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Saturday, March 25, 2017

चित्रकथा - 11: 1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण


अंक - 11

1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण

अपने देस में हम हैं परदेसी कोई ना पहचाने...



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 

हिन्दी फ़िल्मों में तीसरे लिंग का चित्रण दशकों से होता आया है। अफ़सोस की बात है कि ऐसे चरित्रों को सस्ती कॉमेडी के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं या फिर घृणा की नज़रों से देखा जाता है। बार-बार वही घिसा-पिटा रूढ़ीबद्ध रूप दिखाया गया है। फ़िल्मी गीतों में भी उनका मज़ाक उड़ाया गया है। कई बार तो सामान्य चरित्र किन्नर/हिजड़े जैसा मेक-अप लेकर दर्शकों को हँसाने की कोशिशें करते रहे हैं। समय के साथ-साथ इस तरह का बेहुदा हास्य कम हुआ है और तीसरे लिंग का मज़ाक उड़ाया जाना फ़िल्मों में कम हुआ है। पिछले कुछ दशकों में कुछ संवेदनशील फ़िल्मकारों ने तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण अपनी फ़िल्मों में किया है, जिनकी वजह से आज हमारे समाज में तीसरे लिंग की स्वीकृति को काफ़ी हद तक बढ़ावा मिला है। आइए आज ’चित्रकथा’ में चर्चा करें 1997 में प्रदर्शित तीन फ़िल्मों की जिनमें हमें मिलता है तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण।




स दुनिया में यह रवायत है कि जो संख्यलघु में आता है, उसे दुनिया अलग-थलग कर देती है। तीसरे
लिंग के व्यक्तियों के साथ भी यही हुआ। सामाजिक स्वीकृति न मिलने की वजह से ये लोग अपनी अलग की समुदाय बना ली। हमारी फ़िल्मों की कहानियों में अक्सर तीसरे लिंग को पैसा वसूली करते हुए, शादी-व्याह और बच्चे के जनम पर नाचते-गाते हुए या फिर किसी हास्यास्पद तरीके से दिखाया जाता है। लेकिन कुछ संवेदनशील फ़िल्मकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इस विषय को गंभीरता और संवेदनशीलता से अपनी फ़िल्मों में साकार किया। आज बातें 1997 की तीन ऐसी ही फ़िल्मों की। सबसे पहले बातें फ़िल्म ’तमन्ना’ और निर्देशक महेश भट्ट की। इस फ़िल्म में हिजड़ा-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का चित्रण किया गया है। यह फ़िल्म सहानुभूति और सकारात्मक नज़रिए से देखती है तीसरे लिंग को, और इस फ़िल्म ने ऐसी सीमाएँ पार की जो इससे पहले भारतीय सिनेमा ने नहीं की थी। किसी भी फ़िल्मकार ने इससे पहले इस तरह के विषय पर फ़िल्म बनाने की नहीं सोची थी। ’तमन्ना’ एक सत्य घटना और सत्य कहानी पर आधारित फ़िल्म है। कहानी परेश रावल अभिनीत हिजड़ा चरित्र पर केन्द्रित है और इसमें इस समुदाय द्वारा झेले जाने वाले तमाम समस्याओं पर रोशनी डाली गई है। 1975 के पार्श्व की यह कहानी तमन्ना नामक एक लड़की की कहानी है जिसे टिकू नामक हिजड़ा पाल पोस कर बड़ा करता है। टिकू औरतों जैसी पोशाक नहीं पहनता और ना ही हिजड़ा समुदाय में रहता है, बल्कि वो पुरुषों से भरे समाज में ही रहता है। इस तरह से महेश भट्ट ने यह साबित करने की कोशिश की कि तीसरे लिंग के लोग भी ’साधारण’ लोगों के बीच रह सकते हैं। टिकू अपने सबसे अच्छे दोस्त सलीम के साथ रहता है जिसे वो भाई कह कर बुलाता है। टिकू और सलीम के बीच किसी तरह का यौन संबंध ना दिखा कर भट्ट साहब ने यह सिद्ध किया कि आम तौर पर हिजड़ों द्वारा किसी पुरुष को अपने पास रखने के पीछे यौन संबंध होने का कारण समझने का कोई वजूद नहीं है। टिकू एक भावुक इंसान है और कई बार उसका नारीत्व उभर कर सामने आता है। उदाहरण के तौर पर टिकू तमन्ना को एक पिता की तरह नहीं बल्कि माँ की तरह पालता है। एक दृश्य में टिकू नन्ही तमन्ना के लिए लड़कियों की तरह नृत्य करता दिखाई देता है। वैसे तमन्ना टिकू को अब्बु कह कर ही बुलाती है। टिकू एक मेक-अप आर्टिस्ट है और वो अपने समुदाय के दूसरे लोगों की तरह शादी-ब्याह या बच्चे के जनम पर पैसे माँगने नहीं जाता और ना ही वेश्यावृत्ति करता है। बस फ़िल्म के अन्त में टिकू को आर्थिक मजबूरी के कारण हिजड़े के पारम्परिक रूप में सज कर नृत्य करना पड़ता है।

फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य है जब तमन्ना को पता चलता है कि टिकू एक हिजड़ा है। हिजड़ों के प्रति जो आम सामाजिक मान्यताएँ हैं, वो सब तमन्ना के मन में भी घर की हुई है। उसे यह पता है कि अगर हिजड़ा किसी को आशिर्वाद दे सकता है तो वो अभिषाप भी दे सकता है। यह समाज मानता है कि हिजड़ों के अभिषाप से व्यक्ति बांझ या नामर्द बन सकता है। ऐसी मानसिकता की वजह से जब तमन्ना को टिकू के बारे में पता चला तो उसके मन में टिकू के लिए घृणा उत्पन्न हुई और वो भूल गई कि किस तरह से लाड़-प्यार से टिकू ने उसे पाल-पोस कर बड़ा किया है। हिजड़े की जो छवि तमन्ना के दिल में बसी हुई है, उससे वो बाहर नहीं निकल सकी। महेश भट्ट ने इस फ़िल्म में हिजड़ों के प्रचलित रूप को दर्शाने के लिए हिजड़ों के एक दल को रंगीन साड़ियों और ज़ेवरों में तालियाँ बजाते, नृत्य करते दिखाया है, और साथ में यह भी दिखाया है कि टिकू इन जैसा नहीं है। फ़िल्म में यह भी दिखाया गया है कि बाकी हिजड़े किस तरह से टिकू का मज़ाक उड़ाते हैं यह कहते हुए कि आम समाज में रहने से वो सामान्य इंसान नहीं बन जाएगा और ना ही वो अपने लैंगिक भिन्नता वाले वजूद को भूला या मिटा पाएगा। महेश भट्ट ने हिजड़ों के प्रति रूढ़ीवादी नज़रिए को तोड़ने का साहस किया। भट्ट साहब ने समाज को दिखाया कि एक हिजड़ा एक अच्छा अभिभावक और एक अच्छा मित्र भी हो सकता है, और वो एक बच्चे को पाल पोस कर बड़ा कर सकता है। भले वो ख़ुद गर्भ धारण नहीं कर सकते पर प्यार लुटाने की क्षमता रखते हैं।

1997 में ही अमोल पालेकर लेकर आए ’दाएरा’ जो एक सुन्दर कहानी पर बनी फ़िल्म थी जिसमें प्रेम,
वासना और लिंग को बड़े सुन्दर तरीके से उभारा गया। पालेकर साहब के साहसिक और समझ की दाद देनी पड़ेगी कि तीसरे लिंग का इतना सुन्दर चित्रण इस फ़िल्म में उन्होंने किया। स्वर्गीय निर्मल पाण्डेय ने इस चरित्र को इतनी सरलता से उभारा कि फ़िल्म के अन्त तक आपके मन में उस चरित्र के लिए भावनाएँ जाग उठेंगी। ’दाएरा’ हमें एक भावुक यात्रा पर ले जाती है क्योंकि इस फ़िल्म के तमाम चरित्र भी एक जटिल यात्रा के सहयात्री होते हैं जो पारम्परिक लैंगिकता, सामाजिक रवैये और प्रचलित फ़िल्मी परम्परा को धराशायी कर देते हैं। इस फ़िल्म के लिए अमोल पालेकर को कई पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म की कहानी एक अभिनेता (निर्मल पाण्डे) जो एक तीसरे लिंग का व्यक्ति है। एक रात वो एक लड़की (सोनाली कुलकर्णी) को बचाता है जिसका शादी से पहले अपहरण और बलात्कार हो जाता है। आगे की कहानी इन दोनों के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती है। मानव लैंगिकता पर इस फ़िल्म की पहुँच सशक्त है और नारीशक्ति को सकारात्मक दृष्टि से दिखाया गया है। और तो और यह फ़िल्म उन अल्पसंख्यक लोगों के अधिकारों का भी मंथन करती है जो समाज के मुख्यधारा का अंग नहीं हैं, जैसे कि समलैंगिक स्त्री-पुरुष। यह फ़िल्म ऐसे लोगों के मन की गहराई तक जाता है जिन्हें इस समाज से सिर्फ़ तिरस्कार ही मिलते हैं बिना कोई गुनाह किए।

1997 में तो तीसरे लिंग पर आधारित सकारात्मक फ़िल्मों की कतार ही लग गई थी। ’तमन्ना’ और
’दाएरा’ के बाद इसी वर्ष प्रदर्शित हुई ’दर्मियाँ’। कल्पना लाजमी एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने समय समय पर ऐसे ऐसे मुद्दों पर फ़िल्में बनाई हैं जिन मुद्दों पर दूसरे फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने से पहले सौ बार सोचते होंगे। ’दर्मियाँ’ में उन्होंने एक पैदाइशी हिजड़ा लड़के की कहानी को केन्द्र में रख कर एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो सीधे दिल को छू जाती है। ’दर्मियाँ’ कहानी है सिंगिंग् स्टार ज़ीनत बेगम (किरोन खेर) की। यह 40 के दशक का पार्श्व है। इन्डस्ट्री की सबसे महँगी स्टार होने के अलावा वो एक नाजायज़ रिश्ते से उत्पन्न एक बच्चे की माँ भी है। इम्मी नाम का वह बच्चा जन्म से हिजड़ा है। शर्म से कहिए या स्टार होने की वजह से कहिए, ज़ीनत समाज के सामने यह स्वीकार नहीं करती कि इम्मी उसका बेटा है, वो उसे अपना भाई कह कर दुनिया के सामने पेश करती है। नन्हे इम्मी को इस बात का पता है कि ज़ीनत उसकी बड़ी बहन नहीं बल्कि माँ है पर वो किसी से कुछ नहीं कहता। वो अपनी नानी को ही माँ कहता है। ज़ीनत और इम्मी एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। तभी तो जब उस इलाके की हिजड़ा समुदाय की नेत्री चम्पा (सायाजी शिन्डे) इम्मी को उसे सौंप देने के लिए ज़ीनत और उसकी माँ पर ज़ोर डालती है तो ज़ीनत उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देती है। इम्मी भी उसके साथ नहीं जाना चाहता। जब चम्पा कहती है कि एक हिजड़ा केवल अपने समुदाय में ही इज़्ज़त से जी सकता है और ज़ीनत के साथ रहने पर इम्मी कहीं का नहीं रहेगा, तब ज़ीनत यह स्वीकारने से भी मना कर देती है कि उसका बेटा हिजड़ा है। नन्हे इम्मी के मन में अपने वजूद को लेकर कश्मकश चलती रहती है। दिन गुज़रते जाते हैं, इम्मी एक युवक (आरिफ़ ज़कारिया) में परिवर्तित होता है और वो ज़ीनत के साथ शूटिंग् पे जाता है, उसके साथ-साथ रहता है। ज़ीनत बेगम शोहरत और कामयाबी की बुलन्दी पर पहुँचती है, उसे एक युवा अभिनेता इन्दर कुमार भल्ला (शहबाज़ ख़ान) से प्यार हो जाता है, पर समय बदलते देर नहीं लगती। ज़ीनत का करियर ढलान पर आ जाता है, और इन्दर कुमार भी एक नई अदाकारा चित्रा (तब्बु) से प्यार करने लगता है। ज़ीनत अपने आप को शराब और जुए में डुबो कर सब कुछ हार जाती है। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ज़ीनत के बरबाद हो जाने पर उधर इम्मी के साथ भी लोग बदतमीज़ी से पेश आते, उसे उसके वजूद को लेकर भला-बुरा कहते। अपने और अपनी माँ का पेट पालने के लिए इम्मी को आख़िर चम्पा के पास जाना पड़ता है। हिजड़े का पोशाक पहन कर इम्मी भी नाचता है, और जब एक रात वो एक वेश्या बन कर किसी अमीर आदमी के घर जाता है, तब वहाँ मौजूद उस आदमी के दोस्त लोग उसका बलात्कर कर उसे ज़ख़्मी बना देते हैं। इम्मी चम्पा के वहाँ से भाग जाता है। वो समझ जाता है कि वो ना आम समाज में जी सकता है और ना ही हिजड़ा समाज में। 

घर की तरफ़ लौटते हुए उसे वीराने में एक नवजात शिशु मिलता है, जिसे वो घर ले आता है और ज़ीनत
को दिखाता है। मानसिक संतुलन खोने की वजह से ज़ीनत उस बच्चे को नन्हा इम्मी समझती है और उसके लिंग को देख कर चिल्ला-चिल्ला कर कहती है कि उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है, उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है। खुशी से वो नाचने लगती है। बरसों से एक हिजड़ा को जन्म देने का जो दर्द ज़ीनत के मन में पलता रहा है, वह बाहर आ जाता है। इम्मी को भी उस बच्चे में अपने जीने का मक़सद नज़र आता है। उसका नाम वो मुराद रखता है। उसे पाल पोस कर बड़ा करना ही इम्मी के जीवन का मकसद बन जाता है। पर समाज को यह भी मनज़ूर कहाँ? जैसे ही चम्पा को इसका पता चलता है, वो बच्चे को चुरा कर ले जाती है और उसे हिजड़ा बनाने का अनुष्ठान शुरु कर देती है। लेकिन ऐन वक़्त पर इम्मी वहाँ पहुँच जाता है और बच्चे को बचा लेता है। साथ ही पहली बार एक हिजड़े की तरह चम्पा को बद-दुआ देता है कि "मैं एक पैदाइशी हिजड़े की ताक़त से तुझे बद दुआ देता हूँ चम्पा कि तू हर जनम हिजड़ा ही जन्मेगी"। यह सुन कर चम्पा टूट जाती है, विध्वस्त हो जाती है और चीख उठती है यह कहते हुए, "अपनी काली ज़ुबान से फिर हिजड़ा पैदा होने की बद-दुआ मत दे मुझे। एक बार हिजड़ा होके बड़ी मुश्किल से कटी है यह ज़िन्दगी, नफ़रत की कड़वी घूंट पी के, सबसे लड़ के, अपने आप जैसे तैसे ज़िन्दा रही हूँ मैं, फिर से हिजड़ा बनने की ताकत नहीं है मुझमें, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है।" उधर इम्मी को समझ आ जाती है कि उसके लिए उस बच्चे को पालना नामुमकिन है। और यह भी समझ जाता है कि वो अब ना तो आम समाज का है और ना ही हिजड़ा समाज का। वो उस बच्चे को लेकर अपने जैविक पिता के जायज़ संतान, यानी अपने भाई के पास जाता है, पर वो उस बच्चे को नहीं अपनाता और उसे अपमानित कर बाहर निकाल देता है। तब वो आख़िरी उम्मीद के साथ इन्दर कुमार और चित्रा के पास जाते हैं। नर्म दिल और ज़ीनत को इज़्ज़त करने वाली चित्रा से इम्मी कहता है, "देखिए चित्रा जी, इस बच्चे की तरफ़, इसे भी जीने का हक़ है ना? जब मुझे यह बच्चा मिला, तब मैंने इसमें अपने आप को देखा, पर अब आपको इसे मुझसे दूर ही रखना है। मैं एक पैदाइशी हिजड़ा हूँ पता है आपको? मुराद मेरे जैसा नहीं है चित्रा जी, वो मेरे जैसा नहीं है। मुझे तो हमेशा से बस यही सिखाया गया था कि एक हिजड़ा सबसे अलग होता है, वो कभी बाकियों की तरह ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकता।" आरिफ़ ज़कारिया के जानदार और अद्वितीय अभिनय ने इस सीन को ऐसा अनजाम दिया है कि कोई भी दर्शक अपनी आँसू नहीं रोक सकता। चित्रा इम्मी से कहती है कि वो और इन्दर मिल कर इम्मी और ज़ीनत की ज़िन्दगी को बसा देंगे। जवाब में इम्मी कहता है, "मेरी ज़िन्दगी अब कोई मायने नहीं रखती चित्रा जी, मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मुराद को ज़िन्दगी में वो तमाम ख़ुशियाँ हासिल हो जो मुझे कभी ना मिल पायी। पता है एक हिजड़े की ज़िन्दगी होती ही मनहूस है चित्रा जी। आपा को मेरे पैदा होते ही हिजड़ों को दे देना चाहिए था, पर अब ना तो मेरी जगह इस दुनिया में है, न ही हिजड़ों की दुनिया में। दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं! दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं!" इन्दर कुमार के ना करने की बावजूद चित्रा बच्चे को अपना लेती है। इम्मी वहाँ से चला जाता है यह कहते हुए कि वो चित्रा की ज़िन्दगी में फिर कभी नहीं आएगा। घर वापस आकर वो ज़हर पी लेता है अपनी माँ को भी पिला देता है। अन्तिम दृश्य में इम्मी ज़ीनत से (जिसे वो ज़िन्दगी भर आपा कहता आया है) कहता है, "हम आप से बहुत प्यार करते हैं अम्मी जान"! ज़ीनत के मुंह से निकलता है "मेरा बेटा!" चारों तरफ़ ख़ामोशी। दोनों चले गए हमेशा के लिए।

’दर्मियाँ’ एक ऐसी फ़िल्म है जिसे देख कर दिल उदास हो जाता है, तीसरे लिंग के लोगों के लिए मन सहानुभूति से भर उठता है। कल्पना लाजमी ने हिजरा समाज और फ़िल्म के मुख्य पात्र इम्मी का जो चित्र प्रस्तुत किया है, उससे हिजड़ों के प्रति जो आमतौर पर दुर्व्यवहार होता आया है, निस्सन्देह लोगों के दिलों में उनके लिए आदर ना सही पर सहानुभूति ज़रूर उत्पन्न होगी। ’दर्मियाँ’ में जावेद अख़्तर ने बेहद दिल को छू लेने वाला गीत लिखा है जो फ़िल्म का सार भी है और तीसरे लिंग के लोगों के दिल की पुकार भी। भूपेन हज़ारिका के संगीत और आवाज़ में यह गीत दिल को चीर कर रख देता है। गीत के बोल पेश कर रहे हैं...

भाग-1:

(दृश्य: दोस्तों द्वारा चिढ़ाने और चम्पा के डराने के बाद बालक इम्मी अपनी आपा (हक़ीक़त में माँ) के गोदी में सर छुपा कर रो रहा है। और माँ लाचार है, उसके पास कोई जवाब नहीं, किसी से कुछ नहीं कह सकती। अपने बेटे को बेटा नहीं कह सकती।)

कैसा ग़म है क्या मजबूरी है, पास है जो उनसे भी दूरी है
दिल यूं धड़के जैसे कोई गूंगा बोलना चाहे, लेकिन सब हैं अनजाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-2:

(दृश्य: मानसिक रूप से विध्वस्त ज़ीनत अपने बहनोई से यह चुनौती ले लेती है कि उसका बेटा हिजड़ा नहीं है, और अपने बात को साबित करने के लिए वो एक वेश्या लड़की को अपने बेटे के कमरे में भेज देती है। वेश्या को जैसे ही पता चलता है कि इम्मी हिजड़ा है, वो उसका अपमान कर चली जाती है। युवा इम्मी अपनी माँ के पास आकर रोने लगता है।)

कोई बता दे हम क्यों ज़िन्दा हैं, हम क्यों ख़ुद से भी शर्मिन्दा हैं
अपनी ही आँखों से गिरे हैं बनके हम एक आँसू, माने कोई या नहीं माने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-3:

(दृश्य: बलात्कार से ज़ख़्मी होकर हिजड़ा समाज को हमेशा के लिए छोड़ आते समय जब मौत के अलावा इम्मी के लिए कुछ और नहीं बचा, तभी उसे एक अनाथ शिशु मिला, जिसे गोद में लेकर उसमें उसे अपने जीने का बहाना दिखा।)

कोई तो जीने का बहाना हो, कोई वादा हो जो निभाना हो
कोई सफ़र कोई तो रस्ता कोई तो मंज़िल हो, सुन ले ऐ दिल दीवाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-4:

(दृश्य: अन्तिम दृश्य में ख़ुद ज़हर पी कर अपनी माँ को ज़हर पिला रहा है इम्मी।)

सोचा है अब दूर चले जाएँ, अपने सपनों की दुनिया पाएँ
उस दुनिया में प्यार के फूल और ख़ुशियों के मोती हैं जो न दिए इस दुनिया ने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

1997 के तीन फ़िल्मों की चर्चा हमने की। ये फ़िल्में हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्यों हम इतने उदासीन हैं तीसरे लिंग के प्रति? क्यों हम उनका सामाजिक तिरस्कार करते हैं? ईश्वर के लिए सभी जीव-जन्तु समान हैं, जब हम जानवरों से प्यार कर सकते हैं, तो ये तो इंसान हैं हमारी आपकी तरह। क्या हम इन्हें थोड़ा सा प्यार, थोड़ी सी स्वीकृति नहीं दे सकते? क्या यह वाक़ई इतना कठिन है? मु तो नहीं लगता, और आपको?


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत के इतिहास से आपको अवगत करवाया था। हमारी एक पाठिका काव्या सरिता जी ने इस गीत के हमारे दिए बोलों में एक ग़लती ढूंढ़ निकाला और हमें सूचित किया। हमने इस ग़ौर किया और अपने आलेख में सुधार कर ली। काव्या जी को हमारा धन्यवाद। आप सभी इतने मनोयोग से हमारा आलेख पढ़ते हैं, यह देख कर हमें बेहद ख़ुशी हुई। हमारे एक और नियमित पाठक श्री पंकज मुकेश ने टिप्पणी की है - "प्रस्तुत लेख द्वारा आगामी शहीद दिवस 23 मार्च 2017 पर देश के तीन वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि है। अमर शहीद!!!" बिल्कुल सही कहा आपने पंकज जी। और इस अंक की अब तक की कुल रीडरशिप 165 है। आगे भी आप सब बने रहिए ’चित्रकथा’ के साथ। धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, August 1, 2015

'मेरी आशिक़ी अब तुम ही हो...' - क्यों फ़िल्म से हटने वाला था यह ब्लॉकबस्टर गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 64

 

'मेरी आशिक़ी अब तुम ही हो...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 64-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’आशिक़ी 2’ के ब्लॉकबस्टर गीत "तुम ही हो, अब तुम ही हो" के बारे में जिसे अरिजीत सिंह ने गाया था।


2011 वर्ष के सितंबर में मीडिआ में यह ख़बर आई कि महेश भट्ट और भूषण कुमार 1990 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’आशिक़ी’ का रीमेक बनाने में इच्छुक हैं। भूषण कुमार ने महेश भट्ट को ’आशिक़ी’ का सीकुईल बनाने का सुझाव दिया, पर भट्ट साहब तभी राज़ी हुए जब शगुफ़्ता रफ़ीक़ की लिखी स्क्रिप्ट को पढ़ कर उन्हें लगा कि कहानी में ’आशिक़ी’ से टक्कर लेने वाली दम है। ’आशिक़ी’ फ़िल्म की कामयाबी को ध्यान में रखते हुए इस फ़िल्म का रीमेक या सीकुईल बनाने का विचार बहुतों को आत्मघाती लगा। उस पर फ़िल्म के गीत-संगीत के पक्ष को भी बेहद मज़बूत बनाने का सवाल था जो ’आशिक़ी’ के गीतों का मुक़ाबला कर सके। शुरू शुरू में ’आशिक़ी’ के गीतों को ही इस्तमाल करने का विचार आया ज़रूर था, पर इसे रद्द किया गया और ’आशिक़ी-2' में नए गीतों को रखने और उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी भट्ट साहब ने अपने सर ली। और इस तरह से ’आशिक़ी-2’ का काम शुरू हुआ। फ़िल्म में संगीत के लिए चुना गया मिथुन, जीत गांगुली और अंकित तिवारी को। गीत लिखे इरशाद कामिल, संजय नाथ, संजय मासूम और मिथुन ने। यूं तो फ़िल्म के सभी गीत पसन्द किए गए, पर मिथुन के लिखे और स्वरबद्ध किए तथा अरिजीत सिंह के गाए "तुम ही हो..." गीत ने सफलता के झंडे गाढ़ दिए और साल का सर्वश्रेष्ठ गीत बना।


Mithoon
"तुम ही हो..." गीत का ऑडियो 16 मार्च 2013 को जारी किया गय था। अगर यह कहें कि इस गीत ने ही इस फ़िल्म की पब्लिसिटी कर दी तो ग़लत नहीं होगा। गीत को समालोचकों से ख़ूब तारीफ़ें मिली। ग्लैमशैम ने लिखा, "It is indeed an exhilarating experience listening to the songs of Aashiqui 2 and in this age of mundane and average/repetitive musical fares that are being churned out, the audio of Aashiqui 2 is surely a treat for all music buffs. "Tum Hi Ho" and "Sunn Raha Hai" (both versions) are our favourites, but "Chahun Main Ya Naa" and "Piya Aaye Na" end up as a close second. A chartbusting musical experience indeed." इसमें कोई संदेह नहीं कि इस गीत में मिथुन का छाप हर टुकड़े में सुनाई देता है। जितना मेलोडियस इसकी धुन है, उतने ही ख़ूबसूरत इसके बोल हैं। पियानो, स्ट्रिंग्स और बीट्स का बेहद सुरीला प्रयोग मिथुन ने किया और अपनी दिलकश आवाज़ से अरिजीत सिंह ने गाने में चार चाँद लगा दिए। यह कहते हुए ज़रा सा भी हिचक नहीं होगी कि मिथुन और अरिजीत ने "तुम ही हो..." के ज़रिए समीर, नदीम-श्रवण और कुमार सानू के "सांसों की ज़रूरत है जैसे..." को सीधी टक्कर दे दी है। इस गीत के सफलता की बात करें तो गीत के यू-ट्युब पर जारी होने के दस दिनों के अन्दर ही पचास लाख हिट्स दर्ज हुए। Big Star Entertainment Awards 2013 और Zee Cine Awards 2014 में इस गीत को Most Entertaining Song of the year का ख़िताब दिया गया। अरिजीत सिंह को इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिला तो मिथुन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का। 20th Screen Awards 2014 में अरिजीत को एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का पुरस्कार मिला। मिथुन को इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का नामांकन भी मिला था पर पुरस्कार गया प्रसून जोशी को ’भाग मिलखा भाग’ के "ज़िन्दा" गीत के लिए।


Arijit Singh
और अब "तुम ही हो..." गीत के बनने की कहानी से जुड़ा एक दिलचस्प क़िस्सा। दरसल शुरू-शुरू में इस गीत का कॉनसेप्ट इस तरह से सोचा गया था कि यह एक डबल वर्ज़न गीत होगा और फ़ीमेल वर्ज़न मेल वर्ज़न से ज़्यादा असरदार होगा फ़िल्म की कहानी को ध्यान में रखते हुए। गीत के दोनों संस्करण रेकॉर्ड हुए। पर जब सबसे दोनों वर्ज़न सुने तो मुश्किल में पड़ गए। मुश्किल इस बात की थी कि मेल वर्ज़न फ़ीमेल वर्ज़न से ज़्यादा अच्छा लगने लगा। कई बार सुनने के बाद सब ने यह स्वीकारा कि यह गीत दरसल महिला कंठ में नहीं बल्कि पुरुष कंठ में ही अधिक प्रभावशाली सुनाई दे रहा है। और अगर यह बात सच है तो फिर इस गीत का जो कॉनसेप्ट था कि फ़ीमेल वर्ज़न ज़्यादा असरदार होना चाहिए, वह ज़रूरत पूरी नहीं हो रही थी। इसलिए सवाल यह खड़ा हो गया कि क्या इस गीत को रद्द करके कोई नया गीत बनाया जाए जो महिला कंठ में ज़्यादा असरदार लगे? पर इस पर किसी की सहमती नहीं मिली, कारण यह था कि अरिजीत और मिथुन ने "तुम ही हो..." में जो कमाल कर चुके थे, उसके बाद इस गीत को रद्द करने का ख़याल ही ग़लत था। सबको लग रहा था कि गीत ज़बरदस्त हिट होगा। अत: सर्वसम्मति से इस गीत को फ़िल्म में रख लिया गया, फ़ीमेल वर्ज़न को रद्द करके एक डुएट वर्ज़न बनाया गया जिसे अरिजीत सिंह के साथ पलक मुछाल ने गाया। इस संसकरण के बोल मिथुन नहीं बल्कि इरशाद कामिल ने लिखे। यह संस्करण भी सराहा गया पर अरिजीत सिंह का एकल संस्करण ही सर चढ़ कर बोला। लीजिए, अब यही गीत आप भी सुनिए। 


फिल्म  - आशिक़ी 2 : "तुम ही हो अब तुम ही हो..." : अरिजीत सिंह : गीत और संगीत - मिथुन 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Tuesday, June 8, 2010

रब्बा लक़ बरसा.... अपनी फ़िल्म "कजरारे" के लिए इसी किस्मत की माँग कर रहे हैं हिमेश भाई

ताज़ा सुर ताल २१/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़े अंक के साथ हम हाज़िर हैं। विश्व दीपक जी, इस शुक्रवार को 'राजनीति' प्रदर्शित हो चुकी हैं, और फ़िल्म की ओपनिंग अच्छी रही है ऐसा सुनने में आया है, हालाँकि मैंने यह फ़िल्म अभी तक देखी नहीं है। 'काइट्स' को आशानुरूप सफलता ना मिलने के बाद अब देखना है कि 'राजनीति' को दर्शक किस तरह से ग्रहण करते हैं। ख़ैर, यह बताइए आज हम किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं।

विश्व दीपक - आज हम सुनेंगे आने वाली फ़िल्म 'कजरारे' के गानें।

सुजॊय - यानी कि हिमेश इज़ बैक!

विश्व दीपक - बिल्कुल! पिछले साल 'रेडियो - लव ऑन एयर' के बाद इस साल का उनका यह पहला क़दम है। 'रेडियो' के गानें भले ही पसंद किए गए हों, लेकिन फ़िल्म को कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली थी। देखते हैं कि क्या हिमेश फिर एक बार कमर कस कर मैदान में उतरे हैं!

सुजॊय - 'कजरारे' को पूजा भट्ट ने निर्देशित किया है, जिसके निर्माता हैं भूषण कुमार और जॉनी बक्शी। फ़िल्म के नायक हैं, जी हाँ, हिमेश रेशम्मिया, और उनके साथ हैं मोना लायज़ा, अमृता सिंह, नताशा सिन्हा, गौरव चनाना और गुल्शन ग्रोवर। संगीत हिमेश भाई का है और गानें लिखे हैं हिमेश के पसंदीदा गीतकार समीर ने। तो विश्व दीपक जी, शुरु करते हैं गीतों का सिलसिला। पहला गीत हिमेश रेशम्मिया और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में। इस गीत को आप एक टिपिकल हिमेश नंबर कह सकते हैं। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल हुआ है। हिमेश भाई के चाहनेवालों को ख़ूब रास आएगा यह गीत।

गीत: कजरा कजरा कजरारे


विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने की शुरुआत मुझे पसंद आई। जिस तरह से "सुनिधि चौहान" ने "कजरा कजरा कजरारे" गाया है, वह दिल के किसी कोने में एक नटखटपन जगा देता है और साथ हीं सुनिधि के साथ गाने को बाध्य भी करता है। मुझे आगे भी सुनिधि का यही रूप देखने की इच्छा थी, लेकिन हिमेश ने अंतरा में सुनिधि को बस "चियर लिडर" बना कर रख दिया है और गाने की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली है। हिमेश की आवाज़ इस तरह के गानों में फबती है, लेकिन शब्दों का सही उच्चारण न कर पाना और अनचाही जगहों पर हद से ज्यादा जोर देना गाने के लिए हानिकारक साबित होते हैं। हिमेश "उच्चारण" संभाल लें तो कुछ बात बने। खैर अब हम दूसरे गाने की ओर बढते हैं।

सुजॊय - अब दूसरा गीत भी उसी हिमेश अंदाज़ का गाना है। उनकी एकल आवाज़ में सुनिए "रब्बा लक बरसा"। इस गीत में महेश भट्ट साहब ने वायस ओवर किया है। गाना बुरा नहीं है, लेकिन फिर एक बार वही बात कहना चाहूँगा कि अगर आप हिमेश फ़ैन हैं तो आपको यह गीत ज़रूर पसंद आएगा।

विश्व दीपक - जी आप सही कह रहे हैं। एक हिमेश फ़ैन हीं किसी शब्द का बारंबार इस्तेमाल बरदाश्त कर सकता है। आप मेरा इशारा समझ गए होंगे। हिमेश/समीर ने "लक लक लक लक" इतनी बार गाने में डाला है... कि "शक लक बूम बूम" की याद आने लगती है और दिमाग से यह उतर जाता है कि इस "लक़" का कुछ अर्थ भी होता है। एक तो यह बात मुझे समझ नहीं आई कि जब पूरा गाना हिन्दी/उर्दू में है तो एक अंग्रेजी का शब्द डालने की क्या जरूरत थी। मिश्र के पिरामिडों के बीच घूमते हुए कोई "लक लक" बरसा कैसे गा सकता है। खैर इसका जवाब तो "समीर" हीं दे सकते हैं। हाँ इतना कहूँगा कि इस गाने में संगीत मनोरम है, इसलिए खामियों के बावजूद सुनने को दिल करता है। विश्वास न हो तो आप भी सुनिए।

गीत: रब्बा लक़ बरसा


सुजॊय - अब इस एल्बम का तीसरा गीत और मेरे हिसाब से शायद यह इस फ़िल्म का सब से अच्छा गीत है। हिमेश रेशम्मिया के साथ इस गीत में आवाज़ है हर्षदीप कौर की। एक ठहराव भरा गीत है "आफ़रीन", जिसमें पारम्परिक साज़ों का इस्तेमाल किया गया है। ख़ास कर ढोलक का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है गीत में। भले ही हर्षदीप की आवाज़ मौजूद हो गीत के आख़िर में, इसे एक हिमेश रेशम्मिया नंबर भी कहा जा सकता है।

विश्व दीपक - जी यह शांत-सा, सीधा-सादा गाना है और इसलिए दिल को छू जाता है। इस गाने के संगीत को सुनकर "तेरे नाम" के गानों की याद आ जाती है। हर्षदीप ने हिमेश का अच्छा साथ दिया है। हिमेश कहीं-कहीं अपने "नेजल" से अलग हटने की कोशिश करते नज़र आते हैं ,लेकिन "तोसे" में उनकी पोल खुल जाती है। अगर हिमेश ऐसी गलतियाँ न करें तो गीतकार भी खुश होगा कि उसके शब्दों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि यह गाना एल्बम के बाकी गानों से बढिया है। तो लीजिए पेश है यह गाना।

गीत: आफ़रीन


सुजॊय - फ़िल्म का चौथा गीत भी एक युगल गीत है, इस बार हिमेश का साथ दे रहीं हैं श्रेया घोषाल। गीत के बोल हैं "तुझे देख के अरमान जागे"। आपको याद होगा अभी हाल ही में फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' में एक गीत आया था "वाल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा"। तो भई हम तो यहाँ पर यही कहेंगे कि वाल्युम कम कर नहीं तो पूरा मोहल्ला जग जाएगा। जी हाँ, "तुझे देख के अरमान जागे" के शुरु में हिमेश साहब कुछ ऐसी ऊँची आवाज़ लगाते हैं कि जिस तरह से उनके "झलक दिखला जा" गीत को सुन कर गुजरात के किसी गाँव में भूतों का उपद्रव शुरु हो गया था, अब की बार तो शायद मुर्दे कब्र खोद कर बाहर ही निकल पड़ें! ख़ैर, मज़ाक को अलग रखते हुए यह बता दूँ कि आगे चलकर हिमेश ने इस गीत को नर्म अंदाज़ में गाया है और श्रेया के आवाज़ की मिठास के तो कहने ही क्या। वो जिस गीत को भी गाती हैं, उसमें मिश्री और शहद घोल देती हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्यों न लगे हाथों पांचवाँ गीत भी सुन लिया जाए| क्योंकि यह गीत भी हिमेश रेशम्मिया और श्रेया घोषाल की आवाजों में हीं है, और अब की बार बोल हैं "तेरीयाँ मेरीयाँ"। दोस्तों, जिस गीत में "ँ" का इस्तेमाल हो और अगर उस गाने में आवाज़ हिमेश रेशम्मिया की हो, तो फिर तो वही सोने पे सुहागा वाली बात होगी ना! नहीं समझे? अरे भई, मैं हिमेश रेशम्मिया के नैज़ल अंदाज़ की बात कर रहा हूँ। इस गीत में उन्हे भरपूर मौका मिला है अपनी उस मनपसंद शैली में गाने का, जिस शैली के लिए वो जाने भी जाते हैं और जिस शैली की वजह से वो एकाधिक बार विवादों से भी घिर चुके हैं। जहाँ तक इस गीत का सवाल है, संतूर की ध्वनियों का सुमधुर इस्तेमाल हुआ है। वैसे यह मैं नहीं बता सकता कि क्या असल में संतूर का प्रयोग हुआ है या उसकी ध्वनियों को सीन्थेसाइज़र के ज़रिये पैदा किया गया है। जो भी है, सुरीला गीत है, लेकिन श्रेया को हिस्सा कम मिला है इस गानें में।

गीत: तुझे देख के अरमान जागे


गीत: तेरीयां मेरीयां


सुजॊय - विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगता है कि हिमेश रेशम्मिया जब भी कोई फ़िल्म करते हैं, तो अपने आप को ही सब से ज़्यादा सामने रखते हैं। बाके सब कुछ और बाकी सब लोग जैसे पार्श्व में चले जाते हैं। यह अच्छी बात नहीं है। अब आप उनकी कोई भी फ़िल्म ले लीजिए। वो ख़ुद इतने ज़्यादा प्रोमिनेन्स में रहते हैं कि वो फ़िल्म कम और हिमेश रेशम्मिया का प्राइवेट ऐल्बम ज़्यादा लगने लगता है। दूसरी फ़िल्मों की तो बात ही छोड़िए, 'कर्ज़', जो कि एक पुनर्जन्म की कहानी पर बनी कामयाब फ़िल्म का रीमेक है, उसका भी यही हाल हुआ है। ख़ैर, शायद यही उनका ऐटिट्युड है। आइए अब इस फ़िल्म का अगला गीत सुनते हैं "वो लम्हा फिर से जीना है"। हिमेश और हर्षदीप कौर की आवाज़ें, फिर से वही हिमेश अंदाज़। एक वक़्त था जब हिमेश के इस तरह के गानें ख़ूब चला करते थे, देखना है कि क्या बदलते दौर के साथ साथ लोगों का टेस्ट भी बदला है या फिर इस गीत को लोग ग्रहण करते हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने के साथ हीं क्यों न हम फ़िल्म का अंतिम गाना भी सुन लें| हिमेश और सुनिधि की आवाज़ें, और एक बार फिर से हिमेश का नैज़ल अंदाज़। ढोलक के तालों पर आधारित इस लोक शैली वाले गीत को सुन कर आपको अच्छा लगेगा। जैसा कि अभी अभी आपने कहा कि आजकल हिमेश जिस फ़िल्म में काम करते हैं, बस वो ही छाए रहते हैं, तो इस फ़िल्म में भी वही बात है। हर गीत में उनकी आवाज़, हर गाना वही हिमेश छाप। अपना स्टाइल होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन अगर विविधता के लिए थोड़ा सा अलग हट के किया जाए तो उसमें बुराई क्या है? ख़ैर, मैं अपना वक्तव्य यही कहते हुए समाप्त करूँगा कि 'कजरारे' पूर्णत: हिमेश रेशम्मिया की फ़िल्म होगी।

गीत: वो लम्हा फिर से जीना है


गीत: सानु गुज़रा ज़माना याद आ गया


"कजरारे" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***

सुजॊय - हिमेश के चाहने वालों को पसंद आएँगे फ़िल्म के गानें, और जिन्हे हिमेश भाई का गीत-संगीत अभी तक पसंद नहीं आया है, उन्हें इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, मैं तो ये कहूँगा की उन्हें इस एल्बम से दूर ही रहना चाहिए|

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मुझे यह लगता है कि हमें इस एल्बम को सिरे से नहीं नकार देना चाहिए, क्योंकि संगीत बढ़िया है और कुछ गाने जैसे कि "रब्बा लक़ बरसा", "कजरारे" और "आफरीन" खूबसूरत बन पड़े हैं| हाँ इतना है कि अगर हिमेश ने अपने अलावा दूसरों को भी मौक़ा दिया होता तो शायद इस एल्बम का रंग ही कुछ और होता| लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हिमेश भाई और पूजा भट्ट को जो पसंद हो, हमें तो वही सुनना है| मैं बस यही उम्मीद करता हूँ कि आगे चलकर कभी हमें "नमस्ते लन्दन" जैसे गाने सुनने को मिलेंगे... तब तक के लिए "मिलेंगे मिलेंगे" :)

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६१- "शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम", इस गीत के साथ हिमेश रेशम्मिया का क्या ताल्लुख़ है?

TST ट्रिविया # ६२- "आपको कैसा लगेगा अगर मैं आपको नए ज़माने का एक गीत सुनाऊँ जिसमें ना कोई ख़त, ना इंतेज़ार, ना झिझक, ना कोई दर्द, बस फ़ैसला है, जिसमें हीरो हीरोइन को सीधे सीधे पूछ लेता है कि मुझसे शादी करोगी?" दोस्तॊम, ये अल्फ़ाज़ थे हिमेश रेशम्मिया के जो उन्होने विविध भारती पर जयमाला पेश करते हुए कहे थे। तो बताइए कि उनका इशारा किस गाने की तरफ़ था?

TST ट्रिविया # ६३- गीतकार समीर के साथ जोड़ी बनाने से पहले हिमेश रेशम्मिया की जोड़ी एक और गीतकार के साथ ख़ूब जमी थी जब उनके चुनरिया वाले गानें एक के बाद एक आ रहे थे और छा रहे थे। बताइए उस गीतकार का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. पेण्टाग्राम
२. सोना महापात्रा
३. "give me some sunshine, give me some rain, give me another chance, I wanna grow up once again".

आलोक, आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए, इसलिए आपको पुरे अंक मिलते हैं| सीमा जी, इस बार आप पीछे रह गईं| खैर कोई बात नहीं, अगली बार......

Tuesday, August 11, 2009

खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला.....गुलाम अली की मार्फ़त पूछ रहे हैं आनंद बख्शी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३७

दिशा जी की पसंद की दूसरी गज़ल लेकर आज हाज़िर हैं हम। आज के अंक में जो गज़ल हम आप सबको सुनवाने जा रहे हैं वह वास्तव में तो एक फिल्म से ली हुई है लेकिन हमारे आज के फ़नकार ने इस गज़ल को मंच से इतनी बार पेश किया है कि लोग अब इसे गैर-फ़िल्मी गज़ल मानने लगे हैं। इस गज़ल की गुत्थी इतनी उलझी हुई है कि एकबारगी तो हमें भरोसा हीं नहीं हुआ कि इसे माननीय अनु मलिक साहब ने संगीतबद्ध किया होगा। फिर हमने अंतर्जाल की खाक छान दी ताकि हमें वास्तविक संगीतकार की जानकारी मिल जाए। ज्यादातर जगहों पर अनु मलिक का हीं नाम था ,लेकिन कुछ लोग अब भी यह दावा करते हैं कि इसे गुलाम अली(हमारे आज के फ़नकार) ने खुद हीं संगीतबद्ध किया है। वैसे हमारी खोज को तब विराम मिला जब गुलाम अली साहब का एक साक्षात्कार हमारे हाथ लगा। उन्होंने उस साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि इस गज़ल में संगीत अनु मलिक का हीं है। स्क्रीन इंडिया के एक इंटरव्यू में उनसे जब यह पूछा गया कि अनु मलिक का कहना है कि महेश भट्ट की फ़िल्म "आवारगी" की एक गज़ल "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना बैठा" को उन्होंने हीं कम्पोज़ किया है। क्या आप भी यह मानते हैं? तो इस पर गुलाम अली साहब ने दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया कि "हाँ यह उनकी हीं ओरिजिनल कम्पोजिशन थी। मैने बस उनके लिए हीं नहीं बल्कि नदीम-श्रवण के लिए भी बेवफ़ा फ़िल्म की एक गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। ये उनकी अपनी धुने हैं। दिल मानता तो नहीं, लेकिन जब गुलाम अली साहब ने खुद हीं ऐसा कहा है तो सारी अटकलें यहीं समाप्त हो जाती हैं। तो आप सब अब तक यह समझ हीं गए होंगे कि हमारी आज की गज़ल कौन-सी है और इसे किसने अपनी आवाज़ से सजाया है। इस गज़ल के साथ एक और शख्स का नाम जुड़ा है। वैसे तो हिंदी फ़िल्मों में इनसे बड़ा गीतकार आज तक कोई नहीं हुआ लेकिन गज़लों के मामले में इनका हाथ कुछ तंग है। इस हाल में अगर आपको यह पता चले कि आज की गज़ल इन्हीं की लिखी हुई है तो एक सुखद आश्चर्य होता है। तो चलिए जानकारियों का सफ़र शुरू करते हैं गुलाम अली के साथ।

यह तो सबको पता है कि गुलाम अली साहब ने अपने शुरूआती दिनों में रेडियो लाहौर में गायकी की थी। उन्हीं पुराने दिनों को याद करते हुए बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम "एक मुलाकात" में गुलाम अली साहब कहते हैं: असल में वही दिन थे, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. अब से तकरीबन 50 साल पहले की बात थी, तब मैं 14 साल का था. मैं रेडियो में ऑडीशन देने गया था. वहाँ निदेशक आगा बशीर साहब थे और उनके बगल में अय्यूब रमानी साहब थे. ऑडीशन के दौरान जब लाल बत्ती जली तो मैं घबरा सा गया था. हालाँकि रियाज़ करते रहने के कारण गाने में मुझे झिझक नहीं थी. मैने आ..आ.. ही कहा था उन्होंने कहा कि बस, बस......मुझे बहुत दुख हुआ कि मैं तो इन्हें सुनाने आया था और इन्होंने सुना ही नहीं. बाद में अय्यूब साहब ने मुझसे पूछा कि तुम उदास क्यों हो. मैंने कहा कि आपने तो मुझे सुना ही नहीं. उन्होंने क़ाग़ज दिखाते हुए कहा कि घबराते क्यों हो, बशीर साहब ने 'गुड' नहीं 'एक्सीलेंट' लिखा है. पाँच महीने में ही मेरा नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान में भी मुझे लोग सुनते थे. इसके अलावा उनसे जब पूछा गया कि क्या बड़े गुलाम अली खां साहब ने भी यह कहा था कि तुम मेरा नाम रौशन करोगे तो उनका जवाब कुछ यूँ था: जब मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली साहब से मुझे सिखाने की गुजारिश की तो उन्होंने कहा कि मेरी शागिर्दी क्यों करते हो, मैं तो यहाँ रहता नहीं. फिर मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली के दोस्तों बग़ैरह से सिफ़ारिशें करवाईं और जोर देकर कहा कि आप ही इसे सिखाएं. उन्होंने मुझे कुछ सुनाने के लिए कहा. मैने उन्हीं की ठुमरी 'सैंया बोलो तनिक मुँह से रहियो न जाए....' वो हंसने लगे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्यार किया और कहा कि कल आपकी शागिर्दी होगी. सच्ची बात ये है कि ऐसे उस्ताद की शागिर्दी होना मुक़द्दर की बात है. गुलाम अली साहब के अनुसार उनके जीवन और गाने में कोई फ़र्क नहीं है। वे अपने जीवन को अपनी गायकी से अलग करके नहीं देख सकते। उन्हीं के शब्दों में: मेरा तो जीवन और गाना एक ही है. यानी गाना जीवन है और जीवन गाना. मेरे लिए ये आपस में जुड़े हैं. मैं ख़ाली भी होता हूँ तो दिमाग़ में हर समय संगीत ही चलता रहता है. बस मेरा ज़ोर क्लासिकल पर रहता है. जिसे शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं होगी वो आगे नहीं बढ़ सकता. मेरा तो ये कहना है कि जब भी गाया जाए कुछ हटकर गाया जाए. बस इसी तरह लफ़्जों को सोचते रहते हैं. गुलाम अली से जुड़ी और भी कई सारी मज़ेदार बातें हैं,लेकिन वे सब फिर कभी। अभी आनंद बख्शी साहब (जी हाँ यह गज़ल उन्हीं की लिखी हुई है...चौंक गए ना!) की ओर रूख करते हैं।

आनंद बख्शी साहब एक ऐसे शख्स हैं, जिनके गीतों को सुनकर न जाने कितनी पीढियाँ (हमारी पीढी और हमसे एक सोपान पहले की पीढी तो निस्संदेह)जवान हुई हैं। भले हीं इस दौरान हम में से कई लोगों ने उन्हें भुला दिया हो लेकिन उनके गीतों को भुलाना आसान नहीं। हम जैसे भूले-भटकों को राह दिखाने के लिए हीं "विनय प्रजापति" जी आनंद बख्शी साहब पर एक ब्लाग चला रहे हैं। मौका मिले तो एक बार आप भी चक्कर लगा के आ जाईयेगा। वैसे आनंद बख्शी के जीवन के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन चूँकि हमें कुछ अलग करने की आदत है, इसलिए हम उनके सुपुत्र "राकेश आनंद बख्शी" की कही कुछ बातें लेकर यहाँ हाज़िर हुए हैं। ये बातें उन्होंने "सुपर मैग्जीन" के साथ इंटरव्यू में कहीं थी। मेरे पिताजी ने १९५७ से २००२ के बीच ८०० से भी ज्यादा फिल्मों के लिए ३५०० से भी ज्यादा गाने लिखे हैं। इतना होने के बावजूद जब भी वो कोई नया गाना लिखने बैठते तो उन्हें हर बार यह लगता था कि कहीं इस बार वे असफ़ल न हो जाएँ। इस डर के बावजूद वे सफ़ल हुए और इसका एकमात्र कारण यह था कि हर बार वे ग्राउंड ज़ीरो से शुरूआत करते थे। उन्हें अपनी सफ़लता पर तनिक भी दंभ न था। उन्होंने मुझे सिखाया कि "खुद पर संदेह होना या फिर आत्म-विश्वास की कमी आम चीजें हैं। इनसे कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए, बल्कि ये सारी चीजें हीं हमें ताकत देती हैं।" उनका मानना था कि "हिट फ़िल्म बनाना या हिट स्क्रिप्ट लिखना बड़ी बात नहीं है। हिट और फ्लाप तो आते जाते रहते हैं, हमें इन पर ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए। जो चीज मायने रखती है वह यह है कि इनके बाद या इनके दौरान आपका औरों के साथ कैसा बर्ताव रहा है, आप खुद किस तरह के इंसान बन गए हैं या बन रहे हैं और आपने कैसे दोस्त बनाए हैं।" मेरे पिताजी ने अपने डर पर काबू पाने के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं जिनका इस्तेमाल सुभाष घई साहब ने अपनी एक फ़िल्म में भी किया है। उस कविता या कहिए उस गीत का मुखड़ा इस तरह था:

मैं कोई बर्फ़ नहीं जो पिघल जाऊँगा,
मैं कोई हर्फ़ नहीं जो बदल जाऊँगा,
मैं तो जादू हूँ, मैं जादू हूँ, चल जाऊँगा।


कहते हैं कि आनंद बख्शी ने जब "आपकी कसम" के लिए "ज़िंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते" लिखा था तो जावेद अख्तर साहब उनके घर तक चले गए थे और उनसे उनकी कलम की माँग कर दी थी। आनंद बख्शी साहब ने कहा कि आपको अपनी कलम देकर यूँ तो मैं बहुत खुश होऊँगा लेकिन क्या करूँ मुझे यह कलम किशोर कुमार ने गिफ़्ट में दी है। आनंद बख्शी साहब नए फ़नकारों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। सुखविंदर सिंह उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि "चूँकि मैं खुद एक संगीतकार हूँ इसलिए जब मैं दूसरों के लिए गाता हूँ तो अपना इनपुट दिए बिना रहा नहीं जाता और इसलिए गाना दिल से नहीं कर पाता। बख्शी साहब ने एक बार मुझे कहा था कि जब तुम स्टुडियो में एक गायक की हैसियत से आओ तो अपने अंदर बैठे संगीतकार को घर छोड़कर हीं आना और तब से मैं उनकी इस बात को फौलो कर रहा हूँ। और अब मुझे कोई दिक्कत नहीं आती।" तो ऐसे गुणी थे हमारे आनंद बख्शी साहब। उन्हें याद करते हुए चलिए हम अब सुनते हैं आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला

चमकते चाँद को…

यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुद्दत के बाद उस ने जो की ___ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..


आपके विकल्प हैं -
a) करम, b) लुत्फ़, c) मेहर, d) ख़ुशी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ज़ब्त" और शेर कुछ यूं था -

ज़ब्त लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...

फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले पकड़ा कुलदीप जी ने। उन्होंने इस शब्द पर दो शेर भी पेश किए जिनके शायर के बारे में उन्हें जानकारी नही थी। ये रहे दो शेर:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सरे बज्म ये क्या हुआ
मेरी आंख कैसे छलक गयी मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जनून को ज़ब्त सीखा लूं तो फिर चले जाना
में अपनेआप को संभाल लूं तो फिर चले जाना

इन दो शेरों के साथ-साथ उन्होंने परवीन शाकिर, हफ़िज जौनपुरी, मोहसिन नकवी,शकील बदायूंनी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शेरो भोपाली, शहजाद अहमद और इब्राहीम जौक़ के भी शेर पेश किए। अब चूँकि सारे शेर यहाँ हाज़िर नहीं किए जा सकते, इसलिए ज़ौक साहब के इस शेर के साथ कुलदीप जी की टिप्पणियों को इज़्ज़त बख्शते हैं। वैसे भी कुलदीप जी ने इस बार वही शेर पेश किए जिसमें "ज़ब्त" शब्द की आमद थी। बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार की शोभा बढाने वाले ज़ौक साहब का शेर कुछ यूँ है:

ना करता ज़ब्त मैं गिरिया तो ऐ "जौक" इक घडी भर में
कटोरे की तरह घड़ियाल के गर्क आसमान होता

शामिख साहब कोई बात नहीं...देर आयद दुरूस्त आयद। जनाब असदुल्लाह खान ग़ालिब के इस शेर के साथ आपने जबरदस्त वापसी की है:

ऐ दिले-ना-आकिबतअंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त

फ़िराक़ साहब की पूरी गज़ल वैसे तो हमें खूब भायी लेकिन क्या करें पूरी गज़ल यहाँ पेश नहीं कर सकते इसलिए इसी शेर के साथ काम चला लेते हैं:

ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत
तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ

रचना जी, यह क्या, क्या कह रही हैं आप। हमारी इस महफ़िल में आने वाला कोई भी शख्स बड़ा या छोटा नहीं है। हम सब तो गज़लों के मुरीद हैं और इस नाते गज़ल-भाई या गज़ल-बहन हुए। तो फिर भाई-बहनों में क्या ऊँच-नीच। आप इसी तरह अपने शेरों के साथ हमारी महफ़िल की शोभा बढाते रहिए:

सारे गम जब्त करलूं एक सहारा तो दिया होता
चल पड़ता तेरी रह में एक इशारा तो दिया होता

दर्पण जी, अब क्या कहें हम.....चूँकि आप गुलज़ार साहब के बहुत बड़े फ़ैन हैं इसलिए इस नाते तो हमारे दोस्त हुए। फिर आपको चैलेंज क्यों देना। हम तो यह चाहेंगे कि आप गुलज़ार साहब के बारे में अपना कुछ अनुभव लिख कर आवाज़ को hindyugm@gmail.com पर मेल कर दें। वह क्या है कि इस रविवार को हम गुलज़ार साहब पर एक आलेख पेश करने वाले हैं, उनका जन्मदिन जो आ रहा है। आशा करते हैं कि आपकी इंट्री ज़रूर आएगी।

मनु जी, यह क्या.. आप आएँ और दर्पण जी को पहचान कर चल दिए। आपके शेर कहाँ गए?

मंजु जी, आपकी पंक्तियाँ भी खूबसूरत हैं:

दिल की बज्म में तेरी वफा का राज था .
जब्त कर लिया राज तूने
दिया बेवफा का साथ था

सुमित जी, आप देर हो गए, कोई बात नहीं, आए तो सही। यह रहा आपका शेर:

कमाल ऐ जब्त ऐ मोहब्बत इसी को कहते है,
तमाम उम्र जबान पर न उनका नाम आये।

हमारे कुछ उस्ताद महफ़िल में दिखे हीं नहीं जैसे अदा जी, दिशा जी, पूजा जी, नीलम जी। वहीं शरद जी आए तो लेकिन उन्होंने कोई शेर पेश नहीं किया। आखिर ऐसी नाराज़गी क्यों। उम्मीद करते हैं कि इस बार आप सब टिप्पणी करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, February 17, 2009

मछलियाँ पकड़ने का शौकीन भी था वो सुरों का चितेरा

(पिछले अंक से आगे ...)

चाहें कोई पिछली पीढ़ी का श्रोता हो या आज की पीढ़ी का युवा वर्ग हर कोई नौशाद के संगीत पर झूमता है। ज़रा कुछ गीतों पर नजर डालिये... मधुबाला का 'प्यार किया तो डरना क्या' जिस पर आज के दौर में रीमिक्स बनाया जाता है... और जब दिलीप कुमार का "नैन लड़ जई हैं तो मनवा मा.." सुन ले तो कदम अपने आप थिरकने लगते हैं। आज ज्यादातर लोग उस दौर से ताल्लुक नहीं रखते पर फिर भी लगता है कि नौशाद फिल्मों में संगीत नहीं देते थे...बल्कि जादू बिखेरते थे। उनके संगीत में लोक संगीत की झलक मिलती है।

लखनऊ में जन्में १८ वर्षीय बालक से जब उसके पिता ने घर और संगीत में से एक को चुनने को कहा तब उसने संगीत को चुना और खूबसूरत सपने और कड़वी सच्चाइयों वाले मुम्बई शहर जा पहुँचा। आँखों में हजारों सपने लिये फुटपाथ को घर बनाये इस शानदार संगीतकार ने सैकड़ों धुनें तैयार कर दी। यदि फिल्मों पर गौर करें तो महल, बैजू बावरा, मदर इंडिया, मुगल-ए-आज़म, दर्द, मेला, संघर्ष, राम और श्याम, मेरे महबूब-जैसी न जाने कितनी ही फिल्में हैं।



नौशाद की बात करें और लता व रफी की बात न हो तो क्या फायदा। मुगल-ए-आज़म के राग दरबारी में 'मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोय' से लेकर गंगा जमुना के 'ढूँढो ढूँढो रे साजना' तक यदि किसी संगीतकार ने गीत की जरूरत, उसके बोल और गायिका की आवाज़ को समझा है तो वो नैशाद ही हैं।

रफी की बात करें तो गानों की लाइन लग सकती है पर फिर भी यदि किन्हीं दो गानों को चुनना पड़े तो शायद हर कोई 'ए दुनिया के रखवाले' और राग मालकौस 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' को ही चुनेगा।



लता मंगेशकर कहती हैं, "मैंने नौशाद साहब के साथ कईं महत्त्वपूर्ण गानों में काम किया है। उनकी शास्त्रीय संगीत में पकड़ और नये पॉपुलर संगीत की समझ ने उन्हें उस समय के सदाबहार गानों को कॉम्पोज़ करने का सबसे योग्य उम्मीदवार बना दिया था। वे याद करती हैं और हँसती हैं जब 'प्यार किया तो डरना क्या' गीत रिकॉर्ड हो रहा था तब बीच में आवाज़ में गुंजन पैदा करनी थी। जिसके लिये नौशाद ने उन्हें बाथरूम से गाने को कहा। उस समय आवाज़ को गुँजाने का कोई साधन नहीं था, इसलिये नौशादा साहब ने ये तरीका ईज़ाद किया। वे आगे बताती हैं कि नौशाद अपनी धुनों व आवाज़ में लगातार प्रयोग करते रहते थे जिसके लिये उन्होंने पाश्चात्य ओर्केस्ट्रा का प्रयोग करने में भी नहीम हिचकिचाये। उनके पसंदीदा गीतों में 'उठाये जा उनके सितम' (अंदाज़), 'जाने वाले से मुलाकात', 'न मिलता गम' (अमर), 'मोहे पनघट पे नंदलाल', राग केदार में 'बेकस पे करम' और राग दरबारी में 'प्यार किया तो..' गाने प्रमुख रहे। आज के समय में ऐसा संगीत दिया ही कहाँ जाता है।



जिन कलाकारों ने उनके साथ काम किया वे उन्हें मिश्रित संस्कृति का प्रतीक मानते हैं। जावेद अख्तर कहते हैं कि नौशाद न केवल एक संगीतकार थे बल्कि देश के मिश्रित संस्कृति के ऐसे प्रतीक थे जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में कईं परिवर्तन लाये व इसको गरिमा प्रदान की। वे बताते हैं कि नौशाद का फिल्म संगीत में योगदान अद्वितीय था। उनका नाम हमेशा ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।

जानेमाने निर्देशक महेश भट्ट भी कुछ ऐसा ही कहते हैं। वे कहते हैं कि नौशाद सेक्युलर भारत के प्रतीक थे। उनका सम्गीत संयुक्त सम्स्कृति की प्रतिध्वनि था। जब वे भजन में संगीत दिया करते थे ऐसा लगता था मानो वे हिन्दू हों। उनमें भारतीयता की गहराई थी और यही महान इतिहास व संस्कृति उनके खून में बह रही थी।



नौशाद तेजी से बढ़ते 'रीमिक्स कल्चर' से दूर भागने का प्रयास करते और हमेशा कहते कि हमें समय के साथ आगे बढ़ना तो चाहिये पर अपनी जड़ों के साथ पकड़ हमेशा बना कर रखनी चाहिये।

और अंत में एक ऐसी बात जो शायद बहुत कम लोगों को ही पता होगी। नौशाद साहब को मछली पकड़ने का शौक था। संगीत निर्देशन के अति व्यस्त कार्यक्रम से समय निकाल कर वे "एंग्लिंग" खेलने जाया करते थे। ये एक तरह का मछली पकड़ने का खेल है। उन्होंने १९५९ में महाराष्ट्र स्टेट ऐंग्लिंग एसोसियेशन की सदस्यता प्राप्त की। जब नौशाद युवा थे तो मुम्बई की पोवई झील में गीतकार शकील बदईयुनि और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ मछलियाँ पकड़ने जाया करते थे।

नौशाद फिल्मी संगीत के स्वर्णयुग का सबसे अहम संगीतकार थे जिसने शास्त्रीय संगीत में पगे गीतों को लोकप्रिय बनाया और उनके संगीत का जादू ही है जो बैजू बावरा और मुगले आजम का संगीत आज भी ताजातरीन लगता है।



अगले अंक में : नौशाद की तीन बेहतरीन फिल्मों के गाने और मुलाकात उन गीतों से जिनकी धुनें नौशाद साब की आखिरी धुनें थीं

प्रस्तुति- तपन शर्मा


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