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Friday, November 16, 2012

लौट चलें बचपन की ओर, बच्चों की आवाजों में कुछ दुर्लभ रचनाओं संग

शब्दों में संसार - एपिसोड 03 - बचपन 
  
दोस्तों, शब्दों में संसार को आपका ढेर सारा प्यार मिल रहा है, यकीन मानिये इसके हर एपिसोड को तैयार करने में एक बड़ी टीम को जमकर मेहनत जोतनी पड़ती है, पर इसे अपलोड करने के बाद हम में हर किसी को एक गजब की आत्म संतुष्टी का अनुभव भी अवश्य होता है, और आपके स्नेह का प्रोत्साहन पाकर ये खुशी दुगनी हो जाती है. दो दिन पहले हमने 'बाल दिवस' मनाया था तो इस माह का ये विशेष एपिसोड बच्चों के नाम करना लाजमी ही था. 

हमारी उम्र बढ गई, हम बड़े हो गए और इस तरह हमने अपने-आप को उन ख्यालों, सपनों और कोशिशों तक हीं सीमित कर लिया जहाँ हक़ीक़त का मुहर लगना अनिवार्य होता है। हम हरेक बात को संभव और असंभव के पलड़े पर तोलने लगे और जब भी कुछ असंभव की तरफ बढता दिखा तो हमने उससे कन्नी काट ली। हमने बस उसे हीं सच और सही कहा, जो हमारी नज़रों के सामने था या फिर जिसके होने से हमारे मस्तिष्क को बल मिला। बाकी बातों, घटनाओं एवं कल्पनाओं को हमने बचकानी घोषित कर दिया। ऐसा करके हमें लगा कि हमने कोई तीर मार दिया है, लेकिन सही मायने में हमने उसी दिन अपनी मासूमियत खो दी। हम बड़े तो हो गए लेकिन हमारी सोच का आकाश निम्न से निम्नतर होता चला गया। हमारी हार हो गई और हमें हराने वाला कोई और नहीं बल्कि हमारा बचपन हीं था। काश हम बड़े हीं न हुए होते। 

यह ख्याल, यह द्वंद्व शायद हर किसी के हृदय में उठता होगा। इसलिए हमने निश्चय किया कि अपने हृदय से हार की पीड़ा हटाकर उन अमूल्य दिनों की सैर की जाए, जिसे बालपन या बचपन कहते हैं ताकि कुछ हीं समय के लिए हीं सही लेकिन हमें भी जीत की अनुभूति हो। (आज के एपिसोड की स्क्रिप्ट से)

आज के एपिसोड में हमने बाल कवि 'बैरागी', सोहन लाल  द्विवेदी, भवानी प्रसाद मिश्र, सुभद्रा कुमारी चौहान, माखन लाल चतुर्वेदी, दिनकर, रामेश्वर दयाल दूब, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शेरचंद गर्ग, हरिवंश राय बच्चन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, श्याम सुंदर अग्रवाल, निरंकार देव सेवक, और दीन दयाल शर्मा की कुल १५ कविताओं को समेटा है अपने नन्हें मुन्ने श्रोताओं के लिए, जिन्हें खुद हमारे कुछ छोटे छोटे शैतानों ने अपनी आवाज़ से सुरीला बना दिया है. स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की, तथा संचालन है अनुराग शर्मा और संज्ञा टंडन का. इस एपिसोड का निर्माण किया है आपके लिए सजीव सारथी ने. 

लीजिए सुनिए रेडियो प्लेबैक का ये अनूठा पोडकास्ट -



आप इस पूरे पोडकास्ट को यहाँ से डाउनलोड भी कर सकते हैं



आज की कड़ी में प्रस्तुत कवितायें और उनसे जुडी जानकारियाँ इस प्रकार हैं -

 कविता ०१ - अगर मगर : कवि - निरंकार देव सेवक : स्वर -स्टीवन सजीव  



 कविता ०२ - सूक्तियाँ  : कवि - बालकवि बैरागी : स्वर - रूपल रस्तोगी  



 कविता ०३ - पेड : कवि - दीन दयाल शर्मा  : स्वर - निखिल मनोज  



 कविता ०४ : हिमालय : कवि -सोहन लाल द्रिवेदी  : स्वर -स्टीवन सजीव  



 कविता ०५ : अक्ल की बात : कवि - भवानी प्रसाद मिश्र : स्वर -पूजा यादव  



 कविता ०६ : कदम्ब का पेड  : कवि -सुभद्रा कुमारी चौहान  : स्वर -अनुप्रिया वार्ष्णेय 



 कविता ०७ : लड्डू  : कवि -माखन लाल चतुर्वेदी : स्वर -अदिति अमित तिवारी 



 कविता ०८ :  इब्नबतूता   : कवि -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : स्वर -अभिषेक कारकर 



 कविता ०९ : चंदा मामा  : कवि - श्याम सुन्दर अग्रवाल  : स्वर -गार्गी खरडखेडकर 



कविता १० : चाँद का कुर्ता  : कवि - रामधारी सिंह दिनकर : स्वर -दीपाली तिवारी दिशा 



कविता ११ :  चंदा मामा आ जाना  : कवि - द्वारका प्रसाद महेश्वरी : स्वर -केदार  आचरे 



कविता १२ :  उठो लाल : कवि - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔंध ' : स्वर -आकांक्षा खारकर 



 कविता १३: चिड़िया : कवि - हरिवंश राय बच्चन : स्वर -माही तिवारी 



कविता १४ :  खोटी अठन्नी  : कवि - रामेश्वर दयाल दूब : स्वर -क्रिस्टिन सजीव 



कविता १५ : गाँधी के तीन बन्दर  : कवि  - शेरचंद गर्ग : स्वर - कुहू राजीव रंजन प्रसाद 



कोंसेप्ट और स्क्रिप्ट - विश्व दीपक 
कविता-चयन - विश्व दीपक 
स्वर - अनुराग शर्मा और संज्ञा टंडन  

शीर्षक गीत - सजीव सारथी 
स्वर - अनुराग यश, कृष्ण राजकुमार 
संगीत - कृष्ण राजकुमार 
चित्र साभार - धंधापानी फोटोग्राफी 

निर्माण सहयोग - अनुराग शर्मा, रश्मि प्रभा, सुनीता यादव, संज्ञा टंडन, राजीव रंजन प्रसाद, अमित तिवारी, अर्चना चाव्जी 
संयोजन एवं प्रस्तुति - सजीव सारथी 

हिंदी साहित्य के इन अनमोल रत्नों को इस सरलीकृत रूप में आपके सामने लाने का ये हमारा प्रयास आपको कैसा लगा, हमें अपनी राय के माध्यम से अवश्य अवगत करवाएं. यदि आप भी आगामी एपिसोडों में कविताओं को अपनी आवाज़ से सजाना चाहें तो हमसे संपर्क करें.

Friday, August 17, 2012

कहानी पॉडकास्ट - बचपन - उषा महाजन - शेफाली गुप्ता

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने शेफाली गुप्ता की आवाज़ में उषा प्रियंवदा की कथा "वापसी" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार उषा महाजन की कहानी "बचपन", जिसको स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ने।

बिखरते रिश्ते का पाठ्य अभिव्यक्ति पर उपलब्ध है।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 17 मिनट 41 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

उषा महाजन एक स्वतन्त्र पत्रकार हैं।
~ जन्म : 30 सितम्बर, 1948, देवरिया (उ.प्र.). इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक (1968 में). हिन्दी अकादमी का ‘साहित्यिक कृति सम्मान, के. के. बिड़ला फाउण्डेशन फेलोशिप (1993-1994)

हर शुक्रवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"बहुत महँगा साबुन है। अच्छी तरह मल-मलकर नहाना, समझी! और सुन, जो नया फ्रॉक तुझे पिंकी की मम्मी ने दिया है, वही पहनना।" (उषा महाजन की "बचपन" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
 यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
(लिंक पर राइटक्लिक करके सेव ऐज़ का विकल्प चुनें)

#28th Story, Bachpan: Usha Mahajan/Hindi Audio Book/2012/28. Voice: Shaifali Gupta

Thursday, May 21, 2009

गोपालदास नीरज का एक संगीतबद्ध गीत

समय-समय पर आवाज़ नई प्रतिभाओं से आपको रूबरू कराता रहता है। आज हम आपको एक बहुत ही प्रतिभावान कवि, संगीतकार और गायक से मिलाने जा रहे हैं। जी हाँ, ये हैं अब्बास रज़ा अल्वी। अब्बास हिन्दी और उर्दू कविता से तबसे जुड़े हैं जबसे इन्होंने ऑस्ट्रेलिया में कवि सम्मेलन और मुशायरों में पाठ किया। सिडनी में इनके पास अपना रिकॉर्डिंग स्टूडियो है।

हिन्दी-उर्दू की गंगा-जमुनी संस्कृति में पले-बढ़े तथा भारतीय तथा पाश्चात्य संगीत का अनुभव रखने वाले अल्वी ने कविताएँ लिखीं, उन्हें संगीतबद्ध किया और गाया तथा उस एल्बम का नाम दिया 'बैलेंस इन लाइफ'।

अल्वी ने ऑस्ट्रेलिया की ढेरों सांस्कृतिक तथा सामुदायिक संस्थानों के साथ काम किया। इसके साथ ही साथ इन्होंने साहित्य, रंगमंच, रेडियो व टीवी कार्यक्रमों के लिए भी काम किया। लेकिन ये दिल से कवि थे, कविताएँ इनके अंतर्मन के तार छेड़ती थी, इसलिए लिखने का काम सर्वोपरि रहा।

ऑस्ट्रेलिया में इनका पहला ऑडियो एल्बम रीलिज हुआ 'कर्बला को सलाम' जो इनके स्वर्गीय पिता जनाब मुनव्वर अब्बास अल्वी को समर्पित थी। इसके बाद 'मुनव्वर प्रोडक्शन' के बैनर तले इन्होंने प्रवासियों की भावनाओं को समाहित करते हुए एल्बम बनाया 'दूरियाँ'। फिलहाल ये 'राहत', 'फायर एण्ड गंगा', 'नज़दीकियाँ' और 'बनबास' इत्यादि संगीत-सीडियों पर काम कर रहे हैं। इन्होंने संगीत के माध्यम से समाज में जागृति पैदा करने की कोशिश की है। दुनिया के सभी मत्वपूर्ण मुद्दों यथा पर्यावरण, प्रदूषण, आतंकवाद आदि विषयों पर संगीत-निर्माण में दिलचस्पी रखने वाले अब्बास आज एक अलग तरह का गीत आप सबके के लिए लेकर आये हैं।

यह गीत है मशहूर गीतकार गोपालदास नीरज का लिखा हुआ। गाया है सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) के ही मिण्टू और पुष्पा ने। संगीत दिया है खुद अब्बास रज़ा अल्वी ने। सुनें, आप भी अपने बचपन में पहुँच जायेंगे।



गीत के बोल

बचपन के जमाने में
हम-तुम जो बनाते थे।
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते हैं।

बचपन के जमाने में
हम तुम जो बनाते थे।
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते हैं।

बचपन के जमाने में॰॰

पनघट पे गगरियों का
पल-पल जल छलकाना।
छलका-छलका कर जल
घूँघट मे मुसकाना।

पनघट पे गगरियों का
पल-पल जल छलकाना।
छलका-छलका कर जल
घूँघट मे मुसकाना।

अब तक नज़रों में वो
मंजर लहराते हैं।
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते हैं।

बचपन के जमाने में
हम तुम जो बनाते थे।
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते है।

बचपन के जमाने में॰॰॰॰

रामू के बगीचे में
आमों का चुराना वो।
बरसात के मौसम में
सड़कों पे नहाना वो।

रामू के बगीचे में
आमों का चुराना वो।
बरसात के मौसम में
सडकों पे नहाना वो।

इतना सुख देते थे
अब इतना रुलाते हैं।
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते हैं।

बचपन के जमाने में
हम तुम जो बनाते थे।
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते हैं।

बचपन के जमाने में॰॰॰

दादी की कहानी की
याद आज भी आती है।
अम्मी की प्यार भरी
लोरी तड़पाती है।

जब याद वतन आता
हम मर-मर जाते हैं।
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते हैं।

बचपन के जमाने में
हम-तुम जो बनाते थे
मिट्टी के घरोंदे वो
याद आज भी आते हैं।

बचपन के जमाने में॰॰॰


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