Showing posts with label parichay. Show all posts
Showing posts with label parichay. Show all posts

Thursday, August 13, 2009

मुसाफिर हूँ यारों...न घर है न ठिकाना...हमें भी तो किशोर दा को गीतों को बस सुनते ही चले जाना है....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 170

दोस्तों, पिछले ९ दिनों से लगातार किशोर दा की आवाज़ में ज़िंदगी के नौ अलग अलग रूपों से गुज़रते हुए आज हम आ पहुँचे हैं 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़' शृंखला की अंतिम कड़ी में। जिस तरह से एक मुसाफ़िर निरंतर चलते जाता है, ठीक वैसे ही हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सुरीले मुसाफ़िर ही तो हैं, जो हर रोज़ एक नया सुरीला मंज़िल तय करते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे हैं। जी हाँ, आज इस शृंखला की आख़िरी कड़ी में बातें उस यायावर की जिसकी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा किशोर दा की आवाज़ में ढ़लकर कुछ इस क़दर बयाँ हुआ कि "दिन ने हाथ थाम कर इधर बिठा लिया, रात ने इशारे से उधर बुला लिया, सुबह से शाम से मेरा दोस्ताना, मुसाफ़िर हूँ यारों न घर है न ठिकाना, मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना"। यह फ़िल्म 'परिचय' का गीत है। फ़िल्म १८ अक्टुबर सन् १९७२ में प्रदर्शित हुई थी जिसे लिखा व निर्देशित किया था गुलज़ार साहब ने। फ़िल्म की कहानी आधारित थी अंग्रेज़ी फ़िल्म 'द साउंड औफ़ म्युज़िक' पर, जिसका गुलज़ार साहब ने बहुत ही उन्दा भारतीयकरण किया था। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे जीतेंद्र, जया बच्चन और संजीव कुमार। इस फ़िल्म के गीतों के लिए लता मंगेशकर को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। गुलज़ार साहब और राहुल देव बर्मन की उन दिनों नयी नयी जोड़ी बनी थी, और इसके बाद तो इस जोड़ी ने एक से एक कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में हमें दी।

किशोर कुमार के गाये फ़िल्म 'परिचय' के प्रस्तुत गीत को राहुल देव बर्मन ने अपने विशेष जयमाला कार्यक्रम में बजाया था यह कहते हुए - "दोस्तों, अब मैं अपने एक प्रिय दोस्त के लिए कुछ कहूँगा। गुलज़ार। वो मेरे घर गाना लिखने आता है, 'डिरेक्शन' भी देता है, उसके साथ मेरा बहुत जमता है। लेकिन जब वो गाना लिखने बैठता है तो हमारी दुश्मनी शुरु हो जाती है क्योंकि उसके गीत को समझने के लिए मुझे एक या डेढ़ घंटे लगते हैं और मैं जब उसके धुन बनाता हूँ तो उसे समझने में उन्हे दो दिन लग जाते हैं। २/३ दिन के बाद जब दोनों को एक दूसरे का काम समझ में आ जाता है तो दुश्मनी ख़तम होती है। बहुत दिन पहले फ़िल्म 'परिचय' के समय एक दिन मैं किसी कारण से बहुत दुखी था। गुलज़ार आये और कहा कि 'अगर 'मूड' हो तो यह गाना बना देना'। गाना पढ़ते ही एक मिनट के अंदर मैने धुन बना दिया क्योंकि मैं दुखी था और गाने का 'मूड' भी कुछ ऐसा ही था। दो दिन के अंदर गाना रिकार्ड भी कर लिया।" दोस्तों, हर इंसान यहाँ एक मुसाफ़िर है, जो अपना सफ़र तय कर के एक दिन हमेशा के लिए यहाँ से चला जाता है। ठीक वैसे ही जैसे किशोर दा हम से जुदा हो गये थे। आज किशोर दा के गाये तमाम गानें हर रोज़ हमें उनकी याद दिलाते हैं। उनके गाये तमाम गानें सहारे हैं हम सब के, जो हमारे साथ में हर वक़्त चलते हैं, चाहे ख़ुशी हो या ग़म, चाहे जुदाई हो या मिलन। 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़', इस लघु शृंखला के ज़रिये हम ने श्रद्धांजली अर्पित की इस अनूठे हरफ़नमौला फ़नकार को, कला के इस अद्वितीय पुजारी को!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. जन्माष्ठमी पर एक विशेष गीत है ये.
2. आवाज़ है किशोर कुमार की.
3. मुखड़े में शब्द है -"जनम".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी मुबारक बाद...४ अंक हो गए आपके और आप भी अब मनु जी के बराबर आ गए...हमें लगता है कि अपने तीसरे विजेता के लिए हमें लम्बा इंतज़ार करना पड़ेगा. रोहित जी जोर आजमाइश जारी रखिये....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, August 18, 2008

मोरा गोरा अंग लेई ले....- गुलज़ार, एक परिचय

गुलज़ार बस एक कवि हैं और कुछ नही, एक हरफनमौला कवि, जो फिल्में भी लिखता है, निर्देशन भी करता है, और गीत भी रचता है, मगर वो जो भी करता है सब कुछ एक कविता सा एहसास देता है. फ़िल्म इंडस्ट्री में केवल कुछ ही ऐसे फनकार हैं, जिनकी हर अभिव्यक्ति संवेदनाओं को इतनी गहराई से छूने की कुव्वत रखती है, और गुलज़ार उन चुनिन्दा नामों में से एक हैं, जो इंडस्ट्री की गलाकाट प्रतियोगी वातावरण में भी अपना क्लास, अपना स्तर कभी गिरने नही देते.


गुलज़ार का जन्म १९३६ में, एक छोटे से शहर दीना (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ, शायरी, साहित्य और कविता से जुडाव बचपन से ही जुड़ गया था, संगीत में भी गहरी रूचि थी, पंडित रवि शंकर और अली अकबर खान जैसे उस्तादों को सुनने का मौका वो कभी नही छोड़ते थे.
(चित्र में हैं सम्पूरण सिंह यानी आज के गुलज़ार)
गुलज़ार और उनके परिवार ने भी भारत -पाकिस्तान बँटवारे का दर्द बहुत करीब से महसूस किया, जो बाद में उनकी कविताओं में बहुत शिद्दत के साथ उभर कर आया. एक तरफ़ जहाँ उनका परिवार अमृतसर (पंजाब , भारत) आकर बस गया, वहीँ गुलज़ार साब चले आए मुंबई, अपने सपनों के साथ. वोर्ली के एक गेरेज में, बतौर मेकेनिक वो काम करने लगे और खाली समय में कवितायें लिखते. फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्होंने बिमल राय, हृषिकेश मुख़र्जी, और हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर काम शुरू किया. बिमल राय जो हमेशा नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका देते थे उनकी फ़िल्म ‘बंदनी’ के लिए गुलज़ार ने अपना पहला गीत लिखा. संगीत था, एस डी बर्मन का. धीरे धीरे गुलज़ार ने फिल्मों के लिए लिखना शुरू किया, हृषी दा और असित सेन के लिए, कुछ बहतरीन फिल्में उन्होंने लिखी जो कालजयी मानी जा सकती हैं, जिनमे आनंद (१९७०), गुड्डी (१९७१), बावर्ची (१९७२), नमक हराम (१९७३), दो दुनी चार (१९६८), खामोशी (१९६९) और सफर (१९७०) जैसी फिल्में शामिल हैं.



१९७१ में ही "मेरे अपने" से उन्होंने बतौर निर्देशक अपना सफर शुरू किया, १९७२ में आयी "परिचय" और "कोशिश" जो एक गूंगे बहरे दम्पति के जीवन पर आधारित कहानी थी, जिसमे अद्भुत काम किया संजीव कुमार और जाया भादुरी ने, इतना संवेदनशील विषय को इतने उत्कृष्ट रूप में परदे पर साकार कर गुलज़ार ने अपने आलोचकों को भी हैरान कर दिया. इस फ़िल्म के बाद शुरुवात हुई गुलज़ार और संजीव कुमार की दोस्ती की, इस दोस्ती ने हमें दीं, आंधी(१९७५), मौसम(1975), अंगूर(१९८१)और नमकीन(१९८२) जैसी नायाब फिल्में, जो यकीनन संजीव कुमार के अभिनय जीवन की बहतरीन फिल्में रहीं हैं. गुलज़ार ने जीतेन्द्र, विनोद खन्ना, हेमा मालिनी, डिम्पल कपाडिया जैसे व्यवसायिक सिनेमा के अभिनेताओं को उनके जीवन के बहतरीन किरदार जीना का मौका दिया, इन्ही फिल्मों की बदौलत इन कलाकारों की असली प्रतिभा जग जाहिर हुई, खुशबू, किनारा, परिचय, मीरा, अचानक, लेकिन जैसी फिल्में भला कौन भूल सकता है.

छोटे परदे पर भी गुलज़ार ने अपनी छाप छोडी, शुरुवात की धारावाहिक "मिर्जा ग़लिब" से, कहते हैं कि इस धारावाहिक के बजट को बनाये रखने के लिए गुलज़ार ने अपना पारिश्रमिक भी लेना छोड़ दिया था. नसीरुद्दीन शाह, ग़लिब बन कर आए, जगजीत सिंह के संगीत ने ग़लिब की शायरी को नया आकाश दे दिया, गुलज़ार ने जैसे अपने पसंदीदा शायर को फ़िर से जिंदा कर दिया. जंगल बुक, और पोटली बाबा की जैसे बहुत से धारावाहिकों में गुलज़ार साब के योगदान याद कीजिये ज़रा.

काफी समय तक गुलज़ार पार्श्व में रहे और लौटे १९९६ में फ़िल्म "माचिस" के साथ. आज भी गुलज़ार का नाम जिस फ़िल्म के साथ जुड़ जाता है, वो ढेरों फिल्मों की भीड़ में भी अलग पहचान बना जाती है.

गुलज़ार को अब तक ५ राष्ट्रीय पुरस्कार जिसमे फ़िल्म "कोशिश" में बहतरीन स्क्रीन प्ले, "मौसम" में सर्वश्रेष्ट निर्देशक, और फ़िल्म "इजाज़त" में सर्वश्रेष्ट गीतकार के लिए शामिल है मिल चुके हैं. १७ फिल्मफयेर पुरस्कार भी हैं खाते में, कहानी संग्रह "धुवाँ" के लिए साहित्य अकेडमी सम्मान, हस्ताक्षर है साहित्य में उनके योगदान का. बच्चों के लिए लिखी उनकी पुस्तक "एकता" को NCERT ने १९८९ में पुरुस्कृत किया. उनकी कविताओं की किताबें हम सब की लाईब्ररी का हिस्सा हैं, भला कैसे कोई बच सकता है इस जादूगर कलमकार से.

आज हम सब के प्रिये गुलज़ार साहब अपना ७२ वां जन्मदिन मना रहें हैं, क्यों न आज हम सुनें उनका वो सबसे पहला गीत जिसका जिक्र हमने उपर किया है, फ़िल्म "बंदनी" में यह गुलज़ार का एकमात्र गीत है, नूतन पर फिल्माया गए इस गीत के बारे में अब हम क्या कहें, बस सुनें देखें और आनंद लें. गीत की पृष्ठभूमि भी है साथ में, फ़िल्म की सिचुअशन के साथ कितना जबरदस्त न्याय किया है, गुलज़ार ने, ख़ुद ही देखिये.



आवाज़ पर हम गुलज़ार साहब पर निरंतर नयी जानकारियां आपके सामने लाते रहेंगे, फिलहाल तो बस इतना ही कहने का मन है कि - जन्मदिन मुबारक हो गुलज़ार साहब.

सोत्र इन्टरनेट, संकलन - सजीव सारथी

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ