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Thursday, November 1, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : पहली महिला संगीतकार


भूली-बिसरी यादें

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपके बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मास का पहला गुरुवार है और इस दिन हम आपके लिए मूक और सवाक फिल्मों की कुछ रोचक दास्तान लेकर आते हैं। तो आइए पलटते हैं, भारतीय फिल्म-इतिहास के कुछ सुनहरे पृष्ठों को।


यादें मूक फिल्मों की : बम्बई, नासिक और मद्रास फिल्म निर्माण के शुरुआती केन्द्र बने 


 र्ष 1913 में दादा फालके द्वारा निर्मित और प्रदर्शित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का नाम भारत के पहले कथा फिल्म के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो ही चुका था, इसी वर्ष दादा फालके की दूसरी फिल्म ‘भष्मासुर मोहिनी’ का प्रदर्शन हुआ। अगले वर्ष, अर्थात 1914 में भी दादा फलके का ही वर्चस्व कायम रहा, जब उनकी तीसरी फिल्म ‘सावित्री सत्यवान’ का प्रदर्शन हुआ। इन दो वर्षों में कुल तीन फिल्मों का प्रदर्शन हुआ और ये तीनों फिल्म फालके ऐंड कम्पनी द्वारा निर्मित थी। पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के निर्माण के समय कम्पनी का स्टूडिओ और कार्यालय मुम्बई में स्थापित था, किन्तु बाद की फिल्मों के निर्माण के समय दादा फालके ने अपना स्टुडियो और कार्यालय नासिक स्थानान्तरित कर दिया था। कम्पनी की स्थापना स्वयं फालके ने की थी, किन्तु नासिक स्थानान्तरित कर देने के बाद कम्पनी से कुछ साझीदार भी जुड़े। इनमें प्रमुख थे, वामन श्रीधर आप्टे, एल.बी. पाठक, गोकुलदास दामोदर, मायाशंकर भट्ट और माधवजी जयसिंह।

आर. नटराजा मुदालियर 
इसी बीच 1915 में एस.एन. पाटनकर नामक एक फ़िल्मकार ने भारत की दूसरी फिल्म कम्पनी, ‘पाटनकर यूनियन’ की स्थापना की। उन्होने इस कम्पनी की पहली और भारत की चौथी मूक फिल्म ‘मर्डर ऑफ नारायणराव पेशवा’ नामक ऐतिहासिक फिल्म का निर्माण किया। 6000 फीट लम्बाई की इस ऐतिहासिक फिल्म में जी. रानाडे, डी. जोशी और के.जी. गोखले मुख्य भूमिकाओं में थे। पाटनकर ने अपनी इस कम्पनी से दो फिल्मों का निर्माण करने के बाद 1917 में कम्पनी का नाम बदल कर ‘पाटनकर फ्रेंड्स ऐंड कम्पनी’ रख दिया।

मूक फिल्मों के निर्माण की श्रृंखला 1916 में जारी रही। इस वर्ष एक ही फिल्म ‘कीचक वध’ बनी, किन्तु यह बम्बई या नासिक में नहीं, बल्कि तत्कालीन मद्रास में बनी थी। वेल्लोर के रहने वाले आर. नटराजा मुदालियर ने ब्रिटिश कैमरामैन स्टीवर्ट से प्रशिक्षण लेकर मद्रास में ‘इण्डियन फिल्म कम्पनी’ स्थापित की और फिल्म ‘कीचक वध’ का निर्माण किया। 6000 फीट लम्बाई की यह फिल्म महाभारत के अज्ञातवास से सम्बन्धित एक प्रसंग पर आधारित थी। फिल्म का निर्देशन स्वयं आर. नटराजा मुदालियर ने किया था और मुख्य अभिनेता थे, राजा मुदालियर तथा जीवरत्नम। इस फिल्म ने भारतीय फिल्म निर्माण के क्षेत्र का विस्तार दक्षिण भारत में किया।

सवाक युग के धरोहर : पहली महिला संगीतकार कौन?

जद्दनबाई
ह 1934 का साल था जिसने पहली महिला संगीतकार देखा। इशरत सुल्ताना ने ‘अदले जहाँगीर’ में संगीत देकर यह ख़िताब अपने नाम कर लिया। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इस फ़िल्म के गीतों को रेकॉर्ड नहीं किया गया था, और अब इस फ़िल्म की प्रिण्ट मिल पाना भी असम्भव ही है। वैसे प्रथम महिला संगीतकार कौन हैं, इस बात में कुछ संशय है। पहली महिला संगीतकार के रूप में आज हर जगह सरस्वती देवी का नाम सुनाई देता है, जिन्होंने 1935 में फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ में संगीत दिया था, पर साथ ही साथ यह सवाल भी तर्कसंगत है कि क्या सरस्वती देवी को ही भारत की पहली महिला संगीतकार कहा जाना चाहिए? इशरत सुलताना का ज़िक्र हम कर चुके हैं, साथ ही मुनीरबाई और जद्दनबाई ने भी संगीत तो दिया पर फ़िल्मों में नहीं। आगे चलकर जद्दनबाई ने 1935 की एक फ़िल्म 'तलाश-ए-हक़' में संगीत तो दिया पर वो गाने रेकॉर्ड पर नहीं उतर सके। रेकॉर्ड पर न उतर पाने की वजह से ज़्यादा लोगों को इनके गीत सुनने को नहीं मिले, और इनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया। सरस्वती देवी वह प्रथम संगीतकार थीं जिनके गीत न केवल रेकॉर्ड हुए बल्कि एक चर्चित बैनर 'बॉम्बे टाकीज़' के साथ जुड़ने और फ़िल्मों के चलने से वो मशहूर हो गईं और जनता और इतिहास ने उन्हें ही प्रथम महिला संगीतकार होने का गौरव प्रदान कर दिया।

फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ का दृश्य 
1934 में हिमांशु राय व देविका रानी द्वारा गठित ‘बॉम्बे टाकीज़’ 1935 में अपनी पहली फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ के साथ उपस्थित हुई। यह एक मर्डर-मिस्ट्री थी। बोराल, मल्लिक, तिमिर बरन न्यू थिएटर्स में थे। उधर प्रभात में गोविन्दराव और केशवराव भोले जैसे संगीतकार थे। इन दिग्गजों से टक्कर लेने के लिए और ‘बॉम्बे टाकीज़’ के गीत-संगीत में अलग पहचान लाने के लिए हिमांशु राय को तलाश थी एक नए संगीतकार की। उनकी यह खोज उन्हें ले आई सरस्वती देवी के पास, जो बनीं भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार। उनका असली नाम था ख़ुर्शीद मिनोचर होमजी, जिनका जन्म एक पारसी परिवार में हुआ था। संगीत के प्रति लगाव को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें संगीत सीखने की अनुमति दी और वो विष्णु नारायण भातखण्डे की शिष्या बन गईं। मैट्रिक पास करने के बाद लखनऊ के प्रसिद्ध मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से शिक्षा प्राप्त की और वहीं अध्यापन भी किया। 1927 में रेडिओ की शुरुआत के बाद बम्बई में अपनी बहनों के साथ ‘होमजी सिस्टर्स’ के नाम से अपनी ऑरकेस्ट्रा पार्टी बनाई जो काफ़ी लोकप्रिय बन गई।

सरस्वती देवी
1933-34 में वो बम्बई में किसी जलसे में गाने गई थीं जहाँ पर हिमांशु राय से उनकी मुलाक़ात हुई। राय ने उन्हें ‘बॉम्बे टाकीज़’ में संगीतकार बनने और उनकी बहन माणिक को अभिनय और गायन करने का निमंत्रण दिया। कुछ हिचकिचाहट के बाद दोनों बहने राज़ी तो हो गईं, पर पारसी समाज ने इसका विरोध किया क्योंकि पारसी महिलाओं का फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। इस विरोध के चलते हिमांशु राय ने ही दोनों बहनों का नाम बदल कर एक को सरस्वती देवी तो दूसरी को चन्द्रप्रभा बना दिया। सरस्वती देवी को शुरु में देविका रानी को संगीत सिखाने का काम सौंपा गया, और इसी दौरान वो ‘जवानी की हवा’ के लिए भी धुने बनाने लगीं। फ़िल्म के गीत तैयार होने पर देविका रानी, चन्द्रप्रभा और नजमुल हसन से गवाये गये। केवल नाम बदलने से दोनों बहनों की मुसीबत नहीं टली। पारसी समाज के लोगों ने इनके ख़िलाफ़ मोर्चा निकाल कर इस फ़िल्म के प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की। पुलिस फ़ोर्स की निगरानी में इम्पीरियल सिनेमा में फ़िल्म को रिलीज़ किया गया। इस तरह के विरोध के मद्देनज़र ‘बॉम्बे टाकीज़’ के ‘बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टर्स’ के चार सदस्य, जो पारसी थे, इन बहनों को कम्पनी से अलग कर देने का सुझाव दिया, पर हिमांशु राय अपने फ़ैसले में अटल थे। बहरहाल ‘जवानी की हवा’ के गाने लिखे थे जमुनास्वरूप कश्यप ‘नातवाँ’, बड़े आग़ा, नजमुल हुसैन और डी. के. मेहता ने। गीतों में आवाज़ें थीं देविका रानी, नजमुल हुसैन, मिस रिख मसीह और कश्यप की।

और अब हम आपको सरस्वती देवी का संगीतबद्ध और उन्हीं का गाया एक गीत सुनवाते हैं। गीत के बोल हैं- “कित गए हो खेवनहार...”। यह गीत फिल्म ‘अछूत कन्या’ में पर्दे पर उनकी बहन चन्द्रप्रभा पर फ़िल्माया जाना था। लेकिन शूटिंग के दिन चन्द्रप्रभा के गले में ख़राश आ गई और वो गाने की स्थिति में नहीं थीं। ऐसे में अपनी छोटी बहन के लिए सरस्वती देवी ने गीत को गाया जिस पर चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ ही हिलाये।

फिल्म अछूत कन्या : “कित गए हो खेवनहार...” : सरस्वती देवी 




सरस्वती देवी का गाया और संगीतबद्ध किया एक और गीत सुनिए। इसे हमने 1936 की ही फिल्म ‘जन्मभूमि’ से लिया है।

फिल्म जन्मभूमि : “दुनिया कहती मुझको पागल... : सरस्वती देवी 



 इसी गीत के साथ आज हम ‘भूली-बिसरी यादें’ के इस अंक को यहीं विराम देते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का दूसरा गुरुवार होगा। इस दिन हम प्रस्तुत करेंगे एक बेहद रोचक संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 30 नवम्बर, 2012 है।

Wednesday, March 16, 2011

कित गए हो खेवनहार....इस नारी प्रधान शृंखला में आज हम सम्मान कर रहे हैं सरस्वती देवी का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 614/2010/314

हिंदी सिनेमा की प्रथम महिला संगीतकार के रूप में हमनें आपका परिचय जद्दनबाई से करवाया था। लेकिन जद्दनबाई ने केवल 'तलाश-ए-हक़' फ़िल्म में ही संगीत दिया और इस फ़िल्म के गीतों को रेकॊर्ड पर भी उतारा नहीं गया था। शायद इसी वजह से प्रथम महिला संगीतकार होनें का श्रेय दिया जाता है 'बॊम्बे टाकीज़' की सरस्वती देवी को। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'कोमल है कमज़ोर नहीं' शृंखला की आज चौथी कड़ी में बातें संगीत निर्देशिका सरस्वती देवी की। सरस्वती देवी का जन्म सन् १९१२ में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका परिवार एक व्यापारी परिवार था। उनका असली नाम था ख़ुर्शीद मेनोचा होमजी। पारसी समाज में उन दिनों महिलाओं के लिए फ़िल्म और संगीत जगत में क़दम रखना गुनाह माना जाता था। इसलिए ख़ुर्शीद के फ़िल्म जगत में पदार्पण का भी ख़ूब विरोध हुआ। लेकिन वो अपनी राह से ज़रा भी नहीं डीगीं। अपनी रुचि और सपने को साकार किया ख़ुर्शीद मेनोचा होमजी से सरस्वती देवी बन कर। बचपन से ही सरस्वती देवी का संगीत की तरफ़ रुझान था। विष्णु नारायण भातखण्डे से उन्होंने ध्रुपद और धमार की शिक्षा ली। फिर लखनऊ के मॊरिस म्युज़िक कॊलेज से संगीत की तालीम हासिल की। १९३३-३४ में एक संगीत समारोह में भाग लेने वो लखनऊ गईं जहाँ पर उनकी मुलाक़ात हो गई 'बॊम्बे टाकीज़' के प्रतिष्ठाता हिमांशु राय से। उन्होंने सरस्वती देवी को बम्बई आने का न्योता दिया। पहले पहले तो सरस्वती देवी ने उनसे यह कहा कि उनका सिर्फ़ शास्त्रीय संगीत का ही ज्ञान है, सुगम संगीत में कोई तजुर्बा नहीं है। हिमांशु राय ने जब उनसे कहा कि इसमें कोई चिंता की बात नहीं है, तब जाकर वो 'बॊम्बे टाकीज़' में शामिल होने के लिए तैयार हुईं। शुरु शुरु में सरस्वती देवी को हिमांशु राय की पत्नी और मशहूर अभिनेत्री देविका रानी को संगीत सिखाने का ज़िम्मा सौंपा गया। इसी दौरान वो हल्के फुल्के गानें भी बनाने लगीं। वो सरस्वती देवी ही थीं जिन्होंने उस समय की प्रचलित फ़िल्मी गीत की धारा (जो शुद्ध शास्त्रीय और नाट्य संगीत पर आधित हुआ करती थी) से अलग बहकर हल्के फुल्के ऒर्केस्ट्रेशन वाले गीतों का चलन शुरु किया, जिन्हें जनता ने हाथों हाथ ग्रहण किया। बॊम्बे टाकीज़' में तो एक से एक हिट फ़िल्मों में संगीत दिया ही, इनके अलावा सरस्वती देवी ने मिनर्वा मूवीटोन की कुछ फ़िल्मों में भी संगीत दिया था जिनमें 'पृथ्वीबल्लभ' और 'प्रार्थना' शामिल हैं।

यह १९३४-३५ की बात है कि जब फ़िल्म 'जवानी की हवा' के गीतों का सृजन हुआ, जिन्हें गाया सरस्वती देवी की बहन मानेक और नजमुल हसन नें। यह सरस्वती देवी के संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी। ख़ुर्शीद और मानेक के फ़िल्मों में आने से पारसी समाज में हंगामा मच गया। अपनी पहचान छुपाने के लिए इन दोनों बहनों नें अपने अपने नाम बदल कर बन गईं सरस्वती देवी और चन्द्रप्रभा। 'जवानी की हवा' फ़िल्म में एक गीत चन्द्रप्रभा पर फ़िल्माया जाना था। पर उस दिन उनका गला ज़रा नासाज़ था, जिस वजह से सरस्वती देवी ने वह गीत गाया और चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ हिलाये। यह बम्बई में रेकॊर्ड किया गया पहला प्लेबैक्ड सॊंग् था। दोस्तों, हमनें सरस्वती देवी को भारत की पहली महिला संगीतकार तो करार दे दिया, लेकिन क्या वाक़ई वो पहली थीं? १९३२-३३ में मुख्तार बेगम और गौहर कर्नाटकी गायन के क्षेत्र में तो आईं पर बतौर संगीतकार नहीं। १९३४ में इशरत सुल्ताना ने संगीत तो दिया पर उन्हें रेकॊर्ड पर उतारा नहीं गया, केवल फ़िल्म के पर्दे पर ही देखा व सुना गया। मुनिरबाई और जद्दनबाई के भी गीत रेकॊर्ड्स पर नहीं उतारे गये। इस तरह से प्रॊमिनेन्स की अगर बात करें तो सरस्वती देवी ही पहली फ़िल्मी महिला संगीतकार मानी गईं। तो लीजिए आज सरस्वती देवी की सुर-साधना को सलाम करते हुए सुनें उन्हीं की आवाज़ में एक बार फिर से 'अछूत कन्या' फ़िल्म का ही एक और गीत "कित गये हो खेवनहार"।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म संगीत के बदलते दौर के मद्देनज़र ४० के दशक में सरस्वती देवी के सहायक के रूप में जे. एस. कश्यप और रामचन्द्र पाल को नियुक्त किया गया था, लेकिन सरस्वती देवी को अपने काम में किसी की दख़लंदाज़ी नापसंद थी, और इसलिए १९५० में उन्होंने फ़िल्मों से सन्यास ले लिया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक और सुप्रसिद्ध गायिका/नायिका को समर्पित है ये कड़ी.

सवाल १ - कौन है ये मशहूर गायिका/नायिका - ३ अंक
सवाल २ - किस फिल्म का है ये गीत - १ अंक
सवाल ३ - किस फिल्म कंपनी के इस फिल्म का निर्माण किया था - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी नक़ल भी करने के लिए थोडा सा समय चाहिए होता है, पर यहाँ तो ये दोनों लगभग एक ही समय में जवाब के साथ हाज़िर हो जाते हैं. रही बात जवाब के एक जैसे होने की तो ये तय है कि जवाब इन दोनों के गूगल किया है और संबंधित साईट से जस का तस कॉपी कर यहाँ पेस्ट कर दिया है :० क्यों अमित जी और अंजाना जी सही कह रहा हूँ न, फिलहाल हम सभी विजेताओं को बधाई दिए देते हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, February 13, 2011

झुकी आई रे बदरिया सवान की...जब पियानो के सुर छिड़े तो बने ढेरों फ़िल्मी गीत....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 591/2010/291

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और तरो-ताज़ा सप्ताह के साथ हम उपस्थित हैं और आप सभी का स्वागत करते हैं इस महफ़िल में। साज़ों की अगर बात छेड़ें तो दुनिया भर के सभी देशों को मिलाकार फ़ेहरिस्त शायद हज़ारों में पहुँच जाए। लेकिन एक साज़ जिसे साज़ों का राजा कहलाने का गौरव प्राप्त है, वह है पियानो। और यह इसलिए साज़ों का राजा है क्योंकि पियानो ऒर्केस्ट्रा के किसी साज़ का सम्पूर्ण स्पेक्ट्रम कवर कर लेता है; डबल बसून के सब से नीचे के नोट से लेकर पिकोलो के सब से ऊँचे नोट तक। पियानो की मेलडी उत्पन्न करने की क्षमता, उसकी विस्तृत डायनामिक रेंज, तथा आकार में भी सब से बड़ा होना पियानो को साज़ों में सब से उपर का स्थान देता है। सब से ज़्यादा वर्सेटाइल और सब से मज़ेदार है यह साज़। जहाँ तक हिंदी फ़िल्म संगीतकारों की बात है, तो लगभग सभी दिग्गज संगीतकारों ने समय समय पर कहानी, सिचुएशन और मूड के मुताबिक़ फ़िल्मी रचनाओं में पियानो का इस्तेमाल किया। ज़्यादातर गीतों में पियानो के छोटे मोटे पीसेस सुनने को मिले, लेकिन बहुत से गानें ऐसे भी थे जिनमें मुख्य साज़ ही पियानो था। ऐसी ही कुछ लाजवाब और बेहद लोकप्रिय दस गीतों को लेकर आज से हम शुरु कर रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़'। हम न केवल इन दस गीतों को सुनवाएँगे और उनके बारे में बताएंगे, बल्कि पियानो से संबम्धित बहुत सी जानकारी भी देंगे जो शायद अब तक आपको मालूम न होगी। अगर आप यह पूछें कि पियानो का आविष्कार किसने किया था, तो इसका जवाब उतना आसान नहीं होगा, इसलिए कि पियानो का विकास हुआ है, ना कि आविष्कार। स्ट्रिंग इन्स्ट्रुमेण्ट्स की बात करें तो स्ट्रक स्ट्रिंग्स वाले साज़ सब से पहले बनें जिन्हें 'हैमर्ड डल्सिमर्स' (hammered dulcimers) कहते हैं। मध्य युग में कई कोशिशें हुईं स्ट्रक-स्ट्रिंग्स के साथ स्ट्रिंग्ड की-बोर्ड इन्स्ट्रुमेण्ट्स बनाने की। १७-वीं सदी के आते आते, क्लैविकॊर्ड (clavichord) और हार्प्सिकॊर्ड (harpsichord) जैसी की-बोर्ड साज़ आ चुके थे। इस तरह से धीरे धीरे हार्प्सिकॊर्ड का विकास होने लगा और आख़िर में जाकर केस, साउण्डबोर्ड, ब्रिज और की-बोर्ड वाला स्ट्रक्चर ही सब से बेहतर सिद्ध हुआ। और यही स्ट्रक्चर आज तक चला आ रहा है पियानो का। पियानो साज़ की चर्चा हम कल की कड़ी में फिर आगे बढ़ाएँगे।

हिंदी फ़िल्म संगीत में पियानो का इस्तमाल ३० के दशक से ही शुरु हो गया था। वह कौन सा गीत था जिसमें पहली बार पियानो बजा होगा, इसका पता तो हम नहीं चला सके, लेकिन इस तलाश में जो सब से पुराना गीत हमारे हाथ लगा, वह है सन् १९३८ की फ़िल्म 'भाभी' का और इसके बोल हैं "झुकी आयी रे बदरिया सावन की"। ३० के दशक की बॊम्बे टाकीज़ की फ़िल्म, इसलिए ज़ाहिर बात है कि इस फ़िल्म की संगीतकारा हैं सरस्वती देवी। इस दुर्लभ गीत की गायिका हैं रेणुका देवी और गीत लिखा है जे. एस. कश्यप ने। तो आइए क्यों ना इस शृंखला की शुरुआत इसी भूले बिसरे गीत से करें! 'भाभी' के मुख्य कलाकार थे पी. जयराज, रेणुका देवी, मीरा, वी. एच. देसाई और रामा सुकुल। क्यों कि उस ज़माने में प्लेबैक की परम्परा उतनी ज़्यादा प्रचलित नहीं हुई थी और जयराज साहब को भी गाना नहीं आता था, इसलिए इस फ़िल्म में उनको कोई गीत नहीं दिया गया। प्रस्तुत गीत में वो पियानो बजाते हुए नज़र आते हैं जबकि रेणुका जी गीत गाती हैं, और उनके पिता बने वी. एच. देसाई साहब और फ़िल्म के खलनायक रामा सुकुल उन्हें गाते हुए देखते हैं। तो आइए राग गौड़ मल्हार पर आधारित इस शास्त्रीयता भरे गीत का आनंद लें और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस टाइम मशीन पे सवार होकर सैर कर आयें ३० के दशक के उस ज़माने का।



क्या आप जानते हैं...
कि एक वैज्ञानिक शोध से यह पता चला है कि जो बच्चे पियानो सीखते हैं, वो स्कूल की पढ़ाई में दूसरों से बेहतर पर्फ़ॊर्म करते हैं। इसका कारण है डिसिप्लिन, हाथों और आँखों का अच्छा तालमेल, सामाजिक विकास, संगीत की शिक्षा तथा ख़ुद संगीत रचने का परम सुख।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -आर. सी. बोराल की एक संगीत रचना.

सवाल १ - किस अभिनेत्री पर है ये गीत फिल्माया - 2 अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - 3 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अंजना जी और विजय जी आप तीनों को १-१ अंक की बधाई....आज के सवालों में अंकों पर ध्यान दीजियेगा.....मुकाबला दिलचस्प होगा इसमें कोई शक नहीं....अब शरद जी भी है मैदान में....प्रतिभा जी जानकारी के लिए धन्येवाद

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, December 19, 2010

मैं बन की चिड़िया बन के.....ये गीत है उन दिनों का जब भारतीय रुपहले पर्दे पर प्रेम ने पहली करवट ली थी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 551/2010/251

मस्कार दोस्तों! स्वागत है बहुत बहुत आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस सुरीली महफ़िल में। पिछली कड़ी के साथ ही पिछले बीस अंकों से चली आ रही लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' सम्पन्न हो गई, और आज से एक नई लघु शृंखला का आग़ाज़ हम कर रहे हैं। और यहाँ पर आपको इस बात की याद दिला दूँ कि यह साल २०१० की आख़िरी लघु शृंखला होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। जी हाँ, देखते ही देखते यह साल भी अब विदाई के मूड में आ गया है। तो कहिए साल के आख़िरी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' लघु शृंखला को कैसे यादगार बनाया जाए? क्योंकि साल के इन आख़िरी कुछ दिनों में हम सभी छुट्टी के मूड में होते हैं, हमारा मिज़ाज हल्का फुल्का होता है, मौसम भी बड़ा ख़ुशरंग होता है, इसलिए हमने सोचा कि इस लघु शृंखला को कुछ बेहद सुरीले प्यार भरे युगल गीतों से सजायी जाये। जब से फ़िल्म संगीत की शुरुआत हुई है, तभी से प्यार भरे युगल गीतों का भी रिवाज़ चला आ रहा है, और उस ज़माने से लेकर आज तक ये प्रेम गीत ना केवल फ़िल्मों की शान हैं, बल्कि फ़िल्म के बाहर भी सुनें तो एक अलग ही अनुभूति प्रदान करते हैं। और जो लोग प्यार करते हैं, उनके लिए तो जैसे दिल के तराने बन जाया करते हैं ऐसे गीत। तो आइए आज से अगले दस अंकों में हम सुनें ३० के दशक से लेकर ८० के दशक तक में बनने वाली कुछ बेहद लोकप्रिय फ़िल्मी युगल रचनाएँ, जिन्हें हमने आज तक अपने सीने से लगाये रखा है। वैसे तो इनके अलावा भी बेशुमार सुमधुर युगल गीत हैं, बस युं समझ लीजिए कि आँखें बंद करके समुंदर से एक मुट्ठी मोतियाँ हम निकाल लाये हैं, और आँखें खोलने पर ही देखा कि ये मोती कौन कौन से हैं। पेश-ए-ख़िदमत है साल २०१० के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अंतिम लघु शृंखला 'एक मैं और एक तू'। जैसा कि हमने कहा कि हम युगल गीतों का यह सफ़र ३० के दशक से शुरु करेंगे, तो फिर ऐसे में फ़िल्म 'अछूत कन्या' के उस यादगार गीत से ही क्यों ना शुभारम्भ की जाए! "मैं बन की चिड़िया बनके बन बन बोलूँ रे, मैं बन का पंछी बनके संग संग डोलूँ रे"। अशोक कुमार और देविका रानी के गाये इस गीत का उल्लेख आज भी कई जगहों पर चल पड़ता है। और इस गीत को सुनते ही आज भी पेड़ की टहनी पर बैठीं देविका रानी और उनके पीछे खड़े दादामुनि अशोक कुमार का वह दृष्य जैसे आँखों के सामने आ जाता है।

'अछूत कन्या' १९३६ की फ़िल्म थी जो बनी थी 'बॊम्बे टॊकीज़' के बैनर तले। संगीतकार थीं सरस्वती देवी। यह वह दौर था जब गांधीजी ने अस्पृश्यता को दूर करने के लिए एक मिशन चला रखी थी। निरंजन पाल की लिखी कहानी पर आधारित इस फ़िल्म में भी अछूतप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाया गया था। पंडित नेहरु और सरोजिनी नायडू 'बॊम्बे टॊकीज़' में जाकर यह फ़िल्म देखी थी। 'अछूत कन्या' पहली बोलती फ़िल्म है जिसके गानें सर्वसाधारण में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुए। सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि इसके गीतों के ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड्स इंगलैण्ड तक भेजे गये। कहा जाता है कि सरस्वती देवी घण्टों तक अशोक कुमार और देविका रानी को गाना सिखाती थीं, ठीक वैसे जैसे कोई स्कूल टीचर बच्चों को नर्सरी राइम सिखाती है। उस ज़मानें में प्लेबैक का चलन शुरु नहीं हुआ था, इसलिए अभिनेता अशोक कुमार और देविका रानी को अपने गानें ख़ुद ही गाने थे। ऐसे में संगीतकार के लिए बहुत मुश्किल हुआ करता था कम्पोज़ करना और जहाँ तक हो सके वो धुनें ऐसी बनाते थे जो अभिनेता आसानी से गा सके। इसलिए बहुत ज़्यादा उन्नत कम्पोज़िशन करना सम्भव नहीं होता था। फिर भी आज का प्रस्तुत गीत उस ज़माने में ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि उससे पहले किसी फ़िल्मी गीत ने नहीं की थी। उस समय के प्रचलित नाट्य संगीत और शास्त्रीय संगीत के बंधनों से बाहर निकलकर सरस्वती देवी ने हल्के फुल्के अंदाज़ में इस फ़िल्म के गानें बनाये जो बहुत सराहे गये। इस फ़िल्म के संगीत की एक और महत्वपूर्ण बात आपको बताना चाहूँगा। फ़िल्म में एक गीत है "कित गये हो खेवनहार"। कहा जाता है कि इस गीत को सरस्वती देवी की बहन चन्द्रप्रभा द्वारा गाया जाना था जो उस फ़िल्म में अभिनय कर रही थीं। लेकिन जिस दिन इस गाने की शूटिंग् थी, उस दिन उनका गला ख़राब हो गया और गाने की हालत में नहीं थीं। ऐसे में सरस्वती देवी ने पर्दे के पीछे खड़े होकर ख़ुद गीत को गाया जब कि चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ हिलाये। इस तरह से सरस्वती देवी ने प्लेबैक की नींव रखी। वैसे पहले प्लेबैक का श्रेय न्यु थिएटर्स के आर. सी. बोराल को जाता है जिन्होंने १९३५ की फ़िल्म 'धूप-छाँव' में इसकी शुरुआत की थी, लेकिन उस फ़िल्म में उस अभिनेता ने अपने लिए ही प्लेबैक किया। "प्योर प्लेबैक" की बात करे तो सरस्वती देवी ने अपनी बहन चन्द्रप्रभा के लिए प्लेबैक कर 'प्लेबैक' के असली अर्थ को साकार किया। तो लीजिए दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर प्रस्तुत है हिंदी सिने संगीत का ना केवल पहला मशहूर युगल गीत, बल्कि यु कहें कि पहला मशहूर गीत। अशोक कुमार और देविका रानी के साथ साथ सरस्वती देवी को भी 'आवाज़' का सलाम।



क्या आप जानते हैं...
कि सरस्वती देवी का असली नाम था ख़ुरशीद मंचशेर मिनोचा होमजी (Khursheed Manchersher Minocher Homji)। उस समय पारसी महिलाओं को फ़िल्म और संगीत में जाने की अनुमति नहीं थी। इसलिए उन्हें अपना नाम बदल कर इस क्षेत्र में उतरना पड़ा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इस युगल गीत की गायिका हैं नूरजहाँ.

सवाल १ - गायक बताएं - १ अंक
सवाल २ - एक अमर प्रेम कहानी पर आधारित थी फिल्म, नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस संगीतकार की अंतिम फिल्म थी ये - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर पहले सवाल के साथ शरद जी ने बढ़त बनाई है, पर क्या वो पिछली बार की तरह इस बार भी श्याम जी से पिछड़ जायेगें आगे चल कर या वो और अमित जी मिलकर ४ बार के विजेता श्याम जी को पछाड पायेंगें, देखना दिलचस्प होगा, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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