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Saturday, November 28, 2015

बातों बातों में - 14 : गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके सुपुत्र ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत



बातों बातों में - 14

गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके बेटे ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत

जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं...



नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। इस बार हम आपके लिए लेकर आए हैं जाने-माने गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में उनके बेटे गालिब असद भोपाली से की गई लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। इनसे बातचीत की है कृष्णमोहन मिश्र ने। 



असद भोपाली
फिल्म-जगत में कुछ ऐसे भी सृजनशील रचनाकार हुए हैं, जिन्होने गुणबत्ता से कभी भी समझौता नहीं किया, चाहे फिल्म उन्हें किसी भी श्रेणी की मिली हो। फिल्म-जगत के एक ऐसे ही प्रतिभावान, स्वाभिमानी और संवेदनशील शायर-गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर “बातों बातों में” के इस अंक में हम चर्चा करेंगे। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविज़न धारावाहिक के पटकथा, संवाद और गीत लेखक ग़ालिब खाँ से हमारा सम्पर्क हुआ। मालूम हुआ कि अपने समय के चर्चित गीतकार असद भोपाली के आप सुपुत्र हैं। अपने स्वाभिमानी पिता से ही प्रेरणा पाकर ग़ालिब खाँ फिल्म और टेलीविज़न के क्षेत्र में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। हमने ग़ालिब साहब से अनुरोध किया कि वो अपने पिता असद भोपाली के बारे में हमारे साथ बातचीत करें। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने हमसे बातचीत की। प्रस्तुत है चार दशकों तक फिल्म-गीतकार के रूप में सक्रिय श्री असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र ग़ालिब खाँ से किये गये साक्षात्कार के सम्पादित अंश।

ग़ालिब असद भोपाली
कृष्णमोहन- ग़ालिब खाँ साहब, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के इस मंच पर हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।

ग़ालिब खाँ- धन्यवाद। आपने इस मंच पर मुझे अपने पिता जी के बारे में कुछ कहने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमी आपके पिता को असद भोपाली के नाम से जानते हैं। हम उनका वास्तविक नाम जानना चाहते हैं साथ ही यह भी जानना चाहेंगे कि आपके खानदान का सम्बन्ध भोपाल से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता असद उल्लाह खाँ का जन्म 10 जुलाई 1921 को भोपाल में हुआ था। उनके पिता यानि मेरे दादा मुंशी अहमद खाँ का भोपाल के आदरणीय व्यक्तियों में शुमार था। वे एक शिक्षक थे और बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाया करते थे। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी उनके शिष्यों में से एक थे। वो घर में ही बच्चों को पढ़ाया करते थे, इसीलिए मेरे पिताजी भी अरबी-फारसी के साथ साथ उर्दू में भी वो महारत हासिल कर पाए जो उनकी शायरी और गीतों में हमेशा झलकती रही। उनके पास शब्दों का खज़ाना था। एक ही अर्थ के बेहिसाब शब्द हुआ करते थे उनके पास। इसलिए उनके जाननेवाले संगीतकार उन्हें गीत लिखने की मशीन कहा करते थे।

कृष्णमोहन- फिल्म-जगत में आने से पहले एक शायर के रूप वो कितने लोकप्रिय थे?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता को शायरी का शौक़ किशोरावस्था से ही था। उस दौर में जब कवियों और शायरों ने आज़ादी की लड़ाई में अपनी कलम से योगदान किया था, उस दौर में उन्हें भी अपनी क्रान्तिकारी लेखनी के कारण जेल की हवा खानी पड़ी थी।

कृष्णमोहन- इसका अर्थ हुआ कि असद भोपाली साहब स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे।

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, आज़ादी की लड़ाई में हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें साहित्यकारों की भी भूमिका रही है। मेरे पिता ने एक बुद्धिजीवी के रूप में इस लड़ाई में अपना योगदान किया था। क्रान्तिकारी लेखनी के कारण अँग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। ये और बात है कि अँग्रेज़ जेलर भी उनकी 'गालिबी' का प्रशंसक हो गया था। (जी हाँ; वो अँग्रेज़ जेलर शायरी को 'गालिबी' कहा करता था)। जेल से छूटने के बाद मेरे पिता मुशायरों में हिस्सा लेते रहे।

कृष्णमोहन- स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी लेखनी से योगदान करने वाले शायर असद भोपाली साहब फिल्मी दुनिया में कैसे पहुंचे?

सुरैया
ग़ालिब खाँ- तब देश आज़ाद हो चुका था। उन दिनों हर छोटे-बड़े मुशायरे में उन्हें सम्मान से बुलाया जाता था। इसी शायरी ने उन्हें फिल्मनगरी मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँचा दिया। हुआ यूँ कि भोपाल टाकीज कि तरफ से एक मुशायरे का आयोजन किया गया था और शायरों की जबान में कहा जाए तो उन्होंने ये ‘मुशायरा लूट लिया’ था। नतीजा ये हुआ कि भोपाल टाकिज के मैनेजर मिस्बाह साहब ने उन्हें पाँच सौ रूपये दिये और फाजली ब्रदर्स का पता दिया, जिन्हें अपनी नयी फिल्म के गीतों के लिए एक माहिर शायर कि दरकार थी। वो सन 1949 में बम्बई आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। 'दुनिया' उनकी पहली फिल्म थी। संगीतकार थे सी. रामचन्द्र और मुख्य भूमिकाओं में करण दीवान, सुरैया, और याकूब जैसे महान कलाकार थे। इस फिल्म का गीत “अरमान लुटे दिल टूट गया...” लोकप्रिय भी हुआ था।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुनिया’ में आपके पिता असद भोपाली के लिखे इस पहले गीत को क्यों न हम श्रोताओं को सुनवाते चलें? 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, मेरे पिता के इस पहले फिल्मी गीत को श्रोताओं को ज़रूर सुनवाइए। 


फिल्म – दुनिया : “अरमान लुटे दिल टूट गया...” : गायिका - सुरैया 


 
कृष्णमोहन- बहुत दर्द भरा गीत है। अब आपसे हम यह जानना चाहेंगे कि फिल्म-जगत में स्थापित हो जाने के बाद असद साहब के शुरुआती दौर का सबसे लोकप्रिय गीत कौन सा है? 

ग़ालिब खाँ- शुरुआती दौर में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर और हुस्नलाल भगतराम जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम किया था। बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित सफलतम फिल्म 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा भी मनवा लिया। फिल्म का एक गीत -“किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता है, ऐ दुनिया वालों सच तो कहो क्या प्यार भी झूठा होता है...” आज भी लोगों को याद है। मुझे अपने पिता के लिखे गीतों में यह गीत बेहद पसंद है। कृष्णमोहन जी, क्या यह गीत हम श्रोताओं को सुनवा सकते हैं? 

कृष्णमोहन- अवश्य, मैं स्वयं आपसे यही कहना चाह रहा हूँ। तो “बातों बातों में” के प्रिय पाठकों-श्रोताओं, आप सुनिए हमारे आज के अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ की पसन्द का गीत, जिसे उनके पिता और सुप्रसिद्ध शायर-गीतकार असद भोपाली ने 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘अफसाना’ के लिए लिखा था। आप यह गीत सुनें। 


फिल्म – अफसाना : “किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली...” : गायक – मुकेश 




ग़ालिब खाँ- फिल्म ‘अफसाना’ के गीत से उन्हें लोकप्रियता तो मिली, परन्तु फिल्म की सफलता के सापेक्ष उन्हें काम नहीं मिला। उस समय के कलाकारों को काम से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, उन्होंने भी किया। 1963 में प्रदर्शित फिल्म 'पारसमणि' के गीत लिखने का उन्हें प्रस्ताव मिला। यह एक फेण्टेसी फिल्म थी। फिल्म की संगीत-रचना के लिए नये संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को अनुबन्धित किया गया था। मेरे पिता ने उस समय की जन-रुचि और फिल्म की थीम के मुताबिक इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। फिल्म ‘पारसमणि’ के गीत- "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." और "वो जब याद आये, बहुत याद आये..." ने लोकप्रियता के परचम लहरा दिये थे। ये गीत वर्षों बाद आज भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं। 

कृष्णमोहन- आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम इस फिल्म का एक गीत अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाते चलें। 

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, मेरे खयाल से हम अपने पाठकों को ‘पारसमणि’ का बेहद लोकप्रिय गीत– “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” सुनवाते हैं। 


फिल्म – पारसमणि : “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” : स्वर – लता मंगेशकर और कमल बरोट 



कृष्णमोहन- बहुत ही मधुर गीत आपने सुनवाया। ग़ालिब साहब; अब हम जानना चाहेंगे की आपके पिता असद भोपाली ने किन-किन संगीतकारों के साथ काम किया और किन संगीतकारों से उनके अत्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने संगीतकार सी. रामचन्द्र, हुस्नलाल-भगतराम, खैय्याम, हंसराज बहल, एन. दत्ता, नौशाद, ए.आर. कुरैशी (मशहूर तबलानवाज़ अल्लारक्खा), चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, सोनिक ओमी, राजकमल, लाला सत्तार, हेमन्त मुखर्जी, कल्याणजी-आनन्दजी जैसे दिग्गज संगीतकरों के साथ काम किया। परन्तु ‘पारसमणि’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ सफलतम गीत देने के बाद नए संगीतकारों के साथ काम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अन्त तक चलता रहा। नए संगीतकारों में गणेश और उषा खन्ना के साथ वो अधिक सहज थे। संगीतकार राम लक्ष्मण उनके अन्तिम संगीतकार साथियों में से हैं, जिनके पास आज भी उनके कई मुखड़े और गीत लिखे पड़े हैं। 

कृष्णमोहन- असद भोपाली जी ने हर श्रेणी की फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं, किन्तु उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जो उन्हें बहुत पहले ही मिलना चाहिए था। इस सम्बन्ध में आपका और आपके परिवार का क्या मत है? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने 1949 से 1990 तक लगभग चार सौ फिल्मों में दो हज़ार से ज्यादा गीत लिखे परन्तु फिल्म ‘दुनिया’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ के गीत "कबूतर जा जा जा..." तक उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे। इस अन्तिम फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड प्राप्त हुआ था। दरअसल इस स्थिति के लिए वो खुद भी उतने ही ज़िम्मेदार थे, जितनी ये फिल्म नगरी। कवियों और शायरों वाली स्वाभाविक अकड़ उन्हें काम माँगने से रोकती थी और जीवनयापन के लिए जो काम मिलता गया वो करना पड़ा। बस इतना ध्यान उन्होने अवश्य रखा था कि कभी अपनी शायरी का स्तर नहीं गिरने दिया। कम बजट की स्टंट फिल्मों में भी उन्होंने "हम तुमसे जुदा हो के, मर जायेंगे रो-रो के..." जैसे गीत लिखे। अपेक्षित सफलता न मिलने से या यूँ कहूँ कि उनकी असफलता ने उन्हें शराब का आदी बना दिया था और उनकी शराब ने पारिवारिक माहौल को कभी सुखद नहीं होने दिया। पर आज जब मैं उनकी स्थिति को अनुभव कर पता हूँ तो समझ में आता है कि जितना दुःख उनकी शराब ने हमें दिया उससे ज्यादा दुःख वो चुपचाप पी गए और हमें एहसास तक नहीं होने दिया। 

प्रसिद्ध शायर ग़ालिब के हमनाम (असद उल्लाह् खाँ) होने के साथ-साथ स्वभाव, संयोग और भाग्य भी उन्होंने कुछ वैसा ही पाया था। मेरे पिता के अन्तर्मन का दर्द उनके गीतों में झलकता है। दर्द भरे गीतों की लम्बी सूची में से फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का एक गीत मैं पाठकों को सुनवाना चाहता हूँ। 

कृष्णमोहन- दोस्तों, ग़ालिब खाँ के अनुरोध पर हम आपको 1957 की फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का यह गीत सुनवा रहे हैं। स्वर मोहम्मद रफी का और संगीत हंसराज बहल का है। 


फिल्म – मिस बॉम्बे : “ज़िंदगी भर ग़म जुदाई का..” : स्वर – मोहम्मद रफी


 
कृष्णमोहन- साहित्य क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के बारे में भी हमें बताएँ। क्या उनके गीत / ग़ज़ल के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं? 

ग़ालिब खाँ- इस मामले में भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी लिखी हजारों नज्में और गजले जिस डायरी में थी वो डायरी बारिश कि भेंट चढ़ गयी। उन दिनों हम नालासोपारा के जिस घर में रहा करते थे, वह पहाड़ी के तल पर था और वहाँ मामूली बारिश में भी बाढ़ कि स्थिति पैदा हो जाती थी और ऐसी ही एक बाढ़, असद भोपाली की सारी "गालिबी" को बहा ले गयी। तब उनकी प्रतिक्रिया, मुझे आज भी याद है। उन्होने कहा था- 'जो मैं बेच सकता था मैं बेच चुका था, और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी'। एक शायर के पूरे जीवन की त्रासदी इस एक वाक्य में निहित है। 

कृष्णमोहन- आप अपने बारे में भी हमारे पाठको को कुछ बताएँ। यह भी बताएँ कि अपने पिता का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता मिर्ज़ा ग़ालिब से कितने प्रभावित थे इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि उन्होने मेरा नाम ग़ालिब ही रखना पसन्द किया। वो अक्सर कहते थे कि वो असदउल्लाह खाँ "ग़ालिब" थे और ये 'ग़ालिब असदउल्लाह खाँ’ है। अब ये कुछ उस नाम का असर है और कुछ धमनियों में बहते खून का, कि मैंने भी आखिरकार कलम ही थाम ली। शायरी और गीत लेखन से शुरुआत की, फिर टेलीविज़न सीरियल के लेखन से जुड़ गया। ‘शक्तिमान’ जैसे धारावाहिक से शुरुआत की। फिर ‘मार्शल’, ‘पैंथर’, ‘सुराग’ जैसे जासूसी धारावाहिकों के साथ ‘युग’, ‘वक़्त की रफ़्तार’, ‘दीवार’ के साथ-साथ ‘माल है तो ताल है’, ‘जीना इसी का नाम है’, ‘अफलातून’ जैसे हास्य धारावाहिक भी लिखे। ‘हमदम’, ‘वजह’ जैसी फिल्मो का संवाद-लेखन किया। एक फिल्म ‘भिन्डी बाज़ार इंक’ की पटकथा-संवाद लिखने का सौभाग्य मिला, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। बस मेरी इतनी ही कोशिश है कि मैं अपने पिता के नाम का मान रख सकूँ और उनके अधूरे सपनों को पूरा कर पाऊँ। 

कृष्णमोहन- आपका बहुत-बहुत आभार, आप “बातों बातों में” के मंच पर आए और अपने पिता असद भोपाली की शायरी के विषय में हमारे पाठकों के साथ चर्चा की। अब चलते –चलते आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे पाठकों/श्रोताओं को सुनवा दें। 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, पाठको को मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाहता हूँ, जिसे जब भी मैं सुनता हूँ अपने पिता को अपने आसपास पाता हूँ। यह फिल्म ‘एक नारी दो रूप’का गीत है जिसे रफी साहब ने गाया है और संगीतकार हैं गणेश। चूँकि फिल्म चली नहीं इसलिए गीत भी अनसुना ही रह गया। आप इस गीत को सुने और मुझे इजाज़त दीजिए। 


फिल्म – एक नारी दो रूप : “दिल का सूना साज तराना ढूँढेगा...” : स्वर – मोहम्मद रफी 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



वार्ताकार : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 


Saturday, October 18, 2014

"क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...", क्यों आँखें भर आईं सुरैया की इस गीत को फ़िल्माते हुए?


एक गीत सौ कहानियाँ - 43
 

‘क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...






'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 43-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'मोतीमहल' के गीत "क़िस्मत ने हमें रोने के लिये दुनिया में अकेला छोड़ दिया" के बारे में।




फ़िल्मों में कलाकार अपना अपना किरदार निभाते हैं, कई रिश्तों को पर्दे पर साकार करना होता है, जैसे कि पति-पत्नी, माँ-बेटा, पिता-पुत्री, भाई-बहन, दो बहनें आदि। पर्दे पर भले दो कलाकारों के बीच का रिश्ता बिल्कुल पक्का दिखाई दे, पर यह तो हक़ीक़त नहीं। शूटिंग ख़त्म होते ही सब अपनी अपनी राह पर आगे बढ़ निकलते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ कि फ़िल्मों में एक साथ अभिनय करते-करते दो कलाकार असली ज़िन्दगी में भी बहुत क़रीब आ गये हों। जी नहीं, मैं उन कलाकारों की बात नहीं कर रहा जिन्होंने एक दूसरे से शादी कर ली। बल्कि मेरा इशारा है उन दो अभिनेत्रियों की तरफ़ है, जिनका एक साथ अभिनय करते हुए आपस में बहनों जैसा रिश्ता बन गया था। बल्कि यूँ कहें कि वो दो बहनें बन चुकी थीं। ज़िक्र हो रहा है सिंगिंग स्टार सुरैया और प्यारी सी बेबी तबस्सुम का। सन् 1950 की फ़िल्म 'बड़ी बहन' और 1952 की फ़िल्म 'मोती महल' में बेबी तबस्सुम और सुरैया जी ने एक साथ काम किया। इसमें तबस्सुम ने सुरैया की छोटी बहन का रोल निभाया था। और यह दोनो किरदार निभाते-निभाते हक़ीक़त में एक दूसरे से बहनों जैसा प्यार करने लगीं। बेबी तबस्सुम सुरैया को आपा कह कर बुलाने लगी। एक अजीब सा अपनापन दोनो एक दूसरे में महसूस करने लगीं। फ़िल्म 'मोती महल' की कहानी ऐसी थी कि जिसमें तबस्सुम के किरदार को मरना होता है। यह जानकर सुरैया काँप उठीं; उनके हाथ-पाँव ठंडे हो गये यह सोच कर कि यह सीन वो कैसे करेंगी। वो ऐसा हक़ीक़त में तो दूर फ़िल्म की कहानी में भी नहीं सोच सकती थी कि तबस्सुम की बेजान शरीर उनके सामने रखी है। उस पर से फ़िल्म के निर्देशक रवीन्द्र दवे ने सुरैया को बताया कि तबस्सुम के किरदार के मरने वाले सीन में एक गाना रखा गया है जो उन्हें गाना है। और वह गीत था "क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया, "। सुरैया सोच में पड़ गईं कि 3 मिनट तक तबस्सुम के मरने के इस सीन को वो कैसे झेल पायेंगी?

असद भोपाली व हंसराज बहल
ख़ैर, फ़िल्म की कहानी और निर्देशक के फ़ैसले को ध्यान में रखते हुए सुरैया ने अपनी निजी परेशानी का ज़िक्र किसी से नहीं किया और यह सीन करने के लिए तैयार हो गईं और प्रोफ़ेशन के साथ अन्याय नहीं होने दिया। इस सीन के शूटिंग का दिन आ ही गया। इस ईमोशनल सीन के लिए जब सुरैया जी को ग्लिसरीन दी गई आँखों में डालने के लिए, तो सुरैया जी ने आँखों में ग्लिसरीन डालने से मना कर दिया। बेबी तबस्सुम की तरफ़ देखते हुए उससे कहा, "बस इस गाने में शॉट के समय तुम मेरे सामने रहना। तुम मेरी बहन की तरह हो, तुम्हे देख कर सच में मुझे लगेगा कि मेरी बहन मेरे सामने है और मुझे अपने आप ही रोना आ जायेगा। ग्लिसरीन की कोई ज़रूरत नहीं है"। गाना शुरू हुआ, गीतकार असद भोपाली ने ऐसे दिल को छू लेने वाले बोल लिखे और संगीतकार हंसराज बहल ने ऐसी करुण धुन बनाई कि सुरैया की आँखें भर आईं और सीन बिल्कुल जीवन्त लगने लगा। यह एक ग़ज़लनुमा गीत था जिसके अन्तरों के शेर थे "सुख चैन लुटा दुख दर्द मिला बेचैन है दिल मजबूर है हम, दुनिया ने हमारे जीने का हर एक सहारा तोड़ दिया" और "बेदर्द ख़िज़ाँ की नज़रों से मासूम बहारें बच ना सकीं, लो आज चमन में आँधी ने डाली से कली को तोड़ दिया"। गाने की शूटिंग्‍ के दौरान सुरैया जी के सामने तबस्सुम रहीं और सुरैया जी बस तबस्सुम को देखतीं गईं और ज़ार-ज़ार रोती रहीं। और इस तरह से अपनी छोटी बहन के मरने के सीन को सुरैया ने पर्दे पर निभाया।

सुरैया व तबस्सुम
फ़िल्म 'मोती महल' में ही सुरैया और तबस्सुम पर फ़िल्माया हुआ एक और गाना था जिसके बोल थे "छी छी छी रोना नहीं..."। सुरैया के साथ गीत में आवाज़ थी शमशाद बेग़म की जिन्होंने तबस्सुम के लिए गाया। तबस्सुम जी के अनुसार इस फ़िल्म के बाद वो सुरैया जी के और भी ज़्यादा क़रीब आ गईं। जैसा कि सभी को मालूम है कि सुरैया और देव आनन्द के बीच एक प्रेम का रिश्ता बना था और वो दोनों एक दूसरे से शादी भी करना चाहते थे, पर सुरैया की नानी को इस रिश्ते से ऐतराज़ होने की वजह से सुरैया और देव आनन्द का आपस में मिलना-जुलना तक बन्द हो गया था। ऐसी स्थिति में वह तबस्सुम ही थीं जो इन दोनो के बीच की कड़ी बनी। यानी कि तबस्सुम के माध्यम से ही सुरैया और देव आनन्द एक दूसरे को ख़ैर-ख़बर पहुँचाया करते थे। तबस्सुम जी ने सुरैया जी को बहुत क़रीब से जाना है। देव आनन्द ने तो शादी कर ली, पर सुरैया आजीवन अविवाहित ही रहीं और अपनी नानी के आगे नहीं झुकीं। उन्होंने अपनी नानी को साफ़ कह दिया था कि आपने देव आनन्द के साथ रिश्ते को स्वीकारा नहीं, इसलिए मैं भी किसी और रिश्ते को नहीं स्वीकार करूँगी। सुरैया की यह सफल प्रेम की दास्तान इतनी सशक्त है कि किसी फ़िल्मकार की आज तक हिम्मत नहीं हुई इसे पर्दे पर साकार करने की। सुरैया जी के अन्तिम दिनों में उन्होंने सबसे खु़द को अलग कर लिया था, किसी से वो मिलती नहीं थीं। तब ये तबस्सुम जी ही थीं जो उनके सम्पर्क में रहीं। वो बताती हैं कि सुरैया ने अपने आप को जैसे घर में क़ैद कर लिया हो। किसी के लिए दरवाज़ा तक नहीं खोलती थीं। जब जब तबस्सुम उनसे मिलने जाती तो बाहर रखे दूध के पैकेट और बहुत दिनों के अख़बार उठाकर अन्दर ले जाती। फोन पर अपनी आपा से हुई आख़िरी बातचीत को याद करते हुए तबस्सुम कहती हैं कि उन्होंने जब पूछा सुरैया जी से "आपा आप कैसी हैं?", तो सुरैया जी का जवाब था "कैसी गुज़र रही है सब पूछते हैं मुझसे, कैसे गुज़ारती हूँ कोई नहीं पूछता"। और इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद आपा इस दुनिया से चली गईं। सुरैया जैसी स्टार का अन्त भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था। कोई सोच सकता था कि एक ज़माने में सारी दुनिया की चहेती, सारी दुनिया से घिरी रहने वाली सुरैया का आख़िरी वक़्त तनहा बीतेगा? उनके पास कोई नहीं होगा, न उनका कोई अपना, न पराया। सुरैया का इन्तकाल हुआ था साल 2004 में। और इससे 52 साल पहले सुरैया ने पर्दे पर तबस्सुम के किरदार के मरने पर गीत गाया था "क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया", और 52 साल बाद जब सुरैया हक़ीक़त में इस फ़ानी दुनिया को अल्विदा कह गईं तब जाकर तबस्सुम जी को अहसास हुआ कि 52 साल पहले अपनी बहन के मरने के सीन को करते हुए सुरैया जी को कितनी तक़लीफ़ हुई होगी।

फिल्म - मोती महल - 1952 : 'किस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...' : गायिका - सुरैया : गीत - असद भोपाली : संगीत - हंसराज बहल 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 





अपना मनपसन्द स्तम्भ पढ़ने के लिए दीजिए अपनी राय



नए साल 2015 में शनिवार के नियमित स्तम्भ रूप में आप कौन सा स्तम्भ पढ़ना सबसे ज़्यादा पसन्द करेंगे?

1.  सिने पहेली (फ़िल्म सम्बन्धित पहेलियों की प्रतियोगिता)

2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


अपनी राय नीचे टिप्पणी में अथवा cine.paheli@yahoo.com या radioplaybackindia@live.com पर अवश्य बताएँ।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, September 10, 2011

...और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी - असद भोपाली

सुविख्यात शायर और फिल्म-गीतकार श्री असद भोपाली के सुपुत्र श्री ग़ालिब खाँ साहब से उनके पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बातचीत
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‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के ‘शनिवार विशेषांक’ में आपका एक बार पुनः स्वागत है। दोस्तों, पिछले सप्ताह हमने फिल्म-जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार असद भोपाली के सुपुत्र ग़ालिब खाँ से उनके पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बातचीत का पहला भाग प्रस्तुत किया था। इस भाग में आपने पढ़ा था कि असद भोपाली को भाषा और साहित्य की शिक्षा अपने पिता मुंशी अहमद खाँ से प्राप्त हुई थी। आपने यह भी जाना कि अपनी शायरी के उग्र तेवर के कारण असद भोपाली, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर जेल में डाल दिये गये थे। आज़ादी के बाद अपनी शायरी के बल पर ही उन्होने फिल्म-जगत में प्रवेश किया था। आज हम उसके आगे की बातचीत को आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, ‘शनिवार विशेषांक’ के दूसरे भाग में एक बार फिर आपका हार्दिक स्वागत है।
ग़ालिब खाँ- धन्यवाद, और सभी पाठकों को मेरा नमस्कार। अपने पिता असद भोपाली के बारे में ज़िक्र करते हुए पिछले भाग में मैंने बताया था कि १९४९ की फिल्म ‘दुनिया’ के माध्यम से एक गीतकार के रूप में उनकी शुरुआत हुई थी। इसके बाद १९५१ की फिल्म ‘अफसाना’ के गीत से उन्हें लोकप्रियता भी मिली, परन्तु फिल्म कि सफलता के सापेक्ष उन्हें काम नहीं मिला। उस समय के कलाकारों को काम से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, उन्होंने भी किया। १९६३ में प्रदर्शित फिल्म 'पारसमणि' के गीत लिखने का उन्हें प्रस्ताव मिला। यह एक फेण्टेसी फिल्म थी। फिल्म की संगीत-रचना के लिए नये संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को अनुबन्धित किया गया था। मेरे पिता ने उस समय की जन-रुचि और फिल्म की थीम के मुताबिक इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। फिल्म ‘पारसमणि’ के गीत- "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." और "वो जब याद आये, बहुत याद आये..." ने लोकप्रियता के परचम लहरा दिये थे। ये गीत वर्षों बाद आज भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं।

कृष्णमोहन- आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम इस फिल्म का एक गीत अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाते चलें।
ग़ालिब खाँ- जी हाँ, मेरे खयाल से हम अपने पाठकों को ‘पारसमणि’ का बेहद लोकप्रिय गीत– "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." सुनवाते हैं-

फिल्म – पारसमणि : "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." : स्वर – लता मंगेशकर और कमल बरोट


कृष्णमोहन- बहुत ही मधुर गीत आपने सुनवाया। ग़ालिब साहब; अब हम जानना चाहेंगे की आपके पिता असद भोपाली ने किन-किन संगीतकारों के साथ काम किया और किन संगीतकारों से उनके अत्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे?
ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने संगीतकार सी. रामचन्द्र, हुस्नलाल-भगतराम, खैय्याम, हंसराज बहल, एन. दत्ता, नौशाद, ए.आर. कुरैशी (मशहूर तबलानवाज़ अल्लारक्खा), चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, सोनिक ओमी, राजकमल, लाला सत्तार, हेमन्त मुखर्जी, कल्याणजी-आनन्दजी जैसे दिग्गज संगीतकरों के साथ काम किया। परन्तु ‘पारसमणि’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ सफलतम गीत देने के बाद नए संगीतकारों के साथ काम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अन्त तक चलता रहा। नए संगीतकारों में गणेश और उषा खन्ना के साथ वो अधिक सहज थे। संगीतकार राम लक्ष्मण उनके अन्तिम संगीतकार साथियों में से हैं, जिनके पास आज भी उनके कई मुखड़े और गीत लिखे पड़े हैं।

कृष्णमोहन- असद भोपाली जी ने हर श्रेणी की फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं, किन्तु उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जो उन्हें बहुत पहले ही मिलना चाहिए था। इस सम्बन्ध में आपका और आपके परिवार का क्या मत है?
ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने १९४९ से १९९० तक लगभग चार सौ फिल्मों में दो हज़ार से ज्यादा गीत लिखे परन्तु फिल्म ‘दुनिया’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ के गीत "कबूतर जा जा जा..." तक उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे। इस अन्तिम फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड प्राप्त हुआ था। दरअसल इस स्थिति के लिए वो खुद भी उतने ही ज़िम्मेदार थे, जितनी ये फिल्म नगरी। कवियों और शायरों वाली स्वाभाविक अकड़ उन्हें काम माँगने से रोकती थी और जीवनयापन के लिए जो काम मिलता गया वो करना पड़ा। बस इतना ध्यान उन्होने अवश्य रखा था कि कभी अपनी शायरी का स्तर नहीं गिरने दिया। कम बजट की स्टंट फिल्मों में भी उन्होंने "हम तुमसे जुदा हो के, मर जायेंगे रो-रो के..." जैसे गीत लिखे। अपेक्षित सफलता न मिलने से या यूँ कहूँ कि उनकी असफलता ने उन्हें शराब का आदी बना दिया था और उनकी शराब ने पारिवारिक माहौल को कभी सुखद नहीं होने दिया। पर आज जब मैं उनकी स्थिति को अनुभव कर पाता हूँ तो समझ में आता है कि जितना दुःख उनकी शराब ने हमें दिया उससे ज्यादा दुःख वो चुपचाप पी गए और हमें एहसास तक नहीं होने दिया। प्रसिद्ध शायर ग़ालिब के हमनाम (असद उल्लाह् खाँ) होने के साथ-साथ स्वभाव, संयोग और भाग्य भी उन्होंने कुछ वैसा ही पाया था। मेरे पिता के अन्तर्मन का दर्द उनके गीतों में झलकता है। दर्द भरे गीतों की लम्बी सूची में से फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का एक गीत मैं पाठकों को सुनवाना चाहता हूँ।

कृष्णमोहन- दोस्तों, ग़ालिब खाँ के अनुरोध पर हम आपको १९५७ की फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का यह गीत सुनवा रहे हैं। स्वर मोहम्मद रफी का और संगीत हंसराज बहल का है।

फिल्म – मिस बॉम्बे : "ज़िंदगी भर ग़म जुदाई का.." : स्वर – मोहम्मद रफी


कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब! साहित्य क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के बारे में भी हमें बताएँ। क्या उनके गीत/ग़ज़ल के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं?
ग़ालिब खाँ- इस मामले में भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी लिखी हजारों नज्में और गजले जिस डायरी में थी वो डायरी बारिश कि भेंट चढ़ गयी। उन दिनों हम जिस स्थान पर रहते थे उसका नाम था "नालासोपारा", जो पहाड़ी के तल पर था और वहाँ मामूली बारिश में भी बाढ़ कि स्थिति पैदा हो जाती थी और ऐसी ही एक बाढ़, असद भोपाली की सारी "गालिबी" को बहा ले गयी। तब उनकी प्रतिक्रिया, मुझे आज भी याद है। उन्होने कहा था- 'जो मैं बेच सकता था मैं बेच चुका था,और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी'। एक शायर के पूरे जीवन की त्रासदी इस एक वाक्य में निहित है।

कृष्णमोहन- आप अपने बारे में भी हमारे पाठको को कुछ बताएँ। यह भी बताएँ कि अपने पिता का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा?
ग़ालिब खाँ- मेरे पिता मिर्ज़ा ग़ालिब से कितने प्रभावित थे इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि उन्होने मेरा नाम ग़ालिब ही रखना पसन्द किया। वो अक्सर कहते थे कि वो असदउल्लाह खाँ "ग़ालिब" थे और ये 'ग़ालिब असदउल्लाह खाँ’ है। अब ये कुछ उस नाम का असर है और कुछ धमनियों में बहते खून का, कि मैंने भी आखिरकार कलम ही थाम ली। शायरी और गीत लेखन से शुरुआत की, फिर टेलीविज़न सीरियल के लेखन से जुड़ गया। ‘शक्तिमान’ जैसे धारावाहिक से शुरुआत की। फिर ‘मार्शल’, ‘पैंथर’, ‘सुराग’ जैसे जासूसी धारावाहिकों के साथ ‘युग’, ‘वक़्त की रफ़्तार’, ‘दीवार’ के साथ-साथ ‘माल है तो ताल है’, ‘जीना इसी का नाम है’, ‘अफलातून’ जैसे हास्य धारावाहिक भी लिखे। ‘हमदम’, ‘वजह’ जैसी फिल्मो का संवाद-लेखन किया और अभी कुछ दिनों पहले एक फिल्म ‘भिन्डी बाज़ार इंक’ की पटकथा-संवाद लिखने का सौभाग्य मिला, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। बस मेरी इतनी ही कोशिश है कि मैं अपने पिता के नाम का मान रख सकूँ और उनके अधूरे सपनों को पूरा कर पाऊँ।

कृष्णमोहन- आपका बहुत-बहुत आभार, आप ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के मंच पर आए और अपने पिता असद भोपाली की शायरी के विषय में हमारे पाठकों के साथ चर्चा की। अब चलते –चलते आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे पाठकों/श्रोताओं को सुनवा दें।
ग़ालिब खाँ- ज़रूर, पाठको को मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाहता हूँ, जिसे जब भी मैं सुनता हूँ अपने पिता को अपने आसपास पाता हूँ। यह फिल्म ‘एक नारी दो रूप’ का गीत है जिसे रफी साहब ने गाया है और संगीतकार हैं गणेश। चूँकि फिल्म चली नहीं इसलिए गीत भी अनसुना ही रह गया। आप इस गीत को सुने और मुझे इजाज़त दीजिए।

फिल्म – एक नारी दो रूप : “दिल का सूना साज तराना ढूँढेगा...” : स्वर – मोहम्मद रफी


कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, September 3, 2011

शनिवार विशेष - 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा मनवा लिया...

फिल्म-जगत के सुप्रसिद्ध शायर / गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र पटकथा-संवाद लेखक ग़ालिब खाँ से एक साक्षात्कार

शनिवार विशेषांक (प्रथम भाग)



ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी गीत-संगीत प्रेमियों को कृष्णमोहन मिश्र का सादर अभिवादन, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' के मंच पर। दोस्तों, फिल्म-जगत में कुछ ऐसे भी सृजनशील रचनाकार हुए हैं, जिन्होने गुणबत्ता से कभी भी समझौता नहीं किया, चाहे फिल्म उन्हें किसी भी श्रेणी की मिली हो। फिल्म-जगत के एक ऐसे ही प्रतिभावान, स्वाभिमानी और संवेदनशील शायर-गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर इस बार के शनिवार विशेषांक में हम चर्चा करेंगे। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविज़न धारावाहिक के पटकथा, संवाद और गीत लेखक ग़ालिब खाँ से हमारा सम्पर्क हुआ। मालूम हुआ कि अपने समय के चर्चित गीतकार असद भोपाली के आप सुपुत्र हैं। अपने स्वाभिमानी पिता से ही प्रेरणा पाकर ग़ालिब खाँ फिल्म और टेलीविज़न के क्षेत्र में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। हमने ग़ालिब साहब से अनुरोध किया कि वो अपने पिता असद भोपाली के बारे में हमारे साथ बातचीत करें। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने हमसे बातचीत की। प्रस्तुत है चार दशकों तक फिल्म-गीतकार के रूप में सक्रिय श्री असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र ग़ालिब खाँ से किये गये साक्षात्कार के सम्पादित अंश-



कृष्णमोहन- ग़ालिब खाँ साहब, ‘आवाज़’के शनिवार विशेषांक के इस मंच पर हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।

ग़ालिब खाँ- धन्यवाद। आपने ‘आवाज़’ के मंच पर मुझे अपने पिता के बारे में कुछ कहने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका और सभी पाठकों / श्रोताओं का आभारी हूँ।



कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमी आपके पिता को असद भोपाली के नाम से जानते हैं। हम उनका वास्तविक नाम जानना चाहते हैं साथ ही यह भी जानना चाहेंगे कि आपके खानदान का सम्बन्ध भोपाल से किस प्रकार से है?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता असद उल्लाह खाँ का जन्म १० जुलाई १९२१ को भोपाल में हुआ था। उनके पिता यानि मेरे दादा मुंशी अहमद खाँ का भोपाल के आदरणीय व्यक्तियों में शुमार था। वे एक शिक्षक थे और बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाया करते थे। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी उनके शिष्यों में से एक थे। वो घर में ही बच्चों को पढ़ाया करते थे, इसीलिए मेरे पिताजी भी अरबी-फारसी के साथ साथ उर्दू में भी वो महारत हासिल कर पाए जो उनकी शायरी और गीतों में हमेशा झलकती रही। उनके पास शब्दों का खज़ाना था। एक ही अर्थ के बेहिसाब शब्द हुआ करते थे उनके पास। इसलिए उनके जानने वाले संगीतकार उन्हें गीत लिखने की मशीन कहा करते थे।



कृष्णमोहन- फिल्म-जगत में आने से पहले एक शायर के रूप वो कितने लोकप्रिय थे?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता को शायरी का शौक़ किशोरावस्था से ही था, यह बात मेरी माँ बताया करती थीं। उस दौर में जब कवियों और शायरों ने आज़ादी की लड़ाई में अपनी कलम से योगदान किया था, उस दौर में उन्हें भी अपनी क्रान्तिकारी लेखनी के कारण जेल की हवा खानी पड़ी थी।



कृष्णमोहन- इसका अर्थ हुआ कि असद भोपाली साहब स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे।

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, आज़ादी की लड़ाई में हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें साहित्यकारों की भी भूमिका रही है। मेरे पिता ने एक बुद्धिजीवी के रूप में इस लड़ाई में अपना योगदान किया था। क्रान्तिकारी लेखनी के कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। ये और बात है कि अंग्रेज़ जेलर भी उनकी 'गालिबी' का प्रशंसक हो गया था। (जी हाँ; वो अंग्रेज़ जेलर शायरी को 'गालिबी' कहा करता था)। जेल से छूटने के बाद मेरे पिता मुशायरों में हिस्सा लेते रहे।



कृष्णमोहन- स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी लेखनी से योगदान करने वाले शायर असद भोपाली साहब फिल्मी दुनिया में कैसे पहुँचे?

ग़ालिब खाँ- तब देश आज़ाद हो चुका था। उन दिनों हर छोटे-बड़े मुशायरे में उन्हें सम्मान से बुलाया जाता था। इसी शायरी ने उन्हें फिल्मनगरी मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँचा दिया। हुआ यूँ कि भोपाल टाकीज की तरफ से एक मुशायरे का आयोजन किया गया था और शायरों की जबान में कहा जाए तो उन्होंने ये ‘मुशायरा लूट लिया’ था। नतीजा ये हुआ कि भोपाल टाकिज के मैनेजर मिस्बाह साहब ने उन्हें पाँच सौ रूपये दिये और फाजली ब्रदर्स का पता दिया, जिन्हें अपनी नयी फिल्म के गीतों के लिए एक माहिर शायर कि दरकार थी। वो सन १९४९ में बम्बई (अब मुम्बई) आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। 'दुनिया' उनकी पहली फिल्म थी। संगीतकार थे सी.रामचन्द्र और मुख्य भूमिकाओं में करण दीवान, सुरैया, और याकूब जैसे महान कलाकार थे। इस फिल्म का गीत “अरमान लूटे दिल टूट गया...” लोकप्रिय भी हुआ था।



कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, १९४९ में प्रदर्शित फिल्म ‘दुनिया’ में आपके पिता असद भोपाली के लिखे इस पहले गीत को क्यों न हम श्रोताओं को सुनवाते चलें?

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, मेरे पिता के इस पहले फिल्मी गीत को श्रोताओं को ज़रूर सुनवाइए।



फिल्म – दुनिया : "अरमान लुटे दिल टूट गया..." : गायिका - सुरैया





कृष्णमोहन- बहुत दर्द भरा गीत है। अब आपसे हम यह जानना चाहेंगे कि फिल्म-जगत में स्थापित हो जाने के बाद असद साहब के शुरुआती दौर का सबसे लोकप्रिय गीत कौन सा है?

ग़ालिब खाँ- शुरुआती दौर में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर और हुस्नलाल भगतराम जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम किया था। बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित सफलतम फिल्म 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा भी मनवा लिया। फिल्म का एक गीत -"किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता है, ऐ दुनिया वालों सच तो कहो क्या प्यार भी झूठा होता है..." आज भी लोगों को याद है। इस गीत को संगीतकार हुस्नलाल-भगतराम के निर्देशन में मुकेश ने गाया है। मुझे अपने पिता के लिखे गीतों में यह गीत बेहद पसन्द है। कृष्णमोहन जी, क्या यह गीत हम श्रोताओं को सुनवा सकते हैं?



कृष्णमोहन- अवश्य! मैं स्वयं आपसे यही कहना चाह रहा था। तो ‘ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेषांक’ के प्रिय पाठकों-श्रोताओं! आप सुनिए हमारे आज के अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ की पसन्द का गीत, जिसे उनके पिता और सुप्रसिद्ध शायर-गीतकार असद भोपाली ने १९५१ में प्रदर्शित फिल्म ‘अफसाना’ के लिए लिखा था। आप यह गीत सुनें और आज हमें यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। इस साक्षात्कार का दूसरा भाग लेकर हम अगले शनिवार को अपने अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ के साथ पुनः उपस्थित होंगे। धन्यवाद!



फिल्म – अफसाना : "किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली..." : गायक – मुकेश





कृष्णमोहन मिश्र

शेष अगले अंक में........



चित्र - ग़ालिब खान (उपर)

असद भोपाली (नीचे)

Sunday, January 23, 2011

ए मेरे दिले नादाँ तू गम से न घबराना....एक एक बढ़कर एक गीत हुए हैं इन सस्पेंस थ्रिल्लर फिल्मों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 576/2010/276

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नई सप्ताह में आप सभी का फिर एक बार हम हार्दिक स्वागत करते हैं। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है लघु शृंखला 'मानो या ना मानो', जिसमें हम चर्चा कर रहे हैं अजीब-ओ-ग़रीब घटनाओं की जिनका ताल्लुख़ आत्मा, भूत-प्रेत और पुनर्जनम से है। हालाँकि विज्ञान कुछ और ही कहता है, लेकिन कभी कभी कुछ ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जिसकी व्याख्या विज्ञान भी नहीं कर पाता। पिछली दो कड़ियों में ऐसे ही कुछ पुनर्जनम के किस्से हमने पढ़े। आइए आज वापस लौटते हैं 'हौण्टिंग् हाउसेस' पर। हमने आपसे वादा किया था कि एक कड़ी हम ऐसी रखेंगे जिसमें हम आपको इंगलैण्ड के कुछ भौतिक जगहों के बारे में बताएँगे, क्योंकि पूरे विश्व के अंदर इंगलैण्ड में भूत-प्रेत की कहानियाँ सब से ज़्यादा मात्रा में पायी जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत से वायुसैनिक मारे गये थे। कहा जाता है कि कई एयरफ़ील्ड्स में आज भी अजीब-ओ-गरीब चीज़ें महसूस की जा सकती हैं। इन एयरफ़ील्ड्स में शामिल हैं RAF Bircham Newton Norfolk, RAF East Kirkby Lincolnshire, और RAF East Elsham Wolds North Lincolnshire। इंगलैण्ड कैसेल्स (castles) के लिए प्रसिद्ध है, और बहुत से पुराने कैसेल्स ऐसे हैं जिन्हें आत्माओं के निवास-स्थान होने का गौरव प्राप्त है। ससेक्स का अरुण्डेल कैसेल एक विख्यात कैसेल है जिसमें एक नहीं बल्कि चार चार आत्माओं के मौजूदगी मानी जाती है। इनमें पहला नाम है इस कैसेल के निर्माता का (the spirit of the first Earl of Arundel); दूसरे नंबर पे है उस औरत की आत्मा जिसने प्यार में असफल होने के बाद इस कैसेल की एक टावर से कूद कर अपनी जान दे दी थी। कुछ लोग कहते हैं कि आज भी चांदनी रातों में सफ़ेद लिबास में उस औरत को कैसेल के इर्द-गिर्द घूमते हुए देखा जा सकता है। तीसरी आत्मा है उस 'Blue Man' का जिसे इस कैसेल की लाइब्रेरी में १६३० से लेकर अब तक घूमते हुए देखा जाता है। अनुमान लगाया जाता है इसका ताल्लुख़ King Charles-I के ज़माने से है। और चौथे नंबर पे है उल्लू की तरह दिखने वाला एक पक्षी की आत्मा; ऐसी मान्यता है कि अगर इस पक्षी को इस कैसेल की खिड़की पर पंख फड़फड़ाते हुए देखा जाये तो कैसेल के किसी सदस्य की मौत निश्चित है। आगे बढते हैं और पहुँचते हैं लेइसेस्टर के बेल्ग्रेव हॊल में जो सुर्ख़ियों में आ गया था १९९९ में जब वहाँ के CCTV के कैमरे में एक सफ़ेद आकृति कैद हुई थी। कुछ लोगों ने कहा कि यह इस स्थान के पूर्व-मालिक के बेटी की आत्मा है। लंदन की बात करें तो 50 Berkeley Square यहाँ का सब से विख्यात हौण्टेड हाउस है। एसेक्स के बोर्ले नामक गाँव के बोर्ले रेक्टरी में १८८५ से लेकर बहुत से भौतिक नज़ारे लोगों ने देखे हैं। १९३९ में इस घर को आग लग गई और आज तक यह एक वितर्कित जगह है। ब्रिस्लिंगटन, जो किसी समय ब्रिस्टोल के नज़दीक एक आकर्षक समरसेट विलेज हुआ करता था, आज जाना जाता है भूत-प्रेतों के उपद्रवों की वजह से। पब, होटल और घरों में आये दिन अजीब-ओ-गरीब घटनाओं के घटने के किस्से सुने जाते हैं। उत्तरी लंदन के टोटेन्हैम के ब्रुस कैसेल में एक औरत की आत्मा रहती है जो हर साल ३ नवंबर के दिन दिखाई देती है। कहा जाता है कि यह लेडी कोलरैन की आत्मा है जिसे उस कैसेल के एक चेम्बर में उसके पति ने क़ैद कर रखा था और वहीं उसकी मौत हो गयी थी। इस तरह से हौण्टेड कैसेल्स की फ़ेहरिस्त बहुत बहुत लम्बी है और अगर उन सब का ज़िक्र करने बैठे तो शायद एक किताब लिखनी पड़ जाये।

आज के अंक के लिए हमने जिस सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म को चुना है, वह है 'टावर हाउस'। १९६२ में बनी इस फ़िल्म में संगीत दिया था रवि ने और गीत लिखे थे असद भोपाली ने। निसार अहमद अंसारी निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अजीत और शकीला। फ़िल्म की कहानी एक पुरानी परित्यक्त टावर हाउस के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ पर निश्चित रातों में एक औरत गीत गाती हुई घूमती दिखाई देती है और उन्ही रातों में कोई ना कोई उस टावर पर से कूद कर आत्महत्या कर लेता है। पुलिस जाँचपड़ताल करती है लेकिन उन्हें कुछ नहीं सूझता और यह रहस्य एक रहस्य ही बना रहता है। और रहस्य यह भी है कि वह औरत सेठ दुर्गादास की स्वर्गीय पत्नी है। पुलिस दुर्गादास को पूछताछ करते हैं लेकिन किसी निश्कर्ष तक नहीं पहूँच पाते। ऐसे में एक बार रणजीत (एन. ए. अंसारी) सबीता (शकीला) को शेर के पंजों से बचाता है। सबिता सेठ दुर्गादास की ही बेटी है। शेर से बचाते हुए रणजीत ख़ुद बुरी तरह ज़ख्मी हो जाता है और उसके चेहरे पर हमेशा के लिए गंदे निशान बैठ जाते हैं। सहानुभूतिपूर्वक दुर्गादास रणजीत को अपनी कंपनी में मैनेजर रख लेते हैं, लेकिन जल्द ही रणजीत लालच का शिकार होने लगता है और वह अपने असली रंग दिखाने पर उतर आता है, जिसका अंजाम होता है दुर्गादास की मौत। मुख्य आरोपी के रूप में सुरेश कुमार (अजीत) निश्चित होता है जो सबीता का प्रेमी था। सबीता भी सुरेश को ख़ूनी समझ बैठती है और उसे ठुकरा देती है। सुरेश भी उन सब की ज़िंदगी से दूर चला जाता है, जिसकी पुलिस को तलाश है। रणजीत अब कोशिश करता है कि किसी तरह से सबीता को पागल बना दिया जाये ताकि पूरे जायदाद का वो अकेला मालिक बन सके। एक तरफ़ टावर हाउस में घूमती वो लड़की और दूसरी तरफ़ दुर्गादास की मर्डर मिस्ट्री; क्या कोई समानता है इन दोनों में? यही थी 'टावर हाउस' की कहानी। और दोस्तों, उपर जो हमने लिखा है कि उस टावर हाउस में जो लड़की गीत गाती हुई घूमती है, तो आपको बता दें कि वह गीत कौन सा था। जी हाँ, आज का प्रस्तुत गीत, लता जी की हौण्टिग् वॊयस में, "ऐ मेरे दिल-ए-नादाँ, तू ग़म से ना घबराना, एक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफ़साना..."। एक और रूहानी गीत, एक और सस्पेन्स थ्रिलर, आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि असद भोपाली ने पहली बार फ़ज़ली ब्रदर्स की फ़िल्म 'दुनिया' में गीत लिखने के लिए भोपाल से बम्बई आये थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक और शानदार सस्पेंस थ्रिल्लर.

सवाल १ - गीतकार बताएं - 2 अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री का नाम बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी आपको बेनिफिट ऑफ डाउट देते हुए २ अंक देते हैं. शरद जी और विजय दुआ जी भी सही जवाब लाये हैं...शृंखला आधी बीत चुकी है, एक बार फिर अमित जी ५ अंकों की बढ़त ले कर चल रहे हैं....क्या शरद जी उन्हें मात दे पायेंगें....पिछली शृंखला में हमें देखा था अमित जी ने कैसे दूसरी पारी में शरद जी को पराजित कर दिया था....क्या इतिहास खुद को दोहराएगा.....लगता है कुछ कुछ न्यूस चैनल वालों जसी बातें कर रहा हूँ मैं :) चलिए देखते हैं. एक बात और अच्छा लगा कि आप सब ने अंसारी साहब के बारे में इतनी बातें शेयर की. ऐसे ही करते रहिएगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, February 6, 2010

मैं तेरी हूँ तू मेरा है....मधुबाला जावेरी का नटखट अंदाज़ निखारा हंसराज बहल ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 337/2010/37

'हमारी याद आएगी' के आज के अंक में गूंजने वाली है एक और बेहद मधुर गायिका की आवाज़। वक़्त के साथ साथ इस गायिका की यादें ज़रा धुंधली सी हो गई है और आज शायद ही आम ज़िंदगी में हम रोज़ इन्हे याद करते हैं, लेकिन किसी ज़माने में इनके गाए गीतों से संगीत रसिक काफ़ी मुतासिर हुआ करते थे। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक और कमचर्चित गायिका मधुबाला ज़वेरी हैं आज के इस कड़ी की आवाज़। चर्चित कलाकारों के बारे में तो बहुत सारे तथ्य हमें कहीं ना कहीं से मिल ही जाते हैं, लेकिन इन कमचर्चित फ़नकारों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना कभी कभी बेहद मुश्किल सा हो जाता है। मधुबाला ज़वेरी के बारे में भी बहुत ज़्यादा जानकारी तो हम एकत्रित नहीं कर सके, लेकिन यहाँ वहाँ से कुछ कुछ बातें हमने मालूम ज़रूर किए हैं ख़ास इस कड़ी को संवारने के लिए। मधुबाला जी का जन्म सन् १९३२ के करीब हुआ था। 'करीब' हम इसलिए कह रहे हैं दोस्तों क्योंकि उनकी जन्म तिथि हम मालूम नहीं कर पाए, लेकिन ३० जुलाई २००६ को मुंबई के चार्नी रोड हॊल में मधुबाला जी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था जिसमें उनकी ७४ वर्ष की आयु होने की बात कही गई थी। इसी से हम यह अदाज़ा लगा रहे हैं कि उनका जन्म १९३२-३३ के आसपास हुआ होगा! दोस्तों, ज़िंदगी की नाव को आगे बढ़ाने के लिए सांसों के पतवार की ज़रूरत पड़ती है, कली को फूल बनकर खिलने के लिए सूरज के रोशनी की ज़रूरत पड़ती है। दीये में चाहे कितना भी तेल क्यों ना हो, अगर उसकी लौ को समय समय पर उपर की तरफ़ बढ़ाया ना जाए तो दीया बुझ जाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि किसी नई प्रतिभा को पहचान कर उसे मौका देनेवाला संगीतकार का उसकी सफलता के पीछे बहुत बड़ा हाथ होता है। और मधुबाला ज़वेरी के लिए यह हाथ था संगीतकार हंसराज बहल का। जी हाँ, इन्होने ही सब से ज़्यादा गानें मधुबाला जी से गवाये। इसलिए आज के इस कड़ी के लिए हमने इसी जोड़ी का गीत चुना है। फ़िल्म 'जग्गु' का गीत है "मैं तेरी हूँ तू मेरा है, दिल तेरा है ये लेता जा "। गीतकार असद भोपाली। बड़ा ही नटखट गीत है और नायिका ही इसमें अपना प्रेम निवेदन कर रही है। फ़िल्म 'जग्गु' का निर्माण जगदीश सेठी ने सन् १९५२ में किया था, जिसके मुख्य कलाकार थे श्यामला और कमल कपूर। जगदीश सेठी ने भी एक भूमिका अदा की थी और अभिनेत्री नंदा बाल कलाकार के रूप में इस फ़िल्म में नज़र आईं थीं। इसी फ़िल्म से गीतकार नक्श ल्यालपुरी ने अपना फ़िल्मी गीत लेखन का सफ़र शुरु किया था, लेकिन आज का गीत असद भोपाली साहब का लिखा हुआ है।

दोस्तों, सन् १९८१ में विविध भारती के किसी कार्यक्रम में संगीतकार हंसराज बहल ने शिरकत की थी, जिसका अभी हाल ही में विविध भारती के स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य पर आयोजीत शृंखला 'स्वर्ण-स्मृति' के अंतरगत दोहराव किया गया था। उस इंटरव्यू में बहल साहब ने बताया था कि उन्होने ही पहली बार मधुबाला ज़वेरी को अपनी फ़िल्म में गवाया था। तो आज हम यहाँ पर उसी इंटरव्यू का वही हिस्सा पेश कर रहे हैं। हंसराज बहल से विविध भारती की तरफ़ से बात कर रहीं हैं अनुराधा जोशी:

प्र: और आप ने अपने संगीतकार होने के नाते कई कलाकारों को मौका दिया होगा, उनके बारे में आप कुछ बताएँगे? उन कलाकारों के बारे में?

उ: देखिए, ये तो, जब हम काम करते हैं तो बहुत आर्टिस्ट्स आए हमारे पास, हम ने भी कोशिश यही की है कि जो अच्छे कलाकार हैं, उनको आगे आने ही चाहिए, जैसे जैसे चांस मिलता रहा, हम कोशिश करते रहे। उनको गवाए भी हैं।

प्र: मधुबाला ज़वेरी को आप ने सब से पहले गवाया था?

उ: जी हाँ, 'अपनी इज़्ज़त', 'जग्गु', 'मोती महल' जैसी फ़िल्मों में मैंने उनको गवाया था।

और दोस्तों, इन फ़िल्मों के अलावा भी 'शाह बहराम', 'दोस्त', 'हनुमान जन्म', 'राजपूत', 'नक़ाबपोश', आदि कई फ़िल्मों में बहल साहब ने मधुबाला जी को गवाया था। और बहल साहब के अलावा जिन संगीतकारों ने उनसे गानें गवाए उनमें शामिल हैं जमाल सेन, इक़बाल क़ुरेशी, विनोद, अविनाश व्यास, राम गांगुली, शिवराम कृष्ण, बिपिन-बाबुल, हुस्नलाल-भगतराम, बुलो. सी. रानी, ए. आर. क़ुरेशी, शंकर दासगुप्ता, नारायण दत्ता, और शंकर जयकिशन ने भी। जी हाँ, फ़िल्म 'बूट पॊलिश' का वह गीत आपको याद है ना "ठहर ज़रा ओ जानेवाले", उस गीत में रफ़ी और आशा के साथ आवाज़ मिलाई थी मधुबाला ज़वेरी ने ही। ख़ैर, ये तो थी चंद बातें मधुबाला ज़वेरी से संबंधित, आइए अब आज का गीत सुना जाए और गीत को सुनते हुए सलाम कीजिए मधुबाला ज़वेरी और हंसराज बहल की जोड़ी को!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

सूनी सेज फिर महकेगी,
सूना आंगन गूंजेगा,
झांझर की झनकारों से,
मेरा सोहणा यार जब आएगा...

अतिरिक्त सूत्र- पंजाब की मिटटी की महक है साहिर के लिखे इस गीत में

पिछली पहेली का परिणाम-
सुबह ८ बजे तक तो कोई जवाब नहीं आया, वैसे गीत मुश्किल भी था बूझना....खैर

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, February 5, 2010

हँसता हुआ नूरानी चेहरा ....क्यों न हो ओल्ड इस गोल्ड के सुनहरे गीतों को सुनते हुए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 336/2010/36

न दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चल रहा है फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग के कुछ कमचर्चित लेकिन बेहद प्रतिभावान पार्श्वगायिकाओं पर समर्पित शृंखला 'हमारी याद आएगी'। आज की कड़ी में ज़िक्र एक अनोखी आवाज़ की। मिट्टी की सौंधी सौंधी ख़ुशबू जैसी आवाज़ वाली ये हैं कमल बारोट। कमल बारोट ने उस दौर में फ़िल्म जगत में क़दम रखा जब दुनिया बस दो आवाज़ों की दीवानी बन चुकी थी, लता और आशा की। ऐसे में किसी नई गायिका के लिए यहाँ पर जगह बनाना बेहद मुश्किल था और ना ही यह हर किसी के बस की बात थी। सुधा मल्होत्रा, सुमन कल्याणपुर, मिनू पुरुशोत्तम, उषा मंगेशकर, मुबारक़ बेग़म के साथ साथ कमल बारोट ने भी गाना शुरु तो किया, लेकिन इन गायिकाओं को बड़े बैनर्स की फ़िल्मों में गाने के अवसर ज़्यादा नहीं मिलते थे। और अगर मिले तो किसी दूसरी बड़ी गायिका के साथ युगल गीत में या फिर कई अवाज़ों वाले किसी समूह गीत में। इन सारी कठिनाइयों और चुनौतियों को स्वीकार किया कमल बारोट ने और जब जैसे गानें उनकी झोली में आए, वो बस गाती चलीं गईं। लता जी और आशा जी के साथ उनके गाए कई गीत बेहद मशहूर हुए। आशा जी के साथ उनका गाया बेहद लोकप्रिय गीत "दादी अम्मा मान जाओ" हम आप को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की बच्चों वाली विशेष शृंखला में सुनवाया था। तो आज क्यों ना लता जी के साथ उनका गाया हुआ शायद उनकी करीयर का सब से हिट गीत आपको सुनवा दिया जाए। जी हाँ, फ़िल्म 'पारसमणि' की वही सदाबहार क़व्वाली "हँसता हुआ नूरानी चेहरा"। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी की पहली ब्लॊकबस्टर फ़िल्म और इस फ़िल्म से जुड़ी तमाम बातें हमने आपको पहले ही बता दिया था "चोरी चोरी जो तुमसे मिली" गीत के दौरान।

दोस्तों, हम बार बार यह कहते हैं कि लता जी और आशा जी की चमकदार आवाज़ों की वजह से दूसरी गायिकाओं को मौके नहीं मिले। लेकिन यह बात भी सच है कि लता जी ने कई बार नई गायिकाओं के नाम रेकमेण्ड भी किए हैं। यहाँ तक कि कमल बारोट को पहली बार फ़िल्म में गाने का मौका भी लता जी की सिफ़ारिश से ही मिला था। दोस्तों, यह बात मैं कहीं पे पढ़कर या किसी से सुन कर आपको नहीं बता रहा हूँ, बल्कि कमल बारोट ने यह बात ख़ुद अपने ज़ुबान से कही थीं विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में। यक़ीन ना आए तो ख़ुद ही पढ़ लीजिए! "ज़िंदगी की तेज़ धूप में संगीत की छैय्या मिल जाए तो कहना ही क्या। मैंने संगीत की दुनिया में पहली बार क़दम रखा जब लता जी ने कल्याणजी भाई से मेरी सुरीली सिफ़ारिश की। उन्होने कहा कि आप कमल से गाना क्यों नहीं गवा लेते हैं? असल में वह गाना लता दीदी गाने वाली थीं, पर वो जा रही थीं कोल्हापुर और गाना मिल गया मुझे। वो गाना था "दिल लेके जाते हो कहाँ"।" दोस्तों, बड़ा ही हिट हुआ था यह गाना, आगे चलकर शायद हम आपको यह गाना भी कभी सुनवा दें। पर आज तो कमल जी की पारस प्रतिभा को सलाम हम 'पारसमणि' के उस मचलते थिरकते नग़मे के साथ ही करेंगे। जैसा कि कमल जी ने ख़ुद बताया कि उन्हे सब से पहले फ़िल्म के लिए गाने का मौका लता जी ने करवा दिया था १९५९ की फ़िल्म 'ओ तेरा क्या कहना' में। इसी साल कल्यणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में एक और फ़िल्म आई 'मदारी', जिसमें कमल बारोट ने लता जी के साथ एक डुएट गाया "अकेली मोहे छोड़ ना जाना" जो काफ़ी हिट हुआ था। लेकिन "हँसता हुआ नूरानी चेहरा" को जो मक़बूलीयत हासिल हुई, वह कई कई गुणा ज़्यादा थी। यह गीत आज भी सब से ज़्यादा लोकप्रिय फ़ीमेल डुएट्स में शामिल किया जाता है। और एक और ख़ास बात इस गीत की कि यह गीत अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला के उस साल के वार्षिक कार्यक्रम में आठवाँ स्थान प्राप्त किया था। यानी कि उस साल का आठवाँ सब से लोकप्रिय गीत। आज कमल जी जहाँ कहीं भी जीवन यापन कर रहीं हैं, हम उन्हे दीर्घायु होने की शुभकामना देते हैं और सुनते हैं लता जी के साथ उनका गाया गीतकार असद भोपाली का लिखा यह हिट गीत।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

जोगन साँसे तेरा नाम पुकारे,
अब तो आजा साजन प्यारे,
लहराती हवा उन्हें छू के आ,
जो हैं मेरी धडकन के सहारे...

अतिरिक्त सूत्र- हंसराज बहल का संगीतबद्ध गीत है ये

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी जैसा कि अवध जी कहा, वाकई मुश्किल था, पर आपके लिए :) हरगिज़ नहीं..बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, November 1, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (१९) फिल्म गीतकार शृंखला भाग १

जब फ़िल्मी गीतकारों की बात चलती है तो कुछ गिनती के नाम ही जेहन में आते हैं, पर दोस्तों ऐसे अनेकों गीतकार हैं, जिनके नाम समय के गर्द में कहीं खो से गए हैं, जिनके लिखे गीत तो हम आज भी शौक से सुनते हैं पर उनके नाम से अपरिचित हैं, और इसके विपरीत ऐसा भी है कि कुछ बेहद मशहूर गीतकारों के लिखे बेहद अनमोल से गीत भी उनके अन्य लोकप्रिय गीतों की लोकप्रियता में कहीं गुमसुम से खड़े मिलते हैं, फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों पर "रविवार सुबह की कॉफी" में हम आज से एक संक्षिप्त चर्चा शुरू कर रहे हैं, इस शृंखला की परिकल्पना भी खुद हमारे नियमित श्रोता पराग सांकला जी ने की है, तो चलिए पराग जी के संग मिलने चलें सुनहरे दौर के कुछ मशहूर/गुमनाम गीतकारों से और सुनें उनके लिखे कुछ बेहद सुरीले/ सुमधुर गीत. हम आपको याद दिला दें कि पराग जी मरहूम गायिका गीत दत्त जी को समर्पित जालस्थल का संचालन करते हैं.


१) शैलेन्द्र

महान गीतकार शैलेन्द्र जी का असली नाम था "शंकर दास केसरीलाल शैलेन्द्र". उनका जन्म हुआ था सन् १९२३ में रावलपिन्डी (अब पाकिस्तान में). भारतीय रेलवे में वास मुंबई में सन् १९४७ में काम कर रहे थे. उनकी कविता "जलता है पंजाब " लोकप्रिय हुई और उसी दौरान उनकी मुलाक़ात राज कपूर से हुई. उसीके साथ उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ फिल्म बरसात से ! शंकर जयकिशन की जोड़ी के साथ साथ शैलेंद्र ने सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी और कई संगीतकारों के साथ काम किया. उनके राज कपूर के लिए लिखे गए कई गीत लोकप्रिय है, मगर आज हम उनके एक दुर्लभ गीत के बारे में बात करेंगे. लीजिये उन्ही का लिखा हुआ यह अमर गीत जिसे गाया हैं मखमली आवाज़ के जादूगर तलत महमूद ने फिल्म पतिता (१९५३) के लिए. संगीत शंकर जयकिशन का है और गीत फिल्माया गया हैं देव आनंद पर. सुप्रसिद्ध अंगरेजी कवि पी बी शेल्ली ने लिखा था "Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts".शैलेन्द्र ने इसी बात को लेकर यह अजरामर गीत लिखा और जैसे कि पी बी शेल्ली के विचारों को एक नए आसमानी बुलंदी पर लेकर चले गए. गीतकार शैलेन्द्र पर विस्तार से भी पढें यहाँ.



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२) इन्दीवर

बप्पी लाहिरी के साथ इन्दीवर के गाने सुननेवालों को शायद यह नहीं पता होगा की इन्दीवर (श्यामलाल राय) ने अपना पहला लोकप्रिय गीत (बड़े अरमानों से रखा हैं बलम तेरी कसम) लिखा था सन् १९५१ में फिल्म मल्हार के लिए. कहा जाता है की सन् १९४६ से १९५० तक उन्होंने काफी संघर्ष किया, मगर उसके बारे में कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है. रोशन के साथ इन्दीवर को जोड़ी बन गयी, मगर दूसरे लोकप्रिय संगीतकारों के साथ उन्हें गीत लिखने के मौके (खासकर पचास के दशक में) ज्यादा नहीं मिले. बाद में कल्यानजी - आनंद जी के साथ इन्दीवर की जोड़ी बन गयी. समय के साथ इन्दीवर ने समझौता कर लिया और फिर...

खैर, आज हम महान गायक मुकेश, संगीतकार रोशन और गीतकार इन्दीवर का एक सुमधुर गीत लेकर आये है जिसे परदे पर अभिनीत किया गया था संजीव कुमार (और साथ में मुकरी और ज़हीदा पर). फिल्म है अनोखी रात जो सन् १९६८ में आयी थी. यह फिल्म रोशन की आखरी फिल्म थी और इस फिल्म के प्रर्दशित होने से पहले ही उनका देहांत हुआ था.

इतना दार्शनिक और गहराई से भरपूर गीत शायद ही सुनने मिलता है.



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३) असद भोपाली

असद भोपाली (असद खान) ऐसे गीतकार हैं जिन्हें लगभग ४० सालके संघर्ष के बाद बहुत बड़ी सफलता मिली. उनका लिखा हुआ एक साधारण सा गीत "कबूतर जा जा जा " जैसे के देश के हर युवक युवती के लिए प्रेमगीत बन गया. यह गीत था फिल्म मैंने प्यार किया (१९८९) का जिसे संगीतबद्ध किया था राम- लक्ष्मण ने.

असद भोपाली की पहली फिल्मों में से एक थी बहुत बड़े बजट की फिल्म अफसाना (१९५१) जिसमे थे अशोक कुमार, वीणा, जीवन, प्राण, कुलदीप कौर आदि. संगीत था उस ज़माने के लोकप्रिय हुस्नलाल भगतराम का. इसके गीत (और फिल्म भी) लोकप्रिय रहे मगर असद चोटी के संगीतकारोंके गुट में शामिल ना हो सके. सालों साल तक वो एन दत्ता, हंसराज बहल, रवि, सोनिक ओमी, उषा खन्ना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि संगीतकारों के साथ करते रहे मगर वह कामयाबी हासिल न कर सके जो उन्हें फिल्म मैंने प्यार किया से मिली.

लीजिये फिल्म अफसाना (१९५१) का लता मंगेशकर का गाया हुआ यह गीत सुनिए जिसे असद भोपाली ने दिल की गहराईयों से लिखा है



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४) कमर जलालाबादी

अमृतसर के पास एक छोटा सा गाँव हैं जिसका नाम है जलालाबाद , जहां पर जन्म हुआ था ओमप्रकाश (कमर जलालाबादी) का. महान फिल्मकार दल्सुखलाल पंचोली ने उन्हें पहला मौका दिया था फिल्म ज़मीनदार (१९४२) के लिए. उन्होंने चालीस और पचास के दशक में सदाबहार और सुरीले गीत लिखे. उन्होंने सचिन देव बर्मन के साथ उनकी पहली फिल्म एट डेज़ (१९४६) में भी काम किया. उस ज़माने के लगभग हर संगीतकार के साथ (नौशाद और शंकर जयकिशन के अलावा) उन्होंने गीत लिखे.

उनका लिखा हुआ "खुश हैं ज़माना आज पहली तारीख हैं"(फिल्म पहली तारीख १९५४) का गीत आज भी बिनाका गीतमाला पर महीने की पहली तारीख को बजता है. रिदम किंग ओ पी नय्यर के साथ भी उन्होंने "मेरा नाम चीन चीन चू" जैसे लोकप्रिय गीत लिखे.

लीजिये उनका लिखा हुआ रेलवे की तान पर थिरकता हुआ गीत "राही मतवाले" सुनिए. इसे गाया है तलत महमूद और सुरैय्या ने फिल्म वारिस (१९५४) के लिए. मज़े की बात है कि गीत फिल्माया भी गया था इन्ही दो कलाकारों पर.



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५) किदार शर्मा

महान फिल्म निर्माता, निर्देशक और गीतकार किदार शर्मा की जीवनी "The one and lonely Kidar Sharma" हाल ही में प्रर्दशित हुई थी. जिस गीतकार ने सैंकडो सुरीले गीत लिखे उन्हें आज ज़माना भूल चूका है. कुंदन लाल सहगल की फिल्म "देवदास " के अजरामर गीत इन्ही के कलम से लिखे गए है. "बालम आये बसों मोरे मन में" और "दुःख के अब दीन बीतत नाही". उनके लिखे हुए लोकप्रिय गीत है इन फिल्मों मे : नील कमल (१९४७), बावरे नैन (१९५०), सुहाग रात (१९४८). फिल्म जोगन (१९५०) का निर्देशन भी किदार शर्मा का है.

आज की तारीख में किदार शर्मा को कोई अगर याद करता हैं तो इस बात के लिए की उन्होंने हिंदी फिल्म जगत को राज कपूर, मधुबाला, गीता बाली जैसे सितारे दिए. मुबारक बेग़म का गाया "कभी तनहाईयों में यूं हामारी याद आयेगी" भी इन्ही किदार शर्मा का लिखा हुआ है. इसे स्वरबद्ध किया स्नेहल भाटकर (बी वासुदेव) ने और फिल्माया गया हैं तनुजा पर. मुबारक बेग़म के अनुसार यह गीत अन्य लोकप्रिय गायिका गानेवाली थी मगर किसी कारणवश वह ना आ सकी और मुबारक बेग़म को इस गीत को गाने का मौका मिला. उन्होंने इस गीत के भावों को अपनी मीठी आवाज़ में पिरोकर इसे एक यादगार गीत बना दिया.



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प्रस्तुति -पराग सांकला


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Thursday, September 3, 2009

दो दिल धड़क रहें हैं और आवाज़ एक है....आशा और तलत ने आवाज़ मिलाई आवाज़ से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 191

गायक मुकेश के बाद आज से हम फ़िल्म संगीत की आकाश के उस सितारे पर एक लघु शृंखला शुरु करने जा रहे हैं जिनकी आवाज़ का जादू हर उम्र के सुनने वालों पर गहराई से हुआ है। दिल की गहराई में आसानी से उतर जाने वाली, हर भाव, हर रंग को उजागर करने वाली ये आवाज़ है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोंसले की। आशा भोंसले की आवाज़ की अगर हम तारीफ़ करें तो शायद शब्द भी फीके पड़ जाये उनकी आवाज़ की चमक के सामने। और यह चमक दिन ब दिन बढ़ती चली गयी है अलग अलग रंग बदल कर, ठीक वैसे जैसे कोई चित्रकार अलग अलग रंगों से अपने चित्र को सुंदरता प्रदान करता चला जा रहा हो! ८ सितंबर को आशा जी का जनम दिन है। इसी को केन्द्र करते हुए आज से अगले १० दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनिए आशा जी के गाए युगल गीतों की एक ख़ास लघु शृंखला '१० गायक और एक आपकी आशा'। इसके तहत हम आप को आशा जी के गाए फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग के १० युगल गीत सुनवाएँगे, १० अलग अलग गायकों के साथ गाए हुए। इसमें हम गायिकाओं को शामिल नहीं कर रहे हैं। 'फ़ीमेल डुएट्स' पर हम भविष्य में एक अलग से शृंखला का आयोजन ज़रूर करेंगे। तो दोस्तों, '१० गायक और एक आपकी आशा' की इस पहली कड़ी में हम ने आशा जी के साथ जिस गायक को चुना है, वो हैं मखमली आवाज़ वाले, हर दिल अज़िज़, अपने तलत महमूद साहब। युं तो आशा जी और तलत साहब ने बहुत से युगल गीत गाए हैं, जिनमें से कुछ जाने कुछ अंजाने रह गये हैं, लेकिन सब से पहले जो दो चार गीत झट से ज़हन में आते हैं, वो हैं फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' के "प्यार पर बस तो नहीं है" और "सच बता तू मुझपे फ़िदा", फ़िल्म 'बड़ा भाई' का "चोरी चोरी दिल का लगाना बुरी बात है", फ़िल्म 'अपसरा' का "है ज़िंदगी कितनी हसीन", फ़िल्म '२४ घंटे' का "हम हाल-ए-दिल तुम से कहना है, कहिए", फ़िल्म 'लैला मजनू' का "बहारों की दुनिया पुकारे तू आजा", फ़िल्म 'लाला रुख़' का "प्यास कुछ और भी भड़का दे झलक दिखला के", फ़िल्म 'मेम साहिब' का "कहता है दिल तुम हो मेरे लिए", फ़िल्म 'बहाना' का "तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में रहने को जी चाहता है", फ़िल्म 'एक साल पहले' का "नज़र उठा के ये रंगीं समा रहे न रहे", इत्यादि। आशा जी और तलत साहब के गाए ऐसे तमाम सुमधुर युगल गीतों के समुंदर में से आज हम ने जिस लोकप्रिय गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'इंसाफ़' का, "दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है"।

फ़िल्म 'इंसाफ़' बनी थी सन् १९५६ में केदार कपूर के निर्देशन में। रावजी यु. पटेल निर्मित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अजीत और नलिनी जयवंत। फ़िल्म में संगीत का बीड़ा उठाया चित्रगुप्त ने और गीत लिखे असद भोपाली साहब ने। युं तो उस साल, यानी कि १९५६ में, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में कई फ़िल्में प्रदर्शित हुईं जैसे कि 'बसंत पंचमी', 'बसरे की हूर', 'जयश्री', 'क़िस्मत', 'तलवार की धनी', और 'ज़िंदगी के मेले', लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली, और ना ही उनका संगीत। अगर कुछ चला तो सिर्फ़ फ़िल्म 'इंसाफ़' का प्रस्तुत गीत, जो आज एक सदाबहार नग़मा बन कर रह गया है। बड़ा ही नाज़ुक गाना है यह, जिसमें असद भोपाली ने मोहब्बत के अहसासों को कुछ इस क़दर शब्दों में पिरोया है कि सुन कर दिल ख़ुश हो जाता है। "रंगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है, एक दर्द सा इधर है, एक दर्द सा उधर है, दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है, नग़में जुदा जुदा है मगर साज़ एक है"। इस गीत के रीदम में चित्रगुप्त जी ने 'वाल्ट्ज़' का प्रयोग किया है। अगर आप 'वाल्ट्ज़' की जानकारी रखते हैं तो आप इसे इस गीत में महसूस कर सकते हैं। और अगर आप को इसका पता नहीं है तो कृपया इन गीतों के रीदम को ज़हन में लाने की कोशिश कीजिए, आप ख़ुद ब ख़ुद महसूस कर लेंगे 'वाल्ट्ज़' के रीदम को। नौशाद साहब ने 'वाल्ट्ज़' को हिंदी फ़िल्मी गीतों में लोकप्रिय बनाया था, इसलिए उन्ही के बनाये कुछ ऐसे गीतों की याद आप को दिलाते हैं, फ़िल्म 'दास्तान' का "त र री त र री....ये सावन रुत तुम और हम", फ़िल्म 'अंदाज़' का "तोड़ दिया दिल मेरा", फ़िल्म 'मेला' का "धरती को आकाश पुकारे", वगेरह। ग़ुलाम मोहम्मद के संगीत में फ़िल्म 'लैला मजनू' का गीत "चल दिया कारवाँ" भी 'वाल्ट्ज़' पर ही आधारित है। और सज्जाद साहब के स्वरबद्ध फ़िल्म 'संगदिल' का गीत "दिल में समा गए सजन, फूल खिले चमन चमन" तथा फ़िल्म 'दोस्त' का "बदनाम मोहब्बत कौन करे" में भी वाल्ट्ज़ का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है। तो दोस्तों, आज हमने आप को 'वाल्ट्ज़' की थोड़ी बहुत जानकारी दी, आइए अब सुनते हैं आज का यह प्रस्तुत गीत आशा भोसले और तलत महमूद की आवाज़ में।



गीत के बोल -

आशा : आ आ... हं हं... आ आ...
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2
तलत : नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दोनों : दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2

तलत: रँगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है \-2
आशा: इक दर्द सा इधर, इक दर्द सा उधर है
तलत: दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है

आशा: तड़पाइये न हमको, शर्माइये न हमसे \-2
तलत: दोनों की ज़िंदगी है एक दूसरे के दम से \-2
आशा: हम दो कहानियाँ हैं मगर राज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये है आशा का गाया एक और दोगाना.
२. साथी गायक हैं "हेमंत कुमार".
३. गीतकार हैं एस एच बिहारी और गीत में "बादलों" के आगे जाने की बात की है.

आज की पहेली के साथ जीतिए १० बोनस अंक
आप के हिसाब से हम और किन ८ गायकों को इस शृंखला में शामिल करने जा रहे हैं। अगर आप ने अगले २० घंटे के भीतर बिल्कुल सही जवाब दे दिया तो आप को मिलेंगे बोनस १० अंक, जो आप को आप के ५० अंक तक जल्द से जल्द पहुँचने में बेहद मददगार साबित होंगे। तो यह सुनहरा मौका है आप सभी के लिए और जो श्रोता 'पहेली प्रतियोगिता' पहले से ही जीत चुके हैं, उन्हे भी हम यह मौका दे रहे हैं कि आप भी इस विशेष बोनस सवाल का जवाब दे सकते हैं, आप के अंक सुरक्षित रहेंगे भविष्य के लिए। तो झट से याद कीजिए सुनहरे दौर के गायकों के नाम, जिनके साथ आशा जी ने गीत गाए हैं और आप को लगता है कि हम उन्ही गायकों को शामिल करने वाले हैं। आज आप तलत महमूद को सुन रहे हैं और कल हेमंत कुमार को सुनेंगे। तो फिर आपने बताने हैं कि बाक़ी के ८ गायकों के नाम कौन कौन से हैं?

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई २० अंकों के साथ अब आप पराग जी के बराबर आ चुकी हैं...सभी साथियों का आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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