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शनिवार, 27 मई 2017

चित्रकथा - 20: रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ

अंक - 20

रीमा लागू को श्रद्धांजलि

रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


18 मई 2017 को सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रीमा लागू का मात्र 59 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इतनी जल्दी उनके दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से अभिनय जगत को जो क्षति पहुँची है उसकी भरपाई हो पाना असंभव है। 35 सालों से उपर के अभिनय सफ़र में रीमा जी ने दर्शकों के दिलों पर राज किया; कभी गुदगुदाया, कभी रुलाया, और कभी अपने अभिनय से हमें भाव-विभोर कर दिया। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें उनके शुरुआती सालों की फ़िल्मों पर। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीया रीमा लागू की पुण्य स्मृति को!



रीमा लागू (21 जून 1958 - 18 मई 2017)


ऑन-स्क्रीन माँ के किरदार में फ़िल्म इतिहास में बहुत सी अभिनेत्रियों ने बुलंदी हासिल किए हैं जिनमें वो नाम जो सबसे पहले याद आते हैं, वो हैं निरुपा रॉय, कामिनी कौशल, सुलोचना, दुर्गा खोटे, अचला सचदेव, और बाद के वर्षों में नज़र आने वाली अभिनेत्रियों में एक प्रमुख नाम रीमा लागू का है। ’क़यामत से क़यामत तक’, ’मैंने प्यार किया’, ’आशिक़ी’, ’हिना’, ’साजन’, ’हम आपके हैं कौन’, ’जुड़वा’, ’येस बॉस’, ’कुछ कुछ होता है’, ’हम साथ-साथ हैं’, ’वास्तव’, ’मैं प्रेम की दीवानी हूँ’, ’कल हो न हो’, ’रंगीला’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों में माँ की सफल भूमिका निभा कर रीमा लागू दर्शकों के दिलों में एक अपना अलग ही मुकाम बना चुकी थीं। उनके परदे पर आते ही जैसे एक रौनक सी छा जाती। उन्होंने फ़िल्मी माँ के किरदार को एक दुखियारी औरत से बाहर निकाल कर एक ग्लैमरस महिला में परिवर्तित किया। लेकिन आज भले उन्हें हम उनकी माँ की भूमिका वाली फ़िल्मों के लिए याद करते हैं, हक़ीकत यह है कि 1988 में ’क़यामत से क़यामत तक’ के आने से पहले उन्होंने कई फ़िल्मों में कई तरह के चरित्र निभाए जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान यकायक नहीं जाता।

21 जून 1958 को जन्मीं रीमा लागू का असली नाम नयन भडभडे था। उनकी माँ मन्दाकिनी भडभडे मराठी स्टेज ऐक्ट्रेस थीं और उन्हीं से शायद अभिनय की बीज नयन में भी अंकुरित हुई। उनके अभिनय क्षमता से उनका स्कूल वाक़िफ़ था। माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करते ही वो पेशेवर तौर पर अभिनय करना शुरु किया। विवेक लागू से विवाह के पश्चात् नयन भडभडे बन गईं रीमा लागू। 1979 से लेकर 1988 तक वो यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी भी की और साथ ही साथ टेलीविज़न और फ़िल्मों में अभिनय भी जारी रखा। 1988 के बाद उनका फ़िल्मी सफ़र तेज़ हो जाने की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इन्हीं दस वर्षों यानी कि 1979 से 1988 के बीच उन्होंने कई फ़िल्मों में तरह तरह के किरदार निभाए। रीमा लागू का फ़िल्मी सफ़र शुरु हुआ 1979 की मराठी फ़िल्म ’सिंहासन’ से जिसमें नीलू फुले, श्रीराम लागू, नाना पाटेकर, और मोहन अगाशे जैसे दिग्गज कलाकार थे। हिन्दी फ़िल्मों में रीमा लागू प्रथम नज़र आईं 1980 की फ़िल्म ’आक्रोश’ में। इस फ़िल्म में उन्होंने एक नौटंकी नर्तकी का किरदार निभाया था। गोविंद निहलानी निर्देशित इस कलात्मक फ़िल्म को उस वर्ष के बहुत से फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिले। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल और अमरीश पुरी जैसे दिग्गज कलाकारों की इस फ़िल्म में नवोदित रीमा लागू का छोटा सा लावणी डान्सर का किरदार सराहनीय था। फ़िल्म में केवल तीन गीत थे जिनमें एक गीत रीमा लागू पर फ़िल्माया गया। "तू ऐसा कैसा मर्द" एक लावणी गीत है जिस पर रीमा लागू ने लावणी नृत्य किया और माधुरी पुरंदरे की गायी इस लावणी पर लिप-सिंक किया। अक्सर इस तरह के लावणी में थोड़ा बहुत अश्लीलता आ ही जाती है, पर रीमा लागू इस गीत में इतनी ग्रेसफ़ुल और सुन्दर लगती हैं कि उन्हें इस रूप में देखने का मज़ा ही कुछ अलग है। गोविन्द निहलानी जैसे फ़िल्मकार ने अगर उन्हें इस किरदार के लिए चुना था तो ज़रूर उनकी अभिनय प्रतिभा को देख कर ही चुना होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। 

1980 की एक और फ़िल्म में रीमा लागू नज़र आईं। गोविन्द निहलानी के बाद अब बारी थी श्याम बेनेगल की। शशि कपूर निर्मित फ़िल्म ’कलयुग’ में शशि कपूर के अलावा रेखा, राज बब्बर, विक्टर बनर्जी, सुषमा सेठ, कुलभूषण खरबन्दा और अनन्त नाग जैसे मंझे हुए अभिनेता थे। श्याम बेनेगल की फ़िल्म में रीमा लागू जैसी नई अभिनेत्री को अभिनय का मौका मिलना बहुत बड़ी बात थी। साथ ही इतने बड़े बड़े अभिनेताओं के साथ एक ही सीन में अभिनय करना और अपनी एक पहचान बना पाना आसान काम नहीं था। महाभारत की कहानी का आधुनिक रूप था ’कलयुग’ की कहानी। इसमें कुलभूषण खरबन्दा की पत्नी का किरदार रीमा ने निभाया। दो परिवारों के बीच के द्वन्द की कहानी है ’कलयुग’ जिसमें रीमा लागू के बेटे का ऐक्सिडेन्ट में मृत्यु हो जाती है। अपने बेटे का शव देख कर एक माँ की क्या हालत होती है, रीमा लागू के अभिनय से सजी इस सीन को देख कर अपनी आँसू रोक पाना मुमकिन नहीं। हालाँकि किरण के इस किरदार में रीमा लागू को कुलभूषण खरबन्दा के साथ कुछ इन्टिमेट सीन्स भी करने पड़े हैं, लेकिन बेटे की मृत्यु का वह सीन दिलो-दिमाग़ पर छाया रहता है। रीमा लागू ने संतान के जाने के दर्द को यूं उभारा है कि मन से यह दुआ निकलती है कि भगवान कभी किसी दुश्मन से भी उसका संतान न छीने! ’कलयुग’ के बाद 1983 में फ़िल्म ’चटपटी’ में एक छोटा किरदार निभाया रीमा लागू ने। देवेन वर्मा निर्मित इस फ़िल्म में स्मिता पाटिल शीर्षक भूमिका में थीं और साथ में थे राज किरण, श्रीराम लागू और सुधीर दलवी। फ़िल्म बुरी तरह फ़्लॉप होने की वजह से यह फ़िल्म भुला दी गई।

फिर 1985 में फ़िल्म आई ’नासूर’ जिसमें फिर एक बार रीमा लागू को समानान्तर सिनेमा के कुछ दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। अशोक चोपड़ा निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे ओम पुरी, प्रिया तेन्दुलकर, सदाशिव अमरापुरकर, अच्युत पोद्दार, के. के. रैना और अरुण बक्शी। रीमा लागू ने इस फ़िल्म में सदाशिव अमरापुरकर की पुत्रवधु का चरित्र निभाया। हालाँकि रीमा लागू का रोल लम्बा नहीं है, लेकिन छोटी सी भूमिका में भी वो अपना छाप छोड़ जाती हैं। जिस अस्पताल में डॉ. सुनिल गुप्ता (ओम पुरी) गाइनोकोलोजिस्ट हैं, उसी में मंत्री रावसाहेब (सदाशिव) की गर्भवती पुत्रवधु मंजुला (रीमा लागू) का दाख़िला होता है डेलिवरी के लिए। लेकिन ऑपरेशन टेबल पर डॉ. गुप्ता को पता चलता है कि माँ और बच्चे में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है और वो ख़ुद निर्णय लेते हुए माँ को बचाते हैं। अपने बच्चे को खोने का दर्द फिर एक बार रीमा लागू के अभिनय में फूट पड़ती है। संयोग की बात देखिए कि कुछ कुछ इसी तरह का दृश्य पिछली फ़िल्म ’कलयुग’ में भी रीमा लागू ने अदा की थी। 

1986 और 87 में रीमा लागू की कोई फ़िल्म नहीं आई, पर 1988 का वर्ष उनके करीअर का टर्निंग् पॉइन्ट सिद्ध हुआ। अरुणा राजे लिखित, निर्मित और निर्देशित विवादास्पद फ़िल्म ’रिहाई’ में कई दिग्गज कलाकारों के साथ स्क्रीन शेयर किया रीमा लागू ने। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि गुजरात के एक दूर दराज़ के गाँव से सारे जवान मर्द रोज़ी रोटी के लिए शहर चले गए हैं और गाँव में केवल औरतें, बच्चें और वृद्ध-वृद्धा रह गए हैं। गाँव की महिलाएँ दिन भर खेतों खलिहानों में अटूट परिश्रम करती हैं, बच्चे पालती हैं, और रात में तन्हाइयाँ ओढ़ कर सो जाती हैं। गाँव की इन महिलाओं की भूमिकाओं में जिन अभिनेत्रियों ने अभिनय किया, वो हैं हेमा मालिनी, नीना गुप्ता, इला अरुण और रीमा लागू। तभी गाँव में मनसुख (नसीरुद्दीन शाह) की वापसी होती है जो दुबई में सालों काम कर अपने गाँव लौटा है। कुछ औरतें मनसुख के तरफ़ आकर्षित होती हैं, ख़ास तौर से नीना गुप्ता और रीमा लागू द्वारा निभाये किरदार, और दोनों ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं। दो बच्चों की माँ रीमा लागू ने इस विवादास्पद चरित्र को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से निभाया है। यह एक ऐसी औरत का किरदार है जो मुंहफट है, जो कुछ भी कहने से पहले सोचती नहीं, जिसकी बातों में निडरता के साथ-साथ थोड़ी अश्लीलता भी है। हेमा मालिनी जैसी सुपरस्टार अभिनेत्री के साथ सीन शेअर किया रीमा लागू ने और कुछ संवाद भी दोनों के बीच में हैं। इतना ही नहीं एक गीत में आशा भोसले ने हेमा मालिनी का पार्श्वगायन किया है तो अनुपमा देशपांडे ने रीमा लागू का। पहली फ़िल्म ’आक्रोश’ में रीमा लागू पर गीत फ़िल्माया गया था और उनका डान्स भी था, ’रिहाई’ के उस गीत में भी रीमा लागू नृत्य करती नज़र आती हैं। ’रिहाई’ में हेमा मालिनी के अलावा इला अरुण और नीना गुप्ता के चरित्रों को रीमा लागू के चरित्र से ज़्यादा प्रॉमिनेन्स दिया गया है, लेकिन रीमा लागू का स्क्रीन प्रेसेन्स भी कमाल का रहा। उनकी अच्छी बात यह रही कि जो भी रोल उन्हें दिया गया, चाहे छोटा या बड़ा, उन्होंने हर एक में जान फूंक दी।

हिन्दी फ़िल्म जगत में नायक-नायिका की जोड़ियाँ ख़ूब जमी हैं। लेकिन माँ और पिता की जोड़ियों की अगर बात करें तो सबसे पहले जो जोड़ी याद आती है, वह है रीमा लागू और आलोक नाथ की। फ़िल्म ’मैंने प्यार किया’ से इस जोड़ी की शुरुआत ज़रूर हुई थी, पर जिस फ़िल्म में रीमा लागू और आलोक नाथ एक साथ पहली बार नज़र आए थे, वह फ़िल्म थी 1988 की ’हमारा ख़ानदान’। इस फ़िल्म में एक गाइनोकोलोजिस्ट की भूमिका में नज़र आईं रीमा लागू। डॉ. जुली के किरदार में अमरीश पुरी और आशा पारेख के साथ उन्होंने स्क्रीन शेअर किया। किसी बच्चे के लिंग निर्धारण में माँ की नहीं बल्कि पिता के क्रोमोज़ोम की भूमिका होती है, यह संदेश इस फ़िल्म में रीमा लागू के चरित्र के माध्यम से दी गई। अब तक उनके निभाए किरदारों में यह किरदार सबसे दीर्घ रही। फिर इस वर्ष के आख़िर में प्रदर्शित हुई ’मैंने प्यार किया’ जिसमें सूरज बरजात्या ने रीमा लागू को एक ऐसे अवतार में उतारा कि बाकी इतिहास है। एक ग्लैमरस पर घरेलु माँ का इमेज इस फ़िल्म से उनकी बनी जो बेहद हिट सिद्ध हुई और इस फ़िल्म के बाद एक के बाद एक फ़िल्मों में उन्हें हमने इसी अवतार में देखा। इस दौर के समस्त सुपरस्टार हीरो-हीरोइन्स की माँ बन चुकी हैं रीमा लागू और आज की पीढ़े उन्हें इसी रूप में याद करती रहेंगी। लेकिन ’मैंने प्यार किया’ से पहले उनके द्वारा निभाए गए किरदारों में उनके अभिनय की विविधता महसूस की जा सकती है। चाहे ’आक्रोश’ के लावणी डान्सर का किरदार हो या ’कलयुग’ के बिज़नेसमैन घराने की बहू का चरित्र, ’नासूर’ में गर्भवती औरत जिसका बच्चा डेलिवरी के समय मर जाता है, ’हमारा ख़ानदान’ में गाइनोकोलोजिस्ट की दमदार अदायगी या फिर ’रिहाई’ में एक अनपढ़, कामुक, दो बच्चों की माँ की वह विवादास्पद रोल, हर चरित्र में रीमा लागू ढल गईं और इन फ़िल्मों को अपने अभिनय से सजाया, सँवारा, उनमें अपनी सहज स्वाभाविक अदायगी से जान डाली। रीमा लागू आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हिन्दी व मराठी सिनेमा, थिएटर और टेलीविज़न पर उनकी अमिट छाप सदा बनी रहेगी। सहज, सरल अभिनय और हर तरह के चरित्र में बड़ी आसानी से ढल जाना ही रीमा लागू की सबसे बड़ी ख़ासियत थी और इसी बात की पुष्टि उनके द्वारा निभाए गए शुरुआती फ़िल्मों के किरदारों से होती है। रीमा लागू की प्रतिभा और योगदान को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करती है शत शत नमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

"मेरो गाम काठा पारे...", सफ़ेद-क्रान्ति की ही तरह यह गीत भी पहुँचा था देश के कोने कोने तक


एक गीत सौ कहानियाँ - 42
 

‘मेरो गाम काठा पारे...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ से, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ - 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 42-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'मंथन' के यादगार गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के बारे में।


80 का दशक कलात्मक फ़िल्मों का स्वर्ण-युग रहा। जिन फ़िल्मकारों ने इस जौनर को अपनी अर्थपूर्ण फ़िल्मों से समृद्ध किया, उनमें से एक नाम है श्याम बेनेगल का। उनकी 1977 की फ़िल्म 'मंथन' सफ़ेद-क्रान्ति (Operation Flood - The White Revolution) पर बनी थी। देश के कोने-कोने तक हर घर में रोज़ दूध पहुँचे, हर बच्चे को दूध नसीब हो, समूचे देश भर में दूध की नदियाँ बहने लगे, दूध की प्रचुरता हो, यही उद्देश्य था सफ़ेद-क्रान्ति का। फ़िल्म की कहानी डॉ. वर्गिस कुरिएन और श्याम बेनेगल ने संयुक्त रूप से लिखी थी। बताना ज़रूरी है कि कुरिएन भारत के सफ़ेद-क्रान्ति के जनक माने जाते हैं। फ़िल्म की पृष्ठभूमि कुछ इस तरह से थी कि गुजरात के खेड़ा ज़िले के कुछ गरीब कृषकों की सोच को सामाजिक कार्यकर्ता त्रिभुवनदास पटेल ने अंजाम दिया और स्थापित हुआ Kaira District Co-operative Milk Producers' Union और जल्दी ही यह गुजरात के अन्य ज़िलों में भी शुरू हो गया जिसने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। इसी शुरुआत से आगे चल कर स्थापना हुई डेरी कौपरेटिव 'अमूल' की, गुजरात के आनन्द इलाके में। साल था 1946, और आगे चल कर इस कौपरेटिव में करीब 26 लाख लोगों की भागीदारी हुई। 1970 में इसने 'सफ़ेद-क्रान्ति' की शुरुआत कर दी अपना राष्ट्रव्यापी दूध-ग्रिड बनाकर, और 1973 में बनी ‘Gujarat Co-operative Milk Marketing Federation Ltd.(GCMMF)। इसी संस्था के कुल 5,00,000 सदस्यों ने 2 रुपये प्रति सदस्य योगदान देकर 'मंथन' फ़िल्म को प्रोड्यूस किया, और जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो ट्रक भर भर कर गाँव वाले आये "अपनी" इस फ़िल्म को देखने के लिए। एक कलात्मक और ग़ैर-व्यावसायिक फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़ दिये, जो फ़िल्म इतिहास में एक मिसाल है। स्मिता पाटिल, गिरीश करनाड, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबन्दा, अमरीश पुरी प्रमुख अभिनीत 'मंथन' को 1978 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला; साथ ही सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय पुरस्कार भी इस फ़िल्म के लिए विजय तेन्दुलकर को ही मिला। भारत की तरफ़ से ऑस्कर के लिए भी यही फ़िल्म मनोनीत हुआ। फ़िल्म के लोकप्रिय गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के लिए गायिका प्रीति सागर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया। इस गीत को बाद में 'अमूल' कम्पनी ने अपने विज्ञापन के लिए प्रयोग किया। गुजराती लोक-धुन की छाया लिये इस गीत में एक महिला के अपने प्रेमी को देखने की आस को दर्शाया गया है। 'अमूल' के विज्ञापन में इस गीत के साथ-साथ स्मिता पाटिल भी नज़र आती हैं और साथ ही स्क्रीन पर नज़र आते हैं ये शब्द - “Every morning 17 lac women across 9,000 villages, bringing in milk worth Rs.4 crores, are now celebrating their economic independence. Thanks to the co-operative movement called Amul.”

वनराज भाटिया
फ़िल्म 'मंथन' के संगीतकार थे कलात्मक फ़िल्मों में संगीत देने के लिए मशहूर वनराज भाटिया। गायिका प्रीति सागर भी उन्हीं की खोज थी। विविध भारती के एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि प्रीति सागर को उन्होंने कैसे खोजा, तो उन्होंने बताया कि प्रीति की माँ ऐन्जेला वनराज जी की क्लासमेट हुआ करती थीं 'न्यू ईरा स्कूल' में। उसके बाद कॉलेज में भी, यहाँ तक कि एम.ए तक दोनो क्लासमेट रहे। इस तरह से वो प्रीति के सम्पर्क में आये। कम बजट की फ़िल्में होने की वजह से वनराज भाटिया ने प्रीति सागर से कई गीत गवाये और प्रीति की अलग हट कर आवाज़ ने हर गीत में एक अलग ही चमक पैदा की। 'मंथन' के इस गीत के बारे में भी वनराज भाटिया ने उस साक्षात्कार में बताया था। "शुरू-शुरू में इस फ़िल्म के लिए किसी गीत की योजना नहीं थी। केवल पार्श्व-संगीत की ही योजना था। पर फ़िल्म के स्क्रिप्ट राइटर सत्यदेव दुबे ने कहा कि कम से कम एक गीत ज़रूर होना चाहिये फ़िल्म में। तब जाकर मैंने एक गीत कम्पोज़ की। यह एक प्रेरित गीत था, an inspired song। मैं, प्रीति और उसकी बहन नीति एक दिन दोपहर को बैठ गये और इस गीत की रचना शुरु हुई। हम तीनो ने मिल कर इस गीत के बोल भी लिखे और गीत को डेवेलप करते गये। नीति ने बोलों को पॉलिश किया। जब गीत बन कर बाहर आया तो मध्यप्रदेश के लोगों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, गुजरातियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, राजस्थानियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है। पर सच्चाई यही है कि यह स्टुडियो की भाषा थी। जब हमने यह गीत बनाया तो इसका इस्तेमाल फ़िल्म में बतौर पार्श्वसंगीत के रूप में होना था। यह गीत फ़िल्म में कुल सात बार बजता है। ओपेनिंग सीक्वेन्स में 1.5 मिनट के लिए जिसमें नामावली दिखाई जाती है। मैंने पूछा कि टाइटल म्युज़िक 1.5 मिनट का कैसे हो सकता है क्योंकि श्याम बेनेगल उसमें एक अन्तरा भी चाहते थे। मैंने कहा कि अन्तरा कैसे फ़िट होगा इधर? उन्होंने मुझसे गीत का लय बढ़ाकर अन्तरा शामिल करने का सुझाव दिया। और यही वजह है कि इस शुरुआती संस्करण में गीत की रफ़्तार थोड़ी तेज़ है। और फ़िल्मांकन में तेज़ रफ़्तार से जाती हुई ट्रेन के सीन से मैच भी हो गया। उसके बाद स्पीड स्वाभाविक कर दिया जाता है जब गिरिश करनाड जाने लगते हैं और नायिका दौड़ती हुई आती है, उस वक़्त पूरा गीत सही स्पीड में आ जाता है।" वनराज भाटिया ने आगे बताया कि यह किसी लोक गीत की धुन नहीं है, बल्कि उन्होंने ही इसे लोक गीत जैसा कम्पोज़ किया है। उन्हें यह बिल्कुल आभास नहीं था कि यह गीत इतना बड़ा हिट सिद्ध होगा। इस गीत में उन्होंने केवल चार सारंगियों का इस्तेमाल किया था बस।

प्रीति सागर
गायिका प्रीति सागर यह मानती हैं कि यह गीत आज भी उनकी पहचान है और इस गीत ने ही उन्हें अपने चाहनेवालों का बेशुमार प्यार दिया है। "जब हम इस गीत को रेकॉर्ड कर रहे थे, उस समय हमें इतना सा भी अनुमान नहीं था कि यह इतना पॉपुलर होगा। मुझे याद है कि मैं स्टुडियो में 'मंथन' के निर्देशक श्याम बेनेगल और संगीतकार वनराज भाटिया के साथ थी। गीत के बोल कुछ ठीक नहीं जम रहे थे, वनराज जी को अच्छा नहीं लग रहा था। तब मेरी बहन नीति, जो अब अमरीका में है और उस वक़्त वो केवल 15 साल की थी, वो भी हमारे साथ स्टुडियो में बैठी थी। श्याम बाबू ने नीति को गीत के बोलों को लिखने के लिए कहा। इस तरह से नीति ने अपना पहला फ़िल्मी गीत लिखा गुजराती और हिन्दी में, और उस साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में भी मनोनित हुई, आनन्द बक्शी और गुलज़ार जैसे स्तम्भ गीतकारों के साथ", प्रीति सागर ने एक साक्षात्कार में बताया। पुरस्कार गुलज़ार साहब को मिला था "दो दीवाने शहर में" गीत के लिए। प्रीति सागर के लिए इस गीत से जुड़ा सबसे ज़्यादा गर्व करने का मुहूर्त वह था जब उन्होंने इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के लिए गाया था। इस घटना को याद करते हुए उन्होंने कहा, "जब प्रिन्स चार्ल्स भारत आये थे 1982 में, उन्होंने 'मंथन' देखी और मेरा गीत उन्हें बहुत पसन्द आया। वो आनन्द गाँव में डॉ. कुरिएन के फ़ार्म में गये और वहीं कुरिएन साहब ने मुझे बुलाया था इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के सामने बैठ कर गाने के लिए। मैं वहाँ गई और गीत गाया, और प्रिन्स चार्ल्स ने मेरी काफ़ी सराहना की।" मिट्टी की ख़ुशबू लिये यह गीत आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उस ज़माने में था। क्या है वजह, इसका आप ही कीजिये मंथन। सुनिए, यही उल्लेखनीय गीत-

फिल्म - मन्थन : 'मेरो गाम काठा पारे...'  : गायिका - प्रीति सागर : संगीत - वनराज भाटिया 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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