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शुक्रवार, 4 जून 2010

महान फनकारों के सुरों से सुर मिलते आज हम आ पहुंचे हैं रिवाईवल की अंतिम कड़ी में ये कहते हुए - तू भी मेरे सुर में सुर मिला दे...

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ४५

पिछले ४५ दिनों से, यानी डेढ़ महीनों से आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं रिवाइवल सुनहरे दौर के सदाबहार नग़मों का, जिन्हे हमारे कुछ जाने पहचाने साथियों की आवाजों में। आज हम आ पहुँचे हैं इस विशेष शृंखला की अंतिम कड़ी पर। इस शृंखला में जिन जिन गायक गायिकाओं ने हमारे सुर में सुर मिला कर इस शृंखला को इस सुरीले अंजाम तक पहुँचाया है, हम उन सभी कलाकारों का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं, और साथ ही साथ हम आप सभी सुधी श्रोताओं का भी आभार व्यक्त करते हैं जिन्होने इन गीतों को सुन कर अपनी राय और तारीफ़ें लिख भेजी। तो आइए आज इस सुरीली शृंखला को एक सुरीला अंजाम प्रदान करते हैं और सुनते हैं फ़िल्म 'चितचोर' से "तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, संग गा ले, तो ज़िंदगी हो जाए सफल"। आपको बता दें कि इस गीत के लिए हेमलता को उस साल का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला था। इससे पहले कि आप यह गीत सुनें, इस गीत की रिकार्डिंग् की कहानी सुनिए ख़ुद हेमलता से जो उन्होने विविध भारती के एक इंटरव्यू में कहे थे। "इस गीत की रिकार्डिंग् के दिन मैं स्टुडियो लेट पहुँची। किस कारण से लेट हुई थी यह अब तो याद नहीं, बस लेट हो गई थी। वहाँ येसुदास जी आ चुके थे। गाने की रिकार्डिंग् के बाद दादा ने मुझसे कहा कि अगर तुम मेरे गुरु की बेटी नहीं होती तो वापस कर देता। यह सुन कर मैं इतना रोयी उस दिन। मुझे उन पर बहुत अभिमान हो गया, कि वो मुझे सिर्फ़ इसलिए गवाते हैं क्योंकि मैं उनके गुरु की बेटी हूँ? बरमन दादा, कल्याणजी भाई, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, ये सब भी तो मुझसे गवाते हैं, तो फिर उन्होने ऐसा क्यों कह दिया! मुझे बहुत बुरा लगा और मैं दिन भर बैठके रोयी। मैं दादा से जाकर यह कहा कि देर से आने के लिए अगर आप मुझे बाहर निकाल देते तो मुझे एक सबक मिलता, बुरा नहीं लगता, पर आप ने ऐसा क्यों कहा कि अगर गुरु की बेटी ना होती तो बाहर कर देता। तो उन्होने मुझसे बड़े प्यार से कहा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जब तुम्हारे लिए सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स वेट करेंगे, तुम नहीं आओगी तो रिकार्डिंग् ही नहीं होगी'।" तो दोस्तों, आइए अब 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की अंतिम कड़ी के इस गीत को सुना जाए और आपको यह बताते चलें कि सोमवार से हम वापस लौटेंगे अपनी उसी पुराने स्वरूप में और दोबारा शुरु होगा गोल्डन दौर के गोल्डन गीतों का कारवाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी नंबर ४११ के साथ। साथ ही पहेली प्रतियोगिता और 'क्या आप जानते हैं' स्तंभ भी हम वापस ले आएँगे। तो ज़रूर पधारिएगा 'आवाज़' के मंच पर सोमवार यानी ७ जून को। एक बार फिर से उन सभी गायक गायिकाओं का शुक्रिया अदा करते हुए जिन्होने 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की इस शृंखला को मुकम्मल बनाया, हम ले रहे हैं इजाज़त, नमस्कार!

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -तू जो मेरे सुर में...
कवर गायन -रश्मि नायर और एन वी कृष्णन




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रश्मि नायर
इन्टरनेट पर बेहद सक्रिय और चर्चित रश्मि मूलत केरल से ताल्लुक रखती हैं पर मुंबई में जन्मी, चेन्नई में पढ़ी, पुणे से कॉलेज करने वाली रश्मि इन दिनों अमेरिका में निवास कर रही हैं और हर तरह के संगीत में रूचि रखती हैं, पर पुराने फ़िल्मी गीतों से विशेष लगाव है. संगीत के अलावा इन्हें छायाकारी, घूमने फिरने और फिल्मों का भी शौक है
एन वी कृष्णन
मधुर आवाज़ के धनी एन वी कृष्णन साहब मूल रूप से कालीकट केरल के हैं और मुंबई में रहते हैं, जीवन यापन की दौड धूप में उन्हें अपने जूनून संगीत को समय देने के मौका नहीं मिला, पर इन्टरनेट क्रांति ने उनके गायन को आज एक नया आकाश दे दिया है, कृष्णन साहब अपनी इस दूसरी पारी को खूब एन्जॉय कर रहे हैं इन दिनों


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

ताल से ताल मिला - रहमान के साथ

मोजार्ट ऑफ़ मद्रास को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाओं सहित -
बात तब की है, जब रहमान "गुरू" फिल्म के गाने रिकार्ड कर रहे थे। "नुसरत" साहब के एक बहुत हीं सोफ्ट-से गाने "सजना तेरे बिना" ने उन्हें बेहद प्रभावित किया था। गौरतलब बात है कि "रहमान" की गिनती नुसरत साहब के बड़े फैन्स में की जाती है। रहमान भी "सजना तेरे बिना" जैसा हीं कोई सोफ्ट-सा गाना तैयार करना चाहते थे। "नुसरत" साहब का या फिर कहिये उनकी दुआओं का यह असर हुआ कि २५ मिनट का गाना बन कर तैयार हो गया। छ:-सात मुखरों से सजे इस गाने की एडिटिंग शुरू हुई और अंतत: गाने को इसकी मुकम्मल और संतुलित लंबाई मिल गई। मज़े की बात यह है कि इस गाने से पहले रहमान ने "ऎ हैरते आशिकी" गाना भी बना लिया था. "ऎ हैरते आशिकी" के पीछे का वाक्या भी बड़ा हीं मज़ेदार है। अमीर खुसरो के एक नज़्म "ये शरबती आशिकी" ने "रहमान" पर गहरा असर किया था। रहमान इसे धुनों में उतारना चाहते थे, लेकिन फारसी की बहुलता आड़े आ रही थी। तब खेवनहार के तौर पर आए "गुलज़ार साहब" जिन्होने "ये शरबती आशिकी" को अलग हीं अंदाज़ देकर बना दिया "ऎ हैरते आशिकी",जिसे "क्यूँ उर्दू-फारसी बोलते हो, दस कहते हो, दो तोलते हो" जैसे मिसरों ने मिश्री-सा मीठा कर दिया। तो हाँ हम बात कर रहे थे उस २५ मिनट के गाने की। "गुरू" के निर्देशक मणिरत्नम को "ऎ हैरते आशिकी" भारी-भरकम-सा लग रहा था, जिसे वो फिल्म की शुरूआत में नहीं डालना चाहते थे। तब नुसरत साहब की दुआओं से उपजे गाने को फिल्म का पहला गाना बनने का मौका मिला। वह गाना था "तेरे बिना" ("सजना तेरे बिना" से "सजना" को देशनिकाला मिल गया ) । इस गाने को रहमान ने कादिर खान और चिन्मयी की आवाज़ों में रिकार्ड कर लिया । लेकिन तभी मणिरत्नम को "दिल से" के "दिल से" की याद आ गई। मणिरत्नम जिद्द पर अड़ गए कि यह गाना अगर रहमान खुद नहीं गाते तो गाना फिल्म में रहेगा हीं नहीं। रहमान द्वंद्व में, कादिर खान के साथ धोखा भी नहीं कर सकते थे,लेकिन गाना भी प्यारा था । अंतत: रहमान ने हामी भर दी और हमें रहमान की आवाज़ में प्यारा-सा गाना सुनने को मिल गया। वैसे गाने में कादिर खान की आवाज़ है, लेकिन महज़ आलाप में हीं।

कादिर खान की आवाज़ में "तेरे बिना" यहाँ सुने-



सौम्या राव की आवाज़ में "शौक है" सुनें,जिसे ओडियो में रीलिज नहीं किया गया, लेकिन फिल्म में विद्या बालन और माधवन पर फिल्माया गया था।


यह तो हम सभी जानते हैं कि रहमान का वास्तविक नाम "दिलीप कुमार" है। रहमान जब रहमान नहीं थे, बल्कि अपने दोस्तों के साथ संगीत तैयार करने वाले "दिलीप" थे, तब उन्होंने "शुभा" नाम की एक गायिका के साथ "सेट मी फ्री" (set me free) नाम का अंग्रेजी गानों का एलबम तैयार किया था। यह बात "रोजा" के रीलिज होने से पहले की है। इस एलबम को "मैंग्नासाउंड" नाम की कंपनी ने रीलिज किया था। चूँकि संगीतकार नया था, गीतकार नया था, गायिका नयी थी और लोगों की पसंद पुराने ढर्रे की, "सेट मी फ्री" कुछ ज्यादा कमाल नहीं कर सकी। दो साल बाद "रोज़ा" रीलिज हुई और "रहमान" रातोंरात अव्वल नंबर के संगीतकारों में शुमार हो गए । "रोज़ा" में पहली बार दिलीप को "ए०आर०रहमान" के रूप में पेश किया गया था। "दिलीप" के "ए०आर०रहमान" बनने की कहानी जितनी दु:खद(पिता की मृत्य, बहन की लाईलाज बिमारी)है,उतनी हीं रोमांचक भी है। "दिलीप" के पूरे परिवार ने धर्म-परिवर्तन का फैसला कर लिया था। "दिलीप" की माँ ज्योतिष में बेहद यकीन करती थी। चेन्नई के जानेमाने ज्योतिष "उलगनथम" के पास एक बार "दिलीप", उनकी बहन और उनकी माँ का जाना हुआ। उनकी माँ ने उस ज्योतिष से "दिलीप" के लिए कोई इस्लामिक नाम सुझाने का आग्रह किया। "उलगनथम" ने नाम दिया "अब्दुल रहमान" लेकिन कहा कि इसे "ए०आर०रहमान" कहो । बार-बार यह पूछने पर भी कि इसमें "आर०" किस शब्द के लिए है, उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, बस इतना हीं कहा कि "ए०आर०रहमान" नाम हीं इसे प्रसिद्धि दिलायेगा। आगे चलकर प्रख्यात संगीतकार "नौशाद" की सलाह पर "ए०आर०" हुआ "अल्लाह रक्खा" । जब फिल्म रोजा रीलिज होने वाली थी,तो इस फिल्म के कैसेट्स के कवर पर "दिलीप कुमार" लिखने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। तभी रहमान की माँ ने निर्देशक "मणिरत्नम" से संपर्क किया और उनसे गुजारिश की कि "दिलीप कुमार" की बजाय "ए०आर०रहमान" लिखा जाए और इस तरह "दिलीप" हो गए "ए०आर०रहमान" । हाँ तो हम बात कर रहे थे "सेट मी फ्री" की। रोज़ा की सफलता के बाद "मैग्नासाउंड" कंपनी ने "रहमान" के नाम को भुनाना चाहा। रहमान से इजाजत लिए बिना उन लोगों ने पुराने कैसेट्स को नए कवर में बाज़ार में उतार दिया, चेन्नई में जगह-जगह बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स लगा दी और कैसेट को रहमान का सबसे पहला अंतर्राष्ट्रीय एलबम कहा गया । जाहिर सी बात है रीलौंच हुए कैसेट को "रहमान" के नाम के कारण बाज़ार तो मिलना हीं था, कैसेट्स हाथों-हाथ बिक गए,वही कैसेट जिसकी पहले केवल ३०० प्रतियाँ हीं बिकी थी। आज भी हम से कई "सेट मी फ्री" को आज के रहमान का एलबम मानते हैं, जबकी "रहमान" खुद इसके रीलौंच से नाराज़ थे। उनका कहना था कि यह कैसेट उनके लिए एक प्रयोग मात्र था,"मैग्नासाउंड" जब इसे रीलौंच हीं करना चाहती थी तो उनसे धुनों का कच्चापन तो खत्म करा लेती। लेकिन रूपयों के चकाचौंध ने "मैग्नासाउंड" की आँखों पर पट्टी डाला हुआ था। गनीमत देखिए कि उसी कंपनी ने २००६ में फिर से उसी एलबम को रीलिज किया है और इस बार भी "रहमान" के नाम ने उसे करोड़ों की कमाई करा दी है। यह है "रहमान" के संगीत का कमाल...........क्या हुआ कि कच्चा है....लेकिन है तो रहमान का हीं।

पिछले अंक में हम बातें कर रहे थे रहमान के संगीत के अनोखे अंदाज़ के बारे मे। रहमान जानते हैं कि उन्हें किस वाद्य-यंत्र से कितनी ध्वनि चाहिए। कल हम "ताल" की बात पर रूके थे। तो "ताल" का हीं किस्सा सुनाते हैं। "ताल से ताल मिला" की रिकार्डिंग हो रही थी। "रहमान" धुन तैयार कर चुके थे, अब बस म्युजिसियन्स या कहिए वादकों को अपना काम करना था। "ताल से ताल मिला" अगर आपको याद हो तो आप महसूस करेंगे कि इस गाने में "तबला" का बेहद खूबसूरत प्रयोग किया गया है। दर-असल इसका सारा श्रेय जाता है रहमान के अनूठेपन को। तबला-वादक इस गाने की धुन को बेहद आसान और कन्वेंशनल मान रहा था। लेकिन रहमान जानते थे कि उन इस गाने में तबले का प्रयोग कैसे करना है। उन्होंने तबला-वादक को अपनी ऊँगलियों में रबर-बैंड के सहारे आईस-क्रीम-स्टीक्स बाँधने को कहा ,फिर धुन भी अनकन्वेंशनल हो गई और तबले की आवाज भी।

तो चलिए सुनते हैं "ताल" से "ताल से ताल मिला"-



रहमान के स्टुडियो में गानों की रिकार्डिंग कितने अलहदा तरीके से होती है, उसके कई प्रमाण है। रहमान गानों की रिकार्डिंग के वक्त स्टुडियो की हरेक आवाज़ को रिकार्ड कर लेते हैं,फिर चाहे वह माईक का ग्लिच हीं क्यों ना हो। एक ऎसा हीं मज़ेदार वाक्या हुआ तमिल फिल्म "कदल वाईरस" के एक गाने की रिकार्डिंग के वक्त । गाने में नायक की खाँसी की आवाज़ की जरूरत थी। गाने की रिकार्डिंग के बीच में गायक खाँस पड़ता है। इस एक खाँसी के अलावा गाने की रिकार्डिंग के दौरान गायक कभी भी खाँसी की वास्तविक नकल नहीं कर पाता। खाँसी के बिना पूरी रिकार्डिंग खत्म हो जाती है। रहमान पहले से रिकार्ड कर रखी हुई गायक "मनू" की वास्तविक खाँसी को हीं गाने में फिट कर देते हैं। ऎसे हीं कई किस्से हैं जो रहमान को औरों से अलग करते हैं और परफेक्शनिस्ट बनाते हैं। कहा जाता है कि रहमान गायक के अनुसार धुन में फेरबदल नहीं करते,बल्कि धुन के मुताबिक गायक चुनते हैं। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि रहमान की बड़ी बहन "रेहाना" भी एक गायिका हैं ,लेकिन रहमान ने अपने कैरियर के १७ साल बीत जाने के बाद तमिल फिल्म "शिवाजी" में उन्हं गाने का अवसर दिया। रहमान संगीत को जीते हैं,इसलिए संगीत के साथ धोखा करने की सोच भी नहीं सकते । रहमान धुन के अनुसार गायको के साथ प्रयोग करते रहते हैं। यही कारण है कि हम "दौड़" फिल्म के एक गाने "ओ भंवरे" में "येशुदास" की आवाज़ सुनते हैं, जिसकी शायद हीं कोई कल्पना कर सकता है ।

आप भी "दौड़" के "ओ भँवरे" का मज़ा लीजिए:



रहमान ने किसी भी संगीतकार से ज्यादा ४ रजत कमल पुरस्कार(silver lotus, national award) प्राप्त किये हैं उन्हें ये पुरस्कार क्रमश: रोज़ा(१९९२), मिन्सारा कनावु(१९९७), लगान(२००१) और कनतिल मुतमित्तल(२००२)के लिए प्रदान किए गए। टाईम मैगजीन ने "रोज़ा" के संगीत को विश्व के सर्वश्रेष्ठ १० गीतों में शुमार किया है। टाईम मैगजीन ने रहमान को "मोज़ार्ट औफ मद्रास" की उपाधि से भी नवाज़ा है। पूरे विश्व में अबतक रहमान के १० करोड़ से भी ज्यादा साउंडट्रैकस एवं फिल्म -स्कोर्स बिक चुके हैं। यह उपलब्धि उन्हें संसार के १० सबसे बड़े रिकार्ड आर्टिस्टों की कतार में ला खड़ा करती है। यह किसी भी भारतीय के लिए फख़्र की बात है।

चलिए अंत में हम सुनते हैं रहमान का संगीतबद्ध एवं स्वरबद्ध किया हुआ फिल्म "लगान" का "बार-बार हाँ, चले चलो" गाना-



अंत में जाते-जाते रहमान को उनके जन्मदिवस पर ढेरों शुभकामनाएँ। खुदा करे कि उनपर बरकत बनी रहे और पूरा संगीत-जगत सदियों तक उनके संगीत और गीत का यूँ हीं लुत्फ़ लेता रहे। आमीन!!!!

चित्र में (उपर) शांत और सोम्य रहमान, (नीचे) प्रिय निर्देशक मणि रत्नम के साथ
प्रस्तुति - विश्व दीपक "तन्हा"



बुधवार, 26 नवंबर 2008

अमर उजाला पर आवाज़ भी

हिन्द-युग्म के बाल-उद्यान पृष्ठ को अमर-उजाला में आप कई बार पढ़ भी चुके हैं। अब बारी है हिन्द-युग्म के संगीत-पृष्ठ की। २५ नवम्बर के हिन्दी दैनिक अमर उजाला के 'ब्लॉग कोना' स्तम्भ में आवाज़ पर सलिल चौधरी के बारे में २४ नवम्बर २००८ को प्रकाशित आलेख 'सलिल दा के बहाने येसुदास की बात' के कुछ अंश प्रकाशित हुए हैं। आप भी पढ़ें-

षड़ज ने पायो ये वरदान - एक दुर्लभ गीत


येसू दा का जिक्र जारी है, सलिल दा के लिए वो "आनंद महल" के गीत गा रहे थे, उन्हीं दिनों रविन्द्र जैन साहब भी अभिनेता अमोल पालेकर के लिए एक नए स्वर की तलाश में थे. जब उन्होंने येसू दा की आवाज़ सुनी तो लगा कि यही एक भारतीय आम आदमी की सच्ची आवाज़ है, दादा(रविन्द्र जैन) ने बासु चटर्जी जो कि फ़िल्म "चितचोर" के निर्देशक थे, को जब ये आवाज़ सुनाई तो दोनों इस बात पर सहमत हुए कि यही वो दिव्य आवाज़ है जिसकी उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए तलाश थी. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास बना. चितचोर के अविस्मरणीय गीतों को गाकर येसू दा ने राष्टीय पुरस्कार जीता और उसके बाद दादा और येसू दा की जुगलबंदी ने खूब जम कर काम किया.

वो सही मायनों में संगीत का सुनहरा दौर था. जब पूरे पूरे ओर्केस्ट्रा के साथ हर गीत के लिए जम कर रिहर्सल हुआ करती थी, जहाँ फ़िल्म के निर्देशक भी मौजूद होते थे और गायक अपने हर गीत में जैसे अपना सब कुछ दे देता था. येसू दा और रविन्द्र दादा के बहाने हम एक ऐसे ही गीत के बनने की कहानी आज आपको सुना रहे हैं. येसू दा की माने तो ये उनका हिन्दी में गाया हुआ सबसे बहतरीन गीत है. पर दुखद ये है कि न तो ये फ़िल्म कभी बनी न ही इसके गीत कभी चर्चा में आए.

राजश्री वाले एक फ़िल्म बनाना चाहते थे संगीत सम्राट तानसेन के जीवन पर आधारित, चूँकि पुरानी तानसेन काफी समय पहले बनी थी राजश्री ७०-८० के दशक के दर्शकों के लिए तानसेन को फ़िर से जिन्दा करना चाहते थे और उनके पास "तुरुप का इक्का" संगीतकार रविन्द्र जैन भी थे, तो काम असंभव नही दिखता था. बहरहाल काम शुरू हुआ. रविन्द्र जी ने गीत बनाया "षड़ज ने पायो ये वरदान" और सबसे पहले रफी साहब से स्वर देने का आग्रह किया. रफी साहब उन दिनों अपने चरम पर थे, तो हो सकता है बात समय के अभाव की रही हो पर उन्होंने दादा से बस यही कहा "रवि जी,मोहमद रफी इस जीवन काल में तो कम से कम ये गीत नही गा पायेगा...". दादा आज भी मानते हैं कि ये उनका बड़प्पन था जो उन्होंने ऐसा कहा. हेमंत दा से भी बात की गई पर काम कुछ ऐसा मुश्किल था कि हेमंत दा भी पीछे हट गए, यह कहकर कि इस गीत को गाने के बारे में सोचकर ही मैं तनावग्रस्त हो जाता हूँ. तब जाकर दादा ने येसू दा से इसे गाने के लिए कहा. दोनों महान कलकारों ने पूरे दो दिन यानी कुल ४८ घंटें बिना रुके, बिना भोजन खाए और बिना पानी का एक घूँट पिये काम करते हुए गीत की रिकॉर्डिंग पूरी की. ५९ वीं बार के "टेक" में जाकर गीत "ओके" हुआ. सुनने में असंभव सी लगती है बात, पर सच्चे कलाकारों का समर्पण कुछ ऐसा ही होता है.

फ़िल्म क्यों नही बनी और इसके गीत क्यों बाज़ार में नही आए इन कारणों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नही है, पर येसू दा अपने हर कंसर्ट में इस गीत का जिक्र अवश्य करते हैं, १९८६ में दुबई में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने इसे गाया भी जिस की रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आए हैं....हमारे सुधि श्रोताओं के नाम येसू दा और रविन्द्र जैन "दादा" का का ये नायाब शाहकार -




दादा इन दिनों वेद् और उपनिषद के अनमोल बोलों को धुन में पिरोने का काम कर रहे हैं. और वो इस कोशिश में येसू दा को नए रूप में आज के पीढी के सामने रखेंगें. संगीत के कद्रदानों के लिए इससे बेहतर तोहफा भला क्या होगा. सोमवार को हम लौटेंगे और बात करेंगे रविन्द्र जैन साहब के बारे में, विस्तार से. बने रहिये आवाज़ पर.

मंगलवार, 25 नवंबर 2008

"दासेएटन" (येसुदास) के हिन्दी गीतों की मिठास भी कुछ कम नहीं...


कल हमने बात की सलिल दा की और बताया की किस तरह उन्होंने खोजा दक्षिण भारत से एक ऐसा गायक जो आज की तारीख में मलयालम फ़िल्म संगीत का दूसरा नाम तो है ही पर जितने भी गीत उन्होंने हिन्दी में भी गाये वो भी अनमोल साबित हुए. आज हम बात करेंगे ४०.००० से भी अधिक गीतों को अपनी आवाज़ से संवारने वाले गायकी के सम्राट येसुदास की.
लगभग ४ दशकों से उनकी आवाज़ का जादू श्रोताओं पर चल रहा है, और इस वर्ष १० जनवरी को उन्होंने अपने जीवन के ६० वर्ष पूरे किये हैं. उनके पिता औगेस्टीन जोसफ एक मंझे हुए मंचीय कलाकार एवं गायक थे, जो हर हाल में अपने बड़े बेटे येसुदास को पार्श्वगायक बनाना चाहते थे. उनके पिता जब वो अपनी रचनात्मक कैरिअर के शीर्ष पर थे तब कोच्ची स्थित उनके घर पर दिन रात दोस्तों और प्रशंसकों का जमावडा लगा रहता था. पर जब बुरे दिन आए तब बहुत कम थे जो मदद को आगे आए. येसुदास का बचपन गरीबी में बीता, पर उन्होंने उस छोटी सी उम्र से अपने लक्ष्य निर्धारित कर लिए थे, ठान लिया था की अपने पिता का सपना पूरा करना ही उनके जीवन का उद्देश्य है. उन्हें ताने सुनने पड़े जब एक इसाई होकर वो कर्नाटक संगीत की दीक्षा लेने लगे. ऐसा भी समय था कि वो अपने RLV संगीत अकादमी की फीस भी बमुश्किल भर पाते थे और एक ऐसा भी दौर था जब चेन्नई के संगीत निर्देशक उनकी आवाज़ में दम नही पाते थे और AIR त्रिवेन्द्रम ने उनकी आवाज़ को प्रसारण के लायक नही समझा. पर जिद्द के पक्के उस कलाकार ने सब कुछ धैर्य के साथ सहा.

"एक जात, एक धर्म, एक ईश्वर" आदि नारायण गुरु के इस कथन को अपने जीवन मन्त्र मानने वाले येसुदास को पहला मौका मिला १९६१ में बनी "कलापदुक्कल" से. शुरू में उनकी शास्त्रीय अंदाज़ की सरल गायकी को बहुत से नकारात्मक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा पर येसु दा ने फ़िर कभी पीछे मुड कर नही देखा. संगीत प्रेमियों ने उन्हें सर आँखों पे बिठाया. भाषा उनकी राह में कभी दीवार न बन सकी. वो प्रतिष्टित पदमश्री और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित हुए और उन्हें ७ बार पार्श्व गायन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, जिसमें से एक हिन्दी फ़िल्म "चितचोर" के गीत "गोरी तेरा गाँव" के लिए भी था.

मलयालम फ़िल्म संगीत तो उनके जिक्र के बिना अधूरा है ही पर गौरतलब बात ये है कि उन्होंने हिन्दी में भी जितना काम किया, कमाल का किया. सलिल दा ने उन्हें सबसे पहले फ़िल्म "आनंद महल" में काम दिया. ये फ़िल्म नही चली पर गीत मशहूर हुए जैसे "आ आ रे मितवा ...". फ़िर रविन्द्र जैन साहब के निर्देशन में उन्होंने चितचोर के गीत गाये. येसु दा बेशक कम गीत गाये पर जितने भी गाये वो सदाबहार हो गए. मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री में "दासेएटन" के नाम से जाने जाने वाले येसुदा की तम्मना थी कि वो मशहूर गुरुवायुर मन्दिर में बैठकर कृष्ण स्तुति गाये पर मन्दिर के नियमों के अनुसार उन्हें मन्दिर में प्रवेश नही मिल सका. और जब उन्होंने अपने दिल बात को एक मलयालम गीत "गुरुवायुर अम्बला नादयिल.." के माध्यम से श्रोताओं के सामने रखा, तो उस सदा को सुनकर हर मलयाली ह्रदय रो पड़ा था.

जैसा कि युनुस भाई ने भी अभी हाल ही में अपने चिट्टे में जिक्र किया था कि येसु दा के हिन्दी फिल्मी गीत आज भी खूब "डिमांड" में हैं, हम अपने संगीत प्रेमियों और श्रोताओं के लिए लाये हैं येसु दा के चुनिन्दा हिन्दी गीतों का एक गुलदस्ता. आनंद लें इस आवाज़ के जादूगर की खनकती आवाज़ में इन सदाबहार गीतों को सुनकर-



कल हम बात करेंगें येसु दा के एक खास "अनरिलीसड" गीत की और बात करेंगे एक और अदभुत संगीत निर्देशक की.



सोमवार, 24 नवंबर 2008

सलिल दा के बहाने येसुदास की बात


बीते १९ तारीख को हम सब के प्रिय सलिल दा की ८६ वीं जयंती थी, लगभग १३ साल पहले वो हम सब को छोड़ कर चले गए थे, पर देखा जाए इन्ही १३ सालों में सलिल दा की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ है, आज की पीढी को भी उनका संगीत समकालीन लगता है, यही सलिल दा की सबसे बड़ी खासियत है. उनका संगीत कभी बूढा ही नही हुआ.सलिल दा एक कामियाब संगीतकार होने के साथ साथ एक कवि और एक नाटककार भी थे और १९४० में उन्होंने इप्टा से ख़ुद को जोड़ा था. उनके कवि ह्रदय ने सुकांता भट्टाचार्य की कविताओं को स्वरबद्ध किया जिसे हेमंत कुमार ने अपनी आवाज़ से सजाया. लगभग ७५ हिन्दी फिल्मों और २६ मलयालम फिल्मों के अलावा उन्होंने बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजरती, मराठी, असामी और ओडिया फिल्मों में अच्छा खासा काम किया. सलिल दा की पिता डाक्टर ज्ञानेंद्र चौधरी एक डॉक्टर होने के साथ साथ संगीत के बहुत बड़े रसिया भी थे. अपने पिता के वेस्टर्न क्लासिकल संगीत के संकलन को सुन सुन कर सलिल बड़े हुए. असाम के चाय के बागानों में गूंजते लोक गीतों और और बांग्ला संगीत का भी उन पर बहुत प्रभाव रहा. वो ख़ुद भी गाते थे और बांसुरी भी खूब बजा लेते थे. अपने पिता के वो बहुत करीब थे. कहते हैं एक बार एक ब्रिटिश प्रबंधक ने उनके पिता को एक भद्दी गाली दी जिसके जवाब में उनके पिता ने उस प्रबंधक को एक ऐसा घूँसा दिया कि उसके ३ दांत टूट गए. दरअसल उनके पिता ब्रिटिश साम्राज्य के सख्त विरोधी थे और उन्होंने असाम के चाय बागानों में काम कर रहे गरीब और शोषित मजदूरों और कुलियों के साथ मिल कर कुछ नाटकों का भी मंचन किया जो उनका अपना तरीका था, अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का. यही आक्रोश सलिल दा में भी उपजा, उन्होंने भी बहुत से ballad किए जिसमें उन्होंने संगीत और संवाद के माध्यम से अपने नज़रिए को बहुत सशक्त रूप से सामने रखा.

बांग्ला फ़िल्म "रिक्शावाला" का जब हिन्दी रूपांतरण बना तो विमल दा ने उन्हें मुंबई बुला लिया और बना "दो बीघा ज़मीन" का संगीत. मूल फ़िल्म भी सलिल दा ने ख़ुद लिखी थी और संगीत भी उन्हीं का था. दोनों ही फिल्में बहुत कामियाब रहीं. और यहीं से शुरू हुआ था सलिल दा का सगीत सफर, हिन्दी फ़िल्म जगत में. "जागतेरहो", "काबुलीवाला", "छाया", "आनंद", "छोटी सी बात" जैसी जाने कितनी फिल्में हैं जिनका संगीत सलिल दा के "जीनियस" रचनाकर्म का जीता जागता उदहारण बन कर आज भी संगीत प्रेमियों को हैरान करता है.

१९६५ में एक मलयालम फ़िल्म आई थी जो कि साहित्यिक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तकजी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यास "चेमीन" पर आधारित थी. फ़िल्म का शीर्षक भी यही थी. चेमीन एक किस्म की मछली होती है और ये कहानी भी समुद्र किनारे बसने वाले मछवारे किरदारों के इर्द गिर्द बुनी एक प्रेम त्रिकोण थी. ये उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ था कि सभी भारतीय भाषाओं के अलावा इसका अंग्रेजी, रुसी, जर्मन, इटालियन और फ्रेंच भाषा में भी रूपांतरण हुआ. जाहिर सी बात है कि जब निर्देशक रामू करिआत को इस कहानी पर फ़िल्म बनाने का काम सौंपा गया. तो उन्हें समझ आ गया था कि ये फ़िल्म मलयालम सिनेमा के लिए एक बड़ी शुरुआत होने वाली है. वो सब कुछ इस फ़िल्म के लिए बहतरीन चाहते थे. यह फ़िल्म मलयालम की पहली रंगीन और सिनेमास्कोप फ़िल्म भी थी तो रामू ने मलयालम इंडस्ट्री के बहतरीन कलाकारों को चुनने के साथ साथ बॉलीवुड के गुणी लोगों को भी इस महान प्रोजेक्ट में जोड़ा, ऋषिकेश मुख़र्जी ने संपादन का काम संभाला. तो संगीत का जिम्मा सौंपा गया हमारे सलिल दा को. सलिल दा जानते थे कि उन पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, पर ये एक ऐसा काम था जिसमें सलिल दा कोई कमी नही छोड़ना चाहते थे. वो मुंबई से अचानक गायब हो गए कोई चार पाँच महीनों के लिए. किसी को नही पता और सलिल दा जा कर बस गए केरल के एक मछवारों की बस्ती में. वो उनके साथ रहे उनके संगीत को और बोलियों को ध्यान से सीखा समझा और इस तरह बने फ़िल्म "चेमीन" के यादगार गीत. इस फ़िल्म के संगीत ने मलयालम संगीत का पैटर्न ही बदल डाला या यूँ कहें कि रास्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित यह फ़िल्म मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए मील का पत्थर साबित हुई. यहीं सलिल दा को मिला एक बेहद प्रतिभाशाली गायक -येसुदास. पहले फ़िल्म के सभी गीत येसु दा की आवाज़ में रिकॉर्ड हुए, पर सलिल दा को एक गीत "मानसा मयिले वरु" में कुछ कमी सी महसूस हो रही थी, उन्हें लगा कि यदि इस गीत को मन्ना डे गाते तो शायद और बेहतर हो पाता. बहरहाल मन्ना डे ने इस गीत को गाया और इतना खूब गाया कि मन्ना डे ने ख़ुद अपने एक इंटरव्यू में यह माना कि शायद ही उनका कोई प्रोग्राम हुआ हो जिसमें उन्हें ये गीत गाने की फरमाईश नही मिली हो. सुनते है पहले मन्ना दा की आवाज़ में वही गीत.



इस फ़िल्म में ही एक और गीत था "पुथन वलाकरे". इस एक ही गीत में सलिल दा ने बहुत से शेड्स दिए. बीच में एक पंक्ति आती है "चाकरा...चाकरा.." (जब मछुवारों को जाल भर मछलियाँ मिलती है ये उस समय का आह्लाद है) में जो धुन सलिल दा बनाई वो उस धुन को अपने जेहन से निकाल ही नही पा रहे थे. यही कारण था कि १९६५ में ही आई फ़िल्म "चंदा और सूरज" में उन्होंने उसी धुन पर "बाग़ में कली खिली" गीत बनाया. सुनते हैं दोनों गीत, पहले मलयालम गीत का आनंद ले येसुदास और साथियों की आवाज़ में, लिखा है वायलार रवि ने, जिन्होंने अपने सरल गीतों से साहित्य को जन जन तक पहुँचने का अनूठा काम किया. उनका जिक्र फ़िर कभी फिलहाल आनंद लें इस गीत का.



और अब सुनिए फ़िल्म चंदा और सूरज का वो मशहूर गीत आशा जी की आवाज़ में -



यहीं से शुरुआत हुई सलिल दा और येसुदास के संगीत संबंधों की, येसुदास को हिन्दी सिनेमा में लाने वाले भी अपने सलिल दा ही थे. कल हम बात करेंगे येसु दा पर विस्तार से. फिलहाल हम आपको छोड़ते हैं तनूजा पर फिल्माए गए इस गीत के विडियो के साथ जो कि बहुत खूब फिल्माया गया है, देखिये और आनंद लीजिये -




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