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सोमवार, 21 मार्च 2011

चंदा रे जा रे जा रे....मुस्लिम समाज में महिलाओं की निर्भीक आवाज़ बनकर उभरी इस्मत चुगताई को आज आवाज़ सलाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 617/2010/317

हिंदी सिनेमा के कुछ सशक्त महिला कलाकारों को सलाम करती 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की सातवीं कड़ी में आप सभी का फिर एक बार स्वागत है। आज हम जिस प्रतिभा से आपका परिचय करवा रहे हैं, वो एक उर्दू की जानीमानी लेखिका तो हैं ही, साथ ही फ़िल्म जगत को एक कहानीकार, पटकथा व संवाद लेखिका, निर्मात्री व निर्देशिका के रूप में अपना परिचय देनेवाली इस फनकारा का नाम है इस्मत चुगताई। १५ अगस्त १९१५ को उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मीं और जोधपुर राजस्थान में पलीं इस्मत जी के पिता एक सिविल सर्वैण्ट थे। ६ भाई और ४ बहनों के विशाल परिवार में इस्मत नौवीं संतान थीं। इस्मत की बड़ी बहनों का उनकी बचपन में ही शादी हो जाने की वजह से इस्मत का बचपन अपने भाइयों के साथ गुज़रा। और शायद यही वजह थी इस्मत के अंदर पनपने वाले खुलेपन की और इसी ने उनके लेखन में बहुत ज़्यादा प्रभाव डाला। इस्मत के युवावस्था में ही उनका भाई मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुगताई एक स्थापित लेखक बन चुके थे, और वो ही उनके पहले गुरु बनें। १९३६ में स्नातक की पढ़ाई करते हुए इस्मत चुगताई लखनऊ में आयोजित 'प्रोग्रेसिव राइटर्स ऐसोसिएशन' की पहली सभा मे शरीक हुईं। बी.ए. करने के बाद इस्मत ने बी.टी की पढ़ाई की, और बी.ए और बी.टी, दोनों डिग्रियाँ अर्जित करने वाली भारत की पहली मुस्लिम महिला बन गईं। और इसी दौरान वो छुपा छुपा कर लिखने लगीं, क्योंकि उनके इस लेखन का उनकी रूढ़ीवादी मुस्लिम परिवार ने घोर विरोध किया। तमाम मुसीबतों और कठिनाइयों का सामना करते हुए इस्मत चुगताई नें अपना लेखन कार्य जारी रखा और इस देश की आनेवाली लेखिकाओं के लिए राह आसान बनाई। और इसीलिए 'कोमल है कमज़ोर नहीं' शृंखला सलाम करती है इस्मत चुगताई जैसी सशक्त लेखिका को।

जैसा कि हमनें कहा कि इस्मत चुगताई को बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है, आइए इस ओर थोड़ा नज़र डालें। उनकी बहुत सारी लेखों का दक्षिण एशिया में घोर विरोध किया क्योंकि उन सब में मुस्लिम समाज में लाये जाने वाली ज़रूरी बदलावों की बात की गई थी, यहाँ तक कि इस्लामिक उग्रवाद पर भी वार किया था उन्होंने। मुस्लिम महिलाओं की नक़ाबपोशी (परदा) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उन्होंने मुस्लिम समाज में तूफ़ान उठा दिया था। वर्तमान में मुस्लिम देशों में इस्मत चुगताई की बहुत सी किताबों पर प्रतिबंध है। इस्मत चुगताई के हिंदी सिनेमा में योगदान की अगर बात करें तो उन्होंने इस राह में पदार्पण किया था १९४८ की फ़िल्म 'ज़िद्दी' में, जिसकी उन्होंने कहानी लिखी थी। उसके बाद १९५० में 'फ़रेब' का उन्होंने निर्देशन किया। १९५८ की फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' का न केवल उन्होंने निर्माण किया, बल्कि पटकथा भी ख़ुद लिखीं। १९६८ की फ़िल्म 'जवाब आयेगा' को निर्देशित कर १९७३ की मशहूर कलात्मक फ़िल्म 'गरम हवा' की कहानी लिखीं। १९७५ की वृत्तचित्र 'माइ ड्रीम्स' का उन्होंने निर्देशन किया और १९७८ की फ़िल्म 'जुनून' में संवाद लिखे और अभिनय भी किया। २४ अक्तुबर १९९१ को इस्मत चुगताई का बम्बई में निधन हो गया। मुस्लिम होते हुए भी उन्हें कब्र में समाधि नहीं दी गई, बल्कि उनके ख़्वाहिशानुसार उनका अंतिम संस्कार चंदनवाड़ी क्रिमेटोरियम में किया गया। इस छोटे से लेख में इस्मत चुगताई जैसी विशाल प्रतिभा को पूरी तरह से हम समेट नहीं सकते, फिर कभी मौका मिला तो उनके शख्सियत की कुछ और बातें आपको बताएँगे। फ़िल्हाल आइए सुनते हैं फ़िल्म 'ज़िद्दी' से लता मंगेशकर का गाया "चंदा रे, जा रे जा रे"। खेमचंद प्रकाश का संगीत था इस फ़िल्म में और गीतकार थे प्रेम धवन, जिनकी यह पहली पहली फ़िल्म थी। दरअसल निर्देशक शाहीद लतीफ़ और इस्मत चुगताई ही प्रेम धवन साहब को ले गये थे अशोक कुमार और देविका रानी के पास और गीतकार के लिए उनका नाम सुझाया। प्रेम धवन साहब के लिए आज का प्रस्तुत गीत बहुत मायने रखता था, तभी तो विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कुछ इस तरह से उन्होंने इसके बारे में कहा था - "मैं अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर इप्टा से जुड़ गया, कम्युनिस्ट के ख़यालात थे मुझमें। पंजाब में मैं इसका फ़ाउण्डर मेम्बर था। मैंने एक ट्रूप बनाया पंडित रविशंकर और सचिन शंकर के साथ मिल कर और हम पंजाबी में कार्यक्रम पेश करने लगे पूरे देश में घूम घूम कर, और अपनी संस्था इप्टा के लिए चंदा इकट्ठा करते ज़रूरतमंद लोगों की सेवा के लिए। पर १९४७ में दंगे शुरु हो गए और हमारे टूर भी बंद हो गए। चंदा कलेक्ट करना भी बंद हो गया। हमनें फ़ैसला किया कि थिएटर को बंद कर दिया जाए। थिएटर बंद होने के बाद फ़िल्मवालों ने बुलाया। मेरी पहली फ़िल्म थी 'बॊम्बे टाकीज़' की 'ज़िद्दी'। उसमें एक गीत था "चंदा रे, जा रे जा रे", जिसे लता ने गाया था। उस समय लता भी नई नई थी। यह 'महल' के पहले की बात है। यह गीत मेरे करीयर का एक लैण्डमार्क गीत था और लता का भी। इस कॊण्ट्रैक्ट के ख़त्म होने के बाद मैंने अनिल बिस्वास के लिए कई फ़िल्मों में गानें लिखे जैसे 'लाजवाब', 'तरना' वगेरह।" तो आइए दोस्तों, इस्मत चुगताई को सलाम करते हुए सुनें उनकी लिखी कहानी पर बनी फ़िल्म 'ज़िद्दी' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि इस्मत चुगताई के जीवन पर लिखे किताबों में उल्लेखनीय दो किताबें हैं सुक्रीता पाल कुमार लिखित 'Ismat: Her Life, Her Times' तथा मंजुला नेगी लिखित 'Ismat Chughtai, A Fearless Voice'

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक आवाज़ है येसुदास की.

सवाल १ - हम चर्चा करेंगें इस गीत की फिल्म की निर्देशिका की, कौन हैं ये - २ अंक
सवाल २ - गीतकार भी एक जानी मानी लेखिका हैं, नाम बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - कौन हैं सहगायिका - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अंजाना जी बाज़ी मार गए....कमाल हैं आप दोनों...वाकई :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

शनिवार, 5 जून 2010

दो हाथ - इस्मत चुगताई

सुनो कहानी: दो हाथ

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में उन्हीं की हिंदी कहानी "माय नेम इज खान" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं इस्मत चुगताई की एक सुन्दर, मार्मिक कथा "दो हाथ", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 6 मिनट 42 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



चौथी के जोडे क़ा शगुन बडा नाजुक़ होता है।
~ इस्मत चुगताई (1911-1991)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

बिलकुल बेवकूफ है तू।
(इस्मत चुगताई की "दो हाथ" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Seventy Sixth Story, Do Hath: Ismat Chugtai/Hindi Audio Book/2010/21. Voice: Anurag Sharma

बुधवार, 26 मई 2010

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, वहशत-ए-दिल क्या करूँ...मजाज़ के मिजाज को समझने की कोशिश की तलत महमूद ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८५

कुछ शायर ऐसे होते है, जो पहली मर्तबा में हीं आपके दिल-औ-दिमाग को झंकझोर कर रख देते हैं। इन्हें पढना या सुनना किसी रोमांच से कम नहीं होता। आज हम जिन शायर की नज़्म लेकर इस महफ़िल में दाखिल हुए है, उनका असर भी कुछ ऐसा हीं है। मैंने जब इनको पहली बार सुना, तब हीं समझ गया था कि ये मेरे दिमाग से जल्द नहीं उतरने वाले। दर-असल हुआ यूँ कि एक-दिन मैं यू-ट्युब पर ऐसे हीं घूमते-घूमते अली सरदार ज़ाफ़री साहब के "कहकशां" तक पहुँच गया। वहाँ पर कुछ नामीगिरामी शायरों की गज़लें "जगजीत सिंह" जी की आवाज़ में सुनने को मिलीं। फिर मालूम चला कि "कहकशां" बस गज़लों का एक एलबम या जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह तो एक धारावाहिक है जिसमें छह जानेमाने शायरों की ज़िंदगियाँ समेटी गई हैं। इन शायरों में से जिनपर मेरी सबसे पहले नज़र गई, वो थे "मजाज़ लखनवी"। इनपर सात या आठ कड़ियाँ मौजूद थीं(हैं)..मैं एक हीं बार में सब के सब देख गया.. और फिर आगे जो हुआ.... आज का आलेख, आज की महफ़िल-ए-गज़ल उसी का एक प्रमाण-मात्र है। मजाज़ के बारे में मैं खुद कुछ कहूँ, इससे अच्छा मैं यह समझता हूँ कि प्रकाश पंडित जी(जो कि मजाज़ को निजी तौर पे जानते थे) के शब्दों का सहारा ले लिया जाए (अब तक मजाज़ के बारे में मैं इतना कुछ जान चुका हूँ कि मैं खुद हीं कुछ कहना चाहता हूँ, लेकिन यह छोटी मुँह बड़ी बात होगी):

" ‘मजाज़’ उर्दू शायरी का कीट्स है।"
" ‘मजाज़’ शराबी है।"
" ‘मजाज़’ बड़ा रसिक और चुटकुलेबाज़ है।"
" ‘मजाज़’ के नाम पर गर्ल्स कालिज अलीगढ़ में लाटरियां डाली जाती थीं कि ‘मजाज़’ किसके हिस्से में पड़ता है। उसकी कविताएं तकियों के नीचे छुपाकर आंसुओं से सींची जाती थीं और कुंवारियां अपने भावी बेटों का नाम उसके नाम पर रखने की क़समें खाती थीं।" (उर्दू की मशहूर अफ़साना निगार इस्मत चुगताई ने भी अपनी आत्मकथा में इस बात का ज़िक्र किया है)

" ‘मजाज़’ के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजिडी औरत है।"

‘मजाज़’ से मिलने से पूर्व मैं ‘मजाज़’ के बारे में तरह-तरह की बातें सुना और पढ़ा करता था और उसका रंगारंग चित्र मैंने उसकी रचनाओं में भी देखा था, विशेष रूप से उसकी नज़्म ‘आवारा’ (आज की नज़्म) में तो मैंने उसे साक्षात् रूप से देख लिया था। लेकिन उससे मिलने का मुझे मौका तब मिला जब मैं और साहिर लाहौर छोड़ने के बाद दिल्ली में घर लेने की जुगत में थे। तो एक रात की बात है। मैं और साहिर रात के १०-११ बजे एक गली से गुजर रहे थे तभी एक दुबला-पतला व्यक्ति अपने शरीर की हड्डियों के ढांचे पर शेरवानी मढ़े बुरी तरह लड़खड़ाता और बड़बड़ाता मेरे सामने आ खड़ा हुआ।

"अख़्तर शीरानी मर गया-हाय अख़्तर! तू उर्दू का बहुत बड़ा शायर था-बहुत बड़ा !"

वह बार-बार यही वाक्य दोहरा रहा था। हाथों से शून्य में उल्टी-सीधी रेखाएं बना रहा था और साथ-साथ अपने मेज़बान को कोसे जा रहा था जिसने घर में शराब होने पर भी से और शराब पीने को न दी थी और अपनी मोटर में बिठाकर रेलवे पुल के पास छोड़ दिया था। ज़ाहिर है कि इस ऊटपटांग-सी मुसीबत से मैं एकदम बौखला गया। मैं नहीं कह सकता कि उस समय उस व्यक्ति से मैं किस तरह पेश आता कि ठीक उसी समय कहीं से ‘जोश’ मलीहाबादी निकल आए और मुझे पहचानकर बोले, "इसे संभालो, प्रकाश ! ‘मजाज़’ है।"

‘मजाज़’ को संभालने की बजाय उस समय आवश्यकता यद्यपि अपने-आपको संभालने की थी लेकिन ‘मजाज़’ का नाम सुनते ही मैं एकदम चौंक पड़ा और दूसरे ही क्षण सब कुछ भुलाते हुए मैं इस प्रकार उससे लिपट गया मानो वर्षों पुरानी मुलाक़ात हो। उस समय तो मेरी ’मजाज़’ से पहचान न थी, लेकिन आगे चलकर हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। उन दिनों ’मजाज़’ लगभग एक महीने हमारे साथ रहा। शराब छुड़ाने की हमने बहुत कोशिश की, लेकिन उसके शराबी दोस्तों ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। ’मजाज़’ को खाने की कोई चिंता न थी, कपड़े फट गए हैं या मटमैले हैं, इसकी भी उसे कोई परवाह न थी। यदि कोई धुन थी तो बस यही कि कहां से, कब और कितनी मात्रा में शराब मिल सकती है ! दिन-रात निरन्तर शराबनोशी का परिणाम नर्वस ब्रेकडाउन के सिवा और क्या हो सकता था जो हुआ। किसी प्रकार पकड़-धकड़ कर रांची मैण्टल हस्पताल में पहुंचाया, लेकिन स्वस्थ होते ही यह सिलसिला फिर से शुरू हो गया; और यह सिलसिला ६ दिसम्बर, १९५५ ई. को बलरामपुर हस्पताल, लखनऊ में उस समय समाप्त हुआ जब कुछ मित्रों के साथ ‘मजाज़’ ने नियमानुसार बुरी तरह शराब पी। मित्र तो अपने-अपने घरों को सिधार गए लेकिन ‘मजाज़’ रात-भर की नस फट गई।

‘मजाज़’ की ज़िन्दगी के हालात बड़े दुःखद थे। कभी पूरी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जहां से उसने बी.ए. किया था, उस पर जान देती थी। गर्ल्स कालिज में हर ज़बान पर उसका नाम था। लेकिन लड़कियों का वही चहेता शायर जब १९३६ ई. में रेडियो की ओर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ’आवाज़’ का सम्पादक बनकर दिल्ली आया तो एक लड़की (मजाज़ जिस लड़की को चाहते थे वो शादीशुदा थी) के ही कारण उसने दिल पर ऐसा घाव खाया जो जीवन-भर अच्छा न हो सका। एक वर्ष बाद ही नौकरी छोड़कर जब वह अपने शहर लखनऊ को लौटा तो उसके सम्बन्धियों के कथनानुसार वह प्रेम की ज्वाला में बुरी तरह फुंक रहा था और उसने बेतहाशा, पीनी शुरू कर कर दी थी। इसी सिलसिले में १९४० ई. में उस पर नर्वस ब्रेकडाउन का पहला आक्रमण हुआ। १९५४ ई. में उस पर पागलपन का दूसरा हमला हुआ। अब वह स्वयं ही अपनी महानता के राग अलापता था। शायरों के नामों की सूची तैयार करता था और ‘ग़ालिब’ और इक़बाल’ के नाम के बाद अपना नाम लिखकर सूची समाप्त कर देता था।

आधुनिक उर्दू शायरी का यह प्रिय दयनीय शायर सन् १९०९ ई. में अवध के एक प्रसिद्ध क़सबे रदौली में पैदा हुआ। पिता सिराजुलहक़ रदौली के पहले व्यक्ति थे ‘जिन्होंने ज़मींदार होते हुए भी उच्च शिक्षा प्राप्त की और ज़मींदारी पर सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी। यों असरारुल हक़ ’मजाज़’ का पालन-पोषण उस उभरते हुए घराने में हुआ जो एक ओर जीवन के पुराने मूल्यों को छाती से लगाए हुए था और दूसरी ओर नए मूल्यों को भी अपना रहा था। बचपन में, जैसाकि उसकी बहन ‘हमीदा’ ने एक जगह लिखा है, ‘मजाज़’ बड़े सरल स्वभाव तथा विमल हृदय का व्यक्ति था। जागीरी वातावरण में स्वामित्व की भावना बच्चे को मां के दूध के साथ मिलती है लेकिन वह हमेशा निर्लिप्त तथा निःस्वार्थ रहा। दूसरों की चीज़ को अपने प्रयोग में लाना और अपनी चीज़ दूसरों को दे देना उसकी आदत रही। इसके अतिरिक्त वह शुरू से ही सौन्दर्य-प्रिय भी था। कुटुम्ब में कोई सुन्दर स्त्री देख लेता तो घंटों उसके पास बैठा रहता। खेल-कूद, खाने-पीने किसी चींज़ की सुध न रहती। प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ के अमीनाबाद हाई स्कूल में प्राप्त कर जब वह आगरा के सेंट जोन्स कालिज में दाखिल हुआ तो कालिज में मुईन अहसन ‘जज़्बी’ और पड़ोस में ‘फ़ानी’ ऐसे शायरों की संगत मिली और यहीं से ‘मजाज़’ की उस ज्योतिर्मय शायरी का प्रादुर्भाव हुआ जिसकी चमक आगरा, अलीगढ़ और दिल्ली से होती हुई समस्त भारत में फैल गई। ‘मजाज़’ की शायरी का आरम्भ बिलकुल परम्परागत ढंग से हुआ और उसने उर्दू शायरी के मिजाज़ का सदैव ख़याल रखा।

"मजाज़ को शामिल किए बग़ैर पिछले ६० सालों का उर्दू शायरी का कोई भी संचयन पूरा नहीं हो सकता। उर्दू साहित्य में योगदान के लिए २०वीं सदी में जिन दो शायरों को सबसे ज़्यादा शोहरत मिली उनमें भारत से मजाज़ हैं और पाकिस्तान से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हैं।" - ये कथन हैं श्री गोपीचंद नारंग के.... तो उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर स्वर्गीय "असर" लखनवी ने एक बार लिखा था: "उर्दू में एक कीट्स पैदा हुआ था लेकिन इन्क़िलाबी भेड़िए उसे उठा ले गए।" जानकारी के लिए बता दूँ कि मजाज़ का एक हीं कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ है - "आहंग" और बस इसी संग्रह के दम पर मजाज़ को उर्दू का कीट्स कहा जाता है। इस बात से जान पड़ता है कि मजाज़ की लेखनी में कितना दम था। प्रमाण के लिए यह शेर मौजूद है:

अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं


मजाज़ के बारे में कहने को अभी बहुत कुछ बाकी है, लेकिन एक हीं आलेख में सब कुछ समेटा नहीं जा सकता। इसलिए आज बस इतना हीं। वैसे क्या आपको यह मालूम है कि मजाज़ की बहन का निकाह जांनिसार अख्तर से हुआ था, यानि कि मजाज़ "जावेद अख्तर" के मामा थे। नहीं मालूम था ना आपको? खैर कोई बात नहीं.. हम किस मर्ज़ की दवा हैं। चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। आज की नज़्म "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ"/"आवारा" को अपनी आवाज़ से सजाया है तलत महमूद साहब ने। हम नज़्म तो आपको सुनवा हीं देंगे, लेकिन आपके लिए दो प्रश्न हैं:
१) तलत साहब की आवाज़ में यह नज़्म हमने किस फिल्म से ली है?
२) आज से सात साल पहले आई एक फिल्म में पूरा का पूरा एक गाना मजाज़ को समर्पित था। उस गाने में "आवारा" नज़्म की ये पंक्तियाँ थीं: "जी में आता है मुर्दा सितारे नोंच लूँ.."। हम किस गाने की बात कर रहे हैं और वह फिल्म कौन-सी थी?
सही जवाब देने वा्लों को भविष्य में जरूर फायदा होगा, मैं इसका विश्वास दिलाता हूँ। खैर, अभी तो यह नज़्म पेश-ए-खिदमत है:

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे ___ का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "जुगनू" और शेर कुछ यूँ था-

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

जुगनू की चमक के साथ महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुईं सीमा जी। आपने इन शेरों से महफ़िल को रौशन कर दिया:

यही अंदाज़ है मेरा समन्दर फ़तह करने का
मेरी काग़ज़ की कश्ती में कई जुगनू भी होते हैं (बशीर बद्र)

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है (क़तील शिफ़ाई)

शाहनवाज़ जी! वाह.. क्या बात कही आपने। अपनी आमद महफ़िल में ऐसे हीं बनाए रखिएगा:

देख के मेरे घर का रस्ता "जुगनू" भी छुप जाता है.
आसमान का हर तारा घर झांक के तेरे आता है.

शन्नो जी, आप हमेशा हीं यही सोच बैठती हैं कि कोई न कोई(ज्यादातर मैं हीं) आपसे नाराज़ हैं। जबकि ऐसा कभी नहीं होता। अंतर्जाल की इस दुनिया में लोग पल भर को मिलते हैं और अगर इस दौरान कोई नाराज़ हीं हो जाए, तो फिर मिलने-मिलाने का मज़ा तो जाता रहेगा। इसलिए आगे से अपने दिमाग में यह वहम पैदा मत होने दीजिएगा। और खुलकर शेर शेयर करते रहिएगा, जैसे कि आज किया है:

फूलों और पातों में आकर छिप जाते हैं
ये जुगनू रोशनी देकर खुद जल जाते हैं.

शरद जी, इस बार आपका शेर कुछ ढीला रह गया। मुझे आपसे एक जबर्दस्त शेर की उम्मीद थी। खैर फिर कभी:

अंधेरा जब भी गहराता है जुगनू याद आते है
चमक दिखला के वो हमको पता अपना बताते हैं । (स्वरचित)

हमें शौक जुगनू पकड़ने का था,
अंधेरों के यूँ हीं सफ़र कट गए। (शकूर अनवर)

अवध जी, आपका किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ। दर-असल गलती मेरी हीं थी, मुझे कुछ और शोध कर लेना चाहिए था, फिर मैं "चचा-जान" की जगह "रिश्तेदार" नहीं लिखता। आप जैसे सुधि-पाठक हों तो लिखने का मज़ा दूना हो जाता है।

अवनींद्र जी, आपने तो पूरी की पूरी गज़ल हीं लिख डालीं। अब मैं तो उस गज़ल से अपने काम का हीं शेर लूँगा :)

ये चांदनी पत्तों पे ढल रही है या
तेरी याद का जुगनू चमक रहा है !

सुमित जी, फिर से वही जल्दी-बाजी। शायर का नाम तो डालते जाते:

मैं ना जुगनू हूँ, दिया हूँ , ना कोई तारा हूँ,
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं।

मस्त-कलंदर जी, महफ़िल में खाली हाथ नहीं आते :) अगली बार, आपसे एक शेर की उम्मीद रहेगी।

नीलम जी, वल्लाह! आपके इस शेर के क्या कहने। वैसे शायर कौन है? :)

मेरी झोली में जुगनुओं कि वो सौगात लाता
यूँ ही नहीं उसकी किस्मत में अहबाब आता

मंजु जी, यादों के जुगनू आपने भी पकड़े हैं शायद.... तभी तो ये खयाल हैं:

तेरे यादों के जुगनू ने रूला दिया,
बिन सावन के बरसात को बुला लिया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

शनिवार, 30 जनवरी 2010

मैं एक बच्चे को प्यार कर रही थी - इस्मत चुगताई

सुनो कहानी: मैं एक बच्चे को प्यार कर रही थी

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में उन्हीं की हिंदी कहानी "गरजपाल की चिट्ठी" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं इस्मत चुगताई की आत्मकथा ''कागज़ी है पैरहन'' से एक बहुत ही सुन्दर, मार्मिक प्रसंग "मैं एक बच्चे को प्यार कर रही थी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।


अनुराग वत्स के प्रयास से इस प्रसंग का टेक्स्ट सबद... पर उपलब्ध है।

कहानी का कुल प्रसारण समय 6 मिनट 15 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



चौथी के जोडे क़ा शगुन बडा नाजुक़ होता है।
~ इस्मत चुगताई (1911-1991)

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मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी। अम्मा ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा।
(इस्मत चुगताई की "मैं एक बच्चे को प्यार कर रही थी" से एक अंश)


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#Fifty Eighth Story, Main ek bachche ko pyar kar rahi thi: Ismat Chugtai/Hindi Audio Book/2010/5. Voice: Anurag Sharma

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