Showing posts with label indian classical. Show all posts
Showing posts with label indian classical. Show all posts

Sunday, June 12, 2011

सुर संगम में आज - सारंगी की सुरमई तान

सुर संगम - २४ - सारंगी

सारंगी शब्द हिंदी के 'सौ' और 'रंग' शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है सौ रंगों वाला। ऐस नाम इसे इस्लिए मिला है कि इससे निकलने वाले स्वर सैंकड़ों रंगों की भांति अर्थवत और संस्मरणशील हैं।

श्चिमी राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है - ''ताल मिले तो पगाँ रा घुंघरु बाजे'' अर्थात गायकी के साथ यदि सधा हुआ संगतकार (साथ वाद्य बजाने वाला) हो तो सुननेवाला उस गीत-संगीत में डूब जाता है। राजस्थानी लोक संस्कृति में लोक वाद्यों का काफ़ी प्रभाव रहा है। प्रदेश के भिन्न-भिन्न अंचलों में वहाँ की संस्कृति के अनुकूल स्थानीय लोक वाद्य खूब रच-बसे हैं। जिस क्षेत्र में स्थानीय लोक कला एवं वाद्यों को फलने-फूलने का अवसर मिला है वहाँ के लोक वाद्यों की धूम देश के कोने-कोने से लेकर विदेशों तक मची है। इन्हीं वाद्य यंत्रों में एक प्रमुख वाद्य यंत्र है - ''सारंगी''। सुर-संगम के २४वें साप्ताहिक अंक में मैं, सुमित चक्रवर्ती सभी श्रोता-पाठकों का अभिनंदन करता हूँ।

सारंगी शब्द हिंदी के 'सौ' और 'रंग' शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है सौ रंगों वाला। ऐस नाम इसे इस्लिए मिला है कि इससे निकलने वाले स्वर सैंकड़ों रंगों की भांति अर्थवत और संस्मरणशील हैं। सारंगी प्राचीन काल में घुमक्कड़ जातियों का वाद्य था। मुस्लिम शासन काल में यह नृत्य तथा गायन दरबार का प्रमुख वाद्य यंत्र था। इसका प्राचीन नाम ''सारिंदा'' था जो कालांतर के साथ ''सारंगी'' हुआ। राजस्थान में सारंगी के विविध रूप दिखाई देते हैं। मीरासी, लाँगा, जोगी, मांगणियार आदि जाति के कलाकारों द्वारा बजाये जाने वाला यह वाद्य गायन तथा नृत्य की संगीत की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। संगत वाद्य के साथ सह स्वतंत्र वाद्य भी हैं। इसमें कंठ संगीत के समान ही स्वरों के उतार-चढ़ाव लाए जा सकते हैं। वस्तुत: सारंगी ही ऐसा वाद्य है जो मानव के कंठ के निकट है। सांरगी शास्त्रीय संगीत का भी एक प्रमुख संगति वाद्य है। परंतु एकल वाद्य के रूप में भी सारंगी बहुत मनोहारी सुनाई पड़ती है। पं.राम नारायण,साबरी ख़ाँ,लतीफ़ख़ाँ और सुल्तान ख़ाँ जैसे कई उस्ताद सारंगी का प्रयोग शास्त्रीय संगीत में करते रहे हैं। लीजिए प्रस्तुत है पं० राम नारायण द्वारा 'राग मारवा' में सारंगी वादन।

पं० राम नारायण - सारंगी - राग मारवा


सारंगी कई अलग-अलग आकार-प्रकार की होती है। थार प्रदेश में दो प्रकार की सारंगी प्रयोग में लाई जाती हैं - सिंधी सारंगी और गुजरातन सारंगी। सिंधी सारंगी आकार में बड़ी होती है तथा गुजरातन सारंगी को गुजरात में बनाया जाता है। इसे बाड़मेर व जैसलमेर ज़िले में लंगा-मगणियार द्वारा बजाया जाता है। यह सिंधी सारंगी से छोटी होती है एवं रोहिडे की लकड़ी से बनी होती है। सभी सारंगियों में लोक सारंगी सबसे अधिक विकसित हुई हैं। सारंगी का निर्माण लकड़ी से होता है तथा इसका नीचे का भाग बकरे की खाल से मंढ़ा जाता है। इसके पेंदे के ऊपरी भाग में सींग की बनी घोड़ी होती है। घोड़ी के छेदों में से तार निकालकर किनारे पर लगे चौथे में उन्हें बाँध दिया जाता है। इस वाद्य में २९ तार होते हैं तथा मुख्य बाज में चार तार होते हैं जिनमें से दो तार स्टील के व दो तार तांत के होते हैं। आंत के तांत को 'रांदा' कहते हैं। बाज के तारों के अलावा झोरे के आठ तथा झीले के १७ तार होते हैं। बाज के तारों पर गज, जिसकी सहायता से एवं रगड़ से सुर निकलते हैं, चलता है। सारंगी के ऊपर लगी खूँटियों को झीले कहा जाता है। पैंदे में बाज के तारों के नीचे घोड़ी में आठ छेद होते हैं। इनमें से झारों के तार निकलते हैं। एक प्रतीकात्मक समस्वरित सारंगी की आवाज़ किसी मधु मक्खी के छत्ते से आती भनभनाहट जैसी होती है। सारंगी वाद्य बजाने में राजस्थान की सबसे पारंगत जाति है - सारंगीया लंगा। ये मुख्यत: सारंगी के साथ माँड गाते बजाते हैं। आइये सुनते हैं राग माँड पर आधारित एक जुगलबंदी जिसे प्रस्तुत किया है उस्ताद सुल्तान ख़ाँ तथा उस्ताद ज़ाक़िर हुस्सैन ने।

सारंगी और तबला जुगलबंदी - उस्ताद सुल्तान ख़ाँ व उस्ताद ज़ाक़िर हुस्सैन


सारंगी की सुरमई तान और लोक गायकी जब एक साथ निकलती है तब सुनने वाला हर दर्शक और श्रोता सब कुछ छोड़ कर इसमें खो जाता है, क्योंकि इस वाद्य यंत्र में सांप्रदायिक एकता वाली अनूठी विशेषताएँ हैं। यह नेपाल का भी पारंपरिक वाद्य है परन्तु नेपाली सारंगी में केवल ४ तारें होती हैं। सारंगी वादकों का जब वर्णन किया जाता है तो सब से प्रथम जो नाम लिया जाता है वह है पं० राम नारायण का जिन्होंने सारंगी को विश्व भर में प्रसिद्ध किया। इनके अतिरिक्त और भी जाने-माने सारंगी वादक हैं - उस्ताद बुन्दु ख़ाँ, उस्ताद नथु ख़ाँ, गोपाल मिश्र, उस्ताद साबरी और उस्ताद शक़ूर ख़ाँ तथा वर्तमान काल के सुप्रसिद्ध सारंगी वादकों में उस्ताद सुल्तान ख़ाँ, कमाल साबरी, ध्रुब घोष और अरुणा नारायण काले जैसी शख़्सियतों का नाम शामिल है। आइये आज की चर्चा को यहीं समाप्त करते हुए आनंद लें सारंगी सम्राट कहलाने वाले उस्ताद साबरी ख़ाँ साहब की इस प्रस्तुति का, जिसमें वे बजा रहे हैं राग दरबारी।

साबरी ख़ाँ - सारंगी - राग दरबारी


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: सुनें इस सरगम को और बताएँ यह किस राग पर आधारित है?


पिछ्ली पहेली का परिणाम: क्षिति जी ने सटीक उत्तर सबसे पहले दिया, बधाई।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:०० बजे हमारे प्रिय सुजॉय दा लेकर आ रहें हैं कहानियों की पोटली 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शृंखला 'एक था ग़ुल और एक थी बुल्बुल में, पधारना न भूलिएगा। नमस्कार!

खोज व आलेख- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, May 1, 2011

सुर संगम में आज - सुनिए पं. विश्वमोहन भट्ट और उनकी मोहन वीणा के संस्पर्श में राग हंसध्वनी

सुर संगम - 18 - मोहन वीणा: एक तंत्र वाद्य की लम्बी यात्रा
1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ| उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाएँ

सुप्रभात! सुर-संगम की एक और संगीतमयी कड़ी में मैं, सुमित चक्रवर्ती सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत करता हूँ। आप सबको याद होगा कि सुर-संगम की १४वीं व १५वीं कड़ियों में हमने चैती पर लघु श्रंख्ला प्रस्तुत की थी जिसमें इस लोक शैली पर हमारा मार्गदर्शन किया था लखनऊ के हमारे साथी श्री कृष्णमोहन मिश्र जी ने। उनके लेख से हमें उनके वर्षों के अनुभव और भारतीय शास्त्रीय व लोक संगीत पर उनके ज्ञान की झलक मिली। अब इसे हमारा सौभाग्य ही समझिये कि कृष्णमोहन जी एक बार पुनः उपस्थित हैं सुर-संगम के अतिथि स्तंभ्कार बनकर, आइये एक बार फिर उनके ज्ञान रुपी सागर में गोते लगाएँ!

------------------------------------------------------------------------------------------

सुर-संगम के सभी श्रोताओं व पाठकों को कृष्णमोहन मिश्र का प्यार भरा नमस्कार! बात जब भारतीय संगीत के जड़ों के तलाश की होती है तो हमारी यह यात्रा वैदिक काल के "सामवेद" तक जा पहुँचती है| वैदिक काल से लेकर वर्तमान आधुनिक काल तक की इस संगीत यात्रा को अनेक कालखण्डों से गुज़रना पड़ा| किसी कालखण्ड में भारतीय संगीत को अपार समृद्धि प्राप्त हुई तो किसी कालखण्ड में इसके अस्तित्व को संकट भी रहा| अनेक बार भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर की संगीत शैलियों ने इसे चुनौती भी दी, परन्तु परिणाम यह हुआ कि वह सब शैलियाँ भारतीय संगीत की अजस्र धारा में विलीन हो गईं और हमारा संगीत और अधिक समृद्ध होकर आज भी मौजूद है| परम्परागत विकास-यात्रा में नई-नई शैलियों का जन्म हुआ तो वैदिककालीन वाद्य-यंत्रों का क्रमबद्ध विकास भी हुआ| इनमें से कुछ वाद्य तो ऐसे हैं जिनका अस्तित्व वैदिक काल में था, बाद में इनके स्वरुप में थोडा परिवर्तन हुआ तो ये पाश्चात्य संगीत का हिस्सा बने| पश्चिमी संगीत जगत में ऐसे वाद्यों ने सफलता के नए मानक गढ़े| ऐसे वाद्यों की यात्रा यहीं नहीं रुकी, कई प्रयोगधर्मी संगीतज्ञों ने वाद्यों के इस पाश्चात्य स्वरूप में संशोधन किया और इन्हें भारतीय संगीत के अनुकूल स्वरुप दे दिया| अनेक पाश्चात्य वाद्य, जैसे- वायलिन, हारमोनियम, मेन्डोलीन, गिटार आदि आज शास्त्रीय संगीत के मंच पर सुशोभित हो रहें हैं|

सुर-संगम के आज के अंक में हम एक ऐसे ही तंत्र वाद्य- "मोहन वीणा" पर चर्चा करेंगे, जो विश्व-संगीत जगत की लम्बी यात्रा कर आज पुनः भारतीय संगीत का हिस्सा बन चुका है| वर्तमान में "मोहन वीणा" के नाम से जिस वाद्य यंत्र को हम पहचानते हैं, वह पश्चिम के 'हवाइयन गिटार' या 'साइड गिटार' का संशोधित रूप है| 'मोहन वीणा' के प्रवर्तक हैं, सुप्रसिद्ध संगीत-साधक पं. विश्वमोहन भट्ट, जिन्होंने अपने इस अनूठे वाद्य से समूचे विश्व को सम्मोहित किया है| श्री भट्ट इस वाद्य के सृजक ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के तंत्र-वाद्य-वादक भी हैं| सुप्रसिद्ध सितार वादक पं. रविशंकर के शिष्य विश्वमोहन भट्ट का परिवार मुग़ल सम्राट अक़बर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन और उनके गुरु स्वामी हरिदास से सम्बन्धित है| प्रारम्भ में उन्होंने सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु 1966 की एक रोचक घटना ने उन्हें एक नये वाद्य के सृजन की ओर प्रेरित कर दिया| एक बातचीत में श्री भट्ट ने बताया था -"1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ| उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाएँ|" श्री भट्ट के वर्तमान 'मोहन वीणा' में केवल सितार और गिटार के ही नहीं बल्कि प्राचीन वैदिककालीन तंत्र वाद्य विचित्र वीणा और सरोद के गुण भी हैं| मोहन वीणा का मूल उद्‍गम 'विचित्र वीणा' ही है| आइए हम आपको 'विचित्र वीणा' वादन का एक अंश सुनवाते हैं इस वीडियो के माध्यम से| राग 'रागेश्वरी' में यह एक ध्रुवपद है जो 12 मात्रा के 'चौताल' में निबद्ध है और इस रचना के विदेशी वादक हैं विदेशी मूल के गियान्नी रिक्कीज़ी जिन्हें वर्तमान का विचित्र वीणा दिग्गज माना जाता है।

राग - रागेश्वरी : विचित्र वीणा : वादक - गियान्नी रिक्कीज़ी

देखिये विडियो यहाँ
श्री विश्वमोहन भट्ट मोहन वीणा पर सभी भारतीय संगीत शैलियों- ध्रुवपद, धमार, ख़याल, ठुमरी आदि का वादन करने में समर्थ हैं| आइए यहाँ थोड़ा रुक कर एक और वीडियो द्वारा मोहन वीणा पर राग 'हंसध्वनि' में एक अनूठी रचना सुनते हैं जिसे प्रस्तुत कर रहे हैं स्वयं पं. विश्वमोहन भट्ट| रचना के पूर्वार्ध में धमार ताल, ध्रुवपद अंग में तथा उत्तरार्ध में कर्णाटक संगीत पद्यति में एक कृति "वातापि गणपतये भजेहम..." का वादन है| मोहन वीणा के बारे में हम और भी जानेंगे सुर-संगम की आगामी कड़ी में।

राग हंसध्वनि में धमार एवं कृति : मोहन वीणा : वादक - विश्वमोहन भट्ट



और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

हिंदी सिनेमा में हवायन गिटार का प्रयोग सबसे पहले संभवतः १९३७ की एक फ़िल्म के गीत में हुआ था जिसमें संगीतकार केशवराव भोले ने फ़िल्म की अभिनेत्री से एक अंग्रेज़ी गीत गवाया था। आपको बताना है उस अभिनेत्री - गायिका का नाम।

पिछ्ली पहेली का परिणाम: श्रीमति क्षिति तिवारी जी ने लगातार तीसरी बार सटीक उत्तर देकर ५ अंक और अपने खाते में जोड़ लिये हैं, बधाई! अमित जी, अवध जी, कहाँ ग़ायब हैं आप दोनों? देखिये कहीं बाज़ी हाथ से न निकल जाए!

सुर-संगम के आज के अंक को हम यहीं पर विराम देते हैं, परंतु 'मोहन वीणा' पर कई तथ्य एवं जानकारी अभी बाक़ी है जिनका उल्लेख हम करेंगे हमारी आगामी कड़ी में। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए कृष्णमोहन मिश्र को आज्ञा दीजिए| और हाँ! शाम ६:३० बजे हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के प्यारे साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख- कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, April 10, 2011

सुर संगम में आज - नवरात्रों की जगमग और चैती

सुर संगम - 15 - चैत्र मास की चैती
इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं|


मस्कार! सुर-संगम के इस साप्ताहिक स्तंभ में मैं, सुमित चक्रवर्ती आपका अभिनंदन करता हूँ और साथ ही आप सब को नवरात्रों की हार्दिक शुभ-कामनाएँ भी देता हूँ। पिछ्ली कड़ी में हमनें पारंपरिक लोक व शास्त्रीय कला 'चैती' के बारे में चर्चा की। 'चैती' चैत्र मास के नवरात्रों के दिनों में प्रस्तुत की जाने वाली लोक एवं शास्त्रीय कला है। आइये इस कला के लोक पक्ष की चर्चा आगे बढ़ाते हुए हम बात करें इसके शास्त्रीय पक्ष के बारे में भी।

यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं| प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि का ग्रन्थ- 'नाट्यशास्त्र' पंचम वेद माना जाता है| नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक ५७ में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है | श्लोक का अर्थ है- "इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं|" चैती गीतों के लोक स्वरुप में ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उप-शास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका| लोक परम्परा में चैती १४ मात्राओं के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में ताल कहरवा का प्रयोग होता है| पूरब अंग के बोल बनाव की ठुमरी भी १४ मात्राओं के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है| सम्भवतः चैती के इस गुण ने ही उप-शास्त्रीय गायकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा| आइए चैती के लोक स्वरुप का अनुभव 1908 के एक दुर्लभ रिकार्ड के माध्यम से करते हैं| इस रिकार्ड में अच्छन बाई की आवाज़ है|

अरे फुलेला फुल्वा - अच्छनबा


लोक कला जब शास्त्रीय स्वरुप ग्रहण करता है तो उसमें गुणात्मक वृद्धि होती है| चैती गीत इसका एक ग्राह्य उदाहरण है| चैती के लोक और उप-शास्त्रीय स्वरुप का समग्र अनुभव करने के लिए आप उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई वादन की यह प्रस्तुति सुनें।

उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ - चैती धुन


और अब अन्त में चर्चा- 'फिल्म संगीत में चैती' की| हिन्दी फ़िल्मों की जहाँ बात आती है, इनमें चैती गीतों का बहुत ज़्यादा प्रयोग नहीं हुआ है। केवल कुछ ही फ़िल्में ऐसी हैं जिनमें चैती का उल्लेखनीय प्रयोग किया गया हो।| वर्ष १९६३ में बनी फिल्म 'गोदान' में पंडित रविशंकर के संगीत निर्देशन में मुकेश ने चैती- 'हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा' गाया था| यह लोक शैली में गाया चैती गीत है| ठुमरी अंग में आशा भोसले ने फिल्म 'नमकीन' में चैती गाया है जिसके बोल हैं- 'बड़ी देर से मेघा बरसा हो रामा, जली कितनी रतियाँ' | जैसा कि हमने पिछ्ली कड़ी में आपको बताया था कि चैती गीत मुख्यतः राग बिलावल अथवा राग यमनी बिलावल पर आधारित होते हैं परन्तु इस गीत में आपको राग तिलक कामोद का आनंद भी मिलेगा| लीजिए प्रस्तुत हैं ये दोनों फ़िल्मी चैती गीत।

हिया जरत रहत दिन रैन, हो रामा - मुकेश(फ़िल्म - गोदान)


बड़ी देर से मेघा बरसा, हो रामा - आशा भोसले(फ़िल्म - नमकीन)


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए और पहचानिए कि यह किस सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक की आवाज़ है?



पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी ने पुन: सही उत्तर देकर ५ अंक प्राप्त कर लिये हैं, बधाई! क्या कोई और इन्हें चुनौति देना चाहेगा?

तो यह थी प्रसिद्ध लोक व शास्त्रीय शैली - चैती पर आधारित हमारी अंतिम कड़ी। आशा है आपको पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। हम एक बार पुनः आभार व्यक्त करेंगे लखनऊ के श्री कृष्‍णमोहन मिश्र का जिन्होंने इस कला के बारे में अपने असीम ज्ञान को हमसे बाँटा तथा इस प्रस्तुति में हमारा सहयोग दिया। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| शाम ६:३० बजे अपने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख - कृष्‍णमोहन मिश्र
प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, March 27, 2011

सुर संगम में आज - जल तरंग की मधुरता से तरंगित है आज रविवार की सुबह

सुर संगम - 13 - जल तरंग की उमंग

जल तरंग असाधारण इसलिए है कि यह एक तालवाद्‍य भी है और घनवाद्‍य भी। मूलतः इसमें चीनी मिट्टी की बनी कटोरियों में पानी भर उन्हें अवरोही क्रम(descending order) अथवा पंक्ति अथवा किसी भी और सुविधाजनक समाकृति में सजाया जाता है। फिर इन कटोरियों में अलग-अलग परिमाण में जल भर कर इन्हें रागानुसार समस्वरित(tune) किया जाता है। जब इन कटोरियों पर बेंत अथवा लकड़ी के बने छड़ों से मार की जाती है तब इनकी कंपन से एक मधुर झनकार सी ध्वनि उत्पन्न होती है।


मस्कार! सुर-संगम की एक और संगीतमयी कड़ी में सभी श्रोता-पाठकों का हार्दिक अभिनंदन। कैसी रही आप सब की होली? आशा है सब ने खूब धूम मचाई होगी। मैनें भी हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड" के साथी सुजॉय दा के साथ मिलकर जम के होली मनाई। ख़ैर अब होली के बादल छट गए हैं और अपने साथ बहा ले गए हैं शीत एवं बसंत के दिनों को, साथ ही दस्तक दे चुकी हैं गरमियाँ। ऐसे में हम सब का जल का सहारा लेना अपेक्षित ही है। तो हमनें भी सोचा कि क्यों न आप सबकी संगीत-पिपासा को शाँत करने के लिए आज की कड़ी भी ऐसे ही किसी वाद्‍य पर आधारित हो जिसका संबंध जल से है। आप समझ ही गए होंगे कि मेरा संकेत है हमारे देश के एक असाधारण वाद्‍य - 'जल तरंग' की ओर।

जल तरंग असाधारण इसलिए है कि यह एक तालवाद्‍य भी है और घनवाद्‍य भी। मूलतः इसमें चीनी मिट्टी की बनी कटोरियों में पानी भर उन्हें अवरोही क्रम(descending order) अथवा पंक्ति अथवा किसी भी और सुविधाजनक समाकृति में सजाया जाता है। फिर इन कटोरियों में अलग-अलग परिमाण में जल भर कर इन्हें रागानुसार समस्वरित(tune) किया जाता है। जब इन कटोरियों पर बेंत अथवा लकड़ी के बने छड़ों से मार की जाती है तब इनकी कंपन से एक मधुर झनकार सी ध्वनि उत्पन्न होती है। इसी मधुर तरंग नुमा ध्वनि के कारण इस वाद्‍य का नाम 'जल तरंग' पड़ा। यूँ तो यह कहना कठिन है कि इस वाद्‍य की उत्पत्ति कब और कहाँ हुई थी परंतु इसका सबसे पहला उल्लेख पाया जाता है मध्यकालीन ग्रंथ - 'संगीत पारिजात' में। तानसेन द्वारा रचित ग्रंथ 'संगीत सार' में जल तरंग का उल्लेख है। इस ग्रंथ के अनुसार जल तरंग को तभी पूरा माना गया है जब इसमें २२ कटोरियों क प्रयोग किया जाए। मध्य कालीन जलतरंग में काँसे की बनी कटोरियों का भी प्रयोग किया जाता था। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि मश्हूर सम्राट सिकंदर भारत आते समय मैसिडोनिया से कुछ जल तरंग वादको को अपने साथ ले आये थे। आज साधरणतः जल तरंग में १६ प्यालों का प्रयोग किया जाता है, इनमें बडे़ आकार के प्यालों से निचले सप्तक यानि मंद्र स्वर तथा छोटे आकार के प्यालों से ऊँचे सप्तक यानि तार स्वर उत्पन्न किये जाते हैं। आइये आनंद लेते हैं प्रख्यात जल तरंग वादिका डॉ० रागिनी त्रिवेदी की इस मनमोहक प्रस्तुति का। डॉ० त्रिवेदी भारत की प्रमुख महिला जल तरंग शिल्पियों में से एक हैं तथा इस लुप्त होती वाद्‍य कला को बचाए रखने में इनका योगदान उल्लेखनीय रहा है।



भारत में कई प्रख्यात जल तरंग वादक हुए हैं जिनमें रामराव परसत्वर, डॉ० रागिनी त्रिवेदी, श्रीमति रंजना प्रधान, शंकर राव कनहेरे, अनयमपट्टि एस. धन्द्पानि, मिलिन्द तुलंकर, नेमानी सौमयाजुलु, सेजल चोकसी और बलराम दूबे प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त पाकिस्तान के लियाक़त अलि भी खासे प्रसिद्ध जल तरंग शिल्पी हैं। आज के दौर में मिलिन्द तुलंकर एक ऐसा नाम है जिसे भारत के सर्वश्रेष्ठ जल तरंग वादकों में लिया जाता है। मिलिन्द का जन्म तथा लालन-पालन एक "संगीतमय" परिवार में हुआ तथा उन्होंने बहुत ही कम आयु से ही जल-तरंग की विद्या अपने नाना स्वर्गीय पं० शंकरराव कनहेरे से प्राप्त करनी शुरू कर दी थी। पं० शंकरराव कनहेरे स्वयं एक विख्यात जल तरंग वादक थे तथा ऑल इण्डिया रेडियो के 'ए-ग्रेड' यानि प्रथम श्रेणि के कलाकारों में एक थे। उन्होंने देश-विदेश में कई समारोह प्रस्तुत कर जल तरंग को लोकप्रिय बनाया और इस वाद्‍य पर एक पुस्तक भी लिखी जिसे संगीत कार्यालय(हाथरस) ने प्रकाशित किया था। तो लीजिए पेश है उनकी छत्रछाया में पले-बढ़े मिलिन्द तुलंकर की इस प्रस्तुति का एक विडियो, आनंद लीजिए!



और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए इस टुकड़े को और पहचानिए कि यह कौन सी लोक-शैली है जो चैत्र के महीनें में गायी जाती है। गायिका आज के दौर के एक सुप्रसिद्ध अभिनेता कि माँ थीं, उन्हें पहचानने पर ५ बोनस अंक!




पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी ने राग को बिलकुल सही पहचाना और ५ अंक अर्जित कर लिए हैं। बधाई!

लीजिए, हम आ पहुँचे हैं 'सुर-संगम' की आज की कड़ी की समाप्ति पर। आशा है आपको यह कड़ी पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामि रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने मित्र सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए, और शाम ६:३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पधारना न भूलिएगा, आपके प्रिय सुजॉय चटर्जी प्रस्तुत करेंगे एक नई लघु शृंखला, नमस्कार!

प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, March 6, 2011

शततंत्री वीणा से आधुनिक संतूर तक, वादियों की खामोशियों को सुरीला करता ये साज़ और निखरा पंडित शिव कुमार शर्मा के संस्पर्श से

सुर संगम - 10 - संतूर की गूँज - पंडित शिव कुमार शर्मा

इसके ऊपरी भाग पर लकड़ी के पुल से बने होते हैं जिनके दोनों ओर बने कीलों से तारों को बाँधा जाता है। संतूर को बजाने के लिए इन तारों पर लकड़ी के बने दो मुंगरों (hammers) - जिन्हें 'मेज़राब' कहा जाता है, से हल्के से मार की जाती है।


विवार की मधुर सुबह हो, सूरज की सुनहरी किरणे हल्के बादलों के बीच से धरती पर पड़ रही हों, हाथ में चाय का प्याला, बाल्कनी पर खड़े बाहर का नज़ारा ताकते हुए आप, और रेडियो पर संगीत के तार छिड़े हों जिनमें से मनमोहक स्वरलहरियाँ गूँज रही हों! सुर-संगम की ऐसी ही एक संगीतमयी सुबह में मैं सुमित आप सभी संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ| हम सभी ने कई अलग-अलग प्रकार के वाद्‍य यंत्रों की ध्वनियाँ सुनी होंगी| पर क्या आपने कभी इस बात पर ग़ौर किया है कि कुछ वाद्‍यों से निकली ध्वनि-कंपन सपाट(flat) होती है जैसे कि पियानो या वाय्लिन से निकली ध्वनि; जबकि कुछ वाद्‍यों की ध्वनि-कंपन वृत्त(round) होती है तथा अधिक गूँजती है। आज हम ऐसे ही एक शास्त्रीय वाद्‍य के बारे में चर्चा करेंगे जिसका उल्लेख वेदों में "शततंत्री वीणा" के नाम से किया गया है। जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ भारत के एक बेहद लोकप्रिय व प्राचीन वाद्‍य यंत्र - संतूर की। आइये, संतूर के बारे में और जानने से पहले आनंद लें पंडित शिव कुमार शर्मा द्वारा प्रस्तुत इस पहाड़ी धुन का।

संतूर पर डोगरी धुन - पं. शिव कुमार शर्मा


'संतूर' एक फ़ारसी शब्द है तथा शततंत्री वीणा को अपना यह नाम इसके फ़ारसी प्रतिरूप से ही मिला है| फ़ारसी संतूर एक विषम-चतुर्भुज (trapezoid) से आकार का वाद्‍य है जिसमें प्रायः ७२ तारें होती हैं। इसकी उत्पत्ती लगभग १८०० वर्षों से भी पूर्व ईरान में मानी जाती है परन्तु आगे जाकर यह एशिया के कई अन्य देशों में प्रचलित हुआ जिन्होंने अपनी-अपनी सभ्यता-संस्कृति के अनुसार इसके रूप में परिवर्तन किए। भारतीय संतूर फ़ारसी संतूर से कुछ ज़्यादा आयताकार (rectangular) होता है और यह आमतौर पर अखरोट की लकड़ी का बना होता है। इसके ऊपरी भाग पर लकड़ी के पुल से बने होते हैं जिनके दोनों ओर बने कीलों से तारों को बाँधा जाता है। संतूर को बजाने के लिए इन तारों पर लकड़ी के बने दो मुंगरों (hammers) - जिन्हें 'मेज़राब' कहा जाता है, से हल्के से मार की जाती है। इसे अर्धपद्मासन में बैठकर तथा गोद में रखकर बजाया जाता है। यह मूल रूप से कश्मीर का लोक वाद्‍य है जिसे सूफ़ी संगीत में इस्तेमाल किया जाता था। तो आइये देखें और सुनें कि फ़ारसी संतूर भारतीय संतूर से किस प्रकार भिन्न है - इस वीडियो के ज़रिये।

फ़ारसी संतूर


हमारे देश में जहाँ भी संतूर के बारे में चर्चा की जाती है - वहाँ एक नाम का उल्लेख करना अनिवार्य बन जाता है। आप समझ ही गये होंगे कि मेरा इशारा किन की ओर है? जी हाँ! आपने ठीक पहचाना, मैं बात कर रहा हूँ भारत के सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा की। इनका जन्म १३ जनवरी १९३८ को जम्मू में हुआ तथा इनकी माता जी श्रीमती ऊमा दत्त शर्मा स्वयं एक शास्त्रीय गायिका थीं जो बनारस घराने से ताल्लुक़ रखती थीं। मात्र ५ वर्ष कि अल्पायु से ही पंडित जी ने अपने पिता से गायन व तबला वादन सीखना प्रारंभ कर दिया था। अपने एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि उनकी माँ का यह सपना था कि वे भारतीय शास्त्रीय संगीत को संतूर पर बजाने वाले प्रथम संगीतज्ञ बनें। इस प्रकार उन्होंने १३ वर्ष की आयु में संतूर सीखना शुरू कर दिया तथा अपनी माँ का सपना पूरा किया। बम्बई में वर्ष १९५५ में उन्होंने अपनी प्रथम सार्वजनिक प्रस्तुति दी। आज संतूर की लोकप्रियता का सर्वाधिक श्रेय पंडित जी को ही जाता है। उन्होंने संतूर को शास्त्रीय संगीत के अनुकूल बनाने के लिये इसमें कुछ परिवर्तन भी किये। जहाँ तक पुरस्कारों की बात है - पंडित शिव कुमार शर्मा को कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष १९८५ में उन्हें अमरीका के बॊल्टिमोर शहर की सम्माननीय नागरिकता प्रदान की गई। इसके पश्चात्‍ वर्ष १९८६ में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार', वर्ष १९९१ में 'पद्मश्री पुरस्कार' तथा वर्ष २००१ में 'पद्म विभूषण पुरस्कार' से उन्हें सम्मानित किया गया। अपने अनोखे संतूर वादन की कला-विरासत उन्होंने अपने सुपुत्र राहुल को भी अपना शिष्य बनाकर प्रदान की तथा पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने वर्ष १९९६ से लेकर आज तक कई सार्वजनिक प्रस्तुतियाँ दी हैं। क्यों न हम भी इन दोनों की ऐसी ही एक मनमोहक प्रस्तुति का आनन्द लें इस वीडियो के माध्यम से।

पं. शिव कुमार शर्मा व राहुल शर्मा - जुगलबंदी



और अब बारी इस बार की पहेली की। 'सुर-संगम' की आगामी कड़ी से हम इसमें एक और स्तंभ जोड़ने जा रहे हैं - वह है 'लोक संगीत' जिसके अन्तर्गत हम भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों के लोक संगीत से आपको रू-ब-रू करवाएँगे। तो ये रहा इस अंक का सवाल जिसका आपको देना होगा जवाब तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। 'सुर-संगम' के ५०-वे अंक तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी तरफ़ से।

"इस समुदाय के गवैये-बजैये मुस्लिम होते हुए भी अपने अधिकतम गीतों में हिंदु देवी-देवताओं की तथा हिंदु त्योहारों की बढ़ाई करते हैं और 'खमाचा' नामक एक खास वाद्‍य क प्रगोग करते हैं। तो बताइए हम किस प्रांत के लोक संगीत की बात कर रहे हैं?"

पिछ्ली पहेली का परिणाम: कृष्‍णमोहन जी ने बिल्कुल सटीक उत्तर देकर ५ अंक अर्जित कर लिये हैं, बधाई!

हमारे और भी श्रोता व पाठक आने वाली कड़ियों को सुनें, पढ़ें तथा पहेलियों में भाग लें, इसी आशा के साथ, हम आ पहुँचे हैं 'सुर-संगम' की आज की कड़ी की समाप्ति पर। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, इसपर अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामि रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने मित्र सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए, नमस्कार!

प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, February 27, 2011

सुर संगम में आज - परवीन सुल्ताना की आवाज़ का महकता जादू

सुर संगम - 09 - बेगम परवीन सुल्ताना

अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि जितना महत्वपूर्ण एक अच्छा गुरू मिलना होता है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है गुरू के बताए मार्ग पर चलना। संभवतः इसी कारण वे कठिन से कठिन रागों को सहजता से गा लेती हैं, उनका एक धीमे आलाप से तीव्र तानों और बोल तानों पर जाना, उनके असीम आत्मविश्वास को झलकाता है, जिससे उस राग का अर्क, उसका भाव उभर कर आता है। चाहे ख़याल हो, ठुमरी हो या कोई भजन, वे उसे उसके शुद्ध रूप में प्रस्तुत कर सबका मन मोह लेती हैं।


सुर-संगम की इस लुभावनी सुबह में मैं सुमित चक्रवर्ती आप सभी संगीत प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। हिंद-युग्म् के इस मंच से जुड़ कर मैं अत्यंत भाग्यशाली बोध कर रहा हूँ। अब आप सब सोच रहे होंगे कि आज 'सुर-संगम' सुजॉय जी प्रस्तुत क्यों नही कर रहे। दर-असल अपने व्यस्त जीवन में समय के अभाव के कारण वे अब से सुर-संगम प्रस्तुत नहीं कर पाएँगे। परन्तु निराश न हों, वे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिये इस मंच से जुड़े रहेंगे। ऐसे में उन्होंने और सजीव जी ने 'सुर-संगम' का उत्तरदायित्व मेरे कन्धों पर सौंपा है। आशा है कि मैं उनकी तथा आपकी आशाओं पर खरा उतर पाऊँगा। 'सुर संगम' के आज के इस अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं एक ऐसी शिल्पी को जिनका नाम आज के सर्वश्रेष्ठ भारतीय शास्त्रीय गायिकाओं में लिया जाता है। इन्हें पद्मश्री पुरस्कार पाने वाली सबसे कम उम्र की शिल्पी होने का गौरव प्राप्त है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ सुर-साम्राज्ञी बेगम परवीन सुल्ताना की। आइए उनके बारे में और जानने से पहले सुनते हैं राग भैरवी पर आधारित, उन्हीं की आवाज़ व अन्दाज़ में यह भजन जिसके बोल हैं - "भवानी दयानी"।

भजन: भवानी दयानी - राग भैरवी


परवीन सुल्ताना का जन्म असम के नौगाँव शहर में हुआ और उनके माता-पिता का नाम मारूफ़ा तथा इक्रमुल मज़ीद था| उन्होंने सबसे पहले संगीत अपने दादाजी मोहम्मद नजीफ़ ख़ाँ साहब तथा पिता इक्रमुल से सीखना शुरू किया| पिता और दादाजी की छत्रछाया ने उनकी प्रतिभा को विकसित कर उन्हें १२ वर्ष कि अल्पायु में ही अपनी प्रथम प्रस्तुति देने के लिये परिपक्व बना दिया। उसके बाद वे कोलकाता में स्वर्गीय पंडित्‍ चिनमोय लाहिरी के पास संगीत सीखने गयीं तथा १९७३ से वे पटियाला घराने के उस्ताद दिलशाद ख़ाँ साहब की शागिर्द बन गयीं| उसके २ वर्ष पश्चात् वे उन्हीं के साथ परिणय सूत्र में बँध गयीं और उनकी एक पुत्री भी है| उस्ताद दिल्शाद ख़ाँ साहब की तालीम ने उनकी प्रतिभा की नीव को और भी सुदृढ़ किया, उनकी गायकी को नयी दिशा दी, जिससे उन्हें रागों और शास्त्रीय संगीत के अन्य तथ्यों में विशारद प्राप्त हुआ। जीवन में एक गुरू का स्थान क्या है यह वे भलि-भाँति जानती थीं। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि जितना महत्वपूर्ण एक अच्छा गुरू मिलना होता है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है गुरू के बताए मार्ग पर चलना। संभवतः इसी कारण वे कठिन से कठिन रागों को सहजता से गा लेती हैं, उनका एक धीमे आलाप से तीव्र तानों और बोल तानों पर जाना, उनके असीम आत्मविश्वास को झलकाता है, जिससे उस राग का अर्क, उसका भाव उभर कर आता है। चाहे ख़याल हो, ठुमरी हो या कोई भजन, वे उसे उसके शुद्ध रूप में प्रस्तुत कर सबका मन मोह लेती हैं। आइये अब सुनते हैं उनकी आवाज़ में एक प्रसिद्ध ठुमरी जो उन्होंने हिन्दी फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' में गाया था। ठुमरी के बोल हैं - "कौन गली गयो श्याम, बता दे सखी रि"|

ठुमरी: कौन गली गयो श्याम (पाकीज़ा)



सन् १९७२ में पद्मश्री पुरस्कार के अलावा कई अन्य गौरवपूर्ण पुरस्कार बेगम सुल्ताना को प्राप्त हुए - जिनमें 'क्लियोपैट्रा औफ़ म्युज़िक' (१९७०), 'गन्धर्व कालनिधी पुरस्कार' (१९८०), 'मिया तानसेन पुरस्कार' (१९८६) तथा 'संगीत सम्राज्ञी' (१९९४) शामिल हैं। केवल इतना ही नही, उन्होंने फ़िल्मों में भी कई प्रसिद्ध गीत गाए। १९८१ में आई फ़िल्म 'क़ुदरत' में उन्होंने '"हमें तुमसे प्यार कितना'" गाया जिसके लिये उन्हें 'फ़िल्म्फ़ेयर' पुरस्कार से नवाज़ा गया। पंचम दा अर्थात् श्री राहुल देव बर्मन ने जब यह गीत कम्पोज़ किया तभी से उनके मन में विचार था कि इसका एक वर्ज़न बेगम सुल्ताना से गवाया जाये क्योंकि वे स्वयं बेगम सुल्ताना के प्रशंसक थे। उन्होंने इसकी फ़र्माइश उस्ताद दिल्शाद खाँ साहब से की जिस पर बेगम सुल्ताना भी 'ना' नहीं कह सकीं। इस गीत को प्रथम आलाप से ले कर अंत तक बेगम सुल्ताना ने ऐसे अपने अन्दाज़ मे ढाला है, कि सुनने वाला मंत्र-मुग्ध हो जाता है। तो आइये पंचम दा के दिए स्वरों तथा परवीन सुल्ताना जी की तेजस्वी आवाज़ से सुसज्जित इस मधुर गीत का आनंद लेकर हम भी कुछ क्षणों के लिये मंत्र-मुग्ध हो जाएँ।

गीत: हमें तुमसे प्यार कितना (क़ुदरत)


और अब बारी सवाल-जवाब की। जी हाँ, आज से 'सुर-संगम' की हर कड़ी में हम आप से पूछने जा रहे हैं एक सवाल, जिसका आपको देना होगा जवाब तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति के टिप्पणी में। 'सुर-संगम' के ५०-वे अंक तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी तरफ़ से। तो ये रहा इस अंक का सवाल:

"यह एक साज़ है जिसका वेदों में शततंत्री वीणा के नाम से उल्लेख है। इसकी उत्पत्ति ईरान में मानी जाती है। इस साज़ को अर्धपद्मासन में बैठ कर बजाया जाता है। तो बताइए हम किस साज़ की बात कर रहे हैं?"

लीजिए, हम आ पहुँचे 'सुर-संगम' की आज की कड़ी की समाप्ति पर, आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ईमेल आइ.डी पर। आगामि रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी के साथ, तब तक के लिए अपने नए मित्र सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए, नमस्कार!

प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Wednesday, July 29, 2009

लोग उन्हें "गाने वाली" कहकर चिढ़ाते थे, धीरे धीरे ये उनका उपनाम हो गया....

दुनिया में कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिनके जाने के बाद भी उनकी मधुर स्मृतियाँ हमें प्रेरित करती हैं. सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती हैं. इसी श्रेणी में एक नाम और दर्ज हुआ है, वो है शास्त्रीय संगीत की मल्लिका गंगूबाई का. गीता में कहा है कि 'शरीर मरता है आत्मा नही'. गंगूबाई शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं. आज वो नहीं रहीं लेकिन उनकी संगीत शैली आत्मा के रुप में हमारे बीच विराजमान है.

यूँ तो आज गंगूबाई संगीत के शिखर पर विराजित थीं लेकिन उस शिखर तक पहुँचने का रास्ता उन्होंने बहुत ही कठिनाईयों से तय किया था. गंगूबाई का जन्म १९१३ में धारवाड़ में हुआ था. देवदासी कुल में जन्म लेने वाली गंगूबाई ने छुटपन से संगीत की शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी. अक्सर उन्हें जातीय टिप्पणी का सामना करना पड़ता और उनकी गायन कला को लेकर लोग मजाक बनाया करते थे. उस समय गायन को अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए लोग उन्हें 'गाने वाली' कहकर चिढ़ाते थे. धीरे-धीरे यह उनका उपनाम हो गया.

गंगूबाई कर्नाटक के दूरस्थ इलाके हंगल में रहती थीं. इसी से उनकी पहचान बनी और उनके नाम के साथ गाँव का नाम हंगल जुड़ गया. गंगूबाई हंगल की माँ कर्नाटक शैली की गायिका थीं लेकिन गंगूबाई ने हिन्दुस्तानी शैली का गायन सीखने का फैसला किया. अपने गुरु सवाई गंधर्व से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखने के लिये गंगूबाई कुडगोल जाया करती थीं. गंगूबाई ने कई बाधाओं को पार कर शास्त्रीय संगीत को एक मुकाम तक पहुँचाया. गंगूबाई ने गुरु-शिष्य परम्परा को बरकरार रखा. उन्होंने अपने गुरु सवाई गंधर्व की शिक्षाओं के बारे में एक बार कहा था कि -'मेरे गुरु जी ने मुझे सिखाया है कि जिस तरह एक कंजूस अपने पैसों के साथ व्यवहार करता है उसी तरह सुर का इस्तेमाल करो ताकि श्रोता राग की हर बारीकी को समझ सके'.

गंगूबाई ने भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ संगीत शिक्षा ली थी. किराना घराने की परम्परा को बरकरार रखने वाली गंगूबाई ने कभी भी इससे जुड़ी शैली की शुद्धता के साथ समझौता नहीं किया. गंगूबाई को 'भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पुरिया, धनश्री, मारवा, केदार और चन्द्रकौंस' रागों की गायिकी के लिये अधिक सम्मान मिला. उनका कहना था कि 'मैं रागों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की हिमायती हूँ, इससे श्रोता की उत्सुकता बनी रहती है और उसमें अगले चरण को जानने की इच्छा बढ़ती है'. एक बार फ़िल्म मेकर विजया मूले से बात करते हुए गंगूबाई ने कहा था कि 'पुरुष संगीतकार अगर मुसलमान हो तो उस्ताद कहलाने लगता है, हिन्दु हो तो पंडित हो जाता है, लेकिन केसरबाई, हीराबाई और मो्गाबाई जैसी गायिकायें बाई ही रह जाती हैं उनके व्यक्तित्व में जीवन से और स्त्री होने से मिले दुखों की झलक साफ नजर आती थी. उनकी आवाज में दर्द था लेकिन उसे भी उन्होंने मधुरता से सजाया. ईश्वर के प्रति श्रद्धा होने के कारण गंगूबाई ने भक्ति संगीत को भी नई ऊँचाईयों तक पहुँचाया.

गंगूबाई एक महान गायिका थीं. उन्हें पद्म विभूषण, तानसेन पुरुस्कार, संगीत नृत्य अकादमी पुरुस्कार और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरुस्कारों से नवाजा गया. गंगूबाई हंगल ने हर तरह का वक्त देखा था. गंगूबाई को नौ प्रधानमंत्रियों और पाँच राष्ट्रपतियों द्वार सम्मान प्राप्त हुआ जो अपने आप में एक उपलब्धि है. उन्होंने भारत में दो सौ से अधिक स्कूलों मे भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिये कार्यक्रम किये साथ ही देश के बाहर भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को पहुँचाया.

यह सच है कि पद्म भूषण गंगूबाई हंगल नहीं रहीं लेकिन उनकी आँखे आज भी दुनिया देखेंगी. गंगूबाई हंगल अपनी आँखे दान कर गयीं हैं. कहते हैं कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति कभी नहीं मरता है उसकी उपस्थिति उसके अनगिनत महान कार्यों से दुनिया में रहती है. गंगूबाई हंगल भी अपने संगीत और आँखों द्वारा इस दुनिया में रहेंगी. गंगूबाई हंगल एक ऐसी गायिका थीं जिन्होने अपने शास्त्रीय गायन में कभी कोई मिलावट नहीं की. उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया. ऐसी महान शास्त्रीय गायिका को हम श्रद्धाजंली देते हैं और सुनते हैं उनकी आवाज़ में आज राग दुर्गा, प्ले का बटन दबाईये, ऑंखें बंद कीजिये और महसूस कीजिये आवाज़ के इस तिलस्मी अहसास को-



आलेख - दीपाली तिवारी "दिशा"

Friday, February 27, 2009

बांसुरी के स्वर में डूबा नीला आसमां...


मुरली से उनका प्रेम अब जग जाहिर होने लगा, भारत ही नही विदेशो में भी उनकी मुरली के सुर लोगो को आनंदित करने लगे । पंडित हरीप्रसाद चौरसिया जी की बांसुरी वादन की शिक्षा और कटक के मुंबई आकाशवाणी केन्द्र पर उनकी नियुक्ति के बारे में हमने आलेख के पिछले अंक में जाना, अब आगे...

पंडित हरिप्रसाद जी के मुरली के स्वर अब श्रोताओ पर कुछ ऐसा जादू करने लगे कि उनके राग वादन को सुनकर श्रोता नाद ब्रह्म के सागर में डूब जाने लगे,उनका बांसुरी वादन श्रोताओ को बांसुरी के सुरों में खो जाने पर विवश करने लगा । संपूर्ण देश भर में उनके बांसुरी के कार्यक्रम होने लगे,भारत के साथ साथ यूरोप, फ्रांस, अमेरिका, जापान आदि देशो में उनकी बांसुरी के स्वर गुंजायमान होने लगे।

बड़ी बांसुरी पर शास्त्रीय संगीत बजाने के बाद छोटी बांसुरी पर जब पंडित हरिप्रसाद जी धुन बजाते तो श्रोता बरबस ही वाह वाह करते,सबसे बड़ी बात यह की बड़ी बांसुरी के तुंरत बाद छोटी बांसुरी को बजाना बहुत कठिन कार्य हैं, बड़ी बांसुरी की फूंक अलग और छोटी बांसुरी की फूंक अलग,दोनों बांसुरीयों पर उंगलिया रखने के स्थान अलग । ऐसा होते हुए भी जब वे धुन बजाते, सुनने वाले सब कुछ भूल कर बस उनके बांसुरी के स्वरों में खो जाते ।

मैंने कई बार तानसेन संगीत समारोह में उनका बांसुरी वादन सुना हैं, उनके आने की बात से ही तानसेन समारोह का पुरा पंडाल ठसाठस भर जाता, रात के चाहे २ बजे या ४ श्रोता उनकी बांसुरी सुने बिना हिलते तक नही हैं, पंडाल में अगर बैठने की जगह नही हो तो कई श्रोता देर रात तक पंडाल के बाहर खडे रह कर उनकी बांसुरी सुनते हैं, उनका धुनवादन श्रोताओ में बहुत ही लोकप्रिय हैं, लगता हैं मानों स्वयं श्री कृष्ण बांसुरी पर धुन बजा कर नाद देव की स्तुति कर रहे हैं ।

उनके बांसुरी वादन के अनेकों ध्वनि मुद्रण निकले हैं, १९७८ में "कृष्ण ध्वनी " सन १९८१ में राग हेमवती, देशभटियाली, का रिकॉर्डिंग,१९९० में इम्मोर्टल सीरिज, गोल्डन रागा कलेक्शन, माया, ह्रदय, गुरुकुल जैसे अत्यन्त प्रसिद्द रेकॉर्ड्स के साथ अन्य कई रिकॉर्ड निकले और अत्यंत लोकप्रिय हुए हैं ।पंडित शिव कुमार शर्मा जी के साथ मिल कर शिव -हरी के नाम से प्रसिद्द जोड़ी ने चाँदनी ,डर,लम्हे, सिलसिला आदि फिल्मो में दिया संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ, इनके संगीत निर्देशित सिनेमा को उत्कृष्ट संगीत निर्देशन का फिलअवार्ड भी मिला हैं ।सुनते हैं सिलसिला फ़िल्म का गीत नीला आसमान सो गया ।


पंडित हृदयनाथ मंगेशकर, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी के बारे में कहते हैं :"पंडित हरिप्रसाद और पंडित शिव कुमारशर्मा जी जैसे दिग्गज कलाकार हमारे साथ थे यह हमारा बडा भाग्य था ।" कई मराठी और हिन्दी गानों में बांसुरी पर बजाये पंडित जी के पार्श्व संगीत ने इन गानों में मानों प्राण भर दिए । पंडित जी को राष्ट्रिय व अंतरराष्ट्रिय कई सम्मान प्राप्त हुए, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार ,पद्मश्री,पद्मभूषण,पद्मा विभूषण ,कोणार्क सम्मान,यश भारती सम्मान के साथ अन्य कई महत्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित किया गया।

पश्चिमी संगीत के कलाकारों के साथ इनके फ्यूजन संगीत के कई रिकार्ड्स भी निकले । वृंदावन नामक मुमी के जुहू में स्थित गुरुकुल की स्थापना पंडित जी द्वारा की गई, इस गुरुकुल में गुरु शिष्य परम्परा से देशी -विदेशी शिष्यों को संगीतकी शिक्षा दी जाती है । पंडित जी का शिष्य समुदाय काफी बडा हैं ।

पंडित हरिप्रसाद जी बांसुरी पर सुंदर आलाप के साथ वादन का प्रारंभ करते हैं, जोड़,झाला,मध्यलय,द्रुत गत यह सब कुछ इनके वादन में निहित होता हैं,इनकी वादन शैली,स्सुमधुर,तन्त्रकारी के साथ साथ लयकारी का भी समावेश किए हुए हैं ।

बांसुरी पर पंडित हरिप्रसाद जी के स्वर इसी तरह युगों युगों तक भारतीय संगीत प्रेमियों के ह्रदय पर राज करते रहे यही मंगल कामना ।

आइये सुनते हैं पंडित जी का बांसुरी पर पानी पर लिखी कवितायें एल्बम "वाटर" से -


आलेख प्रस्तुतिकरण -
वीणा साधिका
राधिका बुधकर




Thursday, February 26, 2009

बाजे मुरलिया बाजे (पंडित हरिपसाद चौरसिया जी पर विशेष आलेख)


बाँसुरी ......वंसी ,वेणु ,वंशिका कई सुंदर नामो से सुसज्जित हैं बाँसुरी का इतिहास, प्राचीनकाल में लोक संगीत का प्रमुख वाद्य था बाँसुरी । अधर धरे मोहन मुरली पर, होंठ पे माया विराजे, बाजे मुरलियां बाजे ..................

मुरली और श्री कृष्ण एक दुसरे के पर्याय रहे हैं । मुरली के बिना श्री कृष्ण की कल्पना भी नही की जा सकती । उनकी मुरली के नाद रूपी ब्रह्म ने सम्पूर्ण चराचर सृष्टि को आलोकित और सम्मोहित किया । कृष्ण के बाद भी भारत में बाँसुरी रही, पर कुछ खोयी खोयी सी, मौन सी. मानो श्री कृष्ण की याद में उसने स्वयं को भुला दिया हो, उसका अस्तित्व तो भारत वर्ष में सदैव रहा. हो भी कैसे न ? आख़िर वह कृष्ण प्रिया थी. किंतु श्री हरी के विरह में जो हाल उनके गोप गोपिकाओ का हुआ कुछ वैसा ही बाँसुरी का भी हुआ, कुछ भूली -बिसरी, कुछ उपेक्षित सी बाँसुरी किसी विरहन की तरह तलाश रही थी अपने मुरलीधर को, अपने हरी को ।

युग बदल गए, बाँसुरी की अवस्था जस की तस् रही, युगों बाद कलियुग में पंडित पन्नालाल घोष जी ने अपने अथक परिश्रम से बांसुरी वाद्य में अनेक परिवर्तन कर, उसकी वादन शैली में परिवर्तन कर बाँसुरी को पुनः भारतीय संगीत में सम्माननीय स्थान दिलाया। लेकिन उनके बाद पुनः: बाँसुरी एकाकी हो गई ।

हरी बिन जग सुना मेरा ,कौन गीत सुनाऊ सखी री?
सुर,शबद खो गए हैं मेरे, कौन गीत बजाऊ सखी री ॥


बाँसुरी की इस अवस्था पर अब श्री कृष्ण को तरस आया और उसे उद्धारने को कलियुग में जहाँ श्री विजय राघव राव और रघुनाथ सेठ जैसे महान कलाकारों ने महान योगदान दिया, वही अवतार लिया स्वयं श्री हरी ने, अपनी प्रिय बाँसुरी को पुनः जन जन में प्रचारित करने, उसके सुर में प्राण फूँकने, उसकी गरिमा पुनः लौटाने श्री हरी अवतरित हुए हरी प्रसाद चौरसिया जी के रूप में । पंडित हरीप्रसाद चौरसिया जी......एक ऐसा नामजो भारतीय शास्त्रीयसंगीत में बाँसुरी की पहचान बन गया ।एक ऐसा नाम जिसने श्री कृष्ण की प्राणप्रिय बाँसुरी को, पुनः: भारत वर्ष में ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सम्पूर्ण चराचर जगत में प्रतिष्ठित किया, प्रतिस्थापित किया, प्रचारित किया । गुंजारित कियासम्पूर्ण सृष्टि को बाँसुरी के नाद देव से । आलोकित किया बाँसुरी के तम्हरण ब्रह्म नाद रूपी प्रकाश से ब्रह्माण्ड को ।

श्री कृष्ण का जन्म हुआ था मथुरा नगरी के कारावास में, मथुरा नगरी यानी यमुना की नगरी, उसके पावन जल के सानिध्य में श्री कृष्ण का बालपन, कुछ यौवन भी गुजरा. पंडित हरीप्रसाद जी का जन्म १ जुलाई १९३८ के दिन गंगा,यमुना सरस्वती नदी के संगम पर बसी पुण्य पावननगरी इलाहाबाद में हुआ,पहलवान पिता की संतान पंडित हरी प्रसादजी को उनके पिताजी पहलवान ही बनाना चाहते थे, किंतु उनका प्रेम तो भारतीय संगीत से था, बाँसुरी से था । शास्त्रीय गायन की शिक्षा पंडित राजाराम जी से प्राप्त की और बाँसुरी वादन की शिक्षा पंडित भोलानाथ जी से प्राप्त की । संगीत साधना से पंडित हरिप्रसादजी का बाँसुरी वादन सतेज होने लगा । बाँसुरी वादन की परीक्षा में सफल होने के बाद पंडितजी आकाशवाणी पर बाँसुरी के कार्यक्रम देने लगे। कुछ समय पश्चात् आकाशवाणी के कटक केन्द्र पर इनकी नियुक्ति हुई और इनके उत्कृष्ट कार्य के कारण ५ वर्ष के भीतर ही आकाशवाणी के मुख्यालय मुंबई में इनका तबादला हो गया।

पहले पंडित जी सीधी बाँसुरी बजाते थे, तत्पश्चात उन्होंने आडी बाँसुरी पर संगीत साधना शुरू की, बाँसुरी में गायकी अंग, तंत्र वाद्यों का आलाप आदि अंगो के समागम की साधना पंडित जी करने लगे । उसी समय इनका संगीत प्रशिक्षण आदरणीय अन्नपूर्णा देवी जी के सानिध्य में प्रारम्भ हुआ, विदुषी अन्नपूर्णा जी के संगीत शिक्षा से इनकी बाँसुरी और भी आलोकित हुई ।आइये सुनते हैं पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी का बांसुरी वादन, तबले पर है उस्ताद जाकिर हुसैन. ये दुर्लभ विडियो लगभग ९३ मिनट का है. हमें यकीन है इसे देखना-सुनना आपके लिए भी एक सम्पूर्ण अनुभव रहेगा.



अगली कड़ी में पंडित हरिप्रसाद चौरासियाँ जी की बांसुरी यात्रा सविस्तार

आलेख प्रस्तुतिकरण
वीणा साधिका
राधिका बुधकर
विडियो साभार - राजश्री डॉट कॉम



Monday, August 25, 2008

वाह उस्ताद वाह ( १ ) - पंडित शिव कुमार शर्मा


संतूर को हम, बनारस घराने के पंडित बड़े रामदास जी की खोज कह सकते हैं, जिनके शिष्य रहे जम्मू कश्मीर के शास्त्रीय गायक पंडित उमा दत्त शर्मा को इस वाध्य में आपर संभावनाएं नज़र आयी. इससे पहले संतूर शत तंत्री वीणा यानी सौ तारों वाली वीणा के नाम से जाना जाता था, जिसके इस्तेमाल सूफियाना संगीत में अधिक होता था. उमा दत्त जी ने इस वाध्य पर बहुत काम किया, और अपने बाद अपने इकलौते बेटे को सौंप गए, संतूर को नयी उंचाईयों पर पहुँचने का मुश्किल काम. अब आप के लिए ये अंदाजा लगना बिल्कुल भी कठिन नही होगा की वो होनहार बेटा कौन है, जिसने न सिर्फ़ अपने पिता के सपने को साकार रूप दिया , बल्कि आज ख़ुद उनका नाम ही संतूर का पर्यावाची बन गया. जी हाँ हम बात कर रहे हैं, संतूर सम्राट पंडित शिव कुमार शर्मा जी की. पंडित जी ने १०० तारों में १६ तार और जोड़े, संतूर को शास्त्रीय संगीत की ताल पर लाने के लिए.अनेकों नए प्रयोग किया, अन्य बड़े नामी उस्तादों के साथ मंत्रमुग्ध कर देने वाली जुगलबंदियां की, और इस तरह कश्मीर की वादियों से निकलकर संतूर देश विदेश में बसे संगीत प्रेमियों के मन में बस गया.

पंडित जी ने बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया के साथ मिलकर जोड़ी बनाई और हिन्दी फिल्मों को भी अपने संगीत से संवारकर एक नयी मिसाल कायम की, यशराज फिल्म्स की कुछ बेहतरीन फिल्में जैसे, सिलसिला (१९८१), चांदनी (१९८९), लम्हें (१९९१) और डर (१९९३) का संगीत आज भी हर संगीत प्रेमी के जेहन में ताज़ा है.

पेश है दोस्तों, पदम् विभूषण ( २००१ ) पंडित शिव कुमार शर्मा, संतूर पर बरसते बादलों का जादू बिखेरते हुए, आनंद लें इस विडियो का. १४ अगस्त २००८, को बंगलोर में हुए बरखा ऋतू संगीत समारोह से लिया गया है ये विडियो, जो हमें प्राप्त हुआ है अभिक मजुमदार की बदौलत जिन्हें इस समारोह को प्रत्यक्ष देखने का सौभाग्य मिला. यहाँ पंडित जी राग मेघ बजा रहे हैं, तबले पर संगत कर रहे हैं योगेश सामसी. विडियो ७ हिस्सों में हैं ( ३-३ मिनट की क्लिप ), कृपया एक के बाद एक देखें.

भाग-1



भाग-2



भाग-3



भाग-4



भाग-5



भाग-6



भाग-7



विडियो साभार- अभिक मजूमदार
सोत्र - इन्टरनेट
लेख संकलन - सजीव सारथी.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ