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Sunday, April 3, 2016

विविध शैलियों में होली : SWARGOSHTHI – 264 : HOLI SONGS




स्वरगोष्ठी – 264 में आज

होली और चैती के रंग – 2 : विविध शैलियों और रागों में होली

धमार, ठुमरी और फिल्मी गीत में फागुनी रचनाएँ





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। अबीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच हम ‘स्वरगोष्ठी’ की इन प्रस्तुतियों के माध्यम से फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर हो रहे हैं। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाते हैं। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। पिछले अंक में हमने आपको राग काफी के स्वरों पर तैरती कुछ फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कराया था, आज के अंक में हम आपको धमार, ठुमरी और फिल्म शैली की कुछ रचनाएँ सुनवा रहे हैं।



गुंडेचा बन्धु
भारतीय पर्वों में होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें संगीत-नृत्य की प्रमुख भूमिका होती है। जनसामान्य अपने उल्लास को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से देशज संगीत का सहारा लेता है। इस अवसर पर प्रस्तुत की जाने वाली रचनाओं में लोक-संगीत की प्रधानता के बावजूद सभी भारतीय संगीत शैलियों में होली की रचनाएँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं। आज के अंक में हम आपके लिए कुछ संगीत शैलियों में रंगोत्सव के चुनिन्दा गीतों पर चर्चा करेंगे। भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। इस शैली के अन्तर्गत धमार गायकी तो पूरी तरह रंगों के पर्व पर ही केन्द्रित रहती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला 14 मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली का वर्णन मिलता है। कुछ धमार रचनाओं में फाल्गुनी परिवेश का चित्रण भी होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको धमार गायकी के माध्यम से रंगोत्सव का एक अलग रंग दिखाने का प्रयास करेंगे।

ध्रुवपद-धमार गायकी में एक युगल गायक हैं- गुंडेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा), जिन्हें देश-विदेश में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से ‘स्वरगोष्ठी’ के होली अंकों के लिए हमने एक धमार अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध का मान रखते हुए रमाकान्त गुंडेचा ने हमें तत्काल राग केदार का यह मनमोहक धमार, आपको सुनवाने के लिए उपलब्ध कराया। गुंडेचा बन्धु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, राग केदार का यह धमार प्रस्तुत है।


धमार- केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : स्वर – रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा


पं. छन्नूलाल मिश्र
इस अंक के आरम्भ में हमने इस तथ्य को रेखांकित किया था की भारतीय संगीत की सभी शैलियों में होली के गीत मिलते हैं। परन्तु लोक शैली में होली गीतों का सौन्दर्य निराला होता है। वह भी तब, जब ऐसी रचना किसी शास्त्रीय गायक द्वारा प्रस्तुत की गई हो। मेरे मित्र, संगीत समीक्षक और हाथरस से प्रकाशित प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका- ‘संगीत’ के परामर्शदाता मुकेश गर्ग ने इस तथ्य को इन शब्दों में रेखांकित किया है- "हिन्दुस्तानी संगीत में होली की जगह कुछ अलग ही है. ध्रुपद शैली की धमार गायकी से लेकर ख़याल और ठुमरी गायकी तक इस रंग-बिरंगे त्योहार का उल्लास देखते ही बनता है। इन गायन-शैलियों में संयोग श्रृंगार के ढेरों चित्र तो मिलते ही हैं, वियोग की पीड़ा को दर्शाने वाली ठुमरियों की भी कोई कमी नहीं। यहाँ तक कि ठुमरी का एक प्रकार तो 'होरी' या 'होली' नाम से ही जाना जाता है।" इन ठुमरियों ने शब्द और स्वर दोनों स्तरों पर बहुत कुछ लोक-संगीत से ग्रहण किया है।’ लोक संगीत की इस महत्ता को स्वीकारती हुई लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) की सेवानिवृत्त प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव का मत है कि भारतीय संगीत के कई राग, लोक संगीत की धुनों पर ही निर्मित है। राग पीलू, पहाड़ी, माँड़ आदि का उदगम लोक संगीत से ही हुआ है। आइए अब आपको होली की एक लोक संगीत की रचना उपशास्त्रीय दादरा अंग में सुनवाते हैं, वरिष्ठ शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से।


शिव की होली : ‘खेले मसाने की होली दिगम्बर...’ : स्वर – पं. छन्नूलाल मिश्र


आरती अंकलीकर
रंगोत्सव के उल्लासपूर्ण परिवेश में फाल्गुनी संगीत-रचनाओं का सिलसिला जारी रखते हुए अब हम आपको एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह फिल्मी गीत होते हुए भी ठुमरी अंग में प्रस्तुत की गई है। 1996 में एक संगीत-प्रधान फिल्म, ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग की एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। यूँ तो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग का एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। फिल्म में यह गीत आशा भोसले और आरती अंकलीकर की आवाज़ में दो अलग-अलग प्रसंगों में फिल्माया गया है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली का रंग किस खूबी से निखरता हैं।


राग - पीलू : फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : आरती अंकलीकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 264वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 266वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 262 की संगीत पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- मुख्य गायक – मोहम्मद रफी

इस बार की पहेली में कुल छः प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया है। हमारी नई प्रतिभागी मुम्बई, महाराष्ट्र से मीरा ठाकुर हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लिया है और पहेली का एकदम सही उत्तर दिया है। संगीत-प्रेमियों के इस परिवार में मीरा जी को शामिल करते हुए उनका हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे विविध शैलियों में होली गीतों पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, March 23, 2014

फिल्मों के राग आधारित होली गीत


स्वरगोष्ठी – 160 में आज

रागों के रस-रंग से अभिसिंचित फिल्मों में राधाकृष्ण की होली


‘बिरज में होली खेलत नन्दलाल...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली कड़ी में अबीर-गुलाल के उड़ते सतरंगी बादलों के बीच सप्तस्वरों के माध्यम से सजाई गई महफिल में आपने धमार के माध्यम से होली के मदमाते परिवेश की सार्थक अनुभूति की है। हम यह चर्चा पहले भी कर चुके हैं कि भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी रचनाएँ मौजूद हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। इस श्रृंखला में अब तक हमने फिल्म संगीत के अलावा संगीत की इन सभी शैलियों में से रचनाएँ चुनी हैं। आज के अंक में हम विभिन्न रागों पर आधारित कुछ फिल्मी होली गीत लेकर आपके बीच उपस्थित हुए हैं। आज हम आपको राग काफी, पीलू और भैरवी पर आधारित फिल्मी होली गीत सुनवा रहे हैं। 



सांस्कृतिक दृष्टि से ब्रज की होली और इस अवसर के संगीत-नृत्य की परम्परा विख्यात है। फिल्मों में भी ब्रज की होली के प्रसंग खूब चित्रित हुए हैं। आज के अंक में प्रस्तुत किये जाने वाले तीनों गीत राधाकृष्ण की होली से जुड़े हुए हैं। हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग काफी है। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जाती हैं। राग काफी पर आधारित एक बेहद आकर्षक गीत 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से हमने लिया है। यह फिल्म उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी। फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर थे। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत की शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हम राग काफी के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म ‘गोदान’ के इस होली गीत का।


फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : संगीत – पं. रविशंकर : मोहम्मद रफी और साथी



यूँ तो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग का एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। फिल्म में यह गीत आशा भोसले और आरती अंकलीकर की आवाज़ में दो अलग-अलग प्रसंगों में फिल्माया गया है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस खूबी से निखरता हैं।


फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : संगीत – वनराज भाटिया : आरती अंकलीकर



रंग-रंगीली होली के समापन पर्व पर ‘स्वरगोष्ठी’ की इस विशेष श्रृंखला का समापन हम संगीत के मंचों की परम्परा के अनुसार राग भैरवी की एक ऐतिहासिक महत्त्व की रचना से करेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दो दशकों में दिल्ली में ठुमरी के कई गायक और रचनाकार हुए, जिन्होंने इस शैली को समृद्धि प्रदान की। इन्हीं में एक थे गोस्वामी श्रीलाल, जिन्होंने ‘पछाही ठुमरी’ (पश्चिमी ठुमरी) को विकसित किया था। इनका जन्म 1860 में दिल्ली के एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। संगीत की शिक्षा इन्हें अपने पिता गोस्वामी कीर्तिलाल से प्राप्त हुई थी। ये सितारवादन में भी प्रवीण थे। ‘कुँवरश्याम’ उपनाम से उन्होने अनेक ध्रुवपद, धमार, ख़याल, ठुमरी आदि की रचनाएँ की। इनका संगीत स्वान्तःसुखाय और अपने आराध्य भगवान् श्रीकृष्ण को सुनाने के लिए ही था। जीवन भर इन्होने किशोरीरमण मन्दिर से बाहर कहीं भी अपने संगीत का प्रदर्शन नहीं किया। इनकी ठुमरी रचनाएँ कृष्णलीला प्रधान तथा स्वर, ताल और साहित्य की दृष्टि से अति उत्तम है। राग भैरवी की ठुमरी- ‘बाट चलत नई चुनरी रंग डारी श्याम...’, कुँवरश्याम जी की सुप्रसिद्ध रचना है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भी देवालय संगीत की परम्परा कहीं-कहीं दीख पड़ती थी। संगीतज्ञ कुँवरश्याम इसी परम्परा के संवाहक और पोषक थे। आज हम यही पसिद्ध ठुमरी आपको सुनवाएँगे। राधाकृष्ण की होली के रंगों से सराबोर इस ठुमरी अनेक सुप्रसिद्ध गायकों ने स्वर दिया है। 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘लड़की’ में गायिका गीता दत्त ने और 1957 की फिल्म ‘रानी रूपमती’ में कृष्णराव चोनकर और मुहम्मद रफी ने भी इस ठुमरी को अपना स्वर दिया था। राग भैरवी के स्वरों पर आधारित यह ठुमरी अब हम प्रस्तुत कर रहे है। पार्श्वगायिका गीता दत्त की आवाज़ में फिल्म ‘लड़की’ के इस गीत का संगीत धनीराम और आर. सुदर्शनम् ने दिया था। आप राग भैरवी के स्वरों में राधाकृष्ण की होली का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक और इस लघु श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – लड़की : ‘बाट चालत नई चुनरी रंग डारी श्याम...’ : संगीत – धनीराम और आर. सुदर्शनम् : गीता दत्त





आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक फिल्म संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 162वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 158वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित आशीष सांकृत्यायन के स्वरों में एक धमार रचना का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- धमार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दूसरे प्रश्न में राग पहचानने में भूल की है। अतः उन्हें इस पहेली में केवल एक अंक ही मिलेगा। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में बसन्तोत्सव पर केन्द्रित लघु श्रृंखला जारी है। अभी तक आपने फाल्गुनी रस-रंग में पगी रचनाओं का आनन्द लिया। अगले अंक में हम एक और ऋतु आधारित संगीत शैली पर आपसे चर्चा करेंगे। आप अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, March 11, 2012

स्वरगोष्ठी – 61 विविध संगीत शैलियो में होली के इन्द्रधनुषी रंग

स्वरगोष्ठी – ६१ में आज

‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम.....’

भारतीय पर्वों में होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें संगीत-नृत्य की प्रमुख भूमिका होती है। जनसामान्य अपने उल्लास को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से देशज संगीत का सहारा लेता है। इस अवसर पर प्रस्तुत की जाने वाली रचनाओं में लोक-संगीत की प्रधानता के बावजूद सभी भारतीय संगीत शैलियों में होली की रचनाएँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं। आज के अंक में हम आपके लिए कुछ संगीत शैलियों में रंगोत्सव के चुनिन्दा गीतों पर चर्चा करेंगे।    



न्द्रधनुषी रंगों में भींगे तन-मन लिये ‘स्वरगोष्ठी’ के अपने समस्त पाठकों-श्रोताओं का, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः अबीर-गुलाल के साथ स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। रंगोत्सव के उल्लासपूर्ण परिवेश में ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में हमने आपके लिए राग काफी में निबद्ध कुछ संगीत-रचनाओं को प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम यह सिलसिला जारी रखते हुए कुछ अन्य संगीत शैलियों की फाल्गुनी रचनाएँ लेकर उपस्थित हुए हैं। आज प्रस्तुत की जाने वाली होली रचनाएँ हमने राग काफी से इतर रागों में चुनी है।

आज की इस सतरंगी गोष्ठी का आरम्भ हम एक फिल्मी गीत से करेंगे। १९९६ में एक संगीतप्रधान फिल्म, ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग में एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस प्रकार निखरते है? 


फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : स्वर – आरती अंकलीकर


पिछले अंक में हमने इस तथ्य को रेखांकित किया था कि भारतीय संगीत की सभी शैलियों में होली के गीत मिलते हैं। मेरे मित्र, संगीत समीक्षक और हाथरस से प्रकाशित प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका- ‘संगीत’ के परामर्शदाता मुकेश गर्ग ने इस तथ्य को इन शब्दों में रेखांकित किया है- ‘हिन्दुस्तानी संगीत में होली की जगह कुछ अलग ही है. ध्रुपद शैली की धमार गायकी से लेकर ख़याल और ठुमरी गायकी तक, इस रंग-बिरंगे त्योहार का उल्लास देखते ही बनता है। इन गायन-शैलियों में संयोग श्रृंगार के ढेरों चित्र तो मिलते ही हैं, वियोग की पीड़ा को दर्शाने वाली ठुमरियों की भी कोई कमी नहीं। यहाँ तक कि ठुमरी का एक प्रकार तो 'होरी' या 'होली' नाम से ही जाना जाता है। इन ठुमरियों ने शब्द और स्वर दोनों स्तरों पर बहुत कुछ लोक-संगीत से ग्रहण किया है।’ लोक संगीत की इस महत्ता को स्वीकारती हुई लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) की सेवानिवृत्त प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव का मत है कि भारतीय संगीत के कई राग, लोक संगीत की धुनों को ही विकसित और परिमार्जित कर निर्मित है। राग पीलू, पहाड़ी, माँड़ आदि का उदगम लोक संगीत से ही हुआ है। आइए अब आपको होली की एक लोक संगीत की रचना सुनवाते हैं, किन्तु किसी लोक कलाकार से नहीं, बल्कि वरिष्ठ शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से-

शिव की होली : ‘खेले मसाने की होली दिगम्बर...’ : स्वर – पं. छन्नूलाल मिश्र


भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली के अन्तर्गत धमार गायकी तो पूरी तरह रंगों के पर्व पर ही केन्द्रित रहती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला १४ मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली का वर्णन मिलता है। कुछ धमार रचनाओं में फाल्गुनी परिवेश का चित्रण भी होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको धमार गायकी के माध्यम से रंगोत्सव का एक अलग रंग दिखाने का प्रयास करेंगे।

ध्रुवपद-धमार गायकी में एक युगल गायक हैं- गुंडेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा), जिन्हें देश-विदेश में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से ‘स्वरगोष्ठी’ के होली अंकों के लिए हमने एक धमार अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध का मान रखते हुए रमाकान्त गुंडेचा ने हमें तत्काल राग केदार का यह मनमोहक धमार, आपको सुनवाने के लिए उपलब्ध कराया। गुंडेचा बन्धु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, राग केदार का यह धमार -'चोरी चोरी मारत हो कुमकुम, सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...'  प्रस्तुत है-

धमार- केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : स्वर – गुंडेचा बन्धु


होली-पर्व पर ‘स्वरगोष्ठी’ की इस विशेष श्रृंखला का समापन हम संगीत-मंचों की परम्परा के अनुसार राग भैरवी की एक ऐतिहासिक महत्त्व की रचना से करेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी में दिल्ली में ठुमरी के कई गायक और रचनाकार हुए, जिन्होंने इस शैली को समृद्धि प्रदान की। इन्हीं में एक थे गोस्वामी श्रीलाल, जिन्होंने "पछाहीं ठुमरी" को एक नई दिशा दी। इनका जन्म 1860 में दिल्ली के एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। संगीत की शिक्षा इन्हें अपने पिता गोस्वामी कीर्तिलाल से प्राप्त हुई। ये सितारवादन में भी प्रवीण थे। "कुँवरश्याम" उपनाम से इन्होने अनेक ध्रुवपद, धमार, ख़याल, ठुमरी आदि की रचनाएँ की। इनका संगीत स्वान्तःसुखाय और अपने आराध्य भगवान् श्रीकृष्ण को सुनाने के लिए ही था। जीवन भर इन्होने किशोरीरमण मन्दिर से बाहर कहीं नहीं गाया-बजाया। इनकी ठुमरी रचनाएँ कृष्णलीला प्रधान तथा स्वर, ताल और साहित्य की दृष्टि से अति उत्तम है। राग भैरवी की ठुमरी -"बाट चलत नई चुनरी रंग डारी श्याम..." कुँवरश्याम की सुप्रसिद्ध रचना है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भी देवालय संगीत की परम्परा कहीं-कहीं दीख पड़ती थी| संगीतज्ञ कुँवरश्याम इसी परम्परा के संवाहक और पोषक थे| आज हम यही पसिद्ध ठुमरी आपको सुनवाएँगे। राधा-कृष्ण की होली के रंगों से सराबोर इस ठुमरी को कई प्रसिद्ध गायकों ने स्वर दिया है। यहाँ तक कि १९५३ की फिल्म "लड़की" में गायिका गीता दत्त ने और १९५७ की फिल्म "रानी रूपमती" में कृष्णराव चोंकर व मुहम्मद रफी ने भी इस ठुमरी को अपना स्वर दिया था। आज यह ठुमरी और उसके बाद तराना आपके लिए प्रस्तुत करेंगे ‘श्यामचौरासी’ घराने के संवाहक उस्ताद शफकत अली खाँ। आप भैरवी के स्वरों में होली के एक अलग रंग का आनन्द लीजिए और मुझे रंगोत्सव के इस विशेष अंक को विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक के संगीत-अनुष्ठान में आपसे फिर मिलेंगे।

ठुमरी और तराना : ‘बाट चलत नई चुनरी रंग डारी...’ : स्वर - शफकत अली खाँ


आज की पहेली

नीचे दिये गए संगीत के अंश को ध्यान से सुनिए और हमारे दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारतीय वाद्य संगीत के दो दिग्गज वादक कलाकारों की जुगलबन्दी से यह संगीत अंश लिया गया है। इस जुगलबन्दी में उत्तर भारत की बेहद चर्चित लोक-धुन का वादन किया गया है। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – प्रस्तुत संगीत अंश में किन दो वाद्यों की जुगलबन्दी की गई है? दोनों वाद्यों के नाम बताइए।

२ – दोनों वादक कलाकारों ने किस लोक-धुन का वादन किया है? यह लोक-धुन मौसम पर आधारित है।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६३वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५९वें अंक में हमने आपको १९६३ की एक फिल्म के होली गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे फिल्म का नाम और उस राग का नाम पूछा था, जिस पर यह गीत आधारित है। दोनों प्रश्नों के क्रमशः सही उत्तर है- फिल्म ‘गोदान’ और राग ‘काफी’। दोनों पश्नों का सही उत्तर देने वाले पाठक हैं- बैंगलुरु के पंकज मुकेश और बरेली, उत्तर प्रदेश के दयानिधि वत्स। इन्दौर की क्षिति तिवारी ने राग की पहचान तो ठीक की, किन्तु फिल्म का नाम पहचानने में भूल कर बैठीं। इन सभी पाठकों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई। इन पाठकों/श्रोताओं के साथ-साथ फेसबुक के उन सभी मित्रों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द किया।

अपने पाठकों को हम सहर्ष सूचित करते हैं कि ‘सिने-पहेली’ की भाँति ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के विजेता और महाविजेता का हम चयन करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के ५१वें से लेकर ६०वें (पिछले अंक) तक की पहेली में जिस पाठक के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें ‘विजेता’ का सम्मान मिलेगा। यह घोषणा हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में करेंगे। तब तक आप इस अंक की पहेली को सुलझाते रहिए।

झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने संगीत की विविध शैलियों में होली की रचनाएँ आपके लिए प्रस्तुत किया है। अगले अंक में भी हम आपके लिए ऋतु आधारित संगीत का सिलसिला जारी रखेंगे। भारतीय लोक संगीत की कुछ शैलियाँ ऐसी हैं जो उपशास्त्रीय संगीत में भी बेहद लोकप्रिय हैं। ऐसी ही एक मौसम आधारित लोक संगीत शैली और उपशास्त्रीय संगीत से उसके अन्तर्सम्बन्धों पर चर्चा करेंगे। 



कृष्णमोहन मिश्र

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