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Saturday, November 19, 2016

"इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”, बटालवी के इस कविता की क्यों ज़रूरत आन पड़ी ’उड़ता पंजाब’ में?


एक गीत सौ कहानियाँ - 99
 

'इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार।
दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 99-वीं कड़ी में आज जानिए 2016 की फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ के मशहूर गीत "इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत ग़ुम है ग़ुम है...” के बारे में जिसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने गाया था। बोल शिव कुमार बटालवी के और संगीत अमित त्रिवेदी का।

कुछ वर्ष पहले फ़िल्म ’लव आजकल’ के मशहूर गीत “अज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा...” के लिए गीतकार
Shiv Kumar Batalvi
इरशाद कामिल को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था, यह बात बहुतों को पता है। पर जो बात पंजाब के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं, वह यह कि इस गीत का जो मुखड़ा है “अज दिन चढ़ेय तेरे रंग वरगा”, यह दरसल प्रसिद्ध पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी की लिखी कविता की पंक्ति है। ’लव आजकल’ के गीत के लिए बटालवी को कोई क्रेडिट नहीं मिला, पर इस वर्ष की चर्चित फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में बटालवी की लिखी कविता “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” को जब गीत के रूप में पेश किया गया तो उन्हें पूरा-पूरा सम्मान और क्रेडिट दिया गया इस गीत के लिए। शिव कुमार बटालवी पंजाब के पहले आधुनिक कवि माने जाते हैं। उनकी कविताएँ बेहद लोकप्रिय हो जाया करती थीं और लेखन शैली ऐसी थी कि उनकी कविताओं को गीतों के रूप में भी पेश किया जा सकता था। शुरु शुरु में वो ख़ुद ही अपनी कविताओं को गा कर प्रस्तुत करते थे, पर बाद में अन्य गायकों ने भी उनकी कविताओं को ख़ूब गाया। 70 के दशक के शुरुआती किसी वर्ष में बम्बई के शणमुखानन्द हॉल में उन्होंने पहली बार “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” गाया था। उस दिन वो मन में एक अवसाद लेकर स्टेज पर गए थे। उनके भीतर यह भावना थी कि कई गए-गुज़रे लेखक और कवि शोहरत की बुलन्दी पर पहुँच चुके हैं जबकि वो दुनिया की नज़रों में आने के लिए कड़ी संघर्ष किए जा रहे हैं। झल्लाकर उन्होंने उस दिन स्टेज पर यह कह दिया कि “आजकल हर कोई कवि है”, और भी अनाप-शनाप कई बातें उन्होंने कही जिसकी वजह से वहाँ बैठी ऑडिएन्स भड़क उठी। तभी उन्होंने गाना शुरु किया “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”। जनता शान्त हो गई और गाना ख़त्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरे हॉल पर कब्ज़ा कर लिया। गीत बेहद मशहूर हो गई और कई गायकों ने इसे गाया। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में भी यह गीत काफ़ी मशहूर हुआ था। इनके अलावा जगजीत सिंह ज़िरवी और रब्बी शेरगिल के संस्करण भी ख़ूब चर्चित रहे। और अब इस साल 2016 में विवादों से घिरी फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में भी इसी गीत को दो संसकरणों में पेश किया गया। अमित त्रिवेदी के संगीत में इसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने अलग-अलग गाया।


’उड़ता पंजाब’ फ़िल्म में इस कविता की ज़रूरत क्यों आन पड़ी, इस पर चर्चा करते हैं। फ़िल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे बताते हैं, “इक कुड़ी इस फ़िल्म में आई अपने बोलों की वजह से और तब आई जब हम फ़िल्म को लिख ही रहे थे। और इस कविता के शब्द भी ऐसे थे कि जो हमारे सिचुएशन पर पूरी तरह से फ़िट बैठ रहे थे।“ संगीतकार अमित त्रिवेदी के शब्दों में, “जब मेरे पास गीत के बोल आए तो मैंने देखा कि पूरे के पूरे चार पन्ने हैं। पूरे चार पन्ने का गीत। फिर हम लोग सब एक साथ बैठे और साथ मिल कर डिसाइड किया कि जो बेस्ट लाइन्स हैं उन्हें हम इस गीत में रखें। कम्पोज़िशन में हमने मूल गीत से पाँच-छह स्केल ऊपर गए और दिलजीत ने ज़बरदस्त निभाया गीत को।“ अभिनेत्री आलिया भट्ट पर फ़िल्माये इस गीत के बारे में वो कहती हैं, “मैं समझती हूँ कि फ़िल्म में मेरे किरदार की पंजाब में आने से पहले की जो जर्नी है और पंजाब आने के बाद उसकी जर्नी कैसी हो गई, इन दोनों चीज़ों को दिखाना ज़रूरी था। इस गीत के ज़रिए इन बातों को उभारा जा सका है।“ इसमें कोई संदेह नहीं कि बटालवी के इस कविता को अमित त्रिवेदी ने एक नया रूप प्रदान किया है सिर्फ़ एक बार नहीं बल्कि दो दो बार। और दोनों संस्करण अपने आप में उम्दा है। शाहिद मालिया का गाया संस्करण ग्राम्य, लोक-आधारित और भावपूर्ण है, जबकि दिलजीत दोसंझ का गाया संस्करण समकालीन (आधुनिक) और मेलोडी-सम्पन्ना है। दोनों की अपनी-अपनी ख़ासियत है, सुनने वाले पर निर्भर करता है कि उसे कौन सा संस्करण पसन्द है! लेकिन जो भी कहें, महेन्द्र कपूर वाले संस्करण का कोई मुकाबला नहीं है।

“इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” कविता एक गीत के लिए बहुत लम्बी है। इसलिए जब भी इसे गाया गया, कुछ पंक्तियाँ काट दी गई। ’उड़ता पंजाब’ में तो केवल मुखड़ा और कविता का पहला अन्तरा ही लिया गया है। करीब साढ़े चार मिनटों में ही गीत को निपटा दिया गया है, जबकि महेन्द्र कपूर वाले संस्करण में चार अन्तरे (तीन शुरु के और एक आख़िर का) लिया गया है। शिव कुमार बटालवी के गाए मूल गीत में उन्होंने सभी अन्तरे गाये थे। लीजिए पेश है बटालवी की लिखी यह कविता...

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी

गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है

ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है
वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है
हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है

ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है।



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Friday, March 14, 2014

जुगनी उडी गुलाबी पंख लेकर इस होली पर

ताज़ा सुर ताल - 2014 - 10

दोस्तों इस रविवार को दुनिया भर में मनाया गया महिला दिवस. आज जो दो गीत हम आपके लिए चुनकर लेकर आये हैं वो भी नारी शक्ति के दो मुक्तलिफ़ रूप दर्शाने वाले हैं. पहला गीत है गुलाब गैंग  का...कलगी हरी है, चोंच गुलाबी, पूँछ है उसकी पीली हाय, रंग से हुई रंगीली रे चिड़िया, रंग से हुई रंगीली ... नेहा सरफ के लिखे इस खूबसूरत गीत में गौर कीजिये कि उन्होंने इस चिड़िया की चोंच गुलाबी  रंगी है, यही बदलते समय में नारी की हुंकार को दर्शाता है. वो अब दबी कुचली अबला बन कर नहीं बल्कि एक सबल और निर्भय पहचान के साथ अपनी जिंदगी संवारना चाहती है. शौमिक सेन के स्वरबद्ध इस गीत को आवाज़ दी है कौशकी चक्रवर्ति ने. गुलाब गैंग  में ९० के दशक की दो सुंदरियाँ, माधुरी दीक्षित और जूही चावला पहली बार एक साथ नज़र आयेगीं. फिल्म कैसी है ये आप देखकर बताएं, फिलहाल सुनिए ये गीत जो इस साल होली को एक नए रंग में रंगने वाली है. 
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कितने काफिले समय के/ धूल फांकते गुजरे हैं/ मेरी छाती से होकर/ मटमैली चुनर सी /बिछी रही आसमां पे मैं...
कोख में ही दबा दी गयी/ कितनी किलकारियां मेरी/ नरक का द्वार, ताडन को जाई,/ कुलटा, सती, देवी, डायन,/ जाने क्या क्या कहलाई मैं...जली, कटी, लड़ी मगर,/ चीखी भी, चिल्लाई भी मैं,
इन हाथों को, पखों में बदलने को,/जाने कितनी प्रसव वेदनाओं से,/ गुजरी हूँ मैं....अब उड़ने दो, उड़ने दो, उड़ने दो मुझे/ मैं आधी धरा हूँ तो,/ आधे आकाश को भी तो अपना, कहने दो मुझे.... 
कुछ ऐसे ही जज़्बात हैं हमारे अगले गीत में, जिसे गाया और स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने. शब्द रचे हैं अन्विता दास गुप्तन ने. फिल्म है Queen कंगना रानौत की ये फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आ रही है. अमित ने बेहद मुक्तलिफ़ रंग के गीत रचे हैं फिल्म के लिए, ये गीत भी उनमें से एक है. लीजिए मिलिए इस जुगनी  से जो पिंजरा तोड़ उड़ चली है नीले विशाल गगन में, अपनी नई पहचान ढूँढने. 

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Friday, March 7, 2014

सरहदों की दूरियां संगीत से पाटते अली ज़फर और अमित त्रिवेदी

ताज़ा सुर ताल - 09 -2014

ताज़ा सुर ताल के एक और नए एपिसोड में आप सब का स्वागत है. आज हम आपको मिलवा रहे हैं सरहद पार से आये एक जबरदस्त फनकार से जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. पाकिस्तान के पॉप संशेशन अली ज़फर न सिर्फ एक बहतरीन गायक हैं बल्कि एक अच्छे अभिनेता, संगीतकार, और गीतकार भी हैं. आने वाली फिल्म टोटल सयापा  में अली इन सभी भूमिकाओं में नज़र आयेगें. बतौर गीतकार इस फिल्म में उन्होंने आशा  नाम का गीत लिखा है, फिल्म का काम पूरी तरह खत्म होने के बाद फिल्म के अपने साथी किरदार को जेहन में रख कर लिखा गया ये गीत, फिल्म का हिस्सा नहीं है पर एल्बम में अवश्य शामिल है. वैसे इस एल्बम में जिसे पूरी तरह से अली का ही एल्बम कहा जायेगा, मात्र एक ही युगल गीत है, जिसे आज हमने चुना है आपके लिए. अकील रूबी का लिखा ये गीत सदा लुभावन अरेबिक मिजाज़ का है, जिसमें रुबाब का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है. फरिहा परवेज हैं अली के साथ इस गीत में. नहीं मालूम  निश्चित ही एक ऐसा गीत है जिसे आप बार बार सुनना चाहेगें. 


आज के एपिसोड का दूसरा गीत है, मेरे बेहद पसंदीदा संगीतकार अमित त्रिवेदी का. दोस्तों अक्सर हम लोगों से सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं मिलती जो पुराने दौर के गीतों में था. पर वास्तव में ऐसा नहीं है. आज के गीत आज की पीढ़ी को जेहन में रख कर लिखे बुने जाते हैं और हमें इस बात पर फक्र होना चाहिए कि आज के दौर के गीतकार संगीतकार आज भी हमारी धरोहर को संभाले रखे हुए हैं. इतनी सारी बातें मैंने इसलिए कही क्योंकि मुझे लगता है कि प्रस्तुत गीत को सुनकर आपको गुजर दौर का मर्म भी याद आएगा और आज के संगीत की झनक भी. खुद अमित का गाया हुआ ये गीत है बदरा बहार  जिसे बहुत बढ़िया लिखा है अनिवता दत्त ने. अमित का एक खास अंदाज़ है जो सबसे अल्हदा है. सबसे अच्छी बात ये है कि वो किसी से प्रभावित नहीं लगते वरन वो अपनी खुद की लीक पर चलते हैं. हर गीत में एक नया प्रयोग करते हुए, लीजिए सुनिए ये लाजवाब गीत...
    

Friday, June 28, 2013

सुरीला जादू चला कर दिल लूट गया "लुटेरा"

पने पूरे शबाब पर चल रहे संगीतकार अमित त्रिवेदी एक बार फिर हाज़िर हैं, एक के बाद एक अपने स्वाभाविक और विशिष्ट शैली के संगीत की बहार लेकर. पिछले सप्ताह हमने जिक्र किया घनचक्कर  का, आज भी अमित हैं अपनी नई एल्बम लूटेरा  के साथ, इस बार उनके जोडीदार हैं उनके सबसे पुराने साथ अमिताभ भट्टाचार्य. अमिताभ बेशक इन दिनों सभी बड़े संगीतकारों के साथ सफल जुगलबंदी कर रहे हैं पर जब भी उनका साथ अमित के साथ जुड़ता है तो उनमें भी एक नया जोश, एक नई रवानगी आ जाती है. 

लूटेरा  की कहानी ५० के दशक की है, और यहाँ संगीत में भी वही पुराने दिनों की महक आपको मिलेगी. पहले गीत संवार लूँ  को ही लें. गीत के शब्द, धुन और गायिकी सभी सुनहरे पुराने दिनों की तरह श्रोताओं के बहा ले जाते हैं. गीत के संयोजन को भी पुराने दिनों की तरह लाईव ओर्केस्ट्रा के साथ हुआ है. मोनाली की आवाज़ का सुरीलापन भी गीत को और निखार देता है. आपको याद होगा मोनाली इंडियन आईडल में एक जबरदस्त प्रतिभागी बनकर उभरी थी, वो जीत तो नहीं पायी थी मगर प्रीतम के लिए ख्वाब देखे (रेस) गाकर उन्होंने पार्श्वगायन की दुनिया में कदम रखा. अमित ने इससे पहले उन्हें अगा बाई (आइय्या) में मौका दिया था, पर वो एक युगल गीत था. वास्तव में मोनाली का ये पहला गीत है जहाँ उनकी प्रतिभा उभरकर सामने आई है. संवार लूँ  एक बेहद खूबसूरत गीत है जिसे हर उम्र के श्रोताओं का भरपूर प्यार मिलेगा ऐसी हमें पूरी उम्मीद है. 

एक  अच्छे गीत के बाद एक और अच्छा गीत....और यकीन मानिये एल्बम का ये अगला गीत एक मास्टरपीस है. अनकही  में आवाज़ है स्वयं गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य की और क्या खूब गाया है उन्होंने. शब्द जैसे एक सुन्दर चित्र हो और अमित की ये कम्पोजीशन उनकी सबसे बहतरीन रचनाओं में से एक है. आने वाले एक लंबे अरसे तक श्रोता इस गीत को भूल नहीं पायेंगें. ख्वाबों का झरोखा , सच है या धोखा....

और ऐसे ही सच और धोखे के बीच झूलता है अगला गीत भी. शिकायतें  में आवाजें हैं मोहन कानन और अमिताभ की. एक और सोफ्ट रोक्क् गीत जहाँ शब्द गहरे और दिलचस्प हैं. नाज़ुक से शब्द और मोहन की अलहदा गायिकी इस गीत को भी एक यादगार गीत में बदल देते हैं.....मगर रुकिए, क्योंकि  मोंटा रे  सुनने के बाद आप स्वाभाविक ही बाकी सब भूल जायेंगें. आवाज़ है एक और गीतकार स्वानंद किरकिरे की. गीत बांग्ला और हिंदी में है, दिशाहारा  कोइम्बोका मोंटा रे  के मायने होते हैं कि 'मेरा दिशाहीन दिल कितना पागल है'. बेहद बेहद सुन्दर गीत. ये शायद पहला गीत होगा जहाँ दो गीतकारों ने पार्श्वगायन किया हो. बधाई पूरी टीम को.

खुद  अमित त्रिवेदी की दमदार आवाज़ में दर्द की पराकाष्ठा है जिन्दा  में....एक बार फिर अमिताभ ने सरल मगर कारगर शब्द जड़े हैं. इन सभी गीतों की खासियत ये है कि इनमें पार्श्व में कम से कम वाध्यों का इस्तेमाल हुआ है, बस सब कुछ नापा तुला, उतना ही जितना जरूरी हो.....अंतिम गीत मन मर्जियाँ  में शिल्पा राव के साथ  अमिताभ किसी भी अन्य प्रोफेशनल गायक की तरह ही सुनाई देते हैं. एल्बम का एकमात्र युगल गीत रोमांटिक कम और थीमेटिक अधिक है.

वास्तव में ये हमारी राय में इस साल की पहली एल्बम है जिसमें सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं. अमित और अमिताभ का एक और मास्टरपीस. हमारी सलाह मानिये तो आज ही इन गीतों को अपनी संगीत लाईब्रेरी का हिस्सा बनायें और बार बार सुनें. 

एल्बम के बहतरीन गीत - 
अनकही , संवार लूँ, जिंदा, मोंटा रे, शिकायतें 

हमारी  रेटिंग  - ४.९ / ५ 

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी 

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Monday, June 24, 2013

रिचा शर्मा के 'लेजी लेड' ताने से बिदके 'घनचक्कर'

मिर  और नो वन किल्ल्ड जस्सिका  के बाद एक बार फिर निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने अपनी नई फिल्म के संगीत का जिम्मा भी जबरदस्त प्रतिभा के धनी अमित त्रिवेदी को सौंपा है. इमरान हाश्मी और विद्या बालन के अभिनय से सजी ये फिल्म है -घनचक्कर . फिल्म तो दिलचस्प लग रही है, आईये आज तफ्तीश करें कि इस फिल्म के संगीत एल्बम में श्रोताओं के लिए क्या कुछ नया है. 

पहला गीत लेजी लेड अपने आरंभिक नोट से ही श्रोताओं को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है. संगीत संयोजन उत्कृष्ट है, खासकर बीच बीच में जो पंजाबी शब्दों के लाजवाब तडके दिए गए हैं वो तो कमाल ही हैं. बीट्स भी परफेक्ट है. अमिताभ के बोलों में नयापन भी है और पर्याप्त चुलबुलापन भी. पर तुरुप का इक्का है रिचा शर्मा की आवाज़. उनकी आवाज़ और गायकी ने गीत को एक अलग ही मुकाम दे दिया है. एक तो उनका ये नटखट अंदाज़ अब तक लगभग अनसुना ही था, उस पर एक लंबे अंतराल से उन्हें न सुनकर अचानक इस रूप में उनकी इस अदा से रूबरू होना श्रोताओं को खूब भाएगा. निश्चित ही ये गीत न सिर्फ चार्ट्स पर तेज़ी से चढेगा वरन एक लंबे समय तक हम सब को याद रहने वाला है. बधाई पूरी टीम को. 

आगे बढ़ने से पहले आईये रिचा के बारे में कुछ बातें आपको बताते चलें. फरीदाबाद, हरियाणा में जन्मी रिचा ने गन्धर्व महाविद्यालय से गायन सीखा. उनकी पहचान कीर्तनों में गाकर बननी शुरू हुई, बॉलीवुड में उन्हें पहला मौका दिया रहमान ने फिल्म ताल  में. नि मैं समझ गयी  गीत बेहद लोकप्रिय हुआ. उनकी प्रतिभा के अलग अलग चेहरे हमें दिखे माहि वे (कांटे), बागबाँ रब है (बागबाँ), और निकल चली रे (सोच)  जैसे गीतों में. पर हमारी राय में उनकी ताज़ा गीत लेजी लेड  उनका अबतक का सबसे बहतरीन गीत बनकर उभरा है. 

वापस लौटते हैं घनचक्कर  पर. अगला गीत है अल्लाह मेहरबान  जहाँ गीत के माध्यम से बढ़िया व्यंग उभरा है अमिताभ ने, कव्वाली नुमा सेट अप में अमित ने धुन में विविधता भरी है. दिव्या कुमार ने अच्छा निभाया है गीत को. एक और कबीले तारीफ गीत. 

घनचक्कर बाबू  जैसा कि नाम से जाहिर है कि शीर्षक गीत है, एक बार फिर अमिताभ ने दिलचस्प अंदाज़ में फिल्म के शीर्षक किरदार का खाका खीचा है और उतने ही मजेदार धुन और संयोजन से अपना जिम्मा संभाला है.अमित ने. गीत सिचुएशनल है और परदे पर इसे देखना और भी चुटीला होगा. 

अंतिम गीत झोलू राम   से अमित बहुत दिनों बाद मायिक के पीछे लेकर आये हैं ९० के दशक में तुम तो ठहरे परदेसी  गाकर लोकप्रिय हुए अल्ताफ राजा को. हालाँकि ये प्रयोग उतना सफल नहीं रहा जितना रिचा वाला है, पर एक लंबे समय के अंतराल के बाद अल्ताफ को सुनना निश्चित ही अच्छा लगा, .पर गीत साधारण ही है जिसके कारण अल्ताफ की इस वापसी में अपेक्षित रंग नहीं उभर पाया. 

एल्बम के बहतरीन गीत - 
लेजी लेड, अल्लाह मेहरबान 

हमारी रेटिंग - ३.७   

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

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Monday, April 29, 2013

सिनेमा के शानदार 100 बरस को अमित, स्वानंद और अमिताभ का संगीतमय सलाम

प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - बॉम्बे टा'कीस


सिनेमा के १०० साल पूरे हुए, सभी सिने प्रेमियों के लिए ये हर्ष का समय है. फिल्म इंडस्ट्री भी इस बड़े मौके को अपने ही अंदाज़ में मना या भुना रही है. १०० सालों के इस अद्भुत सफर को एक अनूठी फिल्म के माध्यम से भी दर्शाया जा रहा है. बोम्बे  टा'कीस  नाम की इस फिल्म को एक नहीं दो नहीं, पूरे चार निर्देशक मिलकर संभाल रहे हैं, जाहिर है चारों निर्देशकों की चार मुक्तलिफ़ कहानियों का संकलन होगी ये फिल्म. ये चार निर्देशक हैं ज़ोया अख्तर, करण जोहर, अनुराग कश्यप और दिबाकर बैनर्जी. अमित त्रिवेदी का है संगीत तथा गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे और अमिताभ भट्टाचार्य. चलिए देखते हैं फिल्म की एल्बम में बॉलीवुड के कितने रंग समाये हैं. 

पहला  गीत बच्चन  हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को समर्पित है...जी हाँ सही पहचाना वही जो रिश्ते में सबके बाप  हैं. शब्दों में अमिताभ भट्टाचार्य ने सरल सीधे मगर असरदार शब्दों में हिंदी फिल्मों पर बच्चन साहब के जबरदस्त प्रभाव को बखूबी बयाँ किया है. अमित की तो बात ही निराली है, गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. एकतारा का जबरदस्त प्रयोग गीत को वाकई इस दशक में पहुंचा देता है जब हिंदी सिनेमा का पर्याय ही अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. बीच बीच में उनके मशहूर संवादों से गीत का मज़ा दुगुना हो जाता है. सुखविंदर की आवाज़ में बहुत दिनों बाद ऐसा दमदार गीत निकला है. खैर हम भी इस गीत के साथ अपनी इडस्ट्री और बच्चन साहब की ऊंची शख्सियत को सलाम करते हैं, और आगे बढते हैं अगले गीत की तरफ.

अक्कड बक्कड बोम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ बरस का हुआ, ये खिलाड़ी न बूढा हुआ.....वाह स्वानंद साहब ने खूब बयाँ किया है सिनेमा के सौ बरसों का किस्सा. हालाँकि अमित की धुन इंग्लिश विन्गलिश  के कैसे जाऊं मैं पराये देश  से कुछ मिलती जुलती लगती है शुरुआत में, पर धीरे धीरे गीत अपनी लय पकड़ लेता है, सबसे बढ़िया बात ये है कि गीत अपनी रवानी में कहीं भी कमजोर नहीं पड़ता, और श्रोताओं को झूमने की वजह देता रहता है. मोहित की आवाज़ भी खूब जमी है गीत में....

मुर्रब्बा  गीत के दो संस्करण हैं, आमतौर पर अमित के इन ट्रेडमार्क गीतों में शिल्प राव की आवाज़ जरूरी सी होती है, पर इस गीत में महिला स्वर है कविता सेठ की जिनका साथ दिया है खुद अमित ने. छोटा सा मगर बेहद प्रभावी गीत है ये भी. एक बार फिर संगीत संयोजन गीत की जान है. गीत ऐसा नहीं है जो जुबाँ पर चढ जाए पर अच्छा सुनने के शौक़ीन इसे अवश्य पसंद करेंगें .गीत का एक संस्करण जावेद बशीर की आवाज़ में भी है. 

शीर्षक गीत बोम्बे टा'कीस  एक बार फिल्मों के प्रति दर्शकों की दीवानगी को समर्पित है.कैलाश खेर और रिचा शर्मा की आवाजों में ये एक रेट्रो गीत है. स्वानंद के शब्द दिलचस्प हैं. पर मुझे इसका दूसरा संस्करण जिसमें ढेरों गायकों की आवाज़ समाहित है. शान और उदित की आवाजों के साथ कुछ अन्य गीतों की झलक में मिला जुला ये संस्करण अधिक फ़िल्मी लगता है. 

वाकई इन सौ बरसों में फिल्मों के कितने चेहरे बदले पर सौ बरसों के बाद आज भी लगता है जैसे बस अभी तो शुरुआत ही है. फिल्मों का ये कारवाँ यूहीं चलता चले और मनोरंजन के इस अद्भुत लोक में दर्शकों को भरपूर आनंद मिलता रहे यही हम सब की कामना है. एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४ की रेटिंग ५ में से. 

एक सवाल श्रोताओं के लिए -
प्रस्तुत एल्बम में एक गीत एक फ़िल्मी नायक को समर्पित है, क्या आपको कोई अन्य गीत याद आता है जो किसी फ़िल्मी व्यक्तित्व पर केंदित है ?


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Sunday, February 24, 2013

दोस्ती के तागों में पिरोये नाज़ुक से ज़ज्बात -"काई पो छे"

प्लेबैक वाणी -35 - संगीत समीक्षा - काई पो छे


रूठे ख्वाबों को मना लेंगें,
कटी पतंगों को थामेगें,
सुलझा लेंगें उलझे रिश्तों का मांजा...
गिटार के पेचों से खुलता है ये गीत, सारंगी के मांजे में परवाज़ चढ़ाता है, और अमित के सुरों से जब उन्हीं के स्वर मिलते हैं तो एक सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. स्वानंद के शब्दों में बात है रिश्तों की, दोस्ती की और जिंदगी को जीत की दहलीज तक पहुंचा देने वाले ज़ज्बे के. अमित त्रिवेदी ने दिया है श्रोताओं को एक बेशकीमती तोहफा इस गीत के माध्यम से, मुझे जो सबसे अधिक प्रभावित करती है वो है वाध्यों का उनका चुनाव, हर गीत को किन किन गहनों से सजाना है ये अमित बखूबी जानते हैं. मुझे यकीन है कि मेरी ही तरह बहुत से श्रोताओं को उनकी हर नई पेशकश का बेसब्री से इन्तेज़ार रहता है. 

आज हम जिक्र कर रहे हैं काई पो छे के संगीत की. उलझे रिश्तों को सुलझाते हुए आईये आगे बढते हैं अमित के संगीतबद्ध इस एल्बम में सजे अगले गीत की तरफ.
अगला गीत भी दोस्ती के इर्द गिर्द है, मिली नायर की आवाज़ में गजब की ताजगी है, जैसे शबनम के मोती हों सुनहरी धूप में लिपटे. यहाँ धूप का काम करती है अमित की सुरीली आवाज़. स्वानंद के शब्द खुल कर साँस लेते हैं अमित की धुनों में. गीत सोफ्ट रोक् अंदाज़ का है जहाँ बीच बीच में वाध्यों का भारीपन गीत को जरूरी उतार चढ़ाव देता है, बार बार सुने जाने लायक गीत, खास तौर पर अगर आप एक लंबी ड्राईव पर निकलें हों तो मूड को खुश्गवार बनाये रखेंगीं ये मीठी बोलियाँ.
आपको बताते चलें कि ये फिल्म चेतन भगत के लोकप्रिय उपन्यास द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाईफ पर आधारित है. एल्बम में कुल ३ ही गीत हैं, अंतिम गीत एक गरबा है जिसमें एक बार फिर वही दोस्ती, जिंदगी और सपनों की बातें ही उभर कर आती हैं. शुभारंभ में ढोल और शहनाई का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है. ख्वाबों के बीज कच्ची जमीन पे हमको बोना हैआशा के मोती सांसों की माला में पिरोना है..स्वानंद के शब्द एक बार फिर गीत को गहराई देते हैं. श्रुति पाठक ने गरबे वाला हिस्सा अच्छे से निभाया है. एक दिलचस्प और खूबसूरत गीत.
काई पो छे एक छोटा मगर बेहद सुरीला कैप्सूल है संगीत प्रेमियों के लिए. अमित त्रिवेदी और स्वानंद एक बार फिर उम्मीदों पर खरा उतरे हैं, रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ४.६ की रेटिंग.  

यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:

Monday, October 15, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (२०) आइय्या , और आपकी बात-- बोल्ड थीम के अनुरूप ही बोल्ड है "आइय्या" का संगीत


संगीत समीक्षा -  आइय्या

दोस्तों पिछले सप्ताह हमने बात की थी अमित त्रिवेदी के “इंग्लिश विन्गलिश” की और हमने अमित को आज का पंचम कहा था. अमित दरअसल वो कर सकते हैं जो एक श्रोता के लिहाज से शायद हम उनसे उम्मीद भी न करें. उन्होंने हमें कई बार चौंकाया है. लीजिए तैयार हो जाईये एक बार फिर हैरान होने के लिए.

जी हाँ आज हम चर्चा कर रहे उनकी एक और नयी फिल्म “आइय्या” का, जिसमें वो लौटे हैं अपने प्रिय गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य के साथ. मुझे लगता है कि अमिताभ भी अमित के साथ जब मिलते हैं तो अपने श्रेष्ठ दे पाते हैं. आईये जानें की क्या है आइय्या के संगीत में आपके लिए.

हाँ वैधानिक चेतावनी एक जरूरी है. दोस्तों ये संगीत ऐसा नहीं है कि आप पूरे परिवार के साथ बैठ कर सुन सकें. हाँ मगर अकेले में आप इसका भरपूर आनंद ले सकते हैं. वैसे बताना हमारा फ़र्ज़ था बाकी आप बेहतर जानते हैं.

खैर बढते हैं अल्बम के पहले गीत की तरफ. ८० के डिस्को साउंड के साथ शुरू होता है “ड्रीमम वेकपम” गीत, जो जल्दी ही दक्षिण के रिदम में ढल जाता है. पारंपरिक नागास्वरम और मृदंग मिलकर एक पूरा माहौल ही रच डालते हैं. ये गीत आपको हँसता भी है गुदगुदाता भी है और कुछ श्रोता ऐसे भी होंगें जो इसे सुनकर सर पीट लेंगें. पर हमारी राय में तो ये गीत बहुत सुनियोजित तरीके से रचा गया है जिसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन है. शब्दों में जम कर जम्पिन्गम- पम्पिन्गम किया है अमिताभ ने. गायिका सौम्या राव की आवाज़ और अदायगी जबरदस्त है. यकीनन तारीफ के लायक. शरारती शब्द, जबरदस्ती गायकी और उत्कृष्ट संगीत संयोजन इस गीत को तमाम अटकलों के बावजूद एक खास पहचान देते हैं.

अगला गीत सवा डॉलर कुछ हद तक शालीन है, इसे आप अपने बच्चों के साथ बैठकर भी सुन सकते हैं...पर देखा जाए तो ये अल्बम का सबसे “आम” गीत लगता है, सरल लावनी धुन पर थिरकती सुनिधि की आवाज़. “ड्रीमम वेक्पम” के अनूठे अंदाज़ के बाद ये अच्छा और साफ़ सुथरा गीत कुछ कमजोर सा लगता है.

अगले ही गीत से अमित – अमिताभ की ये जोड़ी पूरे जोश खरोश के साथ अपने शरारतों में लौट आते हैं. ये फिल्म का शीर्षक गीत है. फिर एक बार चेता दें बच्चों से दूर रखें इस गीत को....मगर दोस्तों क्या जबरदस्त संयोजन है अमित त्रिवेदी का. एक एक पीस सुनने लायक है. “अगा बाई” गीत में न सिर्फ अमिताभ के शब्द चौंकते हैं, श्यामली खोलगडे और मोनाली ठाकुर की आवाजों में गजब की ऊर्जा और उत्तेजना है जो अश्लील नहीं लगती कहीं भी. निश्चित ही ये गायिकाएं श्रेया और सुनिधि को जबरदस्त टकर देने वाली हैं. अगा बाई एक मस्त मस्त गीत है...एकदम लाजवाब.

अगला गीत “महक भी” में अमित लाये शहनाई के स्वर. गीत शुरू होने से पहले ही अपने सुन्दर वाध्य संरचना से आपको खुद से बाँध लेते हैं. श्रेया की मखमली आवाज़ और पार्श्व में बजती शहनाई...वाह एक बेहद खूबसूरत गीत, मधुर और सुरीला.

 अब देखिये, फिर एक बार सुरीली फुहार के बाद लौटते हैं अमित और अमिताभ अपने शरारत भरी एक और रचना लेकर. यक़ीनन इसे सुनकर आप हँसते हँसते पेट पकड़ लेंगें. इस गीत में कुछ अश्लील सी कोमेडी है, स्नेह कंवलकर और खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने बेहद चुटीले अंदाज़ में निभाया है इस गीत को. अब आप को लिज्जत पापड़ के विज्ञापन को देखकर हँसी आये तो इल्जाम दीजियेगा इस गीत को. और क्या कहें.... 

“वाकडा” अलबम का अंतिम गीत है जो दक्षिण के दुल्हे और महाराष्ट्रीयन दुल्हन के मेल के आंकड़े का वाकडा समझा रहा है. गीत सामान्य है मगर शब्द सुनने को प्रेरित करते हैं अमिताभ के. कुल मिलकर “आइय्या” का संगीत बेहद अलग किस्म का है. या तो आप इसे बेहद पसदं करेंगें या बिल्कुल नहीं.

रेडियो प्लेबैक इंडिया इसे इसके नयेपन के लिए दे रहा है ४.३ की रेटिंग.


एक सवाल - गीत "व्हाट टू डू" की थीम पर कुछ वर्षों पहले एक और गीत आया था, वो भी काफी हिलेरियस था, रितेश देखमुख पर फिल्माया वो गीत कौन सा था याद है आपको ? बताईये हमें अपनी टिप्पणियों में 

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Monday, October 8, 2012

अमित और स्वानंद ने रचा कुछ अलग "इंग्लिश विन्गलिश" के लिए


प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा : इंग्लिश विन्गलिश 

१५ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद खूबसूरती की जिन्दा मिसाल और अभिनय के आकाश का माहताब, श्रीदेवी एक बार फिर लौट रहीं है फ़िल्मी परदे पर एक ऐसे किरदार को लेकर जो अपनी अंग्रेजी को बेहतर करने के लिए संघर्षरत है. फिल्म है इंग्लिश विन्गलिश. आईये चर्चा करें फिल्म के संगीत की. अल्बम के संगीतकार हैं आज के दौर के पंचम अमित त्रिवेदी और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे.

पहला गीत जो फिल्म का शीर्षक गीत भी है पूरी तरह इंग्लिश विन्गलिश अंदाज़ में ही लिखा गया है. गीत के शुरूआती नोट्स को सुनते ही आप को अंदाजा लग जाता है अमित त्रिवेदी ट्रेडमार्क का. कोरस और वोइलन के माध्यम से किसी कोल्लेज का माहौल रचा गया है. स्वानंद ने गीत में बेहद सुंदरता से हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों के साथ खेला है. गीत की सबसे बड़ी खासियत है शिल्पा राव की आवाज़,जिसमें किरदार की सहमी सहमी खुशी और कुछ नया जानने का आश्चर्य बहुत खूब झलकता है. पुरुष गायक के लिए अमित स्वयं की जगह किसी और गायक की आवाज़ का इस्तेमाल करते तो शायद और बेहतर हो पाता.    

अगले गीत में अमित की आवाज़ लाजवाब आई है. धक् धुक एक ऐसे अवस्था का बयां है जिसमें किरदार किसी अपने से दूर जाने के भय से ग्रस्त है. बंगाल के मिटटी की खुश्बू से सने इस गीत की धुन बहुत ही मधुर है. स्वानंद ने शब्दों से पूरे चित्र को बखूबी तराशा है....क्यों न हमें टोके...क्यों न हमें रोके... जैसी पक्तियों को अमित ने बेहद दिल से गाया भी है.

श्रीदेवी की आवाज़ में कुछ संवादों से अगला गीत खुलता है जो मैनहैंटन शहर को समर्पित है. क्लिटंन और बियांका गोमस की आवाजों में ये गीत दिलचस्प है पर कोई लंबी छाप नहीं छोड़ता, हालाँकि बांसुरी का प्रयोग खूबसूरत है.

अगला गीत है गुस्ताख दिल, कम से कम वाध्यों से सुन्दर संयोजन है अमित का और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी भी है. शिल्पा की गहरी और दिल में उतरती आवाज़ गीत को एक अलग मुकाम दे देती है. दिल की गुस्ताखियों को शब्दों में उभरा है स्वानंद ने, हालाँकि इस विषय पर हजारों गीत बन चुके हैं पर स्वनादं ने कुछ अलग तरीके से बात को रखने की कोशिश जरूर की है.    

महाराष्ट्र के विवाहों में गाये जाने वाले लोक गीतों की झलक है अंतिम गीत नवराई माझी में. मस्ती भरे इस गीत में सुनिधि की आवाज़ है और उनका साथ दिया है खुद गीतकार स्वानंद ने और माताजी नीलाम्बरी किरकिरे ने. स्वानंद और उनकी माताजी की आवाज़ गीत में एक सुखद रस घोल देती है....

इंग्लिश विन्गलिश का संगीत ठहराव भरा और मेलोडियस है, रेडियो प्लेबैक इसे दे रहा है ४.१ की रेटिंग....अपनी राय आप बताएँ...


संगीत समीक्षा - इंग्लिश विन्गलिश by f100000740246953
एक सवाल  क्या आपको कोई ऐसा पुराना गीत याद आता है जिसमें गायक एक ऐसे किरदार के लिए गा रहा हो जो किसी नयी भाषा को सीखना की कोशिश कर रहा हो....सोचिये और बताईये हमें टिप्पणियों के माध्यम से.

Monday, May 16, 2011

आ बदल डाले रस्में सभी इसी बात पे.....कुछ तो बात है अमित त्रिवेदी के "आई एम्" में

Taaza Sur Taal (TST) - 12/2011 - I AM

आज सोमवार की इस सुबह मुझे यानी सजीव सारथी को यहाँ देख कर हैरान न होईये, दरअसल कई कारणों से पिछले कुछ दिनों से हम ताज़ा सुर ताल नहीं पेश कर पाए और इस बीच बहुत सा संगीत ऐसा आ गया जिस पर चर्चा जरूरी थी, तो कुछ बैक लोग निकालने के इरादे से मैं आज यहाँ हूँ, आज हम बात करेंगें ओनिर की नयी फिल्म "आई ऍम" के संगीत की. दरअसल फिल्म संगीत में एक जबरदस्त बदलाव आया है. अब फिल्मों में अधिक वास्तविकता आ गयी है, तो संगीत का इस्तेमाल आम तौर पर पार्श्व संगीत के रूप में हो रहा है. यानी लिपसिंग अब लगभग खतम सी हो गयी है. और एक ट्रेंड चल पड़ा है रोक् शैली का. व्यक्तिगत तौर पर मुझे रोक् जेनर बेहद पसंद है पर अति सबकी बुरी है. खैर आई ऍम का संगीत भी यही उपरोक्त दोनों गुण मौजूद हैं.

पहला गाना "बांगुर", बेहद सुन्दर विचार, समाज के बदलते आयामों का चित्रण है, एक तुलनात्मक अध्ययन है बोलों में इस गीत के और इस कारुण अवस्था से बाहर आने की दुआ भी है. आवाजें है मामे खान और कविता सेठ की. अमित त्रिवेदी के चिर परिचित अंदाज़ का है गीत जिसे सुनते हुए भीड़ भाड भरे शहर उलझनों की जिन्दा तस्वीरें आँखों के आगे झूलने लगती हैं. मामे खान भी उभरते हुए गायक मोहन की तरह बेहद सशक्त है. इससे पहले आपने इन्हें "नो वन किल्ल्ड जसिका" के बेहद प्रभावशाली गीत "ऐतबार" में सुना था. पर यहाँ अंदाज़ अपेक्षाकृत बेहद माईल्ड है. कविता अपने फॉर्म में है, यक़ीनन गीत कई कई बार सुने जाने लायक है.

इसके बाद जो गीत है वो अल्बम का सबसे शानदार गीत है, पहले गीत की तमाम निराशाओं को दरकिनार कर एक नयी आशा का सन्देश है यहाँ. गीत के बोल उत्कृष्ट हैं, "बोझ बनके रहे सुबह क्यों किसी रात पे....", "जीत दम तोड़ दे न कभी किसी मात पे" जैसी पक्तियां स्वतः ही आपका ध्यान आकर्षित करेंगीं. आवाज़ है मेरे बेहद पसंदीदा गायक के के की. मैं अभी कुछ दिनों पहले ये फिल्म देखी थी, जिसके बाद ही मुझे इसके संगीत के चर्चा लायक होने का अहसास हुआ. एक और बार बार सुने जाने लायक गीत.

फिल्म में चार छोटी छोटी कहानियों को जोड़ा गया है. अगला गीत इसकी तीसरी कहानी पर है जहाँ नायक का बचपन में शारीरिक शोषण हुआ है और बड़े होने के बाद भी कैसे उन बुरे लम्हों को वो खुद से जुदा नहीं कर पा रहा है, इसी कशमकश का बयां है गीत "बोझिल से...". बेहद दर्द भरा गीत है, एक बार फिर शब्द शानदार हैं,..."बिना पूछे ढेर सारी यादें जब आती है.....ख़ाक सा धुवां सा रहता है इन आँखों में...." वाह. यहाँ संगीत है राजीव भल्ला का. आवाज़ निसंदेह के के की है, जिनकी आवाज में ऐसे गीत अक्सर एक मिसाल बन जाते हैं. यहाँ भी कोई अपवाद नहीं.

अगला गीत 'ऑंखें" शायद हिंदी फिल्म इतिहास का पहला गीत होगा जो एक प्रेम गीत है और जहाँ दोनों प्रेमी समलिंगी है. बस यही इस गीत की खूबी है पर इसके आलावा गीत में कोई नयापन नहीं है. विवेक फिलिप के संगीत में ये गीत अल्बम के बाकी गीतों से कुछ कमजोर ही है.

अमित त्रिवेदी वापस आते हैं एक और नए तजुर्बे के साथ. एक आज़ान से शुरू होता है ये गीत, क्योंकि फिल्म में इसका इस्तेमाल एक कश्मीरी पंडित परिवार के पलायन की दास्ताँ बयां करने के लिए होता है. "साये साये" जिस तरह से बोला गया है वही काफी है आपकी तव्वजो चुराने के लिए. देखिये ऊपर मैंने मोहन का नाम लिया और मोहन मौजूद है यहाँ, साथ में जबरदस्त फॉर्म में रेखा भारद्वाज. जन्नत से दूर होकर खोये हुए जन्नत का दर्द है बोलों में, कहीं कहीं अमित रहमान के "दिल से" वाले अंदाज़ को फोल्लो करते नज़र आते हैं जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है, मुझे यही बात खटकी इस गीत में वैसे गीत शानदार है पर जिन लोगों इस दर्द को जिया है केवल उन्हीं को ये लंबे समय तक याद रहेगा.

राजीव भल्ला का "येंदु वंडू मेरी समझ से बाहर, इसलिए इसका जिक्र छोड़ रहा हूँ, वैसे बांगुर, बोझिल और इसी बात पे जैसे गीत काफी हैं इस अल्बम के लिए आपके द्वारा चुकाई गयी कीमत की वसूली के लिए. वैसे कभी मौका लगे तो ये फिल्म भी देखिएगा, ओनिर एक बेहद सशक्त निर्देशक हैं और फिल्म में आज के दौर के परेल्लल सिनेमा के सभी कलाकार मौजूद हैं. मुझे लगता है जिस स्तर के संगीतकार हैं अमित त्रिवेदी उन्हें रोक् जेनर से कुछ अलग भी ट्राई करना चाहिए अपने संगीत में विवधता लाने के लिए.

श्रेष्ठ गीत – "इसी बात पे", "बांगुर", "साये साये", और "बोझिल"
आवाज़ रेटिंग – ७.५/१०

फिल्म के गीत आप यहाँ सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Wednesday, December 8, 2010

है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में, खुदा वही है.. कविता सेठ ने सूफ़ियाना कलाम की रंगत हीं बदल दी है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०५

ससे पहले कि हम आज की महफ़िल की शुरूआत करें, मैं अश्विनी जी (अश्विनी कुमार रॉय) का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा। आपने हमें पूरी की पूरी नज़्म समझा दी। नज़्म समझकर हीं यह पता चला कि "और" कितना दर्द छुपा है "छल्ला" में जो हम भाषा न जानने के कारण महसूस नहीं कर पा रहे थे। आभार प्रकट करने के साथ-साथ हम आपसे दरख्वास्त करना चाहेंगे कि महफ़िल को अपना समझें और नियमित हो जाएँ यानि कि ग़ज़ल और शेर लेकर महफ़िल की शामों (एवं सुबहों) को रौशन करने आ जाएँ। आपसे हमें और भी बहुत कुछ सीखना है, जानना है, इसलिए उम्मीद है कि आप हमारी अपील पर गौर करेंगे। धन्यवाद!

आज हम अपनी महफ़िल को उस गायिका की नज़र करने वाले हैं, जो यूँ तो अपनी सूफ़ियाना गायकी के लिए मक़बूल है, लेकिन लोगों ने उन्हें तब जाना, तब पहचाना जब उनका "इकतारा" सिद्दार्थ (सिड) को जगाने के लिए फिल्मी गानों के गलियारे में गूंज उठा। एकबारगी "इकतारा" क्या बजा, फिल्मी गानों और "पुरस्कारों" का रूख हीं मुड़ गया इनकी ओर। २००९ का ऐसा कौन-सा पुरस्कार है, ऐसा कौन-सा सम्मान है, जो इन्हें न मिला हो!

इन्हें सुनकर एक अलग तरह की अनुभूति होती है.. ऐसा लगता है मानो आप खुद "ट्रांस" में चले गए हों और आपके आस-पास की दुनिया स्वर-विहीन हो गई हो.. शांति का वातावरण-सा बुन गया हो कोई... ।

आत्मा में कलम डुबोकर लिखी गई किसी कविता की तरह हीं हैं ये, जिनका नाम है "कविता सेठ"। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली में हुआ, वहीं इनका पालन-पोषण हुआ और वहीं पर स्नातक तक की शिक्षा इन्होंने ग्रहण की। शादी के बाद ये दिल्ली चली आई और फिर ऑल इंडिया रेडिया एवं दूरदर्शन के लिए गाना शुरू कर दिया। इसी दौरान इन्होंने दिल्ली के हीं "गंधर्व महाविद्याल" से "संगीत अलंकार" (संगीत के क्षेत्र में स्नातकोत्तर) की उपाधि प्राप्त की .. साथ हीं साथ दिल्ली विश्वविद्यालय से "हिन्दी साहित्य" में परा-स्नातक की डिग्री भी ग्रहण की। इन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्वालियर घराने के "एन डी शर्मा", गंधर्व महाविद्यालय के विनोद एवं दिल्ली घराने के उस्ताद इक़बाल अहमद खान से प्राप्त की है।

इन्होंने बरेली के "खान-कहे नियाज़िया दरगाह" से अपनी हुनर का प्रदर्शन प्रारंभ किया, फिर आगे चलकर ये पब्लिक शोज़ एवं म्युज़िकल कंसर्ट्स में गाने लगीं। कविता मुख्यत: सूफ़ी गाने गाती हैं, अगरचे गीत, ग़ज़ल एवं लोकगीतों में भी महारत हासिल है। इन्होंने देश-विदेश में कई सारी जगहों पर शोज़ किए हैं। ऐसे हीं एक बार मुज़फ़्फ़र अली के अंतरराष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव इंटरनेशल सूफ़ी फ़ेस्टिवल) में इनके प्रदर्शन को देखकर/सुनकर सतीश कौशिक ने इन्हें अपनी फिल्म "वादा" में "ज़िंदगी को मौला" गाने का न्यौता दिया था। आगे चलकर जब ये मुंबई आ गईं तो इन्हें २००६ में अनुराग बसु की फिल्म "गैंगस्टर" में "मुझे मत रोको" गाने का मौका मिला। इस गाने में इनकी गायकी को काफी सराहा गया, लेकिन अभी भी इनका फिल्मों में सही से आना नहीं हुआ था। ये अपने आप को प्राइवेट एलबम्स तक हीं सीमित रखी हुई थीं। इन्होंने "वो एक लम्हा" और "दिल-ए-नादान" नाम के दो सूफ़ी एलबम रीलिज किए। फिर आगे चलकर एक इंडी-पॉप एलबम "हाँ यही प्यार है" और दो सूफ़ी अलबम्स "सूफ़ियाना (२००८)" (जिससे हमने आज की नज़्म ली है) एवं "हज़रत" भी इनकी नाम के साथ जुड़ गए। "सूफ़ियाना" सूफ़ी कवि "रूमी" की रूबाईयों और कलामों पर आधारित है.. कविता ने इन्हें लखनऊ के ८०० साल पुराने "खमन पीर के दरगाह" पर रीलिज किया था।


कुछ महिनों पहले हीं कविता "कारवां" नाम के सूफ़ी बैंड का हिस्सा बनीं हैं, जब एक अंतर्राष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव में इनका ईरान और राजस्थान के सूफ़ी संगीतकारों से मिलना हुआ था। तब से यह समूह सूफ़ी संगीत के प्रचार-प्रसार में पुरज़ोर तरीके से लगा हुआ है। आजकल ये अपने बेटे को भी संगीत की दुनिया में ले आई हैं।

कविता से जब उनके पसंदीदा गायक, संगीतकार, गीतकार के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब कुछ यूँ था: (साभार: प्लैनेट बॉलीवुड)

पसंदीदा गायक: एल्टन जॉन, ए आर रहमान, सुखविंदर, शंकर महादेवन, आबिदा परवीन
पसंदीदा संगीतकार: ए आर रहमान, अमित त्रिवेदी, शंकर-एहसान-लॉय
पसंदीदा गीतकार/शायर: वसीम बरेलवी, ज़िया अल्वी, जावेद अख़्तर, गुलज़ार साहब
पसंदीदा वाद्य-यंत्र: रबाब, डफ़्फ़, बांसुरी, ईरानी डफ़्फ़
पसंदीदा सूफ़ी कवि: कबीरदास, मौलाना रूमी, हज़रत अमिर खुसरो, बाबा बुल्लेशाह
पसंदीदा गीत: ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा (जोधा-अकबर)

उनसे जब यह पूछा गया कि नए गायकों को "रियालिटी शोज़" में हिस्सा लेना चाहिए या नहीं, तो उनका जवाब था: "रियालिटी शोज़ के बारे में कभी न सोचें, बल्कि यह सोचें कि "रियालिटी" में उनकी गायकी कितनी अच्छी है। जितना हो सके शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश करें। कहा भी गया है कि - नगमों से जब फूल खिलेंगे, चुनने वाले चुन लेंगे, सुनने वाले सुन लेंगे, तू अपनी धुन में गाए जा।" वाह! क्या खूब कहा है आपने!

चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। कविता को यह नज़्म बेहद पसंद है और उन्हें इस बात का दु:ख भी है कि यह नज़्म बहुत हीं कम लोगों ने सुनी है, लेकिन इस बात की खुशी है कि जिसने भी सुनी है, वह अपने आँसूओं को रोक नहीं पाया है। आखिर नज़्म है हीं कुछ ऐसी! आप यह तो मानेंगे हीं कि सूफ़ियाना कलामों में ख़ुदा को जिस नज़रिये से देखा जाता है, वह नज़रिया बाकी कलामों में शायद हीं नज़र आता है। कविता इसी नज़रिये को अपनी इस नज़्म के माध्यम से हम सबके बीच लेकर आई हैं। "शब को सहर" मे बदलने वाला वह ख़ुदा आखिरकार कैसा लगता है, आप खुद सुनिए:

बदल रहा है जो शब सहर में,
ख़ुदा वही है..

है जिसका जलवा नज़र-नज़र में,
ख़ुदा वही है..

जो फूल खुशबू गुलाब में है,
ज़मीं, ______, आफ़ताब में है,
है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में,
खुदा वही है..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सांवला" और शेर कुछ यूँ था-

हो छल्ला पाया ये गहने, दुख ज़िंदरी ने सहने,
छल्ला मापे ने रहने, गल सुन सांवला
ढोला,
ओए सार के कित्ते कोला

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

मेरा हर लफ़्ज़ लकीर, अहसास स्याही है "आजाद"
चेहरा एक सांवला-सा ग़ज़ल में दिख रहा होगा. -आजाद

सांवले की आमद से हर चीज़ खिल गयी है.
मौसम हुआ है खुशनुमा दुनिया बदल गयी है. -अवध लाल जी

सांवला सभी को मेरा लगे है सजन
मगर मुझे ऐसा लागे जैसे किशन । - शरद तैलंग जी

कोई सांवला यहाँ कोई सफेद है
कोई खुश तो किसी को खेद है
एक खुदा ने बनाया हम सबको
फिर सबके रंगों में क्यों भेद है? - शन्नो जी (जबरदस्त....... )

सांवला सा मन और उजली सी धूप,
बस इसके सिवा कुछ नहीं,कैसा भी हो रूप - नीलम जी

चितचोर सांवला सजन , करता है नित शोर .
नदी पर करे इशारा , आजा मेरी ओर . - मंजु जी

मन के वीरान कोने मैं एक सांवला सा गम
मन के अँधेरे मैं कुछ घुल मिल सा गया है !!
सिसकियों की स्याह गोद मैं
सहमी सहमी सी यादों के
शूल भरे फूलों से कुछ छिल सा गया है !! - अवनींद्र जी

पिछली महफ़िल की शुरूआत हुई सजीव जी के प्रोत्साहन के साथ। आपके बाद शन्नो जी की आमद हुई। अपने बहुचर्चित मज़ाकिया लहजे में शन्नो जी ने फिर से हमें डाँट की खुराक पिलाई, लेकिन हमारे आग्रह करने के बाद उन्होंने गीत को फिर से सुना और अंतत: गायब शब्द की शिनाख्त करने में सफ़ल हुईं। तो इस तरह से कुछ कोशिशों के बाद महफ़िल का गायब शब्द सब के सामने प्रस्तुत हुआ। शन्नो जी, आपने शब्द तो पहचान लिया, लेकिन आपसे एक गलती हो गई। अगर आप उस शब्द पर कोई शेर कह देतीं तो हम "शान-ए-महफ़िल" के खिताब से आप हीं को नवाज़ते। अब चूँकि "साँवला" शब्द पर शेर लेकर पूजा जी सबसे पहले हाज़िर हुईं, इसलिए हम उन्हें हीं "शान-ए-महफ़िल" घोषित करते हैं। पूजा जी के बाद अवध जी, शरद जी , नीलम जी, मंजु जी एवं अवनींद्र जी का महफ़िल में आना हुआ। आप सभी के स्वरचित शेर एवं नज़्म कमाल के हैं। बधाई स्वीकारें! इन सबके बाद शन्नो जी फिर से महफ़िल में आईं, लेकिन इस बार वो खाली हाथ न थीं.. आपकी झोली में तीन-तीन रूबाईयाँ थीं और तीनों एक से बढकर एक। हमारी पिछली महफ़िल की सबसे बड़ी उपलब्धि रही अश्विनी जी का महफ़िल में आना। यूँ तो आपका शुक्रिया हम शुरूआत में हीं कर चुके हैं, लेकिन आपका जितना भी आभार प्रकट किया जाए कम होगा। उम्मीद करता हूँ कि हमारे बाकी मित्र भी भविष्य में इसी तरह हमारी सहायता करेंगे।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, December 7, 2010

सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे.. "नो वन किल्ड जेसिका" के संगीत की कमान संभाली अमित-अमिताभ ने

सुजॉय जी की अनुपस्थिति में एक बार फिर ताज़ा-सुर-ताल की बागडोर संभालने हम आ पहुँचे हैं। जैसा कि मैंने दो हफ़्ते पहले कहा था कि गानों की समीक्षा कभी मैं करूँगा तो कभी सजीव जी। मुझे "बैंड बाजा बारात" के गाने पसंद आए थे तो मैंने उनकी समीक्षा कर दी, वहीं सजीव जी को "तीस मार खां" ने अपने माया-जाल में फांस लिया तो सजीव जी उधर हो लिए। अब प्रश्न था कि इस बार किस फिल्म के गानों को अपने श्रोताओं को सुनाया जाए और ये सुनने-सुनाने का जिम्मा किसे सौंपा जाए। अच्छी बात थी कि मेरी और सजीव जी.. दोनों की राय एक हीं फिल्म के बारे में बनी और सजीव जी ने "बैटन" मुझे थमा दिया। वैसे भी क्रम के हिसाब से बारी मेरी हीं थी और "मन" के हिसाब से मैं हीं इस पर लिखना चाहता था। अब जहाँ "देव-डी" और "उड़ान" की संगीतकार-गीतकार-जोड़ी मैदान में हो, तो उन्हें निहारने और उनका सान्निध्य पाने की किसकी लालसा न होगी।

आज के दौर में "अमित त्रिवेदी" एक ऐसा नाम, एक ऐसा ब्रांड बन चुके हैं, जिन्हें परिचय की कोई आवश्यकता नहीं। अगर यह कहा जाए कि इनकी सफ़लता का दर (सक्सेस-रेट), सफ़लता का प्रतिशत... शत-प्रतिशत है, तो कोई बड़बोलापन न होगा। "आमिर" से हिन्दी-फिल्म-संगीत में अपना पदार्पण करने वाले इस शख्स ने हर बार उम्मीद से बढकर (और उम्मीद से हटकर) गाने दिए हैं। इनके संगीत से सजी अमूमन सारी हीं फिल्में चली हैं, लेकिन अगर फिल्म फ़्लॉप हो तब भी इनके गानों पर कोई उंगली नहीं उठती, गाने तब भी उतने हीं पसंद किए जाते हैं। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों ने "एडमिशन्स ओपन" नाम की फिल्म देखी है... मैंने नहीं देखी, लेकिन इसके गाने ज़रूर सुने हैं और ये मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इस फिल्म के गाने कई सारी बड़ी (और सफ़ल) फिल्मों के गानों से बढकर हैं। ऐसा कमाल है इस इंसान के सुर-ताल में... इसके वाद्य-यंत्रों में..

जहाँ लोग "अमित त्रिवेदी" के नाम से इस कदर परिचित हैं, वहीं एक शख्स है (अमिताभ भट्टाचार्य), जो हर बार अमित के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता रहा है, अब भी चल रहा है, लेकिन उसे बहुत हीं कम लोग जानते हैं। इतना कम कि अंतर्जाल पर इनके बारे में कहीं भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है (विकिपीडिया भी मौन है)। यह वो इंसान है, जिसने देव-डी का "नयन तरसे" लिखा, "इमोसनल अत्याचार" के रूप में युवा-पीढी को उनका ऐंथम दिया, जिसने उड़ान के सारे गाने लिखे ("आज़ादियाँ", "उड़ान", "नया कुछ नया तो ज़रूर है", "कहानी खत्म है"), जिसने अमित के साथ मिलकर "आमिर" में उम्मीदों की "एक लौ" जलाई, जिसने "वेक अप सिड" में रणबीर का दर्द अपने शब्दों और अपनी आवाज़ के जरिये "इकतारा" से कहवाये... (ऐसे और भी कई उदाहरण हैं)। बुरा लगता है यह जानकर कि इस इंसान को कुछ गिने-चुने लोग हीं पहचानते हैं। कहीं इसकी वज़ह ये तो नहीं कि "यह इंसान" एक गीतकार है.. संगीतकार या गायक होता तो लोग इसे हाथों-हाथ लेते... गाने में एक गीतकार का महत्व जाने कब जानेंगे लोग!!

अमित और अमिताभ की बातें हो गईं.. अब सीधे चला जाए आज की फिल्म और आज के गानों की ओर। मुझे उम्मीद है कि हमारे सभी पाठक और श्रोता "जेसिका लाल हत्याकांड" से वाकिफ़ होंगे, किस तरह उनकी हत्या की गई थी, किस तरह उनकी बहन शबरीना ने मीडिया का सहयोग लेकर न्याय पाने के लिए एंड़ी-चोटी एक कर दी और किस तरह आखिरकार न्यायपालिका ने हत्याकांड के मुख्य आरोपी "मनु शर्मा" को अंतत: दोषी मानते हुए कठिनतम सज़ा का हक़दार घोषित किया। ये सब हुआ तो ज़रूर, लेकिन इसमें दसियों साल लगे.. इस दौरान कई बार शबरीन टूटी तो कई बार मीडिया। "केस" के शुरूआती दिनों में जब सारे गवाह एक के बाद एक मुकर रखे थे, तब खुन्नस और रोष में "टाईम्स ऑफ़ इंडिया" ने यह सुर्खी डाली थी- "नो वन किल्ड जेसिका"। राजकुमार गुप्ता" ने यही नाम चुना है अपनी अगली फिल्म के लिए।

चलिए तो इस फिल्म का पहला गाना सुनते हैं। अदिति सिंह शर्मा, श्रीराम अय्यर और तोची रैना की अवाज़ों में "दिल्ली, दिल्ली"। "परदेशी" के बाद तोची रैना अमित के लिए नियमित हो गए हैं। अदिति सिंह शर्मा भी देव-डी से हीं फिल्मों में नज़र आनी शुरू हुईं। अमित की "दिल्ली-दिल्ली" रहमान की "ये दिल्ली है मेरे यार" से काफी अलग है। "मेरा काट कलेजा दिल्ली.. अब जान भी ले जा दिल्ली" जहाँ दिल्ली में रह रहे एक इंसान का दर्द बयान करती है (भले हीं तेवर थोड़े मज़ाकिया हैं), वहीं "ये दिल्ली है मेरे यार" में दिल्ली (विशेषकर दिल्ली-६) की खूबियों के पुल बाँधे गए थे। संगीत के मामले में मुझे दोनों गाने एक जैसे हीं लगे.. "पेप्पी".. जिसे आप गुनगुनाए बिना नहीं रह सकते। "दिल्ली.. दिल्ली" आप ज्यादा गुनगुनाएँगे क्योंकि इसके शब्द जमीन से अधिक जुड़े हैं.. दिल्ली की हीं भाषा में "दिल्ली-दिल्ली" के शब्द गढे गए हैं (दिल्ली-६ में प्रसून जोशी दिल्ली का अंदाज़ नहीं ला पाए थे)। इस गाने का एक "हार्डकोर वर्सन" भी है, जिसमें संगीत को कुछ और झनकदार (चटकदार) कर दिया गया है। मुझे इसके दोनों रूप पसंद आए। आप भी सुनिए:

दिल्ली


दिल्ली हार्डकोर


अमिताभ भट्टाचार्य जब भी लिखते हैं, उनकी पूरी कोशिश रहती है कि वे मुख्यधारा के गीतकारों-सा न लिखें। वे हर बार अपना अलग मुकाम बनाने की फिराक में रहते हैं और इसी कारण "अन-कन्वेशनल" शब्दों की एक पूरी फौज़ उनके गानों में नज़र आती है। "बैंड बाजा बारात" के सभी गाने उनकी इसी छाप के सबूत हैं। मुमकिन है कि दूसरे संगीतकारों के साथ काम करते वक़्त उन्हें इतनी आज़ादी न मिलती हो, लेकिन जब अमित त्रिवेदी की बात आती है तो लगता है कि उनकी सोच की सीमा हीं समाप्त हो गई है। "जहाँ तक और जिस कदर सोच को उड़ान दे सकते हो, दे दो" - शायद यही कहना होता है अमित का, तभी तो "आली रे.. साली रे", जैसे गाने हमें सुनने को नसीब हो रहे हैं। "भेजे में कचूंबर लेकिन मुँह खोले तो गाली रे", "राहु और केतु की आधी घरवाली रे".. और ऐसे कितने उदाहरण दूँ, जो मुझे अमिताभ का मुरीद बनने पर बाध्य कर रहे हैं। यहाँ अमित की भी दाद देनी होगी, जिस तरह से उन्होंने गाने को "ढिंचक ढिंचक" से शुरू किया है और कई मोड़ लेते हुए "पेपर में छपेगी" पर खत्म किया है.. एक साथ एक हीं गाने में इतना कुछ करना आसान नहीं होता। मुझे इस गाने में "सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे" ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। चूँकि यह गाना रानी मुखर्जी पर फिल्माया गया है जो एक "न्यूज़ रिपोर्टर" का किरदार निभा रही हैं तो वह रिपोर्टर "सुर्खियों" (सुर्खियों में...) से हीं अपने आस-पास की दुनिया बुनेगी। है ना?

आली रे


चलिए अब तीसरे गाने की ओर चलते हैं। इस गाने को अपनी आवाज़ें दी हैं जानेमाने लोकगायक "मामे खान" और जानेमाने रॉकस्टार "विशाल दादालनी" ने। इन दोनों का साथ दिया है रॉबर्ट ओमुलो (बॉब) ने। लोकगायक और रॉकस्टार एक साथ..कुछ अजीब लगता है ना? इसी को तो कहते हैं प्रयोग.. मैं पक्के यकीन के साथ कह सकता हूँ कि अमित इस प्रयोग में सफ़ल हुए हैं। अंग्रेजी बोलों के साथ रॉबर्ट गाने की शुरूआत करते हैं, फिर विशाल "पसली के पार हुआ ऐतबार", "चूसे है खून बड़ा खूंखार बन के" जैसे जोशीले और दर्दीले शब्दों को गाते हुए गाने की कमान संभाल लेते हैं और अंत में "दिल ऐतबार करके रो रहा है.. " कहते-कहते मामे खान गाने को "फ़ोक" का रंग दे देते हैं। गाने में वो सब कुछ है, जो आपको इसे एकाधिक बार सुनने पर मजबूर कर सकता है। तो आईये शुरूआत करते हैं:

ऐतबार


फिल्म का चौथा गाना है अमिताभ भट्टाचार्य, जॉय बरुआ, मीनल जैन (इंडियन आईडल फेम) और रमन महादेवन की आवाज़ों में "दुआ"। ये अलग किस्म की बेहतरीन दुआ है। "खोलो दिल की चोटों को भी" .. "खुदा के घर से, उजालें न क्यों बरसे" जैसे बेहद उम्दा शब्दों के सहारे "अमित-अमिताभ" ने लोगों से ये अपील की है कि रास्ते रौशन हैं, तुम्हें बस आगे बढने की ज़रूरत है, अपने दिल के दर्द को समझो, हरा करो और आगे बढो। और अंत में "मीनल जैन" की आवाज़ में "दुआ करो - आवाज़ दो" की गुहार "सोने पे सुहागा" की तरह काम करती है। आईये हम सब मिलकर यह दुआ करते हैं:

दुआ


देखते-देखते हम अंतिम गाने तक पहुँच गए हैं। "आमिर" के "एक लौ" की तरह हीं शिल्पा राव "ये पल" लेकर आई हैं। "एकल गानों" में शिल्पा राव का कोई जवाब नहीं होता। यह बात ये पहले भी कई बार साबित कर चुकी हैं। इसलिए मेरे पास नया कुछ कहने को नहीं है। अमित और अमिताभ का कमाल यहाँ भी नज़र आता है। "मृगतृष्णा" जैसे शब्दों का इस्तेमाल लोग विरले हीं गानों में करते हैं। "रेंगते केंचुओं से तो नहीं थे".. अमिताभ इस गाने में भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं। अमित का "हूँ हूँ" गाने को एक अलग हीं लेवल पर ले जाता है। इस तरह से, एक पल क्या... हर पल में उसी शांति, उसी चैन का माहौल तैयार करने में ये तीनों कामयाब हुए हैं।

ये पल


तो इस तरह से मुझे "अमित-अमिताभ" की यह पेशकश बेहद अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। नमस्कार!

Tuesday, July 20, 2010

बाई दि वे, ऑन दे वे, "आयशा" से हीं कुछ सुनते-सुनाते चले जा रहे हैं जावेद साहब.. साथ में हैं अमित भी

ताज़ा सुर ताल २७/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! 'ताज़ा सुर ताल' में आज हम जिस फ़िल्म के गीतों को लेकर आए हैं, उसके बारे में तो हमने पिछली कड़ी में ही आपको बता दिया था, इसलिए बिना कोई भूमिका बाँधे आपको याद दिला दें कि आज की फ़िल्म है 'आयशा'।

सुजॊय - अमित त्रिवेदी के संगीत से सजे फ़िल्म 'उड़ान' के गानें पिछले हफ़्ते हमने सुने थे, और आज की फ़िल्म 'आयशा' में भी फिर एक बार उन्ही का संगीत है। शायद अब तक हम 'उड़ान' के गीतों को सुनते नहीं थके थे कि एक और ज़बरदस्त ऐल्बम के साथ अमित हाज़िर हैं। मैं कल जब 'आयशा' के गीतों को सुन रहा था विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगा कि 'देव-डी' और 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी 'आयशा' में अमित ने पैदा की है। इससे पहले कि वो ख़ुद को टाइप-कास्ट कर लेते और उनकी तरफ़ भी उंगलियाँ उठनी शुरु हो जाती, उससे पहले ही वे अपने स्टाइल में नयापन ले आए।

विश्व दीपक - 'आयशा' के गानें लिखे हैं जावेद अख़्तर साहब ने। पार्श्वगायक की हैसियत से में इस ऐल्बम में नाम शामिल हैं अमित त्रिवेदी, अनुष्का मनचन्दा, नोमान पिण्टो, निखिल डी'सूज़ा, रमण महादेवन, सम्राट कौशल, अनुषा मणि, ऐश किंग और तोची रैना की। दो एक नामों को छोड़ कर बाक़ी सभी नाम नए हैं। निखिल और नोमान की आवाज़ें हमने पिछले हफ़्ते की फ़िल्म 'उड़ान' में भी सुनी थी।

सुजॊय - अभी पिछले शनिवार की ही बात है, गायक अभिजीत 'ज़ी बांगला' के एक टॊक शो में पधारे थे। उसमें बातों बातों में जब आज के गीत संगीत की चर्चा छिड़ी, तो उन्होने कहा कि कुछ साल पहले तक लोग कुमार शानू, उदित नारायण, सोनू निगम, अभिजीत जैसी आवाज़ों को अलग अलग पहचानते थे, गीत सुन कर बोल देते थे कि किस संगीतकार की धुन है, लेकिन आज फ़िल्म संगीत ऐसा हो गया है कि गीत सुनने के बाद ना गायक के नाम का अनुमान लगाया जा सकता है और ना ही संगीतकार का। विश्व दीपक जी, आप बताइए, क्या आपको लगता है कि बहुत ज़्यादा फ़्रेश टैलेण्ट्स को अगर गायक के रूप में मौके दिए जाएँ तो फ़िल्मी गीतों की लोकप्रियता पर विपरीत असर पड़ेगा? मुझे कुछ कुछ ऐसा लगता है कि अत्यधिक नई आवाज़ें श्रोताओं को डिस्ट्रैक्ट करती है। किसी आवाज़ को लोगों के दिलों में बिठाने के लिए उससे कई गीत गवाने ज़रूरी हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं अभिजीत जी के बात से पूरी तरह सहमत नहीं। हाँ, इतना तो है कि हमें अपने स्थापित गायकों को मौका देते रहना चाहिए ताकि श्रोता भी उन स्थापित कलाकारों के नाम से खुद को जोड़ सकें। इससे गाने को भी लोकप्रियता हासिल होगी। लेकिन बस कुछ हीं कलाकारों के साथ काम करने से दूसरे प्रतिभावान गायकों की अनदेखी होने का खतरा है.. पुराने समय में इतनी सारी सुविधाएँ मौजूद नहीं थी इसलिए संगीतकारों के पास नए-नए लोग कम हीं आते थे.. पर अब "इंटरनेट बूम" के बाद अपनी आवाज़ को संगीतकार के पास पहुँचाने के हज़ार जरिये हैं और संगीतकार भी बस साज़ों के साथ प्रयोग करने तक हीं सीमित नहीं रहे, वे अब आवाज़ के साथ भी प्रयोग करना चाहते हैं। अब जब इतने सारे विकल्प उपलब्ध हैं तो वे एक हीं के साथ जुड़कर क्यों रहें? और फिर अगर किसी गायक में क्षमता है कि वो अपने आप को किसी संगीतकार के लिए "जरूरी" साबित कर दे तो संगीतकार भी दूसरे किसी विकल्प के बारे में नहीं सोचेगा। हर संगीतकार के पास ऐसे एक या दो गायक जरूर हीं होते है। आप "कैलाश खेर" , "सुखविंदर", "के के", "मोहित चौहान" या फिर "श्रेया घोषाल" को हीं देख लीजिए.. भले हीं हज़ार गायक हों, लेकिन इनकी आवाज़ अमूमन हर एलबम में सुनाई पड़ हीं जाती है। जहाँ तक "संगीत" सुनकर "संगीतकार" पहचानने की बात है तो अभी भी हर संगीतकार अपना एक स्पेशल टच जरूर हीं रखता है, जिसे सुनते हीं लोग संगीतकार का नाम जान लेते हैं। हाँ, कुछ गाने या फिर कुछ जौनर ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर संगीतकार के बारे में ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता, लेकिन मेरे हिसाब से यह अच्छी बात है। इससे साबित होता है कि हर संगीतकार आजकल आगे बढ रहा है, कोई भी एक जगह ठहरकर नहीं रहना चाहता। इसलिए सभी हर क्षेत्र में निपुण होने की कोशिश कर रहे हैं। यह "संगीत" के लिए अच्छी खबर है। नहीं तो पहले यह होता था कि अगर "ड्र्म्स" का इस्तेमाल सही हुआ है तो ये "एल-पी" हैं हैं। दूसरा कोई संगीतकार वैसा जादू तैयार कर हीं नहीं पाता था। आजकल टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो गई है कि ऐसी किसी कमी की संभावना हीं खत्म हो गई है।

सुजॊय - विश्व दीपक जी, इस बहस को विराम देते हैं और सुनते हैं फ़िल्म 'आयशा' का पहला गीत जिसे गाया है अमित त्रिवेदी और ऐश किंग ने।

गीत: सुनो आएशा


विश्व दीपक - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना। एक पेपी नंबर, लेकिन जिन साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, और ऒरकेस्ट्रेशन जिस तरह का किया गया है, अरेंजमेण्ट में एक नवीनता है। अमित का संगीत संयोजन किसी दूसरे संगीतकार से नहीं मिलता, यही उनकी ख़ासियत है। गाने का जो बेसिक रीदम पैटर्ण है, वो कुछ कुछ फ़िल्म 'दोस्ताना' के "जाने क्यों दिल चाहता है" गीत जैसा है, और कुछ कुछ "जब मिला तू" जैसा भी है। लेकिन ’आयशा' के इस गीत को इन गीतों से नर्म अंदाज़ में गाया गया है। ऐश किंग ने अमित का अच्छा साथ दिया है इस गीत में। आपको याद दिला दें कि ये वही ऐश किंग हैं जिन्होने पिछले साथ फ़िल्म 'दिल्ली-६' में "दिल गिरा दफ़्फ़तन" गाया था।

सुजॊय - आपने संगीत संयोजन का ज़िक्र किया, तो मैं इस बात पर प्रकाश डालना चाहूँगा कि इस गीत में सैक्सोफ़ोन का ख़ासा इस्तेमाल हुआ है, और इससे याद अया कि अभी हाल ही में जाने माने सैक्सोफ़ोनिस्ट मनोहारी सिंह, यानी कि मनोहारी दादा का देहावसान हो गया जो फ़िल्म इंडस्ट्री के मशहूर सैक्सोफ़ोनिस्ट और फ़्ल्युटिस्ट रहे हैं। तो इस गीत को हम अपनी तरफ़ से मनोहारी दादा के नाम डेडिकेट करते हुए उन्हे अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।

विश्व दीपक - यह बहुत अच्छी बात कही आपने। 'ताजा सुर ताल' के ज़रिए गुज़रे ज़माने के अज़ीम फ़नकारों को श्रद्धांजलि से बढ़कर और अच्छी बात क्या हो सकती है! चलिए इस थिरकते गीत से जो सुरीली शुरुआत हुई है इस ऐल्बम की, अब आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं फ़िल्म का दूसरा गीत तोची रैना की आवाज़ में।

गीत: गल मिठि मिठि (मीठी मीठी) बोल


सुजॊय - भई ऐसा कह सकते हैं कि 'आयशा' ऐल्बम में जो पंजाबी तड़का अमित त्रिवेदी ने लगाया है, उसी का स्वाद चख रहे थे हम। गीत के बोल भी पूरी तरह से पंजाबी हैं और पाश्चात्य रीदम और साज़ों के साथ फ़्युज़ किया गया है। बीट्स धीमी हैं और पंजाबी भंगड़े की तरह फ़ास्ट रीदम नहीं है। वैसे यह गीत आपको 'लव आजकल' के "आहुँ आहुँ" की याद दिला हीं जाता है। आपको याद दिला दें कि तोची रैना ने अमित त्रिवेदी के लिए "ओ परदेसी" गीत गाया था 'देव-डी' में जिसे ख़ूब सराहना मिली थी।

विश्व दीपक - युं तो आज के दौर में लगभग सभी फ़िल्मों में पंजाबी गीत होते ही हैं, लेकिन यह गीत लीक से हट के है। इस गीत में वो सब बातें मौजूद हैं जो इसे लोकप्रियता की पायदानों पे चढने में मदद करेंगे। देखते हैं जनता का क्या फ़ैसला होता है! और अब फ़िल्म का तीसरा गीत। यह है अमित त्रिवेदी और नोमान पिण्टो का गाया "शाम भी कोई जैसे है नदी"। जावेद साहब का शायराना अंदाज़ है इस गीत में, आइए सुनते हैं।

गीत: शाम भी कोई जैसे है नदी (बूम बूम बूम परा)


सुजॊय - यह गीत भी अपना छाप छोड़ हीं जाती है। अरेंजमेण्ट ऐसा है गाने का कि ऐसा लगता है जैसे कोई युवक हाथ में गीटार लिए आपके ही सामने बैठे गा रहा हो बिल्कुल लाइव! और यही बात आकर्षित करती है इस गीत की तरफ़। अमित और नोमान ने जिस नरमी और फ़ील के साथ गाने को गाया है, और धुन भी उतना ही मेलोडियस! एक कर्णप्रिय यूथ अपील इस गीत से छलकती है।

विश्व दीपक - हाँ, और यह तो बिल्कुल अमित त्रिवेदी टाइप का गाना है। इस गीत को रॉक शैली में भी बनाया जा सकता था, लेकिन उससे शायद फ़ील कम हो जाती। इस तरह के नरम बोलों के लिए इस तरह का म्युज़िक अरेंजमेण्ट बिलकुल सटीक है।

सुजॊय - अच्छा, हमने इस फ़िल्म के अभिनेताओं का ज़िक्र तो किया ही नहीं! फ़िल्म 'आयशा' में नायक हैं अभय देओल और नायिका हैं सोनम कपूर। यानी कि आयशा बनी हैं सोनम कपूर। सोनम भी फ़िल्म दर फ़िल्म अपने कैरियर की सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही हैं। 'दिल्ली-६' और ' आइ हेट लव स्टोरीज़' में उनके अभिनय को सराहा गया, और शायद 'आयशा' में भी वो सफल रहेंगी। अभय देओल अपना एक लो-प्रोफ़ाइल मेनटेन करते हैं लेकिन तीनों भाइयों की अगर बात करें तो मुझे तो सनी और बॊबी से ज़्यादा अभय की ऐकटिंग ज़्यादा जँचती है। ख़ैर, पसंद अपनी-अपनी ख़याल अपना-अपना। लीजिए सुनिए 'आएशा' का चौथा गाना।

गीत: बहके बहके नैन


विश्व दीपक - बहके बहके अंदाज़ में यह गीत गाया है अनुष्का मनचन्दा, सम्राट कौशल और रमण महादेवन ने। पूरी तरह से कारनिवल फ़ील लिए हुए है। हिंदी और अंग्रेज़ी के बोलों का संतुलित संगम है यह गीत। सम्राट और रमण ने जहाँ अंग्रेज़ी बोलों के साथ पूरा न्याय किया है, वहीं अनुष्का भी अपनी गायकी का लोहा मनवाने में कामयाब रही हैं। जिस तरह की अदायगी, जिस तरह का थ्रो इस गाने में चाहिए था, अनुष्का ने उसका पूरा पूरा ख़याल रखा। ऐकॊरडिओन की ध्वनियाँ इस गीत में सुनने को मिलती है, और जो हमें याद दिलाती है शंकर जयकिशन की।

सुजॊय - पूरी तरह से एक डांस नंबर है यह गीत और जैसा कि आपने कहा कि कारनिवल गीत, तो कुछ इसी तरह के कारनिवल गीतों की याद दिलाएँ आप सब को। फ़िल्म 'धूम' में "सलामी", 'धूम-२' में "टच मी डोण्ट टच मी सोणीया", 'हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड' में "प्यार की ये कहानी सुनों", ये सभी इसी जौनर में आते हैं।

विश्व दीपक - हाँ, और इन सब गीतों में करीबीयन, अरबी और कुछ कुछ गोवन (पोर्चुगीज़) संगीत की छाप नज़र आती है। और ऐसे गीतों में लैटिन नृत्य शैली का ख़ास तौर से प्रयोग होता है। इस गीत से एक मूड बन गया है, तो इस मूड को थोड़ा सा बदलते हुए एक बिल्कुल ही अलग किस्म का गीत सुनते हैं।

गीत: लहरें


सुजॊय - "खोयी खोयी सी हूँ मैं, क्यों ये दिल का हाल है, धुंधले सारे ख़्वाब हैं, उलझा हर ख़याल है, सारी कलियाँ मुरझा गईं, लोग उनके यादों में रह गए, सारे घरोंदे रेत के, लहरें आईं लहरों में मिल गए" - एक बेहतरीन गीत, शब्दों के लिहाज़ से, संगीत के लिहाज़ से और गायकी के लिहाज़ से भी। अनुषा मणि की मुख्य आवाज़ थी इस गीत में जिसे उन्होने एक हस्की फ़ील के साथ गाया। नोमान पिण्टो और निखिल डी'सूज़ा ने वोकल बैकिंग दी।

विश्व दीपक - हर तरह से यह गीत इस ऐल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत है, और हो सकता है कि अनुषा मणि पिछले साल "इकतारा" के कविता सेठ की तरह इस बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार हासिल कर लें। अब तक इस फ़िल्म के जितने भी गानें हमने सुनें, किसी भी गीत से हताशा नहीं हुई और हर एक गीत में कुछ ना कुछ अच्छी बात दिल को छू गई। तो अब जो इस फ़िल्म का एक अंतिम गीत बचा है, उसे भी सुनते चलें।

सुजॊय - ज़रूर!

गीत: बाइ दि वे


सुजॊय - जिस तरह से ऐल्बम की सुरीली शुरुआत हुई थी "सुनो आयशा" गीत के साथ, उतना ही धमाकेदार समापन हुआ अनुष्का मनचन्दा और नोमान पिण्टो के गाए इस फ़ास्ट डान्स नंबर से। इस रॉक पॊप सॊंग में अनुष्का जिस तरह से बोलती भी हैं, हमें फ़िल्म 'गजनी' में सुज़ेन डी'मेलो के गाए "ऐ बच्चु तू सुन ले" गीत की झलक दिखा जाती है।

"उड़ान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - कुल मुलाकर, इस ऐल्बम के बारे में मेरा तो यही ख़याल है कि 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी इस ऐल्बम में है और बहुत जल्द ही अमित त्रिवेदी पहले कतार के संगीतकारों में अपना स्थान पक्का कर लेंगे और उस राह पर वो बड़े पुख़्ता क़दमों से चल भी पड़े हैं। अनुष्का मनचन्दा को अगर इसी तरह से गाने के मौके मिलते रहें तो वो भी सुनिधि की तरह नाम कर सकती है ब-शर्ते कि वो अपनी वरसटायलिटी बनाए और इन तेज़ रफ़्तार रॉकक गीतों के बाहर भी दूसरे जौनर के गीतों को निभाने की कोशिश करे। अनुषा मणि के लिए शुभकामनाएँ कि आने वाले दिनों में वो अपनी क्षमता का और सबूत पेश करें। और अमित त्रिवेदी का संगीत जितना नवीन है, उनकी आवाज़ में भी वही ताज़गी है। और रही बात जावेद अख़्तर साहब, तो भई उनकी शान में और क्या कह सकते हैं, वो तो हैं ही नंबर वन!

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही कहा आपने। आयशा के गीतों के सुनने के बाद मुझे लग रहा है कि हमने पिछली दफ़ा जो "आयशा" के आने की घोषणा की थी तो हमारी वह उम्मीद पूरी तरह से सही हीं साबित हुई है। अमित के बारे में और क्या कहूँ, मैंने "उड़ान" के गीतों की समीक्षा के दौरान हीं अपना दिल खोल कर रख दिया था। हाँ, जावेद साहब की कही कुछ बातें आपसे जरूर बाँटना चाहूँगा। "आयशा" के "म्युजिक-रीलिज" के समय जावेद साहब ने हँसी-मज़ाक में हीं सही, लेकिन एक "गीतकार" की हालत जरूर बयान कर दी। उन्होने कहा कि आज का दिन मेरे लिए सबसे अच्छा दिन है, क्योंकि आज के बाद मुझे "रिया कपूर" (फिल्म की निर्माता और सोनम की छोटी बहन) के फोन नहीं आएँगे। आज के बाद कोई मुझसे यह नहीं कहेगा कि "मुखरा" बदल दीजिये या फिर "दूसरे अंतरा" की तीसरी पंक्ति "पुराने गानों" जैसी लग रही है, इसे हटाईये। जावेद साहब ने अपनी नानी/दादी का ज़िक्र करते हुए कहा कि वे मुझे डराने के लिए "भूत" का नाम लेती थीं और आजकल के निर्माता-निर्देशक मुझे डराने के लिए "यूथ" (युवा-पीढी) का नाम लेते हैं और कहते हैं कि यह "यूथ" की भाषा नहीं। आखिरकार जावेद साहब पूछ हीं बैठे कि भई यूथ की भाषा क्या है, उसकी कोई डिक्शनरी, उसका कोई ग्रामर तो होगा हीं। जिस किसी के पास वे किताबें हों, मुझे दे जाए, बड़ी हीं कृपा होगी। अगली फिल्म से मैं उस किताब को देखकर हीं गाने लिखूँगा। तो अगर यह हालत जावेद साहब की है, तो दूसरे गीतकारों के साथ क्या होता होगा। जब तक निर्माता, निर्देशक या दूसरा कोई और गीतकार के काम में दखल देना बंद नहीं करेगा, तब तक दिल को छूने वाले अच्छे गाने कहाँ से लिखे जाएँगें। जाते-जाते जावेद साहब ने गीतकार-संगीतकार के लिए बन रहे नए ऐक्ट की भी बात की, जिसमें गानों के राईट इन सबको भी हासिल होंगे। उन्होंने कहा कि जब गीतकार गाने का मालिक हो जाएगा तो फिर लोग उसे तुच्छ जीव समझने की भूल नहीं करेंगे। मुझे भी उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है। खैर, बात तो समीक्षा की हो रही थी और मैं न जाने कहाँ बह निकला। तो वापस आते हैं "आयशा" पे। मुझे पक्का यकीन है कि आप सबों को इसके सारे गाने पसंद आएँगे। इसी उम्मीद के साथ हम आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। अगली दफ़ा ऐसी हीं कोई फिल्म होगी.. शायद "पिपली लाईव" या "खट्टा-मीठा" या फिर कोई और हीं फिल्म। अभी कह नहीं सकता, जानने के लिए अगले "ताज़ा सुर ताल" का हिस्सा जरूर बनें।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७९- अमित त्रिवेदी के जोड़ीदार गीतकार रहे हैं अमिताभ भट्टाचार्य। इस फ़िल्म में जावेद अख़्तर का साथ अमित को मिला। तो बताइए कि इससे पहले जावेद साहब के लिखे किस गीत की धुन अमित त्रिवेदी ने बनाई थी?

TST ट्रिविया # ८०- हमने मनोहारी सिंह का ज़िक्र आज इस स्तंभ में किया। आपको बताना है कि मनोहारी दा ने सब से पहले किस हिंदी फ़िल्मी गीत में सैक्सोफ़ोन बजाया था?

TST ट्रिविया # ८१- गीतकार जावेद अख़्तर को आप फ़िल्म 'ठोकर' के मशहूर गीत "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ" से कैसे जोड़ सकते हैं? (इस नज़्म का ज़िक्र हमने महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर भी किया था)


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. कविता चौधरी।
२. 'यूं होता तो क्या होता'।
३. अमित त्रिवेदी (संगीतकार) और अमिताभ भट्टाचार्य (गीतकार) ने। (इस राज़ का पर्दाफ़ाश खुद अमित ने एक इंटरव्यु में किया था)।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!
तीसरा नहीं भी पता था तो तुक्का मार देतीं.. क्योंकि तुक्के में इन्हीं दोनों कलाकारों के नाम आने की ज्यादा संभावनाएँ हैं।.. खैर कोई बात नहीं.. इस बार के सवालों पर नज़र दौड़ाईये।

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