Wednesday, December 14, 2011

ये चमन हमारा अपना है....राज कपूर की जयंती पर सुनें शैलेन्द्र -दत्ताराम रचित ये गीत


इस कथानक पर फिल्म बनवाने के पीछे नेहरू जी के दो उद्देश्य थे। मात्र एक दशक पहले स्वतंत्र देश के सरकार की न्याय व्यवस्था पर विश्वास जगाना और नेहरू जी का बच्चों के प्रति अनुराग को अभव्यक्ति देना। फिल्म के अन्तिम दृश्यों में नेहरू जी ने स्वयं काम करने की सहमति भी राज कपूर को दी थी। पूरी फिल्म बन जाने के बाद जब नेहरू जी की बारी आई तो मोरार जी देसाई ने उन्हें फिल्म में काम करने से रोका। नेहरू जी की राजनैतिक छवि के कारण अन्य लोगों ने भी उन्हें मना किया।

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 809/2011/249

ज १४ दिसम्बर है, आज के ही दिन वर्ष १९२४ में उस महान स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर का जन्म हुआ था, जिनकी स्मृति में हम ओल्ड इज़ गोल्ड की श्रृंखला ‘आधी हकीकत आधा फसाना’ प्रस्तुत कर रहे हैं। आज इस श्रृंखला की नौवीं कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने प्रिय पाठकों का स्वागत करते हुए आरम्भ करता हूँ, राज कपूर की एक और महत्त्वपूर्ण कृति पर चर्चा। राज कपूर की यह उल्लेखनीय कृति है, १९५७ में निर्मित फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ थी।

यह विश्वास करना कठिन होगा कि फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ का निर्माण देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर राज कपूर ने किया था, परन्तु यह सत्य है। दरअसल नेहरू जी और राज कपूर में कई समानताएँ थीं। दोनों सपनों के सौदागर थे और समाजवादी विचारधारा के पोषक थे। दोनों का व्यक्तित्व सोवियत रूस में अत्यन्त लोकप्रिय रहा है। राज कपूर नेहरू जी के अनन्य भक्त थे और प्रायः दोनों की भेंट हुआ करती थी। ऐसी ही एक भेंट में नेहरू जी ने राज कपूर से एक ऐसी फिल्म बनाने को कहा जिसमें एक बच्चे की कहानी हो और वह बच्चा अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए दिल्ली की दुर्गम यात्रा कर देश के प्रधानमंत्री तक अपनी फरियाद करता है। अन्ततः वह बालक प्रधानमंत्री नेहरू से मिलने में सफल हो जाता है।

इस कथानक पर फिल्म बनवाने के पीछे नेहरू जी के दो उद्देश्य थे। मात्र एक दशक पहले स्वतंत्र देश के सरकार की न्याय व्यवस्था पर विश्वास जगाना और नेहरू जी का बच्चों के प्रति अनुराग को अभव्यक्ति देना। फिल्म के अन्तिम दृश्यों में नेहरू जी ने स्वयं काम करने की सहमति भी राज कपूर को दी थी। पूरी फिल्म बन जाने के बाद जब नेहरू जी की बारी आई तो मोरार जी देसाई ने उन्हें फिल्म में काम करने से रोका। नेहरू जी की राजनैतिक छवि के कारण अन्य लोगों ने भी उन्हें मना किया। असमंजस की स्थिति में नेहरू जी ने राज कपूर से अपनी असमर्थता बता दी। राज कपूर इस फिल्म को लगभग पूरी बना चुके थे। इस अप्रत्याशित स्थिति में खिन्न मन से अन्तिम प्रसंगों में फिल्म डिवीजन के ‘स्टॉक शॉट’ की सहायता से किसी प्रकार फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ को पूरा किया। फिल्म तो नहीं चली, परन्तु इसके गीतों को अपार सफलता मिली।

राज कपूर ने फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ के निर्देशन के लिए अमर कुमार को और संगीत के लिए दत्ताराम को पहली बार स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अवसर दिया। इससे पहले तक दत्ताराम, शंकर-जयकिशन के सहायक थे। दत्ताराम का ताल-पक्ष बेहद मजबूत था। वे तबला, ढोलक और ढफ वादन में अत्यन्त कुशल थे। राज कपूर की फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ में जब उन्हें पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर मिला तो उन्होने फिल्म के सभी आठ गीतों की धुने बड़े परिश्रम से कथ्य के अनुकूल तैयार कीं। चाचा नेहरू के बाल-प्रेम को रेखांकित करने के लिए राज कपूर ने शैलेंद्र का लिखा गीत- ‘चूँ चूँ करती आई चिड़िया...’ और वर्षों की गुलामी के बाद मिली स्वतन्त्रता के वातावरण में नवनिर्माण के लिए प्रेरित करते गीत- ‘ये चमन हमारा अपना है...’ को शामिल किया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि फिल्म के यह दोनों गीत आज भी लोकप्रिय हैं। प्रत्येक वर्ष बाल दिवस पर और राष्ट्रीय पर्वों पर ये दोनों गीत सर्वत्र बजाए जाते हैं। गीत- ‘चूँ चूँ करती आई चिड़िया...’ ओल्ड इज़ गोल्ड की एक श्रृंखला में हम आपको सुनवा चुके है, आज हम इसी फिल्म का दूसरा लोकप्रिय गीत- ‘ये चमन हमारा अपना है...’ आपको सुनवाएँगे। शैलेंद्र के लिखे इस गीत को गीता दत्त, आशा भोसले और साथियों ने स्वर दिया है।



क्या आप जानते हैंदत्ताराम अपनी जिस विशेषता के लिए पहचाने जाते थे, वह एक विशेष प्रकार की ताल थी, जिसे फिल्म जगत में ‘दत्ताराम बीट’ के नाम से पहचाना जाता था। उनकी इस प्रसिद्ध ताल पर सर्वाधिक सफल गीतों का गायन मन्ना डे ने किया है।

पहचानें अगला गीत -फिल्म का शीर्षक गीत है ये मुकेश और आशा के स्वरों में, फिल्म में इस गीत का एक अन्य संस्करण भी है मुकेश की एकल आवाज़ में.
१. गीतकार बताएं इस आशावादी गीत के - २ अंक
२. संगीतकार बताएं - ३ अंक


पिछले अंक में - इंदु जी गूगल बाबा की गलतियों के लिए तहे दिल से माफ़ी, सेहत का ख़याल रखें

खोज व आलेख-
कृष्णमोहन मिश्र



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6 comments:

इन्दु पुरी said...

फिर सुबह होगी? तो आप खय्याम साहब की बात तो नही कर रहे हैं कहीं? यदि हाँ तो लोक कर दीजिए और यदि नही तो......... मैं तो ये भागी हा हा हा

AVADH said...

पता नहीं क्या कारण है, आजकल टिप्पणी पोस्ट करने में कठिनाई हो रही है क्योंकि पोस्ट करने के बाद सीधे गूगलबाबा का अपना ब्लॉग बनाने का तरीका आ जाता है और टिप्पणी कहाँ गयी उसका अता पता नहीं चलता. जैसे साहिर साहेब के बारे में मैंने दो बार टिप्पणी की जो दिखती ही नहीं. खैर...
इंदु बहिन, थोड़ा उल्टा हो गया. राम गांगुली जी शंकर-जयकिशन द्वय के सहायक नहीं थे बल्कि यह दोनों ही वाद्य मंडली में उनके सहायक थे.
अवध लाल

AVADH said...

साहिर साहेब तो बरसों तलक इन्तेज़ार करते रहे और क्या हम सब भी इसी उम्मीद पर इतने दिनों से नहीं बैठे हुए हैं कि वोह सुबह कभी तो आएगी.
अवध लाल

इन्दु पुरी said...

श्रृंखला समाप्त हो गई.जिस ख़ूबसूरती से आपने इसे प्रस्तुत किया.गानों के निर्मित होने तथा अन्य समबन्धित बातों की, घटना क्रम की जानकारी दी वो आप के मेहनत का शानदार उदाहरण है और यह भी ...कि आप लोग कितना दिल से जुड़े हैं संगीत से भी और इस साईट इस ब्लॉग से भी.आप सब बधाई के पात्र हैं.और....अमित ! आप कलम के धनी हैं यह आप ने अपनी हर कड़ी मे साबित किया है.आपको इताआआआ सारा प्यार,बधाई.
मैं बहुत खुश
अब तो पार्टी दे ही दो हा हा हा
हम साथ साथ हैं आप पार्टी देने के लिए मैं खाने के लिए हा हा हा भई ऐसिच हूँ मैं तो

इन्दु पुरी said...

अवध भैया आ गये हा हा हा अरे अब तो पार्टी पक्की.अब किसी को कोई टेंशन करने की जरूरत नही.अवध भैया आ गये,शरद जी,पाबला भैया और भी है न अपनी पूरी टीम हा हा हा आ जाओ चित्तोड पार्टी क्या पार्टियां दूंगी और..........मुझसे मिलकर आप लोगों को कभी अफ़सोस नही होगा इतना जरूर कहूँगी.बहुत अच्छी नही हूँ मैं पर ऐसी जरूर हूँ जिसे आसानी से बुलाया नही जा सकता.
यकीन नही?
अरे! सचमुच ऐसिच हूँ मैं- बहुत प्यारी सी हा हा हा :P

इन्दु पुरी said...

बुलाया नही भुलाया भुलाया पढियेगा हा हा हा

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