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Friday, October 18, 2013

राम चाहे सुरों की "लीला"

निर्देशक से संगीतकार बने संजय लीला बंसाली ने 'गुज़ारिश' में जैसे गीत रचे थे उनका नशा उनका खुमार आज तक संगीत प्रेमियों के दिलो-जेहन से उतरा नहीं है. सच तो ये है कि इस साल मुझे सबसे अधिक इंतज़ार था, वो यही देखने का था कि क्या संजय वाकई फिर कोई ऐसा करिश्मा कर पाते हैं या फिर "गुजारिश" को मात्र एक अपवाद ही माना जाए. दोस्तों रामलीला, गुजारिश से एकदम अलग जोनर की फिल्म है. मगर मेरी उम्मीदें आसमां छू रही थी, ऐसे में रामलीला का संगीत सुन मुझे क्या महसूस हुआ यही मैं आगे की पंक्तियों में आपको बताने जा रहा हूँ. 

अदिति पॉल की नशीली आवाज़ से खुलता है गीत अंग लगा दे. हल्की हल्की रिदम पर मादकता से भरी अदिति के स्वर जादू सा असर करती है उसपर शब्द 'रात बंजर सी है, काले खंजर सी है' जैसे हों तो नशा दुगना हो जाता है. दूसरे अंतरे से ठीक पहले रिदम में एक तीव्रता आती है जिसके बाद समर्पण का भाव और भी मुखरित होने लगता है. कोरस का प्रयोग सोने पे सुहागा लगता है. 

धूप से छनके उतरता है अगला गीत श्रेया की रेशम सी बारीक आवाज़ में, सुरों में जैसे रंग झलकते हैं. ताल जैसे धडकन को धड्काते हों, शहनाई के स्वरों में पारंपरिक स्वरों की मिठास...रोम रोम नापता है, रगों में सांप सा है....सरल मगर सुरीला और मीलों तक साया बन साथ चलता गीत. 

संजय की फिल्मों में गायक के के एक जरूरी घटक रहते हैं पर जाने क्यों यहाँ उनकी जगह उन्होंने चुना आदित्य नारायण को. शायद किरदार का रोबीलापन उनकी आवाज़ में अधिक जचता महसूस हुआ होगा. आदित्य का गाया पहला गीत है इश्कियाँ डीश्कियाँ. फिल्म के दो प्रमुख किरदारों के बीच प्रेम और नफ़रत की जंग को गीत के माध्यम से दर्शाता है ये गीत. 

अरिजीत सिंह की रूहानी आवाज़ में एक और दिल को गहरे तक छूता गीत मिला है श्रोताओं को लाल इश्क में. आरंभिक कोरस को सुनकर एक सूफी गीत होने का आभास होता है मगर जैसे ही अरिजीत की आवाज़ मिलती है गीत का कलेवर बदल जाता है. रिदम ऊपर के सभी गीतों की ही तरह लाजवाब और संयोजन बेमिसाल. शब्द करीने से चुने हुए और गायिकी गजब की. जब अरिजीत 'बैराग उठा लूँ' गाते हैं तो उनकी आवाज़ में भी एक बैराग उभर आता है. 

शैल हडा तो जैसे लगता है अपना सर्वश्रेष्ठ संजय की धुनों के लिए ही बचा कर रखते हैं. पारंपरिक गुजराती लोक धुन की महक के बाद शैल की कशिश भरी आवाज़ में लहू मुँह लग गया में नफ़रत को प्रेम में बदलते उन नाज़ुक क्षणों की झनकार है. धुन कैची है और जल्द ही श्रोताओं के मुँह लग जायेगा इसमें शक नहीं. गीत के अंतरे खूबसूरती से रचे गए हैं. 

अगले दो गीत फिल्म की गुजरती पृष्भूमि को उभारते हुए हैं मोर बनी थन्घट करे अधिक पारंपरिक है और लोक गायकों की आवाज़ में बेहद जचता है. वहीँ नगाडा संग ढोल में हम दिल दे चुके सनम की ढोल बाजे की झलक होने के बावजूद गीत अपनी एक अलग छाप छोड़ता है. श्रेया की आवाज़ गीत का खास आकर्षण है. 

शैल को एक और रूहानी गीत दिया है संजय ने पूरे चाँद की ये आधी रात है में, पहले गीत से अधिक जटिल गीत है ये पर शैल ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है. हाँ पर मुझे यहाँ के के की कमी जरा सी खली. गीत में ठहराव है गजब का और गति भी है चढ़ते ढलते चाँद सी. अनूठा विरोधाभास है गीत में. बार बार सुनने को मन हो जाए ऐसा.

रामलीला के ठेठ अंदाज़ में शुरु होता है राम चाहे लीला गीत. अक्सर रामलीला में पर्दा गिरने और उठने के बीच कुछ गीत परोसे जाते हैं मनोरंजन के लिए. इन्डियन आइडल से चर्चा में आई भूमि त्रिवेदी को सौंपा संजय ने इस मुश्किल गीत को निभाने का जिम्मा. यकीं मानिये भूमि ने इंडस्ट्री में धमाकेदार एंट्री कर दी है इस गीत के साथ. यहाँ शब्द भी काफी ठेठ हैं. राम चाहे लीला चाहे लीला चाहे राम....देखे तो सरल मगर गहरे तक चोट करते शब्द हैं. जबरदस्त गीत. 

अंतिम गीत राम जी की चाल देखो में रामलला की झाँकी का वर्णन है, अगर कोई भी और संगीतकार होते तो आज के चलन अनुसार इस गीत के लिए मिका को चुनते. मगर यही तो बात है संजय में जो उन्हें सब से अलग करती है. उन्होंने आदित्य पर अपना विश्वास कायम रखा और आदित्य ने कहीं भी गीत की ऊर्जा को कम नहीं होने दिया. और तो और उनके भाव, ताव सब उत्कृष्ट माहौल को रचने में जमकर कामियाब हुए हैं यहाँ. एक धमाल से भरा गीत है ये जिसमें दशहरे का जोश और उत्सव तो झलकता ही है किरदारों के बीच की आँख मिचौलो भी उभरकर सामने आती है.       

कोई बेमतलब के रीमिक्स नहीं. बेवजह की तोड़ मरोड़ नहीं गीतों में. सीधे मगर जटिल संयोजन वाले, मधुर मगर सुरों में घुमाव वाले, मिटटी से जुड़े १० गीतों की लड़ी लेकर आये हैं संजय अपने इस दूसरे प्रयास में. जब उम्मीदें अधिक होती है यो संभावना निराशा की अधिक होती है पर खुशी की बात है कि बतौर संगीतकार संजय लीला बंसाली में वही सूझ बूझ, वही आत्मीयता, वही समर्पण नज़र आता है जो एक निर्देशक के रूप में वो बखूबी साबित कर चुके हैं. ये एक ऐसी एल्बम है जिस पर फिल्म की सफलता असफलता असर नहीं डाल सकती. रामलीला सभी संगीत प्रेमियों के लिए इस वर्ष के सर्वोत्तम तोहफों में से एक है. अवश्य सुनें और सुनाएँ. गीतकार सिद्धार्थ गरिमा को भी हमारी टीम की विशेष बधाई. 

एल्बम के बहतरीन गीत - राम जी की चाल, राम चाहे लीला,  पूरे चाँद की आधी रात है, लहू मुँह लग गया, लाल इश्क, अंग लगा दे, धूप से छनके 

हमारी रेटिंग - ४.९/५ 

    


Tuesday, October 19, 2010

संगीत समीक्षा : गुजारिश - संगीत निर्देशन में भी अव्वल साबित हुए संजय लीला भंसाली...तुराज़ के शब्दों ने रचा एक अनूठा संसार

दोस्तों आज टी एस टी मैं आप मुझे देखकर हैरान हो रहे होंगें, दरअसल सुजॉय छुट्टी पर हैं, और मैंने वी डी को पटा कर ये मौका ढूंढ लिया कि मैं आपको उस अल्बम के संगीत के बारे में बता सकूँ जिसने मेरे दिलो जेहन पर इन दिनों जादू सा कर दिया है.

जब बात संगीत की चलती है, और जब कोई मुझसे पूछता है कि मुझे किस तरह का संगीत पसंद है तो मैं बड़ी उलझन में फंस जाता हूँ, क्योंकि मुझे लगभग हर तरह का संगीत पसंद आता है, पुराने, नए, शास्त्रीय, हिप होप, ग़ज़ल सभी कुछ तो सुनता हूँ मैं, फिर किसे कहूँ कि ये मुझे नापसंद नहीं....खैर पसंद भी कई तरह की होती है, कुछ गीतों के शब्द हमें भा जाते हैं (मसलन गुलाल) तो कुछ उसके खालिस संगीत संयोजन की वजह से मन को लुभा जाते (जैसे रोबोट और अजब प्रेम की गजब कहानी) हैं....हाँ पर ऐसी अल्बम्स तो मैं उँगलियों पे गिन सकता हूँ जिसने मुझे संगीत की सम्पूर्ण संतुष्ठी दी है. ऐसा संगीत जिसे सुन तन मन और आत्मा भी संतुष्ट हो जाए.....संजय लीला बंसाली एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फ़िल्में रुपहले पर्दे पर कविता लिखती है, वो शुद्ध भारतीय सोच के निर्देशक हैं जो बिना गीत संगीत के फिल्मों की कल्पना नहीं करते (ब्लैक एक अपवाद है). मुझे उनकी फिल्मों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है क्योंकि उनकी दो फिल्मों का संगीत (हम दिल दे चुके सनम और देवदास) मेरे “सम्पूर्ण संतुष्ठी अल्बम” की श्रेणी में निश्चित ही आता है. दोनों ही फिल्मों में इस्माईल दरबार का संगीत था, देवदास के बाद कुछ मतभेदों के चलते निर्देशक-संगीतकार की ये जोड़ी अलग हो गयी, जो अगर साथ रहती तो शायद हमें और भी बहुत से मास्टर पीस अल्बम्स सुनने को मिल सकते थे. ब्लैक बिना गीत संगीत के बनी भारतीय फिल्म थी, जो कामियाब भी रही, पर संजय लौट आये अपने नैसर्गिक फॉर्म में “संवरिया” के साथ. मोंटी का था संगीत इसमें जिन्होंने देवदास का शीर्षक संगीत भी रचा था. संगीत के हिसाब से अल्बम बुरी तो नहीं थी, पर संजय के अन्य फिल्मों के टक्कर की भी नहीं थी. इसी फिल्म में हमें संजय का एक नया रूप दिखा जब एक गीत को उन्होंने खुद संगीतबद्ध किया “थोड़े बदमाश हो तुम”. एक लंबे अंतराल के बाद संजय लौटे हैं उसी जेनर की फिल्म लेकर जिसमें उन्हें महारथ हासिल है. ख़ामोशी, देवदास, ब्लैक आदि सभी फ़िल्में व्यक्तिगत अक्षमताओं (शारीरिक और मानसिक) से झूझते और उनपर विजय पाते किरदारों पर है. “गुज़ारिश” भी उसी श्रेणी में आती है, और बतौर संगीतकार संजय लीला बंसाली ने इस बार पूरी तरह से कमान संभाली है....ऐसे में कुछ शंकाएं संभव है, मगर उनकी फिल्मों से अपेक्षाएं हमेशा ही बढ़ चढ कर रहती है, वो कुछ भी कम स्तरीय करेंगें ऐसी इस जीनियस से उम्मीद नहीं की जा सकती.....चलिए इस लंबी भूमिका के बाद अब जरा “गुज़ारिश" के संगीत की चर्चा की जाए.

बरसते पानी की आवाज़ और पार्श्व से आ रहे कुछ संवादों से अल्बम की शुरूआत होती है. ये है फिल्म का शीर्षक गीत, के के की डूबी और डुबो देने वाली आवाज़ में “इसमें तेरी बाहों में मर जाऊं...” सुनकर वाकई मर जाने का जी करता है....सचमुच किसी गीत में इतनी मासूम गुज़ारिश, शब्द जैसे भेद जाते हैं गहरे तक...और के के .....मेरे ख्याल से वो इस कालजयी गीत के लिए एक अदद राष्ट्रीय सम्मान का हक तो रखते ही हैं. वोइलिन के स्वरों में इतना दर्द बहुत अरसे बाद सुनाई दिया है.....ऐ एम् तुराज़ की बतौर गीतकार ये शायद पहली फिल्म होगी, मगर उनका आगाज़ बहुत ही शानदार है. इस पहले गीत से ही संजय अपने साथ सुनने वालों को जोड़ लेते हैं.

गीत - गुज़ारिश


“सौ ग्राम जिंदगी” जब शुरू होता है तो “यादें” (सुभाष घई कृत) का शीर्षक गीत याद आता है जो हरिहरन ने गाया था...नगमें हैं किस्से हैं....पर अंतरे तक आते आते कुणाल गांजावाला इस गीत को अपने नायाब गायन से एक अलग ही मुकाम पर ले जाते हैं....शब्द सुनिए – देर तक उबाली है, प्याली में डाली है, कड़वी है नसीब सी, ये कॉफी गाढ़ी काली है...चमच्च भर चीनी हो बस इतनी सी मर्जी है.....वाह....यहाँ गीतकार हैं विभु पूरी, एक और नयी खोज जो निश्चित ही बधाई के हकदार हैं. संगीत संयोजन यहाँ भी जबरदस्त है. कम से कम वाध्य हैं पर जो हैं उनको संजय ने बहुत ही “संभाल के खर्चा” है. LIFE IS GOOD....सुनिए...

गीत - सौ ग्राम ज़िंदगी


तीसरा गीत “तेरा जिक्र” तो जैसे पूरी तरह से एक कविता (गीतकार तरुज़) है, जिसमें हल्का सा सूफी अंदाज़ भी पिरोया गया है, शैल के साथ राकेश पंडित ने दिया है सूफी स्टाईल में. “तेरा जिक्र है या इत्र है, जब जब करता हूँ महकता हूँ....”. अलग अंदाज़ का गीत है और एक दो बार सुनते ही नशे की तरह सर चढ जाता है. चौथा गीत “सायबा” गोवा के किसी क्लब में ले चलेगा आपको, वैभवी जोशी ने गहरे भाव से इसे गाया है, संगीत संयोजन और शब्द यहाँ भी उत्कृष्ट है (तारुज़). फ्रांसिस कास्तिलेनो और शैल ने कोरस की भूमिका निभायी है यहाँ, जो गीत को और रंग भरा बनाता है. अल्बम के अधिकतर गीतों की तरह ये गीत भी एक अंतरे का है, संजय ने इस तरह के छोटे छोटे गीतों का प्रयोग ख़ामोशी, HDDCS, और देवदास में भी किये हैं.

गीत - तेरा ज़िक्र


गीत - सायबा


“जागती आँखों में भी अब कोई सोता है....जब कोई नहीं होता, तब कोई होता है...” के के की आवाज़ में इतनी गहराई है कि ऑंखें बंद करके सुनो तो मन उड़ने लगता है, ये भी एक छोटा सा मगर सुंदर सा गीत है. छटा गीत “उडी” एक अलग ही कलेवर का है, और अल्बम के बहतरीन गीतों में से एक है, सुनिधि चौहान की मदमस्त आवाज़ और गोवा के लोक रंग का तडका, यक़ीनन “उडी” आपको लंबे समय तक याद रहेगा...

गीत - जाने किसके ख्वाब


गीत - उड़ी


“कह न सकूँ मैं इतना प्यार” में शैल एक बार फिर सुनाई देते हैं. पियानो की स्वरलहरियों में प्रेम की बेबसी कहीं कहीं देवदास के “वो चाँद जैसी लड़की” की याद दिला जाती है. अच्छा गाया है. दिल से गाया है मन को छूता है. अगला गीत हर्षदीप कौर की आवाज़ में हैं, रियल्टी शोस से निकली इस लड़की की आवाज़ में गहराई है, यहाँ भी शब्द बहुत खूबसूरत है, कहीं कहीं गुलज़ार साहब याद आ जाते हैं – चाँद की कटोरी है, रात ये चटोरी है....वाह...”रिश्ते झीने मलमल के”, “मोहब्बत का स्वटर”, “हाथ का छाता” जैसे शब्द युग्म वाकई सिहरन सी उठा जाते है. गीतकार विभु पूरी को बधाई. सेक्सोफोन का एक पीस है इंटरल्यूड में, सुनिए क्या खूब है. एक और शानदार गीत.

गीत - कह न सकूँ


गीत - चाँद की कटोरी


“दायें बाएं” में एक बार फिर के के को सुनकर सकून मिलता है, यहाँ गीटार है पार्श्व में, मधुर रोमांस की तरंगें, जहाँ दर्द भी सोया सोया है, उभरता है मगर जैसे चाहत उसे फिर सुला देती हो....प्यार के सुरीले अहसास को मधुरता से सहलाता है ये गीत. “धुंधुली धुंधली शाम” अंतिम गीत है....पंछियों के स्वर, झील का किनारा....डूबती शाम, एक पूरा चित्र आँखों के सामने उभर आता है.....”तुम्हारे बाद हमारा हाल कुछ ऐसा है..कि जैसे साज़ के सारे तार टूट जाते हैं....” मुझे न जाने क्यों रबिन्द्र नाथ टैगोर याद आ गए. शंकर महादेवन ने संभाला है यहाँ माईक.....बहरहाल...

गीत - दाएँ बाएँ


गीत - धुंधली धुंधली


"गुज़ारिश" मेरी राय में इस वर्ष की सबसे बढ़िया अल्बम है....शायद “ओमकारा” के बाद ये पहली अल्बम है जिसने मुझे वो “सम्पूर्ण संतुष्टी” दी है. (“मैं” शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि मैं नहीं जानता कि आप मेरी इस राय से सहमत होंगे या नहीं) वैसे तो टी एस टी के वाहक तन्हा जी और सुजॉय जी ने रेटिंग बंद करवा दी है है पर फिर भी मैं इस अल्बम को ५/५ की रेटिंग देना चाहूँगा.....आप सब भी सुनिए और बताईये कि आपको कैसे लगे “गुज़ारिश” के गीत.

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