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Friday, August 11, 2017

गीत अतीत 25 || हर गीत की एक कहानी होती है || कहना ही क्या || बोम्बे || महबूब || ऐ आर रहमान || के एस चित्रा

Geet Ateet 25
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
(Silver Jubilee Episode)
Kehna Hi Kya
Bombay
Mehboob 
Also featuring A R Rahman & K S Chitra


"मणि सर ने जैसे मेरा चेहरा पढ़ लिया था, पूछने लगे महबूब क्या बात है , क्या तुम गाने से खुश नहीं हो ?" -    महबूब  

गीत अतीत ; हर गीत की एक कहानी होती है के इस सिल्वर जुबली एपिसोड में पेश है सदाबहार क्लासिक गीत "कहना ही क्या" के बनने की ऐसी दिलचस्प दास्ताँ जिससे बहुत कम ही संगीत प्रेमी वाकिफ होंगें. लीजेंडरी गीतकार महबूब साहब आज हैं हमारे मेहमान. जानिए क्यों हम मनीषा कोइराला को इस गीत में थिरकते देखने से वंचित रह जाते अगर महबूब भाई के सुझाव को मणि रत्नम ने नहीं माना होता, प्ले पर क्लिक करे और अभी सुनें...




डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Tuesday, April 27, 2010

बुल्ले शाह के "रांझा-रांझा" को "रावण" के रंग में रंग दिया रहमान और गुलज़ार ने... साथ है "बीरा" भी

ताज़ा सुर ताल १६/२०१०

सुजॊय - ताज़ा सुर ताल' के एक नए अंक के साथ हम सभी श्रोताओं व पाठकों का हार्दिक स्वागत करते हैं। पिछले हफ़्ते किसी कारण से 'टी.एस.टी' की यह महफ़िल सज नहीं पाई थी। दोस्तों, सजीव जी इन दिनों छुट्टियों के मूड में हैं, इसलिए आज मेरे साथ 'ताज़ा सुर ताल' में उनकी जगह पर हैं विश्व दीपक तन्हा जी। विश्व दीपक जी, वैसे तो आप 'आवाज़' में नए नहीं हैं, लेकिन इस स्तंभ में आप पहली बार मेरे साथ हैं। इसलिए मैं आपका स्वागत करता हूँ।

विश्व दीपक - शुक्रिया सुजॊय जी! मुझे भी बेहद आनंद आ रहा है इस स्तंभ में शामिल हो कर। वैसे मैं एक बार आपकी अनुपस्थिति में फ़िल्म 'रण' के गीत संगीत की चर्चा कर चुका हूँ इसी स्तंभ में। इसलिए यह कह सकते हैं कि यह दूसरी मर्तबा है कि मैं इस स्तंभ में शामिल हूँ बतौर होस्ट और जिस तरह का सजीव जी का मूड है, उस हिसाब से मुझे लगता है कि अगले एक-डेढ महीने तक मैं आपके साथ रहूँगा। खैर यह बताईये कि आज किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने का इरादा है?

सुजॊय - देखिए इन दिनों जिन फ़िल्मों के प्रोमोज़ और गीतों की झलकियाँ दिखाई व सुनाई दे रहीं हैं, उनमें कुछ नाम हैं 'बदमाश कंपनी', 'हाउसफ़ुल', 'मुस्कुराकर देख ज़रा'। लेकिन इन सब से बिल्कुल अलग हट कर जो फ़िल्म आनेवाली है और जिसके प्रति लोगों की उत्सुक्ता दिन ब दिन बढ़ती सी दिखाई दे रही है, वह फ़िल्म है 'रावण'। ऐसे में इस फ़िल्म की चर्चा इस स्तंभ में अनिवार्य हो जाता है।

विश्व दीपक - बिल्कुल ठीक कहा। मणिरत्नम निर्मित एवं निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय, विक्रम, गोविंदा, प्रियामणि, रविकिशन और निखिल द्विवेदी ने। गुलज़ार के गीत हैं और संगीत ए. आर. रहमान का।

सुजॊय - यानि कि पूरी की पूरी एक ज़बरदस्त टीम। देखना है कि अभिषेक-ऐश के साथ रहमान की तिकड़ी क्या वही कमाल दिखाती है जो कमाल फ़िल्म 'गुरु' में हुआ था!

विश्व दीपक - सिर्फ़ अभि-ऐश के साथ ही क्यों, मणिरत्नम और रहमान की ऐतिहासिक जोड़ी शुरु हुई थी १९९२ में 'रोजा' से। उसके बाद 'बॊम्बे', 'दिल से', 'साथिया', 'युवा' और 'गुरु' जैसी यादगार फ़िल्में। ऐसे में अगर लोगों को 'रावण' के म्युज़िक से उम्मीदें हैं तो वो जायज़ हीं हैं। तो चलिए शुरू करते हैं गीतों का सिलसिला। सुनते हैं पहला गीत और फिर चर्चा आगे बढ़ाते हैं।

गीत: बीरा बीरा


सुजॊय - दरअसल यह गीत फ़िल्म के मुख्य पात्र बीरा (अभिषेक बचन) से संबंधित है। जैसा कि आपने सुना कि गीत की धुन और रीदम ट्राइबल अंदाज़ का है। विजय प्रकाश, मुस्तफ़ा कुटोन और कीर्ति सगठिया का गाया यह गीत हो सकता है कि अलग से सुन कर बहुत ज़्यादा अपील ना करे, लेकिन फ़िल्म की कहानी, पात्र और सिचुयशन के मुताबिक ज़रूर सटीक होगी!

विश्व दीपक - और इस गीत की अवधि भी इतनी कम है कि जब तक इसकी रीदम और धुन ज़हन में चढ़ती है, तब तक गीत समाप्त हो चुका होता है। वैसे इसी तरह का एक गीत गुलज़ार साहब ने "ओंकारा" में भी लिखा था। वहाँ भी मुख्य नायक के इंट्रोडक्शन के लिए एक विशेष गीत की ज़रूरत थी। अलग बात यह है कि वहाँ पर गाने में दो अंतरे थे, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहब को अपनी बात एक हीं अंतरे में कहनी थी। और मेरे हिसाब से वो इसमें सफ़ल हुए हैं। सुजोय जी, शायद आपने यह ध्यान न दिया हो लेकिन इस गीत में रहमान की भी आवाज़ है, भले हीं उनका नाम सीडी कवर पर नहीं दिखता। यह तो आपको मानना हीं पड़ेगा कि अलग किस्म का संगीत है इसमें और हाँ कुछ-कुछ अफ़्रीकन तो कुछ-कुछ चाईनीज अफ़ेक्ट भी है।

सुजॊय - जी.. मुस्तफ़ा कुटोन का इस्तेमाल रहमान ने शायद इसी कारण से किया है। क्योंकि उनकी आवाज़ में एक्ज़ोटिक टच है।

विश्व दीपक - बहुत हद तक संभव है। चलिए अब आगे बढ़ते हैं और आ जाते है दूसरे गीत पर। पहले गीत से बिल्कुल अलग यह गीत है "बहने दे मुझे बहने दे"। इस गीत को सुनते हुए फ़िल्म 'दिल से' के "सतरंगी रे" की याद आ ही जाती है।

सुजॊय - हाँ, ख़ास कर "बहने दे" "सतरंगी रे" के अंतरे "थोड़ा थोड़ा उन्स हुआ... मुझे मौत की गोद में सोने दे" से कुछ कुछ मिलता जुलता है। और इन दोनों गीतों में रहमान का स्टाइल साफ़ झलकता है। "सतरंगी" सोनू निगम की आवाज़ में था, और यह गीत गाया है कार्तिक ने। कार्तिक से रहमान ने फ़िल्म 'गजनी' में "बहका मैं बहका" गवाया था।

विश्व दीपक - कार्तिक ने हिंदी में बहुत कम गानें गाए हैं, लेकिन जो भी दो चार गानें इन्होने गाए हैं, सभी अच्छे हैं। उन्हे और ज़्यादा मौके मिलने चाहिए। इस गीत में बहुत सी अलग-अलग ध्वनियों का सहारा लिया गया है। कई उतार चढ़ाव को पार करते हुए ६ मिनट के इस गीत में कार्तिक एक ऐसे शख़्स के दिल की ख़्वाहिशें बयान करते हैं जो सारे बंधनों को तोड़ कर एक ज़िंदगी जीना चाहता है जो उसकी उसूलों पर हो।

गीत: बहने दे


सुजॊय - 'रावण' फ़िल्म का तीसरा गीत एक बार फिर "बीरा बीरा" के अंदाज़ का है। सुखविंदर सिंह की आवाज़ में एक ऐटिट्युड है, जो उन्होने कई गीतों में समय समय पर दिखाया है। इस गीत में भी उनकी गायकी का वही ऐटिट्युड भरा अंदाज़ सुनाई देता है। यह गीत है "ठोक दे किल्ली"

विश्व दीपक - इस गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है। ढोलक, पार्श्व में कोरस, शहनाई, और इलेक्ट्रिक गिटार, इन सब के फ़्युज़न से यह गीत एक प्रयोगधर्मी गीत बन गया है, और उस पर गुलज़ार साहब के ग़ैर पारंपरिक बोलों से गीत अनूठा बन गया है। लेकिन यह बात भी सच है कि इस तरह के गानें पूरी तरह से सिचुयशनल होते हैं जो फ़िल्म के परदे पर ही फ़िट बैठते हैं। आम जनता की ज़ुबाँ पर ये गानें मुश्किल से ही चढ पाते हैं।

सुजॊय - दरअसल यह फ़िल्म पर निर्भर करता है कि उसका संगीत किस तरह का होना चाहिए। अगर कहानी और प्लॊट अनुमति नहीं दे रहे हैं, तो संगीतकार भी कुछ ख़ास नहीं कर पाता। कुछ फ़िल्में संगीत के बलबूते पर चलती है और कुछ कहानी, अभिनय के बलबूते। उम्मीद करता हूँ कि यह फिल्म दोनों मायनों में सफ़ल हो।

विश्व दीपक - सुजोय जी, मैं आपकी बातों से इत्तेफ़ाक रखता हूँ। और वैसे भी कोई गाना कितना भी सिचुएशनल क्यों न हो, अगर उस गाने में रहमान और गुलज़ार साहब के नाम जुड़ जाते है, तो उस गाने का असर दूसरे सिचुएशनल गानों से कहीं ज्यादा होता है। जैसे कि इसी गाने को ले लीजिए... गुलज़ार साहब ने बड़े हीं आसान शब्दों (किल्ली, बिल्ली, खिल्ली, दिल्ली... ) में बहुत हीं बड़ी कह दी है.. उदाहरण के लिए यह पंक्ति "अबकी बार हिसाब चुका ले, छिन के ले ले अपना हिस्सा.. अपना खून भी लाल हीं होगा... खोल के देख ले खाल की झिल्ली"।

गीत: ठोक दे किल्ली


विश्व दीपक - चौथा गीत है "रांझा रांझा ना कर हीरे जग बदनामी होये"। रेखा भारद्वाज, जावेद अली और अनुराधा श्रीराम के गाए इस गीत से आपको सुभाष घई की फ़िल्म 'ताल' के संगीत की याद न आ जाए तो कहिएगा। लोक शैली पर बना यह गीत जोशीला भी है, सेन्शुयल भी है, और सूफ़ियाना अंदाज़ का है। लोक संगीत के साथ में मोडर्न बीट्स और गिटार का सुंदर फ़्युज़न किया गया है इस गाने में।

सुजॊय - अनुराधा श्रीराम की आवाज़ बहुत दिनों के बाद सुनने में आई है। गुलज़ार साहब के लोकशैली के बोल बेहद असरदार हैं। वैसे गीत के शुरुआती बोलों(रांझा-रांझा करदी वे मैं आप्पे रांझा होई.. रांझा-रांझा सद्दो नी मैनु हीर न आंके कोई) का क्रेडिट सूफ़ी कवि बाब बुल्ले शाह को दिया गया है। मेरा ख़याल है इस साल के टॊप-१० गीतों में यह गीत शोभा पाएगी, देखते हैं क्या होता है!

विश्व दीपक - जी हाँ, मुझे भी इस गीत से पुरी उम्मीद है। "रेखा भारद्वाज" अपनी आवाज़ से ऐसा मायाजाल बुनती हैं कि उससे बाहर निकलना हम जैसे संगीत के साधकों के लिए संभव नहीं। "रांझा-रांझा" कहते समय उनकी आवाज़ का "हस्कीनेस" चरम पर मालूम पड़ता है। जावेद अली रहमान के पसंदीदा गायक होते जा रहे हैं और इस गाने में रेखा भारद्वाज के साथ इन्हें मौका देकर (जबकि इन दोनों की गायन-शैली पूरी अलग है) रहमान ने जावेद अली में अपना यकीन दर्शाया है। वैसे मैं यह सोच रहा था कि अगर जावेद अली की जगह कैलाश खेर होते तो गाने का सूफ़ियाना असर कमाल का होता। हो सकता है कि रहमान ने कुछ और सोचा हो। चलिए हम यह गाना सुन लेते हैं।

गीत: रांझा रांझा


सुजॊय - 'रावण' का साउंडट्रैक विविधता से भरा है। अब जो पाँचवा गीत हम सुनने जा रहे हैं, वह एक बहुत ही नर्म और कर्णप्रिय गीत है रीना भारद्वाज की आवाज़ में। यह गीत है "खिली रे"। यह एक उपशास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत है। इसमें नवीन कुमार की बांसुरी और असद ख़ान का बजाया सितार सुनने को मिलता है। तबले का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

विश्व दीपक - रीना भारद्वाज की आवाज़ बहुत ही मीठी है, पता नहीं उन्हे गायन के ज़्यादा मौके क्यों नहीं मिल पाए हैं। रीना जी ने जितने भी गानें गाए है, वो ज़्यादातर रहमान के लिए ही हैं। फिर एक बार सिचुयशनल गीत होने की वजह से इसकी लोकप्रियता पर प्रशचिन्ह लग जाता है। इस गीत को ऐश्वर्य राय पर फ़िल्माया गया होगा और रीना जी की आवाज़ उन पर बहुत ही फ़िट बैठी है। यानी कि अच्छा प्लेबैक!!

गीत: खिली रे


विश्व दीपक - 'रावण' एल्बम का आख़िरी गीत एक समूहगान है "कटा कटा बकरा"। दरसल यह एक हास्य रस का गीत है। सिचुयशन है कि एक आदमी की शादी हो रही है और उसके दोस्त लोग उसका मज़ाक उड़ाते हुए गा रहे हैं "कटा कटा बकरा"। समूह स्वरों में आप इला अरुण, सपना अवस्थी और कुणाल गांजावाला की आवाज़ें भी महसूस कर सकते हैं।

सुजॊय - इतना हीं नहीं इन तीनों के अलावा इस गाने में आठ और आवाज़े हैं.. लगता है कि रहमान बैकिंग वोकल्स में भी कोई समझौता नहीं करना चाहते। जहाँ तक इला अरुण और सपना अवस्थी की गायकी का सवाल है तो इन दोनों की आवाज़ों में बहुत हद तक समानता है, लेकिन इससे पहले ये दोनों कभी साथ में सुनाई नहीं दी थीं।

विश्व दीपक -इस गीत का मूल भाव कुछ-कुछ फ़िल्म 'रोजा' के "रुकमणि रुकमणि" जैसा लगता है। सुनने मे आया है कि "कटा कटा" गीत के लिए मणिरत्नम ने ५०० डान्सर्स का सहारा लिया है और इस गीत की शूटिंग ५ दिनों में पूरी की गई है। बहुत सारे ड्रम, ढोलक, तालियों की थापें, और शहनाई से इस गाने का संयोजन किया गया है। इसके लिए श्रेय जाता है मशहूर संगीत संयोजक रंजीत बारोट को। क्या आपको इसमें 'जोधा अकबर' के "अज़ीम-ओ-शान शहन्शाह" की झलक मिलती है?

गीत: कटा कटा


"रावण" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - तो विश्व दीपक जी, इस सभी ६ गीतों को सुनने के बाद मेरा रवैय्या इस फ़िल्म के साउंडट्रैक के बारे में यह बनता है कि रहमान ने नए क़िस्म का संगीत और संगीत संयोजन हमें दिया है, लेकिन सभी गीत सिचुयशनल होने की वजह से जनता की ज़ुबान पर चढ़ पाना मुश्किल सा लगता है। मेरी व्यक्तिगत पसंद है "रांझा रांझा" गीत। इस फ़िल्म को मेरी तरफ़ से शुभकामनाएँ!!!

विश्व दीपक - आपका अंदेशा बेबुनियाद नहीं है। हो सकता है कि ये गाने फिल्म रीलिज होने के बाद हीं लोगों को पसंद आएँ। लेकिन मेरा हमेशा हीं यह व्यक्तिगत मत रहा है कि रहमान के गाने लोगों की समझ और लोगों की ज़हन पर धीरे-धीरे चढते हैं। इन दिनों रहमान हर फिल्म में कोई नया प्रयोग कर रहे हैं और इस कारण संगीत की मामूली या नहीं के बराबर समझ रखने वाले लोगों को रहमान के ये प्रयोग अटपटे-से लगते हैं। फिर भी मैं हर किसी से यह गुजारिश करूँगा कि बस एक बार(या एक बार भी नहीं) सुनकर इन गानों को खारिज़ न करें। गानों को आप पर असर करने का समय दें, फिर देखना कि आप कैसे इन गानों के दिवाने हो जाते हैं।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ४६- रीना भारद्वाज ने अपना पहला गीत रहमान की धुन पर ही गाया था। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४७- अनुराधा श्रीरम की गायकी में लोक शैली की झलक हम इससे पहले अनिल कपूर आभिनीत एक फ़िल्म में सुन चुके हैं। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४८- यह अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्य राय की एक फ़िल्म का युगलगीत है। इस गीत के पुरुष गायक ने हृतिक रोशन के करीयर के पहली सुपरहिट फ़िल्म में भी एक धमाकेदार गीत गाया था। गीत के अंतरे में एक लाइन है "जीता था पहले भी मगर युं था लगता, सीने में शायद तेरी कुछ कमी है"। बताइए हम किस गीत की बात कर रहे हैं, फ़िल्म का नाम क्या है, और गायक कौन हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. इन तीनों फ़िल्मों में अभिनेताओं ने गीत गाए हैं, 'जोश' में शहरुख़ ख़ान (अपुन बोला तू मेरी लैला), 'हेल्लो ब्रदर' में सलमान ख़ान (चांदी की डाल पर सोने का मोर), और 'काइट्स' में हृतिक रोशन।
२. फ़िल्म 'अनुभव' के लिए राजेश रोशन ने गाया था "बाहों में आजा, सीने से मेरे तू लग जा सनम, दिल मेरा है बेक़रार"।
३. हृतिक ने ६ वर्ष की आयु में जीतेन्द्र - रीना रॊय अभिनीत फ़िल्म 'आशा' में पहली बार अभिनय किया था।

सीमा जी, आपका जवाब सही है। बधाई स्वीकारें।

Monday, January 5, 2009

वो जिसने हिन्दी फ़िल्म संगीत की तस्वीर ही बदल दी...- ए आर रहमान.


बात १९९१ की है। तमिल फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन निर्देशक मणिरत्नम और बेहतरीन संगीतकार इल्लैया राजा की वर्षों पुरानी जोड़ी टूट चुकी थी। मणिरत्नम एक नए और फ्रेश संगीतकार की खोज में थे। हर साल की तरह उस साल भी मणिरत्नम का एक जानेमाने अवार्ड फंक्शन में जाना हुआ। समारोह शुरू होने से पहले वहाँ कुछ ऎड जिंगल्स (ad jingles) प्ले हो रहे थे। मणिरत्नम धुनों से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने उस संगीतकार के कुछ और गानों की फरमाईश की। धुनों का असर बढता गया। समारोह के बाद मणिरत्नम उस संगीतकार के म्युजिक रिकार्डिंग स्टुडियो भी गए। उस गुमनाम संगीतकार ने अपना एक पुराना गीत मणिरत्नम को सुनाया, जिसे उसने बरसों पहले "कावेरी विवाद" के सिलसिले में तैयार किया था। मणिरत्नम ने तनिक भी देर न करते हुए, अपनी नई फिल्म के लिए इस गीत की माँग कर दी और साथ हीं साथ इस नए-से संगीतकार को साईन भी कर लिया। वह मकबूल फिल्म थी "बालचंदर्स कवितालय" की "रोज़ा", वह गाना था "तमिज़ा तमिज़ा", जो हिंदी में अनुवादित होकर हुआ "भारत हमको जान से प्यारा है" और वह अनजाना सा संगीत-दिग्दर्शक था महज़ २४ साल का "अब्दुल रहमान",जिसे आज सारी दुनिया "ए०आर०रहमान" के नाम से जानती है। जानकारी के लिए बता दूँ कि "तमिज़ा तमिज़ा" दर-असल तमिलनाडु की गौरवशाली भूमि,इतिहास एवं वर्त्तमान का बखान है, जिसे जब हिंदी में बदला गया तो इससे किसी प्रदेश की बजाय पूरे हिन्दुस्तान की बात जुड़ गई। रही बात "अब्दुल रहमान" की तो फिल्म-इंडस्ट्री में इससे बड़ी और अनोखी इंट्री आज तक किसी भी फनकार की नहीं हुई। पहली हीं फिल्म "रोज़ा" के गानों के लिए "रहमान" को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया।

चलिए अब अतीत में चलते हैं। "अब्दुल रहमान"(धर्म परिवर्त्तन से पहले ए०एस० दिलीप कुमार)के पिता मलयालम फिल्मों में संगीत दिया करते थे। सलिल चौधरी जैसे संगीतकारों का उनके घर आना-जाना लगा रहता था। ऎसे हीं एक दिन संगीतकार सुदर्शनम मास्टर का रहमान के घर आना हुआ तो उन्होंने देखा कि एक चार साल का बच्चा हार्मोनियम पर एक धुन प्ले कर रहा था। सुदर्शनम साहब ने धुन की लिखी हुई प्रति छुपा दी ताकि बच्चे की तल्लीनता एवं कर्मठता भांप सकें। वही हुआ, जिसका अंदेशा था। बच्चा उसी तत्परता से धुन प्ले करने में लगा रहा,मालूम होता था मानो धुन जबानी याद हो। सुदर्शनम साहब ने तत्क्षण रहमान के पिता को मशवरा दे डाला कि इसे संगीत-साधना में लगाओ। इस तरह महज़ चार साल की उम्र में हीं "रहमान" संगीत की शिक्षा लेने लगे । रहमान जब नौ साल के थे, तो उनके पिता का देहांत हो गया। रहमान उस घटना को याद करते हुए कहते हैं -"मैं संगीत को कभी भी गंभीरता से नहीं लेता था, मैं कम्प्यूटर या इलेक्ट्रानिक इंजीनियर बनना चाहता था, लेकिन पिता की मौत ने मेरे सामने बस एक हीं रास्ता छोड़ा - संगीत। पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे हीं कंधे पर आ गई। पैसों की कमी थी, इसलिए पहले तो संगीत के साज़-औ-सामान की निलामी करनी पड़ी,लेकिन जब उससे भी काम न बना तो मैं इल्लैया राजा के ट्रुप में की-बोर्ड प्लेअर की तौर पर शामिल हो गया। गिटार बजाना भी वहीं सीखा।" और फिर यूँ संगीत की दुनिया को एक बेजोड़ हीरा मिला,जिसे वक्त ने तराशा था। इसे भी वक्त की विडम्बना कहिये कि जिस दिन उनके पिता की मृत्यु हुई उसी दिन उनका ख़ुद का स्वरबद्ध किया पहला गीत बाज़ार में आया था.

रहमान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे धुनों पर अपनी छाप छोड़ना जानते हैं। चाहे धुन कितने भी पारंपरिक क्यूँ न हों, रहमान उसे अपने अलहदा अंदाज में लिखते हैं और अंततोगत्वा वही धुन कुछ नया हीं होकर निकलता है। उनके साउंड रिकार्डिस्ट "श्रीधर" रहमान की इस खूबी के बारे में कहते हैं- "उन्हें अपने हर गाने की खास जरूरत मालूम होती है। मसलन बांसूरी से बस कलरव करती हवा की आवाज़........" । आप रोज़ा का "रोज़ा जानेमन ...." सुने, वहाँ अंतरा के दो छंदों के मध्य आपको बांसुरी का बड़ा हीं मनोरम एवं अनूठा प्रयोग सुनाई देगा। रहमान की यही विशेषता है, जो उन्हें औरों से जुदा करती है।

सुनिए "रोजा जाने मन.." फ़िल्म रोजा से-



अमिताभ बच्चन कार्पोरेशन लिमिटेड(ए०बी०सी०एल०) के तहत आई मणिरत्नम की फिल्म "बम्बे" ने ए०आर०रहमान० के कैरियर को एक अलग हीं ऊँचाई दी। फिल्म हिंदी में डब हुई और सारे गाने बेहद लोकप्रिय हुए। रहमान के लिए बालीवुड के रास्ते खुल गए। राम गोपाल वर्मा ने "रंगीला" के गाने "रहमान" से तैयार करवाए और "रहमान" के संगीत का जादू देखिए कि फिल्म "म्युजिकल" नहीं होकर भी बहुत बड़ी "म्युजिकल हिट" साबित हुई। "रंगीला" के "हाय रामा" गाने को कौन भूल सकता है। हरिहरन की आवाज़ का संतुलन और स्वर्णलता का मदहोश कर देने वाला स्वर बड़ी हीं बारीकी से दिल में उतरता है। भारतीय एवं पाश्चात्य वाद्य-यंत्रों का एक साथ ऎसा प्रयोग भला और कौन संगीतकार कर सकता था। "प्यार ये जाने कैसा है" में सुरेश वाडेकर एवं कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ एवं शास्त्रीय संगीत की स्वर-लहरियाँ रहमान की प्रतिभा का एक नया आयाम दर्शाती हैं । बारीकी से देखें तो यकीनी तौर पर यह कहा जा सकता है कि इस फिल्म के सभी गाने एक-दूसरे से बेहद अलहदा थे।

सुनिए "प्यार ये जाने कैसा है..." फ़िल्म रंगीला से-



रंगीला के बाद आई रहमान को पहला ब्रेक देने वाले मणिरत्नम की फिल्म "दिल से" और इस फिल्म ने साबित कर दिया कि रहमान कितना दिल से काम करते हैं। "दिल से" के गाने "छैंया छैंया" में रहमान ने "सुखविंदर सिंह" को मौका दिया और इस मौके ने पूरे हिन्दी-फिल्म एवं संगीत जगत को दिया एक नया सितारा। "सुखविंदर" आज भी अपनी कामयाबी का पूरा श्रेय रहमान को हीं देते हैं। फिल्म में रहमान ने एक गाना "दिल से" को अपनी आवाज़ दी और देखते हीं देखते रहमान की आवाज़ कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैल गई। सारे संगीत प्रेमी उस सीधी एवं सुलझी हुई आवाज़ के कायल हो गए। यूँ तो रहमान को "हिंदी" की ज्यादा जानकारी नहीं है,लेकिन उनकी आवाज़ सुनकर ऎसा तनिक भी महसूस नहीं होता।

"दिल से" के बाद रहमान ने और भी कई हिंदी फिल्मों में संगीत दिया, मसलन "दौड़", "कभी न कभी", "शिखर" ,"लव यू हमेशा" ,"१९४७-अर्थ' , लेकिन रहमान को बालीवुड में सही पहचान मिली फिल्म "ताल" की सफलता के बाद। "ताल" के बाद हीं उन्हें बालीवुड संगीतकारों की फेहरिश्त में शामिल किया जाने लगा। "अर्थ" के दो गाने "रूत आ गई रे" और "ईश्वर अल्लाह" ने भी खासा नाम किया था ,लेकिन फिल्म के बाकी गाने कुछ ज्यादा प्रभाव नहीं दिखा सके। "रूत आ गई रे" को सुखविदंर अब भी अपना सबसे पसंदीदा गाना मानते हैं ...इस गाने में है हीं ऎसी बात कि जो भी सुन ले,वो खो जाए। "ईश्वर अल्लाह" में रहमान के संगीत के साथ-साथ जावेद अख्तर के बोल भी बेहद हृदय-स्पर्शी हैं।

सुनिए "रुत आ गई रे..." फ़िल्म १९४७ - अर्थ से रहमान का गीत -



चित्र में उपर - रहमान पत्नी सैरा बानो के साथ, (याद कीजिये फ़िल्म बॉम्बे में नायिका का भी यही नाम था...)

देखिये रहमान का शायद सबसे पहला इंटरव्यू जो उन्होंने दूरदर्शन के सुरभि कार्यक्रम के लिए दिया था. तब उनकी पहली फ़िल्म "रोजा" प्रर्दशित हुई ही थी.




प्रस्तुति - विश्व दीपक "तन्हा"
(जारी....)

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