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Tuesday, June 1, 2010

बस प्यार का नाम न लेना, आइ हेट लव स्टोरीज़, यही गुनगुनाते आ पहुँचे हैं विशाल, शेखर, कुमार और अन्विता

ताज़ा सुर ताल २०/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के आज के अंक में आप सब का स्वागत है। विश्व दीपक जी, पिछले हफ़्ते फ़िल्म 'काईट्स' प्रदर्शित हुई, लेकिन आश्चर्य की बात रही कि फ़िल्म को वो लोकप्रियता हासिल नहीं हो सकी जिसकी उम्मीदें की गईं थी। ऐसा सुनने में आया है कि जिन लोगों को अंग्रेज़ी फ़िल्में देखने का शौक है, उन्हे यह फ़िल्म पसंद आई, लेकिन बॊलीवुड मसाला फ़िल्मों के दर्शकों को यह फ़िल्म ज़्यादा हज़म नहीं हुई। आपके क्या विचार हैं 'काइट्स' को लेकर?

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैंने अभी तक काईट्स देखी नहीं है, इसलिए कुछ भी कहने की हालत में नहीं हूँ। इस शनिवार देखने का विचार है, उसी के बाद अपने विचार जाहिर करूँगा। हाँ, लेकिन यह तो है कि ज्यादातर दर्शकों को फिल्म की कहानी में कुछ भी नया नज़र नहीं आया है, उन सब का कहना है कि ऋतिक रोशन का इस फिल्म के लिए ढाई साल का ब्रेक लेना हजम नहीं होता। वहीं मुझे एकाध ऐसे भी लोग मिले हैं जिन्हें यह फिल्म "फिल्मांकन" (सिनेमाटोग्राफी) के कारण पसंद आई है तो दो-चार ऐसे भी हैं जिन्हें बारबारा मोरी के अभिनय ने प्रभावित किया है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस फिल्म को इसी के हाईप (हद से ज्यादा प्रचार और उम्मीदों) से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।

सुजॊय - चलिए, हम काईट्स से आगे बढते हैं। आज हम जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं, उस फ़िल्म से भी लोगों की उम्मीदें हैं। और क्यों ना हो जब फ़िल्म करण जोहर के 'धर्मा प्रोडक्शन्स' के बैनर तले बन रही हो! जी हाँ, आज 'ताज़ा सुर ताल' में ज़िक्र 'आइ हेट लव स्टोरीज़' के संगीत की।

विश्व दीपक - इस फ़िल्म के संगीत की चर्चा तो हम करेंगे, लेकिन आपने ग़ौर किया है कि फ़िल्म के टाईटल को किस तरह से स्पेल किया गया है? 'I Hate Luv Storys' - जिस तरह से हम SMS में टाइप करते हैं, उसी शैली को अपनाया गया है, शायद टाईटल के ज़रिये भी आज के युवा वर्ग को आकर्षित करने का प्रयास हुआ है। ख़ैर, 'आइ हेट लव स्टोरीज़' में इमरान ख़ान और सोनम कपूर ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। मूलत: यह एक रोमांटिक कॊमेडी है जिसका निर्देशन किया है नवोदित निर्देशक पुनीत मल्होत्रा ने, जो मशहूर डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा के भतीजे हैं और जिन्होने पहले करण जोहर के सहायक के रूप में काम कर चुके हैं। यह फ़िल्म प्रदर्शित हो रही है २ जुलाई के दिन।

सुजॊय - इस फ़िल्म में संगीत है विशाल-शेखर का, और गानें लिखे हैं अन्विता दत्त गुप्तन, कुमार और विशाल दादलानी। विशाल-शेखर का ट्रैक-रिकार्ड अच्छा रहा है। 'ओम शांति ओम', ’दोस्ताना’ और 'बचना ऐ हसीनों' के हिट संगीत के बाद अब देखना है कि क्या उनका कमाल इस फ़िल्म में भी चलता है। वैसे काफ़ी यंग फ़िल्म है और म्युज़िक भी भी उसी अंदाज़ का है। तो सुनते हैं पहला गीत जिसे विशाल दादलानी ने गाया है और लिखा है अन्विता ने।

गीत: जब मिला तू


सुजॊय - यह एक पेप्पी नंबर था, और कई ईलेक्ट्रॊनिक इन्स्ट्रूमेण्ट्स के इस्तेमाल से एक शार्प फ़ील आया है गीत में। "रु तु रु तु" गीत का कैच लाइन है जो गीत को दिल-ओ-दिमाग़ पर बसाने का काम करता है। विशाल ने अपने जानदार गायकी से गीत को वही रफ़ फ़ील दिया है जिसकी इस गीत को ज़रूरत थी। अच्छी बात यह भी है कि पाश्चात्य और पेपी नंबर होते हुए भी गीत के बोल वज़नदार हैं। कहने का मतलब यह कि सिर्फ़ संगीत पर ही नहीं, बल्कि बोलों पर भी ध्यान दिया गया है। और विश्व दीपक जी, अन्विता के लिखे इस गीत को सुनते हुए यकायक फ़िल्म 'दोस्ताना' के "जाने क्यों दिल चाहता है" गीत की याद आ ही जाती है। कुछ कुछ वैसा अंदाज़ मिलता है इस गीत में। मेरे ख़याल से तो इस गीत को अच्छा रेस्पॊन्स मिलने वाला है।

विश्व दीपक - जी सुजॊय जी, मेरा भी यही ख्याल है। जहाँ विशाल अपनी अलग तरह की आवाज़ के लिए जाने जाते हैं तो अन्विता भी इन दिनों अपने शब्दों का लोहा मनवा रही हैं। मेरे जहन में अन्विता का लिखा "खुदा जाने" (बचना ऐ हसीनों) अभी तक जमा हुआ है। तब से मैं इनकी लेखनी का फैन हूँ। अभी हाल में हीं "बदमाश कंपनी" का "चस्का" भी इनके लफ़्ज़ों के कारण लीक से हटकर साबित हुआ है। गौरतलब है कि बालीवुड में महिला गीतकारों की बेहद कमी है, इसलिए दुआ करता हूँ कि अन्विता इस पुरूष-प्रधान संगीत की दुनिया में अपना स्थान पक्का कर लें।

सुजॊय - आमीन! चलिए अब सुना जाए दूसरा गीत जिसे शफ़ाक़त अमानत अली और सुनिधि चौहान ने गाया है, गीतकार हैं विशाल दादलानी। जी हाँ, विशाल आज के दौर के उन गिने चुने कलाकारों में से हैं जो एक संगीतकार भी हैं, एक गायक भी, और एक गीतकार के हैसियत से भी अच्छा परिचय दे रहे हैं। कोरस और अकॊस्टिक गिटार के साथ गीत आरम्भ होता है। शफ़ाक़त अमानत अली, जो करण जोहर की कई फ़िल्मों में गीत गा चुके हैं ("मितवा" - कभी अलविदा ना कहना, "तेरे नैना" - माइ नेम इज़ ख़ान), इस गीत में भी उनकी आवाज़ ने वही असर किया है, और इस गीत के मूड के मुताबिक उनकी आवाज़ अच्छी जमी है।

गीत: बिन तेरे


विश्व दीपक - गीत को सुनकर यह कहना ही पड़ेगा कि विशाल दादलानी एक बहुत ही अच्छे गीतकार हैं। उन्होंने इस गीत में रोमांस का माहौल बनाने के लिए उर्दू का जिस तरह इस्तेमाल किया है, वैसा इस्तेमाल आजकल के गीतों में बहुत कम ही सुनाई देता है। सुनिधि की आवाज़ इस गीत में अंतिम हिस्से में आतॊ है और बहुत ही नाज़ुकी के साथ उन्होने गाया है। दर=असल सुनिधि के आवाज़ के दो रूप हैं, एक रूप वह जिसमें वो "धूम मचाले" और "ऐसा जादू डाला रे" जैसे गीत गाती हैं और दूसरा रूप वह जिसमें वो इस तरह की नरमी वाले गानें गाती हैं। और दोनों ही में उन्हे महारथ हासिल है। इसमें कोई शक़ नहीं कि इस दौर की अग्रणी गायिका हैं सुनिधि। लेकिन जहाँ तक इस गीत की बात है, कुछ कमी सी लगती है, वह एक्स-फ़ैक्टर मिसिंग है जो गीत को हिट बनाने के लिए ज़रूरी होता है। देखते हैं कैसा चलता है यह गीत।

सुजॊय - और अब इस फ़िल्म का शीर्षक गीत और एक बार फिर विशाल दादलानी की आवाज़। इस बार गीतकार हैं कुमार। गीत एक डान्स नंबर है जिसकी धुन बहुत ही कैची है, बहुत ही ऐडिक्टिव है, जिसे फ़िल्म के परदे पर इमरान ख़ान एक क्लब में डान्स करते हुए नज़र आएँगे। 'जाने तू या जाने ना' के "पप्पु काण्ट डान्स साला" के लोकप्रिय डान्स के बाद अब देखना यह है कि क्या इस डान्स नंबर को भी वही सफलता प्राप्त होती है। चलिए गीत सुन लेते हैं, फिर इस गीत की थोड़ी और चर्चा करते हैं।

गीत: आइ हेट लव स्टोरीज़


सुजॊय - "मिल गए जो छोरा छोरी, हुई मस्ती थोड़ी थोड़ी, बस प्यार का नाम ना लेना, आइ हेट लव स्टोरीज़" - शायद आज की युवा पीढी को काफ़ी रास आएँगे ये बोल। जो भी है, विशाल दादलानी ने फिर एक बार गायक और संगीतकार की दोहरी भूमिका निभाई है। कुमार के शब्द हास्यप्रद होते हुए भी रचनात्मक सुनाई देते हैं। जिस तरह का चलन आज कर फ़िल्मी गीतों में छाया हुआ है कि हर गीत में कुछ कुछ अंग्रेज़ी के शब्द डाले जा रहे हैं, तो इस फ़िल्म के गीतों में भी मौजूद हैं, और विशाल शेखर एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिन्होने इस शैली का काफ़ी इस्तेमाल किया है।

विश्व दीपक - जी सही कह रहे हैं आप। मज़े की बात तो यह है कि अन्विता की तरह "कुमार" भी विशाल-शेखर के काफी प्रिय हैं। आप ’दोस्ताना’ का ’माँ दा लाडला’ कैसे भूल सकते हैं! कुमार इस तरह के गाने लिखने में खासे माहिर हैं। इन दिनों तो "कुमार" लगभग हर फिल्म में नज़र आ रहे हैं। जैसे कि "आल द बेस्ट", "जश्न", "दिल दोस्ती इटीसी", "चांस पे डांस", "गोलमाल", "गोलमाल रिटर्न्स", "सिकंदर" और "लाईफ़ पार्टनर"। वैसे क्या आपको यह पता है कि "ओम शांति ओम" में "जावेद अख्तर" और "विशाल दादलानी" (आँखों में तेरे) के अलावा एक और गीतकार थे और वो थे "कुमार"। उन्होंने उस फिल्म का सबसे ज्यादा सोलफुल नंबर (जग सूना-सूना लागे) लिखा था। मुझे यह बात जानकर बड़ा हीं सुखद आश्चर्य हुआ और मैं इस बात को आपसे शेयर किए बिना नहीं रह पाया।

सुजॊय - अरे वाह! मुझे तो यह पता हीं नहीं था। हम आगे बढेंगे तो हमें ऐसी हीं और भी बातें मालूम चलेंगी। तो चलिए फ़िल्म का चौथा गीत सुनते हैं जिसमें आवाज़ें हैं श्रेया घोषाल और सोना महापात्रा की। श्रेया का नाम सुनते ही सॊफ़्ट रोमांटिक गीत की कल्पना हम करते हैं। इस गीत में भी वही बात है। ९० के दशक में कई गीत ऐसे बने थे जिनमें इला अरुण ने राजस्थानी लोक शैली में कुछ कुछ पंक्तियाँ गाईं थीं जैसे कि फ़िल्म 'लम्हे' में "मोरनी बागा मा बोले आधी रात मा" या फिर "मेघा रे मेघा", फ़िल्म 'बटवारा' में "हाए उसके डंक बिछवा का", आदि। इन सभी गीतों में मुख्य गायिका रहीं लता जी। अब 'आइ हेट...' के इस गानें में मुख्य गायिका हैं श्रेया और राजस्थानी के शब्द गाईं हैं सोना महापात्रा ने। इन दोनों की आवाज़ों में जो कॊन्ट्रास्ट है, वही है गीत का आकर्षण। "बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार है", सुनते हैं यह गीत और देखें कि आपका दिल भी बहारा हो पाता है या नहीं। और इस गीत के ज़रिए इस चिलचिलाती गरमी में हम निमंत्रण देते हैं सावन को। गीतकार हैं कुमार।

गीत: बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार है


विश्व दीपक - सुजॊय जी, आपने तो इस गीत के बारें में सब कुछ हीं कह दिया है। इसलिए मेरे कहने के लिए कुछ ज्यादा नहीं बचता। फिर भी मैं सोना महापात्रा के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। सोना कालेज आफ़ इन्जीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी, भुवनेश्वर से अभियांत्रिकी स्नातक (बी०ई०) हैं, उन्होंने पुणे के सिम्बायोसिस से एम०बी०ए० की डिग्री हासिल की है और वो मारिको, इंडिया में बांड मैनेजर भी रह चुकी हैं। उनकी छोटी बहन प्रतीचि महापात्रा "विवा" बैंड के लिए गाती हैं। विशाल-शेखर की प्रिय "अनुश्का मनचंदा" भी इसी बैंड की हैं। सोना का पहला वीडियो सिंगल "बोलो ना" एम०टी०वी० पे सबसे ज्यादा देखा गया और फरमाईश किया गया वीडियो है। वहीं "तेरे इश्क़ नचाया" तो इतना ज्यादा म़क़बूल हुआ कि इसे विश्व के अमूमन हर चैनल पर प्रसारित किया गया। कुल मिलाकर "सोना" को ब्युटी विद व्याएस एंड ब्रेन कहा जा सकता है।

सुजॊय - जी। वैसे क्या आपको यह पता है कि "सोना" का नया एलबम "दिलजले" हिन्दुस्तान का पहला और एकमात्र ऐसा डिजीटल एलबम है जिसे पूरे विश्व के नोकिया म्युज़िक स्टोर्स में एक साथ रीलिज किया गया/जा रहा है। इस एलबम में संगीत है "राम संपत" का और बोल लिखे हैं "मुन्ना धीमन" और "राम संपत" ने। खैर ये सब बातें कभी और। अभी तो इस फ़िल्म के अंतिम गीत की बारी है। सूरज जगन और महालक्ष्मी अय्यर की आवाज़ों में "सदका किया यूँ इश्क़ का", बोल अन्विता के। साधारणत: सूरज जगन ने अब तक तेज़ और हार्ड हिटिंग रॊक शैली के गाने गाए हैं, लेकिन इस गीत में उनके आवाज़ के नरम पक्ष का परिचय हमें मिलता है। लगता है इस गीत को वही कामयाबी मिलेगी जो कामयाबी "ख़ुदा जाने ये क्या हुआ है" को मिली है। विश्व दीपक जी, आपका क्या कहना है इस गीत के बारे में?

विश्व दीपक - इस गीत की जो बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई, वह है इस गीत का "कैची फ्रेज" यानि कि "सदका किया"। "अन्विता" ने बहुत हीं प्यारा लेकिन अनूठा शब्द हमारे बीच रखा है। मैं ज्यादा गहराई में तो नहीं जाना चाहूँगा लेकिन इतना बताता चलूँ कि सदका करने का अर्थ होता है ईश्वर या अल्लाह के नाम पर दान करना, किसी पर कुछ निछावर करना। आपने "सदके जाऊँ" का इस्तेमाल तो कई जगह देखा और सुना होगा। तो वहाँ भी यही सदका है। अरे, सदका करते-करते तो मैं "सूरज जगन" को भूल हीं गया। माफ़ कीजिएगा। तो जहाँ तक "सूरज" का सवाल है तो हमने उन्हें पहली मर्तबा "प्यार में कभी-कभी" में "हम नवजवां" गाते हुए सुना था। लेकिन वह गाना कुछ ज्यादा चला नहीं, इसलिए सूरज का भी नाम न हुआ। सही मायनें में सूरज को जाना गया "दिल दोस्ती ईटीसी" के "दम लगा" के कारण। उसके बाद "रॊक ऒन" के "जहरीले" ने तो उन्हें "रॊक स्टार" हीं बना दिया। आगे की कहानी तो जगजाहिर है। तो चलिए हम इसी बात पर "सदका किया" का लुत्फ़ उठाते हैं।

गीत: सदका किया


"आइ हेट लव स्टोरीज़" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - इस पूरे एल्बम की बात करें तो मुझे इसके ज़्यादातर गानें पसंद आए हैं, ख़ास तौर से "जब मिला तू", "बहारा बहारा" और "सदका किया"। विशाल शेखर ने हमें निराश नहीं किया।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, निराश करना तो दूर की बात है, उल्टे मैं यह कहूँगा कि विशाल-शेखर उम्मीदों से बढकर साबित हुए हैं। मुझे इस फिल्म के सारे गाने पसंद आएँ। इन पाँच गानों के अलावा एलबम में दो और गाने हैं- पहला शेखर की आवाज़ में बिन तेरे (रिप्राईज) और दूसरा राहत फतेह अली खान की आवाज़ में बहारा (चिल वर्सन)। ये दोनों वर्सन्स भी कमाल के बन पड़े हैं। मैं सभी पाठकों/श्रोताओं से यह आग्रह करूँगा कि वे इन दोनों गानों को भी जरूर सुनें, खासकर शेखर की आवाज़ में "बिन तेरे"। इस गाने में "शेखर" की आवाज़ को बेहद सराहा गया है।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५८- फ़िल्मी संगीतकार बनने से पहले विशाल दादलानी किस मशहूर बैण्ड में गाया करते थे(आज भी गाते हैं)?

TST ट्रिविया # ५९- आपने पहली बार फ़िल्म 'फ़ैमिली' में गीत गाया था। उसके बाद फ़िल्म 'जम्बो' में सोनू निगम के साथ आपने अपना पहला युगल गीत गाया था। आपने इंजिनीयरिंग् की हुई है और आप एम.बी.ए. भी हैं। बताइए हम किस गायक/गायिका की बात कर रहे हैं?

TST ट्रिविया # ६०- सूरज जगन ने हाल में एक ब्लॊकबस्टर फ़िल्म में एक गीत गाया था जो बेहद बेहद कामयाब हुई थी। गीत के बोल अंग्रेज़ी के थे जिसका भाव कुछ ऐसा था कि मुझे एक मौका और दे दो, मैं फिर से एक बार छोटे से बड़ा होना चाहता हूँ। बहुत आसान है, बताइए हम सूरज जगन के गाए किस गीत की बात कर रहे हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. किशोर कुमार की जीवनी पर बनने वाली फ़िल्म में रणबीर किशोर दा का चरित्र निभाएँगे। लता से किशोर दा की शख़सीयत के कुछ पहलुओं से अपने आप को अवगत करवाने के लिए वो लता जी से मिलने वाले थे।
२. फ़िल्म 'बाबुल' का "कहता है बाबुल ओ मेरी बिटिया"।
३. फ़िल्म 'हिप हिप हुर्रे' में।

सीमा जी, आपने पहले सवाल का सही जवाब दिया है। तीसरे सवाल में आप बहुत नज़दीक थीं। बधाई स्वीकारें!!

Friday, June 26, 2009

इंशा जी उठो अब कूच करो....एक गज़ल जिसके कारण तीन फ़नकार कूच कर गए

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२४

ज की गज़ल को क्या कहूँ, कुछ ऐसी कहानी हीं इससे जुड़ी है कि अगर कुछ न भी हो तो बहुत कुछ कहा जा सकता है,फिर भी दिल है कि एक शब्द कहने या लिखने से पहले सौ बार सोचने की सलाह दे रहा है। यूँ तो मेरे पास लगभग २० गज़लें थीं,जिनमें से किसी पर भी मैं लिख सकता था,लेकिन न जाने क्यों फ़ेहरिश्त की आठवीं गज़ल मेरे मन को भा गई,बाकियों को सुना भी नहीं,इसके बोल पढे और इसे हीं सुनने लगा और यह देखिए कि लगातार तीन-चार दिनों से इसी गज़ल को सुनता आ रहा हूँ। इस गज़ल से जुड़ी जो कहानियाँ हैं, दिमाग उन्हें फ़ितूर साबित करने पर तुला है,लेकिन दिल है कि कभी-कभार उन कहानियों पर यकीं कर बैठता है। अब दिल तो दिल है, उसकी भी तो सुननी होगी। इसलिए सोचता हूँ कि एक बार सही से बैठूँ और दिल-दिमाग के बीच समझौता करा दूँ। इसमें आप मेरा साथ देंगे ना? तो पहले उन कहानियों का हीं ज़िक्र करता हूँ, फिर निर्णय करेंगे कि इनमें कितनी सच्चाई है। इस गज़ल के शायर के बारे में यह कहा जाता है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी, मतलब कि इसे लिखने के बाद वो कुछ भी न लिख पाएँ और कुछ दिनों या महीनों के बाद सुपूर्द-ए-खाक़ हो गए। इस गज़ल को मक़बूल करने में शायर के बाद जिन फ़नकार का हाथ था, मतलब कि जिन्होंने इसे गाया था, उनके बारे में यह कहा जाता है कि जिस दिन उन्होंने पी०टी०वी० के लिए इस गज़ल की रिकार्डिंग की, उसके अगले हीं सुबह दिल का दौरा पड़ने से उनका स्वर्गवास हो गया। इतना हीं नहीं, इस गज़ल के गायक की १९७४ में मौत के बाद उनके साहबजादे ने इसे गाना शुरू किया। चूँकि पिता की याद इस गज़ल से जुड़ी थी,इसलिए इसे गाने के दौरान हमेशा हीं वे भावुक हो जाया करते थे और आँसूओं का सैलाब उमड़ पड़ता था। यही कारण था कि इस गज़ल को हर बार हीं वे मुशायरे के अंत में गाते थे, ताकि रूँधे गले के कारण दूसरे गज़लों पर कोई असर न हो। नियति का खेल देखिए कि उनकी मौत भी दिल का दौरा पड़ने से हुई। ८ अप्रैल २००७ को लंदन में उन्होंने अंतिम साँस ली और उनके बारे में भी यही कहा जाता है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी। शायर ने ५१ साल की उम्र में दम तोड़ा, गुलूकार को महज़ ४२ सावन हीं नसीब हुए तो गुलूकार के सुपूत्र की किस्मत में ५२ वसंत हीं लिखे थे। अब इसे इत्तेफ़ाक कहें या कुछ और?

दिल की इतनी दलीलों के बाद, जब भी मैं दिमाग की तरफ़ रूख करता हूँ तो इन कहानियों में कुछ अटपटा-सा महसूस होता है और वही अटपटापन है,जो मुझे डरने नहीं देता। जहाँ तक गुलूकार की बात है तो उनकी मौत से जुड़े कोई भी सुराग मेरे हाथ नहीं लगे इसलिए यह मानना पड़ेगा कि वे नितांत स्वस्थ थे और रिकार्डिंग के अगले दिन पड़ा दिल का दौरा हीं उनकी मौत का एकमात्र कारण था। लेकिन अगर हम शायर और दूसरे गुलूकार की तरफ़ देखें तो यह जान पड़ता है कि जहाँ पहले को "होज़किन्स लिम्फ़ोमा(एक प्रकार का कैंसर)" था तो वहीं दूसरे को "हाइपरट्रोपिक कार्डियोमायोपैथी(एक प्रकार की दिल की बीमारी" और ये बीमारियाँ हीं उनके मौत का सबब थीं। शायर के बारे में जो कहा गया है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी, तो भाई अगर गुलूकार की मौत "१९७४" में हुई और शायर की "१९७८" में और यह भी मालूम है कि शायर ने बिस्तर-ए-मर्ग(मौत का बिछावन)से भी कई सारी रचनाएँ लिखीं थीं तो इस गज़ल का उनकी अंतिम गज़ल होने का सवाल हीं नहीं उठता है। अब अगर दूसरे गुलूकार की बात करें तो चूँकि हर मुशायरे के अंत में वे इसी गज़ल को गाते थे, तो लाजिमी है कि अंतिम मुशायरे के अंत में भी उन्होंने इसी को गाया होगा और इस तरह यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल हो गई। तो इस तरह मैं यह निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि भले हीं इन तीनों फ़नकारों की मौत बहुत हीं कम उम्र में हुई,लेकिन उन घटनाओं के पीछे इस गज़ल का कोई हाथ न था। वैसे इस गज़ल पर ऊँगली उठाए जाने का एक और कारण है और वह कारण बड़ा हीं पुख्ता है। अगर आप इस गज़ल के बोल पर ध्यान देंगे तो बोल से साफ़ ज़ाहिर है कि इसमें दुनिया से कूच करने की बात की जा रही है। "इंशा जी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी को लगाना क्या"- जी हाँ हम इसी गज़ल की बात कर रहे थे, शायद आपने इसे पहले सुना हो और अगर सुना है तो फिर आपको इससे जुड़े उन तीनों फ़नकारों की जानकारी तो होगी हीं। नहीं है? कोई बात नहीं, हम किस दिन काम आएँगे।

जानकारियों का दौर हम "गज़लगो" से हीं शुरू करते हैं। जन्म से "शेर मुहम्मद खान" और शायरी से "इब्ने-इंशा" की पैदाईश जालंधर के फ़िल्लौर में हुई थी। दूसरे फ़नकारों की तरह हीं इन्हें भी बँटवारे के वक्त पाकिस्तान जाना पड़ा। पाकिस्तान में ये बहुत सारे सरकारी सेवाओं से जुड़े थे, जिनमें रेडियो पाकिस्तान, संस्कृति मंत्रालय और राष्ट्रीय पुस्तक केंद्र प्रमुख हैं। "संयुक्त राष्ट्र" का एक हिस्सा होने के कारण इन्हें कई देशों का दौरा करना पड़ा और उसी दौरान इनकी लेखनी ने एक नया मोड़ लिया। एक जाना-माना उर्दू कवि, विदूषक(ह्युमरिस्ट) और कार्टूनिस्ट "यात्रा-वृतांत लेखक" हो गया। इनकी यात्रा-वृतांत से जुड़ी कई सारी पुस्तकें हैं, जैसे कि "आवारागर्द की डायरी", "दुनिया गोल है", "इब्न-ए-बतूता के ताक़ुब में","चलते हो तो चीन को चलिए", "नगरी-नगरी फ़िरा मुसाफ़िर"। हास्य से लिपटी "उर्दू की आखिरी किताब" इतनी ज्यादा चर्चित हुई कि १९७१ से अब तक ३३ से भी ज्यादा बार यह प्रकाशित हो चुकी है। "इब्न-ए-इंशा" जी का "गज़लों" के क्षेत्र में भी कोई सानी नहीं है। "गुलाम अली" साहब की सबसे प्रसिद्ध प्रस्तुति "कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा" को इन्होंने हीं कलमबद्ध किया था। इन्होंने गज़लों के साथ कई सारे प्रयोग भी किए हैं। आब आज की हीं गज़ल को देखिए। अमूमन लोग मक़ते में अपना तखल्लुस इस्तेमाल करते हैं, या फिर वहाँ भी नहीं करते। लेकिन इन्होंने तो गज़ल की शुरूआत हीं तखल्लुस से कर दी है- "इंशा जी उठो...." । चलिए अब उठकर शायर से गुलूकार की तरफ़ चलते है। गायकी की बेमिसाल जोड़ी "अमानत अली-फ़तेह अली" (हम यहाँ नुसरत साहब की बात नहीं कर रहे) में अमानत अली बड़े थे और ज़्यादा मकबूल भी। इनके दादा "अली बख्श खान" पटियाला घराने के सह-संस्थापक थे और इनके पिता "अख्तर हुसैन खान" ने पटियाला घराने की उसी धरोहर को अपने बेटों तक सकुशल पहुँचाया था। "अमानत अली-फ़तेह अली" की जोड़ी खबरों में तब आई, जब १९४९ में आयोजित "आल बंगाल म्युज़िकल कांफ़रेंस" में इन्होंने अपनी गायकी से समां बाँध दिया था। उस समय "अमानत अली" १७ साल के थे और "फ़तेह अली" १४ के। उसके बाद तो इन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पटियाला घराने में "खयाल" गाने वाले आगे चलकर दो खेमों में बँट गए। एक खेमे को इन दोनों भाईयों ने थामा था तो दूसरे खेमे की कमान संभाली थी बड़े गुलाम अली साहब,उनके भाई बरकत अली और खां साहब के बेटे मुनव्वर अली खान ने। अमानत अली खां साहब के गुजर जाने के बाद "असद अमानत अली खां" साहब मैदान में उतरे। यही वे तीसरे फ़नकार थे, जिनकी बात हमने शुरू में की थी। इनके बारे में कभी बाद में चर्चा करेंगे। वैसे आपको यह बता दें कि "अमानत अली खां" साहब के सबसे छोटे शाहबजादे "शफ़कत अमानत अली खान" ,जिन्हें लोग "रौक स्टार उस्ताद" भी कहते हैं, कभी पाकिस्तानी बैंड "फ़्युज़न" के मुख्य गायक हुआ करते थे और आजकल ये हिंदी फ़िल्मों के लिए गाते हैं। आपने "कभी अलविदा न कहना" का "मितवा" या फिर "डोर" का "ये हौसला" तो सुना हीं होगा। कभी इनके बारे में भी विस्तार से गुफ़्तगू करेंगे, अभी तो आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। उससे पहले:

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर,
जंगल तेरे पर्बत तेरे बस्ती तेरी सहरा तेरा|


तो हाँ, मेहरबान, कद्रदान, साहिबान अपना दिल थाम लें,क्योंकि हम आपको वह गज़ल सुनाने जा रहे हैं, जो हर मायने में अलहदा है। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

इंशा जी उठो अब कूच करो,इस शहर में जी को लगाना क्या!
वहशी का सुकूं से क्या मतलब,जोगी का नगर में ठिकाना क्या!!

इस दिल के दरिदा दामन में,देखो तो सही सोचो तो सही,
जिस झोली में सौ छेद हुए,उस झोली का फ़ैलाना क्या!

शब बीती चाँद भी डूब चला, जंजीर पड़ी दरवाजे पे,
क्यूँ देर गए घर आए हो, सजनी से करोगे बहाना क्या?

जब शहर के लोग ना रस्ता दें,क्यों बन में न जा बिसराम करें,
(क्यों वन में न जा विश्राम करें)
दीवानों की-सी ना बात करें, तो और करे दीवाना क्या!


वैसे तो "अमानत अली" साहब के गाए इस गज़ल में इतने हीं अशआर हैं,लेकिन हम आपको बाकी के दो अशआर भी सुनाए देते हैं:

उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें,
जिसे देख सकें पर छू न सकें,वो दौलत क्या,वो खज़ाना क्या!

उसको भी जला दुखते हुए मन,इक शोला लाल भभुका बन,
यूँ आँसू बन बह जाना क्या, यूँ माटी में मिल जाना क्या!




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत,
रोने को यहाँ वैसे भी ___ नहीं मिलती...

आपके विकल्प हैं -
a) सोहबत, b) कीमत, c) फुर्सत, d) कुर्बत

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"चिराग" और शेर कुछ यूँ था -

वो फिराक हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो चिराग बनके जला न हो...

स्वप्न मंजूषा जी बधाई आपको. आपने फरमाया-

चिराग दिल का जलाओ बहुत अँधेरा है,
कहीं से लौट के आओ बहुत अँधेरा है...

दिशा जी स्वागत आपका, ये था आपका शेर -

वो चिराग ही तो है जो रोशन करे हर अँधेरे को
वरना जुगनू तो ना जाने कितने टिमटिमाते हैं

शरद जी भी आये इस शेर के साथ -

कहाँ तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

भाई वाह बहुत खूब...सुमित जी ने याद दिलाया ये मशहूर शेर -

चिरागों ने जब अंधेरो से दोस्ती की है
जला कर अपना घर हमने रौशनी की है

दोस्तों जोरदार तालियाँ पूजा जी के लिए जिन्होंने पिछली ग़ज़ल के बोलों के अर्थ इतने विस्तार से सबके सामने रखा....बहुत बहुत आभार पूजा जी.

मनु जी लौटे बहुत दिनों के बाद और फरमाया-

आ ही जायेंगे वो चिराग ढले,
और उनके कहाँ ठिकाने हैं...

जी हाँ दोस्तों यही है आपका ठिकाना, स्नेह बनाये रखें....अगली महफिल तक खुदा हाफिज़...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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