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Monday, May 25, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना - अंतिम कडी

अब तक आपने पढ़ा -

आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र...., हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक... ,रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम..., और अमर प्रेम, अजनबी और अनुराग जैसी कामियाब फिल्मों का सफ़र अब पढें आगे....


शक्ति सामंत को समर्पित 'आवाज़' की यह प्रस्तुति "सफल हुई तेरी आराधना" एक प्रयास है शक्तिदा के 'फ़िल्मोग्राफी' को बारीक़ी से जानने का और उनके फ़िल्मों के सदाबहार 'हिट' गीतों को एक बार फिर से सुनने का। पिछले अंक में हमने ज़िक्र किया था १९७४ की फ़िल्म 'अजनबी' का। आइए अब आगे बढ़ते हैं और क़दम रखते हैं सन १९७५ में। यह साल भी शक्तिदा के लिए एक महत्वपूर्ण साल रहा, इसी साल आयी फ़िल्म 'अमानुष' जिसका निर्माण व निर्देशन दोनो ही उन्होने किया। पहली बार बंगला के सर्वोत्तम नायक उत्तम कुमार को लेकर उन्होने यह फ़िल्म बनायी, साथ में थीं उनकी प्रिय अभिनेत्री शर्मिला। इसी फ़िल्म के बारे में बता रहे हैं ख़ुद शक्तिदा - "१९७२ में कलकत्ता में 'नक्सालाइट' का बहुत ज़्यादा 'प्राबलेम' शुरु हो गया था। कलकत्ता फ़िल्म इंडस्ट्री का बुरा हाल था। उससे पहले उत्तमदा ने एक 'पिक्चर' यहाँ बनाई थी 'छोटी सी मुलाक़ात' जो शायद अच्छी नहीं चली थी, या जो भी थी, 'He couldn't establish himself yet'। तो एक दिन रात को उन्होने ऐसे ही कह दिया कि 'क्या मैं दोबारा यहाँ पे आ नहीं सकता हूँ?' मैने कहा 'ज़रूर, मैं आपको लेकर एक 'पिक्चर' बनाउँगा'। तो मैने सोचा कि यह बंगला 'पिक्चर' है तो ज़्यादातर 'आर्टिस्ट्स' वहीं के ले लूँ। कुछ यहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को छोड़कर सब वहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को मैने लिया। और भगवान की दया से वह पिक्चर भी चल पड़ी।"

'अमानुष' फ़िल्म की 'शूटिंग भी रोमांच से भरा हुआ था। इस फ़िल्म को 'शूट' करने के लिए शक्तिदा अपनी पूरी टीम को लेकर बंगाल के सामुद्रिक इलाके 'सुंदरबन' गए जो 'रायल बेंगाल टाइगर' के लिए प्रसिद्ध है। पूरी टीम के लिए वह एक अविस्मरणीय यात्रा रही। वहाँ पर सिर्फ़ एक ऐसी जगह थी जहाँ शेर नहीं आ सकते थे। एक छोटा सा द्वीप जिसके चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी। वहाँ पर १५० लोगों के रहने लायक तंबू लगाये गये थे और 'मोटर बोट्स' की सहायता से सामानों का आवाजाही हो रहा था। उन लोगों ने साफ़ देखा की पानी में छोटी छोटी 'शार्क' मछलियाँ तैर रही हैं। इसलिए उन्हे यह निर्देश था कि कोई भी पानी में ना उतरें। साथ ही यह भी बताया गया था कि रात में कोई तंबू से बाहर ना निकले, यहाँ तक कि हाथ भी तंबू से बाहर ना निकालें क्युंकि एक ताज़े माँस के टुकड़े के लिए ख़ूंखार शेर पानी में डुबकी लगाए छुपे होते हैं। 'अमानुष' के शुरुआती दिनों में शक्तिदा उत्तम कुमार के घर ख़ूब जाया करते थे। उन्ही के घर पर वो गायक संगीतकार श्यामल मित्रा से मिले, और वहीं पर उन्होने श्यामलदा से निवेदन किया कि वो इस फ़िल्म के गीतों को स्वरबद्ध करें। श्यामल मित्रा इस बात पर राज़ी हुए कि गीतों के बोल अच्छे स्तर के होने चाहिए।

गीत: दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (अमानुष)


'अमानुष' फ़िल्म में गीत लिखे थे इंदीवर साहब ने। कितनी अजीब बात है कि 'अमानुष' के इस 'हिट' गीत के लिए गीतकार इंदीवर और गायक किशोर कुमार को 'फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड' से सम्मानित किया गया, लेकिन संगीतकार श्यामल मित्रा वंचित रह गये। ख़ुशी फिर भी इस बात की रही कि हिंदी फ़िल्मों के पहली ब्रेक में ही उन्होने अपार सफलता हासिल की। हिंदी फ़िल्मों में आने से पहले वे बंगाल के जानेमाने गायक और संगीतकार बन चुके थे। फ़िल्म 'अमानुष' में इस तरह के असाधारण गाने लिखने के बाद शक्तिदा इंदीवर साहब के 'फ़ैन' बन गए। लेकिन क्या आपको पता है कि इंदीवर का लिखा कौन सा गाना शक्तिदा को सबसे ज़्यादा पसंद था? वह गीत था १९५४ की फ़िल्म 'बादबान' का। यह गीत सुनने से पहले आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के संवाद और स्क्रीनप्ले शक्तिदा ने ख़ुद लिखे थे जो उन दिनो निर्देशक फणी मजुमदार के सहायक के रूप में काम कर रहे थे बौम्बे टाकीज़ में। बौम्बे टाकीज़ की आर्थिक अवस्था बहुत ख़राब हो चुकी थी। यह फ़िल्म इस कंपनी में काम करने वाले मज़दूरों के लिए बनाई गयी थी, जिसके लिए किसी भी कलाकार ने कोई पैसे नहीं लिए। अशोक कुमार, देव आनंद, लीला चिटनिस, उषा किरन जैसे कलाकारों ने इस फ़िल्म में काम किया था। संगीतकार थे तिमिर बरन और एस. के पाल। अभी उपर इंदीवर के लिखे जिस गीत का ज़िक्र हम कर रहे थे, उसे गाया था गीता दत्त ने, और एक वर्ज़न हेमन्त कुमार की आवाज़ में भी था। सुनिए गीताजी की वेदना भरी आवाज़ में "कैसे कोई जीये ज़हर है ज़िंदगी"।

गीत: कैसे कोई जियें ज़हर है ज़िंदगी (बादबान)


अमानुष के बाद ७० के दशक के आख़िर के चंद सालों में भी शक्तिदा के फ़िल्मों का जादू वैसा ही बरक़रार रहा। निर्माता-निर्देशक के रूप मे १९७७ मे उनकी फ़िल्म आयी 'आनंद आश्रम' जो 'अमानुष' की ही तरह बंगाल के पार्श्वभूमि पर बनाया गया था। इस फ़िल्म का निर्माण बंगला में भी किया गया था, और इस फ़िल्म मे भी उत्तम कुमार और शर्मिला टैगोर ने अभिनय किया था। बतौर निर्माता, शक्तिदा ने १९७६ मे फ़िल्म 'बालिका बधु' का निर्माण किया, जिसका एक बार फिर बंगाल की धरती से ताल्लुख़ था। शरतचंद्र की बंगला उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म को निर्देशित किया था तरु मजुम्दार ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सचिन और रजनी शर्मा। गाने लिखे आनंद बक्शी ने और संगीत दिया राहुल देव बर्मन ने। इस फ़िल्म मे आशा भोसले, मोह्द रफ़ी, किशोर कुमार, अमित कुमार और चंद्राणी मुखर्जी ने तो गीत गाये ही थे, ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म मे आनद बक्शी, आर.डी. बर्मन और उनके सहायक और गायक सपन चक्रवर्ती ने भी गानें गाये, और वह भी अलग अलग एकल गीत। इस फ़िल्म का मशहूर होली गीत हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे आपको सुनवा ही चुके हैं। बतौर निर्देशक, शक्तिदा ने १९७६ मे 'महबूबा', १९७७ में 'अनुरोध' और १९७९ मे 'दि ग्रेट गैम्बलर' जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन किया। ये सभी फ़िल्में अपने ज़माने की सुपरहिट फ़िल्में रहीं हैं। वह दौर ऐसा था दोस्तों कि सफल फ़िल्में कहें या शक्तिदा की फ़िल्में कहें, मतलब एक ही निकलता था।

गीत: आप के अनुरोध पे मैं यह गीत सुनाता हूँ (अनुरोध)


८० के दशक के आते आते फ़िल्मों का मिज़ाज बदलने लगा था। कोमलता फ़िल्मों से विलुप्त होती जा रही थी और उनकी जगह ले रहा था 'ऐक्शन' फ़िल्में। बावजूद इस बदलती मिज़ाज के, शक्तिदा ने अपना वही अंदाज़ बरक़रार रखा। इस दशक मे जिन हिंदी फ़िल्मों के वो निर्माता-निर्देशक बने, वो फ़िल्में थीं 'बरसात की एक रात', 'अय्याश', और 'आर-पार'। इन फ़िल्मों के अलावा उन्होने 'आमने सामने', 'मैं आवारा हूँ', 'पाले ख़ान' और 'आख़िरी बाज़ी' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया, तथा 'ख़्वाब', 'आवाज़', और 'अलग अलग' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। ९० के दशक मे 'गीतांजली' फ़िल्म के वो निर्माता-निर्देशक रहे, तथा 'आँखों में तुम हो' का निर्माण किया व 'दुश्मन' का निर्देशन किया।

शक्ति दा आज इतनी दूर चले गये हैं लेकिन जो काम वो कर गये हैं, उसकी लौ हमेशा नयी पीढ़ी को राह दिखाती रहेगी, नये फ़िल्मकारों को अच्छी फ़िल्में बनाने की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी। दूसरे शब्दों में उनकी आराधना ज़रूर सफल होगी। चलते चलते उनकी फ़िल्म 'आनंद आश्रम' के शीर्षक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है "सफल वही जीवन है, औरों के लिए जो अर्पण है"। शक्तिदा ने भी अपना पूरा जीवन फ़िल्म जगत को और पूरे समाज को सीख देनेवाली अच्छी अच्छी फ़िल्में देते हुए गुज़ार दिये। शक्तिदा को हिंद युग्म की तरफ़ से भावभीनी श्रद्धाजंली।

५ अंकों के इस पूरे आलेख को तैयार करने में विविध भारती के निम्नलिखित कार्यक्रमों से जानकारियाँ बटोरी गयीं:

१. युनूस ख़ान द्वारा प्रस्तुत शक्तिदा को श्रद्धांजलि - "सफल होगी तेरी आराधना"
२. कमल शर्मा से की गयी शक्तिदा की लम्बी बातचीत - "उजाले उनकी यादों के"
३. शक्तिदा द्वारा प्रस्तुत फ़ौजी भाइयों के लिए "विशेष जयमाला" कार्यक्रम


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी
समाप्त



Friday, April 24, 2009

सफल "हुई" तेरी अराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 3)

दोस्तों, शक्ति सामंत के फ़िल्मी सफ़र को तय करते हुए पिछली कड़ी में हम पहुँच गए थे सन् १९६५ में जिस साल आयी थी उनकी बेहद कामयाब फ़िल्म 'कश्मीर की कली'। आज हम उनके सुरीले सफ़र की यह दास्तान शुरु कर रहे हैं सन् १९६६ की फ़िल्म 'सावन की घटा' के एक गीत से। इस फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन, दोनो ही शक्तिदा ने किया था और इस फ़िल्म में भी नय्यर साहब का ही संगीत था।

गीत: आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया (सावन की घटा)


"आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया, मैं तो आगे बढ़ गयी पीछे ज़माना रह गया"। एस. एच. बिहारी के लिखे इस गीत के बोल जैसे शक्तिदा को ही समर्पित थे। 'हावड़ा ब्रिज', 'चायना टाउन', और 'कश्मीर की कली' जैसी 'हिट' फ़िल्मों के बाद इसमें कोई शक़ नहीं रहा कि शक्तिदा फ़िल्म जगत में बहुत ऊपर पहुँच चुके थे। उनका नाम भी बड़े बड़े फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों की सूची में शामिल हो गया। और साल दर साल उनकी प्रतिभा और सफलता साथ साथ परवान चढ़ती चली गयी। 'सावन की घटा' के अगले ही साल, यानी कि १९६७ में एक और मशहूर फ़िल्म आयी 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' जिसके गीत संगीत ने तो हंगामा मचा दिया। शम्मी कपूर, शंकर जयकिशन और मोहम्मद रफ़ी की तिकड़ी पहले से ही लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँच चुकी थी। इस फ़िल्म ने उनकी मुकुट पर एक और चमकता हीरा जड़ दिया। शक्तिदा किसी विदेशी शहर को आधार बनाकर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे। उनके अनुसार उस ज़माने में पैरिस को लेकर लोगों में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी थी और यूरोप के सबसे ख़ास शहर के रूप में भारतीय इसे मानते थे। इसलिए इस फ़िल्म के लिए पैरिस को ही चुना गया। उन्होने यह भी कहा था कि इस फ़िल्म की कहानी में कोई ख़ास बात नहीं थी, फ़िल्म चली अपने किस्मत के बलबूते। फ़िल्म के गीतों के लिए पैरिस से ही नर्तकियों को लिया गया था। एक फ़्रेंच निर्माता ने जब यह फ़िल्म देखी तो उन्होने शक्तिदा से अनुरोध किया कि वो उन्हे इस फ़िल्म के कुछ दृश्य उनकी अपनी फ़िल्म में इस्तेमाल करने की अनुमती दे दें। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के शूटिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा शक्तिदा ने फ़ौजी भाइयों के लिए प्रसारित विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में बताया था। हुआ यूँ कि वो लोग पैरिस में फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। उन दिनो 'जंगली' और 'संगम' के गानें पूरी दुनिया में धूम मचा रहे थे। एक दिन शक्तिदा, जयकिशन और शम्मी कपूर एक 'रेस्तोराँ' में बैठे हुए थे कि अचानक कुछ लोगों ने उन्हे घेर लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि जयकिशन और शम्मी कपूर ने उनको "आइ आइ या करूँ मैं क्या सुकू सुकू" गाना नहीं सुनाया। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के जिस गाने को वो उन दिनों फ़िल्मा रहे थे वह गाना था यह...

गीत: आसमान से आया फ़रिश्ता (ऐन ईवनिंग इन पैरिस)


साल १९६९। उस समय राजेश खन्ना राजेश खन्ना नहीं बने थे। उन्होने कुछ दो तीन फ़िल्मों में काम किया था, लेकिन वो फ़िल्में बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हो पायी थी। जब 'आराधना' की कहानी शक्तिदा के दिमाग़ में आयी, तो उन्हे लगा कि इस कहानी पर एक सफ़ल फ़िल्म तभी बनायी जा सकती है अगर नायक की भूमिका में कोई नया अभिनेता हो। उन्होने राजेश खन्ना का अभिनय देख रखा था और उन्हे उनका अभिनय काफ़ी पसंद भी आया था। जब उन्होने राजेश खन्ना से 'आराधना' में काम करने की बात की तो पहले पहले तो वो ज़्यादा ख़ुश नहीं हुए क्योंकि उनका किरदार 'इंटर्वल' से पहले ही मर जाता है और उनका डबल रोल काफ़ी देर बाद शुरु होता है। उन्हे लगा कि यह नायिका प्रधान फ़िल्म है जो उन्हे कामयाबी नहीं दिला सकती। लेकिन शक्तिदा ने उन्हे हर तरीके से समझाया, यहाँ तक कहा कि अगर फ़िल्म नाकामयाब भी होती है तो भी उन्हे उनके पूरे पैसे मिल जाएंगे। आख़िरकार राजेश खन्ना राज़ी हो गए और फ़िल्म का निर्माण शुरु हो गया। शक्तिदा ने बहुत ही कम बजट में यह फ़िल्म बना डाली और जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो वो लखपति बन गए। 'आराधना' मुंबई के 'बांद्रा टाकीज़' में रिलीज़ हुई थी। मद्रास के एक सिनेमाघर में यह फ़िल्म लगातार दो साल तक चली। इस फ़िल्म ने राजेश खन्ना के रूप में फ़िल्म जगत को दिया उसका पहला 'सुपर स्टार'। शर्मिला टैगोर के स्टाइल को भी उस युग की युवतियों ने गले लगाया। और इसी फ़िल्म से शुरुआत हुई राजेश खन्ना, आनंद बख्शी, सचिन देव बर्मन और किशोर कुमार के टीम की।

गीत: मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू (आराधना)


'आराधना' की बातें इतनी ज़्यादा हैं दोस्तों कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते, भले ही एक और अंक हमें बढ़ाने पड़ जाए। तो हुआ यूँ कि शुरुआत में यह तय हुआ था कि रफ़ी साहब बनेंगे राजेश खन्ना की आवाज़। लेकिन उन दिनो रफ़ी साहब एक लम्बी विदेश यात्रा पर गए हुए थे। इसलिए शक्तिदा ने किशोर कुमार का नाम सुझाया। उन दिनो किशोर देव आनंद के लिए गाया करते थे, इसलिए सचिनदा पूरी तरह से शंका-मुक्त नहीं थे कि किशोर गाने के लिए राज़ी हो जाएंगे। शक्तिदा ने किशोर को फ़ोन किया, जो उन दिनों उनके दोस्त बन चुके थे बड़े भाई अशोक कुमार के ज़रिए। किशोर ने जब गाने से इनकार कर दिया तो शक्तिदा ने कहा, "नखरे क्यूँ कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाए"। आख़िर में किशोर राज़ी हो गए। शुरु शुरु में सचिनदा बतौर गीतकार शैलेन्द्र को लेना चाह रहे थे, लेकिन यहाँ भी शक्तिदा ने सुझाव दिया कि क्यूँ ना सचिनदा की जोड़ी उभरते गीतकार आनंद बख्शी के साथ बनाई जाए। और यहाँ भी उनका सुझाव रंग लाया। जब तक रफ़ी साहब अपनी विदेश यात्रा से लौटते, इस फ़िल्म के करीब करीब सभी गाने रिकार्ड हो चुके थे सिवाय दो गीतों के, जिन्हे फिर रफ़ी साहब ने गाया। इनमें से एक गीत का संगीत राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था क्युंकि सचिनदा की तबीयत उन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रही थी। तो क्यूँ ना यहाँ पर वही गीत सुन लिया जाए!

गीत: बाग़ों में बहार है (आराधना)


'आराधना' में किशोर कुमार का गाया "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी 'बोल्ड' गीत था। सचिनदा ने इस गीत के लिए पहले जो धुन बनाई थी, उसमें किशोर कुमार को कुछ कमी सी लग रही थी, यानी कि जिस नशीले अंदाज़ की ज़रूरत थी वह नहीं आ पा रही थी। तब किशोरदा ने ही इसकी धुन को थोड़ा सा 'मॊर्डन' बना दिया जो बर्मन दादा को भी पसंद आया। अब बारी थी इस गाने के फ़िल्मांकन की। शक्तिदा साधारणतः अपने फ़िल्मों के रिकार्ड किए हुए गाने रात के वक़्त सुना करते थे और उनके फ़िल्मांकन के बारे में योजनाएँ बनाया करते थे। इस गीत के लिए उनके दिमाग़ में एक ख्याल आया कि क्यूँ ना इस गीत को एक ही 'शौट' में फ़िल्माया जाए! उन्होने एक काग़ज़ का पन्ना लिया और उस पर तीन अक्षर लिखे - ए, बी, सी। 'ए' नायक के लिए, 'बी' नायिका के लिए, और 'सी' कैमरे के लिए। और इस तरह से वो अपने मन ही मन में गाने का पूरा फ़िल्मांकन क़ैद कर लिया। उन्होने एक गोलाकार 'ट्राली' का इंतज़ाम किया और फ़िल्मालय स्टुडियो में इस गीत को फ़िल्मा लिया गया। शुरु शुरु में कई लोगों ने उनके इस एक शौट वाले विचार का विरोध किया था। किसी ने यहाँ तक कहा भी था कि "इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शौट में ले रहा है"। उस समय सभी के सवालों का शक्तिदा ने एक ही जवाब दिया था कि "जब रात को गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि कहाँ 'कट' करूँ"। और इस तरह से यह गीत हिंदी फ़िल्म जगत का पहला गाना बन गया जिसे केवल एक ही शौट में फ़िल्माया गया था। तो चलिए हम भी इस गीत की मादकता और नशीलेपन का आनंद उठाते हैं।

गीत: रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना (आराधना)


'आराधना' की कामयाबी सिर्फ़ शक्ति सामंत की कामयाबी नहीं थी, बल्कि राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर, आनंद बख्शी, किशोर कुमार जैसे तमाम कलाकारों के लिए यह फ़िल्म यादगार साबित हुई। इस फ़िल्म की कामयाबी के झंडे को लहराते हुए शक्तिदा ने प्रवेश किया ७० के दशक में। १९७० में उनके निर्देशन में फ़िल्म आयी 'पगला कहीं का'। निर्माता थे अजीत चक्रवर्ती। शम्मी कपूर और आशा पारेख अभिनीत इस फ़िल्म में शंकर जयकिशन ने एक बार फिर से 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' की तरह अपने सुरीले संगीत के जलवे बिखेरे हसरत जयपुरी के लिखे और लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे के गाए गीतों के ज़रिए। इस फ़िल्म का एक गीत ऐसा था जो हमें कभी उसे भुलाने नहीं देता। आप समझ गए होंगे कि हमारा इशारा किस तरफ़ है, जी हाँ, लताजी और रफ़ी साहब का गाया 'डबल वर्ज़न' गीत "तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे"।

गीत: तुम मुझे युं भुला ना पायोगे (पगला कहीं का)


"तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनायोगे"। इसमें कोई शक़ नहीं कि शक्तिदा के फ़िल्मों के गीतों को आज भी लोग बड़े प्यार से गुनगुनाते हैं, याद करते हैं। रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में यही गानें तो हैं जो हमारे सुख दुख के साथी हैं। ना कभी हम इन गीतों को भुला सकते हैं और ना ही इन गानों और इनके फ़िल्मों से जुड़े कलाकारों को। और शायद यही वजह है कि आज हम 'आवाज़' के इस मंच पर शक्ति सामंत को याद कर रहे हैं, उन्हे श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं। पहले हमने सोचा था कि इस श्रद्धांजली को हम चार भागों में पोस्ट करेंगे, लेकिन शक्तिदा के फ़िल्मों की सूची इतनी लम्बी है और इन फ़िल्मों के गाने इतने प्यारे हैं कि हम बड़ी मुशकिल में पड़ गए कि किस फ़िल्म को छोड़ें, और किस फ़िल्म का ज़िक्र करें। इसलिए हमने तय किया है कि हम इस श्रद्धांजली को तब तक जारी रखेंगे जब तक शक्तिदा के सभी फ़िल्मों का ज़िक्र हम इत्मीनान से कर नहीं लेते। चौथे भाग के साथ हम बहुत जल्द वापस आयेंगे, तब तक पढ़ते रहिए और सुनते रहिए 'आवाज़'।

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

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