Showing posts with label dilip kumar. Show all posts
Showing posts with label dilip kumar. Show all posts

Saturday, January 7, 2017

चित्रकथा - 1: उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान


अंक - 1

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान

“मधुबन में राधिका नाची रे...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

4 जनवरी 2017 को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हालीम जाफ़र ख़ाँ साहब के निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। पद्मभूषण, पद्मश्री, और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का शास्त्रीय-संगीत जगत के साथ-साथ फ़िल्म-संगीत जगत में भी योगदान स्मरणीय है। आइए आज ’चित्रकथा’ के माध्यम से याद करें कुछ ऐसे प्रसिद्ध गीतों को जिन्हें ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगा दिए।





"बहुत गुणी सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का आज देहान्त हुआ। मुझे बहुत दुख हुआ, हमने साथ में बहुत काम किया है। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे! मेरी उनको भावभीनी श्रद्धांजली।"
-- लता मंगेशकर
4 जनवरी 2017


भारतीय सिने संगीत को समृद्ध करने में जितना योगदान संगीतकारों, गीतकारों और गायक-
गायिकाओं का रहा है, उतना ही अमूल्य योगदान रहा है शास्त्रीय संगीत के महान कलाकारों का, जिन्होंने अपने संगीत ज्ञान और असामान्य कौशल से बहुत से फ़िल्मी गीतों को बुलन्दी प्रदान किए हैं, जो अच्छे संगीत रसिकों के लिए किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं। उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के निधन से सितार जगत का एक चमकता सितारा डूब गया। अब्दुल हलीम साहब का जन्म इन्दौर के पास जावरा ग्राम में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बम्बई स्थानान्तरित हो गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने के कारण हलीम साहब का संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था। उनकी प्रारंभिक सितार-शिक्षा प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। उसके बाद उस्ताद महबूब खाँ साहब से सितार की उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त की। अच्छी शिक्षा और अपने आप में लगन, धैर्य और समर्पण से उन्होंने जल्दी ही अपनी कला में पूरी दक्षता प्राप्त कर ली।

फ़िल्मों में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का प्रवेश उनकी इच्छा नहीं बल्कि उनकी ज़रूरत थी। पिता की मृत्यु के कारण उनके सामने आर्थिक समस्या आन पड़ी, और घर का चुल्हा जलता रहे, इस उद्येश्य से उन्हें फ़िल्म जगत में जाना ही पड़ा। कलाकार में कला हो तो वो किसी भी क्षेत्र में कामयाब होता है। हलीम साहब को फ़िल्म-संगीत में कामयाबी मिली और पूरे देश में लोग उन्हें जानने लगे, फ़िल्मी गीतों में उनके बजाए सितार के टुकड़ों को सुन कर भाव-विभोर होने लगे। कहा जाता है कि फ़िल्मों में उन्हें लाने का श्रेय संगीतकार ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर को जाता है जिन्होंने 1947 की फ़िल्म ’परवाना’ के गीतों में उन्हें सितार के टुकड़े बजाने का मौका दिया। यह फ़िल्म पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुन्दन लाल सहगल की अन्तिम फ़िल्म थी। सहगल साहब की आवाज़ में "मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है" और "टूट गए सब सपने मेरे" गीतों और इस फ़िल्म के कुछ और गीतों में हलीम साहब का सितार सुनाई दिया।

1952 में ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर के पाक़िस्तान स्थानान्तरित हो जाने के बाद हलीम साहब और
संगीतकार वसन्त देसाई ने साथ में ’राजकमल कलामन्दिर’ के लिए काफ़ी काम किया। मधुरा पंडित जसराज की पुस्तक ’V. Shantaram - The Man who changed Indian Cinema' में हलीम जाफ़र ख़ान को फ़िल्मों में लाने का श्रेय संगीतकार वसन्त देसाई को दिया है। इस पुस्तक में प्रकशित शब्दों के अनुसार - "Vasant Desai travelled across North India and familiarized himself with many folk styles of singing and music. He invited to Bombay tabla maestro Samta Prasad from Benaras, Sudarshan Dheer from Calcutta to play the Dhol, Ustad Abdul Haleem Jafar Khan, a virtuoso with the sitar, and many more musicians." 1951 में ’राजकमल’ की मराठी फ़िल्म ’अमर भोपाली’ में संगीत देकर वसन्त देसाई को काफ़ी ख्याति मिली। 1955 में शान्ताराम ने बनाई एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’झनक झनक पायल बाजे’, जिसके लिए उन्होंने पूरे देश भर में घूम-घूम कर एक से एक बेहतरीन संगीतज्ञों का चयन किया। संगीत-नृत्य प्रधान इस फ़िल्म के लिए उन्होंने शामता प्रसाद (तबला), शिव कुमार शर्मा (संतूर) और अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ (सितार) को चुना। अभिनेत्री संध्या और विख्यात नृत्यशिल्पी गोपी कृष्ण के जानदार अभिनय और नृत्यों से, शान्ताराम की प्रतिभा से तथा वसन्त देसाई व शास्त्रीय संगीत के उन महान दिग्गजों की धुनों से इस फ़िल्म ने एक इतिहास की रचना की। बताना ज़रूरी है कि केवल इस फ़िल्म के गीतों में ही नहीं बल्कि फ़िल्म के पूरे पार्श्वसंगीत में भी हलीम साहब ने सितार बजाया है।

वसन्त देसाई के यूं तो बहुत से गीतों में हलीम साहब ने सितार बजाए हैं, पर जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही वह थी 1959 की ’गूंज उठी शहनाई’। यह फ़िल्म एक शहनाई वादक के जीवन की कहानी है और इस फ़िल्म के गीतों और पार्श्वसंगीत में शहनाई बजाने वाले और कोई नहीं ख़ुद उस्ताद बिस्मिलाह ख़ाँ साहब थे। ऐसे में सितार के लिए अब्दुल हलीम साहब को लिया गया। यही नहीं इस फ़िल्म में ख़ास तौर से एक जुगलबन्दी रखी गई इन दो महान फ़नकारों की। शहनाई और सितार की ऐसी जुगलबन्दी और वह भी ऐसे दो बड़े कलाकारों की, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था किसी फ़िल्म में। यह जुगलबन्दी राग चाँदनी केदार पर आधारित थी।

संगीतकार सी. रामचन्द्र के गीतों को भी अपनी सुरीली सितार के तानों से सुसज्जित किया अब्दुल हलीम साहब ने। इसका श्रेष्ठ उदाहरण है 1953 की प्रसिद्ध फ़िल्म ’अनारकली’ के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "ये ज़िन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया"। यह गीत लता मंगेशकर के पसन्दीदा गीतों में शामिल है। लता जी का ही चुना हुआ एक और पसन्दीदा गीत है सलिल चौधरी के संगीत में "ओ सजना बरखा बहार आई"। इस लोकप्रिय गीत में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब के सितार के कहने ही क्या! कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनमें बजने वाले म्युज़िकल पीसेस याद रह जाते हैं। और जब जब ऐसे गीतों को गाया जाता है, तो इस म्युज़िकल पीसेस को भी साथ में गुनगुनाया जाता है, वरना गीत अधूरा लगता है। इस पूरे गीत में हलीम साहब का सितार ऐसा गूंजा है कि इसके तमाम पीसेस श्रोताओं के दिल-ओ-दिमाग़ में रच बस गए हैं। ज़रा याद कीजिए लता जी के मुखड़े में "ओ सजना" गाने के बाद बजने वाले सितार के पीस को। 1960 की इस फ़िल्म ’परख’ के इस गीत के बारे में बताते हुए लता जी ने हलीम साहब को भी याद किया था - "मुझे इस गीत से प्यार है। सलिल ने बहुत सुन्दरता से इसकी धुन बनाई है और शैलेन्द्र जी के बोलों को बहुत सुन्दर तरीके से इसमे मिलाया है। बिमल रॉय का साधना पर कैमरा वर्क और बारिश का कोज़-अप अपने आप में अद्भुत है। इस गीत की मेलडी अविस्मरणीय इस कारण से भी है कि इसे अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब जैसे गुणी कलाकार ने सितार के सुन्दर संगीत से सजाया है।"

शास्त्रीय संगीत को अपने फ़िल्मी गीतों में उच्चस्तरीय जगह देने में संगीतकार नौशाद का कोई सानी
नहीं। नौशाद साहब ने भी हलीम साहब के सितार का कई महत्वपूर्ण फ़िल्मों में प्रयोग किया। ’मुग़ल-ए-आज़म’ जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्म के समूचे पार्श्वसंगीत में सितार बजाने का दायित्व हलीम साहब को देकर के. आसिफ़ ने अपनी फ़िल्म को इज़्ज़त बख्शी। नौशाद साहब के ही शब्दों में - "उन्होंने (हलीम साहब ने) ना केवल फ़िल्म-संगीत को समृद्ध किया बल्कि मेरे गीतों को इज़्ज़त बक्शी"। 1960 की ही एक और फ़िल्म थी ’कोहिनूर’ जिसमें नौशाद का संगीत था। इस फ़िल्म का मशहूर गीत "मधुबन में राधिका नाची रे" हलीम साहब के सितार के लिए भी जाना जाता है। इस गीत से जुड़ा एक रोचक प्रसंग का उल्लेख किया जाए! नौशाद साहब के शब्दों में, "राग हमीर पर फ़िल्म ’कोहिनूर’ का एक गाना था जिसमें दिलीप साहब सितार बजाते हैं। दिलीप साहब एक दिन मुझसे कहने लगे कि यह क्या पीस बनाया है आपने, मैं फ़िल्म में कैसे अपनी उंगलियों को म्युज़िक के साथ मिला पायूंगा? मैंने कहा कि घबराइए नहीं, क्लोज़-अप वाले शॉट्स में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब की उंगलियों के क्लोज़-अप ले लेंगे, किसी को पता नहीं चलेगा। तो दिलीप साहब ने कहा कि फिर आप ऐक्टिंग् भी उन्हीं से करवा लीजिए! फिर कहने लगे कि मैं ख़ुद यह शॉट दूंगा। फिर वो ख़ुद सितार सीखने लग गए हलीम जाफ़र साहब से। वो तीन-चार महीनों तक सीखे, उन्होंने कह रखा था कि ये सब क्लोज़-अप शॉट्स बाद में फ़िल्माने के लिए। तो जिस दिन यह फ़िल्माया गया मेहबूब स्टुडियो में, शूटिंग् के बाद वो मुझसे आकर कहने लगे कि चलिए साथ में खाना खाते हैं। मैंने कहा बेहतर है। मैंने देखा कि उनके हाथ में टेप बंधा हुआ है। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो बोले कि आप की ही वजह से यह हुआ है, इतना मुश्किल पीस दे दी आपने, उंगलियाँ कट गईं मेरी शॉट देते देते। तो साहब, ऐसे फ़नकारों की मैं क्या तारीफ़ करूँ!" तो इस तरह से हलीम साहब ने दिलीप कुमार को सितार की शिक्षा दी, और रफ़ी साहब और उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की आवाज़ों में यह कालजयी रचना रेकॉर्ड हुई।

इन्टरनेट पर प्रकाशित कुछ सूत्रों में हलीम साहब द्वारा संगीतकार मदन मोहन के गीतों में सितार बजाए जाने की बात कही गई है जो सत्य नहीं है। मदन मोहन जी की सुपुत्री संगीता गुप्ता जी से पूछने पर पता चला कि मदन मोहन जी के गीतों में अधिकतर उस्ताद रईस ख़ाँ, उस्ताद विलायत ख़ाँ, और बाद के बरसों में शमिम अहमद ने सितार बजाए।

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ सितार के एक किंवदन्ती हैं। उनकी मृत्यु से शास्त्रीय संगीत जगत के सितार के क्षेत्र में जो शून्य पैदा हुई है उसे भर पाना मुश्किल है। फ़िल्म-संगीत के रसिक आभारी रहेंगे हलीम साहब के जिन्होंने अपने सितार के जादू से फ़िल्मी गीतों को एक अलग ही मुकाम दी।


आपकी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, December 18, 2016

राग हमीर : SWARGOSHTHI – 297 : RAG HAMIR




स्वरगोष्ठी – 297 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 10 : राग हमीर का रंग

“मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग हमीर पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम अगले सप्ताह 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



नौशाद और  मोहम्मद  रफी
ज हम आपको नौशाद द्वारा राग हमीर के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते है। यह गीत 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से लिया गया है। इसका संगीत नौशाद ने तैयार किया किया है और इसे उनके सर्वप्रिय गायक मोहम्मद रफी ने स्वर दिया है। नौशाद का संगीतकार जीवन 1939-40 से शुरू हुआ था। 1944 में एक फिल्म ‘पहले आप’ बनी थी। इस फिल्म में मोहम्मद रफी को पहली बार गाने का अवसर मिला था। यह गीत था –‘हिंदुस्तान के हम हैं हिंदुस्तान हमारा...’। इस गीत में श्याम, दुर्रानी और रफी के साथ अन्य आवाज़ें भी थी। इस गीत के बाद से लेकर मोहम्मद रफी के अन्तिम समय तक नौशाद के सर्वप्रिय गायक बने रहे। नौशाद के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी ने अनेक राग आधारित गीत गाये हैं। इन्हीं में से फिल्म कोहिनूर का यह गीत भी है। गीत में राग हमीर के स्वरों का असरदार ढंग से पालन किया गया है। परदे पर यह गीत दिलीप कुमार पर फिल्माया गया है। गीत में एक स्थान पर द्रुत लय में मोहम्मद रफी को आकार में तानें लेनी थी, परन्तु यह मुश्किल काम वे कर नहीं पा रहे थे। नौशाद ने तानों का यह काम सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ से सम्पन्न कराया। गीत में सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र खाँ का योगदान भी रहा। लीजिए, अब आप शकील बदायूनी का लिखा, तीनताल में निबद्ध यही गीत सुनिए, जिसके बोल हैं –‘मधुबन में राधिका नाचे रे...’

राग हमीर : ‘मधुबन में राधिका नाचे रे...’ : मोहम्मद रफी और उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म कोहिनूर



उस्ताद  विलायत  खाँ
दिन के पाँचवें प्रहर या रात्रि के पहले प्रहर में गाने-बजाने वाला, दोनों मध्यम स्वर से युक्त एक राग है, हमीर। मूलतः राग हमीर दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति से इसी नाम से उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित राग के समतुल्य है। राग हमीर को कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होने और तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग होने के कारण कुछ प्राचीन ग्रन्थकार और कुछ आधुनिक संगीतज्ञ इसे बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। ऐसा मानना तर्कसंगत भी है, क्योंकि इस राग का स्वरूप राग बिलावल से मिलता-जुलता है। किन्तु अधिकांश विद्वान राग हमीर को कल्याण थाट-जन्य ही मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम स्वर के साथ शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यहाँ भी रागों के गायन-वादन के समय सिद्धान्त और व्यवहार में विरोधाभास है। समय सिद्धान्त के अनुसार जिन रागों का वादी स्वर पूर्व अंग का होता है उस राग को दिन के पूर्वांग अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। इसी प्रकार जिन रागों का वादी स्वर उत्तर अंग का हो उसे दिन के उत्तरांग में अर्थात मध्यरात्रि 12 से मध्याह्न 12 बजे के बीच प्रस्तुत किया जाना चाहिए। परन्तु राग हमीर का वादी स्वर धैवत है, अर्थात उत्तर अंग का स्वर है। स्वर सिद्धांत के अनुसार इस राग को दिन के उत्तरांग में गाया-बजाना जाना चाहिए। परन्तु राग हमीर रात्रि के पहले प्रहर में अर्थात दिन के पूर्वांग में गाया-बजाया जाता है। सिद्धान्त और व्यवहार में परस्पर विरोधी होते हुए राग हमीर को समय सिद्धान्त का अपवाद मान लिया गया है। अब हम आपको राग हमीर का गायन और सितार वादन सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं अद्वितीय सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ। संगीत-प्रेमी जानते हैं कि उस्ताद विलायत जब अपनी कोई मनपसन्द बन्दिश बजाते थे तब प्रायः वह उस बन्दिश का गायन भी किया करते थे। इस रिकार्डिंग में राग हमीर की एक बन्दिश – “अचानक मोहें पिया के जगाए...” बजाने के साथ-साथ उन्होने इसका मधुर गायन भी प्रस्तुत किया है। आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग हमीर : गायन और सितार वादन : “अचानक मोहें पिया के जगाए...” : उस्ताद विलायत खाँ



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1962 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस पहेली के सम्पन्न होने के उपरान्त जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। नये वर्ष 2017 के पहले और दूसरे अंक में हम 2016 की पहेली के महाविजेताओं और उनकी प्रस्तुतियों से आपका परिचय कराएँगे।





1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – आप इस गीत मुख्य गायिका के स्वर को पहचान कर उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 दिसम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 299वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 295 वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित लोकप्रिय फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ से राग पर केन्द्रित गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है – स्वर – उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

इस बार की पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

 मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी हमारी ताज़ा लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के इस अंक में हमने आपको सुनवाने के लिए राग हमीर पर चर्चा की। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने में हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को श्रृंखला की समापन कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

यो प्लेबैक इण्डिया 


Sunday, December 11, 2016

राग सोहनी : SWARGOSHTHI – 296 : RAG SOHANI




स्वरगोष्ठी – 296 में आज


नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 9 : राग सोहनी का गीत

“प्रेम जोगन बन के, सुन्दर पिया ओर चली...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग सोहनी पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



उस्ताद  बड़े  गुलाम  अली  खाँ 
भारतीय फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की। खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने अपने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत नौशाद और के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत गाया - ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए। लीजिए, आप उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में ढला यह गीत सुनिए।

राग सोहनी : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : फिल्म – मुगल-ए-आजम


पण्डित  उल्हास  कशालकर 
राग सोहनी मारवा थाट का बेहद लोकप्रिय राग है। सुप्रसिद्ध मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने राग सोहनी के बारे में बताया कि राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। इस राग का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है। पहले प्रकार, औडव-षाड़व जाति के अन्तर्गत आरोह में ऋषभ और पंचम तथा अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता। राग के दूसरे स्वरूप के आरोह में ऋषभ और अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं होता। राग सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रे(कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी, कर्नाटक संगीत के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया जाता है। अब हम आपको राग मारवा के यथार्थ शास्त्रीय स्वरूप की अनुभूति कराने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में राग सोहनी में निबद्ध दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। मध्यलय खयाल के बोल हैं – “जियरा रे कल नाहि पावे....” और द्रुतलय खयाल के बोल हैं – “देख वेख मन ललचाए...”। यह रिकार्डिंग हमें लखनऊ की सुप्रसिद्ध संगीत संस्था ‘आकर्षण’ के सौजन्य से प्राप्त हुई है। इस संस्था ने 2007 में प्रोफेसर कृष्णकुमार कपूर की स्मृति में आयोजित संगीत सभा में पण्डित उल्हास कशालकर को आमंत्रित किया था। आप राग सोहनी के खयाल सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग सोहनी : “जियरा रे...” और “देख वेख मन ललचाए...” पण्डित उल्हास कशालकर




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 296वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित राग आधारित गीतों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हिन्दी फिल्म के एक गीत का अंश सुनवाते हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की पहेली का उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। नये वर्ष 2017 के पहले और दूसरे अंक में हम वर्ष के महाविजेताओं की घोषणा करेंगे।






1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप इस पार्श्वगायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 17 दिसम्बर 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 298वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 294 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मदर इण्डिया’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – मन्ना डे

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई। 


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के आज के अंक में आपने राग सोहनी के स्वरों में पिरोये एक गीत और खयाल का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
यो प्लेबैक इण्डिया 

Monday, April 11, 2011

लागी नाहीं छूटे....देखिये अज़ीम कलाकार दिलीप साहब ने भी क्या तान मिलायी थी लता के साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 632/2010/332

मस्कार! 'ओल्ड इज़ ओल्ड' पर कल से हमनें शुरु की है लघु शृंखला 'सितारों की सरगम'। पहली कड़ी में कल आपने सुना राज कपूर का गाया गीत। 'शोमैन ऒफ़ दि मिलेनियम' के बाद आज बारी 'अभिनय सम्राट' की, जिन्हें 'ट्रेजेडी किंग्' भी कहा जाता है। जी हाँ, यूसुफ़ ख़ान यानी दिलीप कुमार। युं तो हम दिलीप साहब को एक अभिनेता के रूप में ही जानते हैं, पुराने फ़िल्म संगीत में रुचि रखने वाले रसिकों को मालूम होगा दिलीप साहब के गाये कम से कम एक गीत के बारे में, जो है फ़िल्म 'मुसाफ़िर' का, "लागी नाही छूटे रामा चाहे जिया जाये"। लता मंगेशकर के साथ गाया यह एक युगल गीत है, जिसका संगीत तैयार किया था सलिल चौधरी नें। 'फ़िल्म-ग्रूप' बैनर तले निर्मित इसी फ़िल्म से ऋषिकेश मुखर्जी नें अपनी निर्देशन की पारी शुरु की थी। १९५७ में प्रदर्शित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे दिलीप कुमार, उषा किरण और सुचित्रा सेन। पूर्णत: शास्त्रीय संगीत पर आधारित बिना ताल के इस गीत को सुन कर दिलीप साहब को सलाम करने का दिल करता है। एक तो कोई साज़ नहीं, कोई ताल वाद्य नहीं, उस पर शास्त्रीय संगीत, और उससे भी बड़ी बात कि लता जी के साथ गाना, यह हर किसी अभिनेता के बस की बात नहीं थी। वाक़ई इस गीत को सुनने के बाद मन में यह सवाल उठता है कि दिलीप साहब बेहतर अभिनेता हैं या बेहतर गायक। इस ६:३० मिनट गीत से आज रोशन हो रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल। वैसे दोस्तों, यह गीत एक पारम्परिक ठुमरी है राग पीलू पर आधारित, जिसका सलिल दा ने एक अनूठा प्रयोग किया इसे लता और दिलीप कुमार से गवा कर। लता जी पर राजू भारतन की चर्चित किताब 'लता मंगेशकर - ए बायोग्राफ़ी' में इस गीत के साथ जुड़ी कुछ दिलचस्प बातों का ज़िक्र हुआ है। आपको पता है इस गीत की रेकॊर्डिंग् से पहले दिलीप साहब को एक के बाद एक तीन ब्रांडी के ग्लास पिलाये गये थे?

आज क्योंकि लता जी और दिलीप साहब की चर्चा एक साथ चल पड़ी है, तो इन दोनों से जुड़ी कुछ बातें भी हो जाए! एक मुलाक़ात में लता जी ने दिलीप साहब से कहा था, "दिलीप साहब, याद है आपको, १९४७ में, मैं, आप और मास्टर कम्पोज़र अनिल बिस्वास, हम तीनों लोकल ट्रेन में जा रहे थे। अनिल दा नें मुझे आप से मिलवाया एक महाराष्ट्रियन लड़की की हैसियत से और कहा कि ये आने वाले कल की गायिका बनेगी। आपको याद है दिलीप साहब कि आप ने उस वक़्त क्या कहा था? आप नें कहा था, "एक महाराष्ट्रियन, इसकी उर्दू ज़बान कभी साफ़ नहीं हो सकती!" इतना ही नहीं, आप नें यह भी कहा था कि "इन महाराष्ट्रियनों के साथ एक प्रॊबलेम होता है, इनके गानें में दाल-भात की बू आती है।" आपके ये शब्द मुझे चुभे थे। इतने चुभे कि अगले ही सुबह से मैंने सीरीयस्ली उर्दू सीखना शुरु कर दिया सिर्फ़ इसलिए कि मैं दिलीप कुमार को ग़लत साबित कर सकूँ।" और दिलीप साहब नें १९६७ में लता जी के गायन करीयर के सिल्वर जुबिली कॊनसर्ट में इस बात का ज़िक्र किया और अपनी हार स्वीकारी। राजू भारतन नें सलिल दा से एक बार पूछा कि फ़िल्म 'मुसाफ़िर' के इस गीत के लिए दिलीप साहब को किसनें सिलेक्ट किया था। उस पर सलिल दा का जवाब था, "दिलीप नें ख़ुद ही इस धुन को उठा ली; वो इस ठुमरी का घंटों तक सितार पर रियाज़ करते और इस गीत में मैंने कम से कम ऒर्केस्ट्रेशन रखा था। मैंने देखा कि जैसे जैसे रेकॊर्डिंग् पास आ रही थी, दिलीप कुछ नर्वस से हो रहे थे। और हालात ऐसी हुई कि दिलीप आख़िरी वक़्त पर रेकॊर्डिंग् से भाग खड़े होना भी चाहा। ऐसे में हमें उन्हें ब्रांडी के पेग पिलाने पड़े उन्हें लता के साथ खड़ा करवाने के लिए।" तो दोस्तों, इन दिलचस्प बातों को पढ़कर इस गीत को सुनने का मज़ा दुगुना हो जाएगा, आइए अब गीत सुना जाए।



क्या आप जानते हैं...
कि आज के प्रस्तुत गीत की रेकॊर्डिंग् के बाद दिलीप कुमार और लता मंगेशकर में बातचीत १३ साल तक बंद रही। दरअसल दिलीप साहब को पता नहीं क्यों ऐसा लगा था कि इस गीत में लता जी जान बूझ कर उन्हें गायकी में नीचा दिखाने की कोशिश कर रही हैं, हालाँकि ऐसा सोचने की कोई ठोस वजह नहीं थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक शायरा भी थी ये सशक्त अभिनेत्री जिनकी आवाज़ है इस गीत में.

सवाल १ - कौन है ये गायिका - १ अंक
सवाल २ - सह गायक कौन हैं इस युगल गीत में उनके - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अनजाना जी, प्रतीक जी और रोमेंद्र जी को बधाई. अमित जी कहाँ गायब रहे कल दिन भर :), हिन्दुस्तानी जी आपके सुझाव पर अवश्य काम करेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, May 28, 2009

जिसे तू कबूल कर ले वो अदा कहाँ से लाऊं....पूछा था चंद्रमुखी से देव बाबू से लता के स्वर में.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 94

न्यू थियटर्स के प्रमथेश चंद्र बरुवा ने सन् १९३५ में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के मशहूर उपन्यास 'देवदास' को पहली बार रुपहले परदे पर साकार किया था। यह फ़िल्म बंगला में बनायी गयी थी और बेहद कामयाब रही। देवदास की भूमिका में कुंदन लाल सहगल ने हर एक के दिल को छू लिया। बंगाल में इस फ़िल्म की अपार सफलता से प्रेरित होकर बरुवा साहब ने इस फ़िल्म को हिंदी में बना डाली उसी साल और पूरे देश भर में सहगल दर्द का पर्याय बन गए। जमुना, राजकुमारी (कलकत्ता) और पहाड़ी सान्याल ने कमश: पारो, चंद्रमुखी और चुन्नी बाबू की भूमिकायें निभायी। इसके बाद सन् १९५५ में लोगों ने देवदास को तीसरी बार के लिये परदे पर तब देखा (हिंदी में दूसरी बार) जब बिमल राय ने 'ट्रेजेडी किंग' दिलीप कुमार को देवदास की भूमिका में प्रस्तुत करने का बीड़ा उठाया। उस समय दिलीप कुमार के अलावा इस चरित्र के लिये किसी और का नाम सुझाना नामुमकिन था। दिलीप साहब हर एक की उम्मीदों पर खरे उतरे और उन्हे इस फ़िल्म के लिए उस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला। पारो और चंद्रमुखी की भूमिकायों में थीं सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला। मोतीलाल बने चुन्नी बाबू। कहा जाता है कि वैजयंतीमाला को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार दिया गया था लेकिन उन्होने यह कहकर पुरस्कार लेने से मना कर दिया कि वो उस फ़िल्म में सह-अभिनेत्री नहीं बल्कि मुख्य अभिनेत्री थीं। पारो और चंद्रमुखी के किरदार ऐसे हैं इस उपन्यास मे कि वाक़ई यह बताना मुश्किल है कि कौन 'मुख्य' हैं और कौन 'सह'। साहिर लुधियानवी ने फ़िल्म के गाने लिखे और सचिन देव बर्मन ने बंगाल के लोक संगीत के अलग अलग विधाओं जैसे कि कीर्तन, भटियाली और बाउल संगीत के इस्तेमाल से इस फ़िल्म के गीतों में ऐसा संगीत दिया जो कहानी के स्थान, काल, और पात्रों को पूरी तरह से समर्थन दिये।

चंद्रमुखी के किरदार में वैजयंतीमाला ने अपनी नृत्यकला से दर्शकों का मन जीत लिया। लता मंगेशकर के गाये मुजरा गीतों के साथ उन्होने ऐसी अदायें बिखेरीं कि जब भी कोई गीत शुरु होता, लोग थियटर स्क्रीन पर पैसे फेंकने लग जाते। "दिलदार के क़दमों में दिलदार का नज़राना, महफ़िल में उठा और यह कहने लगा दीवाना, अब आगे तेरी मरज़ी ओ मोरे बालमा बेदर्दी", या फिर "ओ आनेवाले रुक जा कोई दम, रस्ता घेरे हैं बाहर लाखों ग़म" जैसे मुजरा गीतों पर दर्शकों ने काफ़ी पैसे लुटाये। लेकिन लताजी का गाया जो सबसे प्रसिद्ध गाना था वह था "जिसे तू क़बूल कर ले वो अदा कहाँ से लाऊँ, तेरे दिल को जो लुभा ले वो सदा कहाँ से लाऊँ"। चंद्रमुखी यह गीत उस वक़्त गाती है जब वो देवदास के दिल में अपने लिए प्यार उत्पन्न करने में नाकामयाब हो जाती हैं, क्यूंकि देवदास को पारो के अलावा और किसी चीज़ में कोई दिलचस्पी ही नहीं! साहिर साहब ने इस गीत में चंद्रमुखी के जज़्बात को बहुत सुंदरता से उभारा है, जब वो लिखते हैं कि "तुझे और की तमन्ना मुझे तेरी आरज़ू है, तेरे दिल में ग़म ही ग़म है मेरे दिल में तू ही तू है, जो दिलों को चैन दे दे वो दवा कहाँ से लाऊँ, तेरे दिल को जो लुभा ले वो सदा कहाँ से लाऊँ"। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी लाजवाब गीत की बारी, सुनिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सुमन कल्याणपुर और मीनू पुरुषोत्तम की आवाजें.
२. साहिर का लिखा और रोशन का स्वरबद्ध ये गीत जिस फिल्म का है उसके सभी गीत मकबूल हुए थे और फिल्म भी सफल थी.
३. मुखड़े में आता है -"हाथ न लगाना".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी लगातार शतक पे शतक मार रहे हैं. मनु जी और गुडू का भी जवाब सही है बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Tuesday, January 6, 2009

ताल से ताल मिला - रहमान के साथ

मोजार्ट ऑफ़ मद्रास को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाओं सहित -
बात तब की है, जब रहमान "गुरू" फिल्म के गाने रिकार्ड कर रहे थे। "नुसरत" साहब के एक बहुत हीं सोफ्ट-से गाने "सजना तेरे बिना" ने उन्हें बेहद प्रभावित किया था। गौरतलब बात है कि "रहमान" की गिनती नुसरत साहब के बड़े फैन्स में की जाती है। रहमान भी "सजना तेरे बिना" जैसा हीं कोई सोफ्ट-सा गाना तैयार करना चाहते थे। "नुसरत" साहब का या फिर कहिये उनकी दुआओं का यह असर हुआ कि २५ मिनट का गाना बन कर तैयार हो गया। छ:-सात मुखरों से सजे इस गाने की एडिटिंग शुरू हुई और अंतत: गाने को इसकी मुकम्मल और संतुलित लंबाई मिल गई। मज़े की बात यह है कि इस गाने से पहले रहमान ने "ऎ हैरते आशिकी" गाना भी बना लिया था. "ऎ हैरते आशिकी" के पीछे का वाक्या भी बड़ा हीं मज़ेदार है। अमीर खुसरो के एक नज़्म "ये शरबती आशिकी" ने "रहमान" पर गहरा असर किया था। रहमान इसे धुनों में उतारना चाहते थे, लेकिन फारसी की बहुलता आड़े आ रही थी। तब खेवनहार के तौर पर आए "गुलज़ार साहब" जिन्होने "ये शरबती आशिकी" को अलग हीं अंदाज़ देकर बना दिया "ऎ हैरते आशिकी",जिसे "क्यूँ उर्दू-फारसी बोलते हो, दस कहते हो, दो तोलते हो" जैसे मिसरों ने मिश्री-सा मीठा कर दिया। तो हाँ हम बात कर रहे थे उस २५ मिनट के गाने की। "गुरू" के निर्देशक मणिरत्नम को "ऎ हैरते आशिकी" भारी-भरकम-सा लग रहा था, जिसे वो फिल्म की शुरूआत में नहीं डालना चाहते थे। तब नुसरत साहब की दुआओं से उपजे गाने को फिल्म का पहला गाना बनने का मौका मिला। वह गाना था "तेरे बिना" ("सजना तेरे बिना" से "सजना" को देशनिकाला मिल गया ) । इस गाने को रहमान ने कादिर खान और चिन्मयी की आवाज़ों में रिकार्ड कर लिया । लेकिन तभी मणिरत्नम को "दिल से" के "दिल से" की याद आ गई। मणिरत्नम जिद्द पर अड़ गए कि यह गाना अगर रहमान खुद नहीं गाते तो गाना फिल्म में रहेगा हीं नहीं। रहमान द्वंद्व में, कादिर खान के साथ धोखा भी नहीं कर सकते थे,लेकिन गाना भी प्यारा था । अंतत: रहमान ने हामी भर दी और हमें रहमान की आवाज़ में प्यारा-सा गाना सुनने को मिल गया। वैसे गाने में कादिर खान की आवाज़ है, लेकिन महज़ आलाप में हीं।

कादिर खान की आवाज़ में "तेरे बिना" यहाँ सुने-



सौम्या राव की आवाज़ में "शौक है" सुनें,जिसे ओडियो में रीलिज नहीं किया गया, लेकिन फिल्म में विद्या बालन और माधवन पर फिल्माया गया था।


यह तो हम सभी जानते हैं कि रहमान का वास्तविक नाम "दिलीप कुमार" है। रहमान जब रहमान नहीं थे, बल्कि अपने दोस्तों के साथ संगीत तैयार करने वाले "दिलीप" थे, तब उन्होंने "शुभा" नाम की एक गायिका के साथ "सेट मी फ्री" (set me free) नाम का अंग्रेजी गानों का एलबम तैयार किया था। यह बात "रोजा" के रीलिज होने से पहले की है। इस एलबम को "मैंग्नासाउंड" नाम की कंपनी ने रीलिज किया था। चूँकि संगीतकार नया था, गीतकार नया था, गायिका नयी थी और लोगों की पसंद पुराने ढर्रे की, "सेट मी फ्री" कुछ ज्यादा कमाल नहीं कर सकी। दो साल बाद "रोज़ा" रीलिज हुई और "रहमान" रातोंरात अव्वल नंबर के संगीतकारों में शुमार हो गए । "रोज़ा" में पहली बार दिलीप को "ए०आर०रहमान" के रूप में पेश किया गया था। "दिलीप" के "ए०आर०रहमान" बनने की कहानी जितनी दु:खद(पिता की मृत्य, बहन की लाईलाज बिमारी)है,उतनी हीं रोमांचक भी है। "दिलीप" के पूरे परिवार ने धर्म-परिवर्तन का फैसला कर लिया था। "दिलीप" की माँ ज्योतिष में बेहद यकीन करती थी। चेन्नई के जानेमाने ज्योतिष "उलगनथम" के पास एक बार "दिलीप", उनकी बहन और उनकी माँ का जाना हुआ। उनकी माँ ने उस ज्योतिष से "दिलीप" के लिए कोई इस्लामिक नाम सुझाने का आग्रह किया। "उलगनथम" ने नाम दिया "अब्दुल रहमान" लेकिन कहा कि इसे "ए०आर०रहमान" कहो । बार-बार यह पूछने पर भी कि इसमें "आर०" किस शब्द के लिए है, उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, बस इतना हीं कहा कि "ए०आर०रहमान" नाम हीं इसे प्रसिद्धि दिलायेगा। आगे चलकर प्रख्यात संगीतकार "नौशाद" की सलाह पर "ए०आर०" हुआ "अल्लाह रक्खा" । जब फिल्म रोजा रीलिज होने वाली थी,तो इस फिल्म के कैसेट्स के कवर पर "दिलीप कुमार" लिखने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। तभी रहमान की माँ ने निर्देशक "मणिरत्नम" से संपर्क किया और उनसे गुजारिश की कि "दिलीप कुमार" की बजाय "ए०आर०रहमान" लिखा जाए और इस तरह "दिलीप" हो गए "ए०आर०रहमान" । हाँ तो हम बात कर रहे थे "सेट मी फ्री" की। रोज़ा की सफलता के बाद "मैग्नासाउंड" कंपनी ने "रहमान" के नाम को भुनाना चाहा। रहमान से इजाजत लिए बिना उन लोगों ने पुराने कैसेट्स को नए कवर में बाज़ार में उतार दिया, चेन्नई में जगह-जगह बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स लगा दी और कैसेट को रहमान का सबसे पहला अंतर्राष्ट्रीय एलबम कहा गया । जाहिर सी बात है रीलौंच हुए कैसेट को "रहमान" के नाम के कारण बाज़ार तो मिलना हीं था, कैसेट्स हाथों-हाथ बिक गए,वही कैसेट जिसकी पहले केवल ३०० प्रतियाँ हीं बिकी थी। आज भी हम से कई "सेट मी फ्री" को आज के रहमान का एलबम मानते हैं, जबकी "रहमान" खुद इसके रीलौंच से नाराज़ थे। उनका कहना था कि यह कैसेट उनके लिए एक प्रयोग मात्र था,"मैग्नासाउंड" जब इसे रीलौंच हीं करना चाहती थी तो उनसे धुनों का कच्चापन तो खत्म करा लेती। लेकिन रूपयों के चकाचौंध ने "मैग्नासाउंड" की आँखों पर पट्टी डाला हुआ था। गनीमत देखिए कि उसी कंपनी ने २००६ में फिर से उसी एलबम को रीलिज किया है और इस बार भी "रहमान" के नाम ने उसे करोड़ों की कमाई करा दी है। यह है "रहमान" के संगीत का कमाल...........क्या हुआ कि कच्चा है....लेकिन है तो रहमान का हीं।

पिछले अंक में हम बातें कर रहे थे रहमान के संगीत के अनोखे अंदाज़ के बारे मे। रहमान जानते हैं कि उन्हें किस वाद्य-यंत्र से कितनी ध्वनि चाहिए। कल हम "ताल" की बात पर रूके थे। तो "ताल" का हीं किस्सा सुनाते हैं। "ताल से ताल मिला" की रिकार्डिंग हो रही थी। "रहमान" धुन तैयार कर चुके थे, अब बस म्युजिसियन्स या कहिए वादकों को अपना काम करना था। "ताल से ताल मिला" अगर आपको याद हो तो आप महसूस करेंगे कि इस गाने में "तबला" का बेहद खूबसूरत प्रयोग किया गया है। दर-असल इसका सारा श्रेय जाता है रहमान के अनूठेपन को। तबला-वादक इस गाने की धुन को बेहद आसान और कन्वेंशनल मान रहा था। लेकिन रहमान जानते थे कि उन इस गाने में तबले का प्रयोग कैसे करना है। उन्होंने तबला-वादक को अपनी ऊँगलियों में रबर-बैंड के सहारे आईस-क्रीम-स्टीक्स बाँधने को कहा ,फिर धुन भी अनकन्वेंशनल हो गई और तबले की आवाज भी।

तो चलिए सुनते हैं "ताल" से "ताल से ताल मिला"-



रहमान के स्टुडियो में गानों की रिकार्डिंग कितने अलहदा तरीके से होती है, उसके कई प्रमाण है। रहमान गानों की रिकार्डिंग के वक्त स्टुडियो की हरेक आवाज़ को रिकार्ड कर लेते हैं,फिर चाहे वह माईक का ग्लिच हीं क्यों ना हो। एक ऎसा हीं मज़ेदार वाक्या हुआ तमिल फिल्म "कदल वाईरस" के एक गाने की रिकार्डिंग के वक्त । गाने में नायक की खाँसी की आवाज़ की जरूरत थी। गाने की रिकार्डिंग के बीच में गायक खाँस पड़ता है। इस एक खाँसी के अलावा गाने की रिकार्डिंग के दौरान गायक कभी भी खाँसी की वास्तविक नकल नहीं कर पाता। खाँसी के बिना पूरी रिकार्डिंग खत्म हो जाती है। रहमान पहले से रिकार्ड कर रखी हुई गायक "मनू" की वास्तविक खाँसी को हीं गाने में फिट कर देते हैं। ऎसे हीं कई किस्से हैं जो रहमान को औरों से अलग करते हैं और परफेक्शनिस्ट बनाते हैं। कहा जाता है कि रहमान गायक के अनुसार धुन में फेरबदल नहीं करते,बल्कि धुन के मुताबिक गायक चुनते हैं। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि रहमान की बड़ी बहन "रेहाना" भी एक गायिका हैं ,लेकिन रहमान ने अपने कैरियर के १७ साल बीत जाने के बाद तमिल फिल्म "शिवाजी" में उन्हं गाने का अवसर दिया। रहमान संगीत को जीते हैं,इसलिए संगीत के साथ धोखा करने की सोच भी नहीं सकते । रहमान धुन के अनुसार गायको के साथ प्रयोग करते रहते हैं। यही कारण है कि हम "दौड़" फिल्म के एक गाने "ओ भंवरे" में "येशुदास" की आवाज़ सुनते हैं, जिसकी शायद हीं कोई कल्पना कर सकता है ।

आप भी "दौड़" के "ओ भँवरे" का मज़ा लीजिए:



रहमान ने किसी भी संगीतकार से ज्यादा ४ रजत कमल पुरस्कार(silver lotus, national award) प्राप्त किये हैं उन्हें ये पुरस्कार क्रमश: रोज़ा(१९९२), मिन्सारा कनावु(१९९७), लगान(२००१) और कनतिल मुतमित्तल(२००२)के लिए प्रदान किए गए। टाईम मैगजीन ने "रोज़ा" के संगीत को विश्व के सर्वश्रेष्ठ १० गीतों में शुमार किया है। टाईम मैगजीन ने रहमान को "मोज़ार्ट औफ मद्रास" की उपाधि से भी नवाज़ा है। पूरे विश्व में अबतक रहमान के १० करोड़ से भी ज्यादा साउंडट्रैकस एवं फिल्म -स्कोर्स बिक चुके हैं। यह उपलब्धि उन्हें संसार के १० सबसे बड़े रिकार्ड आर्टिस्टों की कतार में ला खड़ा करती है। यह किसी भी भारतीय के लिए फख़्र की बात है।

चलिए अंत में हम सुनते हैं रहमान का संगीतबद्ध एवं स्वरबद्ध किया हुआ फिल्म "लगान" का "बार-बार हाँ, चले चलो" गाना-



अंत में जाते-जाते रहमान को उनके जन्मदिवस पर ढेरों शुभकामनाएँ। खुदा करे कि उनपर बरकत बनी रहे और पूरा संगीत-जगत सदियों तक उनके संगीत और गीत का यूँ हीं लुत्फ़ लेता रहे। आमीन!!!!

चित्र में (उपर) शांत और सोम्य रहमान, (नीचे) प्रिय निर्देशक मणि रत्नम के साथ
प्रस्तुति - विश्व दीपक "तन्हा"



Tuesday, November 11, 2008

आपके पीछे चलेंगी आपकी परछाईयाँ....

निर्देशक बी आर चोपडा पर विशेष

व्यावसायिक दृष्टि से कहानियाँ चुनकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों से अलग सामाजिक सरोकारों को संबोधित करती हुई फिल्मों के माध्यम से समाज को एक संदेश मनोरंजनात्मक तरीके से कहने की कला बहुत कम निर्देशकों में देखने को मिली है. वी शांताराम ने अपनी फिल्मों से सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत की थी, आज के दौर में मधुर भंडारकर को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं, पर एक नाम ऐसा भी है जिन्होंने जितनी भी फिल्में बनाई, उनकी हर फ़िल्म समाज में व्याप्त किसी समस्या पर न सिर्फ़ एक प्रश्न उठाती है, बल्कि उस समस्या का कोई न कोई समाधान भी पेश करती है. निर्देशक बी आर चोपडा ने अपनी हर फ़िल्म को भरपूर रिसर्च के बाद बनाया और कहानी को इतने दिलचस्प अंदाज़ में बयां किया हर बार, कि एक पल के लिए देखने वालों के लिए फ़िल्म का कसाव नही टूटता. चाहे बात हो अवैध रिश्तों की (गुमराह), या बलात्कार की शिकार हुई औरत की (इन्साफ का तराजू), मुस्लिम वैवाहिक नियमों पर टिपण्णी हो (निकाह), या वैश्यावृति में फंसी औरतों का मानसिक चित्रण (साधना), या हो एक विधवा के पुनर्विवाह जैसा संवेदनशील विषय (एक ही रास्ता),अपनी फिल्मों से बी आर ने हमेशा ही समाज में एक सकारात्मक हलचल मचाई है, कई ऐसे विषय जिन पर तब तक परदों में रह कर चर्चा होता थी, उन्हें समाज के सामने बेनकाब किया, यही उनकी फिल्मों की वास्तविक कमियाबी रही है, पर जैसा कि हमने बताया गंभीर विषयों पर आधारित होने के बावजूद उनमें मनोरंजन भी भरपूर होता था, जिस कारण बॉक्स ऑफिस पर भी उनकी फिल्में सफलता के नए कीर्तिमान लिखती थी.


बीते बुधवार सुबह बी आर ने हमेशा के लिए संसार को अलविदा कह दिया, और पीछे छोड़ गए कुछ ऐसी फिल्मों की विरासत जिन से वर्तमान और आने वाली फिल्मकारों की पीढी को हमेशा गर्व रहेगा. आज हम उनकी जिस फ़िल्म का यहाँ जिक्र करेंगे वो है १९५७ में आई गोल्डन जुबली हिट फ़िल्म "नया दौर". आज के निर्देशक सईद मिर्जा और अज़ीज़ मिर्जा के वालिद अख्तर मिर्जा की लिखी इस बेहद "हट के" कहानी को महबूब खान, एस मुख़र्जी और एस एस वासन जैसे निर्देशकों ने सिरे से नकार दिया. कहा गया कि यह एक बढ़िया डोक्यूमेंट्री फ़िल्म तो बन सकती है पर एक फीचर फ़िल्म...कभी नही. बी आर ने इसी कहानी पर काम करने का फैसला किया. पर जब उन्होंने दिलीप कुमार के साथ इस फ़िल्म की चर्चा की तो उन्होंने कहानी सुनने से ही इनकार कर दिया. बी आर अगली पसंद, अशोक कुमार के पास पहुंचे. अशोक कुमार का मानना था कि उनका लुक शहरी है और वो इस गाँव के किरदार के लिए वो नही जमेंगें, पर उन्होंने बी आर की तरफ़ से दिलीप कुमार से एक बार फ़िर बात की. इस बार दिलीप साहब राजी हो गए. आधुनिकता की दौड़ में पिसने वाले एक आम ग्रामीण की कहानी को फ़िल्म के परदे पर लेकर आना आसान नही था. कुछ हफ्तों तक कारदार स्टूडियो में शूट करने के बाद लगभग १०० लोगों की टीम को कूच करना था आउट डोर लोकेशन के लिए जो की भोपाल के आस पास था. उन दिनों मधुबाला और दिलीप साहब के प्रेम के चर्चे इंडस्ट्री में मशहूर थे. तो फ़िल्म की नायिका मधुबाला के पिता ने मधुबाला को शूट पर भेजने से इनकार कर दिया, यूँ भी उन दिनों आउट डोर शूट जैसी बातों का चलन नही था. बी आर ने कोर्ट में मुकदमा लड़ा, अपील में तर्क दिया कि फ़िल्म की कहानी के लिए यह आउट डोर बहुत ज़रूरी है. दिलीप ने बी आर के पक्ष में गवाही दी जहाँ उन्होंने मधुबाला से अपने प्यार की बात भी कबूली. मुकदमा तो जीत लिया पर मधुबाला को कानूनी दांव पेचों से बचने के खातिर केस को वापस लेना पड़ा, और इस तरह फ़िल्म में मधुबाला के स्थान पर वैजंतीमाला का आगमन हुआ. महबूब खान की "मदर इंडिया" के लिए लिबर्टी सिनेमा १० हफ्तों के लिए बुक था. पर फ़िल्म तैयार न हो पाने के कारण उन्होंने बी आर की "नया दौर" को अपने बुक किए हुए १० हफ्ते दे दिए, साथ में हिदायत भी दी कि चाहो तो ५ हफ्तों के लिए ले लो, तुम्हारी इस "ताँगे वाले की कहानी" को पता नही दर्शक मिले या न मिले. और यही महबूब खान थे जिन्होनें, जब फ़िल्म "नया दौर" ने अपनी सिल्वर जुबली मनाई तो बी आर को उनकी फ़िल्म के प्रीमियर के लिए मुख्य अतिथि होने का आग्रह किया. चढ़ते सूरज को दुनिया सलाम करती है पर बी आर उन निर्देशकों में थे जिन्हें अपने चुनाव और अपने फैसलों पर हमेशा पूरा विश्वास रहा. उनकी हर फ़िल्म का संगीत पक्ष भी बहुत मजबूत रहा. नया दौर के गीतों को याद कीजिये ज़रा- मांग के साथ तुम्हारा (पार्श्व में चल रही ताँगे की आवाज़ पर गौर कीजिये), आना है तो आ, साथी हाथ बटाना, उडे जब जब जुल्फें तेरी, रेशमी सलवार या फ़िर आज भी हर राष्ट्रीय त्योहारों पर बजने वाला गीत -"ये देश है वीर जवानों का...",हर गीत कहानी से जुडा हुआ, हर गीत में शब्द और संगीत का परफेक्ट तालमेल.

आज की पीढी उन्हें महान धारावाहिक "महाभारत" के निर्देशक के रूप में अधिक जानती है. पर बहुत कम लोग जानते हैं कि बी आर ने फिल्मों में अनूठे प्रयोग किए हैं जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है, फ़िल्म "कानून" हिंदुस्तान की अब तक की एक मात्र मुक्कमल उर्दू फ़िल्म मानी जाती है, चूँकि इस फ़िल्म में एक भी शब्द संवाद का हिन्दी में नही था, बी आर ने सेंसर बोर्ड से अपील भी की थी कि इस फ़िल्म को उर्दू में सर्टिफिकेशन दिया जाए. एक और बड़ी खासियत इस फ़िल्म के ये थी कि ये शायद हिंदुस्तान की पहली बिना गीतों की फ़िल्म थी. गुरुदत्त भी इस फ़िल्म के दीवाने थे क्योंकि जो बरसों से गुरुदत्त करना चाहते थे पर अपने जीवन काल में कभी कर नही पाये वो बी आर इस फ़िल्म के माध्यम से कर दिखाया था. आज भी कितने निर्देशक होंगें जो बिना गीतों के कोई हिन्दी फ़िल्म बनने का खतरा उठा सके. बी आर को फिल्मों में उनके अमूल्य योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा...फ़िल्म इंडस्ट्री ने फिल्मों के माध्यम समाज को आईना दिखने वाला एक बेहतरीन निर्देशक को खो दिया है. हिंद युग्म,आवाज़ दे रहा है बी आर चोपडा को यह संगीतमय श्रद्धाजंली.




The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ