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Monday, December 6, 2010

चली राधे रानी, आँखों में पानी....भक्ति और प्रेम का समावेश है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 542/2010/242

"With his very first film Udayer Pathe (Hamrahi in Hindi), Bimal Roy was able to sweep aside the cobwebs of the old tradition and introduce a realism and subtely that was wholly suited to the cinema. He was undoubtedly a pioneer. He reached his peak with a film that still reverberates in the minds of those who saw it when it was first made. I refer to Do Bigha Zamin, which remains one of the landmarks of Indian Cinema."~ Satyajit Ray

सत्यजीत रे के इन उद्गारों के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की आज की महफ़िल की हम शमा जला रहे हैं। बिमल रॊय के फ़िल्मी सफ़र की कहनी कल आकर रुकी थी न्यु थिएटर्स में उनके द्वारा किए गये छायांकन वाले फ़िल्मों तक। इस तरह से तक़नीकी सहायक के रूप में कार्य करने के बद बिमल दा को पहली बार फ़िल्म निर्देशन का मौका मिला सन् १९४४ में, और वह बंगला फ़िल्म थी 'उदयेर पौथे' (उदय के पथ पर)। इसी फ़िल्म का हिंदी में अगले ही साल निर्माण हुआ जिसका शीर्षक रखा गया था 'हमराही'। यह फ़िल्म श्रेणी विभाजन (class discrimination) के मुद्दे को लेकर बनाई गई थी। 'उदयेर पौथे' बंगाल में बहुत ज़्यादा चर्चित हुई थी क्योंकि उस समय इतनी ज़्यादा तकनीकी रूप से विकसीत फ़िल्म नहीं बनी थी बंगला में। बिमल दा निर्देशित ४० के दशक की दो और बंगला फ़िल्में हैं - अंजानगढ़ (१९४८) और 'मंत्रमुग्ध' (१९४९)। 'अंजानगढ़' को हिंदी में भी उसी साल बनाया गया था। १९५० में न्यु थिएटर्स ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और उनके 'आज़ाद हिंद फ़ोर्स' को लेकर एक फ़िल्म निर्देशित की 'पहला आदमी', जिसके संगीतकार थे आर. सी. बोराल। इसी विषय को लेकर इसी साल बम्बई में फ़िल्मिस्तान ने बनाई 'समाधि'। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बंगाल का राजनैतिक दृश्य कुछ ऐसा हो गया था कि वहाँ कि फ़िल्म कंपनियाँ बंद होने के कगार पर आ गई थी। ऐसे में बहुत से बड़े कलाकार बम्बई स्थानांतरित हो गए। बिमल रॊय भी उन्हीं में से एक थे। बम्बई आकर बिमल दा बॊम्बे टॊकीज़ से जुड़ गए और १९५२ में उन्होंने दो फ़िल्में निर्देशित कीं - 'मोरध्वज' और 'माँ'। इन दोनों फ़िल्मों में संगीत एस. के. पाल का था। वह बॊम्बे टॊकीज़ का अंतिम समय था। इसलिए बिमल दा ने यह निर्णय लिया कि ख़ुद की एक फ़िल्म कंपनी खोली जाए। और इस तरह से स्थापना हुई 'बिमल रॊय प्रोडक्शन्स' की। इस बैनर की पहली फ़िल्म हेतु बिमल दा ने एक कम बजट की फ़िल्म बनाने की सोची। इसलिए अपने कलकत्ते के तीन और दोस्त - सलिल चौधरी, नवेन्दु घोष और असित सेन, इन सबों को लेकर सलिल चौधरी की उपन्यास 'रिक्शावाला' पर आधारित 'दो बीघा ज़मीन' बनाने की योजना बनाई। उसके बाद क्या हुआ, यह इतिहास बन चुका है। १९५३ में बनी 'दो बिघा ज़मीन' के बारे में एक बार बताया था सलिलदा की बेटी अंतरा चौधरी ने जिसे हमने आप तक पहुँचाया था 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ९१-वीं कड़ी में। इसलिए आज उसे यहाँ नही दोहरा रहे हैं। बल्कि सीधे बढ़ जाते हैं उनकी अगली फ़िल्म 'परिणीता' पर।

इसी साल १९५३ में बिमल दा ने 'परिणीता' का निर्देशन किया था, लेकिन यह 'बिमल रॊय प्रोडक्शन्स' की प्रस्तुति नहीं थी। अभिनेता अशोक कुमार, जिनका हिमांशु राय और देविका रानी के साथ बहुत अच्छा संबंध था, हमेशा चाहा कि बॊम्बे टॊकीज़ अपनी आर्थिक समस्याओं से बाहर निकले, और इस मकसद से उन्होंने कुछ फ़िल्में प्रोड्युस की। हालाँकि इन फ़िल्मों को सफलता ज़रूर मिली, लेकिन बॊम्बे टॊकीज़ में चल रहे अस्थिरता को ख़त्म नहीं कर सके और १९५२ में बॊम्बे टॊकीज़ में हमेशा के ताला लग गया। अशोक कुमार ने फिर अपनी निजी कंपनी 'अशोक कुमार प्रोडक्शन्स' की नींव रखी और इस बैनर तले पहली फ़िल्म 'परिणीता' का निर्माण किया। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की मशहूर उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में मीना कुमारी शीर्षक भूमिका में नज़र आईं थीं और साथ में थे अशोक कुमार और नासिर हुसैन। इस फ़िल्म का एक मुख्य आकर्षण बिमल रॊय का निर्देशन भी था। दादामुनि अशोक कुमार ने बाद में बिमल दा की शान में ये शब्द कहे थे - "In my long experience in this industry I really have not come across another director like Bimal Roy… such commitment to cinema, to perfection. I regret we have few like him today." गायक अरुण कुमार मुखर्जी, जो अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे, और अशोक कुमार का प्लेबैक करने के लिए जाने जाते थे ('बंधन', 'झूला', 'क़िस्मत' जैसी फ़िल्मों में इन्होंने दादामुनि के लिए गाया था), तो दादामुनि ने अरुण कुमार को 'परिणीता' में सगीत देने का मौका दिया। भरत व्यास का लिखा और मन्ना डे का गाया इस फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत था "चले राधे रानी अखियों में पानी, अपने मोहन से मुखड़ा मोड़ के"। इसके अलावा इस फ़िल्म में आशा भोसले ने "गोरे गोरे हाथों में मेहंदी", "कौन मेरी प्रीत के पहले जो तुम" तथा किशोर दा के साथ एक युगल गीत "ऐ बंदी तुम बेगम बनो" गाया था। गीता रॊय की आवाज़ में "चांद है वही सितारें वो ही, गगन फिर भी क्यों उदास है" भी एक सुंदर रचना है। लेकिन फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत "चले राधे रानी" ही है, और इसीलिए आज हम आपको यही गीत सुनवा रहे है, सुनिए...



क्या आप जानते हैं...
कि अरुण कुमार का ६ दिसम्बर १९५५ को दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया था जब वे अशोक कुमार के साथ फ़िल्म 'बंदिश' का ट्रायल शो देख कर कार में वापस लौट रहे थे। यह भी अजीब इत्तेफ़ाक़ की बात है कि जिस अशोक कुमार ने उन्हें फ़िल्मों में अवसर दिलाया, उन्हीं की गोद में सिर रख कर उनका निधन हुआ।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०३ /शृंखला ०५
गीत की एक झलक सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - बिमल रॉय की एक और नायाब फिल्म.

सवाल १ - गायिका पहचानें - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी को २ अंक और इंदु-रोमेंद्र जी को १-१ अंक की बधाई, इंदु जी और रोमेंद्र जी दोनों ही नियमित नहीं रह पाते और अगर अवध जी भी सही समय पर पहुँच पायें तो मुकाबला और दिलचस्प बन जायेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, February 13, 2010

मेरा बुलबुल सो रहा है शोर तू न मचा...कवि प्रदीप और अनिल दा का रचा एक अनमोल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 344/2010/44

१९४३। इस वर्ष ने ३ प्रमुख फ़िल्में देखी - क़िस्मत, तानसेन, और शकुंतला। 'तानसेन' रणजीत मूवीटोन की फ़िल्म थी जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने सहगल और ख़ुर्शीद से कुछ ऐसे गानें गवाए कि फ़िल्म तो सुपर डुपर हिट साबित हुआ ही, खेमचंद जी और सहगल साहब के करीयर का एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित हुआ। प्रभात से निकल कर और अपनी निजी बैनर 'राजकमल कलामंदिर' की स्थापना कर वी. शांताराम ने इस साल बनाई फ़िल्म 'शकुंतला', जिसके गीत संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाया। संगीतकार वसंत देसाई की इसी फ़िल्म से सही अर्थ में करीयर शुरु हुआ था। और १९४३ में बॊम्बे टॊकीज़ की सफलतम फ़िल्म आई 'क़िस्मत'। 'क़िस्मत' को लिखा व निर्देशित किया था ज्ञान मुखर्जी ने। हिमांशु राय की मृत्यु के बाद बॊम्बे टॊकीज़ में राजनीति चल पड़ी थी। देवीका रानी और शशधर मुखर्जी के बीच चल रही उत्तराधिकार की लड़ाई के बीच ही यह फ़िल्म बनी। अशोक कुमार और मुम्ताज़ शांति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए। देश भर में कई कई जुबिलीज़ मनाने के अलावा यह फ़िल्म कलकत्ता के 'चित्र प्लाज़ा' थिएटर में लगातार १९६ हफ़्तों (३ साल) तक प्रदर्शित होती रही। इस रिकार्ड को तोड़ा था रमेश सिप्पी की फ़िल्म 'शोले' ने। 'क़िस्मत' एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म रही क्योंकि इस फ़िल्म में बचपन में बिछड़ने और अंत में फिर मिल जाने की कहानी थी। संगीत की दृष्टि से 'क़िस्मत' अनिल बिस्वास की बॊम्बे टॊकीज़ में सब से उल्लेखनीय फ़िल्म रही। धीरे धीरे पार्श्वगायन की तकनीक को संगीतकार अपनाने लगे थे, और अच्छे गायक गायिकाएँ इस क्षेत्र में क़दम रख रहे थे। ऐसे में संगीतकार भी गीतों में नए प्रयोग ला रहे थे। इस फ़िल्म के तमाम गीत गली गली गूंजने लगे थे। ख़ास कर कवि प्रदीप के लिखे "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने तो जैसे पराधीन भारत के लोगों के रग रग में वतन परस्ती के जस्बे का संचार कर दिया था। इसी फ़िल्म में एक नर्मो नाज़ुक लोरी भी थी जिसे शायद आज भी फ़िल्म संगीत के सर्वश्रेष्ठ लोरियों में गिना जाता है! "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल ना मचा"। कवि प्रदीप की गीत रचना, अनिल दा का संगीत। इसी गीत को हमने चुना है १९४३ का प्रतिनिधित्व करने के लिए।

फ़िल्म 'क़िस्मत' के गीतों की बात करें तो उन दिनों अमीरबाई कर्नाटकी अनिल दा की पहली पसंद हुआ करती थीं। फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से ६ गीतों में ही अमीरबाई की आवाज़ शामिल थी। उपर ज़िक्र किए गए दो गीतों के अलावा इस फ़िल्म में अमीरबाई ने दो दुख भरे गीत गाए - "ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा", और "अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया"। जहाँ तक आज के प्रस्तुत गीत का सवाल है, इसके दो वर्ज़न है, एक में अमीरबाई के साथ आवाज़ है अशोक कुमार की, और दूसरे में अरुण कुमार की। दरसल अरुण कुमार अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे जो अच्छा भी गाते थे और जिनकी आवाज़ अशोक कुमार से कुछ कुछ मिलती थी। इसलिए बॊम्बे टॊकीज़ के कुछ फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्लेबैक उन्होने किया था। लेकिन इस गीत को दोनों से ही अलग अलग गवाया गया और दोनों वर्ज़न ही उपलब्ध हैं। आज हम आपको इस गीत के दोनों वर्ज़न सुनवाएँगे। कहा जाता है कि अनिल बिस्वास ने मज़ाक मज़ाक में कहा था कि यही एकमात्र ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया था। यह भी कहा जाता है कि अनिल दा अशोक कुमार के गायन से कुछ ज़्यादा संतुष्ट नहीं होते थे, इसलिए वो अरुण कुमार से ही उनके गानें गवाने में विश्वास रखते थे। इस फ़िल्म में अरुण कुमार ने अमीरबाई के साथ एक और युगल गीत गाया था जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी था, "हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाए, ये जो एक दिन हँसाए एक दिन रुलाए"। अरुण कुमार का गाया "तेरे दुख के दिन फिरेंगे ले दुआ मेरी लिए जा" भी एक दार्शनिक गीत है इस फ़िल्म का। अनिल दा की बहन और गायिका पारुल घोष का "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" शास्त्रीय रंग में ढला हुआ इसी फ़िल्म का एक सुरीला नग़मा था। इससे पहले कि आज का गीत आप सुनें, उस दौर का दादामुनि अशोक कुमार ने सन्‍ १९६८ में विविध भारती पर किस तरह से वर्णन किया था, आइए जानें उन्ही के कहे हुए शब्दों में। "दरअसल जब मैं फ़िल्मों में आया था सन् १९३४-३५ के आसपास, उस समय गायक अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होने फ़िल्मी गानों को एक शक्ल दी और मेरा ख़याल है उनकी वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्ही की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानी बॊक्स ऒफ़िस सक्सेस के लिए गानों को सब से ऊंची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक के तकनीक की तैयारियां हो रही थी। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आए नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गानें सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाए जाते थे ताक़ी हम जैसे गानेवाले आसानी से गा सके। मैं अपनी पुरानी फ़िल्मों से कुछ मुखड़े सुना सकता हूँ, (गाते हुए) "मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूँ रे", "चल चल रे नौजवान", "चली रे चली रे मेरी नाव चली रे", "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है...", "पीर पीर क्या करता रे तेरी पीर ना जाने कोई"। ये पहले पहले बॊम्बे टॊकीज़ के गीतों में "रे" का इस्तेमाल बहुत किया जाता था।" तो आइए दोस्तों, अब इस गीत को सुनें, पहले अशोक कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में, और फिर अरुण कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में।



दूसरा संस्करण


चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

देख रही तेरा रस्ता कब से
अब तो आजा बेदर्दी सैयां,
रो रो अखियाँ तरसे संगदिल,
मन से पडूं मैं तेरे पैयां..

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. ये फिल्म इस बेहद कामियाब संगीतकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही, हम किस संगीतकार की बात कर रहे हैं- सही जवाब के होंगें २ अंक.
3. इस गीत की गायिका का नाम बताएं जिसका हाल के सालों में एक रीमिक्स संस्करण भी आया-सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
4. इस गीत के गीतकार उस दौर के सफल गीतकारों में थे उनका नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
पहेली में नए प्रयोगों के चलते खूब मज़ा आ रहा है. रोहित जी अब तक ७ अंकों के साथ आगे चल रहे हैं, शरद जी हैं ५ अंकों पर, इंदु जी नाराज़ हो गयी क्या ? अरे व्यस्तता के चलते आपका स्वागत नहीं कर पाए, वैसे स्वागत तो मेहमानों का होता है न, आप तो ओल्ड इस गोल्ड की सरताज सदस्या ठहरीं. वैसे पहेली के सुझावों के लिए हम शरद जी का धन्येवाद देते हैं. ताज्जब इस बात का है कि सही गीत पता लग जाने के बाद भी कोई अन्य सवालों के जवाब लेकर हाज़िर नहीं हो रहा. शायद इस शृंखला के मुश्किल गीतों के कारण ऐसा हो...अवध जी हमें मेल किया और सभी सवालों के जवाब दे डाले. नियमानुसार एक से अधिक सही जवाब देने पर कोई अंक नहीं दिए जाने हैं, पर अवध जी का जवाब अन्य लोगों तक नहीं पहुंचा और उनका कंप्यूटर खराब होने के करण हो सकता है उन्हें नियमों की सही जानकारी न हो, तो इस पहली गलती को नज़र अंदाज़ कर हम उन्हें २ अंक देते हैं, ताकि उनका भी खाता खुले...सभी विजेताओं को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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