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Sunday, February 1, 2015

धमार के रंग : राग केदार के संग : SWARGOSHTHI – 205 : DHAMAR



स्वरगोष्ठी – 205 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 3

‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की तीसरी कड़ी मे मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद बन्दिश के विषय में चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के अन्तर्गत धमार गीत पर चर्चा करेंगे और सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक राग केदार का एक रसपूर्ण धमार प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा पार्श्वगायक मन्ना डे का गाया एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद अंग की गायकी में निबद्ध गीतों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। निबद्ध गीतों के विषयवस्तु में ईश्वर की उपासना, साकार और निराकार, दोनों प्रकार से की गई है। इसके अलावा ध्रुपद गीतों में आश्रयदाता राजाओं और बादशाहों की प्रशस्ति, पौराणिक आख्यान, प्रकृति चित्रण और विविध पर्वों और सामाजिक उत्सवों का उल्लेख भी खूब मिलता है। सुप्रसिद्ध संगीत चिन्तक और दार्शनिक ठाकुर जयदेव सिंह ने ‘भारतीय संगीत के इतिहास’ विषयक पुस्तक में यह भी उल्लेख किया है कि सोलहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक तक ध्रुपद गीतों के साथ नृत्य और अभिनय का चलन भी था। इस उल्लेख का सीधा सा अर्थ है कि उस काल में ध्रुपद शैली लोकजीवन से गहराई तक जुड़ी हुई थी। ध्रुपद शैली के अन्तर्गत ही गीत का एक प्रकार है, जिसे आज हम ‘धमार’ के नाम से जानते हैं। धमार नाम का उल्लेख ‘संगीत शिरोमणि’ में मिलता है। इस ग्रन्थ में ‘धम्माली’ नाम का उल्लेख है। धमाल, धम्माल अथवा धम्माली शब्द से उल्लास से परिपूर्ण नृत्य का स्पष्ट आभास होता है। इस गीत शैली के साहित्य में आज भी होली पर्व के उमंग और उल्लास की अभिव्यक्ति की जाती है। लोक शैली का स्पर्श होने और पर्व विशेष के परिवेश का यथार्थ चित्रण होने के कारण ‘धमार’ या ‘धमाल’ नामकरण इस गीत शैली के लिए सार्थक है। ब्रज के गोप-गोपिकाओं के साथ कृष्ण के होली खेलने का प्रसंग धमार गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। यह गीत शैली चौदह मात्रा के ताल में गायी जाती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला १४ मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली और फाल्गुनी परिवेश का चित्रण होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको चर्चित युगल गायक रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा राग केदार में प्रस्तुत धमार सुनवा रहे हैं। पखावज पर अखिलेश गुण्डेचा ने धमार ताल में संगति की है। हमारे अनुरोध पर ‘स्वरगोष्ठी’ के श्रोताओं के लिए गुण्डेचा बन्धुओं ने इस धमार गीत को स्वयं हमे उपलब्ध कराया है।


धमार राग केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा




धमार गीतों में उपज का काम अधिक होता है। यह लय-प्रधान शैली है। इसके विपरीत ध्रुपद बन्दिश की गायकी ध्रुपद बन्दिश में गम्भीरता होती है, जबकि धमार गायकी में चंचलता होती है। पिछले अंक में हमने आपको 1943 की फिल्म ‘तानसेन’ में शामिल किये गए एक प्राचीन ध्रुपद का गायन प्रसिद्ध गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वर मे सुनवाया था। तानसेन के गुरु और प्रसिद्ध सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास की यह रचना 1962 में बनी फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में भी शामिल किया गया था। दोनों फिल्मों के इस गीत का स्थायी तो समान है, किन्तु अन्तरे के शब्दों में थोड़ा परिवर्तन किया गया है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के संगीतकार थे एस.एन. त्रिपाठी और यह गीत पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में है। फिल्म का यह ध्रुपद गीत राग यमन कल्याण की अनुभूति कराता है। आप इस फिल्मी ध्रुपद गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ध्रुपद राग यमन कल्याण : “सप्तसुरन तीन ग्राम...’ : मन्ना डे : फिल्म – संगीत सम्राट तानसेन






संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 205वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – यह कौन सा वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

2 – संगीत वाद्य पर यह कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 
 


आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 207वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 203वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक ध्रुपद बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भूपाली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सूल ताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला पहले हिस्से में हम ध्रुपद शैली का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, May 11, 2014

एक समृद्ध तंत्रवाद्य सुरबहार


स्वरगोष्ठी – 167 में आज


संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 5


तंत्रवाद्य सुरबहार से उपजते गम्भीर और गमकयुक्त सुरों की बहार

 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की पाँचवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने सहयोगी सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे स्वरवाद्य की चर्चा करेंगे जिसका प्रचलन अब लगभग नहीं के बराबर हो रहा है। आज के सर्वाधिक प्रचलित तंत्रवाद्य सितार से विकसित होकर बना ‘सुरबहार’ वाद्य अब लगभग अप्रचलित सा होकर रह गया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के हमारे साथी लेखक और सहयोगी सुमित चक्रवर्ती लुप्तप्राय तंत्रवाद्य सुरबहार पर चर्चा कर रहे हैं। 
 



उस्ताद इमरत खाँ 
‘परिवर्तन संसार का नियम है’- इस उक्ति को प्रायः हम सब सुनते हैं और प्रयोग भी करते रहते हैं। इस सृष्टि में शायद ही कोई ऐसी रचना हो जिसमें कभी परिवर्तन न आया हो। हमारे आदिकालीन भारतीय संगीत में समय-समय पर कई प्रकार के परिवर्तन होते रहे हैं। संगीत के गायन पक्ष के साथ-साथ वाद्य संगीत भी कई प्रकार के परिवर्तनों से होकर ग़ुज़रता रहा है। वैदिक काल के अनेक तंत्रवाद्य विकसित होकर आज भी प्रचलित हैं। सुरबहार की तंत्रवाद्य श्रेणी के अन्तर्गत गणना की जाती है। वर्तमान में बेहद लोकप्रिय तंत्रवाद्य सितार स्वयं इम्प्रोवाइज़ किया हुआ वाद्य है। परन्तु सितार को भी इम्प्रोवाइज़ कर सुरबहार नामक वाद्य की रचना की गई थी। यूँ तो माना जाता है कि सुरबहार वाद्य का विकास 1825 में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद इमदाद खाँ के पिता उस्ताद साहेबदाद ख़ाँ ने की थी। परन्तु कई जगहों पर इसके सर्जक के रूप में लखनऊ के सितार वादक उस्ताद ग़ुलाम मुहम्मद का भी उल्लेख पाया जाता है। सुरबहार के तारों पर आघात कर इसे बजाया जाता है। सितार की तरह इसमें स्वरों के परदे होते हैं। इस वाद्य की ऊँचाई लगभग 130 सेंटीमीटर होती है। इसमें चार तार स्वर के, चार तार चिकारी के और 15 से 17 तक अनुकम्पी स्वरों के तार लगाए जाते हैं। इसे धातु के तार से बने शंक्वाकार मिज़राब से बजाया जाता है। वादक अपने दाहिने हाँथ की तर्जनी उँगली में मिज़राब पहन कर सुरबहार के तारों को झंकृत करते हैं। सुरबहार तथा सितार में मूल अन्तर यह है कि सुरबहार को नीचे के नोट्स पर बजाया जाता है। इसी कारण इसे 'बेस सितार' (Bass Sitar) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सितार के मुक़ाबले इसका तल भाग थोड़ा चपटा होता है तथा इसके तार भी सितार से भिन्न थोड़े मोटे होते हैं। अपनी इसी बनावट के कारण इससे निकलने वाली ध्वनि गमक से युक्त होती है। सुरबहार की रचना के पीछे मूल उद्देश्य था- पारम्परिक रुद्रवीणा वाद्य के सर्वथा अनुकूल ध्रुपद शैली में आलाप को प्रस्तुत करना। इस वाद्य पर ध्रुपद अंग में आलाप, जोड़ और झाला का वादन अत्यन्त भावपूर्ण अनुभूति कराता है। कुशल वादक पहले सुरबहार पर आलाप, जोड़ और झाला वादन करते हैं, फिर गत बजाने के लिए सितार वाद्य का प्रयोग करते हैं। आइए, अब हम आपको इमदादखानी घराने के सुरबहार और सितार के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद इमरत खाँ का सुरबहार पर बजाया राग यमन कल्याण में आलाप, जोड़ और झाला सुनवाते है।


सुर बहार वादन : राग - यमन कल्याण : आलाप, जोड़ और झाला : उस्ताद इमरत खाँ




पण्डित शिवमाथ मिश्र और देवव्रत मिश्र 
उस्ताद इमरत खान सुरबहार और सितार के विश्वविख्यात वादक हैं। खाँ साहब इमदादखानी अर्थात इटावा घराने का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ इनके बड़े भाई थे। इमरत खाँ ने अनेक वर्षों तक अपने अग्रज के साथ युगल वादन भी किया है। इनके पिता उस्ताद इनायत खाँ (1894-1938) और दादा उस्ताद इमदाद खाँ (1848-1920) ने सुरबहार वादन की विकसित परम्परा को स्थापित किया था। मैहर घराने के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री और पण्डित रविशंकर की पहली पत्नी विदुषी अन्नपूर्णा देवी भी सुरबहार की कुशल कलासाधिका रही हैं। सेनिया घराने के उस्ताद मुश्ताक खाँ को सुरबहार पर ध्रुपद अंग के उत्कृष्ट वादक के रूप में ख्याति मिली थी। उनका सुरबहार वादन सुनने वालों को लगभग रुद्रवीणा जैसे स्वरों की अनुभूति कराती थी। पिछली आधी शताब्दी में कुछ गुणी कलासाधकों ने सुरबहार को अपनाया और बेहतर प्रयोग किये। संगीतज्ञों ने इस वाद्य को दो शैलियों में बजाया, एक तो पारम्परिक ध्रुपद अंग से और दूसरा, गतकारी अंग से। दुर्भाग्यवश कई कारणों से सुरबहार अन्य तंत्रवाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। शायद इसका सबसे प्रमुख कारण है, इसकी विशाल बनावट, जिसके कारण इसे सम्भालने में और यातायात में असुविधा होती है। अब हम आपको सुरबहार पर ध्रुपद अंग की एक तालबद्ध रचना सुनवाते हैं, जो युगलवादन रूप में प्रस्तुत किया गया है। उत्तर भारतीय संगीत का एक प्रमुख केन्द्र वाराणसी भी है। यहाँ भी तंत्रवाद्य की समृद्ध परम्परा रही है। वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व संगीत विभागाध्यक्ष पण्डित शिवनाथ मिश्र और उनके प्रतिभावान सुपुत्र देवव्रत मिश्र ने युगल रूप में सुरबहार वादन प्रस्तुत किया है। आप सुरबहार पर राग जैजैवन्ती, धमार ताल में सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


युगल सुर बहार वादन : राग – जैजैवन्ती : धमार ताल में गत : पण्डित शिवनाथ मिश्र और देवव्रत मिश्र





आज की पहेली


स्वरगोष्ठी’ के 167वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको लगभग छः दशक पुराने एक फिल्मी गीत में बजाए गए लोकवाद्य वादन का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस स्वरवाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस फिल्म के गीत का अंश है? फिल्म का नाम हमें लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 169वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 165वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको लोक-ताल-वाद्य नक्कारा वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- नक्कारा अथवा नगाड़ा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- आठ मात्रा का कहरवा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’के मंच पर जारी श्रृंखला ‘संगीत वाद्य परिचय’ के अन्तर्गत आज हमने आपका परिचय एक कम प्रचलित तंत्र वाद्य सुरबहार से कराया। अगले अंक में हम आपसे एक लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 




शोध एवं आलेख : सुमित चक्रवर्ती 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
  

Wednesday, January 29, 2014

‘बाँसुरी बाज रही धुन मधुर...’ : रागमाला गीत – 3


प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट





रागों के रंग, रागमाला गीत के संग – 3




राग रामकली, तोड़ी, शुद्ध सारंग, भीमपलासी, यमन कल्याण, मालकौंस और भैरवी के इन्द्रधनुषी रंग


‘बाँसुरी बाज रही धुन मधुर...’

शिष्याओं को संगीत की तालीम देते उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ


फिल्म : उमराव जान (1981)

गायक : उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ, शाहिदा खाँ और रूना प्रसाद

संगीतकार : ख़ैयाम

आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन





आपको यह प्रस्तुति कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रिया और अपने सुझाव हमें radioplaybackindia@live.com पर भेजें।  




Wednesday, January 15, 2014

रागमाला गीत – 1 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



 


प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 1


राग बहार, बागेश्री, यमन कल्याण, केदार, भैरव और मेघ मल्हार के रंग बिखेरता रागमाला गीत

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’


फिल्म : संगीत सम्राट तानसेन 
संगीतकार : एस.एन. त्रिपाठी 
गायक : पूर्णिमा सेठ, पंढारीनाथ कोल्हापुरे और मन्ना डे

आलेख : कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन







Sunday, April 7, 2013

एक गीत और सात रागों की इन्द्रधनुषी छटा



स्वरगोष्ठी – 115 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 3

राग रामकली, तोड़ी, शुद्ध सारंग, भीमपलासी, यमन कल्याण, मालकौंस और भैरवी के इन्द्रधनुषी रंग



दो सप्ताह के अन्तराल के बाद लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग, रागमाला गीत के संग’ की तीसरी कड़ी लेकर मैं, कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। इस लघु श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम जो रागमाला गीत प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे हमने 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ से लिया है। भारतीय फिल्मों में शामिल रागमाला गीतों में यह उच्चस्तर का गीत है, जिसमें क्रमशः राग रामकली, तोड़ी, शुद्ध सारंग, भीमपलासी, यमन कल्याण, मालकौंस और भैरवी का समिश्रण किया गया है। वास्तव में फिल्म का यह रागमाला गीत इन रागों की पारम्परिक बन्दिशों की स्थायी पंक्तियों का मोहक संकलन है। गीत में रागों का क्रम प्रहर के क्रमानुसार है। 
 

भारतीय संगीत की परम्परा में जब किसी एक गीत में कई रागों का क्रमशः प्रयोग हो और सभी राग अपने स्वतंत्र अस्तित्व में उपस्थित हों तो उस रचना को रागमाला कहते हैं। रागमाला की परम्परा के विषय में संगीत के ग्रन्थों में कोई विवरण नहीं मिलता। ऐसा प्रतीत होता है कि जब संगीत की आमद दरबारों में हुई होगी, उसी समय से इसका चलन हुआ होगा। अपने आश्रयदाता को राग परिवर्तन के चमत्कार से प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार के प्रयोग किये जाते रहे होंगे। आज भी संगीत सभाओं में इस प्रकार के प्रयोग श्रोताओं को मुग्ध अवश्य करते हैं। फिल्म संगीत के क्षेत्र में भी रागमाला गीतों के कई आकर्षक प्रयोग किये गए हैं। ऐसे ही कुछ चुने हुए रागमाला गीत हम लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग, रागमाला गीत के संग’ के अन्तर्गत प्रस्तुत कर रहे हैं। आज का रागमाला गीत हमने 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ से लिया है।

संगीतकार ख़ैयाम
सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार मुजफ्फर अली ने 1981 में उन्नीसवीं शताब्दी के अवध की संस्कृति पर एक पुरस्कृत और प्रशंसित फिल्म ‘उमराव जान’ का निर्माण किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में अवध के नवाब के संरक्षण में शास्त्रीय संगीत और नृत्य विकासशील अवस्था में था। फिल्म ‘उमराव जान’ इसी काल की मशहूर गायिका, नृत्यांगना और शायरा उमराव जान पर केन्द्रित है। जिस रागमाला गीत का ज़िक्र हम करने जा रहे हैं वह बालिका उमराव की संगीत-शिक्षा के प्रसंग से जुड़ा हुआ है। उस्ताद (भारतभूषण) 10-11 वर्ष आयु की उमराव को गण्डा बाँध कर सूर्योदय के राग से संगीत-शिक्षा आरम्भ करते हैं। चढ़ते प्रहर के क्रम से राग बदलते रहते हैं और उमराव की आयु भी विकसित होती जाती है। गीत के अन्तिम राग भैरवी के दौरान बालिका उमराव, वयस्क उमराव जान (रेखा) संगीत-नृत्य में प्रवीण हो जाती है। फिल्म में संगीत-शिक्षक के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ ने तथा शिष्याओ के लिए शाहिदा खाँ और रूना प्रसाद ने पार्श्वगायन किया है। फिल्म के संगीतकार ख़ैयाम हैं।

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ
फिल्म ‘उमराव जान’ के इस रागमाला गीत का आरम्भ प्रातःकाल के राग रामकली की एक बन्दिश- ‘प्रथम धर ध्यान दिनेश...’ से होता है। प्रथम प्रहर के बाद उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ अपनी शिष्याओं को द्वितीय प्रहर के राग तोड़ी- ‘अब मोरी नैया पार करो तुम...’ और उसके बाद तीसरे प्रहर के राग शुद्ध सारंग की बन्दिश का स्थायी- ‘सगुन विचारो बम्हना...’ का गायन सिखाते हैं। इन शिष्याओं को गायन के साथ-साथ नृत्य का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। चौथे प्रहर के राग भीमपलासी में निबद्ध एक होली रचना- ‘बिरज में धूम मचायो कान्हा...’ रागमाला गीत की अगली प्रस्तुति है। पाँचवें प्रहर के राग यमन कल्याण में पगी रचना- ‘दरशन दो शंकर महादेव...’ की प्रस्तुति के दौरान उमराव बालिका से वयस्क (रेखा) हो जाती है। इस रचना के दौरान उमराव को नृत्य का अभ्यास करते भी दिखाया गया है। राग मालकौंस मध्यरात्रि का राग है, जिसमें निबद्ध रचना- ‘पकरत बैयाँ मोरी बनवारी...’ इस गीत की अगली राग-प्रस्तुति है। अन्त में राग भैरवी की एक बन्दिश- ‘बाँसुरी बाज रही धुन मधुर...’ से इस रागमाला गीत को विराम दिया गया है। अब आप सात रागों से युक्त इस रागमाला गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।



रागमाला गीत : फिल्म उमराव जान : उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ, शाहिदा खाँ और रूना प्रसाद



आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 115वीं संगीत पहेली में हम आपको एक ऋतु विशेष के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस संगीत शैली का नाम क्या है?

2 – गीत के संगीतकार का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 117वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 113वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में राग सोहनी के एक द्रुत खयाल का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित कुमार गन्धर्व। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, मिनिसोटा (अमेरिका) से दिनेश कृष्णजोइस, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ के इस अंक में हमने आपको एक ऐसा गीत सुनवाया, जिसमे सात भिन्न रागों की बन्दिशों का मेल था। अगले अंक में हम रागमाला गीतों की इस श्रृंखला को एक बार फिर विराम देंगे और आपके साथ ऋतु के अनुकूल एक संगीत शैली के गीतों पर चर्चा करेंगे। यह एक ऐसी विधा है जिसका प्रयोग लोक और उप-शास्त्रीय, दोनों रूप में किया जाता है। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, March 10, 2013

रागमाला के रंग एस एन त्रिपाठी के सुरों के संग



स्वरगोष्ठी – 111 में आज

रागमाला – 1

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी जन्मशती पूर्णता पर विशेष



‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला- ‘रागमाला’ के नए अंक के साथ आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। इस लघु श्रृंखला के लिए हमें अनेक संगीत-प्रेमियों के, विशेष रूप से संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों की कई फरमाइशें प्राप्त हुई हैं। कुछ संगीत-प्रेमियों ने तो रागमाला के कुछ अपनी पसन्द के गीत भी भेजे हैं। उन सभी संगीत-प्रेमियों के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए हम यह आश्वासन देते हैं कि इस श्रृंखला में हम इन्हें उनके नाम के साथ प्रकाशित/प्रसारित करेंगे। श्रृंखला का आज के पहले अंक का रागमाला गीत लखनऊ के चार संगीत के विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने उपलब्ध कराया है और रागमाला श्रृंखला में शामिल करने का अनुरोध किया है। इनके अनुरोध पर आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का बेहद चर्चित रागमाला गीत।


फिल्म संगीत में मेलोडी से परिपूर्ण और राग आधारित गीतों की दृष्टि से पाँचवें दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर सातवें दशक के पूर्वार्द्ध की अवधि महत्त्वपूर्ण है। इस अवधि में हजारों मधुर और कालजयी गीतों की रचना हुई। इसी अवधि में एक सफल संगीतकार के रूप में श्रीनाथ त्रिपाठी (एस.एन. त्रिपाठी) का नाम तेजी से उभरा। ऐतिहासिक और और पौराणिक फिल्मों के सर्वाधिक सफल संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने फिल्मों में संगीतकार के अलावा अभिनेता, निर्माता और निर्देशक के रूप में भी अपना योगदान किया था। 14 मार्च, 1913 को कला और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी (वाराणसी) में जन्मे श्री त्रिपाठी का जन्मशती वर्ष आज से तीन दिन बाद ही पूर्ण हो रहा है। इस महान संगीतकार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से स्वरांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से ही हमने आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में उन्हीं का स्वरबद्ध किया गीत चुना है। एस.एन. त्रिपाठी के फिल्म जगत में प्रवेश के प्रसंग का उल्लेख फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने अपनी पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ में करते हुए लिखते हैं- “जीवन नैया’ में श्रीनाथ त्रिपाठी (जो बाद में एस.एन. त्रिपाठी के नाम से मशहूर संगीतकार हुए) को पहला मौका मिला गायक के रूप में। उन्होंने इस फ़िल्म में अभिनय भी किया और “ए री दैया लचक लचक चलत मोहन आवे, मन भावे...” गीत गाया। त्रिपाठी ने इलाहाबाद से बी.एससी की डिग्री पूरी करने के बाद मॉरिस म्यूजिक कॉलेज, लखनऊ (वर्तमान, भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। लखनऊ की ही मैना देवी से उन्होंने उपशास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत की तालीम भी ली थी। मॉरिस कॉलेज से ‘संगीत विशारद’ और प्रयाग संगीत समीति से ‘संगीत प्रवीण’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद त्रिपाठी बॉम्बे टॉकीज़ में वायलिन वादक के रूप में सरस्वती देवी के ऑरकेस्ट्रा में भर्ती हो गए और 1938 तक यहाँ रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी स्वतंत्र संगीतकार की पारी शुरु की”। स्वतंत्र संगीत-निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म ‘चन्दन’ (1939) थी। लघु श्रृंखला ‘रागमाला’ के आज पहले अंक के लिए हमने एस.एन. त्रिपाठी के संगीत-निर्देशन में 1962 में बनी संगीत प्रधान फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का एक गीत चुना है।

शीर्षक के अनुरूप यह फिल्म संगीत सम्राट की उपाधि से अलंकृत तानसेन के जीवन पर आधारित इस फिल्म में एस.एन. त्रिपाठी ने रागों के विविध स्वरूप से प्रसंगों को सुसज्जित किया था। फिल्म का एक प्रसंग ऐसा है जिसमे तानसेन को उनके गुरु स्वामी हरिदास के आश्रम में संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। एक के बाद एक कुल छह रागों के मेल से बने लगभग आठ मिनट के इस रागमाला गीत के माध्यम से तानसेन की बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक के विकास को दिखाया गया है। प्रसंगों के क्रमशः उल्लेख में सरलता के लिए पूरे गीत को तीन भागों में बाँट कर हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले हम आपके लिए रागमाला गीत का पहला दो अन्तरा प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत का आरम्भ राग बहार के स्वरों में गूँथे गीत- ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ से होता है। इन पंक्तियों के दौरान बालक तन्ना (तानसेन) को संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। राग बहार की पंक्तियाँ समाप्त होते ही राग बागेश्वरी अथवा बागेश्री का आलाप आरम्भ हो जाता है। गीत का अगला भाग- ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ है, जिसके लिए संगीतकार ने राग बागेश्री के स्वरों का उपयोग किया है। गीत का यह हिस्सा आरम्भ होते ही बालक तन्ना किशोर हो जाता है। लीजिए, रागमाला गीत के इन आरम्भिक दो हिस्सों का आनन्द लीजिए।


राग बहार और बागेश्वरी : ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ और ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : पूर्णिमा सेठ और पंढारीनाथ कोल्हापुरे




गीत के अगले भाग में राग यमन कल्याण का स्पर्श है। दरअसल रागमाला गीत का यह भाग एक प्राचीन ध्रुवपद रचना है। यह मान्यता है कि इस ध्रुवपद की रचना स्वामी हरिदास ने की थी। इस रचना में संगीत के प्राचीन सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है। फिल्म में गीत के इस भाग के आरम्भ में किशोर आयु के तानसेन को अपने गुरु स्वामी हरिदास के सम्मुख अभ्यास करते दिखाया गया है। इस ध्रुवपद के अन्तरे में ही किशोर तानसेन युवा (भारतभूषण) रूप में परिवर्तित होते हैं। वयस्क तानसेन की भूमिका अभिनेता भारतभूषण निभाई है, जिनके लिए पार्श्वगायन किया, सुप्रसिद्ध गायक मन्ना डे ने। गीत का अगला अर्थात चौथा भाग पारम्परिक गुरुवन्दना है, जो राग केदार के स्वरों पर आधारित है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के इस रागमाला गीत के तीसरे और चौथे भाग को अब हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग यमन कल्याण और केदार : ‘सप्तसुरन तीन ग्राम...’ और गुरुवन्दना : मन्ना डे और साथी


रागमाला गीत के अगले तीन अन्तरों में राग भैरव और मेघ मल्हार के स्वरों का प्रयोग किया गया है। इस प्रसंग में स्वामी हरिदास, तानसेन को विभिन्न रागों के लक्षण बताने का आदेश देते हैं। तानसेन पहले राग भैरव और फिर मेघ मल्हार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। तानसेन की इन प्रस्तुतियों से स्वामी हरिदास सन्तुष्ट हो जाते हैं राधाकृष्ण की प्रतिमा को नमन करने का आदेश देते हैं। गुरु और गोविन्द दोनों को एक साथ सम्मुख देख कर कुछ क्षणों तक तानसेन थोड़ा विचलित होते हैं, किन्तु गुरु के महत्त्व को सर्वोपरि रखते हुए अत्यन्त प्रचलित दोहा- ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ का गायन करते हुए स्वामी हरिदास के चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। यह दोहा भी राग मेघ मल्हार के स्वरों में पिरोया गया है। आइए इस रागमाला गीत अन्तिम भाग भी सुनते हैं। इस रागमाला गीत में पारम्परिक रचनाओं के अलावा अन्य सभी गीतों की रचना गीतकार शैलेन्द्र ने की थी।



राग भैरव और मेघ मल्हार : लक्षण गीत और दोहा ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ : मन्ना डे 

 


आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ की 111वीं संगीत पहेली में हम आपको एक रागमाला फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह अंश किस राग पर आधारित है?

2 – प्रस्तुत संगीत के अंश के उत्तरार्द्ध में गायन के साथ एक वाद्य की जुगलबन्दी भी की गई है। आपको उस वाद्य का नाम बताना है।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 113वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 109वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से मन्ना डे और लता मंगेशकर के गाये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, बैंगलुरु के पंकज मुकेश और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ यह श्रृंखला हमने अपने कई नियमित पाठकों के अनुरोध पर प्रस्तुत किया है। आज के अंक में प्रस्तुत किया गया रागमाला गीत का आडियो हमें लखनऊ के संगीत-विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने भेजा था। आगामी अंक में भी हम आपको एक फिल्मी रागमाला गीत सुनवाएँगे और उसमें सम्मिलित रागों पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र


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