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Monday, September 11, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 06 || नूतन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 06
Nutan 

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के छठे एपिसोड में सुनिए कहानी लाजवाब बेमिसाल नूतन की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 

Wednesday, April 13, 2011

ए मेरे हमसफ़र रोक अपनी नज़र...जितनी उत्कृष्ट अभिनेत्री थी नूतन उनकी गायिकी में भी उतना ही क्लास था

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 634/2010/334

प्रिय दोस्तों, नमस्कार और स्वागत है आपका आप ही के इस मनचाहे महफ़िल में जिसका नाम है 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। इस स्तंभ में इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'सितारों की सरगम' जिसमें हम कुछ ऐसे गीत सुनवा रहे हैं जिन्हें गाया है अभिनेता - अभिनेत्रियों नें। जी नहीं, हम 'सिंगिंग् स्टार्स' की बात नहीं कर रहे, बल्कि हम केवल स्टार्स की बात कर रहे हैं जो मूलतः अभिनेता या अभिनेत्री हैं, लेकिन किसी न किसी फ़िल्म में एक या एकाधिक गीत गाया है। राज कपूर, दिलीप कुमार, और मीना कुमारी के बाद आज बारी है अभिनेत्री नूतन की। अभिनेत्री व फ़िल्म निर्मात्री शोभना समर्थ की बेटी नूतन को शोभना जी नें ही अपनी निर्मित फ़िल्म 'हमारी बेटी' में लौंच किया था, जिसमें नूतन नें एक गीत भी गाया था, जिसके बोल थे "तूने कैसा दुल्हा भाये री बाँकी दुल्हनिया"। 'हमारी बेटी' १९५० की फ़िल्म थी। इसके दस साल बाद, १९६० में शोभना समर्थ नें अपनी छोटी बेटी तनुजा को लौंच करने के लिए बनाई फ़िल्म 'छबिली' जिसमें मुख्य नायिका बनीं नूतन और इस फ़िल्म में संगीतकार स्नेहल भाटकर नें नूतन से ही सारे गीत गवाये जो उन पर फ़िल्माये गये। यह वाक़ई आश्चर्य की बात है कि जिस दौर में संगीतकार लता और आशा को गवाने के लिए तत्पर रहते थे, उस दौर में उन्होंने नूतन को मौका दिया अपने अभिनय के साथ साथ गायन के जोहर दिखाने का भी। और नूतन नें भी क्या कमाल का गायन प्रस्तुत किया था इस फ़िल्म में!

'छबिली' के गीतकार थे एस. रतन। इस फ़िल्म का हेमंत कुमार और नूतन का गाया "लहरों पे लहर उल्फ़त है जवाँ" हम 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला में सुनवा चुके हैं। इस फ़िल्म का दूसरा सब से लोकप्रिय गीत है नूतन की एकल आवाज़ में "ऐ मेरे हमसफ़र, रोक अपनी नज़र" और जब भी नूतन के गायन प्रतिभा की बात चलती है तो सब से पहले इसी गीत का ज़िक्र किया जाता है। इसलिए आज की कड़ी में हम इसी गीत को बजा रहे हैं। इन दो गीतों के अलावा 'छबिली' में नूतन नें "मिला ले हाथ, ले बन गई बात" और "हे बाबू हे बाबा" एकल आवाज़ में गाया; तथा गीता दत्त के साथ मिलकर "यारों किसी से न कहना" और महेन्द्र कपूर के साथ "ओ माइ डार्लिंग् ओ माइ स्वीटी' जैसे गीत भी गाए। आज भले 'छबिली' फ़िल्म की कहानी किसी को याद न होगी, लेकिन इस बात के लिए यह फ़िल्म सब के ध्यान में रहती है कि इसमें नूतन ने अपनी आवाज़ में कुछ लाजवाब गीत गाये थे। आज के इस प्रस्तुत गीत को सुनने के बाद यकायक यह सवाल ज़हन में उभरता है कि नूतन नें और फ़िल्मों में क्यों नहीं गाया होगा! क्या ख़ूबसूरत आवाज़ थी और कितनी सुंदर अदायगी! और शत शत आभार स्नेहल भाटकर का भी, क्योंकि उनके प्रयास के बग़ैर शायद यह संभव नहीं हो पाता। आइए इस लाजवाब गीत का आनंद लिया जाये!



क्या आप जानते हैं...
कि नूतन को ५ बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, और ये फ़िल्में हैं 'सीमा', 'सुजाता', 'बंदिनी', 'मिलन', और 'मैं तुल्सी तेरे आंगन की'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 5/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक ज़माने में इस बेमिसाल अभिनेता को सिंगिंग स्टार बनकर भी गाना पड़ता था, पर ये गीत उस दौर के बहुत बाद का है.

सवाल १ - कौन है ये गायक/अभिनेता - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - सहगायिका कौन हैं इस गीत में - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अनजाना जी बढ़त पर हैं लगता है इस बार अमित जी को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Friday, November 27, 2009

धड़कने लगा दिल नज़र झुक गयी....नूतन की अदाकारी और गीता दत्त से स्वर, दुर्लभ संयोग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 275

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं पार्श्वगायिका गीता दत्त के गाए हुए कुछ सुरीले सुमधुर गीत जो दस अलग अलग अभिनेत्रियों पर फ़िल्माए गए हैं। इन गीतों को चुनकर और इनके बारे में तमाम जानकारियाँ इकट्ठा कर हमें भेजा है पराग सांकला जी ने और उन्ही की कोशिश का यह नतीजा है कि गुज़रे ज़माने के ये अनमोल नग़में आप तक इस रूप में पहुँच रहे हैं। नरगिस, मीना कुमारी, कल्पना कार्तिक और मधुबाला के बाद आज बारी है अदाकारा नूतन की। नूतन भी हिंदी फ़िल्म जगत की एक नामचीन अदाकारा रहीं हैं जिनके अभिनय का लोहा हर किसी ने माना है। हल्के फुल्के फ़िल्में हों या फिर संजीदे और भावुक फ़िल्में, हर फ़िल्म में वो अपनी अमिट छाप छोड़ जाती थीं। उनके अभिनय से सजी तमाम फ़िल्में आज क्लासिक फ़िल्मों में जगह बना चुकी है। वो एकमात्र ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होने ५ बार फ़िल्मफ़ेयर के तहत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता। नूतन मधुबाला, नरगिस या मीना कुमरी की तरह बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत या ग्लैमरस नहीं थीं, लेकिन उनकी सादगी के ही लोग दीवाने थे। उनकी ख़ूबसूरती उनके अंदर थी जो उनके स्वभाव और अभिनय में फूट पड़ती। नूतन अभिनेत्री शोभना समर्थ की ज्येष्ठ पुत्री थीं। उन्हे अपना पहला बड़ा ब्रेक मिला था १९५५ की फ़िल्म 'सीमा' में, जिसके लिए उन्हे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। उसके तुरंत बाद देव आनंद के साथ 'पेयिंग् गेस्ट' जैसी हास्य फ़िल्म करके सब को हैरान कर दिया उन्होने। १९५९ में राज कपूर की फ़िल्म 'अनाड़ी' और बिमल रॉय की फ़िल्म 'सुजाता' में उन्हे ख़ूब सराहना मिली। उनके अभिनय से सजी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्मों के नाम हैं - सीमा, सुजाता, बंदिनी, दिल ही तो है, पेयिंग् गेस्ट, अनाड़ी, नाम, मेरी जंग, आदि। युं तो नूतन अच्छा गाती भी थीं, फ़िल्म 'छबिली' में उन्होने गीत भी गाए थे। लेकिन क्योंकि सिलसिला जारी है गीता दत्त के गाए गीत सुनने का, तो आज नूतन पर फ़िल्माया हुआ जो गीत हम चुनकर लाए हैं वह है फ़िल्म 'हीर' का।

१९५४ में बनीं फ़िल्म 'हीर' के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और नूतन। यह फ़िल्मिस्तान की फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था हमीद बट ने। फ़िल्म में संगीत था अनिल बिस्वास का, जिनके संगीत में इस साल किशोर कुमार व माला सिंहा अभिनीत फ़िल्म 'पैसा ही पैसा' भी प्रदर्शित हुई थी। 'हीर' उन अल्पसंख्यक फ़िल्मों में से एक है जिनमें नूतन नायिका हों और गीता जी ने गीत गाए हों। कहा जाता है कि गुरु दत्त नहीं चाहते थे कि गीता जी इस फ़िल्म में गाए क्योंकि उन्हे अनिल दा पसंद नहीं थे। लेकिन गीता जी की ज़िद के आगे उन्हे झुकना पड़ा और इस तरह से अनिल दा ने इस फ़िल्म में कुछ यादगार गीत रचे गीता जी के लिए। गीता दत्त इस फ़िल्म में कुल ३ एकल और एक हेमन्त कुमार के साथ युगल गीत गाये। आज सुनिए उनकी एकल आवाज़ में "धड़कने लगा दिल नज़र झुक गईं"। युं तो गीता दत्त ने नूतन की चर्चित फ़िल्म 'सुजाता' में भी दो गीत गाये थे लेकिन उनमें से एक शशिकला पर ("बचपन के दिन भी क्या दिन थे") और दूसरा सुलोचना पर ("नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना") फ़िल्माया गया था। १९६० की फ़िल्म 'मंज़िल' में उन्होने नूतन के लिए "चुपके से मिले प्यासे प्यासे" गाया और 'छबिली' में उन्होने गाया "यारों किसी से ना कहना"। तो इन सब जानकारियों के बाद अब वक़्त हो चुका है आज का गीत सुनने का, तो सुनते हैं फ़िल्म 'हीर' का यह गीत जिसे लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. जिस अभिनेत्री पर ये गीत फिल्माया गया है उनका असली नाम बेबी खुर्शीद था, पर फ़िल्मी नाम कुछ और...
२. संगीतकार हैं ओ पी नय्यर साहब.
३. मुखड़े में शब्द है -"झूम"..इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी आप तो बहुत बढ़िया खेल रही हैं १५ अंकों तक पहुँचने में आपको लगे मात्र ५ दिन, बहुत बढ़िया, हम आपको बता दें कि हमारे कुछ दिग्गज जो जीत चुके हैं अब तक, उन्हें जवाब देने की मनाही है, यही कारण है कि आपको अकेलापन खल रहा है, याद रखिये ३०१ वें एपिसोड से नए सिरे से सबके अंक शुरू होंगें, तो आपके पास अब २५ ही सवाल हैं जिनसे आप ५० के आंकडे पर आ सकती हैं, ५० अंक होने पर ही आपको गेस्ट होस्टबनने का मौका मिलेगा....तो मैदान बिलकुल मत छोडिये...

नोट - ओल्ड इस गोल्ड का अगला एपिसोड आप ३० तारीख़ यानि सोमवार को सुन पायेंगें...तब तक के लिए इज़ाज़त.

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, August 20, 2009

अब के बरस भेज भैया को बाबुल....एक अमर गीत एक अमर फिल्म से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 178

रद तैलंग जी के पसंद पर कल आप ने फ़िल्म 'विद्यापति' का गीत सुना था लता जी की आवाज़ में, आज सुनिए लता जी की बहन आशा जी की आवाज़ में फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग का एक और सुनहरा नग़मा। ससुराल में ज़िंदगी बिता रही हर लड़की के दिल की आवाज़ है यह गीत "अब के बरस भेज भ‍इया को बाबुल सावन में लीजो बुलाए रे, लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ, दीजो संदेसा भिजाए रे"। हमारे देश के कई हिस्सों में यह रिवाज है कि सावन के महीने में बहू अपने मायके जाती हैं, ख़ास कर शादी के बाद पहले सावन में। इसी परम्परा को इन ख़ूबसूरत शब्दों में ढाल कर गीतकार शैलेन्द्र ने इस गीत को फ़िल्म संगीत का एक अनमोल नगीना बना दिया है। इस गीत को सुनते हुए हर शादी-शुदा लड़की का दिल भर आता है, बाबुल की यादें, अपने बचपन की यादें एक बार फिर से तर-ओ-ताज़ा हो जाती हैं उनके मन में। देश की हर बहू अपना बचपन देख पाती हैं इस गीत में। फ़िल्म 'बंदिनी' का यह गीत फ़िल्माया गया था नूतन पर। 'बंदिनी' सन् १९६३ की एक नायिका प्रधान फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन किया था बिमल राय ने। जरासंध की मर्मस्पर्शी कहानी, नबेन्दु घोष की पटकथा, नूतन, अशोक कुमार और धर्मेन्द्र के सशक्त अभिनय, और सचिन देव बर्मन तथा शैलेन्द्र के असरदार गीत-संगीत ने इस फ़िल्म को आज कालजयी बना दिया है। 'बंदिनी' का शुमार आज 'क्लासिक्स' में होता है। 'बंदिनी' कहानी है कल्याणी (नूतन) की, उसके दुखों की, उसकी व्यथा की, उसके त्याग और समर्पण की। किस तरह से एक भारतीय नारी का दृढ़ संकल्प होते हुए भी ज़िंदगी के किसी न किसी मोड़ पर उसे दुर्बल होना ही पड़ता है, इसका इस कहानी में प्रमाण मिलता है। इस फ़िल्म ने उस साल कई फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार जीते, जैसे कि नूतन (सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री), बिमल राय (सर्वश्रेष्ठ निर्देशक), जरासंध (सर्वश्रेष्ठ कहानी), कमल बोस (सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र), और डी. बिलिमोरिया (सर्वश्रेष्ठ ध्वनि)। यह फ़िल्म आप सभी ने देखी होगी, अगर किसी ने नहीं देख रखी है तो मेरा सुझाव है कि आज ही इसकी सीडी या टेप मँगवाकर इसे देखें क्योंकि हिंदी सिनेमा की एक बेहतरीन फ़िल्म है 'बंदिनी'।

जहाँ तक इस फ़िल्म के गीत संगीत का सवाल है, इस फ़िल्म का कोई भी गीत ऐसा नहीं जो प्रचलित न हुआ हो। सचिन दा और शैलेन्द्र की टीम तो थी ही, साथ ही नये उभरते गीतकार गुलज़ार ने भी एक गीत इस फ़िल्म में लिखा था "मोरा गोरा अंग ल‍इ ले"। लता जी की आवाज़ में इस गीत के अलावा एक दूसरा गीत था "जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे"। मुकेश की आवाज़ में "ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना", मन्ना डे की आवाज़ में "मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे", बर्मन दादा की आवाज़ में "मेरे साजन हैं उस पार", तथा आशा भोंसले की आवाज़ में "ओ पंछी प्यारे" और आज का यह प्रस्तुत गीत, ये सारे गानें आज सदाबहार नग़मों की फ़ेहरिस्त में दर्ज है। दोस्तों, अभी कुछ १०-१५ दिन पहले मैं विविध भारती पर ग़ैर फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम 'गुल्दस्ता' सुन रहा था। अचानक एक गीत बज उठा सुधा मल्होत्रा का गाया हुआ और संगीतकार का नाम बताया गया शिवराम कृष्ण। गीत कुछ ऐसा था "निम्बुआ तले डोला रख दे मुसाफ़िर, आयी सावन की बहार रे"। अब आप ज़रा इस लाइन को "अब के बरस भेज भ‍इया को बाबुल" की धुन पर गाने की कोशिश कीजिए ज़रा! जी हाँ, उस रात मैं भी चौंक गया था यह सुनकर कि इन दोनों गीतों की धुन हू-ब-हू एक है। मेरे दिल में हलचल होती रही कि कौन सा गीत पहले बना होगा, क्या एक संगीतकार दूसरे संगीतकार की धुन से प्रभावित होकर अपना गीत बनाए होंगे, वगैरह वगैरह। मेरी तफ़तीश अगले दिन समाप्त हुई जब मुझे पता चला कि यह असल में एक पारम्परिक लोक रचना है। यह एक कजरी है जिसे कई कई शास्त्रीय गायकों ने गाया है समय समय पर। सावन की ऋतु पर यह गीत गाँव गाँव में सुनने को मिलता है आज भी। और 'बंदिनी' के इस गीत में भी सावन का ही ज़िक्र है। तो दोस्तों, सावन का महीना भी चल रहा है, ऐसे में यह गीत बड़ा ही उपयुक्त बन पड़ा है हमारी इस महफ़िल के लिए। शरद जी को धन्यवाद देते हैं कि उन्होने इस गीत की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया। सुनिए और इसका आनंद उठाइए, और महिलायें इसे सुनकर अपने बचपन और बाबुल को याद करेंगीं ऐसा हमारा अनुमान है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत में शहनाई का बहुत व्यापक इस्तेमाल हुआ है.
२. गीतकार शम्स लखनवीं ने इस फिल्म की कहानी और संवाद लिखे थे.
३. एक अंतरा खत्म होता है इस शब्द पर -"दुवायें".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी १० अंक कमाकर आप पराग जी, दिशा जी, और रोहित जी को जबरदस्त टक्कर दे रही हैं. बधाई. स्वप्न जी काश ऐसा हो पाता कि हम सब अपना श्रम लगाकर इस फिल्म का रीमेक बना पाते...आपकी पसंद कल्याणी के रोल के लिए श्रेष्ठ है. अन्य सभी श्रोताओं का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, July 17, 2009

प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूँ या न करूँ...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 144

जरूह सुल्तानपुरी, क़मर जलालाबादी, प्रेम धवन आदि गीतकारों के साथ काम करने के बाद सन् १९५८ में संगीतकार ओ. पी. नय्यर को पहली बार मौका मिला शायर साहिर लुधियानवी के लिखे गीतों को स्वर्बद्ध करने का। फ़िल्म थी 'सोने की चिड़िया'। इस्मत चुगतई की लिखी कहानी पर आधारित फ़िल्म कार्पोरेशन ऒफ़ इंडिया के बैनर तले बनी इस फ़िल्म का निर्देशन किया था शाहीद लतीफ़ ने, और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे बलराज साहनी, नूतन और तलत महमूद। जी हाँ दोस्तों, यह उन गिनी चुनी फ़िल्मों में से एक है जिनमें तलत महमूद ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म में तलत साहब और आशा भोंसले के गाये कम से कम दो ऐसे युगल गीत हैं जिन्हे अपार सफलता हासिल हुई। इनमें से एक तो था "सच बता तू मुझपे फ़िदा कब हुआ और कैसे हुआ", और दूसरा गाना था "प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूँ या न करूँ"। और यही दूसरा गीत आज के इस महफ़िल की शान बना है। साहिर साहब के क़लम से निकला हुआ, और प्रेमिका से प्यार करने की इजाज़त माँगता हुआ यह नग़मा प्रेम निवेदन की एक अनूठी मिसाल है। इस भाव पर बहुत सारे गानें बनें हैं, लेकिन इस गीत के बोल हर एक को पीछे छोड़ देते है शब्दों और भाषा की उत्कृष्टता में।

बरसों पहले फ़ौजी भा‍इयों से विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में मुख़ातिब तलत महमूद ने इस गीत के बारे में कहा था - "मैं और कुछ चुनिंदा कलाकार एक बार सिक्किम गये हुए थे आप फ़ौजी भा‍इयों का मनोरंजन करने। तब मुझे समझ में आया कि आप लोग मुझे और मेरे गाये गीतों को कितना पसंद करते हैं। जब भी मैं आप लोगों के लिए प्रोग्राम पेश करता हूँ तो एक गीत की फ़रमाइश अक्सर आती है, और वह गीत है फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' का, जिसमें मैं 'हीरो' था और इस गीत में मैं और 'हीरोइन' एक कश्ती पे सवार हो कर गाते हैं।" दोस्तों, एक और अंश 'दस्तान-ए-नय्यर' से हो जाये! नय्यर साहब बता रहे हैं - "तलत साहब की एक तसवीर थी ('सोने की चिड़िया'), फ़िल्म 'बाज़' में वो गाना गाये, "एक हसरत की तसवीर हूँ मैं, जो बन बन के बिगड़े वह तक़दीर हूँ मैं", उसके बाद 'सोने की चिड़िया' में वो एक 'साइड हीरो' के रोल में आये। वो दो गानें मेरे पास गाये - "प्यार पर बस..." और "सच बता..."। वेल्वेट वायस और बहुत शरीफ़ आदमी, वो भी शरीफ़ आदमी कम बात करने वाले, काम से काम रखते थे!" जब नय्यर साहब से अहमद वसी साहब ने सवाल किया कि "क्या आप को कोई दुशवारी नहीं लगी क्यूंकि तलत साहब की गायकी बिल्कुल अलग थी, उनकी गायकी ग़ज़ल से बहुत क़रीब थी?", तो नय्यर साहब का सीधा और बेझिझक जवाब था - "नहीं, गायकी कोई चीज़ नहीं होती है, यह होगी क्लासिकल सिंगर्स की बनायी हुई, 'फ़िल्म लाइन' में कोई गायकी नहीं है, गायकी तो हम बनाते हैं लोगों की। अब रफ़ी साहब की आवाज़ को कितना तंग और दबाके इस्तेमाल किया गया है, यह तो काम्पोसर पे बहुत डिपेंड करता है कि किस गायक से कैसे काम लेना है"। तो दोस्तों, बातें बहुत सी हो गयी, अब बारी गीत सुनने की।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. जब भी सबसे खूबसूरत दोगानों की बात होगी इस गीत का अवश्य जिक्र आएगा.
2. अनंत ठाकुर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सदाबहार हिट नायक और नायिका की जोड़ी थी.
3. मुखड़े में शब्द है -"मधुर".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत बहुत बधाई. ओल्ड इस गोल्ड पहेली के सबसे पहले विजेता हैं आप. जल्द ही आपकी पसंद गीत शामिल होने इस कारवाँ में. पूरा ओल्ड इस गोल्ड परिवार जोरदार तालियों से कर रहा है आज अपने इस पहले विजेता की ताजपोशी, अदा जी देखते हैं अब आपको कौन टक्कर देगा, अभी तक तो आप पराग जी से बहुत आगे हैं, पर फिर भी मुकाबला कड़ा होगा ऐसी उम्मीद है. दिशा जी अगर थोडा समय से (अमूमन ६.३० बजे शाम भारतीय समय अनुसार) यदि आ पायें तो सब पर भारी पड़ सकती हैं. मनु जी पीछे रह जाते हैं, वैसे रचना जी, दिलीप जी, और कभी कभी सुमित जी भी अपना जलवा दिखा ही देते हैं. खैर अगला विजेता कोई भी हो, पर फिलहाल तो रंग जमा रखा है शरद तैलंग जी ने. शरद जी ओल्ड इस गोल्ड से युहीं जुड़े रहिये, यदि बाकी सब जवाब देने में असमर्थ रहे तो आपको ही जवाब देना पड़ेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, May 5, 2009

तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा...पति प्रेम की पवित्र भावनाओं को समर्पित एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 71

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड'के लिए हमने जिस गीत को चुना है उसमें एक पत्नी का अपने पति के लिए जो निष्पाप पवित्र प्रेम है उसका वर्णन हुआ है। इस गीत के बोल इतने सुंदर हैं कि जो पति-पत्नी के प्रेम को और भी कई गुना पावन कर देता है। लताजी की दिव्य आवाज़ और संगीतकार रवि का सुमधुर संगीत ने राजेन्द्र कृष्ण के बोलों को और भी ज़्यादा प्रभावशाली बना दिया है। लताजी की आवाज़ एक कर्तव्य-परायन भारतीय नारी के रूप को साकार करती है। और भारतीय नारी का यही रूप प्रस्तुत गीत में भी कूट कूट कर भरा हुआ है। फ़िल्म 'ख़ानदान' का यह गीत है "तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा तुम ही देवता हो"। यूँ तो १९६५ की इस फ़िल्म में मुमताज़, सूदेश कुमार, और प्राण भी थे, लेकिन वरिष्ठ जोड़ी के रूप में सुनिल दत्त और नूतन नज़र आये और यह गीत भी इन दोनो पर ही फ़िल्माया गया है। भारतीय संस्कृति मे पत्नी के लिए पति का रूप परमेश्वर का रूप होता है। आज के समाज में यह कितना सार्थक है इस बहस में हम पड़ना नहीं चाहते, लेकिन इस गीत का भाव कुछ इसी तरह का है। पत्नी की श्रद्धा और प्रेम की मिठास गीत के हर एक शब्द में झलक रहा है। इस गीत में नूतन को अपने बीमार अपाहिज पति (सुनिल दत्त) को बहलाते हुए दिखाया गया है। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है, वह एक लोरी की शक्ल ले लेती है। "बहुत रात बीती चलो मैं सुला दूँ, पवन छेड़े सरगम मैं लोरी सुना दूँ" लाइन के ठीक बाद लताजी जिस नरमोनाज़ुक अंदाज़ में बिना बोलों के गुनगुनाती हैं, उसका असर बहुत से बोलों वाले लोरियों से भी कई गुना ज़्यादा है। इस गीत के लिए संगीतकार रवि को उस साल का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का 'फ़िल्म-फ़ेयर' पुरस्कार मिला था। फ़िल्म 'ख़ानदान' की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म के एक नहीं बल्कि दो दो गीतों को अमीन सयानी के 'गीतमाला' के वार्षिक कार्यक्रम में स्थान मिला था। आशा भोंसले और मोहम्मद. रफ़ी का गाया "नील गगन पर उड़ते बादल आ" १४-वीं पायदान पर था और प्रस्तुत गीत "तुम्ही मेरे मंदिर" उस साल तीसरे पायदान पर था। दूसरे पायदान के लिए 'हिमालय की गोद में' फ़िल्म का "एक तू ना मिला" और पहले पायदान के लिए 'सहेली' फ़िल्म का "जिस दिल में बसा था प्यार तेरा" गीत चुने गये थे।

अब आपको आज के गीत के संगीतकार रवि और उनके साथ इस गीत के रिश्ते की बात बताते हैं। रवि के संघर्ष के दिनों में उनकी पत्नी ने बहुत दुख-दर्द झेलें हैं और अपने पति की ख़ातिर कई निस्वार्थ त्याग भी किये। इस बात का ज़िक्र रवि ने विविध भारती की एक मुलाक़ात में कई बार किया था। तो जब रविजी से यह पूछा गया कि उनके बनाए गीतों को सुनकर उनकी पत्नी का क्या विचार रहता था, उन्होने कहा था, "हलाँकि वो शब्दों में बयान नहीं करती थी, लेकिन मैं उसके चेहरे से जान जाता था कि वो ख़ुश है। और मुझे जब भी 'फ़िल्मफ़ेयर अवाराड्स‍' मिलते थे तब भी वो बहुत ख़ुश हो जाती थी। मैंने कभी उसके लिए कोई गीत नहीं बनाया, लेकिन उसे 'ख़ानदान' फ़िल्म का गीत "तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा" बहुत पसंद था। वो अकसर कहा करती थी कि इस तरह के गाने और बनने चाहिए।" रविजी की पत्नी कांता देवी का सन् १९८६ में स्वर्गवास हो गया। तो लीजिए रविजी की स्वर्गवासी पत्नी के त्याग और प्रेम को श्रद्धाजंली अर्पित करते हुए आज का यह गीत सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस बेहद सफल संगीतकार जोड़ी में से एक संगीतकार ने अपने बंगले का नाम इसी फिल्म के नाम पर रखा.
२. लता और मुकेश की आवाजों में एक प्यारा सा गीत.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द युगल से - "चोरी चोरी"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी एकदम सही जवाब....इस बार तो सभी ने बिलकुल सही जवाब दिया...दिलीप जी, नीलम जी, नीरज जी,संजीव जी सभी को बधाई, पराग जी, फिल्म का नाम बताना अनिवार्य नहीं है....आपने बस गीत का अंदाजा लगाना है. शन्नो जी सही कहा आपने ये गीत वाकई बहुत मजेदार है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Monday, March 23, 2009

सुन मेरे बन्धू रे, सुन मेरे मितवा....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 31

किसी सुदूर अनजाने गाँव की धरती से गुज़रती हुई नदी, उसकी कलकल करती धारा, दूर दिखाई देती है एक नाव, और कानो में गूंजने लगते हैं उस नाव पर बैठे किसी मांझी के सुर. अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वो अपनी ही धुन में गाता चला जाता है. दोस्तों, शहरों में अपने 'कॉंक्रीट' के 'अपार्टमेंट' में रहकर शायद हम ऐसे दृश्य का नज़ारा ना कर सके, लेकिन एक गीत ऐसा है जिसे सुनकर आप उसी नज़ारे को ज़रूर महसूस कर पाएँगे, वही नदी, वही नाव और उसी मांझी की तस्वीर आपकी आँखों के सामने आ जाएँगे, यह हमारा विश्वास है. और वही गीत लेकर आज हम हाज़िर हुए हैं 'ओल्ड इस गोल्ड' की इस महफ़िल में.

भटियाली संगीत, यानी कि बंगाल के नाविकों का संगीत. नाव चलाते वक़्त वो जिस अंदाज़ में और सुर में गाते हैं उसी को भटियाली संगीत कहा जाता है. और बंगाल के लोक संगीत के इसी अंदाज़ में सचिन देव बर्मन ने इस क़दर महारत हासिल की है कि उनकी आवाज़ में इस तरह का गीत जैसे जीवंत कर देता है उसी मांझी को हमारी आँखों के सामने. 1959 में फिल्म "सुजाता" में बर्मन दादा ने ऐसा ही एक गीत गाया था. संख्या के हिसाब से अगर हम देखें तो भले ही दादा ने कम गीत गाए हैं, पर अदायगी और भाव सम्प्रेषणता की दृष्टि से देखें तो ऐसी गायिकी शायद ही किसी और गायक की आवाज़ में सुनने को मिले. और यही कारण है कि एस डी बर्मन के गाए गीत 'कवर वर्ज़न' के शिकार नहीं हुए. बर्मन दादा भले ही संगीतकार के रूप में विख्यात हुए हों लेकिन क्या आपको पता है कि उन्होने फिल्मजगत में अपनी शुरुआत बतौर गायक ही की थी. सन 1941 में संगीतकार मधुलल दामोदर मास्टर के लिए फिल्म "ताज महल" में पहली बार उन्होने गीत गाया था. तो लीजिए आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में दादा बर्मन की गायिकी को सलाम करते हुए सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में यह भटियाली सुर, फिल्म "सुजाता" से. फिल्म में यह एक पार्श्व-संगीत की तरह बजता है. सुनील दत्त और नूतन नदी के घाट पर खडे हैं और दूर किसी नाव में कोई मांझी यह गीत गा रहा है. तो सुन मेरे बंधु रे...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. संजीव कुमार और सुलक्षणा पंडित अभिनीत इस फिल्म का ये शीर्षक गीत है.
२. एम् जी हशमत और कल्याण जी आनंद जी की टीम.
३. अंतरे में पंक्ति आती है "चैन मेरा क्यों लूटे..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पारुल ने एक बार फिर रंग जमा दिया. मनु जी और नीरज जी भी बधाई स्वीकारें. ये शायद बहुत आसान था आप सब धुरंधरों के लिए :). नीरज जी तलत साहब पर हमारा आलेख और उनके कुछ ख़ास गीत आप यहाँ सुनें. धुरंधरों की सूची में ममता भी शामिल हो चुकी हैं।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Saturday, February 21, 2009

अरे दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 02

ओल्ड इस गोल्ड आवाज़ का एक ऐसा स्तम्भ है जिसमें हम आपको फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर से चुनकर एक लोकप्रिय गीत सुनवाते हैं और साथ ही साथ उस गीत की चर्चा भी करते हैं उपलब्ध तथ्यों के आधार पर. आज हमने इस स्तम्भ के लिए जिस गीत को चुना है उस गीत को सुनकर न केवल आप मुस्कुरायेंगें बल्कि आपके कदम थिरकने भी लगेंगे. १९५८ में एक फ़िल्म आई थी-"दिल्ली का ठग" और इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे किशोर कुमार और नूतन. इस फ़िल्म में किशोर कुमार और आशा भोंसले का गाया एक ऐसा गीत है जो अपने आप में एक ही है, और ऐसा गीत फ़िर उसके बाद कभी नही बन पाया. जब किशोर दा के सामने हास्य गीत गाने की बारी आती है, तो जैसे उनका अंदाज़ ही बदल जाता है. संगीतकार चाहे जैसी भी धुन बनाये, किशोर दा उस पर अपने अंदाज़ की ऐसी छाप छोड़ देते हैं की वो गीत सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्ही का बन कर रह जाता है. ऐसा ही है ये गीत भी जिसे आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं.

फ़िल्म की सिचुअशन ये है कि नूतन, किशोर कुमार को अंग्रेजी की "वोक्युबलरी" सिखा रही हैं. इस सिचुअशन पर जब गीत बनाने का सोचा गया तब तब गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी, संगीतकार रवि और गायक किशोर कुमार और आशा भोंसले ने एक ऐसा "मास्टर पीस" तैयार कर सबके सामने पेश कर दिया कि सब खुशी से झूम उठे और हँसी के मारे लोट पोट भी हो गए. आशा ने भी देखिये किस खूबी से यहाँ किशोर को टक्कर दी है गायकी में. इस तरह के गीत निभाने आसान नही होते ये याद रखियेगा. "सी ऐ टी कैट कैट माने बिल्ली..." को उस साल अमीन सायानी के हिट रेडियो कार्यक्रम बिनाका गीत माला के वार्षिक कार्यक्रम में दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था. आज भी ये गीत किशोर कुमार के सदाबहार हास्य गीतों की तालिका में एक बेहद सम्मान जनक स्थान हासिल करता है. तो सुनिए किशोर कुमार के साथ आशा भोंसले की आवाज़, फ़िल्म "दिल्ली का ठग" का ये गुदगुदाने वाला गाना.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कमर जलालाबादी, कल्यानजी आनंद जी और मुकेश की शानदार जुगलबंदी.
२. मनमोहन देसाई की पहली निर्देशित फ़िल्म, नायक थे राजकपूर.
३. गीत के मुखड़े में शब्द है -"सुभान अल्लाह"

कुछ याद आया...?

कल की पहेली का सही जवाब दिया मीत जी ने, मनु जी ने और दिलीप जी ने. आप सब को बधाई.

प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सदर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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