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Thursday, October 7, 2010

ओल्ड इज़ गोल्ड - 500 : जब रिवाइव किया गया पहले हिंदी फ़िल्मी गीत "दे दे खुदा के नाम पर" को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 500/2010/200

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस माइलस्टोन एपिसोड में। एक सुरीला सफ़र जो हमने शुरु किया था २० फ़रवरी २००९ की शाम, वह सफ़र बहुत सारे सुमधुर पड़ावों से होता हुआ आज, ७ अक्तुबर को आ पहुँच रहा है अपने ५००-वें मंज़िल पर। दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस यादगार मौक़े पर हम सब से पहले आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। जिस तरह का प्यार आपने इस स्तंभ को दिया है, जिस तरह से आपने इस स्तंभ का साथ दिया है और इसे सफल बनाया है, उसी का यह नतीजा है कि आज हम इस मुक़ाम तक पहुँच पाये हैं।

दोस्तों, इस यादगार शाम को कुछ ख़ास तरीक़े से मनाने के लिए हमने सोचा कि क्यों ना कुछ ऐसा किया जाए कि जिससे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह ५००-वाँ एपिसोड वाक़ई एक यादगार एपिसोड बन जाए। १४ मार्च, १९३१ भारतीय सिनेमा के लिए एक यादगार दिन था, क्योंकि इसी दिन बम्बई के मजेस्टिक सिनेमा में प्रदर्शित हुई थी इस देश की पहली बोलती फ़िल्म 'आलम आरा'। 'आलम आरा' से ना केवल बोलती फ़िल्मों का दौर शुरु हुआ, बल्कि इसी से शुरुआत हुई फ़िल्मी गीतों की, फ़िल्म संगीत की। आज फ़िल्म संगीत मनोरंजन का सब से अहम और लोकप्रिय साधन है, शायद उनकी फ़िल्मों से भी ज़्यादा। दोस्तों, जिस 'आलम आरा' से फ़िल्म संगीत की शुरुआत हुई थी, बेहद अफ़सोस की बात है कि आज 'आलम आरा' का प्रिण्ट नष्ट हो चुका है। और क्योंकि उस ज़माने में 'आलम आरा' के गीतों को ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड पर उतारे नहीं गये थे, इसलिए फ़िल्म के प्रिण्ट के साथ साथ इस फ़िल्म के गानें भी खो गए, हमेशा हमेशा के लिए। कुछ सूत्रों से इस फ़िल्म के गीतों के बोल तो हमने हासिल किए हैं, लेकिन उनकी धुनें कैसी रही होंगी, किस तरह से उन्हें गाया गया होगा, यह आज कोई नहीं बता सकता। इस फ़िल्म में वज़ीर मोहम्मद ख़ान के गाये "दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे ताक़त हो गर देने की" गीत को पहला फ़िल्मी गीत माना जाता है, लेकिन इस गीत का केवल मुखड़ा ही लोगों को पता है। क्या इस गीत के अंतरे भी थे, यह कोई नहीं जानता। इसलिए हमने यह सोचा कि क्यों ना इस पहले पहले फ़िल्मी गीत को रिवाइव किया जाए। क्यों ना इसके अंतरे नये तरीक़े से लिखे जाएँ, और फिर पूरे गीत को स्वरबद्ध कर किसी नए गायक से गवाया जाए! और क्यों ना इस गीत को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ५००-वें अंक में रिलीज़ किया जाए!

शुरु हो गई तैयारी पहली बोलती फ़िल्म के पहले गीत को रिवाइव करने की। इसके लिए सब से पहले ज़रूरत थी इस गीत के बोलों को पूरा करने की क्योंकि जैसा कि हमने आपको बताया कि इस गीत का केवल मुखड़ा ही आज हमें मालूम है। फ़िल्म के नष्ट हो जाने से गीत का बाक़ी का हिस्सा भी उसके साथ खो गया। मुखड़ा कुछ ऐसा है - "दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे ताक़त हो गर देने की, चाहे अगर तो माँग ले मुझसे हिम्मत हो गर लेने की"। तो एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और उसके तहत आमंत्रित किए कुछ ऐसे शेर जो इस ग़ज़ल/गीत को पूरा कर सके। हमें बहुत सारे एन्ट्रीज़ मिले, जिनमें से हमने चुने दो शेर और इस तरह से यह ग़ज़ल मुकम्मल हुई। आगे बढ़ने से पहले आइए आपको बता दें कि जिन दो शख़्स के शेर हमने चुने हैं उनके नाम हैं स्वपनिल तिवारी 'आतिश' और निखिल आनंद गिरि। इस तरह से आर्दशिर ईरानी का लिखा मुखड़ा एक गीत की शक्ल में पूरा हुआ। आगे बढ़ने से पहले, ये रहे वो दो शेर -

इत्र, परांदी और महावर, जिस्म सजा, पर बेमानी,
दुल्हन रूह को कब है ज़रूरत सजने और सँचरने की।
---- स्वपनिल तिवारी 'आतिश'

चला फ़कीरा हँसता हँसता, फिर जाने कब आयेगा,
जोड़ जोड़ कर रोने वाले फ़ुरसत कर कुछ देने की।
---- निखिल आनंद गिरि

लिखने का कार्य तो पूरा हो गया, अब बात आई इसे स्वरबद्ध करने की। इसके लिए भी एक प्रतियोगिता की घोषणा की गई। हमें कुल ९ प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं, जिनमें से हमारी टीम ने इस प्रविष्टि को चुना जो आज इस महफ़िल में बज रहा है। तो साहब पहले फ़िल्मी गीत को री-कम्पोज़ किया है हमारे बेहद कामियाब संगीतकार कृष्ण राज ने, जिन्होंने इस गीत का संगीत संयोजन भी ख़ुद ही किया। आपको याद होगा कि किस प्रकार कृष्ण राज हमारी "काव्यनाद" प्रतियोगिता में भाग लेते रहे हैं, और सफल भी होते रहे हैं. इस गीत में गीटार के लिए विशेष सहयोग उन्हें मिला विशाल रोमी से। धुन और ट्रैक तैयार हो जाने के बाद उसे भेज दिया गया गायक मनु वर्गीज़ के पास और उन्होंने अपनी दिलकश आवाज़ से इस गीत को सजाकर हमारे सपने को पूर्णता प्रदान की। इस तरह से रिवाइव हो गया पहली बोलती फ़िल्म का पहला गीत "दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे"। दोस्तों, यह गीत भले ही १९३१ की फ़िल्म का गीत है, लेकिन क्योंकि आज २०१० में हम इसे रिवाइव कर रहे हैं, इसलिए इसका अंदाज़ भी हमने कुछ इसी ज़माने का रखा है। लेकिन इस बात का भी पूरा पूरा ध्यान रखा गया है कि मेलडी और गीत के मूड के साथ, उसके स्तर के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता ना करना पड़े। गीत कैसा बना है यह तो हम आप ही पर छोड़ते हैं। इस गीत के निर्माण से जुड़े प्रत्येक कलाकार ने अपनी तरफ़ से भरपूर कोशिश की है कि अपना बेस्ट इसमें दें, आगे आपकी राय सर आँखों पर। चूँकि कृष्ण और उनकी टीम की ये प्रविष्ठी इस प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ चुनी गयी है, इस टीम को दिया जा रहा है ५००० रूपए का नकद पुरस्कार. सलाम है 'आलम आरा' फ़िल्म से जुड़े समस्त कलाकारों को, जिनकी लगन और मेहनत ने बोलती फ़िल्मों का द्वार खोल दिया था इस देश में और साथ ही फ़िल्मी गीतों का भी।

और अब 'आलम आरा' से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें आपको बतायी जाए! इस फ़िल्म का निर्माण किया था अर्दशिर ईरानी और अब्दुल अली युसूफ़ भाई ने 'इम्पेरियल फ़िल्म कंपनी' के बैनर तले। यह फ़िल्म आंशिक रूप से सवाक थी। इस फ़िल्म को जिस तरह का पब्लिक रेस्पॊन्स मिला था, वह अकल्पनीय था। उस ज़माने में किसी फ़िल्म का टिकट चंद आने में मिल जाता था, लेकिन इस फ़िल्म के टिकट बिके ४ रूपए में, जो उस ज़माने के हिसाब से एक बहुत बड़ी रकम थी। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे मास्टर विट्ठल, ज़ुबेदा, पृथ्विराज कपूर, जिल्लो बाई, याकूब, जगदिश सेठी और वज़ीर मोहम्मद ख़ान। फ़िल्म का निर्देशन आर्दशिर ईरानी ने ही किया और कहा जाता है कि फ़िल्म के गानें भी उन्होंने ही लिखे और इनकी धुनें भी उन्होंने ही तय की थी, हालाँकि क्रेडिट्स में फ़ीरोज़शाह एम. मिस्त्री और बी. ईरानी के नाम दिए गये थे बतौर संगीतकार। 'आलम आरा' में कुल सात गानें थे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि १९४६ और १९७३ में 'आलम आरा' फ़िल्म फिर से बनी और इनमें भी वज़ीर मोहम्मद ख़ान ने अभिनय किया। ज़ुबेदा की आवाज़ में इस फ़िल्म का एक अन्य गीत "बदला दिलवाएगा या रब तू सितमगारों से" भी उस ज़माने में ख़ूब लोकप्रिय हुआ था। और अब हम आपके लिए कहीं से खोज लाये हैं आर्दशिर ईरानी के कहे हुए शब्द जो उन्होंने कहे थे इस फ़िल्म के गीतों के रेकॊर्डिंग् के बारे में - "There were no sound-proof stages, we preferred to shoot indoors and at night. Since our studio is located near a railway track most of our shooting was done between the hours that the trains ceased operation. We worked with a single system Tamar recording equipment. There were also no booms. Microphones had to be hidden in incredible places to keep out of camera range". 'आलम आरा' १४ मार्च १९३१ को प्रदर्शित हुई थी; २३ मार्च १९३१ को 'टाइम्स ऒफ़ इण्डिया' में एक शख़्स ने इस फ़िल्म की साउण्ड क्वालिटी के बारे में रिव्यू में लिखा था -"Principal interest naturally attaches to the voice production and synchronization. The latter is syllable perfect; the former is somewhat patchy, due to inexperience of the players in facing the microphone and a consequent tendency to talk too loudly". दोस्तों ये सब बातें पढ़कर कैसा रोमांच हो आता है न? कैसा रहा होगा उस ज़माने में फ़िल्म निर्माण के तौर तरीक़े, कैसे रेकॊर्ड होते होंगे गानें? कितनी कठिनाइयों, परेशानियों और सीमित साधनों के ज़रिए काम करना पड़ता होगा। उन अज़ीम फ़नकारों की मेहनत और लगन का ही नतीजा है, यह उसी का फल है कि हिंदी फ़िल्में आज समूचे विश्व में सर चढ़ कर बोल रहा है। तो आइए अब सुना जाए यह गीत; 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का ५००-वाँ अंक समर्पित है 'आलम आरा' फ़िल्म के पूरे टीम के नाम। हमें आपकी राय का इंतज़ार रहेगा, टिप्पणी के अलावा admin@radioplaybackindia.com पर भी आप अपनी राय भेज सकते हैं।

गीत - दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे (२०१० संस्करण)


क्या आप जानते हैं...
कि वज़ीर मोहम्मद ख़ान का १४ अक्तुबर १९७४ को निधन हो गया, यानी कि आज से ठीक ७ दिन बाद उनकी पुण्यतिथि है।

मेकिंग ऑफ़ "दे दे खुदा के नाम पर (२०१० संस्करण)" - गीत की टीम द्वारा

विशाल रोमी: मैं ईश्वर को धन्येवाद देता हूँ कि मुझे मौका मिला, कृष्ण (जो कि इस प्रोजेक्ट के प्रमुख हैं) की टीम के साथ काम करने का. कृष्ण राज ने हमेशा मेरी गलतियों को सुधारा है और मुझे बेहतर करने के लिए प्रेरित किया है. मनु ने भी बहुत अच्छे से इस गीत को निभाया है. ये बिलकुल अलग तरह का गीत था जिस पर काम करने में मुझे बहुत आनंद आया.

मनु वर्गीस: एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेने से अच्छा अनुभव और क्या होगा. मैं अपने मित्र कृष्ण राज का बेहद आभारी हूँ जिसने मुझे मेरे अब तक के सफर के सबसे बहतरीन इस गीत को गाने का मौका दिया. और यक़ीनन मैं परमेश्वर का धन्येवाद कहना चाहूँगा जिसने मुझे अपने राज्य से हिंदी का प्रतिनिधित्व करने का ये मौका दिया और इस गीत को गाने का अवसर प्रदान किया. अच्छे संगीत की जय हो, यही कामना है.

कृष्ण राज: यह तो एक बिलकुल ही जबरदस्त अनुभव था मेरे लिए. सच कहूँ तो मैं बहुत शंकित था कि क्या मैं इस गीत के साथ न्याय कर पाऊंगा. ये भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा का गीत है, जाहिर है जब हिंद युग्म इसे दुबारा से बनाने की योजना बनाएगा तो श्रोताओं की उम्मीदें बढ़ जायेगीं. ऐसे में मेरे शक अपनी जगह सही थे. इस गीत के मेकिंग के दौरान बहुत सी कठिनाईयां मेरे सामने आई. मसलन मैं बीमार पड़ गया. यही वजह थी कि मुझे गायन के लिए किसी और को चुनना पड़ा, ऐसे में मैंने अपने मित्र गायक मनु से आग्रह किया क्योंकि आवाज़ बहुत नर्म है और इस तरह के गानों पर जचती है, और मनु ने इसे बहुत बढ़िया से गाया. विशाल भी बहुत जबरदस्त गीटारिस्ट है. ईश्वर को धन्येवाद कि मुझे एक बहुत अच्छी टीम मिली हुई है. और अंत में शुक्रिया अदा करना चाहूँगा अपने साउंड इंजिनियर नितिन का जिन्होंने इस गीत को मिक्स किया, वो जो पीछे आप कोरस में आवाजें सुन रहे हैं वो भी नितिन की ही है, उम्मीद है कि हम सब आपकी अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगें.
कृष्ण राज
कृष्ण राज कुमार ने काव्यनाद प्रतियोगिता की हर कड़ी में भाग लिया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम! आज उनकी जय बोल' के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। कृष्ण राज कुमार जो मात्र २४ वर्ष के हैं, और B.Tech की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने संगीत करियर को सजाने सवांरने में जी जान से लगे हैं, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। अभी तीसरे सत्र में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया ऋषि ने अपने गीत लौट चल के लिए. ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

मनु वर्गीस
२५ वर्षीया गायक मनु वर्गीस कर्णाटक संगीत की शिक्षा ले रहे हैं श्री पी आर मुरली से. कुछ समय के लिए 'टीम ध्वनि" का हिस्सा रहे, और उनकी पहली अल्बम स्लेमबुक में एक सोलो गीत भी गाया. कोच्ची के मशहूर संगीतकार जैरी अमल्देव के साथ पिछले २ वर्षों से कार्यरत हैं. कोच्ची में आयोजित रफ़ी साहब के गीतों की एक प्रतियोगिता में पहला स्थान प्राप्त कर चुके हैं. कुछ आत्मीय अलबमों में काम कर चुके हैं और "कैरली" टी वी पर भी कुछ कार्यक्रमों का भी हिस्सा रह चुके हैं मनु.

विशाल रोमी
विशाल एक वित्तीय कंपनी में कार्यरत हैं और संगीत में बतौर गीटार वादक अपनी पहचान बनाने में सक्रीय हैं. विशाल पिछले ६ सालों के इस वाध्य की शिक्षा ले रहे हैं. कृष्ण राज की टीम में उनके साथ कई प्रोजेक्ट्स कर चुके हैं. यह युवा गीटार वादक संगीत के क्षेत्र में अपनी खास पहचान बनाने की प्रबल इच्छा रखता है.

Song - De De Khuda Ke Naam Par (2010 edition, The Returns Of Alam Aara)
Music - Krishn Raj Kumar
Lyrics - Adarshir Irani, Nikhil Aanand Giri, and Swapnil Tiwari Aatish.
Guitor - Vishaal Romi
Vocal - Manu Varghese
Mixing - Nitin

Original Composition covered under Creative Commons license. All rights reserved with Hind yugm and the Artists concerned.

Friday, April 23, 2010

मन के बंद कमरों को लौट चलने की सलाह देता एक रॉक गीत कृष्ण राजकुमार की आवाज़ में

Season 3 of new Music, Song # 04


दोस्तों, आवाज़ संगीत महोत्सव, सत्र ३ के चौथे गीत की है आज बारी. बतौर संगीतकार- गीतकार जोड़ी में ऋषि एस और सजीव सारथी ने गुजरे पिछले दो सत्रों में सुबह की ताजगी, मैं नदी, जीत के गीत, और वन वर्ल्ड, जैसे बेहद चर्चित और लोकप्रिय गीत आपकी नज़र किये हैं. इस सत्र में ये पहली बार आज साथ आ रहे हैं संगीत का एक नया (कम से कम युग्म के लिए) जॉनर लेकर, जी हाँ रॉक संगीत है आज का मीनू, रॉक संगीत में मुख्यता लीड और बेस गिटार का इस्तेमाल होता है जिसके साथ ताल के लिए ड्रम का प्रयोग होता है, अमूमन इस तरह के गीतों में एक लीड गायक/गायिका को सहयोग देने को एक या अधिक बैक अप आवाजें भी होती हैं. रॉक हार्ड और सोफ्ट हो सकता है. सोफ्ट रॉक अक्सर एक खास थीम को लेकर रचा जाता है. फिल्म "रॉक ऑन" के गीत इसके उदाहरण हैं. इसी तरह के एक थीम को लेकर रचा गया आज का ये सोफ्ट रॉक गीत है कृष्ण राज कुमार की आवाज़ में, जिन्हें ऋषि ने खुद अपनी आवाज़ में बैक अप दिया है. कृष्ण राज कुमार बतौर संगीत/गायक युग्म में पधारे थे "राहतें सारी" गीत के साथ. काव्यनाद के लिए आयोजित प्रतियोगिताओं में इन्होने अपने संगीत और गायन का उन्दा उदाहरण सामने रखा हर बार, और हर बार ही किसी न किसी सम्मान के ये हक़दार बनें. काव्यनाद में इनकी आवाज़ में दो शानदार गीत हैं, जिन्हें खासी सराहना मिली है. "अरुण ये मधुमय देश हमारा" राष्ट्रीय एफ एम् चैनल "एफ एम् रेनबो" से बज चुका है. तो सुनिए आज की ये प्रस्तुति और अपने स्नेह सुझावों से इन कलाकारों का मार्गदर्शन करें.

गीत के बोल -

ये गलियां, रंग रलियाँ,
ये तेरी नहीं हैं,
तेरा नहीं है जो उसे अब छोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...
इस शोर के जंगल से निकल,
रफ़्तार के दल दल में बस,
तन्हाईयाँ है, बेजारियां है,
इस दौड से मुंह मोड चल,
लौट चल...लौट चल...

तुने देखा है फलक को कफस से आज तक,
कभी पंख फैला और उड़ने की कोशिश तो कर,
जो ये जहाँ है, बस एक गुमाँ है,
सारे भरम अब तोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...

तू बन्दा अपने खुदा का है, तेरा सानी कौन है,
एक मकसद है यहाँ हर शय का बेमानी कौन है,
उसका निशाँ है, तू जो यहाँ है,
खुद को खुदी से अब जोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...

इस धूप के परे भी है एक आसमां,
एक नूर से रोशन है वो तेरा जहाँ,
एक आसमां है, तेरा जहाँ है,
अपनी जमीं को अब खोज चल,
लौट चल...लौट चल...
लौट चल...आ लौट चल



मेकिंग ऑफ़ "लौट चल" - गीत की टीम द्वारा

ऋषि एस- "लौट चल" एक और कोशिश है सामान्य रोमांटिक गीतों से कुछ अलग करने का, एक थीम और उसमें छुपे सन्देश को युवाओं की अभिरुचि अनुरूप रॉक अंदाज़ में इसे किया गया है

कृष्ण राजकुमार- ऋषि ने करीब ५-६ महीने पहले मुझे इस गीत के लिए संपर्क किया था, वो किसी रॉक संगीत मुकाबले के लिए इसे भेजना चाहते थे, मुझे शक था कि क्या मैं रॉक गीत को निभा पाऊंगा, पर ऋषि ने मुझे पर विश्वास किया. और ईश्वर की कृपा से मुझे लगता है कि कुछ हद तक मैं इस गीत के साथ न्याय कर पाया हूँ, बाकी तो आप श्रोता ही बेहतर बता सकते हैं. मैं ऋषि का शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे इस गीत के काबिल समझा.

सजीव सारथी-ये गीत लगभग ५-६ महीने पहले बना था, एक दिन ऋषि कहने लगे कि कुछ अलग करना चाहिए, उस दिन वो कुछ दार्शनिक जैसी बातें कर रहे थे, मैंने कहा गीत तो हमारे किसी भी एक खास ख़याल से पैदा हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि फिर आप कोई नयी थीम पर लिखिए, मैंने कहा लीजिए आज हम जिस विषय पर बात कर रहे हैं इसी पर आपको कुछ लिख कर भेजता हूँ, अमूमन मेरी और ऋषि की जब भी बात होती है संगीत से सम्बंधित ही होती है उसी से फुर्सत नहीं मिलती कि कुछ और कहा सुना जाए, मगर उस दिन हम कुछ इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे, जो इस गीत का भी थीम है, दुनिया की दौड धूप जो शायद हमने खुद अपने ऊपर थोपी हुई है उससे अलग एक दुनिया है हमारे ही भीतर जिसे शास्त्रों में स्वर्ग जन्नत आदि नाम दिए गए हैं, जहाँ कविता है संगीत है रचनात्मकता है, और आप खुद है अपने वास्तविक स्वरुप में, तमाम वर्जनाओं से पृथक...खैर अब आप बताएं कि इस विषय पर आप क्या सोचते हैं और अपने इस गीत के माध्यम किस हद तक मैं इस बात को कहने में सफल हो पाया हूँ

ऋषि एस॰
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

कृष्ण राजकुमार
कृष्ण राज कुमार ने इस प्रतियोगिता की हर कड़ी में भाग लिया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम! आज उनकी जय बोल' के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। और इस बार भी इन्होंने पहला स्थान बनाया है। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।
Song - Laut Chal
Voices - Krishna Raajkumar, Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Sajeev Sarathie
Graphics - Samarth Garg


Song # 04, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Tuesday, December 15, 2009

इस बार नर हो न निराश करो मन को संगीतबद्ध हुआ

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-6: नर हो न निराश करो मन को

आज हम हाज़िर हैं 6वीं गीतकास्ट प्रतियोगिता के परिणामों को लेकर और साथ में है एक खुशख़बरी। हिन्द-युग्म अब तक इस प्रतियोगिता के माध्यम से जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और मैथिलीशरण गुप्त की एक-एक कविता संगीतबद्ध करा चुका है। इस प्रतियोगिता के आयोजित करने में हमें पूरी तरह से मदद मिली है अप्रवासी हिन्दी प्रेमियों की। खुशख़बरी यह कि ऐसे ही अप्रवासी हिन्दी प्रेमियों की मदद से हम इन 6 कविताओं की बेहतर रिकॉर्डिंगों को ऑडियो एल्बम की शक्ल दे रहे हैं और उसे लेकर आ रहे हैं 30 जनवरी 2010 से 7 फरवरी 2010 के मध्य नई दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले 19वें विश्व पुस्तक मेला में। इस माध्यम से हम इस कवियों की अमर कविताओं को कई लाख लोगों तक पहुँचा ही पायेंगे साथ ही साथ नव गायकों और संगीतकारों को भी एक वैश्विक मंच दे पायेंगे।

6वीं गीतकास्ट प्रतियोगिता में हमने मैथिली शरण गुप्त की प्रतिनिधि कविता 'नर हो न निराश करो मन को' को संगीतबद्ध करने की प्रतियोगिता रखी थी। इसमें हमें कुल 9 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुई। लेकिन इस बार हमारे निर्णायकों ने अलग-अलग प्रविष्टियों पर अपनी मुहर लगाई। तो निश्चित रूप से नियंत्रक के लिए मुश्किल होनी थी। अतः हमने तीन प्रविष्टियों को संयुक्त रूप से विजेता घोषित करने का निश्चय है। आइए मिलते हैं विजेताओं से और उनके हुनर से भी।


कृष्ण राज कुमार

कृष्ण राज कुमार ने इस प्रतियोगिता की हर कड़ी में भाग लिया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम! आज उनकी जय बोल' के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। और इस बार भी इन्होंने पहला स्थान बनाया है। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-




रफ़ीक़ शेख़

रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। गीतकास्ट प्रतियोगिता में ही रफ़ीक़ शेख़ ने निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' को संगीतबद्ध करके दूसरा स्थान बनाया था।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


(संगीत संयोजन, मिक्सिंग और और रिकॉर्डिंग- अनिमेश श्रीवास्तव)



श्रीनिवास / शम्पक चक्रवर्ती

श्रीनिवास

शम्पक
संगीतकार श्रीनिवास पांडा बहुत ही मेहनती संगीतकार हैं। हर बार किसी नये गायक को अपने कम्पोजिशन से जोड़ते हैं और उसे एक बड़ा मंच देते हैं। इस बार भी इन्होंने शम्पक चक्रवर्ती नामक युवा गायक को हिन्द-युग्म से जोड़ा है। शम्पक कोलकाता से ताल्लुक रखते हैं। 24 वर्षीय शम्पक के संगीत का शौक रखते हैं। बचपन से ही गा रहे हैं और मानते हैं कि यह कला उन्हें ईश्वरीय वरदान के रूप में मिली है।

मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं। गीतकास्ट में लगातार चार बार विजेता रह चुके हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


इनके अतिरिक्त हम प्रतीक खरे, प्रो॰ (डॉ॰) एन॰ पाण्डेय, मधुबाला श्रीवास्तव, शरद तैलंग, सुषमा श्रीवास्तव, ब्रजेश दाधीच इत्यादि के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है।


इस कड़ी के प्रायोजक आयरलैंड के क्विन्स विश्वविद्यालय के शोधछात्र दीपक मशाल और उनके कुछ साथी हैं। यह हिन्द-युग्म का सौभाग्य है कि इस प्रतियोगिता के आयोजन में ऐसे ही हिन्दी प्रेमियों की वजह से इस प्रतियोगिता के आयोजन में कभी कोई बाधा नहीं आई।

Sunday, October 11, 2009

कलम, आज उनकी जय बोल कविता की संगीतमयी प्रस्तुति

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-5: कलम, आज उनकी जय बोल

मई 2009 में जब गीतकास्ट प्रतियोगिता की शुरूआत हुई थी, तब हमने आदित्य प्रकाश के साथ मिलकर इतना ही तय किया था कि हम छायावादी युगीन कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध करने की प्रतियोगिता रखेंगे। आरम्भ की दो कड़ियों की सफलता के बाद हमने यह तय किया कि गीतकास्ट प्रतियोगिता में प्रमुख राष्ट्रकवियों की कविताओं को भी शामिल किया जाय। कमल किशोर सिंह जैसे सहयोगियों की मदद से हमने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम, आज उनकी जय बोल' से गीतकास्ट प्रतियोगिता की 'राष्ट्रकवि शृंखला' की शुरूआत भी कर दी।

आज हम पाँचवीं गीतकास्ट प्रतियोगिता के परिणाम लेकर उपस्थित हैं। पिछले महीने राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती थी, इसलिए हमने उनके सम्मान में उनकी कविता को स्वरबद्ध करने की प्रतियोगिता रखी। इस प्रतियोगिता में कुल सात प्रतिभागियों ने भाग लिया। संख्या के हिसाब से यह प्रतिभागिता तो कम है, लेकिन गुणवत्ता के हिसाब से यह बहुत बढ़िया है। सजीव सारथी, अनुराग पाण्डेय, शैलेश भारतवासी और आदित्य प्रकाश ने निर्णायक की भूमिका निभाई और तीसरी बार श्रीनिवास पंडा की प्रविष्टि को ही प्रथम चुना है।

इस बार से इनाम की राशि रु 4000 से बढ़ाकर रु 7000 की गई है।

इससे पहले की हम प्रविष्टियों के बारे में बात करें, हम श्रीनिवास की तारीफ़ कर लेना चाहेंगे। श्रीनिवास के रूप हिन्दी साहित्य-जगत और संगीत-जगत को एक बड़ा सितारा मिला है। श्रीनिवास कविता के भावों को पकड‌़ते हैं, समझते हैं और उसी के हिसाब संगीत देते हैं और गायक चुनते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि श्रीनिवास निकट भविष्य में हिन्दी संगीत जगत को बहुत कुछ देंगे।


श्रीनिवास / प्रदीप सोमसुंदरन / निखिल आनंद गिरि
श्रीनिवास
प्रदीप
निखिल
संगीतकार श्रीनिवास पांडा ने इस बार एक स्टार गायक को इस आयोजन से जोड़ा है। उस गायक का नाम है प्रदीप सोमसुंदरन। जो लोग टीवी पर म्यूजिकल शो देखने के शौक़ीन हैं, उन्होंने भारतीय टेलीविजन पर पहले सांगैतिक आयोजन 'मेरी आवाज़ सुनो' को ज़रूर देखा होगा। प्रदीप सोमसुंदरन को इसी कार्यक्रम में सन 1996 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक चुना गया था और लता मंगेशकर सम्मान से सम्मानित किया गया था। 26 जनवरी 1967 को नेल्लूवया, नेल्लूर, केरल में जन्मे प्रदीप पेशे से इलेक्ट्रानिक के प्राध्यापक हैं। त्रिचुर की श्रीमती गीता रानी से 12 वर्ष की अवस्था में ही प्रदीप ने कर्नाटक-संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दी थी और 16 वर्ष की अवस्था में स्टेज-परफॉर्मेन्स देने लेगे थे। प्रदीप कनार्टक शास्त्रीय गायन के अतिरिक्त हिन्दी, मलयालम, तमिल, तेलगू, अंग्रेज़ी और जापानी आदि भाषाओं में ग़ज़लें और भजन गाते हैं। इन्होंने कई मलयालम फिल्मी गीतों में अपनी आवाज़ दी है। और गैर मलयालम फिल्मी तथा गैर हिन्दी फिल्मी गीतों में ये काफी चर्चित रहे हैं। वस्तुतः इनका परिचय और इनकी उपलब्धियाँ इतनी अधिक हैं कि यह परिणाम फिर केवल उन्हीं की चर्चा बनकर ही रह जायेगा। जो श्रोता प्रदीप के बारे में अधिक जानने को इच्छुक हैं वे प्रदीप के वीकिपीडिया पृष्ठ और इनकी निजी वेबसाइट देखें।

इस गीत में शुरूआती उद्‍घोष में आवाज़ हिन्द-युग्म के मशहूर वाहक निखिल आनंद गिरि की है। निखिल की आवाज़ के हिन्द-युग्म के सभी श्रोता कायल हैं। हमारे सभी ज़िंगलों में इनकी ही आवाज़ गूँजती है। मन से कवि हैं, लेकिन इन दिनों रोज़ी-रोटी के लिए ज़ी (यूपी) चैनल की नौकरी कर रहे हैं। हिन्द-युग्म के बैठक-मंच के संपादक है।

मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं। गीतकास्ट में लगातार तीन बार विजेता रह चुके हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 4000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-


दूसरे स्थान के विजता एक बार फिर से कृष्ण राज कुमार हैं।


कृष्ण राज कुमार

कृष्ण राज कुमार एक मात्र ऐसे संगीतकार-गायक हैं, जिन्होंने पाँचों दफ़ा इस प्रतियोगिता में भाग लिया। और इन्होंने मात्र भाग ही नहीं लिया, बल्कि पाँचों बार हमारे निर्णायकों का ध्यान आकृष्ट किया। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। और इस बार द्वितीय पुरस्कार। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

पुरस्कार- द्वितीय पुरस्कार, रु 1500 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-



हमने इस बार तृतीय स्थान के किसी को भी विजेता न घोषित कर तीन प्रविष्टियों को रु 500- रु 500 के सांत्वना पुरस्कार दे रहे हैं।


सुकून बैंड
यह दो युवाओं सौरभ मल्होत्रा और भरत हंस का सांगैतिक बैंड है, इनमें बहुत जोश है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में इनसे बेहतर कम्पोजिशन मिलेंगे।

पुरस्कार- सांत्वना पुरस्कार, रु 500 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


शरद तैलंग

शरद तैलंग महादेवी वर्मा की कविता को संगीतबद्ध कर चुके हैं और तीसरे स्थान के विजेता रहे हैं। इस बार भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय रही।

पुरस्कार- सांत्वना पुरस्कार, रु 500 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


मधुबाला श्रीवास्तव

मधुबाला नई गायिका हैं। इनके बारे में अधिक जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है।

पुरस्कार- सांत्वना पुरस्कार, रु 500 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-



इनके अतिरिक्त हम सखी सिंह और ब्रजेश दाधीच के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है। हम निवेदन करेंगे कि आप इसी ऊर्जा के साथ गीतकास्ट के अन्य अंक में भी भाग लेते रहें।


इस कड़ी के प्रायोजक है रिवरहेड, न्यूयार्क के कमल किशोर सिंह हैं। पेशे से डॉक्टर हैं। हिन्दी तथा भोजपुरी में कविताएँ लिखते हैं। आवाज़ की गीतकास्ट प्रतियोगिता में हर बार ज़रूर भाग लेते हैं। यदि आप भी इस आयोजन को स्पॉनसर करता चाहते हैं तो hindyugm@gmail.com पर सम्पर्क करें।








Sunday, September 13, 2009

महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' का संगीतबद्ध रूप

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-4: जो तुम आ जाते एक बार

हर वर्ष 14 सितम्बर का दिन हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। हिन्दी सेवी संस्थाएँ तरह-तरह के सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन करती हैं। सरकारी उपक्रम तो हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा व हिन्दी मास अभियान चलाने जैसी बातें करते हैं। लेकिन हम ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। बल्कि इससे एक दिन पहले महीयसी महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' का संगीतबद्ध संस्करण जारी कर रहे हैं।

हिन्द-युग्म डॉट कॉम अपने आवाज़ मंच पर गीतकास्ट प्रतियोगिता के माध्यम से हिन्दी के स्तम्भ कवियों की एक-एक कविताओं को संगीतबद्ध/स्वरबद्ध करने की प्रतियोगिता आयोजित करता है। इसमें हमने शुरूआती शृंखला के तौर पर छायवादी युगीन कवियों की कविताओं को स्वरबद्ध करने की प्रतियोगिता रखी। जिसके अंतर्गत अब तक जयशंकर प्रसाद की कविता ' अरुण यह मधुमय देश हमारा', सुमित्रानंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' को संगीतबद्ध किया जा चुका है। आज हम छायावादी युग की अंतिम कड़ी यानी महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' का परिणाम लेकर हाज़िर हैं।

जब हमें लगा कि कविता को स्वरबद्ध करना मुश्किल है, तब हमें बहुत अधिक प्रविष्टियाँ मिली। जबकि इस बार हमें महसूस हो रहा था कि महादेवी वर्मा की यह कविता बहुत आसानी से संगीतबद्ध हो जायेगी तो मात्र 10 प्रतिभागियों ने इसमें भाग लिया। लेकिन सजीव सारथी, अनुराग शर्मा, यूनुस खान, आदित्य प्रकाश और शैलेश भारतवासी सरीखे निर्णायकों ने कहा कि इस बार संगीत संयोजन, गायकी और उच्चारण के स्तर पर प्रविष्टियाँ पहले से कहीं बेहतर हैं। तब हमें बहुत संतोष भी मिला।

पाँच जजों द्वारा मिले औसत अंकों के आधार में हमने कृष्ण राज कुमार और श्रीनिवास पांडा/कुहू गुप्ता को संयुक्त विजेता घोषित करने का निर्णय लिया है। इस तरह से प्रथम स्थान के लिए निर्धारित रु 2000 और दूसरे स्थान के निर्धारित के लिए निर्धारित रु 1000 को जोड़कर आधी-आधी राशि इन दो विजेताओं (विजेता समूहों) को दी जायेगी।

आपको याद होगा की श्रीनिवास पांडा के संगीत-निर्देशन में बिस्वजीत नंदा द्वारा गायी गई निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' को भी पहला स्थान प्राप्त हुआ था। इस बार संगीतकार श्रीनिवास ने कुहू गुप्ता के रूप में बहुत ऊर्जावान गायिका हिन्द-युग्म को दिया है।


श्रीनिवास/कुहू

श्रीनिवास
कुहू
कुहू युग्म पर पहली बार शिरकत कर रही हैं। पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 5 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं।

श्रीनिवास हिन्द-युग्म के लिए बिलकुल नये संगीतकार हैं। 'स्नेह-निर्झर बह गया है' के माध्यम से आवाज़ पर इन्होंने अपनी एंट्री की थी। मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 1500 का नग़द पुरस्कार

विशेष- अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-
64kbps

128kbps



इसी स्थान पर कृष्ण राजकुमार की प्रविष्टि भी शामिल है।


कृष्ण राज कुमार

कृष्ण राज कुमार एक ऐसे गायक-संगीतकार हैं जिनके बारे में जानकर और सुनकर हर किसी को सलाम करने का मन करता है। गीतकास्ट प्रतियोगिता अभी तक 4 बार आयोजित हुई है, इन्होंने चारों दफा इसमें भाग लिया है और निर्णायकों का ध्यान आकृष्ट किया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार और इस बार महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 1500 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-
64kbps

128kbps



तीसरे स्थान के विजेता आवाज़ के दैनिक श्रोता हैं। ओल्ड इज़ गोल्ड के गेस्ट-होस्ट रह चुके हैं। आवाज़ से ही कैरिऑके में अपनी आवाज़ डालना सीखे हैं और आज तीसरे स्थान के विजेता हैं। इस प्रविष्टि में संगीत इनका है और संगीत संयोजन इनके मित्र ब्रजेश दाधीच का। आवाज़ भी इन्हीं की है।


शरद तैलंग

शरद तैलंग सुगम संगीत के आकाशवाणी कलाकार, कवि, रंगकर्मी और राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य हैं। वे भारत विकास परिषद के अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय सम्मेलन के सांस्कृतिक सचिव भी रह चुके हैं।

आप अनेक साहित्यिक व संगीत संस्थाओँ के सदस्य अथवा पदाधिकारी रह चुके है, अनेकों संगीत एवं नाट्य प्रतियोगिताओँ में निर्णायक रह चुके हैं तथा देश के केरल, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र प्रदेशों के अनेक शहरों में अपनी संगीत प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं। आपकी रचनाएँ देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओँ जैसे धर्मयुग, हंस, मरु गुलशन, मरु चक्र, सौगात, राजस्थान पत्रिका, राष्ट्रदूत, माधुरी, दैनिक भास्कर आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं।

ऑल इण्डिया आर्टिस्ट एसोसिएशन शिमला, जिला प्रशासन कोटा आई. एल. क्लब तथा अनेक संस्थानों द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका हैं। आप आवाज़ पर बहुचर्चित स्तम्भ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अतिथि-होस्ट रह चुके हैं।

पुरस्कार- तृतीय पुरस्कार, रु 1000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-
64kbps

128kbps



इनके अतिरिक्त हम रफ़ीक शेख, कमल किशोर सिंह, रमेश धुस्सा, अम्बरीष श्रीवास्तव, शारदा अरोरा, कमलप्रीत सिंह, और अर्चना चाओजी इत्यादि के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है। हम निवेदन करेंगे कि आप इसी ऊर्जा के साथ गीतकास्ट के अन्य अंक में भी भाग लेते रहें।


इस कड़ी के प्रायोजक है डैलास, अमेरिका के अशोक कुमार हैं जो पिछले 30 सालों से अमेरिका में हैं, आई आई टी, दिल्ली के प्रोडक्ट हैं। डैलास, अमेरिका में भौतिकी के प्रोफेसर हैं, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के आजीवन सदस्य हैं। और हिन्दी-सेवा के लिए डैलास में एक सक्रिय नाम हैं। यदि आप भी इस आयोजन को स्पॉनसर करता चाहते हैं तो hindyugm@gmail.com पर सम्पर्क करें।

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