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Wednesday, May 2, 2012

"क़स्मे, वादे, प्यार, वफ़ा, सब बातें हैं..." - जितना यादगार यह गीत है, उतनी ही दिलचस्प है इसके बनने की कहानी


यह बिलकुल ज़रूरी नहीं कि एक अच्छा गीत लिखने के लिए गीतकार को किसी पहाड़ पर या समुंदर किनारे जा कर अकेले में बैठना पड़े। फ़िल्म-संगीत का इतिहास गवाह है कि बहुत से कालजयी गीत यूंही बातों बातों में बन गए हैं। एक ऐसी ही कालजयी रचना है "क़स्मे, वादे, प्यार, वफ़ा, सब बातें हैं बातों का क्या"। रोंगटे खड़े कर देने वाला है यह गीत कैसे बना था, आज उसी विषय पर चर्चा 'एक गीत सौ कहानियाँ' की 18-वीं कड़ी में सुजॉय चटर्जी के साथ...


एक गीत सौ कहानियाँ # 18

1967 की मशहूर फ़िल्म 'उपकार' के गीतों की समीक्षा पंकज राग ने अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में कुछ इस तरह से की है - "'उपकार' का सबसे हिट गाना महेन्द्र कपूर की आवाज़ में सदाबहार देशभक्ति गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले" बनकर गुलशन बावरा की कलम से निकला, पर गुलशन के इस गीत और "हर ख़ुशी हो वहाँ तू जहाँ भी रहे" तथा क़मर जलालाबादी के लिखे और विशेष तौर पर मुकेश के गले के लिए आसावरी थाट पर सृजित "दीवानों से ये मत पूछो दीवानों पे क्या गुज़री है" की अपार लोकप्रियता के बावजूद 'उपकार' का एक गीत यदि चुनना हो तो इंदीवर के शब्दों और मन्ना डे के स्वर में प्राण पर फ़िल्माया वह अमर गाना "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं" ही चुना जाएगा। मन्ना डे अपने कुछ गानों में किस कदर सोज़ पैदा कर देते थे इसके उदाहरणों में 'काबुलीवाला' के "ऐ मेरे प्यारे वतन" के बाद "कस्मे वादे प्यार वफ़ा" का ही स्थान माना जाना चाहिए।" 

'उपकार' के संगीतकार कल्याणजी-आनन्दजी के कल्याणजी भाई जब विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में तशरीफ़ लाए थे, तब उन्होंने अपने सेन्स ऑफ़ ह्यूमर को कायम रखते हुए फ़िल्मी गीतों को तीन भागों में बाँटा था - होमियोपैथिक, ऐलोपैथिक और आयुर्वेदिक। होमियोपैथिक में वे गानें आते हैं जिन्हें बनाते समय यह पता नहीं रहता कि गाना कैसा बनेगा, या तो बहुत अच्छा बनेगा या फिर बहुत ही बेकार बनेगा। ऐलोपैथिक  में वे गानें आते हैं जो पहले-पहले तो सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं पर समय के साथ-साथ उनकी मधुरता कम होने लगती है जिस तरह से ऐलोपैथिक दवाइयों के बाद रीऐक्शन और साइड-ईफ़ेक्ट्स होते हैं। और आयुर्वेदिक गानें वो होते हैं जो पहले सुनने में उतना अच्छा नहीं भी लग सकता है, पर धीरे-धीरे उनकी मिठास बढ़ती चली जाती है। कल्याणजी भाई की नज़र में "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा..." एक आयुर्वेदिक गीत है। उन्हीं के शब्दों में, "एक आयुर्वेदिक गीत प्रस्तुत है जिसके पीछे एक कहानी है। आनन्दजी, मेरा छोटा भाई, कई साल पहले इंदीवरजी ने एक गीत लिखा था जिसे आनन्दजी ने उस समय अपने पास रख लिया था। मनोज कुमार ने उस वक़्त कहा था कि मैं इस गीत को अपनी फ़िल्म में इस्तमाल करूँगा। फ़िल्म 'उपकार' में ऐसे ही एक गाने की सिचुएशन आ गई जो प्राण साहब पर पिक्चराइज़ होना था। उस समय प्राण साहब फ़िल्म में कभी गीत नहीं गाया करते थे, उनके रोल बड़े सीरियस किस्म के होते थे। 'उपकार' में पहली बार उन्होंने किसी गीत में अभिनय किया। मन्ना डे साहब ने इतनी ख़ूबसूरती के साथ गाया है कि लगता ही नहीं कि किसी ने प्लेबैक किया है। ऐसा लगता है जैसे प्राण साहब ख़ुद गा रहे हैं।"

कल्याणजी ने तो इस गीत की कहानी को बहुत ही संक्षिप्त में कह कर चले गए, पर बाद में जब आनन्दजी विविध भारती आए थे, तब उन्होंने इस गीत के बारे में विस्तार से बताया था। शुरू-शुरू में इस गीत को किशोर कुमार से गवाने की सब लोग सोच रहे थे। "सब लोग मिल के सोच रहे थे, यह एक नई बात थी, it was a new thing, एक बहुत बड़ा स्टेप लिया जा रहा था। प्राण साहब भी विलेन बनते थे, सब सोच में पड़ गए कि ये कैसे करेंगे, कैसे निभायेंगे। अब बोल भी नहीं सकते थे, मलंग बोले तो, हम बनिये लोगों को मलंग का मतलब भी समझ में नहीं आता, मलंग क्या होता है? तो हमने बोला कि मलंग क्या होता है? बोले कि फ़कीर जो होता है उसको मलंग बोलते हैं, तो वो विकलांग मलंग है, वो इस तरह से गाना गाएगा, इसकी एक लम्बी कहानी है कि गाना कैसे बना था पहले। This was a stock song, तैयार किया हुआ था। कई गानें होते हैं न जो कभी बन जाते हैं और सम्भाल कर रख लेते हैं! इस गीत के साथ क्या होता है कि मुखड़ा बन जाता है, फिर मुखड़े के बाद एक अंतरा भी बन गया था। देखिए क्या हुआ था कि मैं अफ़्रीका से आया हुआ था, ये अफ़्रीका में मेरा एक दोस्त था, वो यहाँ एक लड़की से प्यार करता था, उसने मुझे बोला कि उसको जाके बोलना कि मैं आ रहा हूँ। मैंने कहा कि बोल दूँगा। बंबई वापस आया तो मेरी एक टाँग टूटी हुई थी, तो थोड़ा फ़िलोसोफ़िकल मैं ऐसे ही हो गया था, ऐक्सिडेण्ट जब हुआ था तब मैं सोच रहा था होस्पिटल में बैठे-बैठे कि न मैंने अपनी माँ को याद किया, न बाप को याद किया, जब दर्द बढ़ा तो ईश्वर को मैंने यही कहा कि सबको सुखी रखना और मेरी जान निकाल ले। बाहर निकलने के बाद यह लगा कि आदमी अपने दुख के सामने सबको भूल जाता है, न बीवी याद आएगी, न छोटे बच्चे। तो मैं सब भूल गया, वहीं से "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या" का ख़याल आया। तो दिमाग़ में एक ऐसी बात बैठ गई थी। तो यहाँ आने के बाद पता चला कि वो इंदीवर जी के भी कॉमन फ़्रेण्ड थे, तो रस्ते में आते-आते मैंने कहा कि 'इंदीवर जी, क्या यार वो दोस्त बेचारा तो अभी भी उम्मीद कर रहा है कि बंबई आऊँगा और शादी करूँगा, और यहाँ लड़की ने तो शादी कर ली है, मैं उसको क्या कहूँगा?' इंदीवर जी ने कहा कि "अरे ये सब बातें हैं सब", तो ये सब सुना तो बोले कि यह एक अच्छा मुखड़ा बन सकता है, चलो घर चलते हैं। घर चले हम लोग और वहाँ बैठ कर रात भर गाना बन गया। वहाँ पर बैठे-बैठे मैंने एक सजेशन दी कि 'इंदीवर जी, आदमी की, दुनिया की दस्तूर क्या है देखो, कि एण्ड में उसका बेटा ही उसको जलाता है, यह कस्टम बनी हुई है, तो उन्होंने लिख दिया कि "तेरा अपना ख़ून ही आख़िर तुझको आग लगाएगा"; उसके बाद बोले कि 'क्या कर दिया तुमने?' बोले, 'अब मैं घर नहीं जाऊँगा, अब तो डर लगने लगा है मुझे'। हम लोग सारी रात बाहर बैठे हुए थे, और दूसरी बातें कर रहे हैं, वो बोले कि दूसरी बातें करो यार, ये तो बहुत हेवी हो गया यार! तो गाना यहीं छूट गया, इसको यहाँ तक करके छोड़ दिया, एक गाना बन गया।"

मन्ना दा के स्वर में यह गीत एक अमर गीत बन गया। मास और क्लास, दोनों ने इसे गले लगाया, आँखों में बिठाया। विविध भारती पर एक कार्यक्रम आता है 'फ़ेवरीट फ़ाइव' जिसमें फ़िल्मी दुनिया के कलाकार अपनी पसंद के पाँच गीत सुनवाते हैं। अनुप जलोटा और सुनिधि चौहान ने अपने पसंदीदा गीतों में इस गीत को शामिल किया है। सुनिधि के शब्दों में, "मन्ना दा का नाम लेना चाहूँगी। बहुत बड़े कलाकार हैं। उनके बारे में कहने के लिए शब्द नहीं है मेरे पास, क्योंकि वो एक, सुखविंदर जी से पहले वो एक सिंगर हैं मेरे ख़याल से जो गायकी से एक लेवल उपर हैं। उनका गाना सिर्फ़ गाना न सुनाई दे, कुछ और हो। जब फ़ीलिंग्स कुछ और हो और आप महसूस करने लगे उस आवाज़ को, उस बात को जो वो कहना चाह रहे हैं, तो उसका मज़ा कुछ और ही होता है। वो मन्ना दा पूरी तरीके से उसको करते थे। मेरे उपर पूरा असर होता था, होता है आज भी। कमाल की बात यह है कि आज इतनी उम्र हो जाने के बाद अब भी वो शोज़ करते हैं, अब भी इतना सुरीला गाते हैं। यह एक सबसे बड़ी निशानी है एक ग्रेटेस्ट सिंगर की। We are proud, we are happy that we have the greatest singer with us of this country. मैंने उनके बहुत से गाने सुने हैं, लेकिन और लोगों से कम ही सुने होंगे, क्योंकि आज हम काम में इतने बिज़ी हो जाते हैं, पुराने गाने सुनने का मौका थोड़ा कम मिल पाता है। जितने भी सुने हैं, उनमें से मेरा फ़ेवरीट है "क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या"।

आज इस गीत के बने हुए 45 साल हो गए हैं, पर समय का कोई असर नहीं हो पाया है इस गीत के उपर। ज़िंदगी का जो फ़लसफ़ा है, वो तो हमेशा, हर दौर में, हर युग में, एक ही रहता है। ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों को सीधे-सच्चे बोलों में कहने की वजह से ही शायद इस गीत का मनुष्य-मन पर इतना गहरा असर हुआ है कि आज भी इस गीत को सुनते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं। "आसमान में उड़ने वाले मिट्टी में मिल जाएँगे", पर यह गीत फ़िल्म-संगीत के http://start.funmoods.com/?f=2&a=makeआसमान पर एक नक्षत्र बन कर हमेशा-हमेशा चमकता रहेगा। इस कालजयी गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें।



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तंभ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Wednesday, April 18, 2012

"छलिया मेरा नाम..." - इस गीत पर भी चली थी सेन्सर बोर्ड की कैंची




सेन्सर बोर्ड की कैंची की धार आज कम ज़रूर हो गई है पर एक ज़माना था जब केवल फ़िल्मी दृश्यों पर ही नहीं बल्कि फ़िल्मी गीतों पर भी कैंची चलती थी। किसी गीत के ज़रिये समाज को कोई ग़लत संदेश न चला जाए, इस तरफ़ पूरा ध्यान रखा जाता था। चोरी, छल-कपट जैसे अनैतिक कार्यों को बढ़ावा देने वाले बोलों पर प्रतिबंध लगता था। फ़िल्म 'छलिया' के शीर्षक गीत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। गायक मुकेश के अनन्य भक्त पंकज मुकेश के सहयोग से आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की १६-वीं कड़ी में इसी गीत की चर्चा...

एक गीत सौ कहानियाँ # 16

सम्प्रति "कैरेक्टर ढीला है", "भाग डी के बोस" और "बिट्टू सबकी लेगा" जैसे गीतों को सुन कर ऐसा लग रहा है जैसे सेन्सर बोर्ड ने अपनी आँखों के साथ-साथ अपने कानों पर भी ताला लगा लिया है। यह सच है कि समाज बदल चुका है, ५० साल पहले जिस बात को बुरा माना जाता था, आज वह ग्रहणयोग्य है, फिर भी सेन्सर बोर्ड के नरम रुख़ की वजह से आज न केवल हम अपने परिवार जनों के साथ बैठकर कोई फ़िल्म नहीं देख सकते, बल्कि अब तो आलम ऐसा है कि रेडियो पर फ़िल्मी गानें सुनने में भी शर्म महसूस होने लगी है। मुझे याद है "चोली के पीछे क्या है" और "कभी मेरे साथ कोई रात गुज़ार" गीतों के आने पर भी कुछ लोगों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई गई थी, पर सेन्सर बोर्ड के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। ख़ैर, अब चलते हैं पुराने ज़माने में। ५० के दशक में गीता दत्त के गाए फ़िल्म 'आर-पार' के गीत "जाता कहाँ है दीवाने सबकुछ यहाँ है सनम, कुछ तेरे दिल में फ़ीफ़ी, कुछ तेरे दिल में फ़ीफ़ी" को फ़िल्म से हटवा दिया गया था, ऐसा कहा जाता है कि सेन्सर बोर्ड को "फ़ीफ़ी" शब्द से आपत्ति थी क्योंकि इसका अर्थ स्पष्ट नहीं था। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि हम कहाँ से आज कहाँ आ पहुँचे हैं।

राज कपूर - नूतन अभिनीत फ़िल्म 'छलिया' १९६० की सुभाष देसाई निर्मित व मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म थी। इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "छलिया मेरा नाम, छलिया मेरा नाम, हिन्दू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम" फ़िल्म-संगीत का एक सदाबहार नग़मा रहा है। कल्याणजी-आनन्दजी द्वारा स्वरबद्ध एवं क़मर जलालाबादी का लिखा यह गीत वास्तव में ऐसा नहीं लिखा गया था। इस गीत का मूल मुखड़ा था "छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम, हिन्दू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम"। अब सेन्सर बोर्ड को "छलना मेरा काम" में आपत्ति थी। बोर्ड के अनुसार यह ग़लत संदेश था समाज के लिए, युवा-पीढ़ी के लिए, और वह भी फ़िल्म के नायक की ज़ुबां से। इसलिए "छलना मेरा काम" की जगह "छलिया मेरा नाम" की पुनरोक्ति कर दी गई। यही नहीं गीत के अंतरों में भी फेर बदल किया गया है। सच तो यह है कि इस गीत के कुल तीन वर्ज़न बने थे। जो वर्ज़न ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर जारी हुआ और जो हमें सुनाई देता है, उसके बोल ये रहे:

छलिया मेरा नाम, छलिया मेरा नाम - २
हिंदू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम
छलिया मेरा नाम...

देखो लोगों ज़रा तो सोचो बनी कहानी कैसे?
कहीं पे ख़ुशियाँ कहीं पे ग़म है, क्यूं होता है ऐसे-२
वाह रे तेरे काम, कहीं सुबह से शाम
हिंदू मुसलिम....

रोक रहे हैं राहें मेरी नैना तीखे-तीखे,
हम तो ख़ाली बात के रसिया इश्क़ नहीं हम सीखे
जहाँ भी देखा काम, करता वहीं सलाम
हिंदू मुसलिम...

मैं हूँ ग़रीबों का शहज़ादा जो माँगू वो दे दूँ
शहज़ादे तलवार से खेलें मैं अश्क़ों से खेलूँ
मेहनत मेरा काम, देना उसका काम
हिंदू मुसलिम...


पंकज मुकेश के सौजन्य से इस गीत के मूल संस्करण का पता चल पाया है। ये रहा वह संस्करण...


छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम - २
हिंदू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम
छलिया मेरा नाम...

देखो लोगों ज़रा तो सोचो बनी कहानी कैसे?
तुमने मेरी रोटी छीनी, छीनी मैंने पैसे
सीखा तुम से काम, हुआ मैं बदनाम
हिंदू मुसलिम....

रोक रही हैं राहें मेरी नैना तीखे-तीखे
हम तो ख़ाली माल के रसिया इश्क़ नहीं हम सीखे
जहाँ भी देखा दाम, वहीं निकाला काम
हिंदू मुसलिम...

मैं हूँ गलियों का शहज़ादा जो चाहूँ वो ले लूँ
शहज़ादे तलवार से खेलें मैं कैंची से खेलूँ
मेहनत मेरा काम देना उसका काम
हिंदू मुसलिम...


उपर्युक्त संस्करण के पहले अंतरे को हटाकर कर भी गीत का एक और संसकरण कुछ ऐसा बना था...

छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम - २
हिंदू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम
छलिया मेरा नाम...

रोक रही हैं राहें मेरी नैना तीखे-तीखे
हम तो ख़ाली माल के रसिया इश्क़ नहीं हम सीखे
जहाँ भी देखा दाम, वहीं निकाला काम
हिंदू मुसलिम...

मैं हूँ गलियों का शहज़ादा जो चाहूँ वो ले लूँ
शहज़ादे तलवार से खेलें मैं कैंची से खेलूँ
मेहनत मेरा काम देना उसका काम
हिंदू मुसलिम...


इस तरह से हम देखते हैं जहाँ-जहाँ असामाजिक व अनैतिक कार्यों की बात की गई थी, उन्हें बदल दिया गया और जो गीत बाहर आया वह एक निहायती ख़ूबसूरत संस्करण था। इसके लिए पूरा श्रेय जाता है क़मर जलालाबादी साहब को। अब 'छलिया' से जुड़ी कुछ और रोचक बातें। राज कपूर अभिनीत फ़िल्मों में अधिकतर शंकर-जयकिशन का संगीत हुआ करता था। इस फ़िल्म के संगीतकार कल्याणजी-आननदजी ज़रूर थे पर गीतों के कम्पोज़िशन में शंकर-जयकिशन का स्टाइल साफ़ झलकता है। संगीतकार का चुनाव निर्माता-निर्देशक की पसन्द थी। विविध भारती के 'जयमाला' में कमर जलालाबादी ने व्यंग करते हुए कहा था, "डिरेक्टर मनमोहन देसाई की पहली फ़िल्म 'छलिया' अपने भाई सुभाष देसाई के लिए डिरेक्ट किया। सुभाष देसाई ने संगीतकार के लिए कल्याणजी-आनन्दजी का नाम चुना। सुभाष देसाई का नाम सुनते ही कल्याणजी भाग खड़े हुए। सुभाष देसाई ने उनका पीछा नहीं छोड़ा, उन्हें पकड़ कर उन्हें संगीतकार बनाकर ही दम लिया।" क़मर साहब ने यह क्यों कहा कि सुभाष देसाई का नाम सुनते ही कल्याणजी भाई भाग खड़े हुए, यह तो पता नहीं चल पाया, पर यह बात ज़रूर है कि देसाई भाइयों का गीतों पर दखलंदाज़ी रहती थी। फ़िल्म 'छलिया' में राज कपूर पर फ़िल्माये सभी गीत मुकेश के गाए हुए थे सिवाय एक गीत "गली गली सीता रोये आज मेरे देस में" के जिसे रफ़ी साहब से गवाया गया था। जब पंकज मुकेश ने आनन्दजी से यह पूछा कि क्या कारण था कि राज कपूर पर फ़िल्माये गए इस गीत को मुकेश से नहीं गवाया गया, तो आनन्दजी बोले कि कई बार प्रोड्युसर-डिरेक्टर की माँग को भी पूरा करना पड़ता है। और यह तो हम सभी जानते हैं कि मनमोहन देसाई रफ़ी साहब के बहुत बड़े फ़ैन थे। इस तरह से यह एक गीत रफ़ी साहब से न केवल गवाया गया बल्कि फ़िल्म के अन्त में साधारणत: फ़िल्म के शीर्षक गीत को बजाया जाता है जबकि इस फ़िल्म में रफ़ी साहब के गाए इस गीत को बजाया गया।

ख़ैर, आज का मुद्दा था फ़िल्मी गीतों के सेन्सरशिप का। 'छलिया' १९६० की बात थी, पर ७० के दशक के आते-आते सेन्सर बोर्ड ने सख़्ती कुछ कम कर दी। इसका उदाहरण है १९७५ की फ़िल्म 'चोरी मेरा काम' का शीर्षक गीत "कौन यहाँ पर चोर नहीं है सबका है यही काम, वो करते हैं चोरी चोरी, करूँ मैं खुल्ले आम, चोरी मेरा काम यारों"। रोचक बात यह है कि इस गीत के संगीतकार एक बार फिर कल्याणजी-आनन्दजी हैं। १९७२ की फ़िल्म 'बेइमान' के शीर्षक गीत में भी बेइमान की जयजयकार होती सुनाई दी है, और इसमें मुकेश की आवाज़ थी। और मज़ेदार बात इस फ़िल्म के लिए शंकर-जयकिशन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी दिया गया था। तो बात बस इतनी है कि समाज के बदलने के साथ-साथ, सामाजिक मूल्यों के बदलने के साथ-साथ, फ़िल्म सेन्सरशिप में भी बदलाव आए हैं, लेकिन जैसा शुरू में मैंने कहा था, उसी बात पे ज़ोर दे रहा हूँ कि कल कहीं ऐसा न हो कि फ़िल्मी गीत सुनने के लिए भी बड़े-बुज़ुर्गों से दूर अन्य अलग कमरे में जा कर बैठना पड़े।

"छलिया मेरा नाम" सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें।



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तंभ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!


Wednesday, August 3, 2011

कभी रात दिन हम दूर थे.....प्यार बदल देता है जीने के मायने और बदल देता है दूरियों को "मिलन" में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 714/2011/154

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! सजीव सारथी की लिखी कविताओं की किताब 'एक पल की उम्र लेकर' से चुनी हुई १० कविताओं पर आधारित शृंखला की आज चौथी कड़ी में हमनें जिस कविता को चुना है, उसका शीर्षक है 'मिलन'।

हम मिलते रहे
रोज़ मिलते रहे
तुमने अपने चेहरे के दाग
पर्दों में छुपा रखे थे
मैंने भी सब ज़ख्म अपने
बड़ी सफ़ाई से ढाँप रखे थे
मगर हम मिलते रहे -
रोज़ नए चेहरे लेकर
रोज़ नए जिस्म लेकर
आज, तुम्हारे चेहरे पर पर्दा नहीं
आज, हम और तुम हैं, जैसे दो अजनबी
दरअसल
हम मिले ही नहीं थे अब तक
देखा ही नहीं था कभी
एक-दूसरे का सच

आज मगर कितना सुन्दर है - मिलन
आज, जब मैंने चूम लिए हैं
तुम्हारे चेहरे के दाग
और तुमने भी तो रख दी है
मेरे ज़ख्मों पर -
अपने होठों की मरहम।


मिलन की परिभाषा कई तरह की हो सकती है। कभी कभी हज़ारों मील दूर रहकर भी दो दिल आपस में ऐसे जुड़े होते हैं कि शारीरिक दूरी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। और कभी कभी ऐसा भी होता है कि वर्षों तक साथ रहते हुए भी दो शख्स एक दूजे के लिए अजनबी ही रह जाते हैं। और कभी कभी मिलन की आस लिए दो दिल सालों तक तरसते हैं और फिर जब मिलन की घड़ी आती है तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे दो नदियाँ अलग अलग तन्हा बहते बहते आख़िरकार संगम में एक दूसरे से मिल गई हों। मिलन और जुदाई सिक्के के दो पहलु समान हैं। दुख और सुख, धूप और छाँव, ख़ुशी और ग़म जैसे जीवन की सच्चाइयाँ हैं, वैसे ही मिलन और जुदाई, दोनों की ही बारी आती है ज़िंदगी में समय समय पर, जिसके लिए आदमी को हमेशा तैयार रहना चाहिए। इसे तो इत्तेफ़ाक़ की ही बात कहेंगे न, जैसा कि गीतकार आनंद बक्शी नें फ़िल्म 'आमने-सामने' के गीत में कहा था कि "कभी रात दिन हम दूर थे, दिन रात का अब साथ है, वो भी इत्तेफ़ाक़ की बात थी, ये भी इत्तेफ़ाक़ की बात है"। बड़ा ही ख़ूबसूरत युगल गीत है लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी नें भी कितना सुरीला कम्पोज़िशन तैयार किया है इस गीत के लिए। तो लीजिए आज मिलन के रंग में रंगे इस अंक में सुनिये 'आमने-सामने' फ़िल्म का यह सदाबहार गीत।



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - कल जिस महान गायक की जयंती है उन्ही की आवाज़ है गीत में.
सूत्र २ - फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा की भी अहम भूमिका थी.
सूत्र ३ - एक अंतरे शुरू होता है इस शब्द से -"आँखों".

अब बताएं -
गीतकार कौन हैं - ३ अंक
किस अबिनेता पर है ये गीत फिल्मांकित - २ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
अविनाश जी, अमित जी सत्यजीत और हिन्दुस्तानी जी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, April 21, 2011

माथे पे लगाइके बिंदिया, अखियन उड़ाइके निंदिया....हास्य अभिनेता देवन वर्मा ने भी पार्श्व गायन में अपनी आवाज़ आजमाई

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 640/2010/340

दोस्तों नमस्कार! इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' रोशन है फ़िल्मी सितारों के गाये नग़मों से। पिछली नौ कड़ियों में हमनें नौ सितारों के गाये गीत सुनवाये और कई सितारों के नाम लिये जिनकी आवाज़ फ़िल्मी गीतों में सुनाई दी हैं। फ़िल्मी सितारों द्वारा गाये गीतों की परम्परा ४० के दशक में शुरु हुई थी, जो अब तक जारी है। आइए कुछ और नाम लें। अनिल कपूर नें गाया था फ़िल्म 'चमेली की शादी' का शीर्षक गीत। कल्याणजी-आनंदजी के ही निर्देशन में राजकुमार साहब नें सलमा आग़ा के साथ फ़िल्म 'महावीरा' के एक गीत में संवाद बोले। ९० के दशक के शुरुआत में श्रीदेवी नें 'चांदनी' का शीर्षक गीत गा कर काफ़ी लोकप्रियता हासिल की थी। माधुरी दीक्षित की भी आवाज़ गूंजी कविता कृष्णामूर्ती और पंडित बिरजु महाराज के साथ 'देवदास' फ़िल्म के "काहे छेड़े मोहे" गीत में। शाहरुख़ ख़ान नें 'जोश' में "अपुन बोला", आमिर ख़ान नें 'ग़ुलाम' में "आती क्या खण्डाला", सलमान ख़ान नें 'हेल्लो ब्रदर' में "सोने की डाल पर चांदी का मोर", संजय दत्त नें 'ख़ूबसूरत' में "ए शिवानी", अभिषेक बच्चन नें 'ब्लफ़ मास्टर' में "कम टू मी भूल जायें सारा जहाँ", और हॄथिक रोशन नें 'काइट्स' में "काइट्स सोरिंग् हाइ" जैसे गीत गाये हैं। ऐसा नहीं कि केवल नायक नायिकाओं नें ही फ़िल्मों में गीत गाये हैं, हास्य अभिनेता भी इस राह पर कई कई बार चले हैं। आइ. एस. जोहर साहब नें रफ़ी साहब के साथ 'शागिर्द' के "बड़े मियाँ दीवाने ऐसे न बनो" गीत में "यही तो मालूम नहीं है" कहे थे। महमूद जी नें एक नहीं बल्कि कई कई गीत गाये हैं, उदाहरण के तौर पर फ़िल्म 'शाबाश डैडी' में उनका गाया एक एकल गीत था, 'पड़ोसन' में किशोर कुमार और मन्ना डे के साथ, 'एक बाप छे बेटे' में सुलक्षणा पंडित और विजेयता पंडित के साथ, 'कुंवारा बाप' में एक बार फिर किशोर कुमार के साथ, और 'काश' में मोहम्मद अज़ीज़ और सोनाली मुखर्जी के साथ महमूद नें गीत गाये। एक बार फिर कल्याणजी-आनंदजी नें फ़िल्म 'वरदान' के किसी गीत में महमूद साहब की आवाज़ ली। अमरीश पुरी नें अल्का याज्ञ्निक के साथ 'आज का अर्जुन' में "माशूका माशूका" गीत में दो लाइनें गाये, शक्ति कपूर की आवाज़ सुनाई दी शैलेन्द्र सिंह के साथ फ़िल्म 'पसंद अपनी अपनी' के एक गीत में, जॊनी लीवर नें भी अपना रंग जमाया 'इश्क़' और 'इण्टरनैशनल खिलाड़ी' जैसी फ़िल्मों के गीतों में, तो अनुपम खेर साहब गाये उषा कृष्णादास के साथ 'एक अलग मौसम' फ़िल्म का गीत और यश चोपड़ा की पत्नी व गायिका पामेला चोपड़ा के साथ 'विजय' फ़िल्म का एक गीत।

दोस्तों, पामेला चोपड़ा के नाम से याद आया कि यश जी की ही १९७७ की फ़िल्म 'दूसरा आदमी' में एक बड़ा ही अनोखा गाना था जिसमें पामेला जी की आवाज़ थी, और पता है उस गीत में मुख्य गायक कौन थे? देवेन वर्मा। जी हाँ, वही फ़िल्म व टीवी हास्य व चरित्र अभिनेता देवेन वर्मा, जिनके अभिनय का लोहा हर कोई मानता है। देवेन वर्मा और पामेला चोपड़ा के गाये इस गीत पर हम अभी आते हैं, उससे पहले आपको यह बता दें कि देवेन जी नें कम से कम दो और गीत गाये हैं और ये हैं 'आदमी सड़क का' फ़िल्म में अनुराधा पौडवाल के साथ गाया हुआ "बुरा न मानो यार दोस्ती यारी में" तथा 'जोश' फ़िल्म में अमजद ख़ान के साथ गाया हुआ "खाट पे खटमल चलेगा जब दिन में सूरज ढलेगा"। देखिए अभिनेता अमजद साहब का भी नाम आ गया 'सितारों की सरगम' में! हाँ तो दोस्तों, 'दूसरा आदमी' का गीत जिसे हम आज सुनवाने जा रहे हैं उसके बोल हैं "माथे पे लगाइके बिंदिया, अखियन उड़ाइके निंदिया, खड़ी रे निहारे गोरी, आयेंगे सांवरिया, अंगना आयेंगे सांवरिया"। फ़िल्म के नायक नायिका थे ॠषी कपूर और नीतू सिंह। गीत का सिचुएशन कुछ ऐसा है कि नीतू सिंह अपने मामा जी के घर एक जनमदिन की पार्टी में गई हुई हैं और ॠषी कपूर को दफ़्तर से सीधे वहीं पार्टी में आना है। लेकिन वो आने में देर कर रहे हैं और नीतू सिंह उदास हो रही है और बार बार दरवाज़े की तरफ़ देख रही है। ऐसे में देवेन वर्मा साहब हारमोनियम और पूरी संगीतमय टोली के साथ ज़मीन पर बैठे गीत छेड़ते हैं "माथे पे लगाइके बिंदिया..."। पूर्णत: लोक शैली में रंगा यह गीत देवेन वर्मा साहब की आवाज़ पाकर जैसे जी उठा हो! इस गीत को अगर किसी सामान्य गायक से गवाया गया होता, तो शायद ही वह बात आ पाती जो बात देवेन साहब की आवाज़ से आयी है। हमें पूरा यकीन है दोस्तों कि इस गीत को आज सुनकर आपको भी मज़ा आयेगा और अगर एक अरसे से आपनें इस गीत को नहीं सुना होगा तो सुनने का मज़ा दुगुना हो जाएगा। तो आप सुनिए इस गीत को और मुझे अनुमति दीजिए 'सितारों की सरगम' शृंखला को समाप्त करने की। हम आशा करते हैं कि इस शृंखला का आपनें आनंद लिया होगा। अपने विचार और सुझाव oig@hindyugm.com के पते पर अवश्य लिख भेजें। साथ ही शनिवार विशेषांक के अंतर्गत 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के लिए अपने जीवन की कुछ यादगार लम्हों को समेटते हुए एक ईमेल हमें ज़रूर लिख भेजें। तो आज बस इतना ही, शनिवार की शाम 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' के साथ फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि देवेन वर्मा को तीन बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का पुरस्कार मिला है, और ये तीन फ़िल्में हैं 'चोरी मेरा काम', 'चोर के घर चोर' और 'अंगूर'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 15
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - अमिताभ बच्चन की फिल्म है ये.

सवाल १ - किस अद्भुत गायक की आवाज़ है इसमें - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी बात पुरुष युगल गीत की हुई है, और अनजाना जी आदमी सड़क का में आवाज़ अनुराधा की थी, जाहिर हैं इस बार आप दोनों को ही अंक नहीं मिल पायेंगें. सही जवाब है "जोश" और अमजद खान. शरद जी को जरूर अंक मिलेंगें. इसी के साथ हमारी १४ वीं श्रृंखला भी समाप्त हुई. एक बार फिर अनजाना जी विजियी हुए हैं. पर यकीन मानिये आप सब के फिल्म संगीत ज्ञान ने हम सभी को हैरान कर रखा है. दिल जीत रखा है, हम चाहेंगें कि शरद जी और प्रतीक जी भी अगली श्रृंखला में जरा फुर्ती दिखाएँ और इन दो महारथियों को जरा और आजमायें, फिलहाल के लिए अनजाना जी को बहुत बहुत बधाई दिए देते हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, April 18, 2011

पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए.....किशोर दा के साथ खूब रंग जमाया गायिका हेमा मालिनी ने इस गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 637/2010/337

'सितारों की सरगम' लघु शृंखला में कल संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में आप नें सुना था अमिताभ बच्चन का गाया फ़िल्म 'लावारिस' का गीत। कल के ही अंक में आप नें जाना कि कल्याणजी-आनंदजी नें कई फ़िल्मी कलाकारों से गीत गवाये हैं। अशोक कुमार और अमिताभ बच्चन के गाये गीतों का ज़िक्र हमनें किया। फ़िल्म 'जब जब फूल खिले' के "एक था गुल और एक थी बुलबुल" में इन्होंने नंदा से संवाद बुलवाये। इसी तरह शंकर जयकिशन नें भी 'संगम' के गीत "बोल राधा बोल" में वैयजंतीमाला, 'मेरा नाम जोकर' के गीत "तीतर के दो आगे तीतर" में सिमी गरेवाल और 'ऐन ईवनिंग् इन पैरिस' के गीत "आसमान से आया फ़रिश्ता" में शर्मीला टैगोर की आवाज़ ली। आइए आज कल्याणजी-आनंदजी के संगीत में आपको सुनवाते हैं ड्रीम-गर्ल की आवाज़। जी हाँ, ड्रीम-गर्ल यानी हेमा मालिनी। हेमा जी नें बेशुमार फ़िल्मों में यादगार अभिनय तो किया ही, लेकिन आज हम उन्हें याद कर रहे हैं एक गायिका के रूप में। हेमा मालिनी के गाये गीतों की अगर बात करें तो कम से कम जो दो गीत एकदम से याद आते हैं, वो हैं गुलज़ार की फ़िल्म 'किनारा' का "एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने"। वैसे इस गीत को मुख्यत: भूपेन्द्र नें गाया है, हेमा मालिनी नें इसमें बस थोड़ा बहुत गुनगुनाया है और संवाद बोले हैं। और जो दूसरा गीत है, वह है 'हाथ की सफ़ाई' फ़िल्म का किशोर कुमार के साथ गाया हुआ "पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए"। १९७४ के इस फ़िल्म में रणधीर कपूर - हेमा मालिनी तथा विनोद खन्ना - सिमि गरेवाल की जोड़ियाँ थीं। फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत रहा लता-रफ़ी का गाया "वादा कर ले साजना"।

रणधीर कपूर और हेमा मालिनी पर फ़िल्माया आज का प्रस्तुत गीत एक स्टेज सॊंग् है जिसमें रणधीर देवदास के किरदार में और हेमा मालिनी को चंद्रमुखी के किरदार में दिखाया जा रहा है। लेकिन सीन कुछ ऐसा है कि रणधीर कपूर को शराब में डूबे देवदास का किरदार निभाना है, लेकिन किसी कारण से वो सचमुच ही शराब पी कर आउट-ऒफ़ कंट्रोल हो जाते हैं और स्टेज पर जो होता है वह होता है एक लाफ़-रायट। उधर चंद्रमुखी का किरदार निभा रहीं हेमा मालिनी के लिए उन्हें सम्भालना मुश्किल हो जाता है और इस गीत के द्वारा इस हास्य दृश्य को साकार किया गया है। बड़ा ही अनोखा और मज़ेदार गीत है, जिसके लिए बड़ा श्रेय गीतकार गुलशन बावरा को जाता है। वैसे दोस्तों, संगीत और शब्दों के लिहाज़ से इस गीत को उत्कृष्ट गीत तो नहीं कह सकते, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि फ़िल्म के इस सिचुएशन के लिए इससे बेहतर गीत लिख पाना भी आसान काम नहीं था। उस पर किशोर दा का ख़ास हास्य अंदाज़ सोने पे सुहागा। इस "टपोरी" गीत में नारीकंठ के लिए हेमा मालिनी की आवाज़ को चुनना भी एक अनोखा प्रयोग था। जैसा कि कल की कड़ी से आप जान चुके हैं आनंदजी के ही शब्दों में कि कुछ गीत ऐसे होते हैं जिन्हें बड़े से बड़ा गायक वह अंजाम नहीं दे पाता जो अंजाम अभिनेता या संगीतकार दे जाता है। शायद इसमें भी वही बात थी। हेमा जी के सुर तो हिले हुए सुनाई देते हैं, लेकिन यही अनोखापन गीत की खासियत बन गया, और यह गीत एक यादगार गीत बन गया। तो आइए आज भी कल ही की तरह आपको गुदगुदायें इस गीत को सुनवाकर।



क्या आप जानते हैं...
कि हेमा मालिनी का पूरा नाम है हेमा मालिनी आर. चक्रवर्ती। उनकी माँ जया चक्रवर्ती दक्षिण की फ़िल्म निर्मात्री थीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 8/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - दमदार आवाज़ के मालिक हैं इस गीत के अभिनेता गायक और ये फिल्म है ऋषि दा की.

सवाल १ - इस गीत में गायक -गायिका एक दूसरे को एक रिश्ते से संबोधित कर रहे हैं, कौन सा है ये रिश्ता - २ अंक
सवाल २ - परदे पर अभिनेता के साथ कौन अभिनेत्री दिखाई देती हैं इस गीत में - ३ अंक
सवाल ३ - सह गायिका कौन है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
फिर बराबरी पर है अनजाना और अमित जी, बताते चले कि इस बार प्रतीक जी भी १० अंकों का आंकड़ा छू लिया है बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, August 24, 2010

तुम्हें जिंदगी के उजाले मुबारक....एक गैर-गुलज़ारनुमा गीत, जो याद दिलाता है मुकेश और कल्याणजी भाई की भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 468/2010/168

क्षाबंधन के शुभवसर पर सभी दोस्तों को हम अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए आज की यह प्रस्तुति शुरु कर रहे हैं। दोस्तों, आज रक्षाबंधन के साथ साथ २४ अगस्त भी है। आज ही के दिन सन् २००० को संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के कल्याणजी भाई हम से हमेशा के लिए दूर चले गए थे। आज जब हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर गुलज़ार साहब के लिखे गीतों की शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं, तो आपको यह भी बता दें कि गुलज़ार साहब ने एक फ़िल्म में कल्याणजी-आनंदजी के लिए गीत लिखे थे। और वह फ़िल्म थी 'पूर्णिमा'। आज कल्याणजी भाई के स्मृति दिवस पर आइए उसी फ़िल्म से एक बेहद प्यारा सा दर्द भरा गीत सुनते हैं मुकेश की आवाज़ में - "तुम्हे ज़िंदगी के उजाले मुबारक़, अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं, तुम्हे पाके हम ख़ुद से दूर हो गए थे, तुम्हे छोड़ कर अपने पास आ गए हैं"। अभी दो दिन बाद, २७ अगस्त को मुकेश जी की भी पुण्यतिथि है। इसलिए आज के इस गीत के ज़रिए हम कल्याणजी भाई और मुकेश जी, दोनों को ही श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं।'पूर्णिमा' १९६५ की फ़िल्म थी और उन दिनों गुलज़ार साहब नए नए फ़िल्मी गीतकार बने थे। इस गीत को सुनते हुए आप महसूस करेंगे कि इसमें गुलज़ार साहब का वह ग़ैर पारम्परिक स्टाइल तब तक डेवेलप नहीं हुआ था जिसके लिए बाद में वो जाने गए; बल्कि इस गीत में उस ज़माने के गीतकारों की झलक ज़्यादा मिलती है। फिर भी गीत के अंतरों में बहुत सुंदर बातें उन्होंने कहे हैं, जैसे कि "तुम्हारी वफ़ाओं से शिकायत नहीं है, निभाना तो कोई रवायत नहीं है, जहाँ तक क़दम आ सके आ गए हैं, अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं"। दूसरे अंतरे में गुलज़ार साहब लिखते हैं "चमन से चले हैं ये इलज़ाम लेकर, बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर, मुरादों की मंज़िल से दूर आ गए हैं, अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं"। मुकेश, जो ज़्यादातर यादगार दर्द भरे गीतों के लिए जाने जाते हैं, यह गीत भी उन्ही यादगार गीतों में से एक है। मुकेश की आवाज़ में ये सभी गीत जैसे आम आदमी के गले से निकले हुए लगते हैं। आज का यह प्रस्तुत गीत फ़िल्माया गया है धर्मेन्द्र पर और इस फ़िल्म में उनकी नायिका बनीं थीं मीना कुमारी।

आज बहुत दिनों बाद हम रुख़ कर रहे हैं उसी आनंदजी के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम की तरफ़ और आज उस लम्बे इंटरव्यु से उस अंश को पेश कर रहे हैं जिसमें चला था फ़िल्म 'पूर्णिमा' के गीतों का ज़िक्र। आनंदजी से बात कर रहे हैं कमल शर्मा।

प्र: 'पूर्णिमा' के गानों का ज़िक्र हम कर रहे हैं तो उसमें एक बड़ा ही संजीदा गाना मुकेश जी की आवाज़ में, और बड़ा ही दिल को छू लेने वाला गाना है, "तुम्हे ज़िंदगी के उजाले मुबारक़"।

उ: अच्छा, इस फ़िल्म में गुलज़ार जी ने पहली बार हमारी फ़िल्म में गाना लिखा था। कमल जी, 'पूर्णिमा' में, आपको मालूम है दो गानें गुलज़ार जी ने लिखे, प्रकाश मेहरा जी ने भी गाना लिखा था इसमें, पहली बार, और कॊमेडी गाना था, भरत व्यास जी ने भी लिखा था, इस फ़िल्म का "हमसफ़र मेरे हमसफ़र पंख तुम परवाज़ हम" गाना बहुत चला था, इसमें एक और गाना भी था जिसे मुकेश जी ने गाया था, "गोरी नैन तुम्हारे क्या कहने", उन दिनों आशिक़ महबूबा को हाथ नहीं लगाते थे, बातों से ही काम निबटा लेते थे। (कमल शर्मा ज़ोर से हंस पड़ते हैं)

प्र: सांकेतिक था सबकुछ, ताकि मर्यादा भी बनी रहे, बात भी हो जाए!

उ: यह भी बहुत बोल्ड है, क्योंकि किसी को 'आप सुंदर हैं' यह कहना उन दिनों में हिम्मत नहीं होती थी, मन ही मन समझ जाते थे, आँखें उनकी तरफ़ करके स्माइल कर देंगे, लेकिन कह नहीं सकते। लेकिन आज के दिनों में अगर आप अपने बीवी को भी कहदो कि 'आज आप अच्छी लग रही हो' तो वो कहेगी कि 'कल बुरी लग रही थी क्या?'

दोस्तों, मुकेश की आवाज़ में आज का यह प्रस्तुत गीत राग दरबारी कानाड़ा पर आधारित है। उपर आनंदजी ने इस फ़िल्म के कई गीतों का उल्लेख किया, एक और गीत इस फ़िल्म का जिसका भी उल्लेख होना चाहिए, वह है सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में "शरदचन्द्र की पूर्णिमा", जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है। तो लीजिए सुनिए मुकेश की आवाज़ में कल्याणजी-आनंदजी की संगीत रचना, और शब्दकार हैं गुलज़ार। 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से कल्याणजी भाई और मुकेश जी को स्मृति सुमन!



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार साहब को सन्‍ २००४ में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था और सन्‍ २००२ में उनकी लघु कहानियों की किताब 'धुआँ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. मुखड़े में शब्द है "कटोरा", संगीतकार बताएं - २ अंक.
२. किस लेखक की मूल कहानी पर आधारित है ये फिल्म, जिसे लिखा और निर्देशित किया भी गुलज़ार साहब ने था - ३ अंक.
३. गायिका बताएं - १ अंक.
४ फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ठीक है प्रतिभा जी, हमें इंतज़ार रहेगा. शरद जी अब मात्र ४ अंक दूर हैं..सभी को बधाई....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, July 1, 2010

और इस दिल में क्या रखा है....कल्याणजी आनंदजी जैसे संगीतकारों के रचे ऐसे गीतों के सिवा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 430/2010/130

ल्याणजी-आनंदजी के स्वरबद्ध गीतों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर' की अंतिम कड़ी पर। आपने पिछली नौ कड़ियों में महसूस किया होगा कि किस तरह से बदलते वक़्त के साथ साथ इस संगीतकार जोड़ी ने अपने आप को बदला, अपनी स्टाइल में बदलाव लाए, जिससे कि हर दौर में उनका संगीत हिट हुआ। आज अंतिम कड़ी में हम सुनेंगे ८० के दशक का एक गीत। युं तो १९८९ में बनी फ़िल्म 'त्रिदेव' को ही कल्याणजी-आनंदजी की अंतिम हिट फ़िल्म मानी जाती है (हालाँकि उसके बाद भी कुछ कमचर्चित फ़िल्मों में उन्होने संगीत दिया), लेकिन आज हम आपको 'त्रिदेव' नहीं बल्कि १९८७ की फ़िल्म 'ईमानदार' का एक बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत सुनवाना चाहते हैं। जी हाँ, बिलकुल सही पहचाना, "और इस दिल में क्या रखा है, तेरा ही दर्द छुपा रखा है"। इस गीत के कम से कम दो वर्ज़न है, एक आशा और सुरेश वाडकर का डुएट है, और दूसरा सुरेश की एकल आवाज़ में। आज आपको सुनवा रहे हैं सुरेश वाडकर की एकल आवाज़। गाना मॊडर्ण है, लेकिन जो पैथोस गीतकार प्रकाश मेहरा ने इस गीत में डाले हैं, वह इस गीत को यादगार बना देता है। बेहद कामयाब हुआ था यह गीत और मुझे याद है उन दिनों रेडियो पर इस गीत की गूंज आए दिन सुनाई पड़ती थी। दोस्तों, हमें पूरा यकीन है कि इस गीत को आज सुन कर आप में से बहुतों को अपने स्कूल कालेज का वह ज़माना याद आ गया होगा, है ना! इसी फ़िल्म में अलका याज्ञ्निक और साधना सरगम से भी उन्होने गानें गवाए। अलका और साधना के ज़िक्र से याद आया कि कल्यानजी-आनंदजी ने बहुत से नए कलाकारों को मौका दिया है समय समय पर। सिर्फ़ मौका ही नहीं बल्कि उन्हे बाक़ायदा ट्रेन किया है। आइए आज उनके इसी पक्ष पर थोड़ा सा और नज़र डालते हैं।

जब १९९७ की उस इंटरव्यू में कल्याणजी भाई से गणेश शर्मा ने यह पूछा कि आज की पीढ़ी की बहुत सी गायक गायिकाएँ आप से अपनी 'सिंगिंग् करीयर' शुरु की है, बहुत कुछ सीखा है, इन नए सिंगर्स के बारे में कुछ हम जानना चाहेंगे आप से, तो कल्याणजी भाई ने जवाब दिया - "कभी भी कोई सिंगर या कोई ऐक्टर या कामेडियन, उस वक़्त तो दिखाई दे जाता है कि उसमें कोई बात है, लेकिन उपरवाला कब उसको मौका दे वो हम नहीं बता सकते। लेकिन ये सिंगर्स तो सब्जेक्ट है हमारा। कुमार सानू ने इतने स्टगलिंग् में दिन निकाले कि कोई दूसरा आदमी हो तो भाग जाए! मैंने उनका एक यह देखा कि कुछ भी हो, अपना रियाज़ है उसको नहीं छोड़ते थे। अनुराधा जी भी काफ़ी टाइम से इस लाइन में थीं, उनमें लगन इतनी है कि 'जो भी रंग चाहोगे मैं गाऊँगी'। उनकी लगन देखिए, आज भी देखिये, हर रंग में उन्होनें गाना गाया है। उसके बाद की पीढ़ी में अलका को आप ने देखा होगा, वो भी ५-७ साल तो बहुत स्ट्रगल करना पड़ा उनको, कोई सुनता नहीं था, कोई नया सिंगर जब भी होता है न, नए की कुछ वैल्यू नहीं होती। अभी तो नई पीढ़ी आई है, उसमें साधना सरगम, सोनाली बाजपेई, जावेद, ये बहुत ही अच्छे सिंगर्स हैं। उसके बीच में सपना मुखर्जी आईं थीं, उसने भी अपने रंग में अच्छे अच्छे गानें गाए। मनहर उधास ने भी गानें गाए। उसके बाद उदित नारायण हैं यहाँ, बहुत अच्छे आदमी हैं, बहुत रियाज़ करते हैं, बहुत अच्छे अच्छे सिंगर्स निकले हैं यहाँ से। हमें तो बहुत आनंद आता है देख कर। अभी जो ये साधना-सोनाली की पीढ़ी है, ये सिर्फ़ पापुलारिटी पर नहीं जाते हई, बहुत अभ्यास किया है इन लोगों ने।" और आइए अब आज के गीत को सुना जाए और इस गीत को सुनते हुए कल्याणजी-आनंदजी को फिर एक बार सलाम करते हुए इस लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर' का समापन किया जाए। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल फिर सजेगी रविवार की शाम और हम उपस्थित होंगे एक नई लघु शृंखला के साथ। तब तक के लिए इजाज़त, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि 'कलावीर अकेडमी' में कल्याणजी भाई के संरक्षण में शिक्षा ग्रहण कर जो कलावीर फ़िल्म गायन के क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे हैं, उनके नाम हैं कुमार सानू, अलका यज्ञ्निक, अनुराधा पौडवाल, साधना सरगम, सोनाली बाजपेई, सुनिधि चौहान आदि।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. कालिदास की एक महान कृति पर बनी है ये फिल्म, जिस कृति के नाम पर फिल्म का भी नाम है, बताएं वो नाम -२ अंक.
२. गायक जगमोहन के गाये इस गीत के संगीतकार बताएं - ३ अंक.
३. देबकी बोस निर्देशित ये फिल्म किस सन में प्रदर्शित हुई थी - १ अंक.
४. इस वर्षा गीत के गीतकार बताएं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को ३ अंक और अवध जी को २ अंक देते हुए हम बताते चलें कि प्रतियिगिता के चौथे हफ्ते के अंत में आते आते शरद जी ने अवध जी को पीछे छोड दिया है, आपका स्कोर है ३६ और ३३ पर है अवध जी....इंदु जी १४ अंकों पर है.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, June 30, 2010

किसी राह में, किसी मोड पर....कहीं छूटे न साथ ओल्ड इस गोल्ड के हमारे हमसफरों का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 429/2010/129

ल्याणजी-आनंदजी के सुर लहरियों से सजी इस लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर' में आज छा रहा है शास्त्रीय रंग। इसे एक रोचक तथ्य ही माना जाना चाहिए कि तुलनात्मक रूप से कम लोकप्रिय राग चारूकेशी पर कल्याणजी-आनंदजी ने कई गीत कम्पोज़ किए हैं जो बेहद कामयाब सिद्ध हुए हैं। चारूकेशी के सुरों को आधार बनाकर "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए" (सरस्वतीचन्द्र), "मोहब्बत के सुहाने दिन, जवानी की हसीन रातें" (मर्यादा), "किसी राह में किसी मोड़ पर (मेरे हमसफ़र), "अकेले हैं चले आओ" (राज़), "एक तू ना मिला" (हिमालय की गोद में), "कभी रात दिन हम दूर थे" (आमने सामने), "बेख़ुदी में सनम उठ गए जो क़दम" (हसीना मान जाएगी), "जानेजाना, जब जब तेरी सूरत देखूँ" (जाँबाज़) जैसे गीतों की याद कल्याणजी-आनंदजी के द्वारा इस राग के विविध प्रयोगों के उदाहरण के रूप में फ़िल्म संगीत में जीवित रहेगी। चारूकेशी का इतना व्यापक व विविध इस्तेमाल शायद ही किसी और संगीतकार ने किया होगा! दूसरे संगीतकारों के जो दो चार गानें याद आते हैं वो हैं लक्ष्मी-प्यारे के "आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं" (मिलन), "मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे" (प्यासा सावन), मदन मोहन का "बै‍याँ ना धरो हो बलमा" (दस्तक), और रवीन्द्र जैन का "श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम" (गीत गाता चल)। ऒरकेस्ट्रेशन भले ही पाश्चात्य हो, लेकिन उस पर भी शास्त्रीय रागों के इस्तेमाल से मेलोडी में इज़ाफ़ा करने से कल्याणजी-आनंदजी कभी नहीं पीछे रहे। उनका हमेशा ध्यान रहा कि गीत मेलोडियस हो, सुमधुर हो, और शायद यही कारण है कि उनके बनाए गीतों की लोकप्रियता आज भी वैसे ही बरकरार है जैसा कि उस ज़माने में हुआ करता था। उनका संगीत मास और क्लास, दोनों को ध्यान में रखते हुए बनाया जाता रहा है। दोस्तों, आज हम राग चारूकेशी पर आधारित १९७० की फ़िल्म 'मेरे हमसफ़र' का गीत सुनने जा रहे हैं "किसी राह में किसी मोड़ पर, कहीं चल ना देना तू छोड़ कर, मेरे हमसफ़र मेरे हमसफ़र"। लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ें, गीतकार आनंद बक्शी के बोल! जीतेन्द्र और शर्मीला टैगोर पर एक ट्रक के उपर फ़िल्माया गया था यह गाना। फ़िल्म तो ख़ास नहीं चली, लेकिन यह गीत अमर हो कर रह गया।

आज ३० जून है। कल्याणजी भाई का जन्मदिवस। 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से हम कल्याणजी भाई को श्रद्धांजली अर्पित करते हैं उन्ही के रचे इस ख़ूबसूरत और दिल को छू लेने वाले गीत के ज़रिए। कल्याणजी भाई का २४ अगस्त २००० में निधन हो गया, आनंदजी भाई के बड़े भाई और उनके सुरीले हमसफ़र उनसे हमेशा के लिए बिछड़ गए। लेकिन यह भी सच है कि कल्याणजी भाई अपनी धुनों के ज़रिए हमेशा जीवित रहेंगे। आनंदजी भाई ने कल्याणजी भाई के अंतिम समय का हाल कुछ इस तरह से बयान किया था विविध भारती के उसी इंटरव्यू में - "फ़ादर फ़िगर थे। सब से दुख की बात मुझे लगती है कि ये जब बीमार थे, अस्पताल में मैं उनसे मिलने गया। तो अक्सर ऐसा होता है कि मिलने नहीं देते हैं; डॊक्टर्स कहते हैं कि इनको रेस्ट करने दो, समझते नहीं हैं इस बात को कि आख़िरी टाइम जो होता है। तो जाने से पहले आख़िरी दिन, जब मैं उनसे मिलने अंदर गया, तो उनकी आँख में आँसू थे और वो कुछ बोलना चाहते थे। अब क्या कहना चाहते थे यह समझ में नहीं आया। डॊक्टर कहने लगे कि 'dont disturb him, dont disturb him'. मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहना चाहते थे। वह बात दिल में ही रह गई। उनके जाने के बाद मैं रो रहा था तो किसी ने कहा कि मत रो। मैंने कहा कि अब नहीं रो‍ऊँ तो कब रो‍ऊँ!" दोस्तों, कल्याणजी भाई इस फ़ानी दुनिया से जाकर भी हमारे बीच ही हैं अपनी कला के ज़रिए। आज का यह प्रस्तुत गीत हमें इसी बात का अहसास दिलाता है। यह गीत हम अपनी तरफ़ से ही नहीं बल्कि आनंदजी भाई की तरफ़ से भी डेडिकेट करना चाहेंगे उनके बड़े भाई, गुरु और हमसफ़र कल्याणजी भाई के नाम।

"तेरा साथ है तो है ज़िंदगी,
तेरा प्यार है तो है रोशनी,
कहाँ दिन ये ढल जाए क्या पता,
कहाँ रात हो जाए क्या ख़बर,

मेरे हमसफ़र, मेरे हमसफ़र।
किसी राह में किसी मोड़ पर,
कहीं चल ना देना तू छोड़ कर,
मेरे हमसफ़र, मेरे हमसफ़र।"



क्या आप जानते हैं...
कि कल्याणजी-आनंदजी को १९९६ में फ़िल्म जगत में विशिष्ट सेवाओं के लिए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदत्त 'लता मंगेशकर पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस गीत के दो वर्जन हैं फिल्म में, एक आशा की आवाज़ में है, दूसरे वर्जन जो कल बजेगा उसके गायक बताएं -३ अंक.
२. गीतकार बताएं इस शानदार गीत के - २ अंक.
३. संजय दत्त अभिनीत फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. फिल्म की नायिका का नाम क्या है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आपके ३ अंकों का त्याग भी काम नहीं आया, खैर आपको और अवध जी को २-२ अंकों की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, June 29, 2010

ये मेरा दिल यार का दीवाना...जबरदस्त ऒरकेस्ट्रेशन का उत्कृष्ट नमूना है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 428/2010/128

'दिल लूटने वाले जादूगर' - कल्याणजी-आनंदजी के धुनों से सजी इस लघु शृंखला में आज हम और थोड़ा सा आगे बढ़ते हुए पहुँच जाते हैं सन‍ १९७८ में। ७० के दशक के मध्य भाग से हिंदी फ़िल्मों का स्वरूप बदलने लगा था। नर्मोनाज़ुक प्रेम कहानियो से हट कर, ऐंग्री यंग मैन की इमेज हमारे नायकों को दिया जाने लगा। इससे ना केवल कहानियों से मासूमीयत ग़ायब होने लगी, बल्कि इसका प्रभाव फ़िल्म के गीतों पर भी पड़ा। क्योंकि गानें फ़िल्म के किरदार और सिचुयशन को केन्द्र में रखते हुए ही बनाए जाते हैं, ऐसे में गीतकारों और संगीतकारों को भी उसी सांचे में अपने आप को ढालना पड़ा। जो नहीं ढल सके, वो पीछे रह गए। कल्याणजी-आनंदजी एक ऐसे संगीतकार थे जिन्होने हर बदलते दौर को स्वीकारा और उसी के हिसाब से सगीत तैयार किया। और यही वजह है कि १९५८ में उनके गानें जितने लोकप्रिय हुआ करते थे, ८० के दशक में भी लोगों ने उनके गीतों को वैसे ही हाथों हाथ ग्रहण किया। हाँ, तो हम ज़िक्र कर रहे थे १९७८ के साल की। इस साल अमिताभ बच्चन की मशहूर फ़िल्म आई थी 'डॊन', जिसमें इस जोड़ी का संगीत था। सुपर स्टार नम्बर-१ पर पहुँचे अमिताभ बच्चन अभिनीत कई फ़िल्मों में संगीत देकर कल्याणजी-आनंदजी अपनी व्यावसायिक हैसीयत को आगे बढ़ाते रहे। बिग बी के साथ इस जोड़ी की कुछ माह्त्वपूर्ण फ़िल्मों के नाम गिनाएँ आपको? 'ज़ंजीर', 'डॊन', 'मुक़द्दर का सिकंदर', 'गंगा की सौगंध', 'ख़ून पसीना', 'लावारिस', आदि। वापस आते हैं 'डॊन' पर। किरदार और कहानी के हिसाब से इस फ़िल्म के गानें बनें और ख़ूब हिट भी हुए। अनजान के लिखे और किशोर दा के गाए "ख‍इ के पान बनारसवाला", "अरे दीवानों मुझे पहचानो", और "ई है बम्बई नगरीय तू देख बबुआ" जैसे गीतों ने तहलका मचा दिया चारों तरफ़। लता-किशोर का डुएट "जिसका मुझे था इंतेज़ार" भी काफ़ी सुना गया। लेकिन एक और गीत जिसका एक ख़ास और अलग ही मुक़ाम है, वह है आशा भोसले का गाया और हेलेन पर फ़िल्माया हुआ "ये मेरा दिल यार का दीवाना"। यह एक कल्ट सॊंग् है जिसकी चमक कुछ इस तरह की है कि आज ३० साल बाद भी वैसी की वैसी बरकरार है। ज़बरदस्त ऒरकेस्ट्रेशन से सजी यह गीत उस समय का सब से ज़्यादा पाश्चात्य रंग वाला गीत था। कल्याणजी-आनंदजी ने जिस तरह का संयोजन इस गाने में किया है कि इस गीत को बजाए बग़ैर आगे बढ़ने को दिल नहीं चाहता। आज की कड़ी में इसी गीत की धूम!

आशा भोसले और कल्याणजी-आनंदजी के शुरु शुरु में बहुत कम ही गानें आए। जैसा कि पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में (पृष्ठ संख्या ५५७) में लिखते हैं कि आशा के तो कल्याणजी-आनंदजी के साथ सातवें और आठवें दशक के म्ध्य तक कम ही उल्लेखनीय गीत हैं। आशा भोसले आश्चर्यजनक रूप से कल्यानजी-आनंदजी खेमे से गायब सी रही हैं। यदि लता नहीं उपलब्ध हुईं तो इन्होनें सुमन कल्याणपुर, गीता दत्त या फिर नई गायिकाओं जैसे कमल बारोट, उषा तिमोथी, हेमलता, कृष्णा कल्ले को मौका दिया, पर आशा को सातवें दशक के मध्य तक तो बिलकुल नहीं। इस तथ्य की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है, हालाँकि कारण सम्भवत: किसी निर्माता द्वारा आरम्भ में ही दोनों के बीच न चाहते हुए एक ग़लतफ़हमी ही रही। पर उसके बाद 'दिल ने पुकारा' (१९६७) के "किस ज़ालिम हो क़ातिल" से आशा भी शामिल हो गईं कल्याणजी-आनंदजी कैम्प में। ख़ैर, हम बात रहे थे "ये मेरा दिल यार का दीवाना की"। इस गीत की खासियत मुझे यही लगती है कि इसका जो ऒरकेस्ट्रेशन हुआ है, इसके जो म्युज़िक पीसेस हैं, वो बहुत ज़्यादा प्रोमिनेण्ट हैं। इतने प्रोमिनेण्ट कि अगर इन्हे गीत से अलग कर दिया जाए तो गीत की आत्मा ही चली जाएगी। अक्सर इस गीत को गुनगुनाते हुए इन पीसेस को भी साथ में गुनगुनाना पड़ता है। इस गीत के इंटरल्युड में से एक पीस को एक नामी टीवी चैनल ने अपने किसी कार्यक्रम के शीर्षक संगीत में इस्तेमाल किया है। तो दोस्तों, इस ज़बरदस्त नग़में को सुनिए और सलाम कीजिए आशा जी की गायकी और कल्याणजी-आनंदजी भाई की वक़्त के साथ साथ अपने आप को ढालने की प्रतिभा को!



क्या आप जानते हैं...
कि लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल करीब ९ सालों तक कल्याणजी-आनंदजी के सहायक रहे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. कल्याणजी आनंदजी ने इस राग पर कई सारे कामियाब गीत बनाये, "छोड दे सारी दुनिया" भी इसी राग पर है जिस पर कल का ये गीत होगा, राग बताएं -३ अंक.
२. मुकेश और लता के गाये इस युगल गीत को किसने लिखा है - २ अंक.
३. ये इस फिल्म का शीर्षक गीत है, किन पर फिल्माया गया है ये गीत - २ अंक.
४. फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अब शरद जी आगे हो गए हैं, पर अवध जी अभी भी मौका है आपके पास, कल का गीत हमारे महिला श्रोताओं के लिए खास रहा, इसे पसंद करने के लिए धन्येवाद

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, June 28, 2010

ओ बाबुल प्यारे....लता की दर्द भरी आवाज़ में एक बेटी की गुहार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 427/2010/127

दिल लूटने वाले जादूगर कल्याणजी-आनंदजी के स्वरबद्ध गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की सातवीं कड़ी में हम फिर एक बार सन् १९७० की ही एक फ़िल्म का गीत सुनने जा रहे हैं। देव आनंद-हेमा मालिनी अभिनीत सुपर डुपर हिट फ़िल्म 'जॊनी मेरा नाम'। एक फ़िल्म को सफल बनाने के लिए जिन जिन साज़ो सामान की ज़रूरत पड़ती है, वो सब मौजूद थी इस फ़िल्म में। बताने की ज़रूरत नहीं कि फ़िल्म के गीत संगीत ने भी एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष निभाया। फ़िल्म का हर एक गीत सुपरहिट हुआ, चाहे वह आशा-किशोर का गाया "ओ मेरे राजा" हो या किशोर की एकल आवाज़ में "नफ़रत करने वालों के सीने में प्यार भर दूँ", उषा खन्ना के साथ किशोर दा का गाया "पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले" हो, आशा जी की मादक आवाज़-ओ-अंदाज़ में "हुस्न के लाखों रंग" हो, या लता जी के गाए दो गीत "मोसे मोरा श्याम रूठा" और "ओ बाबुल प्यारे"। इंदीवर और अनजान के लिखे इस फ़िल्म के ये सारे गीत गली गली गूंजे। अब इस फ़िल्म से किसी एक गीत को आज यहाँ पर सुनवाने की बात आई तो हम कुछ दुविधा में पड़ गए कि किस गीत को बजाया जाए। फिर शब्दों के स्तर पे अगर ग़ौर करें, तो "ओ बाबुल प्यारे" गीत को ही फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत माना जाना चाहिए, ऐसा हमारा विचार है। और इसीलिए हमने इसी गीत को चुना है। सिचुएशन कुछ ऐसा है कि नायिका के बूढ़े पिता को क़ैद कर रखा गया है, और क़ैदख़ाने के ठीक बाहर नायिका यह गीत गा रही है, इस बात से बिल्कुल बेख़बर कि उनके और उनके पिता के बीच का फ़ासला बहुत ही कम है। गीत के बोलों में अनजान साहब ने जान डाल दी है कि गीत को सुनते हुए जैसे कलेजा कांप उठता है। मुखड़े में "ओ" का इस्तेमाल इस तरह का शायद ही किसी और गाने में किसी ने किया होगा! "ओ बाबुल प्यारे, ओ रोये पायल की छमछम, ओ सिसके सांसों की सरगम, ओ निसदिन तुझे पुकारे मन हो"। पिता-पुत्री के रिश्ते पर बने गीतों में यह एक बेहद महत्वपूर्ण गीत रहा है। गीत के तीसरे अंतरे में राजा जनक और सीता का उल्लेख करते हुए नायिका गाती हैं - "जनक ने कैसे त्याग दिया है अपनी ही जानकी को, बेटी भटके राहों में, माता डूबी आहों में, तरसे तेरे दरस को नयन"। और कल्याणजी-आनंदजी ने इस गीत की धुन भी कुछ ऐसी बनाई है कि बताना मुश्किल है कि गीतकार, गायिका और संगीतकार में किसे नम्बर एक माना जाए इस गीत के लिए!

फ़ारूख़ क़ैसर, आनंद बक्शी, इंदीवर और राजेन्द्र कृष्ण के बाद आज हम अनजान साहब की रचना सुन रहे हैं, और बताना ज़रूरी है कि अनजान साहब ने कल्याणजी-आनंदजी के साथ एक लम्बा सफ़र तय किया है। तो क्यों ना आज आनंदजी के 'उजाले उनकी यादों के' वाली मुलाक़ात से उस अंश को यहाँ प्रस्तुत किया जाए जिसमें उनसे पूछा गया था कि उनके हिसाब से उनका सब से अच्छा काम किस गीतकार के साथ हुआ है। सवाल पूछ रहे हैं विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक श्री कमल शर्मा।

प्र: आनंदजी, आपको लगता है कि आपका जो 'best work' है, वो इंदीवर जी के साथ में हुआ है या आनंद बक्शी साहब के साथ में हुआ है?

उ: नहीं, हमने, क्या हुआ, जब अनजान जी आए न, अनजान जी से एक बात कही मैंने। तो स्ट्रगल के दिनों में जब आनजान जी आए, तो अनजान जी से कहा कि काम, बडे सीधे आदमी थे, बड़े सीधे सच्चे आदमी थे, उनसे कहा कि काम तो ईश्वर दिलाएगा, लेकिन ये जो स्ट्रगल पीरियड चला है आपका, इसमें एक ही काम कर लीजिए आप, कि तीन 'म्युज़िक डिरेक्टर्स' चल रहे हैं - कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर.डी. बर्मन - इन तीनों के पास जाओ कि पुरिया क्या बेचनी है, माल क्या देना है। बोले हर जगह तो गाना ही लिखूँगा। मैंने कहा कि ऐसा नही होता है, हर किसी का एक अलग लिखवाने का अंदाज़ होता है। तो बोले कि वह क्या होता है? मैंने कहा कि वो सोचो आप और फिर दो दिन के बाद आइए आप, ज़रा सोच के आइए कि क्या करना है। तो दूसरे तीसरे दिन आए तो बोले कि थोड़ी बात समझ में आई, कि आपके गानों में मैंने देखा कि फ़िलोसोफ़ी चाहिए। मैंने कहा कि सही कहा आपने, हमारे गीतों में फ़िलोसोफ़ी चाहिए कहीं ना कहीं, डायरेक्टली या इनडायरेक्टली। कि अपने हाथों से हवाओं को गिरफ़्तार ना कर, कि पहले पेट पूजा, फिर काम करो कोई दूजा, कुछ ना कुछ तो आएगा ही। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के वहाँ थोड़ा गिरा गाना लाना पड़ेगा, क़व्वाली का रंग, थोड़ा ठेका लाना पड़ेगा, और आर.डी के पास जाएँगे तो लास्ट नोट जो होगी वह लम्बी होगी, तो ऊ, ई नहीं चलेगा वहाँ पे। तो बाद मे अनजान जी जब मिले, बहुत काम करने लगे थे, बोले 'गुरु, वह पुरिया बहुत काम आ रही है, जहाँ भी जाओ फ़टाफ़ट काम हो जाता है, कि उसके वहाँ जाना है तो क्या देना है'।

प्र: गुरु मंत्र तो आप ही से मिला था! (हँसते हुए)

उ: अब क्या हुआ था कि एक गाना था हमारा, फ़िल्म लाइन में चलता है ना, जुमले चलते हैं, कभी कुछ चलता है, कभी कुछ, बीच में जानू, जानेमन, जानेजिगर, ये सब चलने लगा था। मैंने अनजान जी को बोला कि अनजान जी, एक काम कीजिए ना, सारे के सारे एक में डाल देते हैं हम लोग, जानू, जानम, जानेमन, जानेवफ़ा, जानेजहाँ। अनजान जी बोले 'जान छूटे इनसे'।

तो दोस्तों, कुछ हँसी मज़ाक की बातें हो गईं, लेकिन अब वापस आते हैं आज के गीत के मूड पर, जो कि दर्द भरा है। लता जी के दर्दीले अंदाज़ में एक बेटी का अपने पिता को आहवान! सुनते हैं....



क्या आप जानते हैं...
कि कमल बारोट से कल्याणजी-आनंदजी ने कुछ बड़े सुंदर ग़ैर-फ़िल्मी गीत गवाए हैं और आज भी "पिया रे प्यार", "पास आओ कि मेरी" जैसे गीतों का अपना अलग आकर्षण है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये एक एक्शन पैक फिल्म का हिट गीत है, जिसके नए संस्करण को इस फिल्म की लेखक जोड़ी में से एक के सुपुत्र ने निर्देशित किया था, फिल्म बताएं -२ अंक.
२. इस गीत को उसके संगीत संयोजन के लिए खास याद किया जाता है, किस गायिका की आवाज़ है इसमें - २ अंक.
३. मूल फिल्म के निर्देशक कौन थे - ३ अंक.
४. किस मशहूर अभिनेत्री पर फिल्माया गया था ये डांस नंबर- २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे अवध जी किसी सवाल को जवाब तो दिए होते, कम से कम दो अंक ही मिल जाते, खैर इस सही जवाब के साथ ३ अंक लिए शरद जी ने और आपसे आगे निकल आये, इंदु जी अपने व्यस्तता के बीच भी oig में आना नहीं भूलती यही उनका प्यार है...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, June 27, 2010

यूहीं तुम मुझसे बात करती हो...इतने जीवंत और मधुर युगल गीत कहाँ बनते हैं रोज रोज

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 426/2010/126

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक नई सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं। इन दिनों हम आप तक पहुँचा रहे हैं सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के स्वरबद्ध गीतों से सजी लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर'। इस शृंखला के पहले हिस्से में पिछले हफ़्ते आपने पाँच गीत सुनें, और आज से अगले पाँच दिनों में आप सुनेंगे पाँच और गीत। तो साहब हम आ पहुँचे थे ७० के दशक में, और जैसा कि हमने आपको बताया था कि ७० का दशक कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर.डी. बर्मन का दशक था। यह कहा जाता है कि इन तीनों ने रिकार्डिंग् स्टुडियो पर जोड़-तोड़ से ऐडवांस बुकिंग्' करनी शुरु कर दी थी कि और किसी संगीतकार को अपने गीतों की रिकार्डिंग् के लिए स्टुडियो ही नहीं मिल पाता था। 'आराधना' की सफलता के बाद यह ज़माना राजेश खन्ना और किशोर कुमार के सुपर स्टारडम का भी था। कल्याणजी-आनंदजी भी इस लहर में बहे और सन् १९७० में राजेश खन्ना के दो सुपर हिट फ़िल्मों में मुख्यत: किशोर कुमार को ही लिया। ये दो फ़िल्में थीं 'सफ़र' और 'सच्चा झूठा'। 'सफ़र' में "ज़िंदगी का सफ़र", "जीवन से भरी तेरी आँखें", तथा 'सच्चा झूठा' में "दिल को देखो चेहरा ना देखो", "मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया" और "कहदो कहदो तुम जो कहदो" (लता के साथ)जैसे गानें किशोर दा ने ही गाए थे। लेकिन रफ़ी साहब ने 'सच्चा झूठा' में लता जी के साथ मिलकर एक युगल गीत गाया था जिसे लोगों ने ख़ूब ख़ूब पसंद किया, और इसी गीत को आज हम लेकर आए हैं आपको सुनवाने के लिए। "युंही तुम मुझसे बात करती हो या कोई प्यार का इरादा है, अदाएँ दिल की जानता ही नहीं मेरा हमदम भी कितना सादा है"। राजेश खन्ना और मुमताज़ पर फ़िल्माए लता-रफ़ी डुएट्स में जिन दो गीतों की याद हमें सब से पहले आती है, उनमें से एक है लक्ष्मी-प्यारे के संगीत में 'दो रास्ते' का गीत "दिल ने दिल को पुकारा मुलाक़ात हो गई" और दूसरा गीत है आज का यह प्रस्तुत गीत।

सन् १९९७ में कल्याणजी भाई विविध भारती के स्टुडियो में तशरीफ़ लाए थे और गणेश शर्मा को एक इंटरवियू दिया था। चलिए आज उसी का एक अंश यहाँ पर पेश किए देते हैं। गणेश शर्मा कल्याणजी भाई से पूछते हैं कि कल्याणजी भाई, आपको बहुत बड़े बड़े अवार्ड, पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिसमें राष्ट्रपति पुरस्कार, पद्मश्री। कोई ऐसा यादगार लम्हा किसी अवार्ड फ़ंकशन का, अवार्ड लेते हुए, आप श्रोताओं को बताना चहेंगे?

कल्याणजी: कोई भी अवार्ड मिलता है ख़ुशी तो मिलती है, उसमें कोई सवाल नहीं उठता है, लेकिन मुझे लगता है कि जनता का जो अवार्ड है, वह सब से बड़ा है क्योंकि जब भी हम काम करते हैं, उनकी क्या ख़ुशी हुई है, उनकी क्या क्लैपिंग् हुई है, लेकिन जब भी कोई अवार्ड लिया तो ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है हमारी कि हम चाहते हैं कि जितने प्यार से लोगों ने यह अवार्ड दिया है, तो हम इस संगीत के ज़रिये क्या समाज की सेवा कर सकते हैं, क्या देश की सेवा कर सकते हैं, क्या हमारे आने वाले भाइयों के लिए कर सकते हैं, ये हमेशा हमेशा मन में रहता है। फिर अगर आप मज़ाक की बात करें तो फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड, बहुत बड़ा अवार्ड है, और हमें यह 'कोरा काग़ज़' के लिए मिला। बहुत लेट मिला था, २५ साल, २७ साल इंडस्ट्री में रहने के बाद। वहाँ पूछा गया कि यह अवार्ड मिलने से आप को क्या महसूस हो रहा है? मैंने कहा कि बहुत ख़ुशी हो रही है, क्यों नहीं ख़ुशी होगी, बड़ी उमर में लड़का हुआ है!

और आइए अब सुनते हैं राजेश खन्ना और मुमताज़ पर फ़िल्माया गया लता-रफ़ी की युगल आवाज़ों में आनंद बक्शी साहब की रचना फ़िल्म 'सच्चा झूठा' से।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्मों से हट कर कल्याणजी व्यक्तिगत जीवन में आचार्य रजनीश (ओशो) के भक्त थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस फिल्म के एक अन्य गीत में उषा खन्ना ने किशोर दा की आवाज़ से आवाज़ मिलायी थी, फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.
२. गीत के एक अंतरे में रामायण के एक अंश का जिक्र है, गीत के बोल बताएं - २ अंक.
३. गीतकार बताएं - ३ अंक.
४. लता ने किस अभिनेत्री के लिए पार्श्व गायन किया है इस गीत में - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी पहले जरूर आये, पर ३ अंकों का सवाल अपने गुरु के लिए छोड़ गए, वी डी ने भी हाथ आजमाया और २ अंक से खाता खोल ही दिया, इंदु जी जल्दी आईये, आपकी अनुपस्तिथि में मैदान जरा खाली दिख रहा है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, June 24, 2010

पल पल दिल के पास तुम रहती हो....कुछ ऐसे ही पास रहते है कल्याणजी आनंदजी के स्वरबद्ध गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 425/2010/125

ल्याणजी-आनंदजी के संगीत सफ़र के विशाल सुर-भण्डार से १० मोतियाँ चुन कर उन पर केन्द्रित लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर' को इन दिनों हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चला रहे हैं। पिछले चार दिनों से हमने ६० के दशक के गानें सुनें, आइए आज हम आगे बढ़ निकलते हैं ७० के दशक में। ७० का दशक एक ऐसा दशक साबित हुआ कि जिसमें ५० और ६० के दूसरे अग्रणी संगीतकार कुछ पीछे लुढ़कते चले गए, और जिन तीन संगीतकारों के गीतों ने लोगों के दिलों पर व्यापक रूप से कब्ज़ा जमा लिया, वो संगीतकार थे राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और कल्याणजी-आनंदजी। इन तीनों संगीतकारों ने इस दशक में असंख्य हिट गीत दिए और अपार शोहरत हासिल की। आज हमने जिस गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'ब्लैकमेल' का अतिपरिचित "पल पल दिल के पास तुम रहती हो"। किशोर कुमार और कल्याणजी-आनंदजी के कम्बिनेशन के गानों का ज़िक्र हो और इस गाने की बात ना छिड़े यह असंभव है। १९७३ की फ़िल्म 'ब्लैकमेल' का यह गीत फ़िल्माया गया था, जी नहीं, धर्मेन्द्र पर नहीं, बल्कि राखी पर। राखी को अपने प्रेमी धर्मेन्द्र के प्रेम पत्रों को पढ़ते हुए दिखाया जाता है और पार्श्व में यह गीत चल रहा होता है। भले ही गीत में "ख़त" या "चिट्ठी" का ज़िक्र नहीं है, लेकिन यह है तो सही एक 'लव लेटर सॊंग्'। इस गीत को लिखा था राजेन्द्र कृष्ण साहब ने।

आइए फिर एक बार आज रुख़ करते हैं विविध भारती पर आनंदजी से की गई बातचीत की ओर, शृंखला 'उजाले उनकी यादों के' में, जिसमें इस गीत की चर्चा आनंदजी भाई ने कुछ इस क़दर की थी। "ये कम्पोज़िशन के दो तीन स्टाइल होते हैं। जैसे मैं कहूँगा अपनी स्टाइल में, मैं यानी आनंदजी, मुझे घूमने का बहुत शौक है, कल्याणजी भाई कमरे में बैठने का शौक रखते थे। तो बोलते थे कि भीड़ भड़क्के में कहाँ जाना है? तो मुझे गाना बनाने का शौक है तो गाड़ी लेके निकल पड़ता हूँ, ट्रेन में बैठ जाता हूँ, कुछ नहीं तो टेप रिकार्डर लेके बाथरूम में घुस जाता हूँ, बाथ टब में लेट गया, शावर चालू कर दिया, टेप में अपना गाना बजा दिया, ट्रेन में बैठा तो गाना बजा दिया, बाजे पे हाथ रखने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ। मैं ऐसे ही काम करूँगा पहले। क्योंकि बाजे पे आपने हाथ रखा तो एक जगह आपने सुर पकड़ लिया, आप उस सुर में बंध गए, फिर धीरे धीरे आपको लगेगा कि अभी राग में बजाऊँ, कौन से राग में बजाऊँ। तो पहले शुरु में एक्स्प्रेशन दो आप, उसको क्या भाव से आप बोल सकते हैं। उसके बाद धीरे धीरे डेवेलप करने के बाद आपके बाजे पे हाथ रखो, कि भई बाजे पे अब, कौन से सिंगर्स गाने वाले हैं, उसके स्केल पे गाना कैसे बनेगा, क्या बनेगा, उसके बाद उसकी रीदम, उसकी ताल क्या है गाने की, वह मूड को समझते हुए आप विज़ुअलाइज़ कर सकते हैं कि पिक्चराइज़ कैसे होगा गाने का। "पल पल दिल के पास", यह गोल्डी जी के वहाँ आके ऐसे ही गप मारते थे हम लोग। तो युं करते करते, वहाँ बैठे बैठे एक दिन मेरे को बोलते हैं कि एक गाना अपने को करना है ऐसा कि जिसमे मैं कुछ अलग अलग अलग अलग कुछ दिखाना चाहता हूँ, and the guy, he is an educated guy, so piano पे बैठके भी गाएगा, कुछ ये करेगा, लेकिन he is again an Indian guy, तो फ़ीलिंग् भी लानी है। तो हमने बोला कि क्या चाहिए क्या। बोले कि छोटे छोटे टुकड़े होंगे, पिक्चराइज़ करना चाहता हूँ, 'cut one two one two' ऐसे।" और दोस्तों, इस ज़रूरत को पूरा करने में राजेन्द्र कृष्ण साहब ने भी बहुत छोटे छोटे शब्दों का इस्तेमाल इस गीत में किया है "पल", "पल", "दिल", "के", "पास".....।" तो आइए अब इस गीत को सुना जाए। और यहीं पर इस शृंखला का पहला हिस्सा ख़त्म होता है। सोमवार की शाम हम फिर से हाज़िर होंगे इसी शृंखला को आगे बढ़ाने के लिए। तब तक के लिए बने रहिए 'आवाज़' के साथ, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि स्वतंत्र संगीतकार बनने से पहले कल्याणजी भाई ने लगभग ४०० फ़िल्मों में बतौर संगीत सहायक व वादक काम किया।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. राजेश खन्ना की इस फिल्म की नायिका कौन है -३ अंक.
२. इस युगल गीत के गीतकार कौन है- २ अंक.
३. फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "रोज", गीत बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ठीक है अवध जी, आप शरद जी के शिष्य ही सही, पर इस प्रतियोगिता के तीसरे सप्ताह के अंत तक आज भी आप ही आगे हैं, पर इस बार शरद जी ने ये फासला बेहद कम कर दिया है. फिर भी ३ अंकों से आगे होने के कारण इस सप्ताहांत भी आप ही विजेता रहे.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, June 23, 2010

फूल तुम्हें भेजा है खत में....एक बेहद संवेदनशील फिल्म का एक बेहद नर्मो नाज़ुक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 424/2010/124

ल्याणजी-आनंदजी के संगीत की मिठास इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में घुल रही है। १९५९, १९६४ और १९६५ के बाद आज हम आ पहुँचे हैं साल १९६८ में। यह एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव वाला साल है इस संगीतकार जोड़ी के करीयर का, क्योंकि इसी साल आई थी फ़िल्म 'सरस्वतीचन्द्र'। पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं कि "चंदन सा बदन चंचल चितवन" सातवें दशक की युवा पीढ़ी का प्रेम गीत बनकर स्थापित है ही, लेकिन उससे कहीं भी कम नहीं है "फूल तुम्हे भेजा है ख़त में" का सौन्दर्य जो उस ज़माने की आहिस्ता आहिस्ता चलने वाली अपेक्षाकृत कम भाग दौड़ की ज़िंदगी के बीच पनपी रूमानी भावनाओं को बड़े ही मधुर आग्रह से प्रतिध्वनित करती है। क्या ख़ूब कहा है पंकज जी ने। लता जी और मुकेश जी की आवाज़ों में इंदीवर साहब का लिखा हुआ यह बेहद लोकप्रिय व मधुर युगल गीत आज हम लेकर आए हैं। इस फ़िल्म से जुड़े तथ्य तो हम पहले ही आपको दे चुके हैं जब हमने कड़ी नम्बर-१४ में "चंदन सा बदन" सुनवाया था। आज तो बस इसी गीत की बातें होंगी। दोस्तो, यह गीत है तो एक नर्मोनाज़ुक रोमांटिक गीत, लेकिन इसके बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है, जिसे आप आगे पढेंगे तो गुदगुदा जाएँगे। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में जब आनंदजी तशरीफ़ लाए थे, उन्होने कमल शर्मा के साथ बातचीत के दौरान इस किस्से का ज़िक्र किया था। तो आइए उसी बातचीत का वह अंश यहाँ पेश करते हैं।

प्र: आनंदजी, आपने एक बार ज़िक्र किया था कि कोई लिफ़ाफ़ा आ पहुँचा था, आपके पास कोई चिट्ठी आई थी, कोई 'फ़ैन मेल' आया था जिसमें दिल और फूल बना हुआ था और उससे एक गाना बना था, कौन सा था वह?

उ: कमल जी, अब सब हांडी क्यों फोड़ रहे हैं आप? मेरे ग्रैण्ड-चिलड्रेन भी सुन रहे होंगे, वो बोलेंगे दादा ऐसा था क्या? (दोनों हँसते हुए) प्यारे भाइयों और बहनों, कमल जी अब ये सब दिल की बातें पूछ रहे हैं, तो क्या हुआ था कि फ़ैन्स के लेटर्स बहुत आते थे। बहुत सारे लेटर्स आते थे और उन दिनों में क्या था कि फ़ैन्स को आपके लेटर्स चाहिए, फ़ोटो चाहिए, राइटर बनने के लिए कोई आया, ऐक्टर बनने के लिए कोई आया। हम लोगों के बारे में सब को पता था कि भई ये सिंगर्स को ही नहीं ऐक्टर्स को भी चांस देते हैं, डिरेक्टर्स को भी चांस देते हैं, राइटर्स को भी चांस देते है। तो यह एक अड्डा हो गया था कि भई कोई फ़ीज़ वीज़ भी नहीं लगती, बैठ जाओ आके, चाय पानी भी मिलेगी, ऐक्टर ऐक्ट्रेस भी देखने को मिल जाएँगे, सब कुछ होगा। तो ये सब होता था। हम नहीं चाहते थे कि हम जब स्ट्रगल करते थे, कोई अगर कुछ कर रहा है तो एक सहारा तो चाहिए। तो एक लेटर इनका आया, एक सफ़ेद फूल था, और एक लिपस्टिक का सिर्फ़ होंठ बना हुआ था। 'and nothing was there'. 'blank letter'. सिर्फ़ 'to dear' लिखा हुआ था। उपर कल्याणजी-आनंदजी का पता लिखा था और अंदर 'to dear' करके लिख दिया था। तो दोनों में कन्फ़्युशन हो गया कि यह 'to dear' किसको है! मैंने कहा कि यह अपने लिए होगा, भाईसाहब के लिए तो नहीं होगा। ऐसे करके रख लिया। अब रखने के बाद इंदीवर जी आए तो उनको दिखाया मैंने। उनको कहा कि देखो, ऐसे ऐसे ख़त आने लगे हैं अब! (कमल शर्मा ज़ोर से हंस पड़े)। इंदीवर जी बोले कि यह कौन है, होगी तो कोई लड़की, ये होंठ भी तो छोटे हैं, तो लड़की ही होगी। उन्होने पूछा कि किसका नाम लिखा है। मैंने बोला कि 'to dear' करके लिखा है, आप अपना नाम लिख लो, मैं अपना नाम लिख लूँ या कल्याणजी भाई के नाम पे लिख दूँ। बोले कि इस पर तो गाना बन सकता है, फूल तुम्हे भेजा है ख़त में, वाह वाह वाह वाह। 'अरे वाह वाह करो तुम', बोले, "फूल तुम्हे भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है", कमाल है! मैंने कहा 'ये लिपस्टिक'? बोले 'भाड़ में जाए लिपस्टिक, इसको आगे बढ़ाते हैं। अब गाना बनने के बाद हुआ क्या कि प, फ, ब, भ, यह तो आप समझ सकते हैं कमल जी कि या तो आप क्रॊस करके गाइए, या लास्ट में आएगा, तो इसके लिए क्या करना पड़ता है, ये मुकेश जी गाने वाले थे, तो जब यह गाना पूरा बन गया तो यह लगा कि ऐसे सिचुयशन पे जो मंझा हुआ चाहिए, वो है कि भाई कोई सहमा हुआ कोई, डायरेक्ट बात भी नहीं की है, "प्रीयतम मेरे मुझको लिखना क्या ये तुम्हारे क़ाबिल है", मतलब वो भी एक इजाज़त ले रही है कि आपके लायक है कि नहीं। यह नहीं कि नहीं नहीं यह तो अपना ही हो गया। वो भी पूछ रही है मेरे से। तो ये मुकेश जी हैं तो पहले "फू...ल", "भू...ल", "भे...जा" भी आएगा, मैंने बोला, 'इंदीवर जी, ऐसा ऐसा है'। बोले कि तुम बनिए के बनिए ही रहोगे, कभी सुधरोगे नहीं तुम। जिसपे गाना हो रहा है, उसको क्या लगेगा? जिसने लिखा है उसको कितना बुरा लगेगा? ऐसे ही रहेगा। तो हमने बोला कि चलो, ऐसे ही रखते हैं। तो उसको फिर गायकी के हिसाब से क्या कर दिया, उसमें ब्रेथ इनटेक डाल दिया, सांस लेके अगर गाया जाए तो "फूल" होगा "फ़ूल" नहीं होगा। बड़ा डेलिकेट, कि वह फ़्लावर था, बहुत नरम नरम, ऐसे ऐसे यह गाना बन गया, लेकिन यह गाना आज भी लोगों को पसंद आता है, क्यों आता है यह समझ में नहीं आता, ये इंदीवर जी का कमाल है, लोगों का कमाल है, उस माहौल का कमाल है!



क्या आप जानते हैं...
कि 'सरस्वतीचन्द्र' के संगीत के लिए कल्याणजी-आनंदजी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. नायिका पर फिल्माया गया है ये गीत, जो नायक के मनोभावों को महसूस कर रही है, किस गायक की आवाज़ है गीत में -२ अंक.
२. हैंडसम हीरो धमेन्द्र हैं फिल्म के नायक, नायिका कौन है - २ अंक.
३. गीतकार कौन हैं - २ अंक.
४. १९७३ में प्रदर्शित इस फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
सिर्फ अवध जी और शरद जी आमने सामने हैं, कहाँ गए बाकी धुरंधर सब ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, June 22, 2010

कांकरिया मार के जगाया.....लता का चुलबुला अंदाज़ और निखरा कल्याणजी-आनंदजी के सुरों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 423/2010/123

ल्याणजी-आनंदजी के स्वरबद्ध गीतों का सिलसिला जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर' के अन्तर्गत। आज कल्याणजी-आनंदजी के संगीत का जो रंग आप महसूस करेंगे, वह रंग है लोक संगीत का, और साथ ही साथ छेड़-छाड़ का, मस्ती का, चुलबुलेपन का। यह एक बेहद यूनिक गीत है। यूनिक इसलिए कहा क्योंकि आम तौर पर हमारी फ़िल्मों में कुछ महफ़िलों में, पार्टियों में गाए जाने वाले किस्म के गीत होते हैं, कुछ लोक नृत्य के गीत होते हैं, और कुछ सड़क पर नाचती गाती टोलियों के टपोरी किस्म के नृत्य गीत होते हैं। लेकिन अगर इन तीनों विविध और एक दूसरे से बिलकुल भिन्न शैलियों को एक ही गाने में इस्तेमाल कर दिया जाए तो कैसा रहेगा? जी हाँ, कल्याणजी-आनंदजी ने यही कमाल तो कर दिखाया है आज के प्रस्तुत गीत में। फ़िल्म 'हिमालय की गोद में' का यह चुलबुला सा गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में आज सुनिए इस महफ़िल में। माला सिंहा, जो एक रस्टिक, यानी कि गाँव की गोरी जो शहरी तौर तरीकों से बिल्कुल बेख़बर है, उसे मनोज कुमार एक शहरी पार्टी में ले जाते हैं और वहाँ उन्हे नृत्य प्रदर्शन करने को कहा जाता है। तब वो इस गीत को गाते हुए नृत्य करती हैं। इस गाने की धुन को सुनते हुए आप सचमुच ही हिमालय की गोद में पहुँच जाएँगे। पहाड़ों का लोक संगीत कितना सुकून दायक होती है, इस गीत के ज़रिए भी महसूस किया जा सकता है। और मैं क्या चीज़ हूँ साहब, इस गाने की तारीफ़ तो सचिन देव बर्मन साहब ख़ुद कर चुके हैं विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में, जिसमें उन्होने यह कहा था - "मुझे सभी संगीतकारों का संगीत अच्छा लगता है, पर इतना समय नहीं है कि मैं आपको सभी के गानें सुनाऊँ। अब मैं बात करता हूँ कल्याणजी-आनंदजी भाइयों की। जैसा उनका नाम वैसा काम। कल्याणजी अपनी धुनों से संगीत का कल्याण करते हैं, और आनंदजी अपनी धुनों से सबको आनंद पहुँचते हैं। वो दोनों बहुत ही हँसमुख और बिना घमण्ड वाले इंसान हैं। उनकी एक रचना मुझे बेहद पसंद है जो लोक गीत पर आधारित है, आप भी सुनिए।" ज़रूर सुनेंगे दोस्तों, लेकिन उससे पहले इस गीत के बनने की कहानी तो जान लीजिए ख़ुद आनंदजी से।

कमल शर्मा: आनंदजी, आपका कोई गाना, मार्केट में कोई लड़की जो दातून से किसी को मार रही थी, सुना है उससे भी कोई गाना आपने बनाया था? वह कौन सा गाना था?

आनंदजी: (हंसते हुए) अब बातों ही बातों में आप बहुत सारी बातें निकलवा रहे हैं! देखिए, हर सिचुयशन जो है गाने की, उसके पीछे 'इन्स्पिरेशन' कोई ना कोई तो ज़रूर होगा। तो गिरगाम में हम रहते थे, तो दतवाँ (दातून), हम बनिए लोग जो हैं, दतवाँ कहते हैं, तो दतवाँ लेने के लिए पिताजी ने मुझे भेजा। वो बोलते थे कि दतवाँ जो अच्छी ले आए वो समझदार लड़का है। तो ये है कि एक्ज़ाम्पल होता था। तो दतवाँ लेने के लिए भेजा मुझे तो वहाँ दतवाँ काटने वाली लड़की जो है, वो लड़की दतवाँ काट रही थी और उसके बीच में जो होती है ना, गठान, उसको काट के फेंक देती है, बैठे बैठे वो सामने वाले लड़के को मार रही थी। तो वो भी चिल्ला के बोला 'ए क्या कर रही है तू, ये क्या कर रही है तू?' लड़की बोली कि 'तू भी मार ना!' तो ये एक मुखड़ा आ गया कि यह एक ऐंगल रोमांस का भी है। तो उसको उस भाषा में तो लिख नहीं सकते थे, कंकरिया मार के इशारे, तो जहाँ पे ऐसी सिचुएशन आएगी, उसको हम डाल देंगे, मटके के साथ, वगेरह!

तो आइए दोस्तों, इस थिरकते गीत का आनंद लेते हैं और साथ ही साथ सलाम करते हैं मनोज कुमार और कल्याणजी-आनंदजी की तिकड़ी को! आपको बता दें इस गीत के गीतकार हैं आनंद बक्शी साहब।



क्या आप जानते हैं...
कि 'सहेली' का "जिस दिल में बसा था प्यार तेरा" १९६५ की बिनाका गीतमाला की सालाना पायदान का गीत नम्बर एक बना था, तो इसी साल मुकेश की ही आवाज़ में 'हिमालय की गोद' में का "मैं तो एक ख़्वाब हूँ" ने म्युज़िक डायरेक्टर्स ऐसोसिएशन द्वारा प्रदत्त सर्वश्रेष्ठ गीत का पहला पुरस्कार जीता था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस खूबसूरत से युगल गीत के गीतकार बताएं -२ अंक.
२. मुखड़े में शब्द है "मोती", फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
३. एक मशहूर उपन्यास पर आधारित है ये फिल्म, जिसे ४ खण्डों में लिखा गया है, किस मूल भाषा में है ये कृति - २ अंक.
४. ये गीत किस नायक नायिका पर फिल्माया गया है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार अवध जी पहले आये और ३ अंक चुरा ले गए, शरद जी को दो अंक मिलेंगें पर इंदु जी, इस बार आपका तुक्का नहीं चलेगा. पूर्वी जी आपको बहुत दिनों बाद यहाँ देख बहुत अच्छा लगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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