ताई हीं हैं। लेकिन पहेली अगर इतनी आसान हो तो पहेली काहे की। तो भाई पहेली यह है कि आज के फ़नकार एक संगीतकार हैं और उनका वास्तविक नाम है "मोहम्मद ज़हुर हासमी"। अब पहचानिए कि मैं किस संगीतकार के बारे में बात कर रहा हूँ। आपकी सहूलियत के लिए दो हिंट देता हूँ- क) इस आलेख के शीर्षक को सही से पढें। हम जिस गज़ल की आज बात कर रहे हैं..उसका नाम इस शीर्षक में है और उस गज़ल के एलबम के नाम में इन संगीतकार का नाम भी है। ख) १९७६ में बनी एक फ़िल्म में दो नायक और एक नायिका ऎसे त्रिकोण में उलझे कि एक बार मुकेश को तो एक बार लता जी को कहना पड़ा -"...दिल में ख़्याल आता है"। यह ख़्याल किसी और का नहीं..इन्हीं का था। चलिए एक अतिरिक्त हिंट भी देता हूँ.... दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए...इस गाने को आशा ताई ने गाया था..और इसके संगीतकार यही महानुभाव थे। अब आप लोग अपने दिमागी नसों पर जोर दें और हमारे आज के फ़नकार को पहचानें और उनका एहतराम करें।

मुझे मालूम है कि सारे हिंट आसान थे, इसलिए "ख़य्याम" साहब को पहचानने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई होगी। "ख़य्याम" साहब ने हिंदी फ़िल्मी-संगीत को एक से बढकर एक नग्में दिए हैं। वहीं अगर गैर-फ़िल्मी गानों या गज़लों की बात करें तो इस क्षेत्र में भी ख़य्याम साहब का खासा नाम है। जहाँ एक ओर इन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब, दाग़ दहलवी, वली साहब, अली सरदार ज़ाफ़री, मज़रूह सुल्तानपुरी, साहिर लु्धियानवी, कैफ़ी आज़मी जैसे पुराने और मंझे हुए गीतकारों और गज़लकारों के लिए संगीत दिया है, वहीं निदा फ़ाज़ली, नख़्स लायलपुरी, अहमद वासी जैसे नए गज़लगो की गज़लों को भी अपने सुरों से सजाया है। इस तरह ख़य्याम किसी एक दौर के फ़नकार नहीं कहे जा सकते है,उनका संगीत तो सदाबहार है। अब हम आज की गज़ल की ओर बढते हैं। महफ़िल-ए-गज़ल की दूसरी कड़ी में हमने इसी एलबम के एक गज़ल को सुनाया था-"लोग मुझे पागल कहते हैं"। मुझे उम्मीद है कि आप अभी तक उस गज़ल में आशा ताई की मखमली आवाज़ को नहीं भूले होंगे। उस गज़ल में जैसा सुरूर था, मैं दावा करता हूँ कि आपको आज की गज़ल में भी वैसा हीं सुरूर सुनाई देगा....वैसा हीं दर्द महसूस होगा। यह तो सबको पता होगा कि ख़य्याम साहब और आशा ताई ने बहुत सारे फ़िल्मी गानों में साथ काम किया है। इसी साथ का असर था कि "इन आँखों की मस्ती के","ये क्या जगह है दोस्तों" जैसे गानें बनकर तैयार हुए। इस जोड़ी की एक गज़लों की एलबम भी आई थी, जिसका नाम था "आशा और ख़य्याम"। आज की गज़ल "चाहा था एक शख़्स को" इसी मकबूल एलबम से है।

"आँखों को इंतज़ार का देके हुनर चला गया"- यह हुनर भी एक "कमाल" है, यह कभी एक कशिश है तो कभी एक खलिश है। प्यार में डूबी निगाहें इस इंतज़ार का अनुभव नहीं करना चाहतीं, वहीं जिन निगाहों को प्यार नसीब नहीं, उनके लिए यह इंतज़ार भी दुर्लभ होता है और वे इस मज़े के लिए तरसती हैं। तो फिर यह इंतज़ार है ना कमाल की चीज? कभी इस इंतज़ार का सही मतलब जानना हो तो उनसे पूछिये जिनका प्यार अब उनका नहीं रहा। उन लोगों ने इस इंतज़ार के तीन रूप देखे हैं- पहला: जब प्यार नहीं था तब इंतज़ार की चाह, दूसरा: जब प्यार उनकी पनाहों में था तब अनचाहे इंतज़ार का लुत्फ़ और तीसरा: अब जब प्यार उनका नहीं रहा तब इंतज़ार का दर्द। मेरे अनुसार अगर तीसरे इंतज़ार को छोड़ दें तो बाकी दो का अपना हीं एक मज़ा है। लेकिन तीसरा इंतज़ार इन दोनों पर कई गुणा भारी पड़ता है। अगर मालूम हो कि आप जिसकी राह देख रहे हों वह नहीं आने वाला लेकिन फिर भी आप उसकी राह तकने पर मजबूर हों तो इस पीड़ा को क्या नाम देंगे...किस्मत के सिवा.....!!!

आज की गज़ल की ओर बढने से पहले मैं अपना कुछ सुनाना चाहता हूँ। मुलाहजा फरमाईयेगा:

वो दूर गया अपनों की तरह,
फिर गैर हुआ सपनों की तरह।


यह तो हुआ मेरा शेर, अब हम आशा ताई की तरसती आँखों के जरिये प्रेम की अनबूझ कहानी का रसास्वादन करते हैं। आप खुद देखिये कि "कमाल" साहब ने अपने शब्दों से क्या कमाल किया है:

आँखों को इंतज़ार का देके हुनर चला गया,
चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया।

दिन की वो महफ़िलें गईं रातों के रतजगे गए,
कोई समेट कर मेरे शाम-औ-सहर चला गया।

झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़्याल-ए-यार भी,
हरसू बिखर बिखर गई खुशबू, जिधर चला गया।

उसके हीं दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है,
देके वो अपनी याद के शम्स-औ-क़मर चला गया।

कूँचा-ब-कूँचा दर-ब-दर कब से भटक रहा है दिल,
हमको भु्लाके राह वो अपनी डगर चला गया।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग किया हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर,
भेजा वही कागज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नहीं...

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का शब्द था -"रंगत". शब्द कुछ मुश्किल था शायद...खैर शन्नो जी ने कोशिश की -

चमन में खुशबू तो है फूलों की पर वीराना है
बदल जाती है इनकी रंगत उनके यहाँ आने से....

वो कौन है शन्नो जी ये भी बताईये...अरे अरे मनु जी को भी कुछ याद आ गया है सुनिए -

ये खुली खुली सी जुल्फें, ये उडी उडी सी रंगत,
तेरी सुब्हा कह रही है, तेरी रात का फ़साना...

वैसे शन्नो जी अब महफ़िल की शान बनती जा रही हैं...धीरे धीरे शे'रों में भी वज़न आ जायेगा :), शैलेश जी, सलिल जी और राज जी आप सब ने भी महफिल में खूब रंग जमाया...आभार.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

रविवार, 26 अप्रैल 2009

चंदा मामा मेरे द्वार आना...बच्चों के साथ बच्ची बनी आशा की आवाज़ में ये स्नेह निमंत्रण

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 62

साधारणत: हिन्दी फ़िल्मों के विषय नायक और नायिका को केन्द्र में रख कर ही चुने जाते हैं। लेकिन नायक-नायिका की प्रेम-कहानी के बिना भी सफ़ल फ़िल्में बनाई जा सकती है ये हमारे फ़िल्मकारों ने समय समय पर साबित किया है। ऐसी ही एक फ़िल्म है 'लाजवंती' जिसमें एक माँ और उसकी छोटी सी बच्ची के रिश्ते को बड़ी संवेदनशीलता से दर्शाया गया है। दोस्तों, मैने यह फ़िल्म बहुत साल पहले दूरदर्शन पर देखी था और जितना मुझे याद आ रहा है, इस फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की है कि ग़लतफ़हमी का शिकार पति (बलराज साहनी) अपनी पत्नी (नरगिस) को घर से निकाल देता है और इस तरह से माँ अपनी बेटी (बेबी नाज़) से भी अलग हो जाती है। थोड़े दिनो के बाद पति-पत्नी की ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है और वो घर भी वापस आ जाती है लेकिन बेटी के दिल में तब तक अपनी माँ के लिए इतना ज़हर भर चुका होता है कि यही फ़िल्म का मुख्य मुद्दा बन जाता है। अंततः जब बेटी को सच्चाई का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि तब तक नरगिस आत्महत्या के लिए निकल पड़ती है। नरगिस खाई में छलांग लगाने ही वाली है कि पीछे से उसकी बेटी उसे "माँ" कहकर पुकारती है और इस तरह से माँ-बेटी के पुनर्मिलन के साथ फ़िल्म का सुखांत होता है।

१९५८ की फ़िल्म 'लाजवंती' में सचिन देव बर्मन का संगीत था और इस फ़िल्म के ज़्यादातर गीतों को आशा भोंसले ने गाया था । "कोई आया धड़कन कहती है", "कुछ दिन पहले एक ताल में कमलकुंज के अंदर रहता था एक हंस का जोड़ा" और "गा मेरे मन गा, यूहीं बिताये जा दिन ज़िन्दगी के" जैसे गीत बेहद मशहूर हैं। सन १९५७ में लता मंगेशकर और सचिन देव बर्मन के बीच कुछ ग़लतफ़हमी हो गई थी जिसकी वजह से दोनों ने एक दूसरे के साथ काम करना बंद कर दिया था। इस ग़लतफ़हमी की पूरी कहानी हम किसी और दिन आपको तफ़सील से बताएँगे। तो इस ग़लतफ़हमी की वजह से दादा बर्मन लताजी के बजाये आशाजी से गाने गवा रहे थे। 'लाजवंती' इसी दौरान बनी फ़िल्म थी और शायद यही वजह रही होगी कि दादा ने इस फ़िल्म का एक भी गाना लताजी से नहीं गवाया। आज इस फ़िल्म से हम आपको सुनवा रहे हैं आशा भोंसले और साथियों का गाया एक बच्चोंवाला गाना और गाने के बोल हैं "चंदामामा मेरे द्वार आना"। यह लीजिये, यह तो तुकबंदी भी हो गई। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत में परदे पर बेबी नाज़ और दूसरे बच्चों को स्कूल के किसी जलसे में स्टेज पर गाते और नृत्य करते हुए दिखाया गया है। तो सुनिये यह गीत और याद कीजिये अपने स्कूल के दिनो को और अपने स्कूल के वार्षिक जलसों को...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. साहिर के बोल और रोशन का संगीत.
२. लता की जादूई आवाज़.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द से - "दुनिया"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
जहाँ पिछली बार ढेरों विजेता थे इस बार एक भी नहीं...गीत मुश्किल था, इस कारण सभी को माफ़ी दी जाती है....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


इस इतवार की कॉफी ऑनलाइन कवि सभा के साथ

Dr Shyam Sakha Shyam
डॉ श्याम सखा 'श्याम'
सभी कविता प्रेमियों को अप्रैल माह के अंतिम रविवार का नमस्कार। जो आवाज़ के पुराने श्रोता हैं, उन्हें तो समझ में आ ही गया होगा कि हमने आखिरी रविवार क्यों कहा। जी हाँ, हम लेकर हाज़िर है पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का ताज़ा अंक। इस बार कार्यक्रम की स्थाई संचालिका डॉ॰ मृदुल कीर्ति अनुपस्थित थीं। इसलिए इसबार संचालन का दायित्य डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' निभा रहे हैं। हिन्द युग्म के वार्षिकोत्सव में हमने श्याम जी के संचालन कौशल को देखा था,आज जब हमने उनसे संचालन हेतु कहा तो उन्होंने बताया कि वे व्यस्त हैं, और आज ही उनकी मेरिज एनिवर्सिरी भी है। पर हमारे कहने पर वे तैयार हो गये। उन्होंने अति व्यस्त कार्यक्र्म में यह संचालन किया हम उनके आभारी हैं।
डॉ० श्याम अपना-अपनी धर्मपत्नि व बच्चों के जन्मदिन था वैवाहिक वर्षगाँठ जैसे अवसरों पर अपने अस्पताल में मरीजो का मुफ़्त इलाज कर मनाते हैं। यह अलग बात है कि वे यह बात मरीजों को बताते नहीं कि वह आज जाँच-x-ray,test,ultrasound आदि मुफ़्त क्यों कर रहे हैं।

यद्यपि डॉ॰ मृदुल कीर्ति की अनुपस्थिति की सूचना हमें एक सप्ताह पहले मिल गई थी। उसके बाद हमने इसका संचालन युवा पत्रकार तरूश्री शर्मा को सौंप दिया था। परंतु अचानक उनके बीमार हो जाने से यह आपातकालीन स्थिति बनी, जिसके कारण हमें एक डॉक्टर की शरण में जाना पड़ा।

अब आप सुनें और बतायें कि हम अपने प्रयास में कितने सफल हुए हैं-
नीचे के प्लेयर से सुनें:

प्रतिभागी कवि- विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र', आचार्य संजीव 'सलिल', शारदा अरोरा, डॉ॰ अनिल चड्डा, एस कुमार शर्मा, हरिहर झा, रश्मि प्रभा, योगेन्द्र समदर्शी और कमलप्रीत सिंह।

यह भाग डाउनलोड करें।


यह कवि सम्मेलन तकनीक के माध्यम से अलग-अलग स्थानों पर बैठे कवियों को एक वर्चुअल मंच पर एक साथ बिठाने की कोशिश है। यदि आप हमारे आने वाले पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में भाग लेना चाहते हैं
1॰ अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com


पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के अगले अंक का प्रसारण 31 मई 2009 को किया जायेगा और इसमें भाग लेने के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की अन्तिम तिथि है 24 मई 2009

हम सभी कवियों से यह अनुरोध करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 10. Month: April 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।


शनिवार, 25 अप्रैल 2009

चल री सजनी अब क्या सोचें...सुनकर मुकेश के इस गीत कौन न रो पड़े...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 61

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ६१-वीं कड़ी में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। हिंदी फ़िल्मों में विदाई गीतों की बात करें तो सब से पहले "बाबुल की दुआयें लेती जा" ज़्यादातर लोगों को याद आती है। लेकिन इस विषय पर कुछ और भी बहुत ही ख़ूबसूरत गीत बने हैं और ऐसा ही एक विदाई गीत आज हम चुन कर ले आये हैं। मुकेश की आवाज़ में यह है फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' का गाना "चल री सजनी अब क्या सोचे, कजरा ना बह जाये रोते रोते"। मेरे ख़याल से यह गाना फ़िल्म संगीत का पहला लोकप्रिय विदाई गीत होना चाहिए। 'बम्बई का बाबू' १९६० की फ़िल्म थी। इससे पहले ५० के दशक में कुछ चर्चित विदाई गीत आये तो थे ज़रूर, जैसे कि १९५० में फ़िल्म 'बाबुल' में शमशाद बेग़म ने एक विदाई गीत गाया था "छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा", १९५४ में फ़िल्म 'सुबह का तारा' में लता ने गाया था "चली बाँके दुल्हन उनसे लागी लगन मोरा माइके में जी घबरावत है", और १९५७ में मशहूर फ़िल्म 'मदर इंडिया' में शमशाद बेग़म ने एक बार फिर गाया "पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली"। लेकिन मुकेश के गाये इस गीत में कुछ ऐसी बात थी कि गीत सीधे लोगों के दिलों को छू गया और आज भी इस गीत को सुनते ही जैसे दिल रो पड़ता है उस बेटी के लिये जो अपने बाबुल का घर छोड़ एक नये संसार में प्रवेश करने जा रही है। "बाबुल पछताए हाथों को मल के, काहे दिया परदेस टुकड़े को दिल के", "ममता का आँचल, गुड़ियों का कंगना, छोटी बड़ी सखियाँ घर गली अँगना, छूट गया रे" जैसे बोलों ने इस गीत को और भी ज़्यादा भावुक बना दिया है। मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत को लिखा था और संगीतकार थे हमारे बर्मन दादा।

'बम्बई का बाबु' के मुख्य कलाकार थे देव आनंद और सुचित्रा सेन। यूँ तो इस फ़िल्म के दूसरे कई गाने भी मशहूर हुए लेकिन इस गीत को सब से ज़्यादा लोकप्रिय इसलिये कहा जा सकता है क्योंकि अमीन सायानी के बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम में इस फ़िल्म के केवल इसी गीत को स्थान मिला था और वह भी पाँचवाँ। फ़िल्म की कहानी के मुताबिक यह गीत फ़िल्म में ख़ास जगह रखता है। सीन ऐसा है कि सुचित्रा सेन की शादी हो जाती है और वो अपने बाबुल का घर छोड़ विदा होती है। यह बात इस गीत को और भी ज़्यादा ग़मगीन बना देती है कि सुचित्रा सेन की शादी फ़िल्म के नायक देव अनंद से नहीं बल्कि किसी और से हो रही होती है। इस फ़िल्म के बाक़ी गीतों में रफ़ी साहब की आवाज़ थी, बस यह एक गीत ही सिर्फ़ मुकेश की आवाज़ में था। इस गीत में बर्मन दादा ने 'कोरस' का इतना बेहतरीन इस्तेमाल किया है कि 'इन्टरल्युड म्युज़िक' केवल शहनाई और कोरल सिंगिंग से ही बनाया गया है। इस गीत के आख़िर में करीब डेढ़ मिनट का संगीत है जो इसी तरह के शहनाई और कोरल सिंगिंग से बना है। यह ऐसा संगीत है जो कानों से सीधे दिल में उतर जाता है। तो लीजिये सुनिये विदा हो रही एक बेटी की व्यथा। हमें उम्मीद है कि गीत को सुनते हुए विदा हो रही किसी बेटी की तस्वीर आपके आँखों के सामने ज़रूर आ जाएगी क्योंकि मजरूह, दादा बर्मन और मुकेश ने मिलकर यही तस्वीर तो बनाई थी!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. चंदामामा को बुला रही है द्वार आशा की आवाज़.
२. बर्मन दा का संगीत, नर्गिस के अभिनय से सजी फिल्म.
३. मुखड़े में शब्द है - "हार"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार बहुत से विजेता रहे. नीरज जी, नीलम जी, मनु जी, सुमित जी, सलिल जी सभी के जवाब सही रहे, नीलम जी और पी एन साहब आपकी पसंद का गीत वाकई बहुत प्यारा है....जल्द ही सुनेंगे बने रहिये ओल्ड इस गोल्ड के साथ. अनिल जी और अवध जी, आपके जानकारी के बाद इन गीतों को सुनना और भी सुखद रहेगा...आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'आत्म-संगीत'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'आत्म-संगीत'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'स्‍वामिनी' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की अमर कहानी आत्म-संगीत, जिसको स्वर दिया है शोभा महेन्द्रू और अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 9 मिनट और 50 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

रानी का हृदय उछलने लगा। आह ! कितना मनोमुग्धकर राग था ! उसने अधीर होकर कहा—मॉँझी, अब देर न कर, नाव खोल, मैं एक क्षण भी धीरज नहीं रख सकती।
(प्रेमचंद की 'आत्म-संगीत' से एक अंश)


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कल रविवार (२६ अप्रैल २००९) का आकर्षण - पॉडकास्ट कवि सम्मलेन

#Eightenth Story, Atma-sangeet: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2009/13. Voice: Shobha Mahendru, Anurag Sharma

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

हम देखेंगे... लाज़िम है कि हम भी देखेंगे...

पाकिस्तान से कोई ताज़ा ख़बर है?... ज़रूर कोई बुरी ख़बर होगी। याद नहीं पिछली बार कब इस मुल्क से कोई अच्छी ख़बर सुनने को मिली थी। करेले जैसी ख़बरें वो भी नीम चढ़ी कि उनपर अफ़सोस करने के लिये न तो दिमाग़ के पास फ़ालतू-दिमाग़ रह गया है और न दिल के पास वो धड़कनें जो आंसू में ढल जाती हैं। नहीं दोस्त ये वाक़ई बुरी ख़बर है... और फिर जो कुछ मोबाइल पर कहा गया वो वाक़ई यक़ीन करने वाला नहीं था। इक़बाल बानों नहीं रहीं।

हँसी कब ग़ायब हो गई, बेयक़ीनी कब यक़ीन में बदल गई, पता ही नहीं चला। एक ऐसे मुल्क में जहाँ ख़तरनाक ख़बरें रोज़मर्रा की हक़ीक़त बन चुकी हैं। जहां मौत तमाशा बन चुकी है वहां इक़बाल बानों की मौत ने उस आवाज़ को भी हमसे छीन लिया जो ज़ख़्म भरने का काम करती थी, जो रूह का इलाज थी। “दश्ते तंहाई में ऐ जाने जहां ज़िंदा हैं…” फ़ैज़ की ये नज़्म अगर सुननेवालों के दिलों में ज़िंदा है तो इसकी एक बड़ी वजह इक़बाल बानों की वो आवाज़ है जो इसका जिस्म बन गई। बहरहाल ये सच है कि 21 अप्रैल 2009 को इकबाल बानो अपने चाहने वालों को ख़ुदा हाफिज़ कहके हमेशा-हमेशा के लिये रुख़सत हो गईं। और इसी के साथ ठुमरी, दादरा, ख़याल और ग़ज़ल की एक बेहतरीन ख़िदमतगुज़ार एक न मिटने वाली याद बन कर रह गई।

“हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे... हम देखेंगे” यूनिवर्सिटी के ज़माने से लेकर अब तक जब कभी ये नज़्म गायी गई, बदन में सिरहन दौड़ा गई। कई बार टेप की हुई आवाज़ में इसे सुना और साथ ही सुनीं वो हज़ारों तालियाँ जो लय के साथ-साथ गीत को ऊँचा और ऊँचा उठाती रहीं। मेरी इस बात से आप भी सहमत होंगे कि इस नज़्म के अलावा शायद ही कभी किसी और गीत को जनता का, श्रोताओं का, दर्शकों का इतना गहरा समर्थन कभी मिला हो, हमने तो कभी नहीं देखा-सुना हालांकि सब कुछ देखने-सुनने का कोई दावा भी हम नहीं करते। अवाम की आवाज़ में हुक्मरानों के ख़िलाफ़ पंक्ति दर पंक्ति व्यंग्य की लज़्ज़त महसूस करना और ताली बजाकर उसके साथ समर्थन का रोमांच जिन श्रोताओं की यादों का हिस्सा है उन्हें इक़बाल बानो की मौत कैसे खल रही होगी इसका अंदाज़ा हम लगा सकते हैं।

पता नहीं कितनों को ये इल्म है कि इकबाल बानों की पैदाइश इसी दिल्ली में हुई। दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खान ने उन्हें शास्त्रीय संगीत और लाइट क्लास्किल म्यूज़िक में प्रशिक्षित किया। पहली बार उनकी आवाज़ को लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली से सुना। विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। अगर इजाज़त हो तो ये कहना चाहूँगा कि हमारे पास दो बेगम अख़्तर थीं, विभाजन में हमने एक पाकिस्तान को दे दी। 1952 में, 17 साल की उम्र में उनकी शादी एक ज़मींदार से कर दी गई। इक़बाल बानो की इस शर्त के साथ कि उनके शौहर उन्हें गाने से कभी नहीं रोकेंगे। ताज्जुब है कि मौसिकी के नाम पर, एक इस्लामी गणराज्य में, एक शौहर अपनहे वचन के साथ अंत तक बँधा रहा और इक़बाल बानो की आवाज़ के करिश्में दुनिया सुनती रहीं।
1957 से वो संगीत की अपनी प्रस्तुतियों के द्वारा लोकप्रियता की सीढियाँ चढ़ने लगीं। और जल्दी ही फ़ैज़ के कलाम को गाने की एक्सपर्ट कही जाने लगीं। प्रगतिशील आंदोलन के बैनर तले जब भी, कहीं भी, कोई भी आयोजन हुआ तो इक़बाल बानो की आवाज़ हमेशा उसमें शामिल रही। हर ख़ास और आम ने इस आवाज़ को सराहा, उसे दिल से चाहा। हिंद युग्म उन्हें अपना सलाम पेश करता है।

--नाज़िम नक़वी


दश्ते तंहाई में ऐ जाने जहां ज़िंदा हैं (फैज़ अहमद फैज़)


हम देखेंगे.....लाज़िम है कि हम भी देखेंगे (फैज़ अहमद फैज़)


गोरी तोरे नैना काजर बिन कारे (ठुमरी)

संगत- साबरी खान (सारंगी), ज़ाहिद खान (हारमोनियम), रमज़ान खान (तबला), अबदुल हमीद साबरी (सुरमनदल) और साईद खान (सितार)।


इक़बाल बानो को हिन्द-युग्म की श्रद्धाँजलि

हम देखेंगे का वीडियो

सफल "हुई" तेरी अराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 3)

दोस्तों, शक्ति सामंत के फ़िल्मी सफ़र को तय करते हुए पिछली कड़ी में हम पहुँच गए थे सन् १९६५ में जिस साल आयी थी उनकी बेहद कामयाब फ़िल्म 'कश्मीर की कली'। आज हम उनके सुरीले सफ़र की यह दास्तान शुरु कर रहे हैं सन् १९६६ की फ़िल्म 'सावन की घटा' के एक गीत से। इस फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन, दोनो ही शक्तिदा ने किया था और इस फ़िल्म में भी नय्यर साहब का ही संगीत था।

गीत: आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया (सावन की घटा)


"आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया, मैं तो आगे बढ़ गयी पीछे ज़माना रह गया"। एस. एच. बिहारी के लिखे इस गीत के बोल जैसे शक्तिदा को ही समर्पित थे। 'हावड़ा ब्रिज', 'चायना टाउन', और 'कश्मीर की कली' जैसी 'हिट' फ़िल्मों के बाद इसमें कोई शक़ नहीं रहा कि शक्तिदा फ़िल्म जगत में बहुत ऊपर पहुँच चुके थे। उनका नाम भी बड़े बड़े फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों की सूची में शामिल हो गया। और साल दर साल उनकी प्रतिभा और सफलता साथ साथ परवान चढ़ती चली गयी। 'सावन की घटा' के अगले ही साल, यानी कि १९६७ में एक और मशहूर फ़िल्म आयी 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' जिसके गीत संगीत ने तो हंगामा मचा दिया। शम्मी कपूर, शंकर जयकिशन और मोहम्मद रफ़ी की तिकड़ी पहले से ही लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँच चुकी थी। इस फ़िल्म ने उनकी मुकुट पर एक और चमकता हीरा जड़ दिया। शक्तिदा किसी विदेशी शहर को आधार बनाकर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे। उनके अनुसार उस ज़माने में पैरिस को लेकर लोगों में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी थी और यूरोप के सबसे ख़ास शहर के रूप में भारतीय इसे मानते थे। इसलिए इस फ़िल्म के लिए पैरिस को ही चुना गया। उन्होने यह भी कहा था कि इस फ़िल्म की कहानी में कोई ख़ास बात नहीं थी, फ़िल्म चली अपने किस्मत के बलबूते। फ़िल्म के गीतों के लिए पैरिस से ही नर्तकियों को लिया गया था। एक फ़्रेंच निर्माता ने जब यह फ़िल्म देखी तो उन्होने शक्तिदा से अनुरोध किया कि वो उन्हे इस फ़िल्म के कुछ दृश्य उनकी अपनी फ़िल्म में इस्तेमाल करने की अनुमती दे दें। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के शूटिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा शक्तिदा ने फ़ौजी भाइयों के लिए प्रसारित विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में बताया था। हुआ यूँ कि वो लोग पैरिस में फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। उन दिनो 'जंगली' और 'संगम' के गानें पूरी दुनिया में धूम मचा रहे थे। एक दिन शक्तिदा, जयकिशन और शम्मी कपूर एक 'रेस्तोराँ' में बैठे हुए थे कि अचानक कुछ लोगों ने उन्हे घेर लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि जयकिशन और शम्मी कपूर ने उनको "आइ आइ या करूँ मैं क्या सुकू सुकू" गाना नहीं सुनाया। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के जिस गाने को वो उन दिनों फ़िल्मा रहे थे वह गाना था यह...

गीत: आसमान से आया फ़रिश्ता (ऐन ईवनिंग इन पैरिस)


साल १९६९। उस समय राजेश खन्ना राजेश खन्ना नहीं बने थे। उन्होने कुछ दो तीन फ़िल्मों में काम किया था, लेकिन वो फ़िल्में बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हो पायी थी। जब 'आराधना' की कहानी शक्तिदा के दिमाग़ में आयी, तो उन्हे लगा कि इस कहानी पर एक सफ़ल फ़िल्म तभी बनायी जा सकती है अगर नायक की भूमिका में कोई नया अभिनेता हो। उन्होने राजेश खन्ना का अभिनय देख रखा था और उन्हे उनका अभिनय काफ़ी पसंद भी आया था। जब उन्होने राजेश खन्ना से 'आराधना' में काम करने की बात की तो पहले पहले तो वो ज़्यादा ख़ुश नहीं हुए क्योंकि उनका किरदार 'इंटर्वल' से पहले ही मर जाता है और उनका डबल रोल काफ़ी देर बाद शुरु होता है। उन्हे लगा कि यह नायिका प्रधान फ़िल्म है जो उन्हे कामयाबी नहीं दिला सकती। लेकिन शक्तिदा ने उन्हे हर तरीके से समझाया, यहाँ तक कहा कि अगर फ़िल्म नाकामयाब भी होती है तो भी उन्हे उनके पूरे पैसे मिल जाएंगे। आख़िरकार राजेश खन्ना राज़ी हो गए और फ़िल्म का निर्माण शुरु हो गया। शक्तिदा ने बहुत ही कम बजट में यह फ़िल्म बना डाली और जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो वो लखपति बन गए। 'आराधना' मुंबई के 'बांद्रा टाकीज़' में रिलीज़ हुई थी। मद्रास के एक सिनेमाघर में यह फ़िल्म लगातार दो साल तक चली। इस फ़िल्म ने राजेश खन्ना के रूप में फ़िल्म जगत को दिया उसका पहला 'सुपर स्टार'। शर्मिला टैगोर के स्टाइल को भी उस युग की युवतियों ने गले लगाया। और इसी फ़िल्म से शुरुआत हुई राजेश खन्ना, आनंद बख्शी, सचिन देव बर्मन और किशोर कुमार के टीम की।

गीत: मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू (आराधना)


'आराधना' की बातें इतनी ज़्यादा हैं दोस्तों कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते, भले ही एक और अंक हमें बढ़ाने पड़ जाए। तो हुआ यूँ कि शुरुआत में यह तय हुआ था कि रफ़ी साहब बनेंगे राजेश खन्ना की आवाज़। लेकिन उन दिनो रफ़ी साहब एक लम्बी विदेश यात्रा पर गए हुए थे। इसलिए शक्तिदा ने किशोर कुमार का नाम सुझाया। उन दिनो किशोर देव आनंद के लिए गाया करते थे, इसलिए सचिनदा पूरी तरह से शंका-मुक्त नहीं थे कि किशोर गाने के लिए राज़ी हो जाएंगे। शक्तिदा ने किशोर को फ़ोन किया, जो उन दिनों उनके दोस्त बन चुके थे बड़े भाई अशोक कुमार के ज़रिए। किशोर ने जब गाने से इनकार कर दिया तो शक्तिदा ने कहा, "नखरे क्यूँ कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाए"। आख़िर में किशोर राज़ी हो गए। शुरु शुरु में सचिनदा बतौर गीतकार शैलेन्द्र को लेना चाह रहे थे, लेकिन यहाँ भी शक्तिदा ने सुझाव दिया कि क्यूँ ना सचिनदा की जोड़ी उभरते गीतकार आनंद बख्शी के साथ बनाई जाए। और यहाँ भी उनका सुझाव रंग लाया। जब तक रफ़ी साहब अपनी विदेश यात्रा से लौटते, इस फ़िल्म के करीब करीब सभी गाने रिकार्ड हो चुके थे सिवाय दो गीतों के, जिन्हे फिर रफ़ी साहब ने गाया। इनमें से एक गीत का संगीत राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था क्युंकि सचिनदा की तबीयत उन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रही थी। तो क्यूँ ना यहाँ पर वही गीत सुन लिया जाए!

गीत: बाग़ों में बहार है (आराधना)


'आराधना' में किशोर कुमार का गाया "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी 'बोल्ड' गीत था। सचिनदा ने इस गीत के लिए पहले जो धुन बनाई थी, उसमें किशोर कुमार को कुछ कमी सी लग रही थी, यानी कि जिस नशीले अंदाज़ की ज़रूरत थी वह नहीं आ पा रही थी। तब किशोरदा ने ही इसकी धुन को थोड़ा सा 'मॊर्डन' बना दिया जो बर्मन दादा को भी पसंद आया। अब बारी थी इस गाने के फ़िल्मांकन की। शक्तिदा साधारणतः अपने फ़िल्मों के रिकार्ड किए हुए गाने रात के वक़्त सुना करते थे और उनके फ़िल्मांकन के बारे में योजनाएँ बनाया करते थे। इस गीत के लिए उनके दिमाग़ में एक ख्याल आया कि क्यूँ ना इस गीत को एक ही 'शौट' में फ़िल्माया जाए! उन्होने एक काग़ज़ का पन्ना लिया और उस पर तीन अक्षर लिखे - ए, बी, सी। 'ए' नायक के लिए, 'बी' नायिका के लिए, और 'सी' कैमरे के लिए। और इस तरह से वो अपने मन ही मन में गाने का पूरा फ़िल्मांकन क़ैद कर लिया। उन्होने एक गोलाकार 'ट्राली' का इंतज़ाम किया और फ़िल्मालय स्टुडियो में इस गीत को फ़िल्मा लिया गया। शुरु शुरु में कई लोगों ने उनके इस एक शौट वाले विचार का विरोध किया था। किसी ने यहाँ तक कहा भी था कि "इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शौट में ले रहा है"। उस समय सभी के सवालों का शक्तिदा ने एक ही जवाब दिया था कि "जब रात को गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि कहाँ 'कट' करूँ"। और इस तरह से यह गीत हिंदी फ़िल्म जगत का पहला गाना बन गया जिसे केवल एक ही शौट में फ़िल्माया गया था। तो चलिए हम भी इस गीत की मादकता और नशीलेपन का आनंद उठाते हैं।

गीत: रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना (आराधना)


'आराधना' की कामयाबी सिर्फ़ शक्ति सामंत की कामयाबी नहीं थी, बल्कि राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर, आनंद बख्शी, किशोर कुमार जैसे तमाम कलाकारों के लिए यह फ़िल्म यादगार साबित हुई। इस फ़िल्म की कामयाबी के झंडे को लहराते हुए शक्तिदा ने प्रवेश किया ७० के दशक में। १९७० में उनके निर्देशन में फ़िल्म आयी 'पगला कहीं का'। निर्माता थे अजीत चक्रवर्ती। शम्मी कपूर और आशा पारेख अभिनीत इस फ़िल्म में शंकर जयकिशन ने एक बार फिर से 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' की तरह अपने सुरीले संगीत के जलवे बिखेरे हसरत जयपुरी के लिखे और लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे के गाए गीतों के ज़रिए। इस फ़िल्म का एक गीत ऐसा था जो हमें कभी उसे भुलाने नहीं देता। आप समझ गए होंगे कि हमारा इशारा किस तरफ़ है, जी हाँ, लताजी और रफ़ी साहब का गाया 'डबल वर्ज़न' गीत "तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे"।

गीत: तुम मुझे युं भुला ना पायोगे (पगला कहीं का)


"तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनायोगे"। इसमें कोई शक़ नहीं कि शक्तिदा के फ़िल्मों के गीतों को आज भी लोग बड़े प्यार से गुनगुनाते हैं, याद करते हैं। रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में यही गानें तो हैं जो हमारे सुख दुख के साथी हैं। ना कभी हम इन गीतों को भुला सकते हैं और ना ही इन गानों और इनके फ़िल्मों से जुड़े कलाकारों को। और शायद यही वजह है कि आज हम 'आवाज़' के इस मंच पर शक्ति सामंत को याद कर रहे हैं, उन्हे श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं। पहले हमने सोचा था कि इस श्रद्धांजली को हम चार भागों में पोस्ट करेंगे, लेकिन शक्तिदा के फ़िल्मों की सूची इतनी लम्बी है और इन फ़िल्मों के गाने इतने प्यारे हैं कि हम बड़ी मुशकिल में पड़ गए कि किस फ़िल्म को छोड़ें, और किस फ़िल्म का ज़िक्र करें। इसलिए हमने तय किया है कि हम इस श्रद्धांजली को तब तक जारी रखेंगे जब तक शक्तिदा के सभी फ़िल्मों का ज़िक्र हम इत्मीनान से कर नहीं लेते। चौथे भाग के साथ हम बहुत जल्द वापस आयेंगे, तब तक पढ़ते रहिए और सुनते रहिए 'आवाज़'।

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

तू गंगा की मौज, मैं जमुना का धारा....रफी साहब के श्रेष्ठतम गीतों में से एक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 60

दोस्तों, जब हमने आपको फ़िल्म बैजु बावरा का गीत "मोहे भूल गए सांवरिया" सुनवाया था तब हमने इस बात का ज़िक्र किया था कि इस फ़िल्म का हर एक गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल होने की काबिलियत रखता है। इसलिए आज हमने सोचा कि क्यों न इस फ़िल्म का एक और गीत आप तक पहुँचाया जाए! तो लीजिए पेश है बैजु बावरा फ़िल्म का सबसे 'हिट' गीत "तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा"। युं तो इस गीत को मुख्य रूप से रफ़ी साहब ने ही गाया है, लेकिन आख़िर में लताजी और साथियों की भी आवाज़ें मिल जाती हैं। राग भैरवी पर आधारित यह गीत संगीतकार नौशाद और गीतकार शक़ील बदायूनीं की जोड़ी का एक महत्वपूर्ण गीत है। इस गीत के लिए नौशाद साहब को १९५४ में शुरु हुए पहले 'फ़िल्म-फ़ेयर' पुरस्कार के तहत सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला था। मीना कुमारी को भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था इसी फ़िल्म के लिये। लेकिन फ़िल्म के नायक भारत भूषण को पुरस्कार न मिल सका क्योंकि सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार उस साल ले गये दिलीप कुमार फ़िल्म "दाग़" के लिए। १९५३ में बैजु बावरा बनी थी और उसी साल से अमीन सायानी का मशहूर रेडियो प्रोग्राम गीतमाला शुरु हुआ था और इसी गीत को उस साल के सबसे लोकप्रिय गीत के रूप में इस कार्यक्रम में चुना गया था।

'बैजु बावरा' फ़िल्म के इस गीत के बारे में तो हम बता चुके, आइए अब कुछ बातें इस फ़िल्म के बारे में भी हो जाए! जैसा कि आपको पता होगा फ़िल्मकार भाइयों की जोड़ी विजय भट्ट और शंकर भट्ट प्रकाश पिक्चर्स के बैनर तले फ़िल्में बनाया करते थे। ४० के दशक में एक के बाद एक धार्मिक और पौराणिक फ़िल्में बनाने की वजह से एक समय ऐसा आया कि उनकी आर्थिक अवस्था काफ़ी हद तक ख़राब हो गई। यहाँ तक की प्रकाश पिक्चर्स को बंद करने की नौबत आने ही वाली थी। कोई और उपाय न पा कर दोनो भाई पहुँच गए नौशाद साहब के पास। नौशाद साहब के सम्पर्क में आकर उनके क़िस्मत का सितारा एक बार फिर से चमक उठा 'बैजु बावरा' के रूप में। 'बैजु बावरा' की अपार सफ़लता ने भट्ट भाइयों को डूबने से बचा लिया। दोस्तों, 'बैजु बावरा' से संबंधित कुछ और जानकारियाँ हम सुरक्षित रख रहे हैं किसी और अंक के लिए जब हम आपको इस फ़िल्म का एक और गाना सुनवायेगे। तो लीजिये, आज पेश है "तू गंगा की मौज..."



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. फिल्म के शीर्षक में "बम्बई" शब्द है. देव आनंद मुख्य कलाकार हैं.
२. बर्मन दा के संगीत से सजा एक अमर गीत है ये.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"बाबुल".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
भाई कल तो जम कर वोटिंग हुई, दो खेमे बँट गए एक तरफ रहे समीर लाल जी, पी एन साहब और नीलम जी, और दूसरी तरफ हमारे दिग्गज मनु और नीरज. इस बार जीत दिग्गजों की हुई. दरअसल जिस गीत का समीर लाल जी ने जिक्र किया वो भी नौशाद साहब का ही है पर वो लता और रफी का एक युगल गीत है जो दिलीप कुमार और मीना कुमारी पर फिल्माया गया है. जबकि आज का ये गीत मूलतः रफी साहब के स्वर में है, बस यही फर्क है. पर आपका सुझाया गीत भी बेहद प्यारा है और जल्द ही ओल्ड इस गोल्ड पर आएगा. निश्चिंत रहें. संगीता जी और प्रकाश जी का भी महफिल में स्वागत.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


आदमी बुलबुला है पानी का..... महफ़िल-ए-यादगार और तख़्लीक-ए-गुलज़ार

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०७

कुछ फ़नकार ऎसे होते हैं,जिनके बारे में लिखने चलो तो न आपको मस्तिष्क के घोड़े दौड़ाने पड़ते हैं और न हीं आपको अतिशयोक्ति का सहारा लेना होता है, शब्द खुद-ब-खुद हीं पन्ने पर उतरने लगते हैं। यूँ तो आलेख लिखते समय लेखक को कभी भी भावुक नहीं होना चाहिए, लेकिन आज के जो फ़नकार हैं उनकी लेखनी का मैं इस कदर दीवाना हूँ कि तन्हाई में भी मेरे इर्द-गिर्द उनके हीं शब्द घूमते रहते हैं। और इसलिए संभव है कि आज मैं जो भी कहूँ जो भी लिखूँ, वह आपको अतिशय प्रतीत हो। पिछले अंक में हमने "गज़लजीत" जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ का मजा लूटा था और उस पुरकशिश आवाज़ के सम्मोहन का असर देखिए कि हम आज के अंक को भी उन्हीं की स्वरलहरियों के सुपूर्द करने पर मजबूर हैं। तो आप समझ गए कि हम किस फ़नकार की बातें कर रहे थे... जगजीत सिंह। वैसे आज के गीत को साज़ और आवाज़ से इन्हीं से सजाया है, लेकिन आज हम जिनकी बात कर रहे हैं, वह इस गाने के संगीतकार या गायक नहीं बल्कि इसके गीतकार हैं। बरसों पहले "काबुलीवाला" नाम की एक फिल्म आई थी, जो अपनी कहानी और अदायगी के कारण तो मकबूल हुई हीं, उसकी मकबूलियत में चार चाँद लगाया था "ऎ मेरे प्यारे वतन,ऎ मेरे प्यारे बिछड़े चमन" ने। इस गीत के गीतकार "प्रेम धवन" थे। अरे नहीं... आज हम उनकी बात नहीं कर रहे। उनकी बात समय आने पर करेंगे। इस फिल्म में एक और बड़ा हीं दिलकश और मनोरम गीत था- "गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे" । आज हम इसी गीत के गीतकार की बात कर रहे हैं। शायद आप समझ गए होंगे। नहीं समझे तो एक और हिंट देता हूँ। इसी साल इनको एकेडमी अवार्ड से सुशोभित किया गया है। अब समझ गए ना...... जी हाँ हम पद्म भूषण श्री संपूरण सिंह "गुलज़ार" की बात कर रहे हैं।

मैने पहले हीं लिख दिया है कि "गुलज़ार" के बारे में लिखने चलूँगा तो भावों के उधेड़-बुन में उलझ जाऊँगा..इसलिए सीधे-सीधे गाने पर आता हूँ। २००६ में गु्लज़ार साहब (इन्हें अमूमन इसी नाम से संबोधित किया जाता है) और जगजीत सिंह जी की गैर-फिल्मी गानों की एक एलबम आई थी "कोई बात चले"। यूँ तो जगजीत सिंह गज़ल-गायकी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस एलबम के गीतों को गज़ल कहना सही नहीं होगा, इस एलबम के गीत कभी नज़्म हैं तो कभी त्रिवेणी। त्रिवेणी को तख़्लीक़-ए-गुलज़ार भी कहते हैं क्योंकि इसकी रचना और संरचना गुलज़ार साहब के कर-कमलों से हीं हुई है। त्रिवेणी वास्तव में क्या है, क्यों न गु्लज़ार साहब से हीं पूछ लें। बकौल गु्लज़ार साहब : "शुरू शुरू में जब ये फ़ार्म बनाई थी तो पता नहीं था यह किस संगम तक पहुँचेगी - त्रिवेणी नाम इसलिए दिया था कि पहले दो मिसरे गंगा, जमुना की तरह मिलते हैं और एक ख़्याल ,एक शेर को मुकम्मल करते हैं। लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है - सरस्वती, जो गुप्त है, नज़र नहीं आती। त्रिवेणी का काम सरस्वती दिखाना है । तीसरा मिसरा कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है, छुपा हुआ है।" गुलज़ार साहब की एक त्रिवेणी जो मुझे बेहद पसंद है:

"कुछ इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में

अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा!"


इसे क्या कहियेगा कि जो चीज हमें सबसे आसानी से हासिल हो, उसे समझना सबसे ज्यादा हीं मुश्किल हो। ज़िंदगी कुछ वैसी हीं चीज है। और इस ज़िंदगी को जो बरसों से बिना समझे हीं जिए जा रहा है,उसे क्या कहेंगे। इंसान न खुद को समझ पाया है और न खुद की ज़िंदगी को, फिर भी बेसाख़्ता हँसता है, बोलता है और हद यह कि खुद पर गुमां करता है और दूसरों को समझने का दावा भी करता है। इस जहां में जो भी जंग-औ-जु्नूं है, उसकी सलामती का बस एक हीं सबब है और वह है नासमझी की नुमाइंदगी: अपनी हस्ती की नासमझी, अपनी ज़िंदगी की नासमझी और तो और दूसरों की ज़िंदगी की नासमझी। जिस रोज यह अदना-सी चीज हमारे समझ में आ गई, उस दिन सारी तकरारें खत्म हो जाएँगीं और फिर हम कह सकेंगे कि बस कुछ रोज जीकर हीं हमने इस ज़िंदगी को जान लिया है।

मैने कभी इन्हीं भावों को एक त्रिवेणी में पिरोने की कोशिश की थी। मुलाहजा फरमाईयेगा:

यूँ फुर्सत से जीया कि अख्तियार ना रहा,
कब जिंदगी मुस्कुराहटों की सौतन हो गई।

आदतन अब भी मुझे दोनों से इश्क है॥

"ज़िंदगी क्या है जानने के लिए" में गुलज़ार साहब इन्हीं मुद्दों पर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। तो लीजिए आप सबके सामने पेश-ए-खिदमत है ज़िंदगी की बेबाक तस्वीर:

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख़ तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता - आदमी बुलबुला है पानी का।

ज़िंदगी क्या है जानने के लिए,
जिंदा रहना बहुत जरूरी है।

आज तक कोई भी रहा तो नहीं॥

सारी वादी उदास बैठी है,
मौसम-ए-गुल ने खुदकुशी कर ली।

किसने बारूद बोया बागों में॥

आओ हम सब पहन लें आईनें,
सारे देखेंगे अपना हीं चेहरा।

सब को सारे हसीं लगेंगे यहाँ॥

हैं नहीं जो दिखाई देता है,
आईने पर छपा हुआ चेहरा।

तर्जुमा आईने का ठीक नहीं॥

हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी,
तुम सलामत रहो हजार बरस।

ये बरस तो फ़क़त दिनों में गया॥

लब तेरे मीर ने भी देखे हैं,
पंखुरी इक गुलाब की सी है।

बातें सुनते तो ग़ालिब हो जाते॥

ऎसे बिखरे हैं रात-दिन जैसे,
मोतियों वाला हार टूट गया।

तुमने मुझको पिरोके रखा था॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग किया हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -
(आज आप इस शब्द में गुंथी त्रिवेणियाँ भी पेश कर सकते हैं)

पहले रग रग से मेरी खून निचोडा उसने,
अब ये कहता है कि रंगत ही मेरी नीली है...

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का शब्द था -"सर". सलिल जी क्या शुरुआत की है आपने दमदार, लगता है शब्द सुनकर जोश आ गया...

सर को कलम कर लें भले, सरकश रहें हम.
सजदा वहीं करेंगे, जहाँ आँख भी हो नम.

उलझे रहो तुम घुंघरुओं, में सुनते रहो छम.
हमको है ये मालूम,'सलिल'कम नहीं हैं गम.

वाह...चुनावी मौसम का असर लगता है मनु जी पे छा गया है तभी तो कहा -

उंगलियाँ घी में सभी और सर कढाई में ,
इतना सब खाके भी वो देख मुकर जाते हैं

पर भाई ग़ालिब के शेर याद दिला कर एहसान किया ...वाह -

हुआ जब गम से यूं बेहिस तो गम क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से तो जानू पर धरा होता.....

इस बात पर बशीर साहब का शेर भी याद आया -

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा...

बदले से आसार हैं मन लगता नहीं है अब लोगों के दरमियाँ
रंगे-महफ़िल जमी हो जहाँ गानों की, वहीँ सर छुपा के सुकूं पाते हैं.

शन्नो जी, नीलम जी और पूजा जी, महफिले सजती रहेंगी जब तक आप जैसे कद्रदान यहाँ आते रहेंगे....

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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