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Thursday, September 27, 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : अनुराग शर्मा की यादों से झांकती दो फ़िल्में



मैंने देखी पहली फ़िल्म : अनुराग शर्मा 

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान में प्रत्येक गुरुवार को हम आपके लिए सिनेमा के इतिहास पर विविध सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को आपके संस्मरणों पर आधारित ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ का प्रकाशन करते हैं। आज माह का चौथा गुरुवार है, इसलिए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, गैर-प्रतियोगी संस्मरण। आज का यह संस्मरण, रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक-मण्डल के सदस्य अनुराग शर्मा का है।


‘गीत’ के गीत में फूलों की सुगन्ध है तो ‘पुष्पांजलि’ के गीत में राधा के लिए कृष्ण की व्यग्रता

मेरी आयु चार-पाँच वर्ष की थी जब हम लोग जम्मू के तालाब तिल्लो के एक नये बन रहे इलाक़े में किराये पर रहने आये थे। दिन में स्कूल जाना और शाम को अपने मित्रों के साथ तरह-तरह के खेल खेलना। आस-पास नहरें, खड्डों, पत्थरों और जंगली झाड़ियों की भरमार थी। जल्दी ही मैं आक और लेंटाना के पौधों को पहचानने लगा। छोटे-छोटे लाल बेर हम बच्चों के पसन्दीदा थे, जिन्हें डोगरी में गरने कहा जाता था। हमसे कुछ बड़ी लड़कियाँ शाम को जगमगाते जुगनुओं को अपनी चुन्नी में सम्हालकर ऐसे लपेट लेती थीं कि वे सुरक्षित रहते हुए उन्हें प्रकाशित करते रहें।

शाम को रेडियो पर "रेडियो कश्मीर-जम्मू की आवाज़" सुनते थे। मुंशी अंकल और निक्की की बातचीत सुनकर मज़ा आता था। कभी कभार सुबह को कुन्दनलाल सहगल और रात में हवामहल सुनना भी याद है। रविवार को रेडियो पर किसी हिन्दी फ़िल्म का ऑडियो सुनाया जाता था जिसे सभी बड़े ध्यान से सुनते थे और कई बार हम लोग भी। मुकेश के स्वर में "सावन का महीना" उन गीतों में से एक है जिनकी यादें सबसे पुरानी हैं।

जम्मू से पहले की छिटपुट यादें रामपुर, बदायूँ और बरेली की हैं लेकिन जम्मू के दृश्य लम्बे और अधिक स्पष्ट हैं। रामपुर में घर के बाहर शाम को एक पुलिया पर अपने मित्रों के साथ बैठकर एक सुर में "बम बम भोले" कहने की याद तो है लेकिन मित्रों के नाम नहीं याद। जबकि जम्मू की यादों में पात्रों के चेहरे-मोहरे और व्यक्तित्व के साथ उनके नाम भी अधिकांशतः स्पष्ट हैं। तब से अब तक अनगिनत फ़िल्में देखी होंगी, न जाने कितनी भाषाओं में। लेकिन पीछे जाकर देखता हूँ तो सबसे पहले जम्मू में देखी दो फ़िल्मों के बहुत से सुन्दर दृश्य और गीत याद आते हैं। पहाड़ी नगरी जम्मू में देखी ये दोनों हिन्दी फ़िल्में मैंने अपने माता-पिता के साथ शायद कुछ ही दिनों के अंतराल में देखी थीं। एक फ़िल्म का तो नाम ही "गीत" था। शायद तब उम्र की कमी के कारण या तब से इतना समय ग़ुज़र जाने के कारण फ़िल्म की कथा तो पूरी तरह याद नहीं लेकिन कई गीत और दृश्य अब भी दिल में जगह बनाकर डटे हुए हैं। पहला फ़िल्मी दृश्य जो मुझे अभी भी अच्छी तरह याद है, वह है "आजा तुझको पुकारें मेरे गीत रे..." गीत का दृश्य। ऐसा लगता है कि जब हम हाल में घुसे थे तो फ़िल्म शुरू हो चुकी थी और यह गीत चल रहा था। आइये, एक पल रुककर सुनें यह मधुर गीत-

फिल्म – गीत : ‘आजा तुझको पुकारे मेरे गीत...’ : मुहम्मद रफी


बचपन की दूसरी फ़िल्म थी "पुष्पांजलि"। ठीक से नहीं कह सकता कि ‘गीत’ और ‘पुष्पांजलि’ में से पहले कौन सी फ़िल्म देखी थी। जहाँ ‘गीत’ के जितने भी गीत या दृश्य याद हैं, वे सब हरियाली, सुन्दर फूलों व प्रसन्न करने वाले संगीत में ढले हैं वहीं ‘पुष्पांजलि’ का गीत "दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ..." सुनते समय आज भी किसी प्रिय के खो जाने की भावना का अनुभव होता है। जीवन में पहली बार शायद इसी फ़िल्म को देखकर मुझे मृत्यु के शाश्वत सत्य का अहसास हुआ था। लगभग उन्हीं दिनों अपनी ही उम्र के उस छोटे से लड़के को देखा जो अपने घर के बाहर खड़ा होकर हर आने-जाने वाले हमउम्र से डोगरी में कहता था, "तेरा भाई मर गया।" पूछताछ करने पर पता लगा कि कुछ दिन पहले ही उसका भाई पास की नहर में बह गया था और फिर उसकी लाश ही वापस आई। कुछ दिन बाद मैं भी उसी नहर में बहते समय अपने मकान मालिक के किशोर पुत्र व उनके साथियों द्वारा बचा लिया गया था। मृत्यु की इन हाड़-कँपाती यादों के बीच देखी गयी इन दो फ़िल्मों का न केवल याद रहना बल्कि मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन जाना, अब स्वाभाविक सा ही लगता है। मन्ना डे के मधुर स्वर और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के मधुर संगीत में ढला इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "शाम ढले यमुना किनारे ..." दशकों बाद आज भी मन में बसा हुआ है।

फिल्म – पुष्पांजलि : ‘शाम ढले यमुना किनारे...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर


उसके बाद देखी हुई फ़िल्मों में भुवन शोम, त्रिकाल, चौदहवीं का चाँद, कागज़ के फूल, उमराव जान (पुरानी), जुनून, विजेता और इनके अलावा अनेक फ़िल्में याद हैं मगर इन दो की बात ही कुछ और है।

आपको अनुराग जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता


दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।




Sunday, August 2, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (११)

नोट - आज से रविवार सुबह की कॉफी में आपकी होस्ट होंगी - दीपाली तिवारी "दिशा"

रविवार सुबह की कॉफी का एक और नया अंक लेकर आज हम उपस्तिथ हुए हैं. वैसे तो मन था कि आपकी पसंद के रक्षा बंधन गीत और उनसे जुडी आपकी यादों को ही आज के अंक में संगृहीत करें पर पिछले सप्ताह हुई एक दुखद घटना ने हमें मजबूर किया कि हम शुरुआत करें उस दिवंगत अभिनेत्री की कुछ बातें आपके साथ बांटकर.

फिल्म जगत में अपने अभिनय और सौन्दर्य का जादू बिखेर एक मुकाम बनाने वाली अभिनेत्री लीला नायडू को कौन नहीं जानता. उनका फिल्मी सफर बहुत लम्बा तो नहीं था लेकिन उनके अभिनय की धार को "गागर में सागर" की तरह सराहा गया. लीला नायडू ने सन १९५४ में फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीता था और "वोग" मैग्जीन ने उन्हें विश्व की सर्वश्रेष्ठ दस सुन्दरियों में स्थान दिया था.

लीला नायडू ने अपना फिल्मी सफर मशहूर फिल्मकार ह्रशिकेश मुखर्जी की फिल्म "अनुराधा" से शुरु किया. इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता बलराज साहनी की पत्नि की भूमिका निभायी थी. अनुराधा फिल्म के द्वारा लीला नायडू के अभिनय को सराहा गया और फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिये राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला. अपने छोटे से फिल्मी सफर में लीला नायडू ने उम्मींद, ये रास्ते हैं प्यार के, द गुरु, बागी और त्रिकाल जैसी फिल्मों में अभिनय किया. सन १९६३ में प्रदर्शित फिल्म "ये रास्ते हैं प्यार के" ने लीला नायडू को एक अलग पहचान दी. इस फिल्म में अभिनय के बाद वो नारी स्वतंत्रता की प्रतीक बन गयीं. सन १९६३ में ही उन्होंने आइवरी प्रोडक्शन की फिल्म "हाउसहोल्डर" में भी काम किया.

उनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डालें तो कहा जाता है कि वह अपने निजी जीवन में भी उन्मुक्त विचारों की थी. उनके पिता रमैया नायडू आन्ध्रप्रदेश के थे और न्यूक्लियर विभाग में फिजिसिस्ट थे. उनकी माँ फ्रांसिसी मूल की थीं. अपने फिल्मी कैरियर के दौरान ही लीला नायडू ने ओबेरॉय होटल के मालिक मोहन सिंह के बेटे विक्की ओबेरॉय से विवाह कर लिया. उनसे उनकी दो बेटियाँ हैं. बाद में विक्की ओबेरॉय से तलाक हो जाने के बाद लीला नायडू ने अंग्रेजी कवि डॉम मॉरेस से विवाह किया और उनके साथ लगभग दस वर्ष फ्रांस में रहीं. जब कोर्ट ने उनकी दोनों बेटियों का जिम्मा उनसे लेकर विक्की ओबेरॉय को दे दिया तो वह भारत चलीं आयीं. यहाँ लीला नायडू की मुलाकात दार्शनिक जे.कृष्णमूर्ति से हुई. उसके बाद वह आजीवन उन्हीं के साथ रहीं.

लंबे समय तक फिल्मों से दूर रहने के बाद सन १९८५ में श्याम बेनेगल की फिल्म "त्रिकाल" से उनकी बॉलीवुड में वापिसी हुई थी. इसके बाद सन १९९२ में वह निर्देशक प्रदीप कृष्ण की फिल्म "इलैक्ट्रिक मून" में नजर आयीं थीं. यह उनकी आंखिरी फिल्म थी.

कवि बिहारीलाल का एक दोहा है कि "सतसैया कए दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करं गंभीर" यह दोहा लीला नायडू के छोटे फिल्मी सफर पर भी लागू होता है.लीला नायडू ने छोटे फिल्मी सफर में अपने अभिनय की जो छाप छोडी़ है वो न तो बॉलीवुड भुला सकता है और न ही उनके चाहने वाले. आइये हम सभी सौन्दर्य और अभिनय की देवी को श्रद्धांजंली दें.

अब ऐसा कैसे हो सकता है कि हम आपको लीला जी पर फिमाये गए कुछ नायाब और कुछ दुर्लभ गीत ना सुनाएँ, फिल्म "अनुराधा" (इस फिल्म में बेमिसाल संगीत दिया था पंडित रवि शंकर ने ) और "ये राते हैं प्यार के", दो ऐसी फिल्में हैं जिसमें लीला जी पर फिल्माए गीतों को हम कभी नहीं भूल सकते. चलिए सुनते हैं इन्हीं दो फिल्मों से कुछ नायाब गीत -

जाने जाँ पास आओ न (सुनील दत्त, आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के )


ये रास्ते हैं प्यार के (आशा भोंसले, शीर्षक)


आज ये मेरी जिन्दगी (आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के)


ये खामोशियाँ (रफी- आशा, ये रास्ते हैं प्यार के, एक बेहद खूबसूरत प्रेम गीत)


सांवरे सांवरे (लता, अनुराधा)


कैसे दिन बीते (लता, अनुराधा)


और एक ये बेहद दुर्लभ सा गीत भी सुनिए -
गुनाहों का दिया हक (ये रास्ते हैं प्यार के)


रक्षा बंधन पर हमने चाहा था कि आप अपने कुछ संस्मरण बांटे पर अधिकतर श्रोता शायद इस परिस्तिथि के लिए तैयार नहीं लगे, स्वप्न जी ने कुछ लिखा तो नहीं पर अपने भाई जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उन्हें याद करते हुए उनके सबसे पसंदीदा गीत को सुनवाने की फरमाईश की है. हमें यकीन है कि उनके आज जहाँ कहीं भी होंगे अपनी बहन की श्रद्धाजंली को ज़रूर स्वीकार करेंगें -

कोई होता जिसको अपना (किशोर कुमार, मेरे अपने)


हमलोग शुरु से ही संयुक्त परिवार में रहे. परिवार में सगे रिश्तों के अलावा ऐसे रिश्तों की भी भीड़ रही जिनसे हमारा सीधा-सीधा कोई नाता न था. यानी कि हमारा एक भरा-भरा परिवार था. हमारे यहाँ सभी तीज-त्यौहार बहुत ही विधि विधान से मनाये जाते थे. रक्षाबंधन भी इन्हीं में से एक है. मुझे आज भी याद है क मेरे ताऊजी, पापाजी तथा चाचाजी किस तरह सुबह से ही एक लम्बी पूजा में शामिल होते थे और उस दौरान नया जनेऊ पहनना आदि रस्में की जाती थीं. तरह-तरह के पकवान बनते थे. लेकिन हम बच्चे सिर्फ उनकी खुशबू से अपना काम चलाते थे क्योंकि माँ बार-बार यह कहकर टाल देती थी कि अभी पूजा खत्म नही हुई है. पूजा के बाद राखी बाँधकर खाना खाया जायेगा. उस समय तो अपने क्या दूर-दूर के रिश्तेदार भी राखी बँधवाने आते थे. आज बहुत कुछ बदल गया है. अब तो सगे भाई को भी राखी बाँधने का मौका नहीं मिलता है. खैर चलिए चलते चलते सुनते चलें रंजना भाटिया जी की पसंद का ये गीत जो इस रक्षा बंधन पर आप सब की नज़र है-

चंदा रे मेरे भैया से कहना (लता, चम्बल की कसम)


सभी भाई -बहनों के लिए ये रक्षा बंधन का पर्व मंगलमय हो इसी उम्मीद के साथ मैं दिशा आप सब से लेती हूँ इजाज़त.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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