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Saturday, March 25, 2017

चित्रकथा - 11: 1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण


अंक - 11

1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण

अपने देस में हम हैं परदेसी कोई ना पहचाने...



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 

हिन्दी फ़िल्मों में तीसरे लिंग का चित्रण दशकों से होता आया है। अफ़सोस की बात है कि ऐसे चरित्रों को सस्ती कॉमेडी के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं या फिर घृणा की नज़रों से देखा जाता है। बार-बार वही घिसा-पिटा रूढ़ीबद्ध रूप दिखाया गया है। फ़िल्मी गीतों में भी उनका मज़ाक उड़ाया गया है। कई बार तो सामान्य चरित्र किन्नर/हिजड़े जैसा मेक-अप लेकर दर्शकों को हँसाने की कोशिशें करते रहे हैं। समय के साथ-साथ इस तरह का बेहुदा हास्य कम हुआ है और तीसरे लिंग का मज़ाक उड़ाया जाना फ़िल्मों में कम हुआ है। पिछले कुछ दशकों में कुछ संवेदनशील फ़िल्मकारों ने तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण अपनी फ़िल्मों में किया है, जिनकी वजह से आज हमारे समाज में तीसरे लिंग की स्वीकृति को काफ़ी हद तक बढ़ावा मिला है। आइए आज ’चित्रकथा’ में चर्चा करें 1997 में प्रदर्शित तीन फ़िल्मों की जिनमें हमें मिलता है तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण।




स दुनिया में यह रवायत है कि जो संख्यलघु में आता है, उसे दुनिया अलग-थलग कर देती है। तीसरे
लिंग के व्यक्तियों के साथ भी यही हुआ। सामाजिक स्वीकृति न मिलने की वजह से ये लोग अपनी अलग की समुदाय बना ली। हमारी फ़िल्मों की कहानियों में अक्सर तीसरे लिंग को पैसा वसूली करते हुए, शादी-व्याह और बच्चे के जनम पर नाचते-गाते हुए या फिर किसी हास्यास्पद तरीके से दिखाया जाता है। लेकिन कुछ संवेदनशील फ़िल्मकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इस विषय को गंभीरता और संवेदनशीलता से अपनी फ़िल्मों में साकार किया। आज बातें 1997 की तीन ऐसी ही फ़िल्मों की। सबसे पहले बातें फ़िल्म ’तमन्ना’ और निर्देशक महेश भट्ट की। इस फ़िल्म में हिजड़ा-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का चित्रण किया गया है। यह फ़िल्म सहानुभूति और सकारात्मक नज़रिए से देखती है तीसरे लिंग को, और इस फ़िल्म ने ऐसी सीमाएँ पार की जो इससे पहले भारतीय सिनेमा ने नहीं की थी। किसी भी फ़िल्मकार ने इससे पहले इस तरह के विषय पर फ़िल्म बनाने की नहीं सोची थी। ’तमन्ना’ एक सत्य घटना और सत्य कहानी पर आधारित फ़िल्म है। कहानी परेश रावल अभिनीत हिजड़ा चरित्र पर केन्द्रित है और इसमें इस समुदाय द्वारा झेले जाने वाले तमाम समस्याओं पर रोशनी डाली गई है। 1975 के पार्श्व की यह कहानी तमन्ना नामक एक लड़की की कहानी है जिसे टिकू नामक हिजड़ा पाल पोस कर बड़ा करता है। टिकू औरतों जैसी पोशाक नहीं पहनता और ना ही हिजड़ा समुदाय में रहता है, बल्कि वो पुरुषों से भरे समाज में ही रहता है। इस तरह से महेश भट्ट ने यह साबित करने की कोशिश की कि तीसरे लिंग के लोग भी ’साधारण’ लोगों के बीच रह सकते हैं। टिकू अपने सबसे अच्छे दोस्त सलीम के साथ रहता है जिसे वो भाई कह कर बुलाता है। टिकू और सलीम के बीच किसी तरह का यौन संबंध ना दिखा कर भट्ट साहब ने यह सिद्ध किया कि आम तौर पर हिजड़ों द्वारा किसी पुरुष को अपने पास रखने के पीछे यौन संबंध होने का कारण समझने का कोई वजूद नहीं है। टिकू एक भावुक इंसान है और कई बार उसका नारीत्व उभर कर सामने आता है। उदाहरण के तौर पर टिकू तमन्ना को एक पिता की तरह नहीं बल्कि माँ की तरह पालता है। एक दृश्य में टिकू नन्ही तमन्ना के लिए लड़कियों की तरह नृत्य करता दिखाई देता है। वैसे तमन्ना टिकू को अब्बु कह कर ही बुलाती है। टिकू एक मेक-अप आर्टिस्ट है और वो अपने समुदाय के दूसरे लोगों की तरह शादी-ब्याह या बच्चे के जनम पर पैसे माँगने नहीं जाता और ना ही वेश्यावृत्ति करता है। बस फ़िल्म के अन्त में टिकू को आर्थिक मजबूरी के कारण हिजड़े के पारम्परिक रूप में सज कर नृत्य करना पड़ता है।

फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य है जब तमन्ना को पता चलता है कि टिकू एक हिजड़ा है। हिजड़ों के प्रति जो आम सामाजिक मान्यताएँ हैं, वो सब तमन्ना के मन में भी घर की हुई है। उसे यह पता है कि अगर हिजड़ा किसी को आशिर्वाद दे सकता है तो वो अभिषाप भी दे सकता है। यह समाज मानता है कि हिजड़ों के अभिषाप से व्यक्ति बांझ या नामर्द बन सकता है। ऐसी मानसिकता की वजह से जब तमन्ना को टिकू के बारे में पता चला तो उसके मन में टिकू के लिए घृणा उत्पन्न हुई और वो भूल गई कि किस तरह से लाड़-प्यार से टिकू ने उसे पाल-पोस कर बड़ा किया है। हिजड़े की जो छवि तमन्ना के दिल में बसी हुई है, उससे वो बाहर नहीं निकल सकी। महेश भट्ट ने इस फ़िल्म में हिजड़ों के प्रचलित रूप को दर्शाने के लिए हिजड़ों के एक दल को रंगीन साड़ियों और ज़ेवरों में तालियाँ बजाते, नृत्य करते दिखाया है, और साथ में यह भी दिखाया है कि टिकू इन जैसा नहीं है। फ़िल्म में यह भी दिखाया गया है कि बाकी हिजड़े किस तरह से टिकू का मज़ाक उड़ाते हैं यह कहते हुए कि आम समाज में रहने से वो सामान्य इंसान नहीं बन जाएगा और ना ही वो अपने लैंगिक भिन्नता वाले वजूद को भूला या मिटा पाएगा। महेश भट्ट ने हिजड़ों के प्रति रूढ़ीवादी नज़रिए को तोड़ने का साहस किया। भट्ट साहब ने समाज को दिखाया कि एक हिजड़ा एक अच्छा अभिभावक और एक अच्छा मित्र भी हो सकता है, और वो एक बच्चे को पाल पोस कर बड़ा कर सकता है। भले वो ख़ुद गर्भ धारण नहीं कर सकते पर प्यार लुटाने की क्षमता रखते हैं।

1997 में ही अमोल पालेकर लेकर आए ’दाएरा’ जो एक सुन्दर कहानी पर बनी फ़िल्म थी जिसमें प्रेम,
वासना और लिंग को बड़े सुन्दर तरीके से उभारा गया। पालेकर साहब के साहसिक और समझ की दाद देनी पड़ेगी कि तीसरे लिंग का इतना सुन्दर चित्रण इस फ़िल्म में उन्होंने किया। स्वर्गीय निर्मल पाण्डेय ने इस चरित्र को इतनी सरलता से उभारा कि फ़िल्म के अन्त तक आपके मन में उस चरित्र के लिए भावनाएँ जाग उठेंगी। ’दाएरा’ हमें एक भावुक यात्रा पर ले जाती है क्योंकि इस फ़िल्म के तमाम चरित्र भी एक जटिल यात्रा के सहयात्री होते हैं जो पारम्परिक लैंगिकता, सामाजिक रवैये और प्रचलित फ़िल्मी परम्परा को धराशायी कर देते हैं। इस फ़िल्म के लिए अमोल पालेकर को कई पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म की कहानी एक अभिनेता (निर्मल पाण्डे) जो एक तीसरे लिंग का व्यक्ति है। एक रात वो एक लड़की (सोनाली कुलकर्णी) को बचाता है जिसका शादी से पहले अपहरण और बलात्कार हो जाता है। आगे की कहानी इन दोनों के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती है। मानव लैंगिकता पर इस फ़िल्म की पहुँच सशक्त है और नारीशक्ति को सकारात्मक दृष्टि से दिखाया गया है। और तो और यह फ़िल्म उन अल्पसंख्यक लोगों के अधिकारों का भी मंथन करती है जो समाज के मुख्यधारा का अंग नहीं हैं, जैसे कि समलैंगिक स्त्री-पुरुष। यह फ़िल्म ऐसे लोगों के मन की गहराई तक जाता है जिन्हें इस समाज से सिर्फ़ तिरस्कार ही मिलते हैं बिना कोई गुनाह किए।

1997 में तो तीसरे लिंग पर आधारित सकारात्मक फ़िल्मों की कतार ही लग गई थी। ’तमन्ना’ और
’दाएरा’ के बाद इसी वर्ष प्रदर्शित हुई ’दर्मियाँ’। कल्पना लाजमी एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने समय समय पर ऐसे ऐसे मुद्दों पर फ़िल्में बनाई हैं जिन मुद्दों पर दूसरे फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने से पहले सौ बार सोचते होंगे। ’दर्मियाँ’ में उन्होंने एक पैदाइशी हिजड़ा लड़के की कहानी को केन्द्र में रख कर एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो सीधे दिल को छू जाती है। ’दर्मियाँ’ कहानी है सिंगिंग् स्टार ज़ीनत बेगम (किरोन खेर) की। यह 40 के दशक का पार्श्व है। इन्डस्ट्री की सबसे महँगी स्टार होने के अलावा वो एक नाजायज़ रिश्ते से उत्पन्न एक बच्चे की माँ भी है। इम्मी नाम का वह बच्चा जन्म से हिजड़ा है। शर्म से कहिए या स्टार होने की वजह से कहिए, ज़ीनत समाज के सामने यह स्वीकार नहीं करती कि इम्मी उसका बेटा है, वो उसे अपना भाई कह कर दुनिया के सामने पेश करती है। नन्हे इम्मी को इस बात का पता है कि ज़ीनत उसकी बड़ी बहन नहीं बल्कि माँ है पर वो किसी से कुछ नहीं कहता। वो अपनी नानी को ही माँ कहता है। ज़ीनत और इम्मी एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। तभी तो जब उस इलाके की हिजड़ा समुदाय की नेत्री चम्पा (सायाजी शिन्डे) इम्मी को उसे सौंप देने के लिए ज़ीनत और उसकी माँ पर ज़ोर डालती है तो ज़ीनत उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देती है। इम्मी भी उसके साथ नहीं जाना चाहता। जब चम्पा कहती है कि एक हिजड़ा केवल अपने समुदाय में ही इज़्ज़त से जी सकता है और ज़ीनत के साथ रहने पर इम्मी कहीं का नहीं रहेगा, तब ज़ीनत यह स्वीकारने से भी मना कर देती है कि उसका बेटा हिजड़ा है। नन्हे इम्मी के मन में अपने वजूद को लेकर कश्मकश चलती रहती है। दिन गुज़रते जाते हैं, इम्मी एक युवक (आरिफ़ ज़कारिया) में परिवर्तित होता है और वो ज़ीनत के साथ शूटिंग् पे जाता है, उसके साथ-साथ रहता है। ज़ीनत बेगम शोहरत और कामयाबी की बुलन्दी पर पहुँचती है, उसे एक युवा अभिनेता इन्दर कुमार भल्ला (शहबाज़ ख़ान) से प्यार हो जाता है, पर समय बदलते देर नहीं लगती। ज़ीनत का करियर ढलान पर आ जाता है, और इन्दर कुमार भी एक नई अदाकारा चित्रा (तब्बु) से प्यार करने लगता है। ज़ीनत अपने आप को शराब और जुए में डुबो कर सब कुछ हार जाती है। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ज़ीनत के बरबाद हो जाने पर उधर इम्मी के साथ भी लोग बदतमीज़ी से पेश आते, उसे उसके वजूद को लेकर भला-बुरा कहते। अपने और अपनी माँ का पेट पालने के लिए इम्मी को आख़िर चम्पा के पास जाना पड़ता है। हिजड़े का पोशाक पहन कर इम्मी भी नाचता है, और जब एक रात वो एक वेश्या बन कर किसी अमीर आदमी के घर जाता है, तब वहाँ मौजूद उस आदमी के दोस्त लोग उसका बलात्कर कर उसे ज़ख़्मी बना देते हैं। इम्मी चम्पा के वहाँ से भाग जाता है। वो समझ जाता है कि वो ना आम समाज में जी सकता है और ना ही हिजड़ा समाज में। 

घर की तरफ़ लौटते हुए उसे वीराने में एक नवजात शिशु मिलता है, जिसे वो घर ले आता है और ज़ीनत
को दिखाता है। मानसिक संतुलन खोने की वजह से ज़ीनत उस बच्चे को नन्हा इम्मी समझती है और उसके लिंग को देख कर चिल्ला-चिल्ला कर कहती है कि उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है, उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है। खुशी से वो नाचने लगती है। बरसों से एक हिजड़ा को जन्म देने का जो दर्द ज़ीनत के मन में पलता रहा है, वह बाहर आ जाता है। इम्मी को भी उस बच्चे में अपने जीने का मक़सद नज़र आता है। उसका नाम वो मुराद रखता है। उसे पाल पोस कर बड़ा करना ही इम्मी के जीवन का मकसद बन जाता है। पर समाज को यह भी मनज़ूर कहाँ? जैसे ही चम्पा को इसका पता चलता है, वो बच्चे को चुरा कर ले जाती है और उसे हिजड़ा बनाने का अनुष्ठान शुरु कर देती है। लेकिन ऐन वक़्त पर इम्मी वहाँ पहुँच जाता है और बच्चे को बचा लेता है। साथ ही पहली बार एक हिजड़े की तरह चम्पा को बद-दुआ देता है कि "मैं एक पैदाइशी हिजड़े की ताक़त से तुझे बद दुआ देता हूँ चम्पा कि तू हर जनम हिजड़ा ही जन्मेगी"। यह सुन कर चम्पा टूट जाती है, विध्वस्त हो जाती है और चीख उठती है यह कहते हुए, "अपनी काली ज़ुबान से फिर हिजड़ा पैदा होने की बद-दुआ मत दे मुझे। एक बार हिजड़ा होके बड़ी मुश्किल से कटी है यह ज़िन्दगी, नफ़रत की कड़वी घूंट पी के, सबसे लड़ के, अपने आप जैसे तैसे ज़िन्दा रही हूँ मैं, फिर से हिजड़ा बनने की ताकत नहीं है मुझमें, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है।" उधर इम्मी को समझ आ जाती है कि उसके लिए उस बच्चे को पालना नामुमकिन है। और यह भी समझ जाता है कि वो अब ना तो आम समाज का है और ना ही हिजड़ा समाज का। वो उस बच्चे को लेकर अपने जैविक पिता के जायज़ संतान, यानी अपने भाई के पास जाता है, पर वो उस बच्चे को नहीं अपनाता और उसे अपमानित कर बाहर निकाल देता है। तब वो आख़िरी उम्मीद के साथ इन्दर कुमार और चित्रा के पास जाते हैं। नर्म दिल और ज़ीनत को इज़्ज़त करने वाली चित्रा से इम्मी कहता है, "देखिए चित्रा जी, इस बच्चे की तरफ़, इसे भी जीने का हक़ है ना? जब मुझे यह बच्चा मिला, तब मैंने इसमें अपने आप को देखा, पर अब आपको इसे मुझसे दूर ही रखना है। मैं एक पैदाइशी हिजड़ा हूँ पता है आपको? मुराद मेरे जैसा नहीं है चित्रा जी, वो मेरे जैसा नहीं है। मुझे तो हमेशा से बस यही सिखाया गया था कि एक हिजड़ा सबसे अलग होता है, वो कभी बाकियों की तरह ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकता।" आरिफ़ ज़कारिया के जानदार और अद्वितीय अभिनय ने इस सीन को ऐसा अनजाम दिया है कि कोई भी दर्शक अपनी आँसू नहीं रोक सकता। चित्रा इम्मी से कहती है कि वो और इन्दर मिल कर इम्मी और ज़ीनत की ज़िन्दगी को बसा देंगे। जवाब में इम्मी कहता है, "मेरी ज़िन्दगी अब कोई मायने नहीं रखती चित्रा जी, मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मुराद को ज़िन्दगी में वो तमाम ख़ुशियाँ हासिल हो जो मुझे कभी ना मिल पायी। पता है एक हिजड़े की ज़िन्दगी होती ही मनहूस है चित्रा जी। आपा को मेरे पैदा होते ही हिजड़ों को दे देना चाहिए था, पर अब ना तो मेरी जगह इस दुनिया में है, न ही हिजड़ों की दुनिया में। दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं! दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं!" इन्दर कुमार के ना करने की बावजूद चित्रा बच्चे को अपना लेती है। इम्मी वहाँ से चला जाता है यह कहते हुए कि वो चित्रा की ज़िन्दगी में फिर कभी नहीं आएगा। घर वापस आकर वो ज़हर पी लेता है अपनी माँ को भी पिला देता है। अन्तिम दृश्य में इम्मी ज़ीनत से (जिसे वो ज़िन्दगी भर आपा कहता आया है) कहता है, "हम आप से बहुत प्यार करते हैं अम्मी जान"! ज़ीनत के मुंह से निकलता है "मेरा बेटा!" चारों तरफ़ ख़ामोशी। दोनों चले गए हमेशा के लिए।

’दर्मियाँ’ एक ऐसी फ़िल्म है जिसे देख कर दिल उदास हो जाता है, तीसरे लिंग के लोगों के लिए मन सहानुभूति से भर उठता है। कल्पना लाजमी ने हिजरा समाज और फ़िल्म के मुख्य पात्र इम्मी का जो चित्र प्रस्तुत किया है, उससे हिजड़ों के प्रति जो आमतौर पर दुर्व्यवहार होता आया है, निस्सन्देह लोगों के दिलों में उनके लिए आदर ना सही पर सहानुभूति ज़रूर उत्पन्न होगी। ’दर्मियाँ’ में जावेद अख़्तर ने बेहद दिल को छू लेने वाला गीत लिखा है जो फ़िल्म का सार भी है और तीसरे लिंग के लोगों के दिल की पुकार भी। भूपेन हज़ारिका के संगीत और आवाज़ में यह गीत दिल को चीर कर रख देता है। गीत के बोल पेश कर रहे हैं...

भाग-1:

(दृश्य: दोस्तों द्वारा चिढ़ाने और चम्पा के डराने के बाद बालक इम्मी अपनी आपा (हक़ीक़त में माँ) के गोदी में सर छुपा कर रो रहा है। और माँ लाचार है, उसके पास कोई जवाब नहीं, किसी से कुछ नहीं कह सकती। अपने बेटे को बेटा नहीं कह सकती।)

कैसा ग़म है क्या मजबूरी है, पास है जो उनसे भी दूरी है
दिल यूं धड़के जैसे कोई गूंगा बोलना चाहे, लेकिन सब हैं अनजाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-2:

(दृश्य: मानसिक रूप से विध्वस्त ज़ीनत अपने बहनोई से यह चुनौती ले लेती है कि उसका बेटा हिजड़ा नहीं है, और अपने बात को साबित करने के लिए वो एक वेश्या लड़की को अपने बेटे के कमरे में भेज देती है। वेश्या को जैसे ही पता चलता है कि इम्मी हिजड़ा है, वो उसका अपमान कर चली जाती है। युवा इम्मी अपनी माँ के पास आकर रोने लगता है।)

कोई बता दे हम क्यों ज़िन्दा हैं, हम क्यों ख़ुद से भी शर्मिन्दा हैं
अपनी ही आँखों से गिरे हैं बनके हम एक आँसू, माने कोई या नहीं माने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-3:

(दृश्य: बलात्कार से ज़ख़्मी होकर हिजड़ा समाज को हमेशा के लिए छोड़ आते समय जब मौत के अलावा इम्मी के लिए कुछ और नहीं बचा, तभी उसे एक अनाथ शिशु मिला, जिसे गोद में लेकर उसमें उसे अपने जीने का बहाना दिखा।)

कोई तो जीने का बहाना हो, कोई वादा हो जो निभाना हो
कोई सफ़र कोई तो रस्ता कोई तो मंज़िल हो, सुन ले ऐ दिल दीवाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-4:

(दृश्य: अन्तिम दृश्य में ख़ुद ज़हर पी कर अपनी माँ को ज़हर पिला रहा है इम्मी।)

सोचा है अब दूर चले जाएँ, अपने सपनों की दुनिया पाएँ
उस दुनिया में प्यार के फूल और ख़ुशियों के मोती हैं जो न दिए इस दुनिया ने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

1997 के तीन फ़िल्मों की चर्चा हमने की। ये फ़िल्में हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्यों हम इतने उदासीन हैं तीसरे लिंग के प्रति? क्यों हम उनका सामाजिक तिरस्कार करते हैं? ईश्वर के लिए सभी जीव-जन्तु समान हैं, जब हम जानवरों से प्यार कर सकते हैं, तो ये तो इंसान हैं हमारी आपकी तरह। क्या हम इन्हें थोड़ा सा प्यार, थोड़ी सी स्वीकृति नहीं दे सकते? क्या यह वाक़ई इतना कठिन है? मु तो नहीं लगता, और आपको?


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत के इतिहास से आपको अवगत करवाया था। हमारी एक पाठिका काव्या सरिता जी ने इस गीत के हमारे दिए बोलों में एक ग़लती ढूंढ़ निकाला और हमें सूचित किया। हमने इस ग़ौर किया और अपने आलेख में सुधार कर ली। काव्या जी को हमारा धन्यवाद। आप सभी इतने मनोयोग से हमारा आलेख पढ़ते हैं, यह देख कर हमें बेहद ख़ुशी हुई। हमारे एक और नियमित पाठक श्री पंकज मुकेश ने टिप्पणी की है - "प्रस्तुत लेख द्वारा आगामी शहीद दिवस 23 मार्च 2017 पर देश के तीन वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि है। अमर शहीद!!!" बिल्कुल सही कहा आपने पंकज जी। और इस अंक की अब तक की कुल रीडरशिप 165 है। आगे भी आप सब बने रहिए ’चित्रकथा’ के साथ। धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, November 19, 2011

"बुझ गई है राह से छाँव" - डॉ. भूपेन हज़ारिका को 'आवाज़' की श्रद्धांजलि (भाग-२)

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 68

भाग ०१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे पिछले हफ़्ते हमने श्रद्धांजलि अर्पित की स्वर्गीय डॉ. भूपेन हज़ारिका को। उनके जीवन सफ़र की कहानी बयान करते हुए हम आ पहुँचे थे सन् १९७४ में जब भूपेन दा नें अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' में संगीत दिया था। आइए उनकी दास्तान को आगे बढ़ाया जाये आज के इस अंक में। दो अंकों वाली इस लघु शृंखला 'बुझ गई है राह से छाँव' की यह है दूसरी व अन्तिम कड़ी।

भूपेन हज़ारिका नें असमीया और बंगला में बहुत से ग़ैर फ़िल्मी गीत तो गाये ही, असमीया और हिन्दी फ़िल्मों में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। १९७५ की असमीया फ़िल्म 'चमेली मेमसाब' के संगीत के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। आपको याद होगा उषा मंगेशकर पर केन्द्रित असमीया गीतों के 'शनिवार विशेषांक' में हमने इस फ़िल्म का एक गीत आपको सुनवाया था। १९७६ में भूपेन दा नें अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा निर्मित हिन्दी फ़िल्म 'मेरा धरम मेरी माँ' को निर्देशित किया और इसमें संगीत देते हुए अरुणाचल के लोक-संगीत को फ़िल्मी धारा में ले आए। मैं माफ़ी चाहूंगा दोस्तों कि 'पुरवाई' शृंखला में हमने अरुणाचल के संगीत से सजी इस फ़िल्म का कोई भी सुनवा न सके। पर आज मैं आपके लिए इस दुर्लभ फ़िल्म का एक गीत ढूंढ लाया हूँ, आइए सुना जाए....

गीत - अरुणाचल हमारा (मेरा धरम मेरी माँ)


१९८५ में कल्पना लाजमी की फ़िल्म 'एक पल', जो असम की पृष्ठभूमि पर निर्मित फ़िल्म थी, में भूपेन दा का संगीत बहुत पसन्द किया गया। पंकज राग के शब्दों में 'एक पल' में भूपेन हज़ारिका ने आसामी लोकसंगीत और भावसंगीत का बहुत ही लावण्यमय उपयोग "फूले दाना दाना" (भूपेन, भूपेन्द्र, नितिन मुकेश), बिदाई गीत "ज़रा धीरे ज़रा धीमे" (उषा, हेमंती, भूपेन्द्र, भूपेन) जैसे गीतों में किया। "जाने क्या है जी डरता है" तो लता के स्वर में चाय बागानों के ख़ूबसूरत वातावरण में तैरती एक सुन्दर कविता ही लगती है। "मैं तो संग जाऊँ बनवास" (लता, भूपेन), "आने वाली है बहार सूने चमन में" (आशा, भूपेन्द्र) और "चुपके-चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं" (लता) जैसे गीतों में बहुत हल्के और मीठे ऑरकेस्ट्रेशन के बीच धुन का उपयोग भावनाओं को उभारने के लिए बड़े सशक्त तरीके से किया गया है।

गीत - चुपके-चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं (एक पल)


१९९७ में भूपेन हज़ारिका के संगीत से सजी लेख टंडन की फ़िल्म आई 'मिल गई मंज़िल मुझे' जिसमें उन्होंने एक बार फिर असमीया संगीत का प्रयोग किया और फ़िल्म के तमाम गीत आशा, सूदेश भोसले, उदित नारायण, कविता कृष्णमूर्ति जैसे गायकों से गवाये। कल्पना लाजमी के अगली फ़िल्मों में भी भूपेन दा का ही संगीत था। १९९४ में 'रुदाली' के बाद १९९७ में 'दरमियान' में उन्होंने संगीत दिया। इस फ़िल्म में आशा और उदित का गाया डुएट "पिघलता हुआ ये समा" तो बहुत लोकप्रिय हुआ था। १९९६ की फ़िल्म 'साज़' में बस एक ही गीत उन्होंने कम्पोज़ किया। २००० में 'दमन' और २००२ में 'गजगामिनी' में भूपेन हज़ारिका का ही संगीत था। पुरस्कारों की बात करें तो पद्मश्री (१९७७), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रीय नागरिक सम्मान, असम का सर्वोच्च शंकरदेव पुरस्कार जैसे न जाने कितने और पुरस्कारों से सम्मानित भूपेन दा को १९९३ में दादा साहब फालके पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है। लेकिन इन सब पुरस्कारों से भी बड़ा जो पुरस्कार भूपेन दा को मिला, वह है लोगों का प्यार। यह लोगों का उनके प्रति प्यार ही तो है कि उनके जाने के बाद जब पिछले मंगलवार को उनकी अन्तेष्टि होनी थी, तो ऐसा जनसैलाब उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने उस क्षेत्र में उमड़ा कि असम सरकार को अन्तेष्टि क्रिया उस दिन के रद्द करनी पड़ी। अगले दिन बहुत सुबह सुबह २१ तोपों की सलामी के साथ गुवाहाटी में लाखों की तादाद में उपस्थित जनता नें उन्हें अश्रूपूर्ण विदाई दी। भूपेन दा चले गए। भूपेन दा से पहली जगजीत सिंह भी चले गए। इस तरह से फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के कलाकार हम से एक एक कर बिछड़ते चले जा रहे हैं। ऐसे में तो बस यही ख़याल आता है कि काश यह समय धीरे धीरे चलता।

गीत - समय ओ धीरे चलो (रुदाली)


'आवाज़' परिवार की तरफ़ से यह थी स्वर्गीय डॉ. भूपेन हज़ारिका की सुरीली स्मृति को श्रद्धा-सुमन और नमन। भूपेन जैसे कलाकार जा कर भी नहीं जाते। वो तो अपनी कला के ज़रिए यहीं रहते हैं, हमारे आसपास। आज अनुमति दीजिए, फिर मुलाकात होगी अगर ख़ुदा लाया तो, नमस्कार!

चित्र परिचय - भुपेन हजारिका को अंतिम विदाई देने को उमड़ा जनसमूह

Saturday, November 12, 2011

बुझ गई है राह से छाँव - डॉ. भूपेन हज़ारिका को 'आवाज़' की श्रद्धांजलि

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 67
बुझ गई है राह से छाँव - भाग ०१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे आज श्रद्धांजलि उस महान कलाकार को जिनका नाम असमीया गीत-संगीत का पर्याय बन गया है, जिन्होने असम और उत्तरपूर्व के लोक-संगीत को दुनियाभर में फैलाने का अद्वितीय कार्य किया, जिन्होंने हिन्दी फ़िल्म-संगीत में असम की पहाड़ियों, चाय बागानों और वादियों का विशिष्ट संगीत देकर फ़िल्म-संगीत को ख़ास आयाम दिया, जो न केवल एक गायक और संगीतकार थे, बल्कि एक लेखक और फ़िल्मकार भी थे। पिछले शनिवार, ४ नवंबर को ८५ वर्ष की आयु में हमें अलविदा कह कर हमेशा के लिए जब भूपेन हज़ारिका चले गए तो उनका रचा एक गीत मुझे बार बार याद आने लगा..... "समय ओ धीरे चलो, बुझ गई है राह से छाँव, दूर है पी का गाँव, धीरे चलो...." आइए आज के इस विशेषांक में भूपेन दा के जीवन सफ़र के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों पर नज़र डालें।

भूपेन हज़ारिका का जन्म १ मार्च १९२६ को असम के नेफ़ा के पास सदिया नामक स्थान पर हुआ था। पिता संत शंकरदेव के भक्त थे और अपने उपदेश गायन के माध्यम से ही देते थे। बाल भूपेन में भी बचपन से ही संगीत की रुचि जागी और ११ वर्ष की आयु में उनका पहला ग़ैर-फ़िल्मी गीत रेकॉर्ड हुआ। फ़िल्म 'इन्द्र मालती' में उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अभिनय किया और इसी फ़िल्म में अपना पहला फ़िल्मी गीत "विश्व विजय नौजवान" भी गाया। तेजपुर से मैट्रिक और गुवाहाटी से इंटर पास करने के बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया और साथ ही साथ शास्त्रीय संगीत भी सीखते रहे। १९४२ में साम्प्रदायिक एकता पर लिखा उनका एक गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा जो बाद में 'शीराज़' फ़िल्म में भी लिया गया। गुवाहाटी में कुछ दिनों के लिए अध्यापन करने के बाद वो जुड़े आकाशवाणी से और यहीं से छात्रवृत्ति लेकर वो गए अमरीका के कोलम्बिया यूनिवर्सिटी 'मास कम्युनिकेशन' में एम.ए. करने। वहीं फ़िल्म माध्यम का भी गहन अध्ययन किया, रॉबर्ट स्टेन्स और रॉबर्ट फ्लैहर्टी से भी बहुत कुछ सीखा। वापसी में जहाज़ी सफ़र में जगह जगह से लोक-संगीत इकट्ठा करते हुए जब वो भारत पहुँचे तो उनके पास विश्वभर के लोक-संगीत का ख़ज़ाना था।

गुवाहाटी वापस लौट कर फिर एक बार उन्होंने अध्यापन किया, पर जल्दी ही पूर्ण मनोयोग से वो गीत-संगीत-सिनेमा से जुड़ गए। इप्टा (IPTA) के वे सक्रीय सदस्य थे। असम के बिहू, बन गीत और बागानों के लोक संगीत को राष्ट्रीय फ़लक पर स्थापित करने का श्रेय भूपेन दा को ही जाता है। असमीया फ़िल्म 'सती बेहुला' (१९५४) से वो फ़िल्म-संगीतकार बने। उसके बाद 'मनीराम देवान' और 'एरा बाटोर सुर' जैसी फ़िल्मों के गीतों नें चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। उसके बाद उनके लिखे, निर्देशित और संगीतबद्ध 'शकुंतला', 'प्रतिध्वनि' और 'लटिघटि' के लिए उन्हे लगातार तीन बार राष्ट्रपति पदक भी मिला। भूपेन हज़ारिका का व्यक्तित्व उसी समय इतना विराट बन चुका था कि १९६७ में विधान सभा चुनाव उनसे लड़वाया गया और उन्हें जीत भी हासिल हुई। १९६७-७२ तक विधान सभा सदस्य के रूप में उन्होंने असम में पहले स्टुडियो की स्थापना करवाई।

बांगलादेश के जन्म के उपलक्ष्य में भूपेन हज़ारिका की रचित 'जय जय नवजात बांगलादेश' को अपार लोकप्रियता मिली थी। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के दिनों में प्रसिद्ध अमरीकी बीग्रो गायक पॉल रोबसन के मित्र रहे हज़ारिका अश्वेतों के अधिकारों के लिए लड़ाई से बहुत प्रभावित रहे हैं। रोबसन की प्रसिद्ध रचना 'Old man river' से प्रेरणा लेकर हज़ारिका ने ब्रह्मपुत्र पर अपनी यादगार रचना "बूढ़ा लुई तुमि बुआ कियो" (बूढ़े ब्रह्मपुत्र तुम बहते क्यों हो?)। इसी गीत का हिन्दी संस्करण भी आया, जिसमें ब्रह्मपुत्र के स्थान पर गंगा का उल्लेख हुआ। "विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार, करे हाहाकार, निशब्द सदा, ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों?" आइए भूपेन दा की इसी कालजयी रचना को यहाँ पर सुना जाए।

गीत - गंगा बहती हो क्यों (ग़ैर फ़िल्म)


१९६३ में भूपेन दा के संगीत में असमीया फ़िल्म 'मनीराम देवान' में उन्होंने एक गीत रचा व गाया जो उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में दर्ज हुआ। गीत के बोल थे "बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई"। इसी गीत की धुन पर दशकों बाद कल्पना लाजमी की फ़िल्म 'रुदाली' में भूपेन दा नें "दिल हूम हूम करे गरजाए" कम्पोज़ कर इस धुन को असम से निकाल कर विश्व भर में फैला दिया। आइए इन दोनों गीतों को एक के बाद एक सुनें, पहले प्रस्तुत है असमीया संस्करण।

गीत - बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई (मनीराम देवान - असमीया)


फ़िल्म 'रुदाली' में इस गीत को लता मंगेशकर और भूपेन हज़ारिका, दोनों नें ही अलग अलग गाया था। सुनते हैं भूपेन दा की आवाज़। ख़ास बात देखिये, यह संगीत है असम का, पर 'रुदाली' फ़िल्म का पार्श्व था राजस्थान। तो किस तरह से पूर्व और पश्चिम को भूपेन दा नें एकाकार कर दिया इस गीत में, ताज्जुब होती है! कोई और संगीतकार होता तो राजस्थानी लोक-संगीत का इस्तेमाल किया होता, पर भूपेन दा नें ऐसा नहीं किया। यही उनकी खासियत थी कि कभी उन्होंने अपने जड़ों को नहीं छोड़ा।

गीत - दिल हूम हूम करे घबराए (रुदाली)


हिन्दी फ़िल्म जगत में भूपेन हज़ारिका के संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी १९७४ की 'आरोप'। दोस्तों, आपको याद होगा अभी हाल ही में 'पुरवाई' शृंखला में हमने दो गीत भूपेन दा के सुनवाये थे, जिनमें एक 'आरोप' का भी था "जब से तूने बंसी बजाई रे..."। इसी फ़िल्म में उन्होंने लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया युगल गीत "नैनों में दर्पण है, दर्पण में कोई देखूँ जिसे सुबह शाम" ख़ूब ख़ूब चला था। भूपेन दा के संगीत की खासियत रही है कि उन्होंने न केवल असम के संगीत का बार बार प्रयोग किया, बल्कि उनका संगीत हमेशा कोमल रहा, जिन्हें सुन कर मन को सुकून मिलती है। आइए फ़िल्म 'आरोप' के इस युगल गीत को सुना जाये, पर उससे पहले लता जी की भूपेन दा को श्रद्धांजलि ट्विटर के माध्यम से... "भूपेन हज़ारिका जी, एक बहुत ही गुणी कलाकार थे, वो बहुत अच्छे संगीतकार और गायक तो थे ही, पर साथ-साथ बहुत अच्छे कवि और फ़िल्म डिरेक्टर भी थे। उनकी असमीया फ़िल्म (एरा बाटोर सुर) में मुझे गाने का मौका मिला यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। ऐसा महान कलाकार अब हमारे बीच नहीं रहा इसका मुझे बहुत दुख है, ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।"

गीत - नैनों में दर्पण है (आरोप)


भूपेन हज़ारिका से संबंधित कुछ और जानकारी हम अगले सप्ताह के अंक में जारी रखेंगे। भूपेन दा को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आज की यह प्रस्तुति हम यहीं समाप्त करते हैं, नमस्कार!

Wednesday, October 12, 2011

जाने क्या है जी डरता है...असम के चाय के बागानों से आती एक हौन्टिंग पुकार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 764/2011/204

सम के लोक-संगीत की बात चल रही हो और चाय बागानों के संगीत की चर्चा न हो, यह सम्भव नहीं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है शृंखला 'पुरवाई' में जिसमें इन दिनों आप पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत के लोक धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीत सुन रहे हैं। चाय बागानों की अपनी अलग संस्कृति होती है, अपना अलग रहन-सहन, गीत-संगीत होता है। दरअसल इन चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूर असम, बंगाल, बिहार और नेपाल के रहने वाले हैं और इन सब की भाषाओं के मिश्रण से एक नई भाषा का विकास हुआ जिसे चाय बागान की भाषा कहा जाता है। यह न तो असमीया है, न ही बंगला, न नेपाली है और न ही हिन्दी। इन चारों भाषाओं की खिचड़ी लगती है सुनने में, पर इसका स्वाद जो है वह खिचड़ी जैसा ही स्वादिष्ट है। यहाँ का संगीत भी बेहद मधुर और कर्णप्रिय होता है। असम के चाय बागानों में झुमुर नृत्य का चलन है। यह नृत्य लड़कों और लड़कियों द्वारा एक साथ किया जाता है, और कभी-कभी केवल लड़कियाँ करती हैं झुमुर नृत्य। इस नृत्य में पाँव के स्टेप्स का बहुत महत्व होता है, एक क़दम ग़लत पड़ा और नृत्य बिगड़ जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि नृत्य करने वाले एक दूसरे की कमर को कस के पकड़े हुए होते हैं। और इस नृत्य के दौरान बजने वाला गीत-संगीत नृत्य को और भी ज़्यादा सुनद्र बना देते हैं। एक अजीब सुकून देने वाला यह संगीत है। आज के बड़े शहरों की तनाव से भरी ज़िन्दगी जीने वालों के लिए यह सुझाव देना चाहेंगे कि एक बार असम या उत्तर बंगाल के चाय बागानों की सैर कर आइए, यकीन दिलाते हैं कि आप एक नई ताज़गी और स्फूर्ति से भर उठेंगे। शायद वैसी ही ताज़गी जो यहाँ के चाय पत्तियों से बनी चाय की चुस्की लेते हुए आप महसूस करते हैं।

आज के अंक के लिए असम के चाय बागान के संगीत पर आधारित हमनें जिस गीत को चुना है, उसे भी कल की तरह भूपेन हज़ारिका नें ही स्वरबद्ध किया है। फ़िल्म 'एक पल' का यह गीत है "जाने क्या है जी डरता है, रो देने को जी करता है, अपने आप से डर लगता है, डर लगता है, क्या होगा"। लता मंगेशकर की आवाज़ है और गुलज़ार के बोल। यह १९८६ की कल्पना लाजमी निर्देशित फ़िल्म थी जो असम की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म थी। फ़िल्म के सभी गीतों में असमीया संगीत साफ़ सुनाई देता है, फिर चाहे आज का यह गीत हो या "मैं तो संग जाऊँ बनवास", विदाई गीत "ज़रा धीरे ज़रा धीमे" हो या फिर "फूले दाना दाना"। आज जो गीत आपको सुनवा रहे हैं, इसका असमीया गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' के उषा मंगेशकर पर केन्द्रित अंक में सुनवा चुके हैं। याद है न "राधाचुड़ार फूल गूंजी राधापुरोर राधिका" गीत? यह एक झुमुर नृत्य शैली का लोक गीत है जिस पर आधारित यह असमीया गीत है। पर हिन्दी वर्ज़न में भूपेन हज़ारिका नें बीट्स कम कर के इसमें एक हौन्टिंग् टच ले आये हैं। गीत सुन कर वाक़ई ऐसा लगता है कि कोई डरा हुआ है। तो आइए आज असम के चाय बगानों की सैर की जाये लता मंगेशकर, भूपेन हज़ारिका और गुलज़ार के साथ फ़िल्म 'एक पल' के इस गीत के माध्यम से।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
काका बाबु और किम पर फिल्मांकित इस गीत का आरंभ होता है इस शब्द से -"संग"

पिछले अंक में
लगता है की अब सभी श्रोता हमारे इशारों में बात करते हैं :) सुजॉय की पुरवाई का असर है
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, October 11, 2011

जब से तूने बंसी बजाई रे....भूपेन हजारिका का स्वरबद्ध एक मधुर गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 763/2011/203

पूर्वी और पुर्वोत्तर राज्यों के लोक धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों की लघु शृंखला 'पुरवाई' की तीसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। जैसा कि पहली कड़ी में हमने कहा था कि हमारे देश के हर राज्य के अन्दर भी कई अलग अलग प्रकार के लोक गीत पाये जाते हैं; इसमे असम राज्य कोई व्यतिक्रम नहीं है। कल की कड़ी में हमने बिहु का आनद लिया था, आज प्रस्तुत है असम की भक्ति गीतों की शैली में कम्पोज़ किया एक गीत। असम के नामघरों में जिस तरह का धार्मिक संगीत गाया जाता है, यह गीत उसी शैली का है। संगीतकार भूपेन हज़ारिका नें पहली बार इसका प्रयोग अपनी असमीया फ़िल्म 'मणिराम दीवान' के "हे माई जोख़ुआ" गीत में किया था, बाद में ७० के दशक में जब उन्हे हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' में संगीत देने का सुयोग मिला, और एक भक्ति रचना उन्हें फ़िल्म के लिए कम्पोज़ करना था, तो इसी धुन का उन्होंने दुबारा इस्तमाल किया और गायिका लक्ष्मी शंकर से यह गीत गवाया जिसके बोल थे "जब से तूने बंसी बजाई रे, बैरन निन्दिया चुराई, मेरे ओ कन्हाई, नटखट कान्हा ओ हरजाई रे काहे पकड़ी कलाई, मेरे ओ कन्हाई"। १९७४ की इस फ़िल्म में गीत लिखीं माया गोविन्द नें।

आइए आज इस कड़ी में आपको असम के नामघरों के बारे में बताते हैं। नाम का अर्थ है प्रार्थना। नामघर उस जगह को कहते हैं जहाँ लोग जमा हो कर आध्यात्मिक कार्य करते हैं जैसे कि प्रार्थना (अलग अलग प्रकार के 'नाम') और भावना (आधात्मिक नाट्य जिसमें पारम्परिक वेशभूषा और नृत्यों का प्रयोग होता है)। नामघर की परम्परा मूलत: असम के वैष्णवी हिन्दू धर्म के लोगों में पायी जाती है। वैष्णवी लोग भगवान कृष्ण के भक्त होते हैं जो नामघरों में नियमीत रूप से जाकर प्रार्थना करते हैं। वहाँ वे पवित्र ग्रंथों का पाठ करते हैं जिनमें कीर्तन, भागवत, नाम-घोसा आदि शामिल हैं, और पाठ के समय लोग "रीदमिक क्लैपिंग्" करते हैं और कई बार पारम्परिक वाद्यों का इस्तमाल किया जाता है। हालाँकि यह धार्मिक कार्यों तक ही सीमित होते हैं, नामघरों का उपयोग कम्युनिटी हॉल के रूप में किया जाता है शैक्षिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और उन्नयनमूलक कार्यों के लिए। नामघर को असम के 'neo-vaishnavite movement' का योगदान समझा जाता है। असम के प्रसिद्ध वैष्णव सन्त श्रीमन्त शंकरदेव (१४४९ - १५६९) नें नामघर की परिकल्पना की थी। किसी भी नामघर के एक अन्त में एक सिंहासन होता है, और दूसरे अन्त में होता है नामघर का मुख्य द्वार। इस सिंहासन में पवित्र ग्रंथ रखा होता है पूजा के लिए, और इस सिंहासन को सहारा स्वरूप चार हाथी, २४ सिंह और ७ बाघों की मूर्तियों का प्रयोग होता है। नामघर के अन्दर पौराणिक चरित्रों जैसे कि गरूड़, हनुमान, नागर, अनन्त आदि की मूर्तियाँ भी होती हैं। तो दोस्तों, चलिए असम की इस धार्मिक संगीत की शैली में सुनते हैं फ़िल्म 'आरोप' का गीत लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में। बड़ा ही दिल को छू लेने वाला संगीत है इस गीत का।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
गुलज़ार का लिखा ये गीत "जाने" शब्द से शुरू होता है

पिछले अंक में
मज़ा आया इंदु जी
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, April 28, 2009

आलसी सावन बदरी उडाये...भूपेन दा के स्वरों में

बात एक एल्बम की # 04

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


बतौर संगीतकार अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' (1974) साईन में उन्होंने लता से 'नैनों में दर्पण है' गवाया. इस गाने के बारे में भूपेन दा बताते है "एक दिन जब मैं रास्ते से गुजर रहा था तब एक पहाड़ी लडके को गाय चराते हुए इस धुन को गाते सुना इस गाने से मै इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उसी समय इस गाने की टियून को लिख लिया. हालांकि मैंने उसकी हू -बहू नक़ल नही किया मगर उसका प्लाट वही रखा ताकि उसकी आत्मा जिन्दा रहे.

और एक लम्बे अंतराल के बाद हिंदी में आई उनकी फिल्म "रुदाली" में एक बार फिर लता ने स्वर दिया उस अमर गीत को. 'दिल हूँ हूँ करे..." इस फिल्म में आशा ने अपनी आवाज़ से एक सजाया था बोल थे ...."समय धीरे चलो...". १९९२ में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वापस आते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ. "मैं और मेरा साया" में मूल असामी बोलों को हिंदी में तर्जुमा किया गुलज़ार साहब ने. गुलज़ार साहब ने इन सुंदर गीतों को हिंदी भाषी श्रोताओं को पेश कर बहुत उपकार किया है. इस एल्बम से गुजरना यानी भूपेन दा के मधुर स्वरों और शब्दों के असीम आकाश में विचरना. सच में एक अनूठा अनुभव है ये. आज इस अंतिम कड़ी में सुनिए ये तीन गीत -

ये किसकी सदा है ....


आलसी सावन बदरी उडाये....


और अंत में ये शीर्षक गीत - मैं और मेरा साया....


एल्बम "मैं और मेरा साया" के अन्य गीत यहाँ सुनें -

डोला रे डोला...
एक कली दो पत्तियां...
उस दिन की बात है रमैया...
हाँ आवारा हूँ...
कितने ही सागर....

भूपेन दा हिंदी फिल्म "एक पल" के सभी गीतों को सुनने के लिए यहाँ जाएँ -
दुर्लभ गीत फिल्म "एक पल" के

साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, April 21, 2009

जेहन को सोच का सामान भी देते हैं भूपेन दा अपने शब्दों और गीतों से

बात एक एल्बम की # 03

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


असम का बिहू, बन गीत और बागानों के लोकगीत को राष्ट्रीय फ़लक पे स्थपित करने का श्रेय हजारिका को ही जाता है. उनके शब्द आवाम की आवाज़ को सुन कर उन्ही के मनोभावों और एहसासों को गीत का रूप दे देते हैं और बहुत ही मासूमियत से फिर दादा पूछते हैं - 'ये किसकी सदा है'. भूपेन दा ने बतौर संगीतकार पहली असमिया फ़िल्म 'सती बेहुला' (१९५४) से अपना सफ़र शुरू क्या.

भूपेन दा असमिया फ़िल्म में काम करने के बाद अपना रुख मुंबई की ओर किया वहाँ इनकी मुलाकात सलिल चौधरी और बलराज सहानी से हुई। इनलोगों के संपर्क में आ कर भूपेन दा इंडियन पीपल थियेटर मोवमेंट से जुड़े. हेमंत दा भी इस थियेटर में आया करते थे. हेमंत दा और भूपेन दा की कैमेस्ट्री ऐसी जमी कि भूपेन दा उनके घर में हीं रहने लगे. एक दिन अचानक हेमंत दा हजारिका को लता जी से मुलाकात करवाने ले गए. लता से उनकी ये पहली मुलाकात थी भूपेनदा खासा उत्साहित थे.जब लता जी से मुलाकात हुई तब आश्चर्य से बोली कि 'आप ही भूपेन हो जितना आपका नाम है उतनी तो आपकी उम्र नही है!' भूपेन दा ने लता जी को बातो ही बातो में ये इकारानाम भी करवा लिए कि जब भी कोई हिन्दी फ़िल्म बनाऊंगा तब आप मेरे लिए गायेंगी ।

किसी गीत के सरल माध्यम से एक सशक्त सन्देश कैसे दिया जाता है ये कोई भूपेन दा से सीखे. एल्बम "मैं और मेरा साया" में भी उन्होंने कुछ ऐसे ही विचारों को उद्देलित करने वाले गीत रचे हैं, उदाहरण के लिए सुनिए आसाम के बागानों में गूंजती ये सदा..एक कली दो पत्तियां...नाज़ुक नाज़ुक उँगलियाँ....



सुनिए एक और कहानी इस गीत के माध्यम से, आवाज़ में ऐसा दर्द भूपेन दा के अलावा और कौन भर सकता है...




साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Sunday, April 19, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (3)

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीतों की सौगात लेकर हम फिर से हाज़िर हैं. आज आपके लिए कुछ ख़ास लेकर आये हैं हम सबके प्रिय पंकज सुबीर जी. हमें उम्मीद ही नहीं यकीन है कि पंकज जी का ये नायाब नजराना आप सब को खूब पसंद आएगा.

असमिया संगीतकार और गायक श्री भूपेन हजारिका का गीत "ओ गंगा बहती हो क्‍यों" जब आया तो संगीत प्रेमियों के मानस में पैठता चला गया । हालंकि भूपेन दा काफी पहले से हिंदी फिल्‍मों में संगीत देते आ रहे हैं किन्‍तु उनको हिंदी संगीत प्रेमियों ने इस गाने के बाद हाथों हाथ लिया । यद्यपि 1974 में आई फिल्‍म "आरोप" जिसके निर्देशक श्री आत्‍माराम थे तथा जिसमें विनोद खन्‍ना और सायरा बानो मुख्‍य भूमिकाओं में थे उस फिल्‍म का एक गीत जो लता जी तथा किशोर दा ने गाया था वो काफी लोकप्रिय हुआ था । गीत था- "नैनों में दर्पण है दर्पण में कोई देखूं जिसे सुबहो शाम" । इस फिल्‍म के संगीतकार भी भूपेन दा ही थे । भूपेन दा और गुलजार साहब ने मिलकर जब "रुदाली" का गीत संगीत रचा तो धूम ही मच गई । रुदाली में इस जादुई जोड़ी के साथ त्रिवेणी के रूप में आकर मिली लता जी की आवाज । और फिर श्रोताओं को मिले दिल हूम हूम करे, समय ओ धीरे चलो जैसे कई सारे अमर गीत । रुदाली का संगीत बहुत पापुलर संगीत है और वो उस दौर का संगीत है जब "माया मेमसाब", "लेकिन", "रुदाली" जैसी फिल्‍मों में हट कर संगीत आ रहा था । किन्‍तु आज हम बात करेंगें एक ऐसी फिल्‍म की जिसमें यही टीम थी और संगीत भी ऐसा ही अद्भुत था लेकिन किसी कारण से न तो फिल्‍म को कोई महत्‍व मिला और संगीत भी उसी प्रकार से आकर चुपचाप ही चला गया । यहां तक कि रुदाली फिल्‍म की निर्देशिका कल्‍पना लाजमी ही इस फिल्‍म "एक पल" की भी निर्देशिका थीं । किन्‍तु जहां रुदाली आई थी 1993 में तो एक पल आई थी 1985 में । अर्थात लगभग आठ साल पहले ।

तो आइये बात करते हैं एक पल की और सुनते हैं उसके वे अद्भुत गीत ।
1985 में आई एक पल में शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख जैसे कलाकार थे । जाहिर सी बात है कि ये एक आफ बीट फिल्‍म थी । 1985 में मार धाड़ की फिल्‍मों का दौर चल रहा था और शायद इसीलिये ये फिल्‍म और इसके गीत कुछ अनसुने से होकर गुज़र गये थे । संगीत भूपेन दा का था और गीत लिखे थे कैफी आजमी साहब और गुलजार साहब ने मिलकर ।

यदि अपनी बात कहूं तो मुझे लता जी का गाया तथा गुलजार सा‍हब का लिखा गीत 'जाने क्‍या है जी डरता है, रो देने को जी करता है, अपने आप से डर लगता है ' सबसे पसंद है । जाने किस मानसिकता में लिखा गया है ये गीत । शब्‍द ऐसे कि लगता है मानो किसी ने हमारे ही भावों को अभिव्‍यक्ति दे दी है । उस पर लता जी ने जिस हांटिंग स्‍वर में गाया है, ऐसा लगता है कि बार बार सुनते रहो इस गीत को ।

जाने क्‍या है जी डरता है


एक और गीत है जो लता जी, भूपेन दा तथा गुलजार साहब की ही त्रिवेणी ने रचा है । शब्‍द देखें 'चुपके चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं, आ डूब के देखें नीले से सागर में कैसे बहते हैं, आ जाना डूब के देखेंगें' ये गीत भी एक ऐसा गीत है जिसे रात की ख़ामोशी में सुन लो तो नशा ही छा जाये ।' जो सोचा है वो झूठ नहीं महसूस किया वो पाप नहीं, हम रूह की आग में जलते हैं ये जिस्‍म का झूठा ताप नहीं' जैस्‍ो शब्‍दों का जादू देर तक सर पर चढ़ा रहता है ।

चुपके चुपके


कैफी आजमी साहब का लिखा हुआ एक गीत है जो कि दो स्‍वरों में है भूपेंद्र तथा आशा भौंसले जी ने अलग अलग इस गीत को अपनी तरह से गाया है । 'आने वाली है बहार सूने चमन में, कोई फूल खिलेगा प्‍यारा सा कोमल तन में' ये गीत दोनों ही बार आनंद देता है । आशा जी की खनकदार आवाज़ जो गीतों में प्राण फूंक देती है उसने इस गीत को अमर कर दिया है । भूपेंद्र ने गीत का सेड वर्शन गाया है । जाहिर सी बात है उसमें संगीत भी वैसा ही है ।

आने वाली है बहार


आने वाली है बहार (आशा)


एक और गीत जो मुझे हांट करता है वो लता जी और भूपेन दा के स्‍वरों में है तथा गुलजार साहब ने लिखा है । गीत के बोल हैं 'मैं तो संग जाऊं बनवास, स्‍वामी न करना निरास, पग पग संग जाऊं, जाऊं बनवास हे' गीत के बोल ही बता रहे हैं कि राम के बनवास गमन पर गीत है । जिसमें लता जी बनवास ग वन गमन की जिद कर रहे हैं और भूपेन दा रोकने के लिये अपनी बात कर रहे हैं । 'जंगल बन में घूमे हाथी भालू शेर और हिरना, नारी हो तुम डर जाओगी न जाओ बनवास हे '' । अनोखा सा गीत है ये ।

मैं तो संग


गुलजार साहब के एक और गीत को झूम कर गाया है नितिन मुकेश, भूपेन दा और भूपेंद्र ने । 'फूले दाना दाना फूले डालियां भंवराता आया बैसाख' इस गीत में असम के बीहू की ध्‍वनियां भूपेन दा ने उपयोग की हैं ।'बाजरे की बाली सी छोरिया, गेहूं जैसी गोरिया, रात को लागे चांदनी, ऐसी ला दे जोरुआ' । मुझे नहीं मालूम असम में बैसाख कैसा आता है किन्‍तु इस गीत में तो अद्भुत मस्‍ती है बैसाख की । और अंत में जब गीत तेज होता है तो वो पंक्तियां 'पूर्णिमा अगनी जल गई रजनी, जल्‍दी करा दे रे मंगनी, हो मैया करा दे रे' गीत देर तक मस्‍ती देता रहता है । बीच बीच में भूपेन दा का स्‍वर किसी जादू की तरह आता है ।

फूले दानादाना


गुलज़ार साहब का एक और गीत है जो दो बार है एक बार सेड है और एक हैप्‍पी है । सेड में केवल भूपेंद्र ने गाया है और हैप्‍पी वर्शन में भूपेन दा, भूपेंद्र, उषा मंगेशकर तथा हेमंती शुक्‍ला ने इसे गाया है । विवाह गीत है ये 'जरा धीरे जरा धीमे ले के जइहो डोरी, बड़ी नाज़ुक मेरी जाई मेरी बहना भोली' । गीत में भी लोक संगीत की ध्‍वनियां हैं और भरपूर हैं ।

जरा धीरे


तो ये है संगीत फिल्‍म 'एक पल' का जिसे निर्देशित किया था कल्‍पना लाजमी ने । फिल्‍म भले ही यूंही आकर यूंही चली गई हो किन्‍तु इसका संगीत अमर है । ये लोक का संगीत है ।

प्रस्तुति - पंकज सुबीर

पिछले अंक में विकास शुक्ल जी ने हमसे लता जी के गाये एक गीत की फरमाईश की थी, हमने एक बार फिर अजय जी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्होंने ढूंढ निकला वह दुर्लभ गीत जिसे विकास जी ढूंढ रहे थे. आप भी सुनिए फिल्म "गजरे" से ये गीत "बरस बरस बदरी बिखर गयी...", संगीत है अनिल बिस्वास का -





"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Tuesday, April 14, 2009

बहता हूँ बहता रहा हूँ...एक निश्छल सी यायावरी है भूपेन दा के स्वर में

बात एक एल्बम की # 02

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


भूपेन दा का जन्म १ मार्च १९२६ को नेफा के पास सदिया में हुआ.अपनी स्कूली शिक्षा गुवाहाटी से पूरी कर वे बनरस चले आए और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीती शास्त्र से स्नातक और स्नातकोत्तर किया. साथ में अपना संगीत के सफर को भी जारी रखा और चार वर्षों तक 'संगीत भवन' से शास्त्रीय संगीत की तालीम भी लेते रहे। वहां से अध्यापन कार्य से जुड़े रहे इन्ही दिनों ही गुवाहाटी और शिलांग रेडियो से भी जुड़ गए. जब इनका तबादला दिल्ली आकाशवाणी में हो गया तब अध्यापन कार्य छोड़ दिल्ली आ गए ।

भूपेन दा के दिल में एक ख्वाहिश थी की वे एक जर्नलिस्ट बने. इन्ही दिनों इनकी मुलाकात संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष नारायण मेनन से हुई. भूपेन दा की कला और आशावादिता से वे खासा प्रभावित हुए और उन्हें सलाह दी के वे विदेश जा कर पी.एच.डी. करें भूपेन दा ने उनकी सलाह मान ली और कोलंबिया विश्वविद्यालय में मॉस कम्युनिकेशंस से पी.एच डी करने चले गए. मेनन साहब ने स्कालरशिप दिलाने में काफी मदद की. कोलंबिया में पढ़ाई के साथ -साथ होटल में काम किया और कुछ मैगजीन और लघु फिल्मों में संवाद भी बोले. इन सब कामो से वे लगभग २५० डालर कमा लेते थे जिससे उनके शौक भी पूरे हो जाया करते. इन्ही दिनों इनकी मुलाकात राबर्ट स्टेन्स और राबर्ट फेल्हरती से हुई जिनके संपर्क में इन्हे फिल्मो के बारे में काफी कुछ सीखने का मौका भी मिला. जगह -जगह के लोक संगीत को संग्रह करना और सीखना भूपेन साहब के शौको में सबसे उपर. एक दिन दादा एक सड़क से हो कर गुजर रहे थे तभी अमेरिका के मशहुर नीग्रो लोकगायक पॉल रॉबसन गाते हुए देखा वे गाये जा रहे थे 'ol 'man river,you dont say nothing ,you just keep rolling along' पॉल के साथ मात्र एक गिटार वादक था और एक ड्रम और कोई इंस्ट्रूमेंट नही.पॉल की आवाज और उनका गाया यह गाना भूपेन दा को इतना अच्छा लगा कि उससे प्रेरित हो कर 'ओ गंगा तुम बहती हो क्यूँ' रचना का सृजन किया. पॉल से से इनकी जान पहचान भी हो गई और पॉल से ये नीग्रो लोकगायकी के गुर भी सीखने लगे मगर पॉल की दोस्ती थोडी महंगी पड़ी और 7 दिनों के लिए पॉल के साथ जेल की हवा खानी पड़ी .बहरहाल हजारिका अपनी शिक्षा पूरी कर भारत लौट आए।

चलिए आगे का किस्सा अगले सप्ताह अब सुनते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम "मैं और मेरा साया" से भूपेन के गाये ये दो गीत.
हाँ आवारा हूँ ..यायावर दादा के चरित्र को चित्रित करता है ये मधुर गीत-




कुछ इसी भाव का है ये दूसरा गीत भी. कितने ही सागर, कितने ही धारे...बहते हैं बहता रहा हूँ....वाह... सुनिए और इस आनंद में सागर में डूब जाईये -



साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

Tuesday, April 7, 2009

मैं और मेरा साया - भूपेन दा का एक नायाब एल्बम.

बात एक एल्बम की # ०१

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


दोस्तों आज बात एक ऐसी शख्सियत की हो रही है जिनके बारे में कुछ कहने में ढेरों मुश्किलों से साक्षत्कार होना पड़ता है. इस एक शख्स में कई शख्सियत समायी हुई है ।बुद्धिजीवी संगीतकार, उत्कृष्ट गायक, सवेदनशील कवि, अभिनेता, लेखक, निर्देशक, समाज सेवक और न जाने कितने रूप. दोस्तों मै दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मानित डॉक्टर भूपेन हजारिका के बारे में बात कर रहा हूँ .जब भी हिन्दी सिने जगत में लोकसंगीत की बात आएगी तो भूपेन दा के का नाम शीर्ष पर रहेगा. उन्होंने अपने संगीत के जरिये आसाम की मिट्टी की सोंधी खुश्बू कायनात में घोल दी है.


बचपन में पिता शंकर देव का उपदेश ज्यादातर गेय रूप में प्राप्त होता था. उन्ही दिनों उनके मन में संगीत ने अपना घर बना लिया और वे ज्योति प्रसाद अग्रवाल, विष्णु प्रसाद शर्मा और फणी शर्मा जैसे संगीतविदों के संपर्क में आकर लोकगीत की तालीम लेने लगे।

भूपेन दा के आवाज़ में वह बंजारापन है जो उस्तादों से लेकर आम जन -जन को अपने गिरफ्त में ले लेता हैं और अपनी आवाज़ को सबकी आवाज़ बना देता हैं। भूपेन दा की रचनाओं की वेदना की गहराई का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है जब वे एक दफ़ा नागा रिबेल्स से बात करने गए तो आपनी एक रचना 'मानुहे मनोहर बाबे' को वहां के एक नागा युवक को उन्हीं कि अपनी भाषा में अनुवाद करने को कहा और जब उन लोगों ने इस गीत को सुना तो सभी के आंखों में आँसू आ गए। भूपेन दा के इस गीत के बंगला अनुवाद 'मानुष मनुषेरे जन्में', को बी.बी.सी.की तरफ़ से 'सॉंग ऑफ द मिलेनियम,के खिताब से नवाजा गया. इस गीत के जरिये भूपेन दा का कवि रूप का चिंतन हमारे सामने आता है.

हमारे फीचर्ड आर्टिस्ट भूपेन दा पर होंगी और बातें अगले मंगलवार, फिलहाल सुनते हैं इस महीने की फीचर्ड एल्बम, "मैं और मेरा साया" से भूपेन हजारिका की आवाज़. भूपेन दा के मूल गीत का हिंदी अनुवाद किया है गुलज़ार साहब ने.



साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


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