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Sunday, February 24, 2019

राग नन्द : SWARGOSHTHI – 408 : RAG NAND






स्वरगोष्ठी – 408 में आज

कल्याण थाट के राग – 6 : राग नन्द

पं. कुमार गन्धर्व से राग नन्द का खयाल और लता मंगेशकर से इस राग में पिरोया फिल्मी गीत सुनिए





पण्डित कुमार गन्धर्व
लता मंगेशकर और मदन मोहन
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के छठे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के एक और जन्य राग ‘नन्द” पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “मेरा साया” से लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। संगीतकार मदन मोहन ने इस गीत को राग नन्द के स्वरों का आधार दिया है।



आज के अंक में हमने आपके लिए दोनों मध्यम स्वरों से युक्त, अत्यन्त मोहक राग ‘नन्द’ चुना है। इस राग को नन्द कल्याण, आनन्दी या आनन्दी कल्याण के नाम से भी पहचाना जाता है। यह कल्याण थाट का राग माना जाता है। यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसके आरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग नहीं होता। इसके आरोह में शुद्ध मध्यम का तथा अवरोह में दोनों मध्यम का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम माना जाता है। यह राग कामोद, हमीर और केदार के निकट होता है अतः गायन-वादन के समय राग नन्द को इन रागों से बचाना चाहिए। राग नन्द से मिल कर राग नन्द-भैरव, नन्द-भैरवी, नन्द-दुर्गा और नन्द-कौंस रागों का निर्माण होता है। राग नन्द की सार्थक अनुभूति कराने के लिए आज हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में एक बन्दिश सुनवाएँगे। पण्डित कुमार गन्धर्व का जन्म आठ अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। जिन दिनों कुमार गन्धर्व ने संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 के बीच वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। कुमार गन्धर्व की सांगीतिक प्रतिभा की अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको उनके प्रिय राग नन्द के स्वरों में एक बन्दिश सुनवाते हैं। तीनताल में निबद्ध इस खयाल के बोल हैं- “राजन अब तो आ जा रे...”

राग नन्द : ‘राजन अब तो आ जा रे...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व


राग नन्द में तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग अवरोह में पंचम स्वर के साथ किया जाता है, जैसा कि कल्याण थाट के अन्य रागों में किया जाता है। राग नन्द में राग बिहाग, कामोद, हमीर और गौड़ सारंग का सुन्दर समन्वय होता है। यह अर्द्धचंचल प्रकृति का राग होता है। अतः इसमें विलम्बित आलाप नहीं किया जाता। साथ ही इस राग का गायन मन्द्र सप्तक में नहीं होता। इस राग का हर आलाप अधिकतर मुक्त मध्यम से समाप्त होता है। आरोह में ही मध्यम स्वर पर रुकते हैं, किन्तु अवरोह में ऐसा नहीं करते। राग नन्द में पंचम और ऋषभ स्वर की संगति बार-बार की जाती है। आरोह में धैवत और निषाद स्वर अल्प प्रयोग किया जाता है, इसलिए उत्तरांग में पंचम से सीधे तार सप्तक के षडज पर पहुँचते है। भारतीय संगीत के इस बेहद मनमोहक राग नन्द के सौन्दर्य का आभास कराने के लिए अब हम आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। लता मंगेशकर के सुरों और मदनमोहन के संगीत से सजे अनेक गीत कर्णप्रियता और लोकप्रियता की सूची में आज भी शीर्षस्थ हैं। इस सूची में 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरा साया’ का एक गीत है- ‘तू जहाँ जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा...’। राजा मेंहदी अली खाँ की गीत-रचना को मदनमोहन ने राग नन्द के आकर्षक स्वरों पर आधारित कर लोचदार कहरवा ताल में ढाला है। मदनमोहन से इस गीत को राग नन्द में निबद्ध किये जाने का आग्रह स्वयं लता मंगेशकर जी ने किया था। न जाने क्यों, हमारे फिल्म-संगीतकारों ने इस मनमोहक राग का प्रयोग लगभग नहीं के बराबर किया। आप यह गीत सुनिए और राग नन्द के सौन्दर्य में खो जाइए। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। और हाँ, इस अंक की संगीत पहेली को हल करने का प्रयास करना न भूलिएगा।

राग नन्द : ‘तू जहाँ जहाँ चलेगा...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – मेरा साया



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 408वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। पहेली क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 2 मार्च, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 410 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 406 की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म “ज़िद्दी” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – छायानट, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, रमेश कुमार शर्मा (रमेश जी ने अपने उत्तर के साथ अपना पता नहीं लिखा), अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” की छठी कड़ी में आज आपने राग “नन्द” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायक पण्डित कुमार गन्धर्व से इस राग में निबद्ध तीनताल की एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। इसी राग को आधार बना कर 1966 में प्रदर्शित फिल्म “मेरा साया” में एक गीत शामिल किया गया था। संगीतकार मदन मोहन ने यह गीत राग “नन्द” के स्वरों में पिरोया है। इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछले अंकों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग नन्द : SWARGOSHTHI – 408 : RAG NAND : 24 फरवरी, 2019

Sunday, January 5, 2014

कुमार गन्धर्व, जसराज और मन्ना डे ने भी कबीर को गाया

  
स्वरगोष्ठी – 149 में आज

रागों में भक्तिरस – 17

‘दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सत्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का नये वर्ष की पहली कड़ी में हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। पिछले अंक में हमने यह पद ध्रुवपद, भजन और मालवा की लोक संगीत शैली में प्रस्तुत किया था। कबीर का यही पद आज हम सुविख्यात गायक पण्डित कुमार गन्धर्व, पण्डित जसराज और पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 
  


बीर एक सन्त कवि ही नहीं समाज सुधारक भी थे। उन्होने हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों में व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध अभियान चलाया था। अन्धविश्वासों पर कुठाराघात करते हुए कबीर ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल दिया। उन्होने अपने काव्य में बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। उनके काव्य में भरपूर व्यंग्य मौजूद है, जो अन्धविश्वास पर जोरदार प्रहार करते हैं। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओं के शब्द मिलते हैं। खड़ीबोली, ब्रज, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द तो प्रचुर मात्रा में हैं। इसके अलावा तत्कालीन शासकों की अरबी और फारसी के शब्दों का भी उन्होने प्रयोग किया है। इसीलिए उनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है। पिछले अंक में हमने कबीर के पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। आज हम उस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए यही पद पहले पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। रागदारी संगीत में घरानों के घेरे को तोड़ कर अपनी एक अलग शैली का सूत्रपात करने वाले कुमार गन्धर्व मालवा के सबसे दिव्य सांस्कृतिक विभूति हैं। कुमार गन्धर्व एकमात्र ऐसे संगीतज्ञ हुए हैं जिन्होंने मालवा क्षेत्र की बोली मालवी और उसके लोकगीतों को रागों से सुसज्जित कर बन्दिशों का स्वरूप दिया। कबीर की रचनाओं पर उनका शोध भारतीय संगीत के भण्डार को समृद्ध करता है। स्वरों के माध्यम से मानो उन्होने कबीर के रहस्यवाद को पर्त-दर-पर्त खोल कर रख दिया हो। लोक संगीत को रागदारी संगीत के समकक्ष ले जाने वाले कुमार जी ने कबीर को जैसा गाया वैसा कोई नहीं गा सकेगा। आज के अंक में प्रस्तुत कबीर के पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ को कुमार जी ने राग जोगिया के स्वरों में बाँधा है। राग जोगिया भक्तिरस में छिपे वैराग्य भाव को अभिव्यक्त करने में पूर्ण समर्थ है। प्रथम प्रहर अर्थात सूर्योदय के समय गाया-बजाया जाने वाला यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कर्नाटक संगीत पद्यति का राग सावेरी, इस राग के समतुल्य होता है। राग जोगिया के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। आरोह में ऋषभ और धैवत कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। अवरोह के दो रूप प्रचलित है। अवरोह के पहले रूप में गान्धार और निषाद स्पष्ट होता है। यह रूप कर्नाटक पद्यति के राग सावेरी के निकट होता है। दूसरे रूप में कोमल गान्धार स्वर केवल अवरोह में प्रयोग होता है, वह भी मात्र कण रूप में। यह रूप राग गुणकली के निकट हो जाता है। अवरोह में सात स्वर का प्रयोग होता है। इस प्रकार यह राग औड़व-सम्पूर्ण जाति का है। राग जोगिया में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास अर्थात ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भैरव में ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार राग जोगिया में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का आन्दोलन नहीं होता, जबकि राग भैरव में ऐसा होता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है। आइए, अब आप पण्डित कुमार गन्धर्व से कबीर का पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ सुनिए, जिसे उन्होने राग जोगिया और चाँचर ताल में प्रस्तुत किया है।


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व : राग - जोगिया : चाँचर ताल



कबीर के इस पद को अनेक श्रेष्ठ गायकों ने स्वर दिया है। इन्हीं में विश्वविख्यात कलासाधक हैं, पण्डित जसराज। कबीर के इस भक्तिपद का पण्डित जसराज के स्वरों से जो योग हुआ है, उसमें आध्यात्म पक्ष खूब मुखरित हुआ है। पण्डित जसराज की आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की गायन शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याममनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसन्धान कर कई नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है उनके द्वारा प्रवर्तित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो प्राचीन शास्त्रोक्त मूर्छना पद्यति को पुनर्जीवित करता है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में दो भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। जसराज जी के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। भक्तिरस तो इनकी हर रचना में परिलक्षित होता ही है। पण्डित जी ने कबीर के इस पद को राग अहीर भैरव के स्वरों का आवरण प्रदान किया है। अहीर भैरव एक प्राचीन राग है, जिसमें अप्रचलित और लुप्तप्राय राग अभीरी या अहीरी और भैरव का मेल है। स्वरों के माध्यम से भक्तिरस को उकेरने में सक्षम इस राग में कोमल ऋषभ और कोमल निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। राग अहीर भैरव के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है, अर्थात यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। दक्षिण भारतीय कर्नाटक पद्यति का राग चक्रवाक, इस राग के समतुल्य है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। उत्तरांग प्रधान इस राग का गायन-वादन दिन के प्रथम प्रहर में अत्यन्त सुखदायी होता है। कबीर का पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ अब आप पण्डित जसराज से राग अहीर भैरव के स्वरों में सुनिए।


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : पण्डित जसराज: राग – अहीर भैरव





इसी क्रम में आज हम आपको मानव जीवन की उपमा एक चादर से करते कबीर के इस पद का एक फिल्मी संस्करण भी सुनवाते हैं। 1954 में कबीर के जीवन पर एक फिल्म ‘महात्मा कबीर’ बनी थी, जिसके संगीतकार अनिल विश्वास थे। इस फिल्म के संगीत के विषय में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “1953 में मन्ना डे से फिल्म ‘हमदर्द’ के शास्त्रीय संगीत आधारित कंपोज़ीशन गवाने के बाद अनिल विश्वास ने ‘महात्मा कबीर’ में पुनः मन्ना डे के स्वर में ‘झीनी झीनी रे बीनी चदरिया...’, ‘घूँघट का पट खोल रे...’, ‘मनुआ तेरा दिन दिन बीता जाए...’ और ‘सतगुरु मोरा रंगरेज...’ जैसी रचनाएँ निर्गुण भक्ति की एक बेहद प्रभावशाली संगीत धारा का सृजन करती हैं। फिल्म संगीत में कबीर के दोहों और भजनों का इतना सुन्दर उदाहरण फिर नहीं मिलता।” दरअसल अनिल विश्वास ने इस पद को कीर्तन शैली में संगीतबद्ध किया है और मन्ना डे ने शब्दों को पूरी भावाभिव्यक्ति से गाया है। आप कबीर के इस पद का यह फिल्मी रूप भी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को विराम देने की अनुमति दीजिए। परन्तु पहेली में भाग लेना न भूलिए। 


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : गायक - मन्ना डे : संगीत – अनिल विश्वास : फिल्म – महात्मा कबीर



  
आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 149वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला तथा वर्ष का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह किस गायिका की आवाज़ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 151वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

  
पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हमने आपको भजन गायक अनूप जलोटा की आवाज़ में कबीर के पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग देश और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


  
झरोखा अगले अंक का


मित्रों, नये वर्ष में भी ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर निर्गुण ब्रह्म के उपासक सन्त कबीर के ही पद का रसास्वादन कराया। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि सूरदास की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसके माध्यम से अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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