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Sunday, October 6, 2019

राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 437 : RAG JOGIYA






स्वरगोष्ठी – 437 में आज


भैरव थाट के राग – 3 : राग जोगिया


पण्डित राजन-साजन मिश्र से राग जोगिया में खयाल तथा कमल बारोट और महेन्द्र कपूर से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित राजन और साजन मिश्र
कमल बारोट
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। 

महेन्द्र कपूर
इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “जोगिया” पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के तीसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल-स्वर में राग जोगिया में निबद्ध खयाल प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर के युगल स्वर में सुनवाएँगे। 1962 में प्रदर्शित फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” से शैलेंद्र का लिखा और एस.एन. त्रिपाठी का संगीतबद्ध किया एक गीत – “हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- अहीर भैरव, गौरी, नट भैरव, वैरागी, रामकली, गुणकली, कलिंगड़ा, जोगिया, विभास आदि। आज के अंक में हम राग जोगिया पर चर्चा कर रहे हैं। राग जोगिया, भैरव थाट का जन्य राग माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार तथा निषाद स्वर वर्जित तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित किया जाता है। अतः इस राग की जाति औड़व-षाड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग जोगिया का गायन समय प्रातःकाल सन्धिप्रकाश के सय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। कुछ विद्वान राग जोगिया में तार षडज को वादी और मध्यम को संवादी मानते हैं। किन्तु दोनों दृष्टियों में यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग जिया में बहुधा बड़ा खयाल नहीं गाया जाता। यह छोटा खयाल और ठुमरी के उपयुक्त राग माना जाता है। कभी-कभी राग के आकर्षण को बढ़ाने के लिए अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग कर लिया जाता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप के दिग्दर्शन के लिए अब हम आपको इस राग में एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, बनारस घराने के सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र।

राग जोगिया : “मोरे अँगना कागा बोले...” : पण्डित राजन और साजन मिश्र


आज हम भैरव थाट के जन्य राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे(कोमल), म, प, ध(कोमल), सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध(कोमल), प, ध(कोमल), म, रे(कोमल), सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। गीत का फिल्मी संस्करण गीतकार शैलेन्द्र ने रचा है। यह गीत वास्तव में शिव-वन्दना है। अनेक विद्वानों का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग जोगिया : “हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...” : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 437वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 12 अक्तूबर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 439 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 435वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – अहीर भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – अद्धा तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने भैरव थाट के जन्य राग जोगिया का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल स्वर में इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। राग जोगिया के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध युगल गायक और गायिका कमल बारोट और महेन्द्र कपूर के स्वर में फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम भैरव थाट के एक अन्य जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 437 : RAG JOGIYA : 6 अक्तूबर, 2019

Sunday, September 29, 2019

राग अहीर भैरव : SWARGOSHTHI – 436 : RAG AHIR BHAIRAV






स्वरगोष्ठी – 436 में आज

भैरव थाट के राग – 2 : राग अहीर भैरव

परवीन सुल्ताना से राग अहीर भैरव में निबद्ध खयाल और मन्ना डे से फिल्मी गीत सुनिए




परवीन सुल्ताना
मन्ना डे
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “अहीर भैरव” पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के दूसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीत-विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में राग अहीर भैरव में निबद्ध दो खयाल रचनाएँ सुनवाएँगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 1963 में प्रदर्शित फिल्म “मेरी सूरत तेरी आँखें” से शैलेंद्र का लिखा और सचिनदेव बर्मन के संगीतबद्ध किये एक गीत – “पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई...” का रसास्वादन आप करेंगे।



राग ‘अहीर भैरव’ भैरव थाट का एक जन्य राग माना जाता है। इसके नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग भैरव का ही एक प्रकार है। इसमें ऋषभ और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग अहीर भैरव के गायन-वादन का सबसे उपयुक्त समय दिन का प्रथम प्रहर अर्थात प्रातःकाल माना गया है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग के वादी-संवादी स्वरों के निर्धारण के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इस राग में षडज स्वर को वादी और मध्यम स्वर को संवादी मानते हैं। ऐसा मानने पर वादी- संवादी को समय की दृष्टि से अपवाद मानना पड़ेगा। राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल अतः इसे उत्तरांगवादी होना चाहिए। मध्यम के अतिरिक्त किसी अन्य स्वर को वादी नहीं माना जा सकता। पंचम स्वर अल्प है, धैवत स्वर को वादी मानने पर भैरव अंग कम हो जाएगा और निषाद स्वर किसी भी राग में वादी नहीं माना गया है। अतः मध्यम स्वर को ही वादी मानना अधिक उचित है। इससे किसी भी नियम का खण्डन नहीं होता। इस राग में मध्यम और कोमल ऋषभ स्वर की संगति तथा ऋषभ स्वर पर आन्दोलन भैरव अंग का परिचायक है। आलाप करते समय बीच-बीच में ऋषभ स्वर का प्रयोग करते हुए भैरव अंग दिखाते रहना पड़ता है, जिससे राग अहीर भैरव का स्वरूप बना रहता है। राग अहीर भैरव के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपके लिए विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में इस राग के दो खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह वीडियो हम ‘यू-ट्यूब’ से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। विलम्बित खयाल के बोल हैं; “साजन ऐसे बन आए...” और द्रुत खयाल के बोल है; “मोहे छेड़ो ना गिरधारी...”

राग अहीर भैरव : विलम्बित और द्रुत खयाल : विदुषी परवीन सुल्ताना



राग अहीर भैरव के कुछ और विशेषताओं की चर्चा भी आवश्यक है। दरअसल राग अहीर भैरव प्राचीन राग नहीं है, किन्तु आजकल इसका प्रचलन बहुत अधिक हो गया है। राग भैरव सुनने का अवसर भले ही कम हो किन्तु राग अहीर भैरव सुनने को अवश्य मिल जाएगा। कुछ विद्वान इस राग में भैरव और खमाज रागों का मिश्रण तो कुछ इसमें भैरव और काफी रागों का मिश्रण मानते हैं। राग अहीर भैरव के पूर्वांग में भैरव और उत्तरांग में खमाज या काफी के स्वर प्रयोग किये जाते हैं। भैरव अंग अधिक प्रबल होने के कारण इसका प्रत्येक आलाप भैरव अंग से ही समाप्त किया जाता है। वादी और गायन-वादन के समय की दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान है, किन्तु इसका चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होता है। इसमें कोमल ऋषभ, शुद्ध गांधार और शुद्ध मध्यम होने के कारण यह प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश राग कहलाता है। आज हम एक ऐसा फिल्मी गीत प्रस्तुत करेंगे, जिसे राग ‘अहीर भैरव’ के स्वरों में पिरोया गया है। 1963 में संगीतकार सचिनदेव बर्मन द्वारा स्वरबद्ध गीतों से सजी फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का एक सदाबहार गीत- ‘पुछो न कैसे मैंने रैन बिताई....’, राग ‘अहीर भैरव’ पर आधारित था। फिल्मों में इस गीत के अलावा इसी राग पर आधारित कई गीत रचे गए, किन्तु जो लोकप्रियता फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ के गीत को प्राप्त हुई, वह अन्य गीतों को न मिल सकी। अद्धा तीनताल और कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत के गीतकार शैलेन्द्र हैं।आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अहीर भैरव : “पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई...” : मन्ना डे : फिल्म - मेरी सूरत तेरी आँखें




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 436वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका की है।

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 5 अक्तूबर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 438 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 434वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने जन्य राग अहीर भैरव का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात शास्त्रीय गायिका विदुषी परवीन सुलताना के स्वर में इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। राग अहीर भैरव की आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे के स्वर में फिल्म “मेरे सूरत तेरी आँखें” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम भैरव थाट के एक जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। सभी संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग अहीर भैरव : SWARGOSHTHI – 436 : RAG AHIR BHAIRAV : 29 सितम्बर, 2019

Sunday, May 14, 2017

राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 317 : RAG BHIMPALASI




स्वरगोष्ठी – 317 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 3 : राग भीमपलासी में मीरा भजन

राग भीमपलासी में विदुषी गंगूबाई हंगल से खयाल और लता मंगेशकर से भजन सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की तीसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हमने 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ का एक मीरा भजन चुना है, जिसे रोशन ने राग भीमपलासी के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही इसी राग में निबद्ध एक खयाल सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
र्ष 1952 में रोशन की पाँच फिल्में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म ‘अनहोनी’ ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म थी। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘संस्कार’ थी। इस फिल्म में भी तलत महमूद के गाये गीत थे। फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र थे, जिन्होने एक से बढ़ कर एक गीतों की रचना की थी। इन दोनों फिल्मों की चर्चा हम पिछले अंक में कर चुके हैं। इस वर्ष की तीन अन्य फिल्में थी, ‘शीशम’, ‘रागरंग’ और ‘नौबहार’। फिल्म ‘शीशम’ के गीतों में भी भरपूर रचनात्मकता थी। फिल्म में मुकेश के स्वरों में दो दर्द भरे गीत थे; -“सताएगा किसे तू आसमाँ जब हम नहीं होगे...” और –“एक झूठी सी तसल्ली वो मुझे दे के चले...”। रोशन लता मंगेशकर के सर्वप्रिय संगीतकार थे। फिल्म ‘शीशम’ में लता मंगेशकर की आवाज़ में दो एकल गीत; -“बजे बाँसुरी चले साँवरी...” और –“मुस्कुराहट तेरे होंठों की मेरा श्रृंगार है...” बेहद आकर्षक थे। इसी के साथ मुकेश और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ में एक उल्लासभरा गीत; -“सपनों में आना छेड़ छेड़ जाना...” भी फिल्म में था। रोशन के संगीत निर्देशन में निर्मित और 1952 में ही प्रदर्शित चौथी फिल्म थी, ‘रागरंग’। इस फिल्म का निर्माण अभिनेत्री गीता बाली और उनकी बहन ने किया था। फिल्म में रोशन ने राग यमन की एक पारम्परिक बन्दिश, -“ए री आली पिया बिन...” लता मंगेशकर से गवाया था। फिल्म में लता मंगेशकर की आवाज़ में अन्य गीत, -“किसकी नज़र का मस्त इशारा है ज़िंदगी...” और त्रिलोक कपूर के साथ गाया गीत, -“करते हैं इशारे फ़लक में चाँद तारे...” भी रोशन की प्रतिभा के परिचायक थे। अशोक कुमार और नलिनी जयवन्त अभिनीत फिल्म ‘नौबहार’ इस वर्ष की पाँचवीं फिल्म थी, जिसमें रोशन का उच्चकोटि का संगीत था आज के अंक के लिए हमने इसी फिल्म का एक गीत चुना है। फिल्म का कथानक एक अमीर, किन्तु नेत्रहीन युवक (अशोक कुमार) और एक गरीब मालिन (नलिनी जयवन्त) की प्रेमकथा पर केन्द्रित है। फिल्म का जो गीत हमने चुना है, वह राग भीमपलासी पर आधारित है। दरअसल यह गीत मीरा का एक भक्तिपद है, जिसके बोल हैं; -“ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...”। फिल्म के प्रसंग के अनुसार गीतकार शैलेंद्र ने इस भक्तिपद के अन्तरों में परिवर्तन किये हैं। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है। लता मंगेशकर के अलावा फिल्म में तलत महमूद और राजकुमारी की आवाज़ में कई मनभावन गीत हैं। 1967 में लता मंगेशकर ने –“ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” गीत को अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में चुना था। यह एक सदाबहार गीत सिद्ध हुआ। इस गीत के लिए राग भीमपलासी के स्वर इतने सटीक सिद्ध हुए कि वर्षों बाद 1979 में जब गीतकार गुलजार ने अपनी फिल्म ‘मीरा’ के संगीत निर्देशन का दायित्व पण्डित रविशंकर को दिया था और इसी मीरापद का चुनाव अपनी फिल्म के लिए भी किया था। पण्डित रविशंकर ने इस पद को राग तोड़ी में बाँधा था और वाणी जयराम से गवाया था। गीत के लिए स्वर चुनते समय पण्डित जी की ही टिप्पणी थी –“रोशन ने इस पद को राग भीमपलासी का ऐसा आवरण दे दिया है कि वह धुन दिमाग से निकलती ही नहीं”। बहरहाल आप 1952 की फिल्म ‘नौबहार’ से लता मंगेशकर की आवाज़ में गीतकार शैलेन्द्र द्वारा संशोधित भजन –“ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” सुनिए और रोशन के अविस्मरणीय संगीत की सराहना कीजिए।

राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म – नौबहार


गंगूबाई हंगल
राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, (कोमल), म, प, नि(कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि(कोमल), ध, प, म (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धर और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। इस राग में चूँकि वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है, इस दृष्टि से इसे उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए और दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से लेकर दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए, परन्तु व्यवहार में ऐसा होता नहीं। अपवाद रूप में यह पूर्वांग प्रधान राग मान लिया जाता है और दिन के पूर्व अंग में ही गाया-बजाया जाता है। राग ‘भीमपलासी’ के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है।

आइए, अब हम आपको राग भीमपलासी की ही एक आकर्षक बन्दिश सुनवाते हैं। यह किराना घराने की गायकी में सिद्ध शीर्षस्थ विदुषी गंगूबाई हंगल की एक रिकार्डिंग है। 5 मार्च, 1913 को धारवाड़, कर्नाटक में उनका जन्म हुआ था। बाल्यावस्था में उन्हें अपनी माँ से दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति की शिक्षा मिली। 1928 में उनका परिवार हुबली स्थानान्तरित हो गया। जाने-माने संगीतविद् सवाई गन्धर्व से संगीत में दक्षता प्राप्त करने पूर्व किन्नरी वीणा वादक कृष्ण आचार्य और दत्तोपन्त देसाई से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। पण्डित भीमसेन जोशी इनके गुरूभाई थे। गंगूबाई हंगल ने संगीत को आत्मसात करने के लिए कठिन साधना की थी। भारत के उच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से 1971 में और ‘पद्मविभूषण’ से 2002 में अलंकृत किया गया था। 21 जुलाई, 2009 को इस महान गायिका का हुबली में निधन हुआ था। अब आप विदुषी गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की यह खयाल रचना सुनिए। इस प्रस्तुति में उनके गायन में उनकी सुपुत्री कृष्णा हंगल ने सहयोग किया है। आप राग भीमपलासी का रसास्वादन कीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : ‘गरवा हरवा डारो री...’ : विदुषी गंगूबाई हंगल : तीनताल




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 317वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में प्रदशित एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का आधार परिलक्षित हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 20 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 319वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 315वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘संस्कार’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे सभी नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस तीसरे अंक में हमने आपके लिए राग भीमपलासी में निबद्ध रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वरों में प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, May 7, 2017

राग भैरव : SWARGOSHTHI – 316 : RAG BHAIRAV




स्वरगोष्ठी – 316 में आज


संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 2 : राग भैरव में लोरी


राग भैरव में निबद्ध प्रभा अत्रे से शिव-स्तुति और लता मंगेशकर से लोरी सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की नई श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के घर में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हमने 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘संस्कार’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग भैरव के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही इसी राग की एक रचना सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका डॉ. प्रभा अत्रे के स्वरों में हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
र्ष 1949 में रोशन के संगीत निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘नेकी और बदी’ प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्मकार केदार शर्मा द्वारा निर्मित यह फिल्म व्यावसायिक दृष्टि से असफल थी। किन्तु अगले वर्ष प्रदर्शित केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बावरे नैन’ के गीतों ने खूब सफलता अर्जित की। इस फिल्म के संगीत ने रोशन को फिल्म जगत में स्थापित कर दिया। वर्ष 1951 में रोशन के संगीत से सजी तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थी। केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बेदर्दी’ में एक बार फिर मुकेश के लुभावने गीत थे। इसी फिल्म में रोशन ने अभिनेत्री निम्मी से भी एक गीत –“ननदिया जाने ना दर्द...” गवाया था। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘हमलोग’ थी। इस फिल्म में भी मुकेश की आवाज़ थी। फिल्म में मुकेश के अलावा लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और दुर्रानी की आवाज़ों में आकर्षक गीत थे। इसी वर्ष रोशन के संगीत निर्देशन में मुकेश द्वारा निर्मित फिल्म ‘मल्हार’ भी प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के गीतों में रोशन ने रागों का सुखद स्पर्श दिया था। इसी फिल्म से राग ‘गौड़ मल्हार’ पर आधारित गीत पर हम पिछले अंक में चर्चा कर चुके है। अगले वर्ष अर्थात 1952 में रोशन की पाँच फिल्में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म ‘अनहोनी’ ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म थी, जिसमे राज कपूर ने अभिनय किया था। इस फिल्म में रोशन ने राज कपूर के लिए तलत महमूद की आवाज़ का चयन किया और सफल भी हुए। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘संस्कार’ थी। इस फिल्म में भी तलत महमूद के गाये गीत थे। फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र थे, जिन्होने एक से बढ़ कर एक गीतों की रचना की थी। इन गीतों में रोशन के संगीत में भी भरपूर रचनात्मकता के दर्शन होते हैं। सितार, बाँसुरी और सारंगी के अभिनव प्रयोग से इन गीतों को सजाया गया था। अपने संगीत शिक्षा काल में इसराज रोशन का प्रिय वाद्य रहा। गज से बजने वाले एक प्रमुख वाद्य सारंगी की शिक्षा उन्होने उस्ताद बुन्दु खाँ से प्राप्त की थी। इसीलिए उनके गीतों में सारंगी का सार्थक प्रयोग मिलता है। फिल्म ‘संस्कार’ में रोशन ने तलत महमूद की आवाज़ में एक खूबसूरत गजल –“मुहब्बत के झूठे सहारों ने लूटा...” भी स्वरबद्ध किया था। फिल्म में लता मंगेशकर ने भी उल्लेखनीय गीत गाये थे, जिनमें –“दो नैनों ने जाल बिछाया...”, -“दो नैना उलझ गए...” तथा –“हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” काफी लोकप्रिय हुए थे। लता मंगेशकर की आवाज़ में गायी लोरी –हँसे टिम टिम...” में राग भैरव का स्पर्श है। हमारा आज का यही गीत है। पहले आप रोशन का स्वरबद्ध किया गया फिल्म ‘संस्कार’ से राग भैरव पर आधारित गीत सुनिए। शैलेन्द्र के गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।

राग भैरव : “हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – संस्कार


राग भैरव भारतीय संगीत का एक प्राचीन राग है। यह इसी नाम से प्रचलित थाट भैरव से सम्बद्ध माना जाता है। अर्थात राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग होता है। आश्रय राग उसे कहते हैं जब किसी थाट का नामकरण किसी प्रचलित राग के नाम के अनुसार किया गया हो। इस दृष्टि से राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग कहलाता है। राग भैरव में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। विद्वानों ने इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल के सन्धिप्रकाश बेला को माना है। इस नियम के अनुसार राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल 4 से सात बजे के बीच किया जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वरों पर आन्दोलन किया जाता है। अब हम आपको इसी राग में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना सुनवाते हैं।

डॉ.प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर ‘सरगम’ विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल और एकताल में निबद्ध है।

राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिव शंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 316वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 13 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 318वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 313वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको लगभग 66 वर्ष पूर्व की फिल्म ‘मल्हार’ के एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग भैरव पर आधारित रोशन के एक गीत और राग भैरव की की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, June 4, 2016

"हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...", क्यों राज कपूर ने किया था महेन्द्र कपूर से गीत गवाने का वादा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 83
 

'हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 83-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की मशहूर फ़िल्म ’संगम’ के गीत "हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर, मुकेश और महेन्द्र कपूर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत शंकर जयकिशन का। 


बात 60 के दशक के शुरुआत की होगी, एक स्टेज शो के लिए राज कपूर ताशकन्द गए और अपने साथ महेन्द्र कपूर जी को भी ले गए। ताशकन्द उस समय USSR का हिस्सा हुआ करता था। और रूस में राज कपूर बहुत लोकप्रिय थे। राज कपूर का शो ज़बरदस्त हिट शो, इस शो में राज कपूर ने भी कुछ गाने गाए, उन गानों पर महेन्द्र कपूर ने हारमोनियम बजा कर राज कपूर का साथ दिया। इस शो के लिए महेन्द्र कपूर ने ख़ास तौर से हिन्दी गानों का रूसी भाषा में अनुवाद करके तैयार कर रखा था। जब उनके गाने की बारी आई तब उन्होंने फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले..." को रूसी भाषा में जो गाया तो लोग झूम उठे। और महेन्द्र कपूर का नाम लेकर "once more, once more" का शोर मचाने लगे। जनता का यह रेस्पॉन्स देख कर राज कपूर ने महेन्द्र कपूर से कहा कि "देखा, एक कपूर ही दूसरे कपूर को मात दे सकता है!" शायद इसलिए कहा होगा कि राज कपूर की परफ़ॉरमैन्स के बाद महेन्द्र कपूर को रूसी जनता से उनके गीत का जो रेसपॉन्स मिला वो राज कपूर उम्मीद नहीं कर रहे थे। ज़ाहिर है कि राज कपूर के रेसपॉन्स से महेन्द्र कपूर को रेसपॉन्स ज़्यादा मिला। राज कपूर महेन्द्र कपूर से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महेन्द्र से कहा कि मैं चाह कर भी मेरे गाने तुमसे नहीं गवा सकता क्योंकि तुम तो जानते ही हो कि मेरी आवाज़ मुकेश है, मेरे सारे गाने मुकेश ही गाते हैं। महेन्द्र जी बोले, "मुकेश जी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं, इसलिए मैं चाहता भी नहीं कि उनके गाने मैं गाऊँ"। इस पर राज साहब बोले कि लेकिन मैं एक वादा करता हूँ कि मेरी अगली फ़िल्म में जो दूसरा हीरो होगा, उसके लिए तुम ही गाना गाओगे। महेन्द्र कपूर ने मज़ाक में राज कपूर से कहा कि "राज जी, आप बहुत बड़े आदमी हैं, भारत लौट कर आपको यह वादा कहाँ याद रहेगा?" उस वक़्त राज कपूर सिगरेट पी रहे थे, सिगरेट की एक कश लेकर मुंह से निकाली सिगरेट और जलती हुई सिगरेट से अपने हाथ पे एक निशान दाग़ दिया और बोले, "तुम फ़िकर मत करो, यह जला निशान मुझे अपना वादा भूलने नहीं देगा।"

इस घटना के बाद जब राज कपूर और महेन्द्र कपूर हिन्दुस्तान लौट कर आए तो राज कपूर ने अपने वादे के अनुसार अगली ही फ़िल्म ’संगम’ में दूसरे नायक राजेन्द्र कुमार के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ में गाना रेकॉर्ड किया और ताशकन्द में किए अपने वादे को निभाया। गाना था "हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा, दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जाएगा..."। इस गीत के साथ महेन्द्र कपूर की कुछ यादें मुकेश की भी जुड़ी हुई हैं। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों में’ कार्यक्रम में इस बारे में महेन्द्र जी ने कहा था, "मुझे जब "नीले गगन के तले..." के लिए फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला, तो किसी भी दूसरे सिंगर ने मुझे फ़ोन करके बधाई नहीं दी। एक रात मेरा नौकर आकर मुझसे कहा कि बाहर मुकेश जी आए हैं, आप से मिलना चाहते हैं। मैं तो हैरान रह गया कि मुकेश जी आए हैं मेरे घर। मैं भागता हुआ बाहर गया तो बोले, आओ यार, मेरी पत्नी से कहा कि भौजी, लड्डू शड्डू बाँटों। फिर मुझसे कहा कि ऐसे ही काम करते रहो, बहुत अच्छा होगा तुम्हारा। उन्हें कोई कॉम्प्लेक्स नहीं था कि कौन छोटा है कौन बड़ा है। एक बार मेरे बेटे के स्कूल के प्रिन्सिपल ने मुझसे अनुरोध किया कि आप मुकेश जी से अनुरोध करें कि हमारे स्कूल के फ़ंक्शन में आएँ। मैंने कहा कि ठीक है मैं उनसे कहूँगा। उस समय हम ’संगम’ के गीत की रेकॉर्डिंग् पर मिल रहे थे। मैंने उनसे कहा कि ऐसा है, मेरे बेटे के स्कूल फ़ंक्शन में आप गाएँगे? उन्होंने कहा कि हाँ, गा दूँगा। तो मैंने उनसे पूछा कि आप पैसे कितने लेंगे? उन्होंने कहा कि वो 3000 लेते हैं। मुकेश जी ने यह भी कहा कि वो वहाँ पर ज़्यादा देर नहीं ठहरेंगे, गाना गा कर आ जाएँगे। तो मैंने स्कूल के प्रिन्सिपल से कह दिया कि मुकेश जी गाएँगे और गाना हो जाने के बाद उन्हें 3000 रुपये उसी वक़्त दे दिया जाए। तो मुकेश जी वहाँ गए, सात-आठ गाने गाए, लेकिन पैसे लिए बिना ही वापस चले गए। अगले दिन जब वो मुझसे मिले तो कहा कि कल बड़ा मज़ा आया स्कूल में बच्चों के साथ। मैंने पूछा कि मुकेश जी, आपने पैसे तो ले लिए थे ना? वो बोले, कैसे पैसे? मैंने कहा कि आप ने जो कहा था कि 3000 रुपये? बोले, मैंने कहा था कि मैं 3000 लेता हूँ, पर यह नहीं कहा था कि मैं 3000 लूँगा। महेन्द्र, एक बात बताओ, अगर कल नितिन उसके महेन्द्र अंकल से कहेगा कि चाचाजी, आप मेरे स्कूल में गाना गाओ तो क्या आप उसके लिए पैसे लोगे?" लीजिए अब अप फिल्म 'संगम' का वही गीत सुनिए। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, December 19, 2015

"आज फिर जीने की तमन्ना है..." - क्यों शुरू-शुरू में पसन्द नहीं आया था देव आनन्द को यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 72
 

'आज फिर जीने की तमन्ना है...' 


 रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 72-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की फ़िल्म ’गाइड’ के गीत "आज फिर जीने की तमन्ना है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सचिन देव बर्मन का। 


हर फ़िल्मी गीत का निश्चित स्वरूप होता है, पहले मुखड़े से पहले का प्रस्तावना या कुछ शब्द, फिर मुखड़ा, फिर अन्तराल संगीत, फिर अन्तरा। शुरू से लेकर अब तक अधिकांश फ़िल्मी गीत इसी स्वरूप को मानते चले आए हैं। फिर भी कभी कभार कुछ गीतकारों और संगीतकारों ने नए प्रयोग किए और इस स्वरूप से हट कर गीत बनाए। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले" इस स्वरूप को नहीं मानता। इस गीत में कोई अन्तरा नहीं है, बल्कि हर अन्तरा मुखड़े की धुन पर ही आधारित है। इसी तरह से एक गीत ऐसा भी है जो शुरू होता है अन्तरे से और मुखड़ा अन्तरे के बाद आता है। सचिन देव बर्मन की धुन पर शैलेन्द्र का लिखा हुआ यह गीत है फ़िल्म ’गाइड’ का - "आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है" जो शुरू होता है "काँटों से खींच के यह आँचल" जो अन्तरा है। पिता के इस नवीन प्रयोग को पुत्र पंचम ने भी एक बार अपने एक गीत में प्रयोग किया। फ़िल्म ’बेताब’ का वह गीत था "तेरी तसवीर मिल गई" जो शुरू होता है "यह मेरी ज़िन्दगी बेजान लाश थी" से। ख़ैर, आज हम चर्चा करेंगे "आज फिर जीने की तमन्ना है" का। अपने ज़माने का सुपर-डुपर हिट गीत और आज तक आए दिन रेडियो पर सुनने को मिल जाता है। गीत के 50 वर्ष बाद भी यह उतना ही लोकप्रिय है। और यही नहीं आमिर ख़ान की अगली फ़िल्म का शीर्षक भी ’आज फिर जीने की तमन्ना है’ होने जा रहा है, ऐसी ख़बर मीडिया में आई है। इसी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस जुमले में कितनी शक्ति है! लेकिन जब यह गीत बना था तब देव आनन्द को यह गीत बिल्कुल बकवास लगा था।

"आज फिर जीने की तमन्ना है" गीत फ़िल्म की कहानी के हिसाब से भी बेहद ज़रूरी और सार्थक था क्योंकि इसी गीत से परिवर्तन होता है फ़िल्म की हीरोइन रोज़ी के चरित्र का। यही गाना बताता है कि अब रोज़ी अपने पति के चंगुल से आज़ाद है और निकल पड़ी है एक नए सफ़र पर, ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत के लिए। जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, तब सबसे पहले यही गाना लोगों के ज़बान पर चढ़ गया था। मगर यही लोकप्रिय गाना देव आनन्द के गले नहीं उतर रहा था। वो इस गाने को शूट करना तो दूर, वो इसे दूसरे किसी म्युज़िक डिरेक्टर से दोबारा बनवाना चाहते थे। इतना ना-पसन्द था उन्हें यह गाना। वहीदा रहमान ने अपनी किताब में इस घटना का ज़िक्र किया है कि एक दिन शूटिंग के वक़्त जब इस गाने को शूट करने की बारी आई तो देव आनन्द साहब बहुत अपसेट थे। उन्होंने फ़िल्म के निर्देशक विजय आनन्द, जो उनके भाई थे, से कहा कि "ये बर्मन दादा को क्या हो गया है, ऐसा गाना बना दिया है, मज़ा नहीं आ रहा है। I just can't take it. मुझे दादा से बात करनी पड़ेगी कि गाने में बिल्कुल मज़ा नहीं आ रहा है, किसी और कम्पोज़र से गाना बनवानी पड़ेगी।" देव साहब की यह बात सुन कर गोल्डी को अजीब लगा। पूरी युनिट ने भी यह बात सुनी, सब ने कहा कि "आपको यह गाना बुरा लगा है, कम से कम एक बार यह गाना हमको तो सुनवा दें। शूटिंग् तो उसी दिन करनी है हमको।" देव आनन्द ने बड़े अनमने मन से कहा कि अच्छा नागरे के उपर लगा दो, और सुनो। नागरा एक स्पूल वाली मशीन हुआ करती थी उस ज़माने में, जिस पर गाना लगा देते थे। गाना लगाया गया, गाना सबने सुना, और सब उछल पड़े गाने के बाद। लता जी की बेहतरीन आवाज़, एस. डी. बर्मन का बेहतरीन संगीत, शैलेन्द्र का बेहतरीन गीत, सबको बहुत अच्छा लगा, आपको पसन्द क्यों नहीं आ रहा है? लेकिन देव साहब के उपर कोई असर ही नहीं हुआ। अब सबने सोचा कि शूटिंग् का टाइम आ रहा है, कैसे देव साहब को मनायें? तब भाई विजय आनन्द के दिमाग़ में एक विचार आया। उन्होंने भाई से कहा, "हम सब आपकी जज़्बात की इज़्ज़त करते हैं कि आपको गाना पसन्द नहीं आ रहा है, मगर फिर भी एक हमारी अनुरोध है कि गाना शूट कर लेते हैं, शूट करने के बाद जब आप देखेंगे कि गाना पसन्द नहीं आ रहा है, तो निकाल देंगे।" देव आनन्द मान गए। और इस गीत को राजस्थान के अलग अलग स्थानों पे पाँच दिनों में शूट किया गया। इसी शूटिंग् के दौरान एक बहुत अहम बात हो गई जिसने देव आनन्द के फ़ैसले को बदल दिया। हर दिन शूट के बाद फ़िल्म के कर्मी दल के सदस्य जब होटल लौटते तो सभी की ज़बान पर यही गाना होता था। जहाँ देखो जिसे देखो हर कोई यही गाना गुनगुनाता हुआ नज़र आता था। लोगों की ज़ुबान पर गाना चढ़ गया। तब देव साहब को यह एहसास हुआ कि उनका फ़ैसला हो सकता है कि ग़लत हो। पाँचवे दिन जब वो सेट पे पहुँचे, तो उन्होंने पूरे कर्मी दल से कहा कि "Sorry, I made a mistake, सचमुच यह गाना बहुत अच्छा है और अब यही गाना इस फ़िल्म का हिस्सा भी बनेगा। मैं रखूँगा इस गाने को।" और उसके बाद फिर क्या हुआ, इतिहास गवाह है। 

फिल्म - गाइड : 'काँटों से खींच कर ये आँचल....' : लता मंगेशकर




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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