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Wednesday, April 25, 2012

"डफ़ली वाले डफ़ली बजा..." - शुरू-शुरू में नकार दिया गया यह गीत ही बना फ़िल्म का सफ़लतम गीत


कभी-कभी ऐसे गीत भी कमाल दिखा जाते हैं जिनसे निर्माण के समय किसी को कोई उम्मीद ही नहीं होती। शुरू-शुरू में नकार दिया गया गीत भी बन सकता है फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत। एक ऐसा ही गीत है फ़िल्म 'सरगम' का "डफ़ली वाले डफ़ली बजा"। यही है आज के 'एक गीत सौ कहानियाँ' के चर्चा का विषय। प्रस्तुत है इस शृंखला की १७-वीं कड़ी सुजॉय चटर्जी के साथ...



एक गीत सौ कहानियाँ # 17


फ़िल्म इंडस्ट्री एक ऐसी जगह है जहाँ किसी फ़िल्म के प्रदर्शित होने तक कोई १००% भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि फ़िल्म चलेगी या नहीं, यहाँ तक कि फ़िल्म के गीतों की सफ़लता का भी पूर्व-अंदाज़ा लगाना कई बार मुश्किल हो जाता है। बहुत कम बजट पर बनी फ़िल्म और उसके गीत भी कई बार बहुत लोकप्रिय हो जाते हैं और कभी बहुत बड़ी बजट की फ़िल्म और उसके गीत-संगीत को जनता नकार देती है। मेहनत और लगन के साथ-साथ क़िस्मत भी बहुत मायने रखती है फ़िल्म उद्योग में। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था फ़िल्म 'सरगम' का संगीत। १९७९ में प्रदर्शित इस फ़िल्म का "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" गीत उस साल बिनाका गीतमाला में चोटी का गीत बना था। और इसी फ़िल्म के संगीत ने एल.पी को १९८० में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी दिलवाया। भले यह पुरस्कार उन्हें मिला पर स्तर की अगर बात करें तो इस फ़िल्म के गीत चल्ताऊ क़िस्म के ही थे। 'सरगम' की तुलना में इसी वर्ष पं रविशंकर के संगीत में फ़िल्म 'मीरा' के गीत या कानु राय के संगीत में फ़िल्म 'गृहप्रवेश' के गीत कई गुणा ज़्यादा उत्कृष्ट थे, पर यह भी एक विडम्बना ही है कि फ़िल्मफ़ेयर कमिटी ने बहुत कम बार के लिए ही गुणवत्ता को पैमाना समझा है। "डफ़ली वाले" गीत के लिए आनन्द बक्शी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार का नामांकन मिला था, पर यह पुरस्कार मिला था गुलज़ार को फ़िल्म 'गोलमाल' के "आने वाला पल जाने वाला है" गीत के लिए।

"डफ़ली वाले डफ़ली बजा" को जनता ने भी हाथों हाथ ग्रहण किया। पर मज़े की बात यह है कि शुरू-शुरू में फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक ने इस गीत को फ़िल्म में रखने से इंकार कर दिया था। इस बात पर अभी आते हैं, उससे पहले 'सरगम' के पार्श्व पर एक नज़र डालते हैं। 'सरगम' एन. एन. सिप्पी द्वारा निर्मित फ़िल्म थी। के. विश्वनाथ लिखित व निर्देशित यह फ़िल्म १९७६ की सुपरहिट तेलुगू फ़िल्म 'सिरि सिरि मुव्वा' की रीमेक थी। 'सरगम' ने अभिनेत्री जया प्रदा को स्टार बना दिया, इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नामांकन भी मिला था, और इस फ़िल्म को १९७९ के बॉक्स ऑफ़िस में तीसरा स्थान मिला था। अब आते हैं "डफ़ली वाले" गीत पर। जब लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने इस गीत की धुन बनाई और आनन्द बक्शी ने बोल लिखे, और निर्माता-निर्देशक को सुनाया तो उन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं आया। उन्हें बोल और संगीत दोनों ही बेकार लगे। "डफ़ली वाले डफ़ली बजा, मेरे घुंघरू बुलाते हैं, आ, मैं नाचूँ तू नचा", ये बोल बहुत ही सस्ते और चल्ताऊ किस्म के लगे। सच भी है, फ़िल्म के अन्य गीतों ("पर्बत के इस पार", "कोयल बोली दुनिया डोली", "मुझे मत रोको मुझे गाने दो", "रामजी की निकली सवारी", "हम तो चले परदेस", "कहाँ तेरा इंसाफ़") की तुलना में "डफ़ली वाले" के बोल कम स्तरीय थे। "डफ़ली वाले" गाना रद्द हो गया। फ़िल्म की शूटिंग् शुरू हुई; एक एक कर सारे गानें फ़िल्माए गए। पर लक्ष्मी-प्यारे को पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि "डफ़ली वाले" को पब्लिक स्वीकार करेगी और गाना हिट होगा, पर उनकी बात को कोई नहीं मान रहा था। पूरी फ़िल्म कम्प्लीट हो गई पर "डफ़ली वाले" की क़िस्मत नहीं चमकी। पर अन्त में एल.पी के लगातार अनुरोध करने पर निर्माता मान गए और "डफ़ली वाले" गीत की रेकॉर्डिंग् को अप्रूव कर दिया।

लता और रफ़ी की आवाज़ों में लक्ष्मी-प्यारे ने "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" को रेकॉर्ड तो कर लिया गया, पर अब अगली समस्या यह आन पड़ी की फ़िल्म में किसी और गीत की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी। ऐसी कोई सिचुएशन नहीं थी जिसमें "डफ़ली वाले" को फ़िट किया जाए। जिन लोगों ने यह फ़िल्म देखी है, उन्हें पता है कि "डफ़ली वाले" को फ़िल्म के बिल्कुल अन्त में, क्लाइमैक्स से पहले एक ऐसी जगह पर डाल दिया गया है, बल्कि यूं कहें कि ठूस दिया गया है, जहाँ पर गीत का कोई सिचुएशन ही नहीं था। मैंने जब यह फ़िल्म दूरदर्शन पर देखी थी, तब इस गीत को न पा कर शुरू शुरू में ऐसा लगा था जैसे दूरदर्शन वालों ने गीत को काट दिया है (ऐसा दूरदर्शन अक्सर करता था), पर मेरी यह धारणा ग़लत निकली और फ़िल्म के बिल्कुल अन्त में यह गीत सुनाई/दिखाई दिया। इस तरह से "डफ़ली वाले" को फ़िल्म में एन्ट्री तो मिल गई और गीत भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ, पर एक अफ़सोस की बात यह रह गई कि फ़िल्म में इस गीत के लिए एक अच्छी सिचुएशन नहीं बन सकी। अगर निर्माता-निर्देशक शुरू में ही एल.पी की बात मान कर गीत को रख लेते तो शायद ऐसा नहीं होता। ख़ैर, अन्त भला तो सब भला।

ॠषी कपूर, डफ़ली और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की तिकड़ी का एक बार फिर साथ हुआ 'सरगम' के बनने के १० साल बाद। १९८९ में एक फ़िल्म बनी थी 'बड़े घर की बेटी', जिसमें "डफ़ली वाले" गीत जैसा एक गीत बनाने की कोशिशें हुई थी। आनन्द बक्शी की जगह आ गए संतोष आनन्द, जया प्रदा की जगह आ गईं मीनाक्षी शेशाद्री, तथा लता-रफ़ी के जगह आ गए अनुराधा पौडवाल और मोहम्मद अज़ीज़। और गीत बना "तेरी पायल बजी जहाँ मैं घायल हुआ वहाँ, तेरी डफ़ली बजी जहाँ मैं पागल हुई वहाँ"। यह गीत "डफ़ली वाले" की तरह ब्लॉकबस्टर तो नहीं हुआ, पर अच्छी ख़ासी लोकप्रियता ज़रूर हासिल की थी। यूं तो फ़िल्मी गीतों के फ़िल्मांकन में डफ़ली का प्रयोग काफ़ी बार हुआ है, पर गीत के बोलों में डफ़ली का इस्तमाल इन्हीं दो गीतों में सबसे ज़्यादा चर्चित हुआ है। चलते चलते यही कहेंगे कि "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" की सफलता से हमें ज़िन्दगी के लिए यही सबक मिलती है कि किसी को भी हमें अंडरेस्टिमेट नहीं करनी चाहिए, कब कौन बड़ा काम कर जाए कह नहीं सकते, किसी को भी कमज़ोर समझ कर उसका अपमान नहीं करना चाहिए; शुरू-शुरू में नकार दिया गया गीत "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" ही बना था फ़िल्म का सफ़लतम गीत।

"डफ़ली वाले" सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें।


तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तंभ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Tuesday, June 14, 2011

एक हसीना थी, एक दीवाना था....एक कहानी नुमा गीत जिसमें फिल्म की पूरी तस्वीर छुपी है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 678/2011/118

'एक था गुल और एक थी बुलबुल' शृंखला में कल आपने १९७९ की फ़िल्म 'मिस्टर नटवरलाल' का गीत सुना था। जैसा कि हमने कल बताया था कि आनन्द बक्शी साहब के लिखे दो गीत आपको सुनवायेंगे, तो आज की कड़ी में सुनिये उनका लिखा एक और ज़बरदस्त कहानीनुमा गीत। यह केवल कहानीनुमा गीत ही नहीं, बल्कि उसकी फ़िल्म का सार भी है। पुनर्जनम की कहानी पर बनने वाली फ़िल्मों में एक महत्वपूर्ण नाम है 'कर्ज़' (१९८०)। राज किरण और सिमी गरेवाल प्रेम-विवाह कर लेते हैं। राज को भनक तक नहीं पड़ी कि सिमी ने दरअसल उसके बेहिसाब जायदाद को पाने के लिये उससे शादी की है। और फिर एक दिन धोखे से सिमी राज को गाड़ी से कुचल कर पहाड़ से फेंक देती है। राज किरण की मौत हो जाती है और सिमी अपने स्वर्गवासी पति के एस्टेट की मालकिन बन जाती है। लेकिन कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई। प्रकृति भी क्या क्या खेल रचती है! राज दोबारा जनम लेता है ॠषी कपूर के रूप में, और जवानी की दहलीज़ तक आते आते उसे अपने पिछले जनम की याद आ जाती है और किस तरह से वो सिमी से बदला लेता है अपने इस जनम की प्रेमिका टिना मुनीम के साथ मिल कर, किस तरह से पिछले जनम का कर्ज़ चुकाता है, यही है इस ब्लॉकबस्टर फ़िल्म की कहानी। एक कमर्शियल फ़िल्म की सफलता के लिये जिन जिन बातों की ज़रूरत होती है, वो सभी बातें मौजूद थीं सुभाष घई की इस फ़िल्म में। यहाँ तक कि इसके गीत-संगीत का पक्ष भी बहुत मज़बूत था। दोस्तों, पूनर्जनम और सस्पेन्स फ़िल्मों में पार्श्वसंगीत का बड़ा हाथ होता है माहौल को सेट करने के लिये। और ख़ास कर पूनर्जनम की कहानी मे ऐसी विशेष धुन की ज़रूरत होती है जिससे आती है एक हौण्टिंग् सी फ़ीलिंग्। यह धुन बार बार बजती है, और कभी कभी तो इसकी कहानी में इतनी अहमियत हो जाती है कि यह धुन ही पिछले जनम की याद दिलवा जाये! ऐसा ही कुछ 'कर्ज़' में भी था। याद है आपको वह इन्स्ट्रुमेण्टल पीस जो राज किरण और सिमी की गाड़ी में बजी थी ठीक राज के कत्ल से पहले। अगले जनम में ऋषी इसी धुन पर आधारित गीत गा कर और उस धुन पर उसी भयानक कहानी को सुना कर सिमी को भयभीत कर देता है। और दोस्तों, यही कहानी है आज के गीत में, जिसे आवाज़ें दी हैं किशोर कुमार और आशा भोसले नें। "एक हसीना थी, एक दीवाना था..."। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत था इस फ़िल्म में।

अभी जो उपर 'कर्ज़' फ़िल्म की कहानी हमने बतायी, उसी का एक अन्य रूप था गीत की शक्ल में! और फिर एक बार आनन्द बक्शी ऐट हिज़ बेस्ट!!! क्या कमाल का लिखा है। सिचुएशन है कि ऋषी कपूर को पिछले जनम की कातिल-पत्नी सिमी गरेवाल को उस भायानक कहानी की याद दिला कर उसे डराना है, उसे एक्स्पोज़ करना है। इस जनम में ऋषी एक सिंगर-डान्सर हैं, और यह काम वो एक स्टेज-शो में टिना मुनीम के साथ मिल कर करते हैं। गीत के शुरुआती बोल ऋषी कपूर की आवाज़ में ही है। आइए इस गीत-रूपी कहानी को पहले पढ़ें और फिर सुनें।

रोमिओ-जुलिएट, लैला-मजनु, शिरी और फ़रहाद,
इनका सच्चा इश्क़ ज़माने को अब तक है याद।

याद मुझे आया है एक ऐसे दिलबर का नाम,
जिसने धोखा देकर नाम-ए-इश्क़ किया बदनाम।

यही है सायबान कहानी प्यार की,
किसी ने जान ली, किसी ने जान दी।

एक हसीना थी, एक दीवाना था,
क्या उमर, क्या समा, क्या ज़माना था।

एक दिन वो मिले, रोज़ मिलने लगे,
फिर मोहब्बत हुई, बस क़यामत हुई,
खो गये तुम कहाँ, सुन के ये दास्ताँ,
लोग हैरान हैं, क्योंकि अंजान हैं,
इश्क की वो गली, बात जिसकी चली,
उस गली में मेरा आना-जाना था,
एक हसीना थी एक दीवाना था।

उस हसीं ने कहा, सुनो जाने-वफ़ा,
ये फ़लक ये ज़मीं, तेरे बिन कुछ नहीं,
तुझपे मरती हूँ मैं, प्यार करती हूँ मैं,
बात कुछ और थी, वो नज़र चोर थी,
उसके दिल में छुपी चाह दौलत की थी,
प्यार का वो फ़कत एक बहाना था,
एक हसीना थी एक दीवाना था।

बेवफ़ा यार ने अपने महबूब से,
ऐसा धोखा किया,
ज़हर उसको दिया,
धोखा धोखा धोखा धोखा।

मर गया वो जवाँ,
अब सुनो दास्ताँ,
जन्म लेके कहीं फिर वो पहुँचा वहीं,
शक्ल अंजान थी, अक्ल हैरान थी,
सामना जब हुआ, फिर वही सब हुआ,
उसपे ये कर्ज़ था, उसका ये फ़र्ज़ था,
फ़र्ज़ तो कर्ज़ अपना चुकाना था।




क्या आप जानते हैं...
कि 'कर्ज़' फ़िल्म के इस गीत के पहले इंटरल्युड म्युज़िक का इस्तमाल अनु मलिक नें फ़िल्म 'हर दिल जो प्यार करेगा' के गीत "ऐसा पहली बार हुआ सतरह अठरह सालों में" में किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 9/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - लता की आवाज़ है गीत में.
सवाल १ - संगीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल २ - गीतकार का नाम बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है अनजाना जी वाकई सत्यग्रह पर बैठ गए हैं, अरे भाई हम सरकार नहीं हैं वापस आईये मुकाबल एकतरफा हो रहा है, अमित जी क्षिति जी और अविनाश जी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, May 26, 2011

मेरा तो जो भी कदम है.....इतना भावपूर्ण है ये गीत कि सुनकर किसी की भी ऑंखें नम हो जाए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 663/2011/103

'...और कारवाँ बनता गया'... मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गीतों का कारवाँ इन दिनों चल रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। पिछली चार कड़ियों में हमनें ४० और ५० के दशकों से चुन कर चार गानें हमनें आपको सुनवाये, आज क़दम रखेंगे ६० के दशक में। साल १९६४ में एक फ़िल्म आयी थी 'दोस्ती' जिसनें न केवल मजरूह को उनका एकमात्र फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलवाया, बल्कि संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को भी उनका पहला फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलवाया था। वैसे विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में प्यारेलाल जी नें स्वीकार किया था कि इस पुरस्कार को पाने के लिये उन्होंने बहुत सारे फ़िल्मफ़ेयर मैगज़ीन की प्रतियाँ ख़रीद कर उनमें प्रकाशित नामांकन फ़ॉर्म में ख़ुद ही अपने लिये वोट कर ख़ुद को जितवाया था। पंकज राग नें भी इस बारे में अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखा था - "फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों पर शंकर-जयकिशन के कुछ जायज़ और कुछ नाजायज़ तरीके के वर्चस्व को उनसे बढ़कर नाजायज़ी से तोड़ना और 'संगम' को पछाड़ कर 'दोस्ती' के लिये तिकड़मबाज़ी से फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार प्राप्त करना सफलता के लिये इनके हदों को तोड़नेवाली महत्वाकांक्षा दर्शाता है।" ख़ैर, वापस आते हैं मजरूह सुल्तानपुरी पर। एल.पी के साथ भी मजरूह साहब नें काफ़ी अच्छा काम किया है, इसलिए दस संगीतकारों के साथ उनके लिखे गीतों की इस शृंखला में एल.पी का स्वरबद्ध एक गीत सुनवाना अत्यावश्यक हो जाता है। और ऐसे में फ़िल्म 'दोस्ती' के एक गीत की गुंजाइश तो बनती है। इस फ़िल्म से सुनिये रफ़ी साहब की आवाज़ में "मेरा तो जो भी क़दम है, वो तेरी राह में है, कि तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाह में है"। वैसे जिस गीत के लिये मजरूह साहब को यह पुरस्कार मिला था, वह था "चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे"।

मजरूह सुल्तानपुरी नें उस दौर के सभी दिग्गज संगीतकारों की धुनों पर गानें लिखे हैं। वो किसी भी सिचुएशन पर बड़ी ही सहजता से गीत लिख सकते थे, जो अलग से सुनने पर भी एक अलग ही जज़्बात की गहराई महसूस होती है। वक़्त के साथ साथ किसी भी गीतकार की लेखनी में गहराई आती चली जाती है। मजरूह साहब के गीतों में भी ऐसी गहराई देखने को मिलती है, चाहे वो उस दौर में लिखे गीत हों, या इस ज़माने का। उनके गीतों में कुछ न कुछ ज़रूर है जो हमारे ख़यालों को महका जाते हैं। मजरूह साहब चाहे कम्युनिस्ट विचारधारा के क्रांतिकारी लेखकों में से एक थे, लेकिन उन्होंने अपनी इस विचारधारा का प्रचार करने के लिये फ़िल्मी गीतों का सहारा नहीं लिया। और न ही उन्होंने फ़िल्मी गीतों में अपनी अदबी और भारी-भरकम शायरी के जोहर दिखाने की कभी कोशिश की। लेकिन उन्होंने पूरी दक्षता के साथ फ़िल्मी गीत लेखन का कार्य पूरा किया और पूरी सफलता के साथ पूरा किया, और स्थान-काल-चरित्र को ध्यान में रखते हुए अच्छे से अच्छा गीत लिखने का निरंतर प्रयास किया पाँच दशकों तक। और आज का प्रस्तुत गीत भी उन्हीं में से एक है। तो आइए सुनते हैं मजरूह-एल.पी-रफ़ी की तिकड़ी का यह यादगार गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी एकमात्र किताब 'ग़ज़ल' प्रकाशित हुई थी १९५६ में। इसके बाद इस किताब के कई एडिशन प्रकाशित हुए, जिनमें से एक का शीर्षक था 'मशाल-ए-जान'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 6/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - इस फिल्म क वो कौन सा गीत है जिसे हम पहले ओल्ड इस गोल्ड में सुनवा चुके हैं - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म के नायक कौन है - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं- 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी बधाई, लगता है अब आप अविनाश जी को टक्कर दे सकेंगीं...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, May 19, 2011

भँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर....एक क्लास्सिक गीत जिसका कोई सानी नहीं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 660/2011/100

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! गायक गायिकाओं की हँसी का मज़ा लेते हुए 'गान और मुस्कान' लघु शृंखला की अंतिम कड़ी में आज हम आ पहुँचे हैं। इस आख़िरी कड़ी के लिए हमने वह गीत चुना है जिसमें लता जी सब से ज़्यादा हँसती हुई सुनाई देती हैं, यानी कि सबसे ज़्यादा अवधि के लिए उनकी हँसी सुनाई दी है इस गीत में। सुरेश वाडकर के साथ उनका गाया यह है १९८२ की फ़िल्म 'प्रेम-रोग' का गीत "भँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर"। फ़िल्म में सिचुएशन कुछ ऐसा था कि नायिका (पद्मिनी कोल्हापुरी) विवाह की पहली ही रात में विधवा हो जाती है और कुछ ही दिनों में ससुराल को छोड़ कर मायके वापस आने के लिए मजबूर हो जाती है। मायके में भी उसका आदर-सम्मान नहीं होता और एक दुखभरी जीवन गुज़ारने लगती है। ऐसे में उसके चेहरे पर मुस्कान वापस लाता है उसका बचपन का साथी (ऋषी कपूर)। किसी बहाने से जब पद्मिनी ऋषी के साथ घर से बाहर निकलती है, एक अरसे के बाद जब खुली हवा में सांस लेती है, हरे लहलहाते खेतों में दौड़ती-भागती है, ऐसे में किसका मन ख़ुशी के मारे मुस्कुराएगा नहीं। जो एक खुले दिल से हँसने वाली बात होती है, उस हँसी की ज़रूरत थी इस गीत में, और लता जी नें उसे पूरा पूरा निभाया है इस गीत में। गीत तो आपने कई कई बार सुना होगा, आज इस शृंखला में एक बार फिर से इस गीत को सुन कर देखिए, मज़ा कुछ बढ़के ही आयेगा।

राज कपूर की फ़िल्म 'प्रेम रोग' में संगीत था लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का। प्रस्तुत गीत के गीतकार हैं पंडित नरेंद्र शर्मा। जो सिचुएशन अभी उपर हमनें उपर बताया, उस पर कितना सुंदर गीत पंडित जी नें लिखा है। मुखड़ा तो है ही कमाल का, अंतरों में भी कितना सुंदर वर्णन है। इस तरह की अभिव्यक्ति को हिंदी व्याकारण में अन्योक्ति अलंकार कहते हैं। यानी कि शब्द कुछ कहे जा रहे हैं, लेकिन इशारा किसी और बात पर है। हिंदी के शुद्ध शब्दों के प्रयोग से गीत में और भी मधुरता आ गई है। और बाकी की मधुरता लता और सुरेश की आवाज़ों नें ला दी है। कुल मिलाकर एक सदाबहार गीत है "भँवरे ने खिलाया फूल"। पंडित जी की सुपुत्री लावण्या शाह इंटरनेट पर सक्रीय हैं। उनका साक्षात्कार आप 'हिंद-युग्म' पर पहले भी पढ़ चुके हैं, और बहुत जल्द 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में भी एक अलग अंदाज़ में पढ़ने वाले हैं। लेकिन आज यहाँ पर हम पंडित जी का वह इंट्रोडक्शन पढ़ेंगे जो इंट्रो विविध भारती नें पंडित जी द्वारा प्रस्तुत 'जयमाला' कार्यक्रम की शुरुआत में दिया था - "आज की 'जयमाला गोल्ड' में हम आपको उस शख़्स की रेकॉर्डिंग् सुनवा रहे हैं जिन्हें श्रेय है भारत के सब से लोकप्रिय रेडियो चैनल विविध भारती को शुरु करने का। इस सेवा को 'विविध भारती' नाम इन्होंने ही दिया था। इनको हम सब जानते हैं पंडित नरेन्द्र शर्मा के नाम से। २ अक्तुबर १९५७ को जब विविध भारती के प्रसारण की शुरुआत हुई तो पंडित नरेन्द्र शर्मा नियुक्त हुए विविध भारती के चीफ़ प्रोड्युसर। १९१३ में २८ फ़रवरी को उत्तर प्रदेश के एक गाँव जहांगीरपुर में जन्मे नरेन्द्र शर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे - कविता, फ़िल्मी गीत लेखन, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, सब में उनकी गहन रुचि थी। पंडित नरेन्द्र शर्मा हिंदी, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेज़ी के विद्वान थे। सन् १९३३ मे साहित्यकार भगवती चरण वर्मा पंडित नरेन्द्र शर्मा को अपने साथ मुंबई लवा लाये। मुंबई में ही पंडित शर्मा जुड़े फ़िल्मों से एक गीतकार के रूप में। गीतकार के रूप में उनकी पहली फ़िल्म थी बॉम्बे टॉकीज़ की 'हमारी बात'। आपनें फ़िल्म 'मालती माधव' की पटकथा भी लिखी थी। 'ज्वार भाटा', 'सती अहल्या', 'अन्याय', 'श्री कृष्ण दर्शन', 'वीणा', 'बनवासी', 'सजनी', 'चार आँखें', 'भाभी की चूड़ियाँ', 'अदालत', 'प्रेम रोग' और 'सत्यम शिवम सुंदरम' आदि फ़िल्मों में उन्होंने गीत लिखे।" दोस्तों, यह तो था एक छोटा सा परिचय पंडित जी का। जैसा कि हमनें बताया, बहुत जल्द उन पर एक विस्तारित साक्षात्कार हम आप तक पहुँचाएंगे, इसी वादे के साथ आप आज का यह गीत सुनिये और मुझे अनुमति दीजिए 'गान और मुस्कान' शृंखला को समाप्त करने की। शनिवार की शाम विशेषांक के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के महफ़िल की शमा जलाने हाज़िर हो जाउँगा, पधारिएगा ज़रूर, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि राज कपूर और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का जो नाता 'बॉबी' से शुरु हुआ था, वह 'प्रेम रोग' पर आकर टूट गया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 1/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक मशहूर गीतकार के आरंभिक गीतों (संभवतः पहला गीत) में से एक.
सवाल १ - किस गायिका की आवाज़ में है ये - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका कौन है - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत दिनों बाद किसी शृंखला में टाई हुआ है, वैसे अनजाना जी जीत सकते थे आसानी से, पर खैर हम अमित जी और अनजाना जी को सयुंक्त रूप से बधाई देते हुए अगली शृंखला के लिए शुभकामनाएँ भी दिए देते हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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