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Sunday, March 26, 2017

फाल्गुनी गीत : SWARGOSHTHI – 310 : SONGS OF FAGUN




स्वरगोष्ठी – 310 में आज


फागुन के रंग – 2 : राग काफी में कुछ और गीत


पण्डित जसराज से सुनिए -“परमानन्द प्रभु चतुर ग्वालिनी तज रज तक मोरी जाए बलाए...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखला “फागुन के रंग” की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। दो सप्ताह पूर्व ही हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया था। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंक में हमने इस राग में ठुमरी और टप्पा प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम राग काफी में खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत करेंगे। पहले विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के मनमोहक स्वर में एक द्रुत खयाल, उसके बाद राग काफी का एक तराना पण्डित कुमार गन्धर्व के दिव्य स्वरों में और अन्त में पण्डित जसराज की आवाज़ में राग काफी में पिरोया एक भक्तिगीत भी प्रस्तुत करेंगे। 



अश्विनी भिड़े  देशपाण्डे
पिछले अंक में हमने राग काफी के स्वरूप पर चर्चा करते हुए निवेदन किया था कि राग काफी, इसी नाम से पहचाने जाने वाले काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी में धमार गायकी से लेकर खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, टप्पा और भजन आदि रचनाएँ आकर्षक लगती हैं। चंचल प्रकृति के इस राग में निबद्ध रचनाओं के माध्यम से उल्लास और उमंग का भाव सहज ही सृजित किया जा सकता है। ठुमरियों में प्रायः मिश्र काफी का रूप मिलता है। रस और भाव में विविधता के लिए राग काफी के स्वर-संगतियों में प्रयोग की अपार सम्भावनाएँ हैं। राग का ऐसा ही एक रूप आज के इस अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। राग के इस रूप को काफी कान्हड़ा के नाम से पहचाना जाता है। राग काफी कान्हड़ा में आरोह के स्वर काफी के अनुसार प्रयोग होते है, जबकि अवरोह के स्वर कान्हड़ा अंग में प्रयोग किए जाते हैं। राग काफी की प्रवृत्ति चंचल होती है और कान्हड़ा की प्रवृत्ति गम्भीर होती है। राग काफी कान्हड़ा में परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न करने का प्रयास होता है। अब हम आपको राग काफी कान्हड़ा में आपको द्रुत खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

 डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग काफी कान्हड़ा का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग काफी कान्हड़ा : ‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’ : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



पण्डित कुमार गन्धर्व 
 लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब हम आपको राग काफी का एक तराना सुनवा रहे है, जिसे भारतीय संगीत जगत के शीर्षस्थ साधक पण्डित कुमार गन्धर्व ने स्वर दिया है। कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ था, जिसका माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। कुमार गन्धर्व ने जब संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 तक वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। आज के अंक में हम आपको इस महान संगीतज्ञ के स्वरों में राग काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह तराना सुनिए और राग काफी की प्रत्यक्ष रसानुभूति कीजिए।
राग काफी : तीनताल में निबद्ध तराना : पण्डित कुमार गन्धर्व



पण्डित जसराज
 खयाल और तराना के बाद अब हम आपको राग काफी में एक भजन सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज। जसराज जी का जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पण्डित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पण्डित जसराज को संगीत के संस्कार अपने परिवार से मिले। जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। उनके बाद परिवार के भरण-पोषण का दायित्व जसराज जी के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पण्डित मणिराम जी पर आ गया। इन्हीं की छत्र-छाया में जसराज जी की संगीत शिक्षा आगे बढ़ी। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परन्तु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था। संगति कलाकारों के साथ इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में दक्ष नहीं हो जाते, वे अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवन्त सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत को आत्मसात किया। पण्डित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की खयाल शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के मार्गदर्शन में हवेली संगीत विधा पर व्यापक अनुसन्धान कर अनेक नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन पद्यति पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में दो भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पण्डित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। आज के अंक में हम पण्डित जसराज के द्वारा राग काफी के स्वरों में पिरोया एक भक्तिगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने उनके अल्बम ‘बिहरत रंग लाल गिरधारी’ से लिया है। आप भक्तिरस से अभिसिंचित इस गीत का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग काफी : भजन : ‘कहा करूँ वैकुण्ठ ही जाए...’ : पण्डित जसराज




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिख भेजिए।

3 – यह किस महान गायक की आवाज़ है? 
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 1 अप्रैल, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 312वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 308वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वाद्य संगीत की राग आधारित रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, वाद्य – गिटार

इस अंक के तीनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीन में से दो प्रश्न का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी है; हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। इन सभी चार प्रतिभागियों को 2-2 अंक मिलते हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने एक प्रश्न का ही सही उत्तर दिया है; अतः इन्हें एक अंक ही मिलेगा। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ का यह दूसरा अंक था। इस अंक में भी हमने राग काफी में प्रयोग खयाल, तराना और भजन की रचनाओं की चर्चा की है। इस श्रृंखला में हम बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जो अगले अंक में भी जारी रहेगा। आगामी अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। आगामे श्रृंखला के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, December 25, 2016

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 298 : RAG BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 298 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 11 : 98वें जन्मदिवस पर स्वरांजलि

“दिया ना बुझे री आज हमारा...”




नौशाद : जन्मतिथि - 25 दिसम्बर, 1919
 ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग भैरवी पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला की इस समापन कड़ी का प्रसारण हम आज 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर कर रहे हैं और तमाम संगीत-प्रेमियों की ओर से स्वरांजलि अर्पित करते हैं। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



नौशाद और  लता  मंगेशकर
 मु म्बई आकर फिल्म संगीतकार के रूप में स्वयं को स्थापित करने के लिए नौशाद ने कडा संघर्ष किया। मुम्बई में सबसे पहले नौशाद को चालीस रुपये मासिक वेतन पर ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ के वाद्यवृन्द में पियानो वादक की नौकरी मिली। इसी फिल्म कम्पनी की फिल्म ‘सुनहरी मकड़ी’ के एक गीत को स्वरबद्ध करने पर उनकी तरक्की सहायक संगीतकार के रूप में हो गई। लखनऊ से मुम्बई आने से पहले नौशाद अपने एक परिचित अब्दुल मजीद ‘आदिल’ से उनके बम्बई में रह रहे मित्र अलीम ‘नामी’ के नाम एक पत्र लिखवा कर लाए थे। शुरू में उन्हें अलीम साहब के यहाँ आश्रय भी मिला था। परन्तु ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ की नौकरी मिलने के बाद नौशाद ने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। इसी बीच उनकी मित्रता गीतकार पी.एल. सन्तोषी से हो गई, जो गीत लिखते समय नौशाद से सलाह लिया करते थे। इस दौरान नौशाद दस रुपये मासिक किराये पर परेल की एक चाल में रहने लगे थे। गीतकार दीनानाथ मधोक नौशाद के सबसे बड़े शुभचिन्तक थे। मधोक की मदद से नौशाद को मिली और 1944 में प्रदर्शित फिल्म ‘रतन’ नौशाद की बेहद सफल फिल्म थी। इस फिल्म के गीतों की साढ़े तीन लाख रुपये रायल्टी अर्जित हुई थी। यह उस समय की बहुत बड़ी रकम थी। 1947 में प्रदर्शित फिल्म ‘दर्द’ इसलिए उल्लेखनीय है कि इस फिल्म में पहली बार नौशाद और गीतकार शकील बदायूनी का साथ हुआ। गीतकार और संगीतकार की यह जोड़ी काफी लम्बी चली। शकील बदायूनी के निधन से पूर्व उनकी चिकित्सा के लिए आर्थिक सहयोग दिलाने हेतु अन्तिम गीत भी नौशाद ने ही लिखवाया था। शकील बदायूनी जब क्षयरोग से ग्रसित होकर एक सेनीटोरियम में भर्ती हुए, उस समय उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। नौशाद ने उनकी आर्थिक मदद के इरादे से 1967-68 में प्रदर्शित तीन फिल्मों; ‘राम और श्याम’, ‘आदमी’ और ‘संघर्ष’ में गीत लिखने का अनुबन्ध कराया था। फिल्म ‘राम और श्याम’ का एक गीत –“आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले, कल तेरी वज़्म से दीवाना चला जाएगा...” सम्भवतः उनके निधन से पूर्व का अन्तिम लिखा गया गीत है। शकील बदायूनी के गीतों से और नौशाद के संगीत से सजी 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘सन ऑफ इण्डिया’ का एक गीत आज हमारी चर्चा में है। सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार महबूब इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक और लेखक थे। शकील बदायूनी के लिखे फिल्म के एक गीत –“दिया ना बुझे री आज हमारा...” की स्वरयोजना नौशाद ने राग भैरवी में की थी। यह नृत्य-गीत लता मंगेशकर और साथियों की आवाज़ में है। आइए, सुनते हैं, यह लुभावना गीत जो नृत्यांगना-अभिनेत्री कुमकुम और साथियों पर फिल्माया गया था।

राग भैरवी : “दिया ना बुझे री आज हमारा...” : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म – सन ऑफ इण्डिया


 राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।


मालिनी राजुरकर
 भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको राग भैरवी में निबद्ध आकर्षक टप्पा और तराना का गायन सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, मालिनी जी के स्वरों में सुनिए राग भैरवी का मोहक टप्पा और तराना। आप इस टप्पा का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरवी : टप्पा - “लाल वाला जोबन...” और तराना : विदुषी मालिनी राजुरकर




संगीत पहेली

 ‘स्वरगोष्ठी’ के 298वें और 299वें अंक में हम आपसे संगीत पहेली में हम आपसे कोई भी प्रश्न नहीं पूछ रहे हैं। पहेली को निरस्त करने का कारण यह है कि हमारे अगले दो अंक संगीत पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों पर ही केन्द्रित है। ‘स्वरगोष्ठी’ के 300वें अंक से हम संगीत पहेली का सिलसिला पुनः आरम्भ करेंगे।

पिछली पहेली के विजेता

 ‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 296 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – हमीर, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – मोहम्मद रफी

 इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई।


अपनी बात

 मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर अब तक जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की यह समापन कड़ी थी। आज के अंक में आपने राग भैरवी की प्रस्तुतियों का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने थे। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का साभार सहयोग लिया था। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा था। यदि आप भी किसी नई श्रृंखला, राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को संगीत पहेली के महाविजेताओ की प्रस्तुतियों पर आधारित एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, March 27, 2016

राग काफी : SWARGOSHTHI – 263 : RAG KAFI




स्वरगोष्ठी – 263 में आज

होली और चैती के रंग – 1 : राग काफी

राग काफी में रची-बसी फागुनी रचनाएँ





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ आरम्भ हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा करेंगे, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। अबीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच आज के अंक में और अगले अंक में भी हम फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर होंगे। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाएँगे। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। आज हम आपको राग काफी के स्वरों पर तैरती कुछ फागुनी रचनाएँ सुनवा रहे हैं।


मारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। आइए, पहले हम राग काफी के स्वरों की संरचना पर विचार करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए।


राग काफी : द्रुत तीनताल में निबद्ध तराना : स्वर – विदुषी मालिनी राजुरकर




होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी।


काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : स्वर – विदुषी गिरिजा देवी




अब हम आपको सुनवाते है, राग काफी पर आधारित एक फिल्मी गीत। 1963 में एक फिल्म- ‘गोदान’ प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी यह फिल्म, जिसके संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म- ‘गोदान’ के इस होली गीत का। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग काफी : फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : मुहम्मद रफी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 263वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित गीत है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 265वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 261 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पूर्वी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – वाणी जयराम

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागी सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की पहली श्रृंखला 251वें अंक से लेकर 260वें अंक के बीच आयोजित की गई थी। 251वें अंक में पहेली का प्रश्न नहीं पूछा गया था। इस प्रकार 9 अंको में अधिकतम 18 अंक हुए। श्रृंखला के कुल 12 प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना करने के बाद पहले तीन स्थान पर 6 प्रतिभागियों ने विजेता होने का सम्मान प्राप्त किया है। 18 में से 18 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान पर चार विजेता हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। 16 अंक प्राप्त कर दूसरे स्थान पर चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल विजेता हुए हैं। इसी क्रम में 4 अंक अर्जित कर मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप पर्व और ऋतु के अनुकूल श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ की पहली कड़ी का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के पहले अंक में हमने आपसे राग काफी की चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पास हर सप्ताह आपकी फरमाइशे आती हैं। हमारे कई पाठकों ने ‘स्वरगोष्ठी’ में दी जाने वाली रागों के विवरण के प्रामाणिकता की जानकारी माँगी है। उन सभी पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि रागों का जो परिचय इस स्तम्भ में दिया जाता है, वह प्रामाणिक पुस्तकों से पुष्टि करने का बाद ही लिखा जाता है। यह पुस्तकें है; संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और श्री वसन्त द्वारा संकलित और श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा सम्पादित ‘राग-कोष’, संगीत सदन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित और श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’ तथा आवश्यकता पड़ने पर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’। हम इन ग्रन्थों से साभार पुष्टि करके ही आप तक रागों का परिचय पहुँचाते हैं। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

 


Sunday, November 1, 2015

जगजीत सिंह और राग : SWARGOSHTHI – 242 : JAGJEET SINGH AND RAGAS


स्वरगोष्ठी – 242 में आज

संगीत के शिखर पर – 3 : जगजीत सिंह के गजल, गीत और भजन

जगजीत सिंह के बेमिसाल मगर कमचर्चित राग प्रयोग की एक झलक




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमारा विषय है, गजल गायकी और इस विधा में अत्यन्त लोकप्रिय रहे गायक जगजीत सिंह और उनकी गजल, गीत और भजन की राग आधारित प्रस्तुतियाँ। आज के अंक में हम जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत राग दरबारी कान्हड़ा में निबद्ध एक द्रुत रचना, राग भैरवी में ठुमरियाँ और राग दरबारी कान्हड़ा के स्वरों में एक कीर्तन सुनवाएँगे।



गजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी,1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी सरकारी कर्मचारी थे। जगजीत सिंह का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गाँव का रहने वाला है। उनकी प्रारम्म्भिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में माध्यमिक शिक्षा के लिए जालन्धर आ गए। डी.ए.वी. कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूर्ण की और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। जगजीत सिंह को बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला था। गंगानगर मे ही पण्डित छगनलाल शर्मा से दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखा। बाद में सेनिया घराने के उस्ताद जमाल खाँ से ख्याल, ठुमरी और ध्रुवपद की बारीकियाँ सीखीं। आगे चल कर उन्होने ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में कुछ नये प्रयोग कर संगीत की इसी विधा में आशातीत सफलता प्राप्त की, परन्तु जब भी उन्हें अवसर मिला, अपनी शास्त्रीय संगीत शिक्षा को अनेक संगीत सभाओं में प्रकट किया। जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत किये गए अधिकतर ग़ज़लों, गीतों और भजनों में रागों का स्पर्श स्पष्ट परिलक्षित होता है। राग दरबारी और भैरवी उनके प्रिय राग थे। आइए, आपको सुनवाते हैं, जगजीत सिंह के स्वर में राग दरबारी, द्रुत एकताल में निबद्ध एक खयाल रचना।


राग दरबारी : “नज़रें करम फरमाओ...” : जगजीत सिंह




जगजीत सिंह 1955 में मुम्बई आ गए। यहाँ से उनके संघर्ष का दौर आरम्भ हुआ। मुम्बई में रहते हुए विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर, वैवाहिक समारोह अथवा अन्य मांगलिक अवसरों पर गीत-ग़ज़लें गाकर अपना गुजर करते रहे। उन दिनों देश के स्वतंत्र होने के बावजूद ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में दरबारी परम्परा कायम थी। संगीत की यह विधा रईसों, जमींदारों और अरबी-फारसी से युक्त क्लिष्ट उर्दू के बुद्धिजीवियों के बीच ही प्रचलित थी। जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को इस दरबारी परम्परा से निकाल कर जनसामान्य के बीच लोकप्रिय करने का प्रयत्न किया। उस दौर में ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेग़म अख्तर, तलत महमूद और मेंहदी हसन जैसे दिग्गजॉ के प्रयत्नों से ग़ज़ल, अरबी और फारसी के दायरे से निकल कर उर्दू के साथ नये अंदाज़ में सामने आने को बेताब थी। ऐसे में जगजीत सिंह, अपनी रेशमी आवाज़, रागदारी संगीत का प्रारम्भिक प्रशिक्षण तथा संगति वाद्यों में क्रान्तिकारी बदलाव कर इस अभियान के अगुआ बन गए। अब आपको सुनवाने के लिए हमने चुना है, जगजीत सिंह की आवाज़ में दो ठुमरी रचनाएँ। एक मंच प्रदर्शन के दौरान उन्होने पहले भैरवी के स्वरों में थोड़ा आलाप किया, फिर बिना ताल के नवाब वाजिद आली शाह की रचना- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...’ और फिर तीनताल में निबद्ध पारम्परिक ठुमरी भैरवी- ‘बाजूबन्द खुल-खुल जाए...’ प्रस्तुत किया है। अन्त में उन्होने तीनताल में निबद्ध तराना का एक अंश भी प्रस्तुत किया है। आइए सुनते हैं, जगजीत सिंह की विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण।


राग भैरवी : ठुमरी और तराना : जगजीत सिंह




पुत्र विवेक और पत्नी चित्रा सिंह के साथ
जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब सरल और सहज अंदाज़ में गाना आरम्भ किया तो जनसामान्य की अभिरुचि ग़ज़लों की ओर बढ़ी। उन्होने हुस्न और इश्क़ से युक्त पारम्परिक ग़ज़लों के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम आदमी की ज़िंदगी को भी अपने सुरों से सजाया। जैसे- ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूँ..’, ‘मैं रोया परदेश में...’, ‘ये दौलत भी ले लो...’, ‘माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...’ जैसी रचनाओं में आम आदमी को अपने जीवन का यथार्थ नज़र आया। प्राचीन ग़ज़ल गायन शैली में केवल सारंगी और तबले की संगति का चलन था, किन्तु जगजीत सिंह ने सारंगी का स्थान पर वायलिन और सन्तूर को अपनाया। उन्होने संगति वाद्यों में गिटार को भी जोड़ा। ग़ज़ल को जनरुचि का हिस्सा बनाने के बाद 1981 में उन्होने फिल्म ‘प्रेमगीत’ से अपने फिल्मी गायन का सफर शुरू किया। इस फिल्म का गीत- ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो...’ वास्तव में एक अमर गीत सिद्ध हुआ। 1990 में एक सड़क दुर्घटना में जगजीत सिंह के इकलौते पुत्र विवेक का निधन हो गया। इस रिक्तता की पूर्ति के लिए उन्होने अपनी संगीत-साधना को ही माध्यम बनाया और आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गए। इस दौर में उन्होने अनेक भक्त कवियों के पदों सहित गुरुवाणी को अपनी वाणी दी। अब हम आपको जगजीत सिंह के स्वर में एक भक्तिगीत सुनवा रहे हैं। यह भक्तिगीत कीर्तन शैली में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रस्तुति में भी आपको राग दरबारी कान्हड़ा की झलक मिलेगी। आप जगजीत सिंह की आवाज़ में यह भक्तिगीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग दरबारी : भजन - “जय राधा माधव जय कुंजबिहारी...” : जगजीत सिंह




 संगीत पहेली 



‘स्वरगोष्ठी’ के 242वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत के एक सम्मानित गायक की आवाज़ में प्रस्तुत कण्ठ-संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग में निबद्ध है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 7 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 244वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


 पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 240 की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका बेगम अख्तर की आवाज़ में प्रस्तुत ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न के उत्तर में हमे दो उत्तर, 'खमाज' और 'तिलंग', प्राप्त हुए हैं। ठुमरी का जो अंश सुनवाया गया था, उसमें दोनों रागों का भ्रम हो रहा है। दरअसल दोनों राग खमाज थाट के हैं, दोनों रागों में दोनों निषाद का प्रयोग होता है और दोनों रागों का वादी और संवादी स्वर क्रमशः गान्धार और निषाद होता है। हमने दोनों उत्तरों को सही माना है। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा की लग्गी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका बेगम अख्तर

सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। अगले अंक में हम चौथी श्रृंखला के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे।


 अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह तीसरा अंक था। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 





Sunday, February 22, 2015

तराना : SWARGOSHTHI – 208 : TARANA RECITAL


स्वरगोष्ठी – 208 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 6 : तराना

सार्थक शब्दों की अनुपस्थिति के बावजूद रसानुभूति कराने में समर्थ तराना शैली




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नयी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘खयाल’ शैली का परिचय आरम्भ किया है। आज के अंक में हम खयाल शैली के साथ अभिन्न रूप से सम्बद्ध ‘तराना’ शैली पर सोदाहरण चर्चा करेंगे। तराना रचनाओं में सार्थक शब्द नहीं होते। परन्तु रचना से रसानुभूति पूरी होती है। आज के अंक में हम आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में राग हंसध्वनि के तराना का रसास्वादन कराते हैं। इसके अलावा लगभग छः दशक पुरानी फिल्म ‘लड़की’ से सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर गाये एक गीत का अंश भी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें उन्होने राग चन्द्रकौंस का तराना गाया है।
 



रम्परागत भारतीय संगीत की शैलियों में खयाल शैली वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित है। वर्तमान शास्त्रीय संगीत से यह इतनी घुल-मिल गई है कि इसके बिना रागदारी संगीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसकी लोकप्रियता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि वाद्य संगीत पर भी खयाल बजाया जाता है। खयाल शैली विकास अठारहवीं शताब्दी से हुआ है। खयाल शब्द फारसी भाषा का है, जो संस्कृत के ‘ध्यान’ शब्द का पर्याय है। प्राचीन ग्रन्थकार मतंग के काल में विभिन्न रागों को ध्यान शैली में गायन का उल्लेख मिलता है। सम्भव है ध्यान परम्परा से खयाल शैली का सम्बन्ध हो। खयाल शैली का सम्बन्ध सूफी संगीत से भी जुड़ता है। सूफी काव्य में भी खयाल नाम से एक प्रकार प्रचलित रहा है। कुछ विद्वान खयाल शैली पर मध्यकाल के लोक संगीत का प्रभाव भी मानते हैं। आज भी राजस्थान, ब्रज और अवध क्षेत्र में खयाल नामक लोक संगीत का एक प्रकार प्रचलित है। एक खयाल रचना के तीन भाग होते हैं; अत्यन्त संक्षिप्त आलाप, विलम्बित खयाल और द्रुत खयाल। खयाल के भी दो भाग हो जाते हैं; स्थायी और अन्तरा। स्थायी और अन्तरा के लिए एक संक्षिप्त सी पद की रचना भी होती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत स्वर-प्रधान है। अधिकतर विद्वान शब्दों को स्वर के आरोहण का एक माध्यम ही मानते हैं और राग के स्वरों की अपेक्षा शब्दों को विशेष महत्त्व नहीं देते। परन्तु कुछ विद्वान खयाल गायन में शब्दों के उच्चारण पर विशेष बल देते हैं। इनका मानना है कि स्वरो में रस के निष्पत्ति की सीमित सम्भावना होती है, जबकि शब्दों अर्थात साहित्य को जब स्वरों का संयोग मिलता है तब सभी नौ प्रकार के रसों की सृष्टि सहज हो जाती है। विलम्बित, मध्य और द्रुत खयाल के साथ ही तराना गायकी का विशेष महत्त्व है। तराना की संरचना मध्य या द्रुत लय के खयाल जैसी होती है, अन्तर इसकी शब्द रचना में होता है। खयाल के स्थायी और अन्तरा में सार्थक शब्दों की रचना होती है, जबकि तराना मे निरर्थक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। ये शब्द सार्थक नहीं होते किन्तु लय के प्रवाह सरलता से घुल-मिल जाते हैं। कुशल कलासाधक तराना के इन्हीं निरर्थक साहित्य के माध्यम सार्थक रसानुभूति कराने में समर्थ होते हैं। तराना के उदाहरण के लिए आज के अंक में हमने राग हंसध्वनि के एक मोहक तराना का चुनाव किया है। यह तराना सुविख्यात संगीत-विदुषी परवीन सुल्ताना प्रस्तुत कर रही हैं। हमारी यह चर्चा जारी रहेगी, पहले आप यह तराना सुनिए।


राग हंसध्वनि : आलापचारी और द्रुत तीनताल का तराना : बेगम परवीन सुल्ताना




स्वर-विस्तार की प्रधानता होने कारण खयाल में आलाप का महत्त्व सीमित हो गया है। इस शैली में ध्रुपद जैसी स्थिरता और गम्भीर गमक के अलावा छूट, मुरकी, जमजमा आदि का महत्त्व बढ़ जाता है। आरम्भिक काल के खयाल में तानों का प्रयोग नहीं होता था। बाद में जब घरानों की स्थापना हुई तो तानों का प्रयोग वैचित्र्य के लिए किया जाने लगा। यही नहीं इस शैली में सरगम का प्रयोग भी बाद में शुरू हुआ। तराना गायकी में लयकारी का विशेष महत्त्व होता है। फिल्म संगीत में कई संगीतकारों ने तराना का इस्तेमाल किया है। 1953 में ए.वी.एम. प्रोडक्शन की एक फिल्म ‘लड़की’ के एक गीत में तराना का प्रयोग किया गया था। इस फिल्म के संगीतकार धनीराम ने फिल्म के एक नृत्यगीत के अन्त में राग चन्द्रकौंस के संक्षिप्त तराना को जोड़ा था। फिल्म में यह गीत अभिनेत्री और नृत्यांगना वैजयन्तीमाला द्वारा मंच पर प्रस्तुत किये जा रहे नृत्य में शामिल किया गया था। मूल गीत के बोल हैं- ‘मेरे वतन से अच्छा कोई वतन नहीं है...’। गीतकार राजेंद्र कृष्ण की इस रचना के अन्तिम डेढ़ मिनट की अवधि में संगीतकार धनीराम ने राग चन्द्रकौंस का ताराना इस्तेमाल किया था। पूरा गीत और अन्त का तराना लता मंगेशकर ने गाया है। आप गीत का तराना वाला हिस्सा सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग चन्द्रकौंस : फिल्म लड़की : गीत ‘मेरे वतन से अच्छा...’ का तराना अंश : लता मंगेशकर 





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 208वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – इस रचना के गायक को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 28 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 206वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की एक पुरानी रेकार्डिंग का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल विलम्बित एकताल। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। आज आपने खयाल शैली से जुड़े तराना का परिचय प्राप्त किया। अगले अंक में हम आपका परिचय संगीत की किसी अन्य प्रकार से कराएंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर सहर्ष देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Sunday, March 2, 2014

राग काफी में खयाल, तराना और भजन


स्वरगोष्ठी – 157 में आज

फाल्गुनी परिवेश में राग काफी के विविध रंग


‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली कड़ी से हमने फाल्गुनी परिवेश के सर्वप्रिय राग काफी पर चर्चा आरम्भ की है। फाल्गुन मास में शीत ऋतु का क्रमशः अवसान और ग्रीष्म ऋतु की आहट होने लगती है। यह परिवेश उल्लास और श्रृंगार भाव से परिपूर्ण होता है। प्रकृति में भी परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है। रस-रंग से परिपूर्ण फाल्गुनी परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंक में हमने इस राग में ठुमरी और टप्पा प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम राग काफी में खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत करेंगे, जिसे क्रमशः विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे, पण्डित कुमार गन्धर्व और पण्डित जसराज की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। 
 


पिछले अंक में हमने राग काफी के स्वरूप पर चर्चा करते हुए निवेदन किया था कि राग काफी, इसी नाम से पहचाने जाने वाले काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी में धमार गायकी से लेकर खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, टप्पा और भजन आदि रचनाएँ आकर्षक लगती हैं। चंचल प्रकृति के इस राग में निबद्ध रचनाओं के माध्यम से उल्लास और उमंग का भाव सहज ही सृजित किया जा सकता है। ठुमरियों में प्रायः मिश्र काफी का रूप मिलता है। रस और भाव में विविधता के लिए राग काफी के स्वर-संगतियों में प्रयोग की अपार सम्भावनाएँ हैं। राग का ऐसा ही एक रूप आज के इस अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। राग के इस रूप को काफी कान्हड़ा के नाम से पहचाना जाता है। राग काफी कान्हड़ा में आरोह के स्वर काफी के अनुसार प्रयोग होते है, जबकि अवरोह के स्वर कान्हड़ा अंग में प्रयोग किए जाते हैं। राग काफी की प्रवृत्ति चंचल होती है और कान्हड़ा की प्रवृत्ति गम्भीर होती है। राग काफी कान्हड़ा में परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न करने का प्रयास होता है। अब हम आपको राग काफी कान्हड़ा में आपको द्रुत खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग काफी कान्हड़ा का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।


राग काफी कान्हड़ा : ‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’ : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब हम आपको राग काफी का एक तराना सुनवा रहे है, जिसे भारतीय संगीत जगत के शीर्षस्थ साधक पण्डित कुमार गन्धर्व ने स्वर दिया है। कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ था, जिसका माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। कुमार गन्धर्व ने जब संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 तक वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। आज के अंक में हम आपको इस महान संगीतज्ञ के स्वरों में राग काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह तराना सुनिए और राग काफी की प्रत्यक्ष रसानुभूति कीजिए।


राग काफी : तीनताल में निबद्ध तराना : पण्डित कुमार गन्धर्व




खयाल और तराना के बाद अब हम आपको राग काफी में एक भजन सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज, जिनका जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पण्डित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पण्डित जसराज को संगीत के संस्कार अपने परिवार से मिले। जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। उनके बाद परिवार के भरण-पोषण का दायित्व जसराज जी के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पण्डित मणिराम जी पर आगया। इन्हीं की छत्र-छाया में जसराज जी की संगीत शिक्षा आगे बढ़ी। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परन्तु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था। संगति कलाकारों के साथ इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में दक्ष नहीं हो जाते, वे अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवन्त सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत को आत्मसात किया। पण्डित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की खयाल शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के मार्गदर्शन में हवेली संगीत विधा पर व्यापक अनुसन्धान कर अनेक नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन पद्यति पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पण्डित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। आज के अंक में हम पण्डित जसराज के द्वारा राग काफी के स्वरों में पिरोया एक भजन प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने उनके अल्बम ‘बिहरत रंग लाल गिरधारी’ से लिया है। आप भक्तिरस अभिसिंचित इस भजन का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग काफी : भजन : ‘कहा करूँ वैकुण्ठ ही जाए...’ : पण्डित जसराज




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 157वीं संगीत पहेली में हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 159वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 155वीं संगीत पहेली में हमने आपको तंत्रवाद्य पर ठुमरी वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मिश्र काफी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गिटार। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज का हमारा यह अंक फाल्गुनी रस और रंग से अभिसिंचित राग काफी के खयाल, तराना और भजन में किये गए प्रयोग पर केन्द्रित था। यह सिलसिला आगामी अंक में भी जारी रहेगा। इस अंक में पण्डित जसराज का परिचय 'भारत ज्ञानकोश' से साभार उद्धरित किया है। श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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