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मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

संगीत समीक्षा : गुजारिश - संगीत निर्देशन में भी अव्वल साबित हुए संजय लीला भंसाली...तुराज़ के शब्दों ने रचा एक अनूठा संसार

दोस्तों आज टी एस टी मैं आप मुझे देखकर हैरान हो रहे होंगें, दरअसल सुजॉय छुट्टी पर हैं, और मैंने वी डी को पटा कर ये मौका ढूंढ लिया कि मैं आपको उस अल्बम के संगीत के बारे में बता सकूँ जिसने मेरे दिलो जेहन पर इन दिनों जादू सा कर दिया है.

जब बात संगीत की चलती है, और जब कोई मुझसे पूछता है कि मुझे किस तरह का संगीत पसंद है तो मैं बड़ी उलझन में फंस जाता हूँ, क्योंकि मुझे लगभग हर तरह का संगीत पसंद आता है, पुराने, नए, शास्त्रीय, हिप होप, ग़ज़ल सभी कुछ तो सुनता हूँ मैं, फिर किसे कहूँ कि ये मुझे नापसंद नहीं....खैर पसंद भी कई तरह की होती है, कुछ गीतों के शब्द हमें भा जाते हैं (मसलन गुलाल) तो कुछ उसके खालिस संगीत संयोजन की वजह से मन को लुभा जाते (जैसे रोबोट और अजब प्रेम की गजब कहानी) हैं....हाँ पर ऐसी अल्बम्स तो मैं उँगलियों पे गिन सकता हूँ जिसने मुझे संगीत की सम्पूर्ण संतुष्ठी दी है. ऐसा संगीत जिसे सुन तन मन और आत्मा भी संतुष्ट हो जाए.....संजय लीला बंसाली एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फ़िल्में रुपहले पर्दे पर कविता लिखती है, वो शुद्ध भारतीय सोच के निर्देशक हैं जो बिना गीत संगीत के फिल्मों की कल्पना नहीं करते (ब्लैक एक अपवाद है). मुझे उनकी फिल्मों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है क्योंकि उनकी दो फिल्मों का संगीत (हम दिल दे चुके सनम और देवदास) मेरे “सम्पूर्ण संतुष्ठी अल्बम” की श्रेणी में निश्चित ही आता है. दोनों ही फिल्मों में इस्माईल दरबार का संगीत था, देवदास के बाद कुछ मतभेदों के चलते निर्देशक-संगीतकार की ये जोड़ी अलग हो गयी, जो अगर साथ रहती तो शायद हमें और भी बहुत से मास्टर पीस अल्बम्स सुनने को मिल सकते थे. ब्लैक बिना गीत संगीत के बनी भारतीय फिल्म थी, जो कामियाब भी रही, पर संजय लौट आये अपने नैसर्गिक फॉर्म में “संवरिया” के साथ. मोंटी का था संगीत इसमें जिन्होंने देवदास का शीर्षक संगीत भी रचा था. संगीत के हिसाब से अल्बम बुरी तो नहीं थी, पर संजय के अन्य फिल्मों के टक्कर की भी नहीं थी. इसी फिल्म में हमें संजय का एक नया रूप दिखा जब एक गीत को उन्होंने खुद संगीतबद्ध किया “थोड़े बदमाश हो तुम”. एक लंबे अंतराल के बाद संजय लौटे हैं उसी जेनर की फिल्म लेकर जिसमें उन्हें महारथ हासिल है. ख़ामोशी, देवदास, ब्लैक आदि सभी फ़िल्में व्यक्तिगत अक्षमताओं (शारीरिक और मानसिक) से झूझते और उनपर विजय पाते किरदारों पर है. “गुज़ारिश” भी उसी श्रेणी में आती है, और बतौर संगीतकार संजय लीला बंसाली ने इस बार पूरी तरह से कमान संभाली है....ऐसे में कुछ शंकाएं संभव है, मगर उनकी फिल्मों से अपेक्षाएं हमेशा ही बढ़ चढ कर रहती है, वो कुछ भी कम स्तरीय करेंगें ऐसी इस जीनियस से उम्मीद नहीं की जा सकती.....चलिए इस लंबी भूमिका के बाद अब जरा “गुज़ारिश" के संगीत की चर्चा की जाए.

बरसते पानी की आवाज़ और पार्श्व से आ रहे कुछ संवादों से अल्बम की शुरूआत होती है. ये है फिल्म का शीर्षक गीत, के के की डूबी और डुबो देने वाली आवाज़ में “इसमें तेरी बाहों में मर जाऊं...” सुनकर वाकई मर जाने का जी करता है....सचमुच किसी गीत में इतनी मासूम गुज़ारिश, शब्द जैसे भेद जाते हैं गहरे तक...और के के .....मेरे ख्याल से वो इस कालजयी गीत के लिए एक अदद राष्ट्रीय सम्मान का हक तो रखते ही हैं. वोइलिन के स्वरों में इतना दर्द बहुत अरसे बाद सुनाई दिया है.....ऐ एम् तुराज़ की बतौर गीतकार ये शायद पहली फिल्म होगी, मगर उनका आगाज़ बहुत ही शानदार है. इस पहले गीत से ही संजय अपने साथ सुनने वालों को जोड़ लेते हैं.

गीत - गुज़ारिश


“सौ ग्राम जिंदगी” जब शुरू होता है तो “यादें” (सुभाष घई कृत) का शीर्षक गीत याद आता है जो हरिहरन ने गाया था...नगमें हैं किस्से हैं....पर अंतरे तक आते आते कुणाल गांजावाला इस गीत को अपने नायाब गायन से एक अलग ही मुकाम पर ले जाते हैं....शब्द सुनिए – देर तक उबाली है, प्याली में डाली है, कड़वी है नसीब सी, ये कॉफी गाढ़ी काली है...चमच्च भर चीनी हो बस इतनी सी मर्जी है.....वाह....यहाँ गीतकार हैं विभु पूरी, एक और नयी खोज जो निश्चित ही बधाई के हकदार हैं. संगीत संयोजन यहाँ भी जबरदस्त है. कम से कम वाध्य हैं पर जो हैं उनको संजय ने बहुत ही “संभाल के खर्चा” है. LIFE IS GOOD....सुनिए...

गीत - सौ ग्राम ज़िंदगी


तीसरा गीत “तेरा जिक्र” तो जैसे पूरी तरह से एक कविता (गीतकार तरुज़) है, जिसमें हल्का सा सूफी अंदाज़ भी पिरोया गया है, शैल के साथ राकेश पंडित ने दिया है सूफी स्टाईल में. “तेरा जिक्र है या इत्र है, जब जब करता हूँ महकता हूँ....”. अलग अंदाज़ का गीत है और एक दो बार सुनते ही नशे की तरह सर चढ जाता है. चौथा गीत “सायबा” गोवा के किसी क्लब में ले चलेगा आपको, वैभवी जोशी ने गहरे भाव से इसे गाया है, संगीत संयोजन और शब्द यहाँ भी उत्कृष्ट है (तारुज़). फ्रांसिस कास्तिलेनो और शैल ने कोरस की भूमिका निभायी है यहाँ, जो गीत को और रंग भरा बनाता है. अल्बम के अधिकतर गीतों की तरह ये गीत भी एक अंतरे का है, संजय ने इस तरह के छोटे छोटे गीतों का प्रयोग ख़ामोशी, HDDCS, और देवदास में भी किये हैं.

गीत - तेरा ज़िक्र


गीत - सायबा


“जागती आँखों में भी अब कोई सोता है....जब कोई नहीं होता, तब कोई होता है...” के के की आवाज़ में इतनी गहराई है कि ऑंखें बंद करके सुनो तो मन उड़ने लगता है, ये भी एक छोटा सा मगर सुंदर सा गीत है. छटा गीत “उडी” एक अलग ही कलेवर का है, और अल्बम के बहतरीन गीतों में से एक है, सुनिधि चौहान की मदमस्त आवाज़ और गोवा के लोक रंग का तडका, यक़ीनन “उडी” आपको लंबे समय तक याद रहेगा...

गीत - जाने किसके ख्वाब


गीत - उड़ी


“कह न सकूँ मैं इतना प्यार” में शैल एक बार फिर सुनाई देते हैं. पियानो की स्वरलहरियों में प्रेम की बेबसी कहीं कहीं देवदास के “वो चाँद जैसी लड़की” की याद दिला जाती है. अच्छा गाया है. दिल से गाया है मन को छूता है. अगला गीत हर्षदीप कौर की आवाज़ में हैं, रियल्टी शोस से निकली इस लड़की की आवाज़ में गहराई है, यहाँ भी शब्द बहुत खूबसूरत है, कहीं कहीं गुलज़ार साहब याद आ जाते हैं – चाँद की कटोरी है, रात ये चटोरी है....वाह...”रिश्ते झीने मलमल के”, “मोहब्बत का स्वटर”, “हाथ का छाता” जैसे शब्द युग्म वाकई सिहरन सी उठा जाते है. गीतकार विभु पूरी को बधाई. सेक्सोफोन का एक पीस है इंटरल्यूड में, सुनिए क्या खूब है. एक और शानदार गीत.

गीत - कह न सकूँ


गीत - चाँद की कटोरी


“दायें बाएं” में एक बार फिर के के को सुनकर सकून मिलता है, यहाँ गीटार है पार्श्व में, मधुर रोमांस की तरंगें, जहाँ दर्द भी सोया सोया है, उभरता है मगर जैसे चाहत उसे फिर सुला देती हो....प्यार के सुरीले अहसास को मधुरता से सहलाता है ये गीत. “धुंधुली धुंधली शाम” अंतिम गीत है....पंछियों के स्वर, झील का किनारा....डूबती शाम, एक पूरा चित्र आँखों के सामने उभर आता है.....”तुम्हारे बाद हमारा हाल कुछ ऐसा है..कि जैसे साज़ के सारे तार टूट जाते हैं....” मुझे न जाने क्यों रबिन्द्र नाथ टैगोर याद आ गए. शंकर महादेवन ने संभाला है यहाँ माईक.....बहरहाल...

गीत - दाएँ बाएँ


गीत - धुंधली धुंधली


"गुज़ारिश" मेरी राय में इस वर्ष की सबसे बढ़िया अल्बम है....शायद “ओमकारा” के बाद ये पहली अल्बम है जिसने मुझे वो “सम्पूर्ण संतुष्टी” दी है. (“मैं” शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि मैं नहीं जानता कि आप मेरी इस राय से सहमत होंगे या नहीं) वैसे तो टी एस टी के वाहक तन्हा जी और सुजॉय जी ने रेटिंग बंद करवा दी है है पर फिर भी मैं इस अल्बम को ५/५ की रेटिंग देना चाहूँगा.....आप सब भी सुनिए और बताईये कि आपको कैसे लगे “गुज़ारिश” के गीत.

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

"इश्क़ महंगा पड़े फिर भी सौदा करे".. ऐसा हीं एक सौदा करने आ पहुँचें हैं कभी साफ़, कभी गंदे, "लफ़ंगे परिंदे"

ताज़ा सुर ताल २९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! जैसा कि हाल के सालों में हम देखते आ रहे हैं.. आज के फ़िल्मकार नई नई कहानियाँ हिंदी फ़िल्मों में ला रहे हैं। वैसे तो ज़्यादातर फ़िल्मों की कहानियों का आधार नायक-नायिका-खलनायक ही होते रहे हैं और आज भी है, लेकिन बदलते समाज और दौर के साथ साथ फ़िल्म के पार्श्व में काफ़ी परिवर्तन आ गए हैं। अब आप ही बताइए मुंबई के 'बाइक गैंग्स' पर किसी फ़िल्म की कल्पना क्या ७० के दशक में की जा सकती थी?

सुजॊय - क्योंकि फ़िल्म समाज का आईना कहलाता है, तो बदलते दौर के साथ साथ, बदलते समाज के साथ साथ फ़िल्में भी बदल रही है। और यही बात लागू होती है फ़िल्म संगीत पर भी। जब जब फ़िल्मी गीतों के गिरते हुए स्तर पर लोग चर्चा शुरु कर देते हैं, तब भी उन्हें इसी बात को ध्यान में रखना होगा कि अब वक़्त बदल गया है। आज की नायिका अगर "चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है" जैसे गीत गाये, तो वह बहुत ज़्यादा नाटकीय और बेमानी लगेगी। इसलिए बदलते दौर के साथ साथ बदलते संगीत को भी खुले दिल से स्वीकारें, इसी में शायद सब की भलाई है। हाँ, यह ज़रूर है कि गीतों का स्तर नहीं गिरना चाहिए। अच्छा फ़नकार वही है जो लाख पाबंदियों के बावजूद भी अच्छा काम कर निकल जाए। और पिछले कुछ दिनों से हम देख भी रहे हैं कि कुछ कलाकार इस ओर ध्यान दे भी रहे हैं।

विश्व दीपक - तो अब आज की फ़िल्म की चर्चा शुरु की जाए! जैसा कि हमने पिछले हफ़्ते हीं इशारा कर दिया था, आज हम लेकर आए हैं फ़िल्म 'लफ़ंगे परिंदे' के गीतों को। यह फ़िल्म मुंबई के बाइक गैंग्स की कहानी है जिसका निर्माण किया है आदित्य चोपड़ा ने और निर्देशन है प्रदीप सरकार का। नील नितिन मुकेश फ़िल्म के नायक हैं जो नंदु की भूमिका में नज़र आएँगे, जो एक फ़ाइटर है और जो आँखों में पट्टी लगाकर रिंग में लड़ेंगे। उधर फ़िल्म की नायिका बनीं हैं दीपिका पडुकोण जो निभा रही है पिंकी का किरदार, जो एक नृत्यांगना है और जो नेत्रहीन है। नंदु पिंकी को अपनी आँखों से दुनिया दिखाता है तो पिंकी उसे प्यार करना सिखाती है। लेकिन इन दोनों को अपने प्यार के लिए किस तरह की कीमत चुकानी होगी, यह आप ख़ुद देख लीजिएगा २० अगस्त के बाद, यानी जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हो जाएगी।

सुजॊय - तो दोस्तों, यश राज के बैनर तले बनने वाली इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं नवोदित गायक रोनित सरकार की आवाज़ में। फ़िल्म के गीतकार हैं प्रदीप सरकार के चहेते गीतकार स्वानंद किरकिरे, और संगीत के लिए चुना गया है आर. आनंद को।

गीत - लफ़ंगे परिंदे


विश्व दीपक - आजकल रॊक शैली का लगभग सभी फ़िल्मों में इस्तेमाल हो रहा है। पिछले कुछ हफ़्तों में हमने जिन जिन फ़िल्मों के गानें इस स्तंभ में सुने हैं, उन सब में एक ना एक रॊक अंदाज़ का गीत ज़रूर रहा है। "लफ़ंगे परिंदे" गीत भी उसी रॊक स्टाइल का है। हेवी मेटल, गीटार की भरमार और उस पर रोनित सरकार की वज़नदार आवाज़ धुन और इन हेवी मेटल्स के साथ पूरा पूरा न्याय करती है। यह गीत किसी रॊक ऐल्बम में होती तो इसे ज़्यादा कामयाबी मिलती, फ़िल्मी गीत के रूप में इस तरह के गीत का लोगों की ज़ुबान पर चढ़ना ज़रा मुश्किल सा हो जाता है। गीत अच्छा है इसमें कोई शक़ नहीं है, और इस गीत से इस ऐल्बम की धमाकेदार शुरुआत हुई है।

सुजॊय - इस बात पर अगर हम ग़ौर करें कि यह एक यशराज फ़िल्म है, तो हमेशा से यशराज के फ़िल्म का शीर्षक गीत बड़ा ही रोमांटिक और नर्मोनाज़ुक हुआ करता है। उस दृष्टि से यह एक उल्लंघन है उनके हीं नियमों का है और ऐसा यशराज की फ़िल्म से उम्मीद नहीं किया करते हैं लोग। तो सब को चौंका कर ही कह सकते हैं कि यशराज बैनर अब अपना इमेज बदल रहा है। अच्छा, अगले गीत की तरफ़ बढ़ने से पहले आप को यह बता दें कि इस फ़िल्म के संगीतकार आर. आनंद का दुबारा पदार्पण हुआ है फ़िल्म जगत में। इससे पहले आर. आनंद ने आग़ोश बैण्ड के ज़रिए 'पैसा' नामक ऐल्बम का निर्माण किया था। फिर उसके बाद इन्होंने दक्षिण के कुछ फ़िल्मों में संगीत दिया और आनंद की आख़िरी फ़िल्म थी 'ज़ोर'। अब देखते हैं हिंदी फ़िल्मों में वो क्या कुछ कर दिखाते हैं।

विश्व दीपक - और अब "लफ़ंगे परिंदे" के बाद "मन लफ़ंगा"।

गीत - मन लफ़ंगा


सुजॊय - पिछले गीत से जो एक ख़ास मूड बन गया था, उसी मूड को आगे बढ़ाता हुआ यह गीत हमने सुना मोहित चौहान की आवाज़ में। गोवानीज़ कोरल गायन का इस्तेमाल सुना जा सकता है इस गीत में। ऒरकेस्ट्रेशन भी गोवा के संगीत जैसा लगता है। मोहित की आवाज़ ने एक बार फिर गीत के साथ पूरा पूरा न्याय किया और कहने की ज़रूरत नहीं कि मोहित चौहान एक के बाद एक सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। उनके गाये ज़्यादातर गानें ही हिट हो रहे हैं। इन दिनों 'वन्स अपन ए टाइम' का "पी लूँ" गीत हर चैनल पर सुनने को मिल रहा है जो चार्टबस्टर भी बन चुका है। "मन लफ़ंगा" गीत का एक रीमिक्स भी है फ़िल्म के ऐल्बम में लेकिन ऒरिजिनल के साथ इसकी तुलना अर्थहीन है।

विश्व दीपक - अकोस्टिक गीटार का जो इस्तेमाल हुआ है, वह कई दृष्टि से नवीन लगता है। एक सादा सरल बीट और रीदम गीत के प्रवाह को कर्णप्रिय बनाता है और लगता है कि यह गीत भी एक मक़बूल रोमांटिक गीत के रूप में उभर कर आएगा। स्वानंद के बोल भी कमाल के हैं कि नायक कह रहा है कि उसे अपने मन पर कोई बस नहीं है, मन तो लफ़ंगा है, जब प्यार की बात आती है तो वो किसी की नहीं सुनता, वह मनमानी करता है। "इश्क़ महंगा लगे.. फिर भी सौदा करे".. यह पंक्ति अपने आप में हीं सारी बात कह देती है। इस गीत को पहली बार सुनने के बाद एक बार और सुनने को दिल करता है। दोस्तों, आप लोग अगला गीत सुनिए, मैं ज़रा इस गीत को दोबारा सुन कर फिर अगला गीत सुनता हूँ।

सुजॊय - अगला गीत है शैल हाडा और अनुष्का मनचंदा की अवाज़ों में, आइए सुनते हैं।

गीत - धतड़ ततड़


विश्व दीपक - इस ऐल्बम का रॊक फ़ील बरकरार रखा है इस "धतड़ ततड़" ने। शैल हाडा सांवरिया का शीर्षक गीत गाने के बाद जैसे ग़ायब हो गए थे, उन्हे वापस लौटा देख कर ख़ुशी हो रही है, क्योंकि वो बेहद गुणी कलाकार हैं। उनके इंटरव्यु से पता चलता है कि शास्त्रीय संगीत सीखे हुए कलाकार है, जिन्होंने कई सालों तक मुंबई के किसी स्कूल में बच्चों को संगीत सिखाया भी है। और इस गीत में उनके साथ अनुष्का मनचंदा की आवाज़ ने अच्छा साथ दिया है। रॊक और लोक संगीत का फ़्युज़न है इस गीत में, स्ट्रिंग्स के साथ साथ ढोल का इस्तेमाल हुआ है जो क़दमों को थिरकाने लगते हैं।

सुजॊय - सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल के बाद अब ऐसा लगने लगा है कि जो दो गायिका दूसरों के मुक़ाबले कुछ आगे निकल रही हैं वो हैं अनुष्का मनचंदा और शिल्पा राव। धीरे धीरे संगीतकारों की निगाहें इन्ही दो गायिकाओं पर टिक-सी रही है ऐसा प्रतीत होता है। पूरी तरह से मुंब‍इया डान्स नंबर है और लगता है और इस बार गणपति में तो शायद इसी गीत की धूम रहेगी। लोग ख़ूब झूमने वाले हैं इस गीत के साथ जैसे पिचले साल सलमान ख़ान की फ़िल्म 'वाण्टेड' का गीत "तेरा ही जल्वा" छाया हुआ था। ख़ैर, इस धतड़ ततड़ के बाद अब एक सुकूनदायक गीत की बारी शिल्पा राव की आवाज़ में हो जाए!

गीत - नैन परिंदे


विश्व दीपक - एक ख़ूबसूरत पियानो पीस के साथ शुरु होकर यह गीत बेहद सुरीला आकार ले लेता है। शिल्पा राव इस तरह के गानें एक के बाद एक गा रही हैं और उनकी आवाज़ में इस तरह के गानें ख़ूब जँचते भी हैं। "सजदे में युंही" (बचना ऐ हसीनों), "उड़ी उड़ी मुड़ी मुड़ी" (पा), "रंग दे" (लाहौर), जैसे गीत शिल्पा राव के हाल के सफल गीतों में शुमार होते हैं। इस गीत की बात करें तो स्वानंद किरकिरे के शब्द बड़े ही काव्यात्मक और अर्थपूर्ण लगते हैं।

सुजॊय - शिल्पा राव की आवाज़ दीपिका के उपर अच्छी बैठी है, जिनके लिए "सजदे में युंही" भी शिल्पा ने गाया था। देखते हैं कि क्या शिल्पा भविष्य में दीपिका का स्क्रीन वॉयस बन पाती हैं या नहीं। और अब एक और रॉक सॉंग आज के समय के सब से कामयाब रॉकस्टार सूरज जगन की आवाज़ में। सूरज जगन एक रॉक सिंगर हैं जो फ़िल्म 'रॉक ऒन' में परदे पर नज़र भी आए थे। उन्होंने उस फ़िल्म में दूसरे बैंड के लीड सिंगर का किरदार निभाया था। उनकी आवाज़ में वह जोश है, वह वज़न है, जो इन हार्ड मेटल संगीत में साफ़ साफ़ सुनाई भी दे और अपना असर भी करे।

विश्व दीपक - बेस गीटार और ईलेक्ट्रिक गीटार का ख़ूब इस्तेमाल हुआ है इस गीत में, और सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरस में ढोलकी और स्कॉटिश पाइप का भी इस्तेमाल हुआ है। तो चलिए इस थिरकन भरे गीत को सुन लिया जाये। वैसे भी यह फ़िल्म का एक और शीर्षक गीत है जिसके बोल हैं "रंग डालें लफ़गे परिंदे"।

गीत - रंग डालें लफ़ंगे परिंदे


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसा लगा 'लफ़ंगे परिंदे'? मुझे तो एक और 'रॉक ऒन' लगा। फ़िल्म की कहानी के अनुसार ये गीत बने हैं जो सिचुएशनल हैं। मोहित चौहान और शिल्पा राव वाले दो गीत एक श्रेणी में रख सकते हैं और बाक़ी के तीन गीत रॉक श्रेणी में। यकीनन हीं यह ऐल्बम ऐवरेज से ऊपर है... बल्कि मैं तो कहता हूँ कि यह ऐल्बम भी इन्हीं दिनों आए बाकी ऐल्बमों-सा मक़बूल होने का माद्दा रखता है। वैसे भी यहाँ उन परिंदों की बात हो रही है जो कभी साफ तो कभी गंदे हैं लेकिन खुलेआम उड़ते हैं.. संगीत की दुनिया में भी इन्होंने लम्बी उड़ान भरी है... है ना? "ये कभी साफ़, ये कभी गंदे, लफ़ंगे परिंदे" :-)

विश्व दीपक - सुजॉय जी, सही कहा आपने। यहाँ पर मैं संगीतकार और गीतकार दोनों की तारीफ़ करना चाहूँगा। गीतकार के बारे में क्या कुछ नया कहूँ। स्वानंद साहब हर तरह के गीत लिखने में उस्ताद हो चुके हैं। भला कोई यकीन कर सकता हूँ कि इन्होंने हीं "आल इज़ वेल" लिखा था। और यहाँ पर वही "लफ़ंगे परिंदे" लिख रहे हैं.. पिछली फिल्म "राजनीति" में इन्होंने हीं कहा था "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन" तो वेलडन अब्बा में इन्हीं की कलम से ये बोल निकले थे "साबुन लेकर हाथ में निकले, सिस्टम को है धोना रे"। "खोया खोया चाँद" के शीर्षक गीत को भला कोई भूल सकता है... और कितने गाने गिनवाऊँ! मैं तो भाई इनका कायल हो गया हूँ। "देसी शब्दों" की बौछार इनसे अच्छा कोई और नहीं कर सकता.. यह तो मानना हीं पड़ेगा। गीतकार के बाद संगीतकार की भी बात कर लें। तो यहाँ पर प्रदीप सरकार की समझ-बूझ और विश्वास की दाद देनी होगी जो उन्होंने अपने नियमित संगीतकार "शांतनु मोइत्रा" की बजाय एक गुमनाम संगीतकार (आर आनंद) को चुना.. मैं सच कहता हूँ, मैंने इस फिल्म से पहले इनका नाम नहीं सुना था, लेकिन इस फिल्म के गानों को सुनने के बाद अब सोच रहा हूँ कि ढूँढ-ढूँढकर इनके गाने सुनूँ। इन्होंने इस फिल्म के नब्ज़ को जैसे पकड़-सा लिया है.. गानों को सुनते हीं दृश्य सामने आने लगते हैं। निस्संदेह संगीतकार की जीत हुई है। मेरी उम्मीदें इनसे अब बढ गई हैं.. देखते हैं आगे क्या होता है। चलिए तो इस सुखद बातचीत के बाद आज की समीक्षा को विराम देते हैं। अगली बार एक नई फिल्म (शायद आशाएँ या वी आर फैमिली या फिर कोई और) के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

आवाज़ रेटिंग्स: लफ़ंगे परिंदे: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८५- 'लफ़ंगे परिंदे' फ़िल्म के गीत "धतड़ ततड़" को आप किशोर कुमार से कैसे जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # ८६- "मेरे उपर भी आइ.आइ.टी या पी.एम.टी की परीक्षा देने का प्रेशर था घर से। लेकिन एक बार युवा वाणी कार्यक्रम के लिए आकाशवाणी केन्द्र जाते वक़्त मेरा ऐक्सिडेन्ट हो गया। तब मम्मी ने कहा कि अब ज़िंदगी में जो करना है करो। क्योंकि उस ऐक्सिडेन्ट से बच कर निकलना मेरे लिए दूसरा जन्म था। मैं कैसे बचा मुझी कुछ नहीं पता। तो मम्मी ने कहा कि जो अब ज़िंदगी में बनना है बनो"। बताइए हम किस फ़नकार की बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८७- प्रदीप सरकार और स्वानंद किरकिरे का साथ कई फ़िल्मों में हुआ है। बताइए इन दोनों के उस फ़िल्म के उस गीत का मुखड़ा जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "होश लेके उड़ गया उसकी कैसी है जादूगरी"।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रियदर्शन, प्रीतम, अक्षय कुमार।
२. नगीन तनवीर।
३. फ़िल्म - बिल्लू, गीत - बिल्लू भयंकर, सहगायक - अजय झिंग्रन और कल्पना.

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। अवध जी, ताजा सुर ताल पर आपको देखकर बेहद खुशी हुई। आगे भी इसी तरह अपनी उपस्थिति से हमें कृतार्थ करते रहिएगा। यही आग्रह है आपसे। आपने एक सवाल का सही जवाब दिया। बधाई स्वीकारें!

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