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रविवार, 9 दिसंबर 2012

'स्वरगोष्ठी' में ठुमरी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



स्वरगोष्ठी-९९ में आज
फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – १०

विरहिणी नायिका की व्यथा : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा। 


‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा।

हमारी आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों के योगदान से। उन्होने इस ठुमरी को अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का जन्म १९०२ में पराधीन भारत के पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श ख़ान तत्कालीन पश्चिम पंजाब प्रान्त के एक संगीत परिवार से सम्बन्धित थे और ख़ुद भी एक जाने-माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली जब ७ वर्ष के थे, तभी उन्होंने अपने चाचा काले खाँ से सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली ने अपनी स्वर-यात्रा का आरम्भ सारंगी वादक के रूप में किया और कलकत्ता में आयोजित उनकी पहली संगीत-सभा में उन्हें लोकप्रियता मिली। ली। बाद में उन्होने अपनी गायन प्रतिभा से भी संगीत-प्रेमियों को प्रभावित किया। उनके गले की मिठास, गायकी का अंदाज़, हरकतें, सबकुछ मिलाकर उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। आइए, आज सबसे पहले उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनते हैं आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

 

श्रृंगार रस के विरह भाव को उकेरने में पूर्ण समर्थ इस ठुमरी को सुविख्यात गायिका पद्मा तलवलकर ने भी गाया है। २८ फरवरी, १९४८ को मुम्बई में जन्मीं पद्मा जी की संगीत-शिक्षा जयपुर, अतरौली घराने की प्राप्त हुई है, किन्तु उनके गायन में ग्वालियर और किराना गायकी की विशेषताएँ भी परिलक्षित होती हैं। उनका विवाह जाने-माने तबला-वादक पण्डित सुरेश तलवलकर से हुआ। इस संगीतज्ञ दम्पति की सन्तानें- पुत्र सत्यजीत और पुत्री सावनी, दोनों ही तबला-वादन में कुशल हैं। संगीत-शिक्षा के दौरान पद्मा जी को ‘भूलाभाई मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से पाँच वर्ष तक छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी। बाद में उन्हें ‘नेशनल सेण्टर फॉर पर्फ़ोर्मिंग आर्ट्स’ द्वारा दो वर्ष के लिए फ़ेलोशिप भी मिली थी। उन्हें वर्ष २००४ में पण्डित जसराज गौरव पुरस्कार, २००९ में श्रीमती वत्सलाबाई भीमसेन जोशी पुरस्कार तथा २०१० में राजहंस प्रतिष्ठान पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इन्हीं प्रतिभावान गायिका के स्वरों में अब आप भैरवी की इस ठुमरी का आनन्द लीजिए-


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : विदुषी पद्मा तलवलकर




आज हमारी चर्चा में जो ठुमरी है, उसे अनेक गायक-गायिकाओं ने अलग-अलग ढंग से गाया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने भी अनेक अवसरों पर इस ठुमरी को प्रस्तुत किया है। उनके स्वरों में ढल कर इस ठुमरी का एक अलग रंग निखरता है। आज के अंक में हम उनकी आवाज़ में भी यह ठुमरी सुनवा रहे हैं। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। इससे पूर्व अजय जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके पिता पं. अजीत चक्रवर्ती से, बाद में कालीदास वैरागी और पं. ज्ञानप्रकाश घोष से प्राप्त हुई। पण्डित अजय चक्रवर्ती पहले ऐसे संगीत-साधक हैं, जिन्हें पाकिस्तान आमंत्रित किया गया और उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया था। एक संगीत-सभा में इस ठुमरी की प्रस्तुति के दौरान पण्डित अजय चक्रवर्ती ने वर्तमान गजल गायकी, राग भैरवी के विभिन्न रूप तथा पटियाला घराने की गायकी के बारे में कुछ चर्चा की है। संगीत के विद्यार्थियों के लिए यह प्रस्तुति लाभकारी होगी। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में भैरवी की यही ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



वर्ष १९७७ वासु चटर्जी की फिल्म ‘स्वामी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राजेश रोशन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग में भैरवी की इस पारम्परिक ठुमरी का उपयोग किया था। परन्तु ठुमरी के इस फिल्मी स्वरूप में भैरवी के अलावा बीच-बीच में कुछ अन्य रागों- जोगिया, पीलू आदि की अनुभूति भी होती है। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येसुदास ने इस ठुमरी को बड़े नर्म और भावपूर्ण अंदाज में गाया है। राजेश रोशन के पिता, संगीतकार रोशन ने अपने समय की फिल्मों में पारम्परिक खयाल, ठुमरी आदि का भरपूर उपयोग किया था। फिल्म ‘स्वामी’ में इस ठुमरी को शामिल करने की प्रेरणा राजेश को सम्भवतः अपने पिता से मिली हो। ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के इस फिल्मी रूप का आनन्द आप भी लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

फिल्म – स्वामी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : येसुदास



आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही वर्ष २०१२ की पाँचों श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रथम तीन विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से पुरस्कृत भी किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?
२ – इस पारम्परिक ठुमरी को आठवें दशक की एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। उस फिल्म के संगीतकार कौन थे?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता 


 
‘स्वरगोष्ठी’ के ९७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका इकबाल बानो के स्वर में ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग देस। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का



 मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक सौवाँ अंक होगा और यह हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ का समापन अंक भी होगा। इस अंक में हम आपके लिए श्रृंगार रस की अत्यन्त मोहक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे। जनवरी, २०१३ से हम आपके सुझावों और फरमाइशों के आधार पर आपके प्रिय कार्यक्रमों में बदलाव कर रहे हैं। आप अपने सुझाव १५ दिसम्बर तक अवश्य भेज दें। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

रविवार, 18 नवंबर 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – ७


स्वरगोष्ठी – ९६ में आज
लौकिक और आध्यात्मिक भाव का बोध कराती ठुमरी


‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’


चौथे से लेकर छठें दशक तक की हिन्दी फिल्मों के संगीतकारों ने राग आधारित गीतों का प्रयोग कुछ अधिक किया था। उन दिनों शास्त्रीय मंचों पर या ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से जो बन्दिशें, ठुमरी, दादरा आदि बेहद लोकप्रिय होती थीं, उन्हें फिल्मों में कभी-कभी यथावत और कभी अन्तरे बदल कर प्रयोग किये जाते रहे। चौथे दशक के कुछ संगीतकारों ने फिल्मों में परम्परागत ठुमरियों का बड़ा स्वाभाविक प्रयोग किया था। फिल्मों में आवाज़ के आगमन के इस पहले दौर में राग आधारित गीतों के गायन के लिए सर्वाधिक यश यदि किसी गायक को प्राप्त हुआ, तो वह कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल ही थे। उन्होने १९३८ में प्रदर्शित ‘न्यू थियेटर’ की फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ गाकर उसे कालजयी बना दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में आप संगीत-प्रेमियों के बीच, मैं कृष्णमोहन मिश्र, भैरवी की इसी ठुमरी से जुड़े कुछ तथ्यों पर चर्चा करूँगा।

वध के नवाब वाजिद अली शाह संगीत-नृत्य-प्रेमी और कला-संरक्षक के रूप में विख्यात थे। नवाब १८४७ से १८५६ तक अवध के शासक रहे। उनके शासनकाल में ही ठुमरी एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी। नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की रचनाएँ भी की थी। इसके अलावा ‘अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी। राग खमाज का सादरा –‘सुध बिसर गई आज अपने गुनन की...’ तथा राग बहार का ख़याल –‘फूलवाले कन्त मैका बसन्त...’ उनकी बहुचर्चित रचनाएँ हैं। उनका राग खमाज का सादरा संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने राग हेमन्त में परिवर्तित कर फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में प्रयोग किया था। ७ फरवरी, १८५६ को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी –‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ में अभिव्यक्त हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को न गाया हो। १९३६ के लखनऊ संगीत सम्मलेन में जब उस्ताद फैयाज़ खाँ ने इस ठुमरी को गाया तो श्रोताओं की आँखों से आँसू निकल पड़े थे। इसी ठुमरी को पण्डित भीमसेन जोशी ने अनूठे अन्दाज़ में गाया, तो विदुषी गिरिजा देवी ने बोल-बनाव से इस ठुमरी का आध्यात्मिक पक्ष उभारा है। फिल्मों में भी इस ठुमरी के कई संस्करण उपलब्ध हैं। १९३८ में बनी फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' में कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी भैरवी सर्वाधिक लोकप्रिय हुई। आज सबसे हम प्रस्तुत कर रहे है, पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में यह ठुमरी।

ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी



चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत की उन रचनाओं को शामिल करने का चलन था जिन्हें संगीत के मंच पर अथवा ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से लोकप्रियता मिली हो। फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में इस ठुमरी को शामिल करने का उद्येश्य भी सम्भवतः यही रहा होगा। परन्तु किसे पता था कि लोकप्रियता की कसौटी पर यह फिल्मी संस्करण, मूल पारम्परिक ठुमरी की तुलना में कहीं अधिक चर्चित होगी। इस ठुमरी का साहित्य दो भावों की सृष्टि करता है। इसका एक लौकिक भाव है और दूसरा आध्यात्मिक। ठुमरी के लौकिक भाव के अन्तर्गत विवाह के उपरान्त बेटी की विदाई का प्रसंग और आध्यात्मिक भाव के अन्तर्गत मानव का नश्वर शरीर त्याग कर परमात्मा में विलीन होने का भाव स्पष्ट होता है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी ने इस ठुमरी के गायन में दोनों भावों की सन्तुलित अभिव्यक्ति दी है। आइए, सुनते हैं, उनके स्वर में यह भावपूर्ण ठुमरी।

ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : विदुषी गिरिजा देवी




फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में सहगल द्वारा प्रस्तुत इस ठुमरी को जहाँ अपार लोकप्रियता मिली, वहीं उन्होने इस गीत में दो बड़ी ग़लतियाँ भी की है। इस बारे में उदयपुर के ‘राजस्थान साहित्य अकादमी’ की पत्रिका ‘मधुमती’ में श्री कलानाथ शास्त्री का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसके कुछ अंश हम यहाँ अपने साथी शरद तैलंग के सौजन्य से प्रस्तुत कर रहे हैं। 

“बहुधा कुछ उक्तियाँ, फिकरे या उदाहरण लोककण्ठ में इस प्रकार समा जाते हैं कि कभी-कभी तो उनका आगा-पीछा ही समझ में नहीं आता, कभी यह ध्यान में नहीं आता कि वह उदाहरण ही गलत है, कभी उसके अर्थ का अनर्थ होता रहता है और पीढी-दर-पीढी हम उस भ्रान्ति को ढोते रहते हैं जो लोककण्ठ में आ बसी है। ‘देहरी भई बिदेस...’ भी ऐसा ही उदाहरण है जो कभी था नहीं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायक कुन्दनलाल सहगल द्वारा गायी गई कालजयी ठुमरी में भ्रमवश इस प्रकार गा दिये जाने के कारण ऐसा फैला कि इसे गलत बतलाने वाला पागल समझे जाने के खतरे से शायद ही बच पाये।


पुरानी पीढी के वयोवृद्ध गायकों को तो शायद मालूम ही होगा कि वाजिद अली शाह की सुप्रसिद्ध शरीर और आत्मा के प्रतीकों को लेकर लिखी रूपकात्मक ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ सदियों से प्रचलित है जिसके बोल लोककण्ठ में समा गये हैं– ‘चार कहार मिलि डोलिया उठावै मोरा अपना पराया छूटो जाय...’ आदि। उसमें यह भी रूपकात्मक उक्ति है– ‘देहरी तो परबत भई, अँगना भयो बिदेस, लै बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस...’। जैसे पर्वत उलाँघना दूभर हो जाता है वैसे ही विदेश में ब्याही बेटी से फिर देहरी नहीं उलाँघी जाएगी, बाबुल का आँगन बिदेस बन जाएगा। यही सही भी है, बिदेस होना आँगन के साथ ही फबता है, देहरी के साथ नहीं, वह तो उलाँघी जाती है, परबत उलाँघा नहीं जा सकता, अतः उसकी उपमा देहरी को दी गई। हुआ यह कि गायक शिरोमणि कुन्दनलाल सहगल किसी कारणवश बिना स्क्रिप्ट के अपनी धुन में इसे यूँ गा गये ‘अँगना तो पर्वत भया देहरी भई बिदेस...’ और उनकी गायी यह ठुमरी कालजयी हो गई। सब उसे ही उद्धृत करेंगे। बेचारे वाजिद अली शाह को कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि बीसवीं सदी में उसकी उक्ति का पाठान्तर ऐसा चल पड़ेगा कि उसे ही मूल समझ लिया जाएगा। सहगल साहब तो ‘चार कहार मिल मोरी डोलिया सजावैं...’ भी गा गये जबकि कहार डोली उठाने के लिए लगाये जाते हैं, सजाती तो सखियाँ हैं। हो गया होगा यह संयोगवश ही अन्यथा हम तो कालजयी गायक सहगल के परम- प्रशंसक हैं।”


और अब हम यही ठुमरी प्रस्तुत कर रहे सुविख्यात युगल गायक बन्धु पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में। मिश्र बन्धुओं ने इस ठुमरी के आध्यात्मिक पक्ष को बड़े ही प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया है।

ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित राजन और साजन मिश्र



वर्ष १९३८ में ‘न्यू थियेटर’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ के निर्देशक फणी मजुमदार थे। फिल्म के संगीत निर्देशक रायचन्द्र (आर.सी.) बोराल ने अवध के नवाब वाजिद अली खाँ की इस कृति के लिए कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ को चुना। फिल्म में सहगल साहब ने अपनी गायी इस ठुमरी पर स्वयं अभिनय किया है। उनके साथ अभिनेत्री कानन देवी हैं। हालाँकि उस समय पार्श्वगायन की शुरुआत हो चुकी थी, परन्तु फिल्म निर्देशक फणी मजुमदार ने गलियों में पूरे आर्केस्ट्रा के साथ इस ठुमरी की सजीव रिकार्डिंग और फिल्मांकन किया था। एक ट्रक के सहारे माइक्रोफोन सहगल साहब के निकट लटकाया गया था और चलते-चलते यह ठुमरी और दृश्य रिकार्ड हुआ था। सहगल ने भैरवी के स्वरों का जितना शुद्ध रूप इस ठुमरी गीत में किया है, फिल्म संगीत में उतना शुद्ध रूप कम ही पाया जाता है। आप सुनिए, कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी और इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : फिल्म – स्ट्रीट सिंगर : कुन्दनलाल सहगल




आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक पूरब अंग की सुविख्यात गायिका के स्वर में एक पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१- यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

२- इस ठुमरी का प्रयोग सातवें दशक की एक फिल्म में किया गया था। क्या आप उस फिल्म का नाम हमें बता सकते हैं?
 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९८वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ९४वें अंक की पहेली में हमने आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में भैरवी की पारम्परिक ठुमरी ‘बाजूबन्द खुल खुल जाए...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘भैरवी’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका गिरिजा देवी। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। लखनऊ से प्रकाश गोविन्द ने दूसरे प्रश्न के उत्तर में गायिक को सही नहीं पहचाना, उन्हें इस बार एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी गीत के रूप में प्रयोग की चर्चा करेंगे। आपकी स्मृतियों में यदि किसी मूर्धन्य कलासाधक की ऐसी कोई पारम्परिक ठुमरी या दादरा रचना हो जिसे किसी भारतीय फिल्म में भी शामिल किया गया हो तो हमें अवश्य लिखें। आपके सुझाव और सहयोग से इस स्तम्भ को अधिक सुरुचिपूर्ण रूप दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९:३० बजे हम और आप इसी मंच पर पुनः मिलंगे। आप अवश्य पधारिएगा।


कृष्णमोहन मिश्र



रविवार, 30 सितंबर 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी



स्वरगोष्ठी – ९० में आज  
‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ 

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं, कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों के बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज से हम आरम्भ कर रहे हैं, एक नई लघु श्रृंखला- ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। शीर्षक से आपको यह अनुमान हो ही गया होगा कि इस श्रृंखला में हम आपके लिए कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जिन्हें भारतीय फिल्मों में शामिल किया गया। फिल्मों का हिस्सा बन कर इन ठुमरियों को इतनी लोकप्रियता मिली कि लोग मूल पारम्परिक ठुमरी को प्रायः भूल गए। इस श्रृंखला में हम आपके लिए उप-शास्त्रीय संगीत की इस मनमोहक विधा के पारम्परिक स्वरूप के साथ-साथ फिल्मी स्वरूप भी प्रस्तुत करेंगे। 


घु श्रृंखला- ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के आज के पहले अंक का राग है, झिंझोटी और ठुमरी है- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’। परन्तु इस ठुमरी पर चर्चा से पहले ठुमरी शैली पर थोड़ी चर्चा आवश्यक है। ठुमरी भारतीय संगीत की रस, रंग और भाव से परिपूर्ण शैली है, जिसे उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल से लेकर अब तक अपार लोकप्रियत मिली। यद्यपि इस शैली के गीत रागबद्ध होते हैं, किन्तु "ध्रुवपद" और "ख़याल" की तरह राग के कड़े प्रतिबन्ध नहीं रहते। रचना के शब्दों के अनुकूल रस और भाव की अभिव्यक्ति के लिए कभी-कभी गायक राग के स्वरों में अन्य स्वरों को भी मिला देते हैं। ठुमरी गीतों में श्रृंगार और भक्ति रस की प्रधानता होती है। कुछ ठुमरियों में इन दोनों रसों का अद्भुत मेल भी मिलता है।

आज के अंक में प्रस्तुत की जाने वाली पारम्परिक ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ के गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ सम्पूर्ण भारतीय संगीत का प्रतिनिधित्व करते थे। वे उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। उन्होने दक्षिण के कर्नाटक संगीत के कई रागों को उत्तर भारतीय संगीत में शामिल किया और सरगम के विशिष्ट अन्दाज को उत्तर भारत में प्रचलित किया। किराना घराने के इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष १८८४ में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं, वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत-सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे १८९९ से १९०२ तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। खाँ साहब खयाल गायकी के साथ ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत के गायन में भी दक्ष थे। वर्ष १९२५-२६ में उनकी गायी राग झिंझोटी की अत्यन्त लोकप्रिय ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ का रिकार्ड भी बना था। आइए, उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में सुनते हैं, राग झिंझोटी यही प्रसिद्ध ठुमरी।

ठुमरी राग झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

 

इस परम्परागत ठुमरी को १९३६ में हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म "देवदास" में शामिल किया गया था। फिल्म का निर्देशन पी.सी. बरुआ ने किया था। फिल्म में देवदास की भूमिका में कुन्दनलाल सहगल, पारो (पार्वती) की भूमिका में जमुना बरुआ और चन्द्रमुखी की भूमिका में राजकुमारी ने अभिनय किया था। फिल्म के संगीतकार तिमिर बरन (भट्टाचार्य) थे। तिमिर बरन उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के शिष्य और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वानों के कुल के थे। साहित्य और संगीत में कुशल तिमिर बरन के 'न्यू थियेटर्स' में प्रवेश करने पर पहली फिल्म "देवदास" का संगीत निर्देशन सौंपा गया। इस फिल्म में राग "झिंझोटी" की इसी परम्परागत ठुमरी का स्थायी और एक अन्तरा सहगल साहब ने अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ गाया था। रिकार्डिंग के बाद सहगल साहब की आवाज़ में इस ठुमरी को अब्दुल करीम खाँ साहब ने सुना और सहगल साहब के गायन-शैली की खूब तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई का एक सन्देश भी भेजा था। सहगल साहब ने परदे पर मदहोश देवदास की भूमिका में इस ठुमरी को गाया था। गायन के दौरान ठुमरी में तालवाद्य (तबला आदि) की संगति नहीं की गई है। पार्श्व-संगीत के लिए केवल वायलिन और सरोद की संगति है। आइए, राग "झिंझोटी" की यह ठुमरी के.एल. सहगल के स्वरों में सुनते हैं।


फिल्म – देवदास : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ : कुन्दनलाल सहगल



इसी ठुमरी गीत के साथ आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए। अगले अंक में ऐसी ही एक और परम्परागत ठुमरी पर आपसे चर्चा करेंगे। 


आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक सुविख्यात गायिका के स्वर में ठुमरी का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह हमारा ९०वाँ अंक है और इस अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।  



१_यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?  
२_ इस ठुमरी की गायिका कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९२वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता  

‘स्वरगोष्ठी’ के ८८वें अंक की पहेली में हमने पं. श्रीकुमार मिश्र द्वारा मयूरवीणा पर प्रस्तुत एक राग-रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘मारूबिहाग’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर ताल ‘तीनताल’ है। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर, उत्तर प्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और अहमदाबाद, गुजरात के हमारे एक नये प्रतिभागी कश्यप दवे ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

‘स्वरगोष्ठी’ के ८८वें अंक के प्रकाशन के पहले दिन हम अंक की क्रम संख्या बदलना भूल गए थे। अगले दिन हमने अपनी इस भूल को सुधार दिया था। हमारे कुछ प्रतिभागियों ने पहेली का उत्तर क्रम संख्या ८७ और कुछ ने ८८ क्रमांक अंकित कर भेजा। हमने इन दोनों क्रमांक पड़े हुए उत्तर को स्वीकार किया है। अपनी इस भूल के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में भी हम फिल्मों के आँगन में विचरती, इठलाती, मचलती और ठुमकती ठुमरियों का सिलसिला जारी रखेंगे। अगले अंक में हम अपने इस मंच पर एक मशहूर हस्ती का जन्मदिन भी मनाएँगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित आपकी अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


कृष्णमोहन मिश्र 


 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता

दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।



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