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Saturday, August 22, 2009

कौन कहे इस ओर तू फिर आये न आये, मौसम बीता जाए... कैसे एक गीत समा गयी जीवन की तमाम सच्चाइयाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 179

दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आप सुन रहे हैं शरद तैलंग जी के अनुरोध पर एक के बाद एक कुल पाँच गानें। तीन गानें हम सुन चुके हैं, आज है चौथे गीत की बारी। यह एक ऐसा गीत है जो जुड़ा हुआ है हमारी मिट्टी से। इस गीत को सुनते हुए मन कहीं सुदूर गाँव में पहुँच जाता है जहाँ पर सावन की पहली फुहार के आते ही किसान और उनके परिवार के सदस्य जी जान से लग जाते हैं बीज बुवाई के काम में। "धरती कहे पुकार के, बीज बिछा ले प्यार के, मौसम बीता जाए"। फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' का यह गीत मन्ना डे, लता मंगेशकर और साथियों की आवाज़ों में है जिसे लिखा है शैलेन्द्र ने और संगीतकार हैं सलिल चौधरी ने। इसी फ़िल्म का एक और समूह गीत "हरियाला सावन ढोल बजाता आया" हमने अपनी कड़ी नं. ९१ में सुनवाया था, और उसके साथ साथ इस फ़िल्म से जुड़ी तमाम जानकारियाँ भी हमने आप को दी थी, जिनका आज हम दोहराव नहीं करेंगे। सलिल दा की कुछ धुनें बहुत ही मीठी, नाज़ुक सी हुआ करती थी, कुछ धुनों में पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत की झलक मिलती थी, और उनके कुछ गानें ऐसे थे जिनमें झलकते थे क्रांतिकारी सुर, राष्ट्रवादी विचार धारा और सामाजिक उत्थान के कलरव। 'दो बीघा ज़मीन' के ये दोनों गानें इसी तीसरी श्रेणी में आते हैं।

"धरती कहे पुकार के" गीत में लता जी के अंश बहुत थोड़े से हैं, मुख्यतः मन्ना दा की ही आवाज़ गूँजती है। सलिल दा और मन्ना दा के आपसी रिश्ते के बारे में सलिल दा की सुपुत्री अंतरा चौधरी बताती हैं - "When Manna-da and my father got together, there was laughter in the air. They would just hit it off narrating hilarious stories, no wonder then my father thought that only Manna-da could sing with such enthusiasm all those socio-political songs he composed. His association with Manna Dey began from his very first Hindi film and continued into the late 70s." अब जब सलिल दा की बेटी का ज़िक्र हम ने किया तो आप को शायद ख़याल आया होगा सलिल दा के संगीत निर्देशन में मन्ना डे और अंतरा चौधरी के गाये फ़िल्म 'मिनू' के उस सुंदर गीत का "तेरी गलियों में हम आये", क्यों, है ना? दोस्तों, 'दो बीघा ज़मीन' के प्रस्तुत गीत में आगे चलकर एक पंक्ति आती है "अपनी कहानी छोड़ जा, ख़ुद तू निशानी छोड़ जा, कौन कहे इस ओर तू फिर आये न आये"। जब अमेरिका में पुराने फ़िल्म संगीत के शौकीन एक संस्था ने सन् २००५ की अपनी वार्षिक सम्मेलन को सलिल दा के नाम समर्पित करने का निर्णय लिया तो इसी पंक्ति से प्रेरीत होकर सम्मेलन का नाम रखा गया "अपनी कहानी छोड़ जा"। इतना ही नहीं, इसी गीत के मुखड़े के शुरूआती बोलों को लेकर सन् १९६९ में एक फ़िल्म भी बनी 'धरती कहे पुकार के', जिसका शीर्षक गीत भी कुछ हद तक इसी गीत से मिलता जुलता लिखा गया कि "धरती कहे पुकार के, ओ मुझको चाहने वाले किसलिए बैठा हार के, मेरा सब कुछ उसी का है जो छू ले मुझको प्यार से"। तो दोस्तों, अब बारी है गीत सुनने की, शरद तैलंग जी के इस पसंदीदा गीत को आइए हम सब मिल कर एन्जोय करते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. महेंद्र कपूर हैं इस गीत के गायक.
२. एक वैवाहिक स्र्त्री के पर पुरुष से सम्बन्ध को लेकर बनी एक संवेदनशील फिल्म का है ये गीत.
३. एक अंतरा शुरू होता है "न" शब्द से.

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी बधाई. १४ अंक लेकर अब आप दिशा जी और पराग जी के बराबर आ गए हैं. टक्कर गजब की है भई. शरद जी आपकी पसंद के तो हम सब पहले ही कायल हैं.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, May 25, 2009

हरियाला सावन ढोल बजाता आया....मानसून की आहट पर कान धरे है ये मधुर समूहगान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 91

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए आज हम एक बड़ा ही अनोखा समूहगान लेकर आये हैं। सन् १९५३ में बिमल राय की एक मशहूर फ़िल्म आयी थी 'दो बीघा ज़मीन'। बिमल राय ने अपना कैरियर कलकत्ते के 'न्यू थियटर्स' में शुरु किया था और उसके बाद मुंबई आकर 'बौम्बे टाकीज़' से जुड़ गये जहाँ पर उन्होने कुछ फ़िल्में निर्देशित की जैसे कि १९५२ में बनी फ़िल्म 'माँ'। उस वक़्त 'बौम्बे टाकीज़' बंद होने के कगार पर थी। इसलिए बिमलदा ने अपनी 'प्रोडक्शन' कंपनी की स्थापना की और अपने कलकत्ते के तीन दोस्त, सलिल चौधरी, नवेन्दु घोष और असित सेन के साथ मिलकर सलिल चौधरी की बंगला उपन्यास 'रिक्शावाला' को आधार बनाकर 'दो बीघा ज़मीन' बनाने की ठानी। सलिलदा की बेटी अंतरा चौधरी ने एक बार बताया था इस फ़िल्म के बारे में, सुनिए उन्ही के शब्दों में - "१९५२ में ऋत्विक घटक बिमलदा को 'रिक्शावाला' दिखाने ले गये। बिमलदा इस फ़िल्म से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने मेरे पिताजी को अपनी कंपनी के साथ जुड़ने का न्योता दे बैठे, और इस तरह से बुनियाद पड़ी 'दो बीघा ज़मीन' की। ये दोनो एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। मुझे अभी भी याद है कि जब बिमलदा बहुत सुबह सुबह हमारे घर आया करते थे और मेरे पिताजी के बिस्तर के पास कुर्सी में बैठकर अख़बार पढ़ते रहते और पिताजी के उठने का इंतज़ार करते। मेरी माँ उन्हे जगाना भी चाहे तो बिमलदा मना कर देते थे।" यह तो थी 'दो बीघा ज़मीन' और 'रिक्शावाला' की बात, लेकिन ऐसा भी कहा गया है कि 'दो बीघा ज़मीन' ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर बनी फ़िल्म 'धरती के लाल' से भी प्रेरित था। यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि अब्बास साहब और सलिलदा, दोनो ही 'इपटा' के सदस्य थे। बलराज साहनी, निरुपा राय और रतन कुमार अभिनीत 'दो बीघा ज़मीन' हिंदी फ़िल्म इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म रही है।

सलिल चौधरी के संगीत की एक ख़ास बात यह रही है कि उनके बहुत सारे गीतों में जन-जागरण के सुर झलकते हैं। संगीत उनके लिए एक हथियार की तरह था जिससे वो समाज में क्रांति की लहर पैदा करना चाहते थे। सलिलदा के व्यक्तित्व को जानने के लिए उनके बनाये इस तरह के जोशीले गीतों को सुनना बेहद ज़रूरी हो जाता है। दृढ़ राजनैतिक विचारों और सामाजिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने की वजह से उनका संगीत उस ज़माने के दूसरे संगीतकारों से बिल्कुल अलग हुआ करता था। फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' मे भी उन्होने इस तरह के कम से कम दो गीत हमें दिये हैं। एक तो है "धरती कहे पुकार के मौसम बीता जाये" और दूसरा गीत है "हरियाला सावन ढोल बजाता आया", और यही दूसरा गीत आज सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। गीतकार शैलेन्द्र भी 'इपटा' के सक्रीय सदस्य थे। सलिलदा के समाज में क्रांति पैदा करने वाले संगीत को अपने जोशीले असरदार बोलों से इस फ़िल्म में समृद्ध किया शैलेन्द्र ने। मन्ना डे, लता मंगेशकर, और साथियों की आवाज़ों में किसान परिवारों के उत्साह भरे इस गीत को सुनिए और गरमी के इस मौसम में सावन को जल्द से जल्द आने का न्योता दीजिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज कुमार और माला सिन्हा अभिनीत इस फिल्म में संगीत है सी रामचंद्र का.
२. परवेज़ शम्सी ने लिखा है ये मधुर युगल गीत.
३. मुखड़े में शब्द है - "कहानी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत दिनों बाद दिलीप जी के सर बंधा है विजेता का ताज. बधाई हो दिलीप जी और पराग जी आपको भी बधाई सही गीत पहचाना

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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