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Sunday, April 19, 2015

बिलावल थाट के राग : SWARGOSHTHI – 215 : BILAWAL THAAT




स्वरगोष्ठी – 215 में आज


दस थाट, दस राग और दस गीत – 2 : बिलावल थाट


'तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...' 





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे बिलावल थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग बिलावल में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे। साथ ही इस थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग बिहाग के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



भारतीय संगीत के रागों को उनमें लगने वाले स्वरों के अनुसार वर्गीकृत करने की प्रणाली को थाट कहा जाता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने कुल दस थाट के अन्तर्गत सभी रागों का वर्गीकरण किया था। उन्होने थाट के कुछ लक्षण बताए हैं। किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। थाट में ये सात स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। थाट को गाया-बजाया नहीं जा सकता। इसके स्वरों के अनुकूल किसी राग की रचना की जा सकती है, जिसे गाया बजाया जा सकता है। एक थाट से कई रागों की रचना हो सकती है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपको ‘कल्याण’ थाट का परिचय दिया था। आज का दूसरा थाट है- ‘बिलावल’। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि अर्थात सभी शुद्ध स्वर का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (भाग-1) के अनुसार ‘बिलावल’ थाट का आश्रय राग ‘बिलावल’ ही है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग हैं- अल्हैया बिलावल, बिहाग, देशकार, हेमकल्याण, दुर्गा, शंकरा, पहाड़ी, भिन्न षडज, हंसध्वनि, माँड़ आदि। राग ‘बिलावल’ में सभी सात शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गांधार होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल का प्रथम प्रहर होता है।

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ 
अब हम आपको राग ‘बिलावल’ पर आधारित एक खयाल रचना सुनवाते हैं। यह रचना एक ऐसे महान संगीतज्ञ की आवाज़ में है, जो उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। किराना घराने के इस महान कलासाधक को हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के नाम से जानते हैं। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत की सभाओं गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। आइए, खाँ साहब की आवाज़ में सुनिए राग बिलावल की एक दुर्लभ रिकार्डिंग।


राग बिलावल : ‘प्यारा नज़र नहीं आवे...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ




संगीतकार बसन्त देसाई 
राग बिलावल का उल्लेख ‘गुरुग्रन्थ साहब’ में भी मिलता है। सम्पूर्ण गुरुवाणी को 31 रागों में बाँधा गया है। इसके 16वें क्रम पर राग बिलावल में निबद्ध पद हैं। ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या 795 से लेकर 859 तक की रचनाएँ इसी राग में निबद्ध हैं। बिलावल थाट के अन्तर्गत आने वाले रागों में एक प्रमुख राग बिहाग भी है, जिसमे सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। बिहाग, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग बिहाग के आरोह के स्वर हैं- साग मप निसां और अवरोह के स्वर हैं- सां निधप मग रेसा। यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। अब हम आपको राग बिहाग में पिरोया एक आकर्षक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। भरत व्यास के लिखे गीत को संगीतकार बसन्त देसाई ने राग बिहाग के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। गीत के बोल हैं- ‘तेरे सुर और मेरे गीत, दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...’ जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बिहाग : ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गूँज उठी शहनाई : संगीत – बसन्त देसाई


संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 25 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 213वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ द्वारा प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे गए थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद राशिद खाँ। इस बार की पहेली में पहले और दूसरे प्रश्न के सही उत्तर देकर तीनों प्रतिभागियों ने पूरे दो-दो अंक अर्जित किये हैं। तीसरे प्रश्न के उत्तर में तीनों प्रतिभागी भ्रमित हुए। जबलपुर से क्षिति तिवारी ने इस प्रश्न कोई उत्तर नहीं दिया है। हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने गायक कलाकार को उस्ताद अमीर खाँ के रूप में पहचाना है। पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने एकदम सही उत्तर तो नहीं दिया है, किन्तु उस्ताद राशिद खाँ के साथ पण्डित राजन मिश्र के नाम का विकल्प भी दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे बिलावल थाट और राग पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Wednesday, January 22, 2014

रागमाला गीत -2 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट





प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट


रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 2



राग भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुलतानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस की छटा बिखेरता रागमाला गीत


दो उस्तादों के गायन और वादन की अनूठी जुगलबन्दी

फिल्म : गूँज उठी शहनाई

संगीतकार : बसन्त देसाई

गायक : उस्ताद अमीर खाँ

शहनाई वादक : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन 






Sunday, March 17, 2013

Raagmaala 2 उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के जन्मदिवस पर विशेष



स्वरगोष्ठी – 112 में आज


रागों के रंग रागमाला गीत के संग - 2

फिल्म 'गूँज उठी शहनाई 'के रागमाला गीत में दो उस्तादों की अनूठी जुगलबन्दी


आज ‘स्वरगोष्ठी’ के एक ताज़ा अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में एक और रागमाला गीत लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आज का यह रागमाला गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। यह गीत दो कारणों से आज के अंक को विशेष बनाता है। पहली विशेषता यह है कि इसे भारतीय संगीत-जगत के दो दिग्गज उस्तादों- उस्ताद अमीर खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने जुगलबन्दी के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरी विशेषता यह है कि आगामी गुरुवार, 21 मार्च को शहनाई-वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की 98वीं जयन्ती है। रागमाला का यह गीत आज हम उन्हीं उस्ताद शहनाईनवाज़ को स्वरांजलि-स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं।


बसन्त देसाई
र्ष 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ का कथानक एक प्रेम त्रिकोण पर आधारित है, परन्तु फिल्म का नायक किशन (राजेन्द्र कुमार) सांगीतिक प्रतिभा से सम्पन्न कुशल शहनाईवादक भी है। फिल्म में किशन की बाल्यावस्था में संगीत के प्रति ललक और संगीत-गुरु रघुनाथ महाराज (अभिनेता उल्हास) के मार्गदर्शन से एक कुशल शहनाईवादक बनने की दास्तान है। फिल्म के संगीतकार बसन्त देसाई ने इस फिल्म में एक से बढ़ कर एक राग आधारित गीतों का संयोजन किया था। चूँकि फिल्म का कथानक एक शहनाईवादक के चरित्र पर केन्द्रित है इसलिए बसन्त देसाई ने अपने समय के दिग्गज शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और वाराणसी के ही युवा शहनाईवादक रामलाल को भी फिल्म से सम्बद्ध किया गया था। यही नहीं, संगीत के इन्दौर घराने के संस्थापक और वाहक उस्ताद अमीर खाँ को फिल्म में गायन के लिए राजी कर लिया गया। संगीतकार बसन्त देसाई स्वयं भी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अत्यन्त कुशल थे और जब उनके साथ जब इन दिग्गज कलाकारों का साथ मिला तब फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ के लिए कई अविस्मरणीय और कालजयी गीतों की रचना हुई। इन्हीं गीतों में से एक रागमाला गीत भी है, जिसकी चर्चा आज हम आपसे कर रहे हैं।

फिल्म में इस रागमाला गीत का उपयोग उस प्रसंग में किया गया है, जब एक अनाथ बालक किशन, मन्दिर के एक कोने में छिप कर, देव-प्रतिमा के सम्मुख साधनारत संगीत के प्रकाण्ड पण्डित रघुनाथ महाराज के स्वरों का अपनी शहनाई पर अनुकरण करने का प्रयत्न करता है। किशन की शहनाई के स्वर कानों में पड़ते ही पण्डित रघुनाथ महाराज अपने उस एकलव्य जैसे शिष्य की प्रतिभा को पहचान लेते हैं और उसे अपना शिष्य बना कर विधिवत संगीत की शिक्षा देने लगते हैं। आज का रागमाला गीत इसी प्रसंग से जुड़ा है। यह गीत, गायन और शहनाईवादन की जुगलबन्दी के रूप में है। गुरु रघुनाथ महाराज गायन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने कण्ठस्वर दिया है, जब कि शिष्य किशन के लिए उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई बजाई है। गीत में क्रमशः भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुल्तानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस रागों का प्रयोग किया गया है। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार ही यह क्रम रखा गया है। पहला राग भटियार सूर्योदय का राग है। समय के अनुसार ही क्रमशः आगे बढ़ते हुए मध्यरात्रि के राग चन्द्रकौंस से गीत को विराम दिया गया है।

उस्ताद अमीर खाँ
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
इस रागमाला गीत का आरम्भ मन्दिर के दृश्य से होता है, जहाँ देव-प्रतिमा के सम्मुख गुरु रघुनाथ महाराज संगीत-साधना के अन्तर्गत प्रातःकाल के राग भटियार की एक रचना- ‘निसदिन न बिसरत मूरत तिहारी...’ का गायन कर रहे हैं। वहीं मन्दिर के दूसरे कोने में बालक किशन शहनाई पर रघुनाथ महाराज के स्वरों की अनुकृति करने का प्रयास करता है। महाराज के कानों में अचानक शहनाई का मधुर स्वर पड़ता है और वे किशन के पास जाकर उसकी प्रतिभा की सराहना करते हैं और उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार कर लेते हैं। अगला राग रामकली है, जिसे महाराज के घर के अभ्यास कक्ष में फिल्माया गया है। इस प्रसंग में महाराज पहले राग रामकली में एक पंक्ति गाते हैं और फिर किशन उन्हीं स्वरों को शहनाई पर बजाता है। अचानक गुरु महाराज राग देशी की सरगम गुनगुनाते है। देशी के बाद राग शुद्ध सारंग के स्वरों में आलाप और शहनाईवादन साथ-साथ होता है। इसके बाद महाराज राग मुल्तानी की एक बन्दिश- ‘बलमा तुम संग लागली प्रीत...’ गाते हैं। मुल्तानी के बाद राग यमन की बारी आती है। इस राग की एक प्रचलित बन्दिश ‘अवगुण न कीजिए गुणी संग...’ के साथ महाराज किशन से कुछ सरल तानों का अभ्यास कराते हैं। अचानक गुरु महाराज राग बागेश्री का सरगम आरम्भ कर देते हैं। रागमाला गीत के इस भाग में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने कुछ जटिल ताने बजाई हैं। अन्त में राग चन्द्रकौंस का तराना प्रस्तुत किया जाता है और गीत के इसी भाग में किशन एक परिपक्व युवक (अभिनेता राजेन्द्र कुमार) और शहनाईवादक के रूप में परिलक्षित होता है। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ का आठ रागों में गुथा हुआ यह रागमाला गीत सुनवाते हैं। इस गीत में उस्ताद अमीर खाँ के कण्ठस्वर और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई की जुगलबन्दी की गई है।


रागमाला गीत : भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुल्तानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस : उस्ताद अमीर खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के रागमाला में पिरोए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बहार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म संगीत सम्राट तानसेन। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने केवल दूसरे प्रश्न का ही सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें एक अंक ही मिलते हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

इसी अंक की पहेली के साथ वर्ष 2013 की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) भी पूर्ण हुई है। इस श्रृंखला में सर्वाधिक 16.5 अंक प्राप्त कर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने प्रथम स्थान, 16 अंक पाकर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने द्वितीय स्थान और 15.5 अंक पाकर बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने तृतीय स्थान प्राप्त किया है। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले अंक से हमने आपके अनुरोध पर ‘रागमाला’ शीर्षक से लघु श्रृंखला आरम्भ की है। परन्तु अगला अंक रंग और उल्लास के पर्व, होली से ठीक पहले पड़ने वाले रविवार को प्रकाशित होगा, इसलिए ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक रस-रंग से भरपूर होली पर केन्द्रित होगा। भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों में होली का चित्रण जिस प्रकार हुआ है, अगले अंक में हम ऐसे ही कुछ उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। रविवार, 24 मार्च को हम इस विशेष अंक के साथ उपस्थित होंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


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