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Sunday, August 16, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और आपकी पसंद के गीत (13)

"है नाम ही काफी उनका और क्या कहें, कुछ लोग तआर्रुफ के मोहताज नहीं होते" गुलजार उन्ही चंद लोगों में से एक हैं जिन्हें किसी परिचय की जरुरत नहीं है. गुलज़ार एक ऐसा नाम है जो उत्कृष्ट और उम्दा साहित्य का पर्याय बन गया है. आज अगर कही भी गुलज़ार जी का नाम आता है लोगों को विश्वास होता है कि हमें कुछ बेहतरीन ही पढ़ने-सुनने को मिलेगा. आवाज हो या लेखन दोनों ही क्षेत्रों में गुलजार जी का कोई सानी नहीं. गुलजार लफ्जों को इस तरह बुन देते है कि वो आत्मा को छूते हैं. शायद इसीलिए वो बच्चों, युवाओं और बूढों में समान रूप से लोकप्रिय है. गुलज़ार जी का स्पर्श मात्र ही शब्दों में प्राण फूँक देता है और ऐसा लगता है जैसे शब्द किसी कठपुतली की तरह उनके इशारों पर नाचने लगे है. उनकी कल्पना की उडान इतनी अधिक है कि उनसे कुछ भी अछूता नहीं रहा है. वो हर नामुमकिन को हकीकत बना देते हैं. उनके कहने का अंदाज बिलकुल निराला है. वो श्रोता और पाठक को ऐसी दुनिया में ले जाते है जहां लगता ही नहीं कि वो कुछ कह रहे है ऐसा प्रतीत होता है जैसे सब कुछ हमारे आस-पास घटित हो रहा है. कभी-कभी सोचती हूँ, गुलजार जी कोई एक व्यक्ति नहीं वरन उनमें कई गुलज़ार समाये हुए हैं. उनके बारे में कुछ कहने में शब्द कम पड़ जाते है. गुलजार जी के शब्द और आवाज ही उनकी पहचान है. जिसके कान में भी एक बार गुलजार जी के लेखनी से निकले शब्द और आवाज पड़ते है वो उनके बारे में जानने के लिए बेचैन हो उठता है. जब गुलज़ार जी इतने श्रेष्ठ हैं तो जाहिर है उनके चाहने वाले भी ऐसे-वैसे नहीं होंगे. आइये अब में आपको गुलज़ार जी के ऐसे रसिया जी से मिलाती हूँ जिनका परिचय गुलज़ार जी से सबसे पहले उनके शब्दों द्वारा हुआ था. मैं बात कर रही हूँ हमारे साथी विश्व दीपक तनहा जी की, जो गुलज़ार जी द्वारा लिखे शब्दों के वशीभूत होकर ही गुलज़ार जी तक पहुचे थे. चलिए उनकी कहानी उन्हीं ही जुबानी जान लेते है. ....

"गुलजार जी से मेरी पहली पहचान फिजा फिल्म के गीतों से हुई. पहली बार इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उनके लिखे गीत तो मैंने पहले भी सुने थे लेकिन तब मैं उनके नाम से परिचित नहीं था. चूँकि आठवीं कक्षा से हीं मैने लिखना शुरू कर दिया था इसलिए शब्दों की अहमियत जानने लगा था। अच्छे शब्द पसंद आते थे। विविधभारती पर जो भी गाना सुनता, हर बार यही कोशिश रहती कि गाने का अर्थ जानूँ। ऐसा हीं कुछ हुआ जब मैने "फ़िज़ा" फिल्म गाना का "आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में" सुना, उदित नारायण और अल्का याज्ञिक की आवाज़ों के अलावा जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था शब्दों का प्रवाह। "चल रोक लें सूरज छिप जाएगा, पानी में गिर के बुझ जाएगा" - गीत के बोलों ने मुझे झकझोर दिया और मैं इसी सोच में रहने लगा की आखिर कोई इस तरह का कैसे सोच सकता है। इस गाने की कशिश मुझे सिनेमा हाल तक खींच ले गयी, इसी फिल्म के एक और गीत "मैं हवा हूँ फ़िज़ा हूँ जमीं की नहीं..... मैंने तिनके उठाए हुए हैं परों पे, आशियाना नहीं है मेरा....फ़िज़ा" ने मुझे अन्दर तक छू लिया. मुझे फिल्म के गीतकार के बारे में जानने की एक धुन लग गयी. फिल्म देखकर लौटने के बाद उसी शाम कैसेट की दुकान पर जाकर कैसेट कवर का मुआयना किया तो पता चला कि इन साहब के कई गाने तो मैंने पहले भी सुने हैं. धीरे-धीरे यादों की गलियों से "छैंया-छैंया", "दिल से" ," ऐ अजनबी", "सतरंगी रे", "चप्पा-चप्पा चरखा चले", "छोड़ आए हम वो गलियाँ" और भी न जाने कितने सारे गाने जो मेरे हमेशा से हीं खास रहे हैं की , मधुर गूँज सुनाई देने लगी । लेकिन तब इनके गीतकार का नाम मुझे नहीं पता था, लेकिन वो अजनबी आज अपना-सा लगने लगा था. फिर तो मैने गुलजार जी के लिखे पुराने गानों की तरफ़ रूख किया। गुलजार जी के प्रति मेरी जानकारी का दायरा तब और बड़ा जब १२वीं के बाद मैं पटना की गलियों में दाखिल हुआ । उस दौरान बंदिनी का "मोरा गोरा रंग लेई ले" सुना तो बड़ा हीं आश्चर्य लगा कि एक पंजाबी शायर( कवि या गीतकार भी कह सकते हैं) ब्रज भाषा के आसपास की किसी भाषा में भी इतना खूबसूरत लिख सकता है, फिर कहीं पढा कि यह गाना उनका पहला गाना है (हाल हीं में अंतर्जाल पर यह पढने को मिला था कि यह उनका पहला गाना नहीं है, लेकिन चूँकि ज्यादातर लोग इस गाने को हीं उनका पहला गाना मानते हैं इसलिए मेरी भी अब तक यही मान्यता है) । गुलज़ार जी के एक अन्य गीत "मेरा कुछ सामना तुम्हारे पास पड़ा है" से मुझे और बारीकियां जानने को मिली फिर क्या था मैं खुद को गुलज़ार जी का प्रशंसक बनने से रोक नहीं पाया। मानो मेरे गुलज़ार-प्रेम को पंख लग गए। इंटरनल लैन(LAN) पर सारे गाने और सारी जानकारियाँ आसानी से उपलब्ध हो जाने लगीं । फिर तो मैने उनके लिखे सारे हीं गानों को खंगाल डाला। (इस प्रेम का एक कारण यह भी था कि उसी दौरान मैने भी प्रेम के कुछ स्वाद चखे थे..... ) उसके आगे का क्या कहूँ, तब से उनके प्रति मेरी दीवानगी चलती हीं आ रही है। अब तो मैने उनको सुनने के साथ-साथ उनको पढना भी शुरू कर दिया है। "रात पश्मीने की", "पुखराज" , "मिर्ज़ा ग़ालिब" ये तीन किताबें अब तक मैने पढ ली हैं और बाकियों को अंतर्जाल पर पढता हीं रहता हूँ। लेकिन कोशिश यही है कि धीरे-धीरे उनकी सारी किताबें मेरे दराज में मौजूद हो जाएँ।
मुझे मालूम है कि "गुलज़ार" साहब की झोली में एक से बढकर एक कई सारे गाने हैं लेकिन चूँकि "आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में..... आजा माहिया" वह गीत है जिसने मुझे गुलज़ार-जगत से रूबरू कराया , इसलिए मैं आज के दिन उसी गाने को सुनना पसंद करूँगा
।"

देखा दोस्तों गुलज़ार जी की लेखनी का जादू विश्व दीपक जी क्या हम भी उस जादू से बंधे हैं. चलिए अब मैं भी आपकी पसंद पूरी करने वाली छडी घुमाती हूँ और सुनवाती हूँ आपका पसंदीदा गीत...

आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में



गुलजार जी की बात जहां हो वो महफिल उनके जिक्रभर से ही चमक उठती है. उनके लिए तो "कायनात में लफ्ज ही नहीं तारीफ ये भी तो कुछ कम ही है" यह बोल निकलते हैं. गुलज़ार जिस तरह से शब्दों से खेलते है वो कोई और नहीं कर सकता इसीलिए हर शख्स उनका मुरीद हो जाता है. गुलज़ार की लेखनी से घायल एक और दीवानी की बात करते हैं. ये हैं हमारी महफिल की साथी रंजना जी. रंजना जी गुलज़ार जी के प्रति कुछ इस तरह से अपने भावों को बयाँ करती है......

"इतने लोगो में ,कह दो आंखो को
इतना ऊँचा न ऐसे बोला करे
लोग मेरा नाम जान जाते हैं !!

अब इतने कम लफ्जों में इस से ज्यादा खूबसूरत बात गुलजार जी के अलावा कौन लिख सकता है. उन्होंने अपनी कही नज्मों में गीतों में ज़िंदगी के हर रंग को छुआ है . कुदरत के दिए हर रंग को इस बारीकी से अपनी कलम द्वारा कागज में उतारा है कि हर शख्स को वह सब अपना कहा और दिल के करीब लगता है. चाहे फिल्मों में हो या फिर साहित्य में, कुदरत से इतना जुडाव बहुत कम रचना कार कर पाये हैं.

गुलजार सादगी और अपनी ही भाषा में सरलता से हर बात कह देते हैं कि लगता है कोई अपनी ही बात कर रहा है. उनकी यह लेखन की सादगी जैसे रूह को छू लेती है ..गुलजार जी का सोचा और लिखा आम इंसान का लिखा- उनके द्वारा कही हुई सीधी सी बात भी आँखों में एक सपना बुन देता है ..जिस सहजता व सरलता से वे कहते हैं वो इन पंक्तियों में दिखाई देती है--—

‘बहुत बार सोचा यह सिंदूरी रोगन/जहाँ पे खड़ा हूँ/वहीं पे बिछा दूं/यह सूरज के ज़र्रे ज़मीं पर मिले तो/इक और आसमाँ इस ज़मीं पे बिछा दूँ/जहाँ पे मिले, वह जहाँ, जा रहा हूँ/मैं लाने वहीं आसमाँ जा रहा हूँ।’

उनके सभी गीत ज़िन्दगी से गहरे जुड़े हैं और हर गीत जैसे अपने ऊपर ही बात करता हुआ लगता है ...गुलज़ार जी के कहे लिखे गीत इस तरह से जहन में छाए रहते है कि जब कभी भी ज़िन्दगी की किसी मीठी भूली बिसरी बात का ज़िक्र होता है तो वह गीत बरबस याद आ जाता है ...इजाजत फिल्म का "मेरा कुछ समान तुम्हारे पास पड़ा है" का यह गीत यूँ लगता है जैसे ज़िन्दगी से ज़िन्दगी कुछ कहना चाहती है या अपना दिया कुछ उधार वापस चाहती है, जैसे कुछ कहीं फिर से छूट गया है और एक कसक तथा कुछ पाने की एक उम्मीद शब्दों में ढल जाती हैं . मैं इजाजत फिल्म का गीत मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पडा है सुनना चाहती हूँ.
"

सच ही तो है कि हर किसी का अंदाज-ए-बयां अलग होता है. आइये अब हम सुनते है गुलज़ार जी के एक अलग अंदाज को ...

भीगी मेहँदी की खुशबु वो झूठ मूठ के वादे ...बहुत कुछ कह जाता है यह गीत .."



गुलज़ार जी ने एक से बढ़कर एक गीत लिखे है और जन-जन के हृदय के तारों को छेड़ दिया है. उन्होंने फिल्मी गंगा को समृद्ध किया है. "खुशबू, आंधी, किनारा, देवता, घर, गोलमाल,ख़ूबसूरत, नमकीन, मासूम, इजाजत और लिबास" आदि फिल्मों में गुलज़ार जी के लेखन कौशल का जलवा देखने को मिलता है. उनका लेखन ही नहीं निर्देशन भी कमाल का है. गुलज़ार जी ने कई प्रसिद्द फिल्मों में पटकथा व संवाद भी लिखे है. उनके लेखन की धारा को बांधा नही जा सकता. वो एक स्वछंद पंछी कि तरह कल्पना के आकाश में उड़ान भरते रहते है. गुलज़ार जी की कल्पना के हजारों शिकार हुए है, इनमें एक नाम है हमारे साथी निखिल आनंद गिरी जी का. निखिल जी अपने आप को गुलज़ार जी के शब्दजाल में फंसा पाते है और लिखते है कि---

गुलजार के कई रूप हैं. कभी वो नीली हंसी, पीली हंसी वाले गुलज़ार हैं तो कभी फूलों को चड्डी पहनाने वाले गुलज़ार...सिर्फ गुलज़ार ही हैं जो कुछ भी कर सकते हैं.....उनके ज़ेहन में शब्दों की कुश्ती चलती है...वो किसी भी शब्द को कहीं भी फिट कर सकते हैं....चांद को छत पर टांग सकते हैं, उसे रोटी भी कह सकते हैं..... यू-ट्यूब पर उनके यूएस के किसी कवि सम्मेलन का जिक्र है.....'छोटी (या नई) बहू को सारी चीज़े क्लीशे(clieshed) लगती हैं....' इतना बेहतर गुलज़ार ही लिख सकते हैं और कोई नहीं....
इजाज़त फिल्म की नज़्म " मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, वो लौटा दो...." तो मेरी साँसों में दोड़ती है. वाह क्या कहने एकदम लाजवाब....."गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो," क्या कहा जाए इस पर... गुलजार जी कुछ कहने लायक ही नहीं छोड़ते है. हर पहलू को छूते हैं गुलज़ार

"सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली, सरहद पर कल रात, कुछ ख्वाबों का खून हुआ है.....आह....कितना सुन्दर .

वही गुलज़ार जब मस्ती में लिखते हैं तो कोई और लगते हैं.....आसमान को कूटते गुलज़ार......इश्क का नमक लगाते गुलज़ार......क्या-क्या चर्चा की जाए....अजी चर्चा क्या कई बार तो बहस भी हो जाती है गुलजार जी के लिए. साहित्यकार कमलेश्वरजी के नाती अनंत त्यागी मेरे साथ जामिया में थे.....अक्सर चर्चा होती कि गुलज़ार जी बेहतर या जावेद अख्तर.....वो हमेशा जावेद अख्तर जी पर अड़ जाते....बहस में कुछ निकलता तो नहीं मगर गुलज़ार के जी ढेरों गाना ताज़ा हो जाते....

गुलज़ार जी की रेंज इतनी ज़्यादा है कि बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को बराबर भाते हैं.....
बहरहाल, कौन-कौन से गाने पसंद है इसका गुलज़ारी जवाब यही हो सकता है कि मुझे गुलज़ार की छींक से खर्राटे तक सब कुछ पसंद है....आज मैं अपने दोस्त और मेरी पसंद का "शाम से आंख में नमी सी है..."गीत सुनना चाहता हूँ.


गुलज़ार जी के लेखन की बारीकियों को समझने के लिए बहुत ही गहरी सोच चाहिए. और गहन सोच के लिए जरुरी है कि हम गुलज़ार जी के लिखे गीतों को सुन उनकी गहराइयों में उतरें. तो सुनते है निखिल जी और उनके दोस्त की की ये ग़ज़ल -

"शाम से आँख में नमी सी है "



गुलजार जी के गीतों की फहरिस्त इतनी लम्बी है कि कभी ख़त्म ही न होगी. या यूँ कहें कि हम भी यही चाहते है कि यह सिलसिला इसी तरह चलता रहे. उनके लिखे ख़ास गीतों में से "आने वाला पल जाने वाला है, हजार राहें मुड़कर देखीं, तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूँ मैं, मेरा कुछ सामान तुमारे पास पडा है, यारा सिली-सिली विरहा कि रात का जलना, चल छैयां-छैयां- छैयां-छैयां, साथिया-साथिया तथा सबसे अधिक प्रसिद्द कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना" है. इन सभी गीतों के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरुस्कार मिला है जिसके वो सही मायनो में हकदार भी है. अभी तो गुलजार जी की कल्पना के कई और रंग देखने बांकी हैं. हम इश्वर से प्रार्थना करेंगे की गुलजार जी अपनी लेखनी का जादू इसी तरह बिखेरते रहे. वो चाँद को कुछ भी कहें, और रात को कोई भी नाम दे दें लेकिन उनके सभी चाहने वाले उनकी हर कल्पना में एक सुखद एहसास की अनुभूति करते है और करते रहेंगे.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Tuesday, August 5, 2008

मैं इस जमीं पे भटकता रहा हूँ सदियों तक...गुलजार

जब रंजना भाटिया "रंजू" ,रूबरू हुई गुलज़ार की कलम के तिलिस्म से ...

मैं जब छांव छांव चला था अपना बदन बचा कर
कि रूह को एक खूबसूरत जिस्म दे दूँ
न कोई सिलवट .न दाग कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाएं
न जख्म छुए, न दर्द पहुंचे
बस एक कोरी कंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ, रूह को मैं

मगर तपी जब दोपहर दर्दों की, दर्द की धूप से
जो गुजरा
तो रूह को छांव मिल गई है .

अजीब है दर्द और तस्कीं [शान्ति ] का साँझा रिश्ता
मिलेगी छांव तो बस कहीं धूप में मिलेगी ...


जिस शख्स को शान्ति तुष्टि भी धूप में नज़र आती है उसकी लिखी एक एक पंक्ति, एक एक लफ्ज़ के, साए से हो कर जब दिल गुजरता है, तो यकीनन् इस शख्स से प्यार करने लगता है सुबह की ताजगी हो, रात की चांदनी हो, सांझ की झुरमुट हो या सूरज का ताप, उन्हें खूबसूरती से अपने लफ्जों में पिरो कर किसी भी रंग में रंगने का हुनर तो बस गुलजार साहब को ही आता है। मुहावरों के नये प्रयोग अपने आप खुलने लगते हैं उनकी कलम से। बात चाहे रस की हो या गंध की, उनके पास जा कर सभी अपना वजूद भूल कर उनके हो जाते हैं और उनकी लेखनी में रचबस जाते है। यादों और सच को वे एक नया रूप दे देते है। उदासी की बात चलती है तो बीहड़ों में उतर जाते हैं, बर्फीली पहाडियों में रम जाते हैं। रिश्तों की बात हो वे जुलाहे से भी साझा हो जाते हैं। दिल में उठने वाले तूफान, आवेग, सुख, दुख, इच्छाएं, अनुभूतियां सब उनकी लेखनी से चल कर ऐसे आ जाते हैं जैसे कि वे हमारे पास की ही बातें हो।


तुम्हारे गम की डली उठा कर
जुबान पर रख ली हैं मैंने
वह कतरा कतरा पिघल रही है
मैं कतरा कतरा ही जी रहा हूँ
पिघल पिघल कर गले से उतरेगी ,आखरी बूंद दर्द की जब
मैं साँस की आखरी गिरह को भी खोल दूंगा ----

जब हम गुलजार साहब के गाने सुनते हैं तो .एहसास होता है की यह तो हमारे आस पास के लफ्ज़ हैं पर अक्सर कई गीतों में गुलज़ार साब ने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो श्रोता को चकित कर देते हैं.जैसे की उन्होने कोई जाल बुना हो और हम उसमें बहुत आसानी से फँस जाते हैं. दो अलग अलग शब्द जिनका साउंड बिल्कुल एक तरह होता है और वो प्रयोग भी इस तरह किए जा सकते हैं की कुछ अच्छा ही अर्थ निकले गीत का...गुलज़ार साब ने अक्सर ही ऐसा किया है.इसे हम गुलज़ार का तिलिस्म भी कह सकते हैं.

मरासिम एलबम की एक ग़ज़ल है -

“हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते.....”

इस ग़ज़ल में एक शेर है-
“शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिए दिल नहीं थोड़ा करते”


कितना आसान है दूसरे मिसरे में थोड़ा को तोड़ा सुन लेना.और उसका मतलब भी बिल्कुल सटीक बैठता है. मगर यही जादू है गुलज़ार साब की कलम का. साउंड का कमाल.

आर डी बर्मन और गुलजार की जोड़ी के कमाल को कौन नही जानता..."मेरा कुछ सामान..." गाना जब गुलज़ार ने RD के सामने रखा तो पढ़कर बोले - अच्छे संवाद हैं...पर गुलज़ार जानते थे कि RD को किस तरह समझाना है कि ये संवाद नही बल्कि गीत है जिसे वो स्वरबद्ध करना चाहता थे अपनी नई फ़िल्म "इजाज़त" के लिए, लगभग दो महीने बाद मौका देखकर उन्होंने इसी गीत को फ़िर रखा RD के सामने और इस बार आशा जी भी साथ थी, बर्मन साब कहने लगे "भाई एक दिन तुम अखबार की ख़बर उठा लाओगे और कहोगे कि लो इसे कम्पोज करो..." पर तभी आशा जी ने गीत के बोल पढ़े और कुछ गुनगुनाने लगी, बस RD को गाने का मर्म मिल गया और एक कालजयी गीत बना. गुलज़ार और आशा दोनों ने इस गीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता. (जाने पंचम दा कैसे पीछे छूट गए)..एक सौ सोलह चाँद की रातें...एक तुम्हारे कांधे का तिल....वाह क्या बात है....गुलज़ार साब की.

जरा याद कीजिये घर का वह गाना ..."आप की आँखों में" ..इस से ज्यादा रोमांटिक गाना मेरे ख्याल से कोई नही हो सकता है इस में गाये किशोर दा की वह पंक्ति जैसे दिल की तारों को हिला देती है .."लब खिले तो मोंगरे के फूल खिलते हैं कहीं ..." और फ़िर लो पिच पर यह "आपकी आंखों में क्या साहिल भी मिलते हैं कहीं .....आपकी खामोशियाँ भी आपकी आवाज़ है ..." और लता जी की एक मधुर सी हलकी हँसी के साथ "आपकी बदमाशियों के यह नए अंदाज़ है ...".का कहना जो जादू जगा देता है वह कमाल सिर्फ़ गुलजार ही कर सकते हैं अपने लफ्जों से .....

ज़िंदगी के हर रंग को छुआ है उन्होंने अपनी कही नज्मों में, गीतों में ...कुदरत के दिए हर रंग को उन्होंने इस तरह अपनी कलम से कागज में उतारा है, जो हर किसी को अपना और दिल के करीब लगता है, इतना कुदरत से जुडाव बहुत कम रचना कार कर पाये हैं, फिल्मों में भी, और साहित्य में भी .

मैं कायनात में ,सय्यारों में भटकता था
धुएँ में धूल में उलझी हुई किरण की तरह
मैं इस जमीं पे भटकता रहा हूँ सदियों तक
गिरा है वक्त से कट कर जो लम्हा .उसकी तरह
वतन मिला तो गली के लिए भटकता रहा
गली में घर का निशाँ तलाश करता रहा बरसों
तुम्हारी रूह में अब ,जिस्म में भटकता हूँ

लबों से चूम लो आंखो से थाम लो मुझको
तुम्हारी कोख से जनमू तो फ़िर पनाह मिले ..

फ़िर मिलूंगी आपसे दोस्तों, गुलज़ार साहब के कुछ और अहसास लेकर तब तक आनंद लें उनके लिखे इस लाजवाब गीत का, संगीत इलयाराजा का है.



- रंजना भाटिया
( हिंद युग्म )

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