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Saturday, July 25, 2015

BAATON BAATON MEIN - 10: INTERVIEW OF ACTOR KIRAN JANJANI

बातों बातों में - 10

फ़िल्म अभिनेता किरण जनजानी से सुजॉय चटर्जी की बातचीत






नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज जुलाई 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के जानेमाने अभिनेता किरण जनजानी (करणोदय जनजानी) से की गई हमारी बातचीत के सम्पादित अंश।   




नमस्कार किरण जी,.... मैं किरण इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इसी नाम से आप फ़िल्मों में जाने जाते रहे हैं।

नमस्कार! जी बिल्कुल। 

बहुत बहुत स्वागत है ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के ’बातों बातों में’ के मंच पर, और बहुत शुक्रिया आपका जो आपने इतनी व्यस्तता के बावजूद हमें समय दिया, और हमारे पाठकों से रु-ब-रु होने का सौभाग्य हमें दिया। बहुत शुक्रिया। 

शुक्रिया आपका भी मुझे आमन्त्रित करने के लिए। 

सबसे पहले तो हम आपके नाम से ही शुरू करना चाहेंगे। आप फ़िल्मों में अब तक किरण जनजानी (Kiran Janjani) के नाम से जाने जाते रहे हैं, पर आजकल आप ने अपना नाम बदल कर करणोदय जनजानी (Karanuday Jenjani) कर दिया है। इसके पीछे क्या राज़ है?

कोई राज़ की बात नहीं है, करणोदय (करण-उदय) मेरा जन्मपत्री नाम है और किरण नाम मेरे बाल्यकाल से चला आ रहा है। संजय जुमानी जी मुझसे बहुत बार कह चुके हैं कि मुझे करणोदय नाम को ही अपनाना चाहिए, पर मैंने कभे इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया। लेकिन अब मेरी बेटी के जन्म के बाद जब उन्होंने फिर से यह कहा कि अब मुझे अपना नाम बदल लेना चाहिए, तो मैंने आख़िरकार बदल ही लिया। पर लोग अब भी मुझे किरण नाम से ही बुलाते हैं।

तो क्या आपकी आनेवाली फ़िल्मों में आपक नाम करणोदय दिखाई देगा?

जी बिल्कुल, मैंने अब औपचारिक तौर पर अपना नाम बदल दिया है। अंग्रेज़ी में पारिवारिक नाम की स्पेलिंग् भी बदल गई है, यानी कि Janjani से अब Jenjani हो गया है।

आप विश्वास करते हैं न्युमेरोलोजी पर?

जैसा कि मैंने कहा कि अपनी बेटी की ख़ातिर मैंने अपने नाम में बदलाव किया है। और वैसे भी यह मेरा जन्मपत्री नाम ही है, तो एक तरह से कोई बदलाव तो है ही नहीं।


किरण की, अब चलते हैं पीछे की तरफ़, बताइए कि कैसा था आपका बचपन? बचपन के वो दिन कैसे थे? किस तरह की यादें हैं आपकी?

जब मैं छोटा था तब बहुत ही शर्मीला स्वभाव का था। अपने परिवार का दुलारा था, protected by family types। कोई चिन्ता नहीं, कोई तनाव नहीं, वो बड़े बेफ़िकरी के दिन थे। क्योंकि मैं पढ़ाई में काफ़ी अच्छा था, मैं अपने बिल्डिंग् के दोस्तों के ग्रूप का लीडर हुआ करता था, पर खेलकूद में बिल्कुल भी अच्छा नहीं था। उन दिनों कम्प्यूटर नहीं था और केबल टीवी की बस शुरुआत हुई ही थी। इसलिए विडियो टेप (VCP/VCR) ही देश-विदेश के फ़िल्म जगत से जुड़ने का एकमात्र ज़रिया था। पर उन दिनों ज़्यादा वक़्त दोस्तों के साथ घूमने-फिरने, मौज मस्ती करने में ही निकलता था। और यही बचपन की सबसे ख़ूबसूरत बात थी।

आपने इस बात का ज़िक्र किया कि आप पढ़ाई-लिखाई में अच्छे थे, यहाँ पर मैं अपने पाठकों को यह बता दूँ कि किरण जी ने देश-विदेश में काफ़ी पढ़ाई की है, जैसे कि कोलम्बिया के Colegio Cosmopolitano de Colombia, फिर अमरीका के New York Film Academy और Universal Studios से फ़िल्म स्टडीज़ की, और फिर मुंबई के Narsee Monjee Institute of Management and Higher Studies से भी कोर्स किया। ऐसे बहुत कम फ़िल्म अभिनेता होंगे हमारे देश में जिन्होंने इतनी पढ़ाई की होगी। ख़ैर, किरण जी, यह बताइए कि जैसे जैसे आप बड़े होने लगे तो जीवन के किस मोड़ पे आकर आपको यह लगा कि आपको अभिनय में जाना है?

जब मैं दसवीं कक्षा में था, तब फ़ैशन के बारे में मुझे मालूमात हुई और एक झुकाव सा हुआ। यह वह समय था जब मैं स्कूल ख़तम करने ही वाला था और कॉलेज में दाख़िल होने वाला था। मैं बहुत उत्तेजित हो जाता था जब मेरे दोस्त, पड़ोसी और मेरे कज़िन्स मुझे देख कर यह कहते कि मैं बहुत अच्छा दिखता हूँ, इसलिए मुझे मॉडेलिंग् और ऐक्टिंग् में जाना चाहिए। उन दिनों त्योहारों, जैसे कि गणपति में, मेलों में और कॉलेज फ़ंकशन्स में डान्स करना एक क्रेज़ हुआ करता था। इन सब का प्रभाव मुझ पर भी पड़ा और मैंने भी डान्स सीखना शुरू कर दिया, और मॉडलिंग् की बारीकियाँ भी सीखने लगा।

परिवार जनों की क्या प्रतिक्रिया रही? कहीं उन्हें यह तो नहीं लगा कि आप ग़लत राह पर चल रहे हैं?

बिल्कुल नहीं! मेरे पिताजी मुझे डान्स शोज़ में परफ़ॉर्म करते देख बहुत ज़्यादा उत्तेजित हो जाते थे, और यहाँ तक कि ज़ोर ज़ोर से सीटियाँ भी बजाते थे जब भी मैं स्टेज पर परफ़ॉर्म कर रहा होता।

क्या बात है! और आपकी माँ?

मेरी माँ और बहन तो हमारे इलाके में मेरी वजह से मशहूर थीं। और मुझे यह अनुभव बहुत ही अच्छा लगता था कि मैं इतना पॉपुलर हूँ।


मॉडलिंग् में जाते हुए आपको क्या किसी कठिनाई या संघर्ष का सामना करना पड़ा?

बस एक ही तक़लीफ़ थी, और वह यह कि मेरे दाँत उभरे हुए थे, जिसे हम अंग्रेज़ी में buck teeth कहते हैं। इसे ठीक करने के लिए मैं पैसे बचाए और ब्रेसेस लगा कर इस परेशानी को ख़त्म किया। और इसका एक फ़ायदा यह भी हुआ कि मेरे अन्दर आत्मविश्वास और गहरा हो गया, और मैं एक मॉडल और डान्सर बनने के लिए बिल्कुल तैयार हो गया।

और उसके बाद अभिनय भी?

जी हाँ, बिल्कुल!

आपने फ़िल्म इंडस्ट्री में क़दम रखा साल 2003 की फ़िल्म ’Oops!' से। किस तरह से मौक़ा मिला इस फ़िल्म में हीरो बनने का? क्या बॉलीवूड में आपका कोई कनेक्शन था पहले से ही?

कोई कनेक्शन नहीं था, दरसल बात यह हुई कि मैं जिस जिम में जाया करता था, उसी जिम में दीपक तिजोरी भी जाया करते थे। वहाँ उन्होंने मुझे देखा, और मेरा जो स्वभाव था, जिस तरह से मैं वहाँ के स्टाफ़, ट्रेनर और दूसरे दोस्तों से बातचीत करता था, जिस खिलन्दड़पन और रंगीन मिज़ाज से सबसे मिलता था, उससे वो काफ़ी प्रभावित हुए। पूरी मस्ती चालू रहती थी, जोक्स मारता रहता था, एक ऐटिट्यूड भी था, कुल मिला कर दीपक तिजोरी ने मुझमें जहान देखा।

जहान?

जी हाँ, जहान, यानी कि 'Oops!' फ़िल्म के नायक के चरित्र का नाम। जहान में ये ही सारी ख़ूबियाँ थीं। उन्होंने जब मुझे इसके लिए ऐप्रोच किया तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

पहली बार फ़िल्मी कैमरा फ़ेस करने से पहले किस तरह की तैयारियाँ आपने की थी?

ऑफ़कोर्स दीपक ने मुझे पूरे दो महीने की फ़िल्म के स्क्रिप्ट की ट्रेनिंग् दिलवाई। उस समय मेरे अन्दर एक आग थी अभिनेता बनने की, इसलिए कोई भी मुश्किल मुश्किल नहीं लगा। 


फ़िल्म 'Oops!' की कहानी बहुत ही ज़्यादा बोल्ड थी। अपनी पहली ही फ़िल्म में इस तरह का रोल करना आपको आत्मघाती नहीं लगा? किसी तरह की हिचकिचाहट महसूस नहीं हुई?

जैसा कि मैंने अभी कहा कि मेरे अन्दर उस समय एक अभिनेता एक हीरो बनने की आग जल रही थी और मैं हर हाल में वह मंज़िल पाना चाहता था, इसलिए यह सोचने का सवाल ही नहीं था कि फ़िल्म बोल्ड सब्जेक्ट पर है या मेरे लिए suicidal है। डरने या पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। मौक़े बार बार नहीं मिलते। इसलिए मैंने 'Oops!' में जहान का किरदार निभाने के लिए दीपक तिजोरी को हाँ कह दिया।

फ़िल्म ’Oops!' कई कारणों से विवादों में घिर गई थी। पहला कारण इसका बोल्ड सब्जेक्ट कि जिसमें जहान अपनी दोस्त आकश की माँ के साथ प्रेम संबंध बना लेता है, और दूसरा कारण इसमें दिखाए गए अन्तरंग दृश्य जो उस समय के हिसाब से बहुत ज़्यादा बोल्ड थे। क्या वाक़ई आपको डर नहीं लगा था फ़िल्म को करते हुए?

नरवसनेस तो होती है यह मैं मानता हूँ, मुश्किल दृश्यों को करते हुए अभिनेता नरवस फ़ील करता है। सीनियर ऐक्टर्स के साथ काम करना, देर रात तक काम करना, अन्तरंग दृश्य निभाना, ये सब हमें परेशान करते हैं, पर मैं इन सब चीज़ों को अपने काम का हिस्सा मानता हूँ जिनसे बचने का कोई तरीका नहीं है। इसलिए इन्हें स्वीकार कर लेने में ही भलाई है।

वरिष्ठ अभिनेत्री मीता वशिष्ठ के साथ आपके अन्तरंग दृश्यों को लेकर काफ़ी चर्चाएँ और विवाद खड़े हुए थे। क्या कहना चाहेंगे उस बारे में?

मुझे हमेशा अपने डिरेक्टर पर भरोसा रहा है और यह विश्वास रहा है कि वो ऐसा कुछ नहीं दिखाएँगे जो सस्ता या चल्ताऊ लगे, भद्दा लगे, अश्लील लगे। मीता जी एक वरिष्ठ अभिनेत्री हैं, अगर उन्हे वह सीन करते हुए बुरा नहीं लगा तो मैं नहीं समझता कि इसके बाद मुझे कुछ और कहने की आवश्यक्ता है।

’Oops!' के गाने भी काफ़ी अच्छे थे और लोकप्रिय भी हुए। आपको कौन सा गाना सबसे ज़्यादा पसन्द है इस फ़िल्म का?

सच पूछिए तो इस फ़िल्म के सभी गाने मेरे फ़ेवरीट हैं। सोनू निगम का गाया "जाने यह क्या हो रहा है, यह दिल कहाँ खो रहा है...", हरिहरण का गाया "ऐ दिल तू ही बता...", शान का गाया "याहें...", ये सभी गीत मुझे बहुत पसन्द है, और ये सब बड़े बड़े गायक हैं। मैं आज भी इन गीतों को सुनता रहता हूँ।


हमारी फ़िल्म इंडसट्री में यह रवायत है कि कोई भी कलाकार बहुत जल्दी टाइप कास्ट हो जाता है, और शायद यह आपके साथ भी हुआ। ’Oops!' के बाद आपने कई ऐसी फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें कहानी कम और मसाला ज़्यादा थी, जैसे कि ’Stop', ’सौ झूठ एक सच’, ’जलवा - फ़न इन लव’, ’सितम’ आदि। क्या इनके बाद भी आपको यह नहीं लगा कि ’Oops!' से आग़ाज़ करना उचित नहीं रहा?

’Stop' फ़िल्म में मैंने एक flirt casanova का किरदार निभाया था, ’सितम’ में मैं एक बिज़नेसमैन था, और अन्य फ़िल्मों में भी मैंने अलग अलग किरदार निभाए, पर इन सब में एक बात जो कॉमन थी, वह यह कि मेरा किरदार एक flirt था, हा हा हा। पर यह भी तो देखिए कि ’Oops!' में एक male stripper का रोल निभाने वाला ’My Friend Ganesha' में एक अच्छे पति का रोल भी निभाया है जो एक बच्चों की फ़िल्म थी। और आज भी मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मैंने ’Oops!' में एक male stripper के किरदार से अपनी पारी की शुरुआत की। मुझे गर्व है कि मैंने यह फ़िल्म किया। मैं एक अभिनेता हूँ, इसलिए कठिनाइयाँ और ख़तरे तो उठाने ही पड़ेंगे।

क्योंकि आपने ज़िक्र छेड़ ही दिया है तो मैं अब सीधे 2007 की फ़िल्म ’My Friend Ganesha' पे आ जाता हूँ। इस फ़िल्म में आपको अभिनय का मौका कैसे मिला, जबकि आप दूसरी तरह की फ़िल्में (वयस्क फ़िल्में) कर रहे थे?

मैं बचपन से ही भगवान गणपति का बहुत बड़ा भक्त रहा हूँ। गणपति उत्सव के दौरान मैं गलियों में ख़ूब नाचा करता था। मैं यही कहूँगा कि गणपति के आशिर्वाद से ही मुझे ’My Friend Ganesha' में काम करने का अवसर मिला। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि फ़िल्म के निर्मता महोदय शुरुआत में नहीं चाहते थे कि मैं इस फ़िल्म में काम करूँ। फिर उसके बाद जब वो तैयार हुए तो मैंने एक बार नहीं बल्कि दो दो बार रीजेक्ट कर दिया, पार अख़िरकार मैं मान गया।

कैसा था इस फ़िल्म में अभिनय करने का अनुभव?

जब मैं इस फ़िल्म की शूटिंग् कर रहा था तब मुझे वाक़ई ऐसा लग रह था कि गणेश जी मेरे आसपास हैं। इस फ़िल्म के सभी दृश्यों और भक्ति गीतों पर अभिनय करते हुए एक अजीब सी शान्ति अनुभव करता था, और फ़िल्म के निर्देशक और पूरी यूनिट को भी बहुत अच्छा लगा।

यानी कि एक आध्यात्मिक लोक में पहुँच गए थे इस फ़िल्म को करते हुए?

बिल्कुल! एक कनेक्शन बन गया था जैसे!

बहुत ख़ूब! अच्छा, अब आपके द्वारा निभाए कुछ अन्य चरित्रों की बात करते हैं। फ़िल्म ’Life Express' में आपने निखिल शर्मा का किरदार निभाया था। इसके बारे में कुछ बताइए?

’Life Express' का निखिल शर्मा एक बहुत ही व्यस्त पति है जिसे अपने परिवार के लिए बिल्कुल समय नहीं है। पर हक़ीक़त की ज़िन्दगी में ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरे लिए परिवार ही सर्वोपरि है। इस वजह से इस किरदार को अन्दर से महसूस करना थोड़ा मुश्किल हो गया था शुरू शुरू में। निखिल शर्मा बहुत ही शुष्क और शान्त स्वभाव का है जबकि मैं बहुत ही लाउड हूँ जो सबके साथ कनेक्टेड रहता हूँ। ’Life Express' की कहानी surrogate motherhood की कहानी है जिसमें ऋतुपर्णा सेनगुप्ता और दिव्या दत्ता ने मेरे साथ काम किया था और इस फ़िल्म को काफ़ी सराहा गया था।

जी हाँ, और इस फ़िल्म के गीत भी काफ़ी अच्छे थे।

रूप कुमार राठौड़ ने बहुत अच्छा म्युज़िक दिया था। "फीकी फीकी सी लगे ज़िन्दगी तेरे प्यार का नमक जो ना हो...", "थोड़ी सी कमी रह जाती है..." और ख़ास तौर पर जगजीत सिंह के गाए भक्ति गीत "फूल खिला दे शाख़ों पर..." गीत के तो क्या कहने!



अच्छा, अभे हाल में आपने ’Picture Perfect' नामक फ़िल्म में अभिनय किया था। इस फ़िल्म के बारे में कुछ बताइए?

यह दरसल MTV Films और Tresemme द्वारा निर्मित एक लघु फ़िल्म थी 40 मिनट अवधि की जिसे MTV और Youtube पर रिलीज़ किया गया था। यह कहानी थी एक लड़की के दृढ़ संकल्प की, जोश की, और जीतने की चाह की; उस लड़की की जो हर मुसीबतों का सामना करती है अपने सपने को जीने के लिए। Youtube पर आप इस फ़िल्म को देख सकते हैं।

ज़रूर! किरण जी, आपने इतने सारे किरदार निभाए हैं, क्या किसी किरदार में किरण नज़र आता है आपको? कौन है आपके सबसे ज़्यादा दिल के क़रीब - 'Oops!' का जहान, 'Stop' का रोहित, ’सौ झूठ एक सच’ का विक्रम प्रधान, ’जलवा’ का यश सिंघानिया या फिर ’Life Express' का निखिल शर्मा?

मैं अपने द्वारा निभाए गए किसी भी फ़िल्मी चरित्र जैसा नहीं हूँ। मुझे लगता है कि एक अभिनेता होने के नाते मुझे हर किरदार और रोल में ढल जाना चाहिए, और मेरे हिसाब से एक अच्छे कलाकार की यही निशानी होनी चाहिए। मैं हमेशा सिम्पल फील करता हूँ।

आपने शुरू में बताया था कि कॉलेज के दिनों से ही आप नृत्य करते थे। तो अब यह बताइए कि ’नच बलिये 3’ में आप कैसे गए और कैसा अनुभव था उस रीयल्टी शो में भाग लेने का?

दरसल ’नच बलिये 3’ मुझे नहीं बल्कि मेरी पत्नी ऋतु को मिला था। क्योंकि हमारी तस्वीरें इन्तरनेट पर मौजूद थी celebrity couple के रूप में, Hong Kong से Star TV चैनल ने उन्हें देखा और ऋतु और मुझे फ़ाइनल किया। और जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ कि मैं एक अच्छा डान्सर था ही, इसलिए ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। मैं शियामक दावर और अलिशा चिनॉय जैसे पॉप स्टार्स के साथ डान्स कर चुका था, पर एक जोड़ी बन कर डान्स करना और वह भी इतने बड़े प्लैटफ़ॉर्म पर, नैशनल टेलीविज़न पर, यह एक चुनौती ज़रूर था।

आपने पत्नी ऋतु का ज़िक्र जब आ ही गया तो उनके बारे में भी कुछ बताइए?

मेरी पत्नी ऋतु एक prosthetic make-up designer हैं जिसने Los Angeles california से ट्रेनिंग् प्राप्त किया है। 


और कौन हैं आपके परिवार में?

मेरी तीन साल की बेटी Valerie है जो बहुत ही प्यारी है और हमारी लाडली भी। 

ख़ाली समय में क्या करते हैं? कोई शौक़?

कोई शौक़ नहीं है, Valerie के साथ समय बिताना ही हमारा एकमात्र पास्टाइम है। शॉपिंग् मॉल, गार्डन, मूवीज़, स्विमिंग् ये तमाम चीज़ें मैं करता हूँ वैलरी और ऋतु के साथ।

भविष्य में अभिनय या फ़िल्म निर्माण/निर्देशन का विचार है?

मैंने Los Angeles New York Film Academy से फ़िल्म निर्माण सीखा और एक निर्माता और निर्देशक के हैसीयत से कुछ लघु फ़िल्मों का निर्माण भी किया। अब मैंने अपनी पहली पटकथा लिखी है जो एक ऐक्शन थ्रिलर है। बहुत जल्द मैं अपनी इस फ़िल्म को ख़ुद प्रोड्युस और डिरेक्ट करने जा रहा हूँ। और हाँ, इस फ़िल्म में मैं बहुत से special fx prosthetic makeup का इस्तमाल करने जा रहा हूँ जिसमें मेरी पत्नी पारंगत है। भगवान गणेश का आशीर्वाद रहा तो यह सपना जल्दी ही सच होगा।

हम ईश्वर से दुआ करते हैं कि आपका यह सपना सच हो और हम सब को एक अच्छी फ़िल्म देखने को मिले।

धन्यवाद!

किरण जी, बहुत अच्छा लगा आप से बातें कर, आपका बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने हमें इतना समय दिया अपनी वुअस्त ज़िन्दगी से। आपको आपकी आने वाली फ़िल्म के लिए ढेरों शुभकामनाएँ, नमस्कार!

बहुत बहुत धन्यवाद और नमस्कार!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Saturday, December 27, 2014

बातों बातों में - INTERVIEW OF ACTOR, MODEL & FORMER CRICKETER SAJIL KHANDELWAL

 बातों बातों में - 03

फिल्म अभिनेता व पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

" मेहनत ज़रूर रंग लाती है..." 






नमस्कार दोस्तों। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते। काश, परदे से इतर इनके जीवन के बारे में कुछ मालूमात हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने बीड़ा उठाया है फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का। फ़िल्मी अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार के दिन। आज दिसम्बर, 2014 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है अभिनेता, मॉडल और पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। सजिल खण्डेलवाल अपने क्रिकेट करीयर में रणजी ट्रॉफ़ी खेल चुके हैं, और अब फ़िल्म जगत में उनका पदार्पण होने वाला है फ़िल्म 'Confessions of a Rapist' से जिसमें वो नायक की भूमिका में नज़र आयेंगे। तो आइए स्वागत करते हैं सजिल खण्डेलवाल का। 




सजिल, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है, और आपका बहुत-बहुत धन्यवाद हमारे इस निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए।

धन्यवाद!

आपकी पहली फ़िल्म और वह भी नायक की भूमिका में जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही है - Confessions of a Rapist' । इस फ़िल्म के लिए आप हमारी अग्रिम शुभकामनाएँ स्वीकार करें।

बहुत बहुत धन्यवाद!

हम आपकी इस फ़िल्म की विस्तृत चर्चा इस साक्षात्कार में आगे चलकर करेंगे, लेकिन शुरूआत हम शुरू से करना चाहते हैं। तो बताइए अपने जन्म और बचपन के बारे में। कैसे थे बचपन के वो दिन?

मेरी पैदाइश लखनऊ, उत्तर प्रदेश की है। एक बड़े ही इज़्ज़तदार घराने में मेरा जन्म हुआ। शुरू से ही मेरा स्वभाव सरल सहज रहा; मैं चालाक नहीं था पर हर चीज़ का ज्ञान था। कभी कभार शरारतें भी करता था जब दूसरे दोस्त शरारत करते। बचपन के वो दिन भी क्या दिन थे। सबसे पहली बात तो यह कि मैं कभी भी स्कूल ठीक समय पर नहीं पहुँच पाता था, हमेशा लेट। और इसलिए पनिशमेण्ट भी ख़ूब मिलता था मुझे। ट्यूशन में भी वही हाल था। कई बार ऐसा हुआ कि मेरे मम्मी-डैडी को मेरी शिकायत आ जाया करती, और फिर डैडी से मुझे डाँट पड़ती। जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई, मैं और ज़्यादा शरारती और होशियार होता चला गया। मेरे टीचर्स हमेशा मेरे मम्मी-डैडी को कहते कि आपका बेटा होशियार और तेज़ है, पर शरारती बहुत है। और यह भी कहते कि अगर सही दिशा मिले तो आपका बेटा कमाल कर सकता है।

अच्छा अपने बचपन के दोस्तों के बारे में भी बताइए?

मेरे बहुत ही कम दोस्त हुआ करते थे, दो या तीन। हम एक साथ पढ़ाई करते, एक साथ खेलते-कूदते, एक साथ क्लास बंक करते, आपस में अपने-अपने मसले भी सुलझाते। मतलब हमने साथ में हर एक पल का भरपूर आनन्द लिया।

आपने बताया कि आप शरारती बहुत थे; तो क्या अपनी शरारत भरी कोई घटना याद है?

जी हाँ, शायद 15 साल पहले की बात होगी। मैंने सीढ़ियों में तेल डाल दिया था ताकि मेरा क्लास टीचर जैसे ही सीढ़ियों से उतरने लगे तो वो गिर पड़े, क्योंकि मुझे वो बिल्कुल भी पसन्द नहीं थीं। पर अफ़सोस (हँसते हुए) कि वो नहीं गिरीं।

अच्छा सजिल, ये तो थी आपके बिल्कुल बचपन के दिनों का हाल, यह बताइए कि आपने क्रिकेट खेलना, मेरा मतलब है, गम्भीरता से क्रिकेट खेलना कब शुरू किया?

गम्भीरता से क्रिकेट खेलना मैंने 8 वर्ष की आयु से शुरू किया था। मेरे डैडी हमेशा यह चाहते थे कि मैं एक क्रिकेटर बनूँ और उसमें बहुत दूर तक जाऊँ। मैं स्कूल में क्रिकेट खेलता था, घर के आस-पड़ोस में दोस्तों के साथ खेलता था, और मैं काफ़ी अच्छा खेल लेता था शुरू से ही। मुझे आउट करना मुश्किल होता था। क्रिकेट को लेकर मेरे अन्दर एक दॄढ़ संकल्प था शुरू से ही। धीरे धीरे मेरे दोस्तों और आस-पड़ोस के लोगों को यह आभास हो गया कि मैं वाक़ई अच्छा खेलता हूँ और उन सब ने मुझसे कहा कि मुझे क्रिकेट को गम्भीरता से लेनी चाहिए। सबने यह भी सुझाव दिया कि मुझे किसी क्रिकेट अकादमी में एक अच्छे कोच से इसकी तालीम लेनी चाहिए। जब मैंने यह बात अपने मम्मी-डैडी को बताई तो मेरे डैडी मुझे के. डी. सिंह बाबू  स्टेडियम ले गए जहाँ मुझे श्री संजीव पन्त और श्री शशिकान्त सिंह जैसे गुरु मिले। और वहीं से शुरू हुआ क्रिकेट का औपचारिक सफ़र।

वाह! उस वक़्त आपके फ़ेवरीट प्लेअर कौन होते थे?

ऑस्ट्रेलिआ के मार्क वा।

सजिल, क्रिकेटर बनने का आपका औपचारिक सफ़र शुरू हो गया। लेकिन एक सफल क्रिकेटर बनने और रणजी ट्रॉफ़ी में जगह बनाने के लिए किस तरह का संघर्ष आपको करना पड़ा, यह हम जानना चाहेंगे।

क्रिकेटर बनने की राह पर चलना आसान नहीं रहा। कड़ी मेहनत करनी पड़ी। सुबह बहुत जल्दी उठ कर दौड़ना पड़ता था अपने आप को फ़िज़िकली फ़िट रखने के लिए। उस वक़्त मैं स्कूल में था। तो वापस लौट कर स्कूल के लिए तैयार होकर जाना पड़ता था। स्कूल के बाद प्रैक्टिस सेशन में जाता; वहाँ से लौट कर पढ़ाई, और फिर आठ घंटे की नींद। यह मेरी दिनचर्या हुआ करती थी। जैसा कि कहा जाता है कि मेहनत रंग ज़रूर लाती है, मेरे साथ भी यही हुआ। मैं कानपुर गया जहाँ उत्तर प्रदेश क्रिकेट ऐसोसिएशन का मुख्य कार्यालय स्थित है। हर साल वहाँ ट्रायल होता है, यानी कि नए खिलाड़ियों की खोज। मुझे भी वहाँ 'Under 12 Trial' में जाने का मौका मिला। मैं बहुत घबराया हुआ था क्योंकि मेरी उम्र उस वक़्त सिर्फ़ दस साल थी। मैं ख़ुशनसीब था जो मुझे एक बहुत ही अच्छा कोच मिला जिन्होंने मुझे हर वक़्त उत्साह दिया और मेरी मदद की। मुझे याद है कि उस वक़्त कानपुर में मैं रो रहा था क्योंकि सीटें बहुत कम थीं और 500 से 1000 खिलाड़ी आए हुए थे। पर मैंने अपने आप को सम्भाला, आत्मविश्वास को वापस लाया और खेल के मैदान में उतर गया। करीब 1000 खिलाड़ियों में 40 का सीलेक्शन हुआ, और मैं उनमें से एक था। उस कैम्प का नाम था  'Uttar Pradesh Under 12 Top 40'। कैम्प चार दिनों का था। फिर मैं 12 खिलाड़ियों के टीम में चुन लिया गया। उन शुरुआती मैचों में मैंने 51 और 70 रन बनाए, यानी कि मेरा प्रदर्शन सराहनीय रहा। फिर मेरा सफ़र शुरू हुआ Under 14, 16, 19, 22 से होते हुए रणजी तक का। मैंने कुछ चार या पाँच मैच खेले, मेरा प्रदर्शन ठीक-ठाक था, बहुत अच्छा भी नहीं और बहुत ख़राब भी नहीं। मैं अपनी बल्लेबाज़ी की शुरुआत ऑफ़-ब्रेक से किया करता था। रणजी ट्रॉफ़ी की टीम में शामिल होने के लिए किसी भी खिलाड़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से फ़िट होना पड़ता है, और मैं हमेशा इस तरफ़ ध्यान देता था। और मैंने अपने स्टेट लेवेल 'Under 16' और 'Under 19' के मैचों में क्रम से 56, 78, 43 और 65 स्कोर किया था। मेरे अन्दर हमेशा अच्छी नेट्रुत्व-क्षमता थी, तो ये सब तमाम चीज़ें काम आयी रणजी टीम में शामिल होने में।

बहुत ख़ूब! आपकी बातों से ऐसा लग रहा है कि आप एक अच्छा क्रिकेटर बनने की क्षमता रखते थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि आपने क्रिकेट को अलविदा कह दिया और मॉडेलिंग की दुनिया में आ गए?

मैं कभी अपना प्रोफ़ेशन बदलना नहीं चाहता था, मैं एक क्रिकेटर ही रहना चाहता था, पर वह कहते हैं ना कि नसीब में जो रहता है वही होता है। सबसे बड़ी बात जो मेरे साथ हुई वह यह कि मैंने अपने पीक टाइम में अपने डैडी को हमेशा के लिए खो दिया। और इससे क्रिकेट खेलने की जो प्रेरणा मुझे उनसे मिलती थी, वह ख़तम हो गई, और मेरा इन्टरेस्ट भी ख़तम हो गया।

बहुत ही अफ़सोस की बात है! क्या उम्र रही होगी आपकी उस वक़्त?

मैं उस वक़्त 19 साल का था।

बहुत ही कठिन समय रहा होगा यकीनन। फिर मॉडेलिंग और फ़ैशन जगत में क़दम रखने के लिए आपने अपने आप को किस तरह से तैयार किया?

मैं यह मानता हूँ कि किसी भी प्रोफ़ेशन में सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत और लगन ज़रूरी होता है। अगर आप फ़ैशन जगत में एन्टर कर रहे हो तो आपका चेहरा, शारीरिक गठन, बॉडी लैंगुएज, कम्युनिकेशन स्किल्स बहुत ज़रूरी होता है। और अपने आप पर भरोसा होना भी बेहद ज़रूरी है; मन में यह विश्वास बनाए रखना कि चाहे कोई भी रोल हो, उसे आप निभा सकते हो। यह ज़रूर है कि एक नवागन्तुक होने की वजह से आप अपने काम और किरदार ख़ुद चुन नहीं सकते, पर आपको अपने आप को हर किरदार और हर काम के लिए तैयार रहना है। मैं हमेशा आइने के सामने घंटों खड़े हो कर प्रैक्टिस किया करता था।

क्रिकेटर बनने का स्ट्रगल तो आपने बताया था, मॉडल बनने के लिए भी ज़रूर एक बार फिर से स्ट्रगल करना पड़ा होगा?

पहली बात तो यह कि मैं बेशक़ मॉडेलिंग की दुनिया में आया, पर मेरा मक़सद एक मॉडल बनना नहीं था। मैं शुरू से ही एक अभिनेता बनना चाहता था। मैंने 21 वर्ष की आयु में अपनी ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही मॉडेलिंग्‍ शुरू की। मैं अक्सर मॉडल कोर्डिनेटर्स के पीछे भागता रहता, उन्हें अपनी तस्वीरें दिखाता, और फ़ॉलो-अप करता रहता। यह एक 24-घंटों का प्रोफ़ेशन है। इसमें आपका शारीरिक गठन, उच्चता, चेहरे की बनावट, फ़ोटोजेनिक होना, ये सब चीज़ें ज़रूरी होती हैं।

कहते हैं कि ग्लैमर की दुनिया के इन चकाचौंध के पीछे का जो अन्धेरा है वह लोगों को दिखाई नहीं देता। मेरा मतलब है कि इस लाइन में सुनने में आता है कि नवागन्तुक युवाओं का शोषण और उत्पीड़न होता है। आपके क्या विचार हैं इस बारे में?

मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि यह डीपेन्ड करता है कि इस तरह की चीज़ों को कोई कितनी समझदारी और होशियारी से हैन्डल कर सकता है। यह सच है कि लोग इस प्रोफ़ेशन के बारे में बहुत सी बातें करते हैं, पर मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमें प्रैक्टिकल होना चाहिए और सिर्फ़ अपनी मेहनत पर भरोसा रखना चाहिए, बस! किसी से कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए; अगर आपमें वह बात है, अगर आपकी मेहनत में सच्चाई है तो काम ज़रूर मिलेगा। वैसे इस प्रोफ़ेशन में उतार-चढ़ाव बहुत हैं। बहुत से लड़के लड़कियों को समझौता करने को कहा जाता है। बहुत धोखेबाज़ लोग भी भर गए हैं इस लाइन में जो युवा लड़कों और लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं। ऐसे बहुत सी घटनाएँ हैं जो यहाँ कहना मुमकिन नहीं।

जी, मैं समझ सकता हूँ। आपकी इन बातों से युवा-वर्ग को जो सन्देश मिलना था, वह मिल चुका होगा। अच्छा अब यह बताइए कि आपने अपना पहला रैम्प शो किस तरह से हासिल किया? इसके बारे में कुछ बताइए?

वह मेरे कॉलेज का ही शो था जहाँ मुझे Mr. Prince का ख़िताब दिया गया। फिर उसके बाद मेरा पहला डिज़ाइनर शो था मुम्बई में उमैर ज़फ़र का।

दिल की क्या हालत रही होगी उस पहले पहले शो को करते हुए?

मुझे घबराहट नहीं हुई, पर मैं उत्तेजित ज़रूर था। मैंने रिहर्सल्स ठीक तरह से किए और स्टेज को हिट करने के लिए तैयार हो गया। (हँसते हुए)

यानी वही आत्मविशास एक बार फिर नज़र आया, जो क्रिकेट के मैदान में दिखता था। फिर किन किन डिज़ाइनर्स और ब्रैण्ड्स के फ़ैशन शोज़ आपने किए?

उमैर ज़फ़र के साथ
उमैर ज़फ़र के शोज़ मैं नियमित रूप से करता हूँ। मुम्बई के ही डिज़ाइनर ख़ुशीज़ के शोज़ मैंने किए। लखनऊ के डिज़ाइनर अभिजीत साईप्रेम के लिए रैम्प शोज़ मैंने किए। दिल्ली के डिज़ाइनर सदन पाण्डे के फ़ैशन शो में भी जल्दी ही काम करने जा रहा हूँ। इस तरह से जब जो शोज़ आ रहे हैं मैं करता चला जा रहा हूँ।

प्रिन्ट मीडिया में आपका पहला विज्ञापन कौन सा था?

मेरा पहला प्रिन्ट-शूट 'मदर्स डे प्रोमो शूट' था ब्लैकबेरी फ़ोन के लिए। वह एक बहुत बड़ा शूट था जिसके लिए 117 लड़के ऑडिशन के लिए आए हुए थे। सभी की टेस्ट ली गई और उनमें से मैं सीलेक्ट हुआ। मुझे अपने आप पर बहुत गर्व महसूस हुआ, और मेहनताना भी बहुत अच्छा मिला मुझे। उस ऐड को करते हुए मुझे बहुत मज़ा आया पर मैं घबराया हुआ था। पर यह ज़िन्दगी की सच्चाई ही है कि जब आप अपना 100% देते हो, तभी उसका परिणाम भी उतना ही अच्छा होता है।

और कौन कौन से विज्ञापन में आप नज़र आए हैं?

टेलीविज़न पर जो ऐड्स आते हैं, उनमें से 99% स्थापित फ़िल्म कलाकारों द्वारा किए जाते हैं, या फिर सीनियर टीवी कलाकार उन्हें करते हैं। मैंने प्रिन्ट शूट्स किए हैं लेनिन, ग्रासिम सूटिंग्स, वेडिंग टाइम्स मैगज़ीन, ब्लैकबेरी जैसे ब्राण्ड्स के लिए। फ़ैशन मैगज़ीन के कवर पेज पर भी मैं आ चुका हूँ। कैटलॉग शूट्स भी किए हैं। अब तक मुझे अच्छा रेस्पॉन्स मिला है। अगले साल जनवरी-फ़रवरी में कुछ अच्छे काम मुझे मिल रहे हैं।

एक मॉडल के लिए एक नियमित दिनचर्या का होना बहुत आवश्यक होता है शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए। आप किस तरह से इस बात को ध्यान में रखते हैं?

दिनचर्या... मेरा दिन शुरू होता है सुबह 9 या कभी कभी 10 बजे से। मैं हेवी ब्रेकफ़ास्ट करता हूँ और फिर छोटे-छोटे मील्स लेता हूँ लंच, मिड-मील, डिनर के साथ साथ। मैं एक फ़िटनेस-फ़्रीक हूँ, ईश्वर का मुझ पर आशीर्वाद ही रहा है कि मुझे एक अच्छा शरीर मिला है। और यह शूट पर भी डीपेन्ड करता है। और एक बात यह भी है कि आजकल सिर्फ़ इस प्रोफ़ेशन के लिए ही फ़िट रहना ज़रूरी नहीं बल्कि आजकल की ज़िन्दगी में हर किसी को फ़िट रहना चाहिए। जब मैं जिम जाता हूँ तो 40 मिनट वेट ट्रेनिंग करता हूँ और 20 मिनट कार्डियो और रनिंग करता हूँ।

आपने अपने फ़ूड-हैबिट की बात की; इसके बारे में और ज़रा सा विस्तार से बताइए?

मैं बहुत ही पौष्टिक आहार लेता हूँ। ब्रेकफ़ास्ट में एक सेब, दो केले, दो अन्डे का सफ़ेद हिस्सा और एक प्रोटीन शेक विथ मल्टिविटामिन लेता हूँ। लंच में एक कटोरी दाल, तीन रोटियाँ, हरी सब्ज़ियाँ, दही और चावल। जिम से निकल कर दूध और अन्डे लेता हूँ। डिनर में दो रोटियाँ और सब्ज़ियाँ लेता हूँ। दिन में तीन लिटर पानी पीता हूँ और आठ घंटे सोता ज़रूर हूँ जो एक स्वस्थ जीवन के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

मॉडल से एक अभिनेता कैसे बने आप? क्या पहले भी कभी आपने कहीं अभिनय किया था? 'Confessions...' फ़िल्म का रोल आपको कैसे मिला?

मेरे हिसाब से हर किसी के अन्दर एक अभिनेता छुपा हुआ है। आपको बस इसका अहसास होना चाहिए, यही मेरे लिए अभिनय है। मैंने इससे पहले कभी कहीं अभिनय नहीं किया था। जैसे ही इस फ़िल्म की और इस रोल की ख़बर सुनी मुझे ऐसा लगा कि यह रोल सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लिए है और मैं यह रोल किसी भी अन्य नए अभिनेता से बेहतर निभा सकता हूँ। यह रोल बोल्ड था और उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। मैंने ’लूक टेस्ट’ दिया, फिर मुझे ऑडिशन का बुलावा आया। दस ऑडिशन देने के बाद आख़िरकार इस ऑडिशन में मैं चुन लिया गया। प्रोडक्शन टीम ने मुझे सुबह सवा दस बजे फ़ोन किया और उनके दफ़्तर में जाकर उनसे मिलने को कहा। मैं वहाँ पहुँचा तो निर्देशक महोदय ने कहा कि सजिल, बधाई हो, आप फ़िल्म में नायक के रोल के लिए चुन लिए गए हो। मुझे जैसे एक झटका लगा, कुछ देर के लिए मैं बिल्कुल ख़ामोश सा हो गया और सोचने लगा कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा। फिर मुझे यकीन हुआ कि अपने जीवन के अब तक का सबसे बड़ा मुहुर्त मैं अनुभव कर रहा था। मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि क्या बताऊँ। मैंने तुरन्त अपनी मम्मी को फ़ोन किया और उन्हें यह ख़ुशख़बरी दी।

वाह! वाक़ई बड़ा ही सुखद अनुभव रहा होगा। अच्छा सजिल, अब आप इस फ़िल्म के बारे में ज़रा विस्तार में बताइए कि फ़िल्म की विषयवस्तु क्या है?

जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि फ़िल्म की कहानी बलात्कार पर केन्द्रित है। मैं इस फ़िल्म में एक दोहरा-किरदार निभा रहा हूँ। पहले किरदार में मेरी थोड़ी सी दाढ़ी है, एक पोनी टेल है, और पतला शरीर है। और दूसरे किरदार में मैं क्लीन शेव और सामान्य छोटे बालों वाला हूँ। फ़िल्म की शूटिंग् दिल्ली, गोरखपुर और कानपुर में हुई है। यह फ़िल्म समाज को एक सशक्त सन्देश देगा बलात्कार विरोधी अभियान के बारे में, जो आज के भारतीय समाज के सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। साथ ही नारी सुरक्षा का भी सन्देश है इस फ़िल्म में। मैं इससे ज़्यादा इस वक़्त नहीं बता सकता फ़िल्म के बारे में। बस इतना कहूँगा कि फ़िल्म में दो लड़कियाँ हैं जो मुख्य किरदारों में हैं, एक जो मेरी बहन का रोल निभा रही है और दूसरी जो एक रिपोर्टर है। मेरी ही तरह इस फ़िल्म के निर्देशक भी फ़िल्म जगत में अपना पहला क़दम रख रहे हैं। He is a chilled out guy and also very young. उन्हें भी इस फ़िल्म से बहुत सारी उम्मीदें हैं और उनका यह मानना है कि यह फ़िल्म हर किसी को पसन्द आएगी।

फ़िल्म के सह-कलाकारों और ख़ास कर निर्देशक के साथ आपकी ट्युनिंग् कैसी रही? पहली फ़िल्म होने की वजह से आपको बहुत कुछ सीखने को भी मिला होगा न?

मुझे पूरी टीम यूनिट के साथ काम करते हुए बहुत ही मज़ा आया, ख़ूब मस्ती की। साथी कलाकारों और निर्देशक साहब के साथ काम करके बहुत अच्छा लगा। इस यूनिट के साथ जुड़ने का जो मौका मुझे मिला, इसे मैं अपनी ख़ुशक़िस्मती समझता हूँ। भविष्य में फिर कभी मौका मिले तो इस यूनिट का दोबारा हिस्सा बनना चाहूँगा। हम जैसे एक ही परिवार के सदस्य बन गए थे। इस फ़िल्म को करते हुए मुझे बहुत ही ख़ूबसूरत तजुर्बे हुए, पर मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि एक अभिनेता बनने के लिए प्रतिबद्धता के साथ-साथ भाग्य भी साथ में होना चाहिए। जब बात ना बन रही हो और टेक के बाद टेक हो रहे हों तो आदमी झल्ला जाता है। और कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आता है कि आपको लगता है कि सबसे उपर हो। शूटिंग के दौरान पूरे यूनिट की निगाह आप पर होती है। तो कभी कोई शॉट इतना बेकार होता है कि आप झल्ला जाते हो। फिर यह भी कहा गया है कि practice makes a man perfect। मुम्बई में हर रोज़ लाखों लोग क़दम रखते हैं फ़िल्म जगत में अपने सपनों को पूरा करने के लिए। पर बहुत कम लोग ही कुछ कर पाते हैं। मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे यह मौका मिला और भविष्य में भी मैं अच्छे प्रोजेक्ट्स में काम कर सकूँ, उसकी कोशिश मैं करता रहूँगा। अभी तो करीअर की बस शुरूआत ही है।

और हम आपको इसके लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं।

धन्यवाद!

अच्छा सजिल, इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि से तो आपने हमें अवगत करवाया, लेकिन हमने ऐसा सुना है कि फ़िल्म को लेकर कोई विवाद चल रहा है और इसके रिलीज़ की भी तारीख़ अभी निर्धारित नहीं हो पायी है, क्या यह सही है?

जी हाँ, फ़िल्म की रिलीज़ डेट अभी तय नहीं हो पायी है। फ़िल्म विवादित है, पर मेरा इसके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं रहेगा। बस इतना कहूँगा कि कि बलात्कार जैसे सेन्सिटिव विषय पर होने की वजह से सेन्सर बोर्ड ने अभी तक अनुमति नहीं दी है। पर जल्दी ही मामला निपट जाएगा और उसके बाद ही रिलीज़ डेट तय की जाएगी।

क्या आपको यह लगता है कि यह विवाद आपके मात्र शुरू हुए करीअर पर बुरा असर कर सकता है? या फिर इस विवाद से फ़िल्म को पब्लिसिटी मिलने की उम्मीद दिखाई देती है?

कोई भी विवाद किसी कलाकार को चोट नहीं पहुँचा सकता। कलाकार का विवाद से क्या लेना देना? कलाकार विवाद के लिए ज़िम्मेदार नहीं होता। और रही पब्लिसिटी स्टण्ट की बात, तो इसका भी कोई मतलब नहीं बनता क्योंकि इस फ़िल्म से कई लोगों का करीअर शुरू होने जा रहा है। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि हर किसी को पता है कि क्लास स्थायी होता है, मुझे ऑफ़र्स मिल रहे हैं। मेरी इच्छा है कि भविष्य में मुझे अच्छे-अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिले। फ़िलहाल तो जैसे ही सेन्सर बोर्ड का यह मामला सुलझ जाता है, हम फ़िल्म का प्रोमोशन शुरू करेंगे और इसकी रिलीज़ के लिए जुट जायेंगे।

जी बिल्कुल! जैसा कि आपने बताया कि फ़िल्म का विषय बोल्ड है, तो क्या अपनी पहली फ़िल्म के लिए ऐसे बोल्ड सब्जेक्ट पर काम करने से आपको डर नहीं लगा? एक पल के लिए भी आपने यह नहीं सोचा कि यह आपके हित में नहीं भी हो सकता है?

यह सच है कि मैंने एक बोल्ड करैक्टर निभाया है इस फ़िल्म में और बहुत चुनौतीपूर्ण भी रहा। पर कोई भी अभिनेता ऐसे रोल करने से डरेगा क्यों भला? अगर आपको एक सफल अभिनेता बनना है तो हर तरह के किरदार आपको निभाने पड़ेंगे। और यह रोल तो आज के समाज को एक बहुत ही ज्वलन्त मुद्दे को लेकर एक बड़ा सन्देश दे रहा है। हाल ही में दिल्ली में हमने एक भयानक बलात्कार का हादसा देखा जिसने पूरे देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। उसके बाद भी बलात्कार के मामले कम नहीं हुए हैं। हमारा देश, हमारी सरकार क्या क़दम उठा रही है इस तरफ़, यही सब कुछ हमने इस फ़िल्म में कैप्चर किया है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स सीन में हम एक सशक्त सन्देश देने जा रहे हैं। मैं इस फ़िल्म से बहुत ख़ुश हूँ और हम सभी का यह मानना है कि देशवासियों को यह फ़िल्म पसन्द आएगी, ना कि वो इस फ़िल्म को नकारात्मक्ता से देखेगी।

चलिए इस फ़िल्म के बारे में तो हमने जाना, अब यह बताइए कि आप एक अभिनेता के रूप में किस तरह से पनपना चाहते हैं? आपकी किस तरह की उम्मीदें हैं इस फ़िल्म इंडस्ट्री से?

यहाँ पर पनपने का जो सबसे उत्तम तरीका है, वह है कड़ी मेहनत और अपने आप पर भरोसा। मुझे बहुत कुछ करना है आगे, मैं बहुत तरह के किरदार निभाना चाहता हूँ, सिर्फ़ नायक की भूमिका में ही नहीं बल्कि खलनायक और हास्य अभिनेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाना चाहता हूँ। मैं मधुर भण्डारकर जी के साथ काम करना चाहता हूँ क्योंकि वो मेरे सबसे पसन्दीदा निदेशक रहे हैं। और मेरे आइडॉल हैं शाहरुख़ ख़ान। वो मेरे सब कुछ हैं।

सजिल, यह बताइए कि पहले क्रिकेट, फिर मॉडलिंग्, उसके बाद फ़िल्म अभिनेता, अब इसके बाद क्या??

कुछ भी नहीं (हँसते हुए), मैं ख़ुशनसीब हूँ कि क़िस्मत ने मुझे इतना कुछ करने का मौका दिया है। पर इस वक़्त मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अभिनय को लेकर सीरियस हूँ और इसे ही अपना करीअर मानता हूँ और इसी पर अपना पूरा ध्यान लगा रहा हूँ।

आप एक युवा क्रिकेटर, मॉडल और अभिनेता हैं, और निश्चित रूप से युवाओं के लिए एक लाइट-हाउस की तरह भी हैं। क्या सन्देश देना चाहेंगे आप उन युवाओं को जो आप ही की तरह एक क्रिकेटर या अभिनेता/मॉडल बनना चाहते हैं?

मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि किसी भी शॉर्ट-कट में विश्वास नहीं करनी चाहिए और ना ही किसी से कोई भी उम्मीद रखनी चाहिए। अपने जीवन में आप जो भी करना चाहें, उस तक पहुँचने के लिए कड़ी मेहनत कीजिए और अपना पूरा ध्यान उस पर लगाए रखिए। ईश्वर पर भरोसा कीजिए, वो आपको फल ज़रूर देगा। हमेशा ख़ुश रहिए और चीज़ों को हल्के अंदाज़ में ग्रहण कीजिए। कोई भी प्रोफ़ेशन आप चुनिए, क्रिकेट, मॉडलिंग् या ऐक्टिंग्, सभी में आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। सफलता अगर पाना है तो कोई भी शॉर्ट-कट नहीं चलेगा, there is no shortcut to success, मैं ऐसा मानता हूँ।

बहुत अच्छी बात बताई आपने और यह बिल्कुल सही भी है। और सजिल, अन्त में हम यह जानना चाहेंगे कि सजिल उस वक़्त क्या कर रहे होते हैं जब वो ना तो अभिनय कर रहे होते हैं, ना ही मॉडलिंग और ना ही जिम में वर्क आउट?

मुझे बहुत सी चीज़ों का शौक है, जैसे कि मैं क्रिकेट खेलता हूँ अपने निकट के दोस्तों के साथ जब भी मुझे समय मिलता है। बान्द्रा में या फिर जब मैं लखनऊ में होता हूँ तो दोस्तों के साथ हैंग-आउट करता हूँ। मैं अपने प्ले-स्टेशन में भी ख़ूब गेम्स खेलता हूँ। मुझे गाड़ियाँ चलाने का भी बड़ा शौक है। और अपने परिवार के साथ ढेर सारा समय बिताना मुझे बेहद अच्छा लगता है।

बहुत बहुत शुक्रिया सजिल जो आपने हमें अपना कीमती समय दिया और अपने बारे में, और अपनी आने वाली फ़िल्म के बारे में इतना कूछ बताया। आपको फ़िल्म की कामयाबी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए आपसे विदा लेते हैं, नमस्कार!

आपको बहुत बहुत धन्यवाद, ढेर सारा प्यार, नमस्कार।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



Thursday, June 11, 2009

सुजॉय की यह कोशिश वेब रेडियो की बेहतरीन कोशिश है

सुजॉय चटर्जी एक ऐसा नाम जिससे आवाज़ के सभी नियमित श्रोता अब तक पूरी तरह से परिचित हो चुके हैं. रोज शाम वो ओल्ड इस गोल्ड पर लेकर आते हैं एक सोने सा चमकता नगमा हम सब के लिए, और खोल देते हैं बातों का एक ऐसा झरोखा जहाँ से आती खुशबू घोल देती है सांसों में ढेरों खट्टी मीठी गुजरे दिनों की यादें. ओल्ड इस गोल्ड ने पूरे किये अपने १०० एपिसोड और इस एतिहासिक अवसर पर हमने सोचा कि क्यों न आपके रूबरू लेकर आया जाए आपके इतने प्यारे ओल्ड इस गोल्ड के होस्ट सुजॉय चटर्जी को, तो मिलिए आज सुजॉय से -

हिंद युग्म - सुजॉय स्वागत है आपका, हमारे श्रोता ओल्ड इस गोल्ड के माध्यम से आपको जानते हैं. इतने सारे पुराने गीतों के बारे में आपकी जानकारी देखकर कुछ लोग अंदाजा लगते हैं कि आपकी उम्र कोई ४०-५० साल की होगी. तो सबसे पहले तो श्रोताओं को अपनी उम्र ही बताईये. ?


सुजॉय - वैसे अविवाहित लड़कों से उनकी उम्र पूछनी तो नहीं चाहिए, चलिए फिर भी बता देता हूँ कि मैं ३१ साल का हूँ।

हिंद युग्म - अच्छा अब अपना परिचय भी दीजिये...

सुजॉय - हम लोग बंगाल के रहनेवाले हैं, लेकिन मेरी पिताजी की नौकरी गुवाहाटी, असम में होने की वजह से मेरा जन्म और पूरी पढाई वहीं हुई। इसलिए मैं अपने आप को असम का ही रहनेवाला मानता हूँ। फ़िल्हाल मैं चण्डीगढ़ में नौकरी कर रहा हूँ। पेशे से मैं 'टेलीकाम इंजिनीयर' हूँ, और मेरी दिलचस्पी है हिंदी फ़िल्म संगीत में, फ़ोटोग्राफ़ी में, और खाना बनाने में।

हिंद युग्म - सुजॉय, ये ओल्ड इस गोल्ड का कॉन्सेप्ट कैसे बना ?

सुजॉय - सच पूछिए तो यह कॉन्सेप्ट सजीवजी का है, मैने तो बस उनके इस कॉन्सेप्ट को अंजाम दिया है। एक बात जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के श्रोताओं को शायद ही मालूम हो कि जितने भी गाने आप इसमें सुनते हैं वे सभी सजीवजी के ही चुने हुए होते हैं। एक बार गीतों की लिस्ट मेरे हाथ लगी कि मैं अपना काम शुरु कर देता हूँ उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारियाँ इकट्ठा करने में। कभी कभी बहुत अच्छी बातें हाथ लगती हैं, और कभी कभी थोड़े में ही गुज़ारा करना पड़ता है। लेकिन जो भी है, मुझे बड़ा आनंद आता है इस सीरीज़ के लिए आलेख लिखने में। शायद इसी तरह का कुछ दबा हुआ था मेरे अंदर जो मैं हमेशा से करना चाहता था। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का मंच पाकर ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी उस पराधीन चाहत को आज़ाद कर दिया हो!

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड को बहुत पसंद किया जा रहा है. एक श्रोता ने हिंद युग्म को लिखा कि ओल्ड इस गोल्ड पर आकर वो अपने बीते दिनों को जैसे फिर से जी रहे हैं. कैसा लगता है जब इस तरह के फीडबैक मिलते हैं ?

सुजॉय - बहुत अच्छा लगता है जानकर कि श्रोताओं और पाठकों को यह शृंखला पसंद आ रही है। उससे भी ज़्यादा अच्छा तब लगता है जब लोग आलेख में छुपी हुई ग़लतियों को ढूंढ निकालते हैं। इतने मनयोग से लोगों को पढ़ते हुए देखकर लगता है कि जैसे मेरी मेहनत सफल हुई। यह शृंखला लोगों को अपने बीते दिनों को याद करवाने में सहायक का काम कर रही है जानकर बहुत ख़ुशी हुई। आगे भी ऐसा ही प्रयास रहेगा।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड से पहले से ही आप इन्टरनेट पर विविध भारती समुदाय के माध्यम से बहुत लोकप्रिय थे, कैसे कर पाते हैं इतने सारे कार्यक्रमों को आप अपने जेहन में कैद ?

सुजॉय - शुरु शुरु में 'रेडियो' सुनते हुए ही इन कार्यक्रमों में बोली जा रही ज़रूरी बातों को 'शौर्ट हैंड' की तरह नोट कर लेता था, और फिर बाद में आलेख की शक्ल में लिख लेता था। बाद में जब मेरी 'मोबाइल फ़ोन' की पदोन्नती हुई तो उसमें रिकार्ड करने की क्षमता भी उत्पन्न हुई और तब से इन कार्यक्रमों को उस पर रिकार्ड करके बाद मे लिख लेता हूँ। इसे मेरी हॉबी ही समझिये या पागलपन! शायद ही दुनिया में कोई और इस तरह से रेडियो से रिकार्ड कर कम्प्युटर पर टाइप करता होगा!

हिंद युग्म - और फिर पूरे के पूरे कार्यक्रम को टाइप करना, क्या इन सब में बहुत समय नहीं लगता. ?

सुजॉय - समय तो लगता ही है, आख़िर मेरे भी दो हाथ हैं, और फिर औफ़िस भी जाता हूँ, खाना भी पकाता हूँ। मेरा ऐसा विचार है कि अगर आप किसी काम को शौकिया तौर पर करना चाहें तो आप उसके लिए अपनी व्यस्तता के बावजूद समय निकाल सकते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड में गीतों की प्रस्तुति में आपका विविध भारती का अनुभव कितना काम आता है ?

सुजॉय - बहुत ज़्यादा! बचपन से ही विविध भारती के अलग अलग कार्यक्रम और आकाशवाणी गुवाहाटी से प्रसारित होनेवाली फ़िल्म संगीत पर आधारित 'सैनिक भाइयों का कार्यक्रम' सुनते हुए ही बड़ा हुआ हूँ। लेकिन मैने अपनी तरफ़ से जो अच्छा काम किया वह यह था कि इन कार्यक्रमों को सुनने के साथ साथ इनमें दी जा रही जानकारियों को भी मैं अपनी डायरी में और बाद में अपने कम्प्युटर में संग्रहित करता चला गया। और अब हाल यह है कि ६०० से ज़्यादा रेडियो कार्यक्रमों का आलेख मेरे इस ख़ज़ाने मे क़ैद हो चुका है, जिनका मैं भरपूर इस्तेमाल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिना कंजूसी के कर रहा हूँ। उस वक्त मुझे यह पता भी नहीं था कि एक दिन इन सब का इस्तेमाल यूँ किया जाएगा। मेहनत से किया गया कोई भी काम कभी बेकार नहीं जाता, यह अब मैं मान गया हूँ।

हिंद युग्म - हर गीत की प्रस्तुति से पहले क्या तैयारियां करते हैं ?

सुजॉय - सबसे पहले तो दो चार दिन तक गीतों को मन ही मन मंथन करता हूँ, और उठते बैठते सोते जागते यह सोचता रहता हूँ कि फ़लाना गीत की क्या खासियत है। फिर उसके बाद 'रेडियो' प्रोग्रामों की लिस्ट पे नज़र दौड़ाता हूँ कि कहीं कुछ जानकारियाँ पहले से ही मेरे पास उपलब्ध है या नहीं। फिर उसके बाद इंटर्नेट पर जितना हो सके सर्च करता हूँ, और सारी बातों को आलेख की शक्ल में लिख डालता हूँ। यूँ समझ लीजिए कि १० गीतों का आलेख लिखने के लिए ७ से १० दिन लग ही जाते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड के शतक पूरे करने की एक बार फिर बधाई. आप यूहीं अच्छे अच्छे गीत हम सभी को सुनाते रहें. हिंद युग्म को उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि आप इस खोज और आलेख प्रस्तुतीकरण का भरपूर आनंद ले पा रहे हैं. जारी रहे ये सफ़र...सब श्रोताओं की तरफ से शुभकामनायें स्वीकार करें.

सुजॉय - बहुत धन्यवाद! वैसे शुक्रिया मुझे हिंद युग्म का अदा करनी चाहिए मुझे यह मंच देने के लिए। जो काम मैं हमेशा से करना चाहता था और नहीं कर पा रहा था, हिंद युग्म ने मुझे वह काम करने का मौका दिया, इससे ज़्यादा और मैं हिंद युग्म से क्या माँग सकता हूँ। चलते चलते वही लाइन फिर से कहूँगा जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की हीरक जयंती अंक मे मैने कहा था कि "तुम अगर साथ देने का वादा करो, हम यूँही मस्त नग़में लुटाते रहें"। बहुत धन्यवाद!

ओल्ड इस गोल्ड के श्रोताओं में कुछ ऐसे नाम भी हैं जिन्होंने इस शृंखला के विषय में मीडिया के माध्यम से जानकारी देकर संगीत प्रेमियों को इससे जुड़ने के लिए प्रेरित किया है, मशहूर ब्लॉग "मोहल्ला" के संचालक अविनाश जी भी इन्हीं में से एक हैं जिन पर सुजॉय का जादू जम कर चला है. तभी तो मशहूर साहित्यिक पत्रिका "कथादेश" में उन्होंने अपने "ओल्ड इस गोल्ड" अनुभव को कुछ यूँ व्यक्त किया है. पढिये -

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Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



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