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Thursday, January 5, 2017

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए.. पेश-ए-नज़र है अल्लामा इक़बाल का दर्द मेहदी हसन की जुबानी

महफ़िल ए कहकशाँ 18



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है मोहम्मद अल्लामा इकबाल की लिखी गज़ल मेहदी हसन की आवाज़ में|  



मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी






इस ऑडियो को आप यहाँ से डाउनलोड भी कर सकते हैं| लिंक पर राइट क्लिक करके सेव एज का आप्शन चुनें|
allamaiqbal.mp3

Thursday, August 4, 2016

छल्ला कालियां मर्चां, छल्ला होया बैरी.. छल्ला से अपने दिल का दर्द बताती विरहणी को आवाज़ दी शौक़त अली ने



शौकत अली 
महफ़िल ए कहकशाँ 10


दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है पंजाबी लोक-संगीत ’छल्ला’ का एक रूप, गायक शौक़त अली की आवाज़ में।







मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी




Sunday, July 17, 2016

राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 279 : RAG ALHAIYA BILAWAL




स्वरगोष्ठी – 279 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 12 : समापन कड़ी में खुशहाली का माहौल

“भोर आई गया अँधियारा सारे जग में हुआ उजियारा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की यह समापन कड़ी है। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हमने मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा की और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी भी दी। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग अल्हैया बिलावल के स्वरों में पिरोये गए 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ से एक सुमधुर, उल्लास से परिपूर्ण गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग अल्हैया बिलावल के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर और उनकी शिष्याओ के स्वरों में राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन उन गिने-चुने संगीतकारों में से थे जो नए-नए प्रयोग करने से नहीं कतराते थे। शास्त्रीय रागों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग मदन मोहन ने किए जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’बावर्ची’ का गीत ही ले लीजिए "भोर आई गया अँधियारा..."। यह गीत आधारित है राग अल्हैया बिलावल पर। इस फ़िल्म के बनते समय तक शायद ऐसा कोई भी हिन्दी फ़िल्मी गीत नहीं था जो इस राग पर आधारित हो। अल्हैया बिलावल एक प्रात:कालीन राग (सुबह 6 से 9 बजे तक गाया जाने वाला राग) होने की वजह से मुमकिन था कि इसका प्रयोग संगीतकार अपने गीतों में करते क्योंकि प्रात:काल के बहुत से गीत फ़िल्मों में आ चुके थे। पर शायद किसी ने भी इस राग को नहीं अपनाया, या फिर यूँ कहें कि अपना नहीं सके। मदन मोहन ने इस ओर पहल किया और अल्हैया बिलावल को गले लगाया। ’बावर्ची’ फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि सुबह के वक़्त संयुक्त परिवार में चहल-पहल शुरु हुई है, पिताजी के चरण-स्पर्ष हो रहे हैं, सुबह की चाय पी जा रही है, बावर्ची अपने काम पे लगा है, संगीतकार बेटा अपने सुर लगा रहा है, घर की बेटियाँ घर के काम-काज में लगी हैं। इस सिचुएशन के लिए गीत बनाना आसान काम नहीं था। पर मदन मोहन ने एक ऐसे गीत की रचना कर दी कि इस तरह का यह आजतक का एकमात्र गीत बन कर रह गया है। बावर्ची बने फ़िल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए मन्ना डे की आवाज़ ली गई जो इस गीत के मुख्य गायक हैं, जो बिखरते हुए उस परिवार को एक डोर में बाँधे रखने के लिए इस गीत में सबको शामिल कर लेते हैं। पिता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का पार्श्वगायन उन्होंने ख़ुद ही किया, संगीतकार बेटे (असरानी) को आवाज़ दी किशोर कुमार ने, और घर की दो बेटियों (जया भादुड़ी और उषा किरण) के लिए आवाज़ें दीं शास्त्रीय-संगीत की शीर्ष की दो गायिकाओं ने। ये हैं लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी। कैफ़ी आजमी ने गीत लिखा और नृत्य निर्देशन के लिए चुना गया गोपीकृष्ण को। कलाकारों के इस अद्वितीय आयोजन ने इस गीत को अमर बना दिया। और मदन मोहन ने केवल अल्हैया बिलावल ही नहीं, इस गीत के अलग-अलग अंश के लिए अलग-अलग रागों का प्रयोग किया। "भोर आई गया अंधियारा" का मूल स्थायी और अन्तरा राग अल्हैया बिलावल है। परन्तु अलग-अलग अन्तरों में राग मारु विहाग, नट भैरव, धनाश्री और हंसध्वनि की झलक भी मिलती है। हर बदले हुए राग के अन्तरे के बाद राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध स्थायी की पंक्तियाँ वापस आती हैं।

अपने उसूलों पर चलने की वजह से 70 के दशक में मदन मोहन के साथ कई फ़िल्मकारों ने काम करना बन्द कर दिया था। हालाँकि उनके अन्तिम कुछ वर्षों में उन्होंने ॠषीकेश मुखर्जी (बावर्ची), गुलज़ार (कोशिश, मौसम), चेतन आनन्द (हँसते ज़ख़्म) और एच. एस. रवैल (लैला मजनूं) के साथ काम किया, पर उनके लिए रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में तारीख़ मिलना भी मुश्किल हो रहा था। नए संगीतकारों की फ़ौज 60 के दशक के अन्तिम भाग से आ चुकी थी जिनके पास बहुत सी फ़िल्में थीं और वो महीनों तक अच्छे रेकॉर्डिंग् स्टुडियोज़ (जैसे कि तारदेव, फ़िल्म सेन्टर, महबूब) को बुक करवा लेते थे जिस वजह से जब मदन जी को ज़रूरत पड़ती स्टुडियो की, तो उन्हें नहीं मिल पाता। इस तरह से उनकी रेकॉर्डिंग् कई महीनों के लिए टल जाती और इस तरह से वो पिछड़ते जा रहे थे। ख़ैर, वापस आते हैं ’बावर्ची’ पर। इस फ़िल्म में कुल छह गीत थे। एक गीत की हमने चर्चा की, अन्य पाँच गीत भी रागों अथवा लोक संगीत पर आधारित थे। मन्ना डे की एकल आवाज़ में "तुम बिन जीवन कैसा जीवन..." के पहले अन्तरे में राग हेमन्त की झलक है। इसी प्रकार लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में "काहे कान्हा करत बरजोरी...", में भी राग का स्पर्श है। कुमारी फ़ैयाज़ की आवाज़ में "पहले चोरी फिर सीनाज़ोरी..." में मराठी लोक संगीत लावणी का रंग है। मदन मोहन की फ़िल्म हो और लता मंगेशकर का कोई गीत ना हो कैसे हो सकता है भला। इस फ़िल्म में दो गीत लता जी से गवाये गए - "मोरे नैना बहाये नीर...", और दूसरा गीत है "मस्त पवन डोले रे..."। इस दूसरे गीत को फ़िल्म में नहीं शामिल किया गया, इसका मदन मोहन को अफ़सोस रहा। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ। एडिटिंग् की कैंची उनके कई सुन्दर गीतों पर चल गई और गीत फ़िल्म से बाहर हो गया। कुछ उदाहरण - "खेलो ना मेरे दिल से..." (हक़ीक़त), "चिराग़ दिल का जलाओ बहुत अन्धेरा है..." (चिराग़), "दुनिया बनाने वाले..." (हिन्दुस्तान की क़सम), "मस्त पवन डोले रे..." (बावर्ची)। ’हीर रांझा’ में "मेरी दुनिया में तुम आयी..." शुरु-शुरु में फ़िल्म में नहीं था, कुछ सप्ताह बाद इसे जोड़ा गया था, पर साथ ही "तेरे कूचे में..." को हटा दिया गया। ’हँसते ज़ख़्म’ में "आज सोचा तो आँसू भर आए..." गीत को बहुत सप्ताह बीत जाने के बाद जोड़ा गया था। इन सारी जानकारियों के बाद अब समय है फ़िल्म ’बावर्ची’ के "भोर आई गया अँधियारा..." गीत को सुनने के साथ-साथ देखने का।


राग अल्हैया बिलावल : "भोर आई गया अँधियारा..." : मन्ना डे और साथी : फिल्म – बावर्ची


राग अल्हैया बिलावल का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना गया है और इस थाट के आश्रय राग बिलावल का ही एक प्रकार है। इस राग के आरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस कारण इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। आरोह में शुद्ध और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग अल्हैया बिलावल के गायन-वादन का समय दिन का प्रथम प्रहर होता है। राग के आरोह में ऋषभ और अवरोह में गान्धार स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग आरोह में और कोमल निषाद का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो धैवत के बीच में किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है, अर्थात इसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में आता है। इस राग का चलन भी सप्तक के उत्तरांग में और तार सप्तक में अधिक किया जाता है। आजकल राग अल्हैया बिलावल का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है केवल बिलावल कह देने से लोग अल्हैया बिलावल ही समझते हैं, जबकि राग बिलावल और अल्हैया बिलावल दो अलग-अलग राग हैं। राग अल्हैया बिलावल के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 16 मात्रा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने के गायकी में दक्ष विदुषी किशोरी अमोनकर। इस गायन में उनकी शिष्याओं का योगदान भी है। राग अल्हैया बिलावल की इस बन्दिश के बोल हैं – ‘कवन बतरिया गैलो माई...’। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक के साथ जारी श्रृंखला को भी यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अल्हैया बिलावल : ‘कवन बतरिया गैलो माई...’ विदुषी किशोरी अमोनकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – ताल के लिए गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है? हमें उस तालवाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 277 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज यह समापन कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग अल्हैया बिलावल का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए हमने प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख  : सुजॉय चटर्जी  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, July 2, 2016

"तू मेरा कौन लागे?" क्या सम्बन्ध है इस गीत का किशोर कुमार से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 85
 

'तू मेरा कौन लागे...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 85-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लोकप्रिय गीत "तू मेरा कौन लागे..." के बारे में जिसे अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञनिक और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। गीत लिखा है हसन कमाल ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने।  


 मारी फ़िल्मों में एकल और युगल गीतों की कोई कमी नहीं है। तीन, चार या उससे अधिक गायकों के गाये
गीतों की भी फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। लेकिन अगर ऐसे गानें छाँटने के लिए कहा जाए जिनमें कुल तीन गायिकाओं की आवाज़ें हैं तो शायद गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है। दूसरे शब्दों में ऐसे गीत बहुत कम संख्या में बने हैं। आज हम एक ऐसे ही गीत की चर्चा कर रहे हैं जो बनी थी 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लिए। अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "तू मेरा कौन लागे" गीत अपने ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की चर्चा शुरू करने से पहले जल्दी जल्दी एक नज़र डाल लेते हैं तीन गायिकाओं के गाए फ़िल्मी गीतों के इतिहास पर। पहला गीत तो वही है जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला पार्श्वगायन युक्त गीत है। 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ के गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." में संगीतकार रायचन्द बोराल ने तीन गायिकाओं - पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ को एक साथ गवाया था। 40 के दशक में 1945 की फ़िल्म ’ज़ीनत’ में एक ऐसी क़व्वाली बनी जिसमें केवल महिलाओं की आवाज़ें थीं, फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह पहली बार था। मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ाँ के संगीत में "आहें ना भरी शिकवे ना किए...", इस क़वाली में आवाज़ें थीं नूरजहाँ, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की। 50 के दशक में नौशाद साहब ने तीन गायिकाओं को गवाया महबूब ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’मदर इण्डिया’ में। तीन मंगेशकर बहनों - लता, उषा और मीना ने इस गीत को गाया, बोल थे "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा..."। 60 के दशक में पहली बार संगीतकार रवि ने लता, आशा और उषा को एक साथ गवाकर इतिहास रचा, फ़िल्म थी ’गृहस्थी’ और गाना था "खिले हैं सखी आज..."। इसके पाँच साल बाद 1968 में कल्याणजी-आनन्दजी ने फिर एक बार इन तीन बहनों को गवाया ’तीन बहूरानियाँ’ फ़िल्म के गीत "हमरे आंगन बगिया..." में। इसी साल कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों ने मुबारक़ बेगम, सुमन कल्याणपुर और कृष्णा बोस की आवाज़ों में ’जुआरी’ फ़िल्म में एक गीत गवाया "नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले" जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 70 के दशक में शंकर-जयकिशन ने एक कमचर्चित फ़िल्म ’दिल दौलत दुनिया’ के लिए एक दीपावली गीत रेकॉर्ड किया आशा भोसले, उषा मंगेशकर और रेखा जयकर की आवाज़ों में, "दीप जले देखो..."। और 80 के दशक में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1982 की फ़िल्म ’जीवन धारा’ में पहली बार अनुराधा-अलका-कविता की तिकड़ी को पहली बार साथ में माइक के सामने ला खड़ा किया, गीत था "जल्दी से आ मेरे परदेसी बाबुल..."। और जब 1989 में ’बटवारा’ में एक ऐसे तीन गायिकाओं वाले गीत की ज़रूरत आन पड़ी तब लक्ष्मी-प्यारे ने फिर एक बार इसी तिकड़ी को गवाने का निर्णय लिया। 90 के दशक में इस तिकड़ी को राम लक्ष्मण ने ’हम साथ साथ हैं’ फ़िल्म के कई गीतों में गवाया जैसे कि "मय्या यशोदा...", "मारे हिवड़ा में नाचे मोर...", "हम साथ साथ हैं..."। इसी दशक में यश चोपड़ा की फ़िल्म ’डर’ में शिव-हरि ने लता मंगेशकर के साथ कविता कृष्णमूर्ति और पामेला चोपड़ा को गवाकर एक अद्‍भुत गीत की रचना की, बोल थे "मेरी माँ ने लगा दिये सोलह बटन मेरी चोली में..."। 2000 के दशक में भी तीन गायिकाओं के गाए गीतों की परम्परा जारी रही, अनु मलिक ने ’यादें’ फ़िल्म में अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति और हेमा सरदेसाई से गवाया "एली रे एली कैसी है पहेली..."।

"तू मेरा कौन लागे" गीत में डिम्पल कपाडिया के लिए अलका याज्ञनिक, अम्रीता सिंह के लिए कविता
किशोर के साथ अनुराधा की दुर्लभ तसवीर, साथ में अमित कुमार और आशा
कृष्णमूर्ति और पूनम ढिल्लों के लिए अनुराधा पौडवाल की आवाज़ निर्धारित हुई। गाना रेकॉर्ड होकर सेट पर पहुँच गया शूटिंग् के लिए। पर फ़िल्मांकन में हो गई गड़बड़। अभिनेत्री-गायिका की जोड़ियों में गड़बड़ हो गई। शुरुआती मुखड़े में अम्रीता सिंह ने अनुराधा पौडवाल के गाए हिस्से में होंठ मिला दी जबकि अनुराधा को पूनम के लिए गाना था। गीत का अन्त तो और गड़बड़ी वाला है। डिम्पल गीत को ख़त्म करती हैं "तू मारो कोण लागे" पंक्ति को चार बार गाते हुए। पर पहली दो लाइनें अलका की आवाज़ में है और अगली दो लाइनें अनुराधा की आवाज़ में। और तो और अनुराधा जो पूनम के लिए "तू मेरा कौन लागे" गा रही थीं, अब डिम्पल के लिए "तू मारो कोण लागे" गाती हैं। ऐसा क्यों है, पता नहीं! ख़ैर, अब ज़िक्र करते हैं कि इस गीत का किशोर कुमार के साथ क्या सम्बन्ध है। गीत के रेकॉर्डिंग् के दिन की बात है। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। 



फिल्म - बँटवारा : "तू मेरा कौन लागे..." : अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञिक, कविता कृष्णमूर्ति



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, June 16, 2016

खुशी ने मुझको ठुकराया है... आइये, सुनते हैं आज बेगम अख्तर की जीवन यात्रा!


दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए शकील बदायूनीं की ग़ज़ल बेगम अख्तर की पुरकशिश आवाज़ में.

मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी

Thursday, June 2, 2016

आज की महफ़िल में सुनिये क्या कहते हैं गुलज़ार साहब त्रिवेणियों के बारे में!




दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए गुलज़ार साहब की त्रिवेणी की व्याख्या  और जगजीत सिंह द्वारा उनकी त्रिवेणियों को आवाज़ देना.


मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी



Monday, April 11, 2016

अमित कुमार - आर्टिस्ट प्रोफाईल - मेरे ये गीत याद रखना


मेरे ये गीत याद रखना 

आज जाने पार्श्व गायक अमित कुमार के सफ़र की दास्ताँ, और सुनें उनके कुछ यादगार गीत, आपके प्रिय आर जे विवेक श्रीवास्तव के साथ

Thursday, July 25, 2013

नाराज़गी ऐसी ...हाय तौबा

गोल्ड सीरीस - वो हमसे चुप हैं ....
स्वर - श्वेता पाण्डेय
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन

Monday, July 22, 2013

दुनिया की हर माँ के नाम एक गीत

मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में....
स्क्रिप्ट  - सुजॉय चट्टर्जी
स्वर - अर्शिना सिंह
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन

Monday, July 15, 2013

बिजलियाँ गिराती अदाओं से ज़रा बच के

गोल्ड सीरिस - खरा सोना गीत (अंक ५)
शोख नज़र की बिजलियाँ ...
फिल्म  - वो कौन थी
स्वर - आशा भोसले
शब्द - राजा मेहदी अली खान
संगीत - मदन मोहन

स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टरजी
प्रस्तुतकर्ता  - लिंटा मनोज
एपिसोड निर्देशिका - संज्ञा टंडन

Saturday, June 1, 2013

सिने पहली - 66

सिने-पहेली # 66

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को अमित तिवारी का नमस्कार! सिने पहेली के 65 वें अंक में तो वाकई धूम धड़ाका हो गया. आई. पी.एल जरूर ख़त्म हो गया पर लखनऊ से चन्द्रकांत दीक्षित जी ने क्रिस गेल के स्टाइल में शानदार ढंग से पहेली प्रकाशित होने के 15 मिनट के अंदर सभी सवालों के सही उत्तर देकर  सरताज विजेता का ख़िताब अपने नाम कर लिया. 

साथ ही इस सेगमेंट में अपना खाता खोला गढ़ बनेली, पूर्णिया बिहार से शोएब अख्तर जी ने. शोएब जी आपका स्वागत है सिने पहेली में.

इस बार सभी प्रतियोगी पूर्ण अंक प्राप्त करने में सफल रहे. आप सबको बधाईयाँ. पहेली के उत्तर नीचे दिए गए हैं . 

चलिए, अब तैयार हो जाइए अपने-अपने फ़िल्मी ज्ञान को आज़माने के लिए, अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालने के लिए और हम शुरू करते हैं एक और नयी ताज़ा पहेली.

आज से इस प्रतियोगिता में जुड़ने वाले नये खिलाड़ियों का स्वागत करते हुए हम उन्हें यह भी बताना चाहेंगे कि अभी भी कुछ देर नहीं हुई है, आज से इस प्रतियोगिता में जुड़ कर भी आप महाविजेता बन सकते हैं, यही इस प्रतियोगिता की ख़ासियत है। इस प्रतियोगिता के नियमों का नीचे किया गया है, ध्यान दीजियेगा।


आज की पहेली:



आज की पहेली में कुल पाँच सवाल हैं और हर सवाल के लिए दो अंक हैं. यानि कि इस पहेली में मौका है पूरे 10 अंक अर्जित करने का.


सवाल-1: पहचानिए तो सही
आज का पहला सवाल है एक चित्र पहेली. नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए. यह दृश्य एक गाने का है. आपको बतलाना है गाने का नाम और फिल्म के निर्देशक का नाम. याद रहे, दोनों उत्तर सही बताने पर ही पूरे अंक दिए जायेंगे.





सवाल-2: सुनिये तो...  

सुनिये तो'.... में आज हम आपको जो ऑडियो क्लिप सुनवा रहे हैं उसमें आपको 60 के दशक की एक मशहूर अभिनेत्री की आवाज सुनाई देगी. आपको उस अभिनेत्री का नाम बताना है.




सवाल-3: मुखड़ा पहचानो

आज हम आपको सुनवा रहे हैं एक मशहूर गीत का  अंतरा. अंतरे की इन पंक्तियों को सुन कर बताइये कि गीत का मुखड़ा क्या है?




सवाल-4: गोल्डन वॉयस

इस आवाज को सुनकर आपको बतलाना है कि ये आवाज किसकी है और इस फिल्म के निर्देशक का पूरा नाम क्या था.

अतिरिक्त सूत्र: इन्होने गायिका, अभिनेत्री होने के अलावा एक  फिल्म में संगीत भी दिया.



सवाल-5: पहचान कौन

अंतिम सवाल है एक चित्र पहेली. नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए. इस तस्वीर में आप रफ़ी साहब , मदन मोहन जी को तो आसानी से पहचान गए होंगे  पर आपको पहचानना है बायीं ओर सबसे पहले खड़ी हस्ती को.




पिछली पहेली का हल

1-
विदेशी फिल्म: Memento
हिन्दी फिल्म:गज़नी

2 –
विदेशी फिल्म: It Happened One Night
हिन्दी फिल्म: दिल है कि मानता नहीं

3 –
विदेशी फिल्म: Man, Woman and Child
हिन्दी फिल्म: मासूम

4 –
विदेशी फिल्म:Man On Fire
हिन्दी फिल्म: एक अजनबी

5 –
विदेशी फिल्म: Mrs. Doubtfire
हिन्दी फिल्म: चाची 420

पिछली पहेली के विजेता

सिने पहेली - 65 के के विजेताओं के नाम और उनके प्राप्तांकों पर।

1- चंद्रकान्त दीक्षित, लखनऊ - 10 अंक
2- प्रकाश गोविन्द, लखनऊ - 10 अंक 
3- क्षिति तिवारी, जबलपुर - 10 अंक
4- विजय कुमार व्यास, बीकानेर - 10 अंक
5.  पंकज मुकेश,बेंगुलुरू - 10 अंक  
6.  शोएब अख्तर, गढ़ बनेली - 10 अंक 
7. महेश बसंतानी, पिट्सबर्ग - 10 अंक  

 इस सेगमेण्ट का अब तक का सम्मिलित स्कोरकार्ड 




नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। छठे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम।

जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 66" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 6 जून शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार।


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