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Sunday, May 24, 2015

काफी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 220 : KAFI THAAT





स्वरगोष्ठी – 220 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 7 : काफी थाट

राग काफी में ‘बाँवरे गम दे गयो री...’ 
और 
बागेश्री में ‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 में से कम से कम पाँच स्वरों की उपस्थिति आवश्यक होती है। भारतीय संगीत में ‘थाट’, रागों के वर्गीकरण करने की एक व्यवस्था है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार सात मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते है। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारतीय संगीत में दस थाट का प्रयोग किया जाता है। इन दस थाट का प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे काफी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग काफी में निबद्ध पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में एक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। साथ ही काफी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग बागेश्री के स्वरों में निबद्ध एक बाँग्ला फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।

धुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाटों की श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की आज की कड़ी में हम ‘काफी’ थाट का परिचय प्राप्त करेंगे और इस थाट के आश्रय राग ‘काफी’ और इसी थाट के अन्तर्गत आने वाले राग बागेश्री में एक फिल्मी गीत का आनन्द भी लेंगे। परन्तु उससे पहले प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में की गई थाट विषयक चर्चा की कुछ जानकारी आपसे बाँटेंगे। थाट को संस्कृत ग्रन्थों में मेल अर्थात स्वरों का मिलाना या इकट्ठा करना कहते हैं। इन ग्रन्थों में थाट अथवा मेल के विषय में जो व्याख्या की गई है, उसके अनुसार ‘वह स्वर-समूह थाट कहलाता है, जो राग-निर्मिति में सक्षम हो’। पण्डित सोमनाथ अपने ‘राग-विवोध’ के तीसरे अध्याय में मेलों को परिभाषित करते हुए लिखते हैं- ‘थाट इति भाषायाम’ अर्थात, मेल को भाषा में थाट कहते हैं। ‘राग-विवोध’ आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व की रचना है। यह ग्रन्थ ‘थाट’ का प्राचीन आधार भी है। वर्तमान में प्रचलित दस थाटों का निर्धारण पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने किया है। आज हम आपसे थाट ‘काफी’ के विषय में कुछ चर्चा करेंगे। काफी थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒, म, प, ध, नि॒। इस थाट में गान्धार और निषाद कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। राग ‘काफी’ में गांधार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं- सारे, म, प, धनिसां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध, प, म, रे, सा । इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है और इसका गायन-वादन समय मध्यरात्रि होता है। राग काफी में होली और रंगोत्सव से सम्बन्धित रचनाएँ खूब निखरती हैं। आइए, सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग काफी की एक बन्दिश सुनते हैं।



राग काफी : ‘बावरे गम दे गयो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी



इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- भीमपलासी, पीलू, बागेश्री, आभोगी, चन्द्रकौंस, जोग, धानी, नीलाम्बरी, बहार, नायकी कान्हड़ा, गौड़ मल्हार आदि। राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ विद्वान इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त होना चाहिए। इस राग को काफी थाट से अन्तर्गत माना जाता है। राग का एक प्रचलित स्वरूप भी है, जिसके आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का हो जाता है। कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ के साथ पंचम स्वर भी वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्यति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग बागेश्री में यदि पंचम और कोमल निषाद का प्रयोग न किया जाए तो यह राग आभोगी की अनुभूति कराता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर, विशेष रूप से मध्यरात्रि में इस राग का सौन्दर्य खूब निखरता है। इस राग में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ भली लगती है। अब हम आपको राग बागेश्री में बँधी एक मोहक फिल्मी गीत का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ। 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ से यह गीत हमने लिया है। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथा पर विख्यात फिल्म-शिल्पी तपन सिन्हा के निर्देशन में फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ का निर्माण किया गया था। फिल्म की मुख्य भूमिका में सौमित्र चटर्जी और अरुन्धति देवी ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी के केन्द्र में एक शापित हवेली है, जिसमें एक सरकारी कारिन्दा उलझ जाता है। इस फिल्म का सर्वाधिक उललीखनीय पक्ष इसका संगीत है। मैहर परम्परा के उस्ताद अली अकबर खाँ फिल्म के संगीतकार थे। फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ में उन्होने एक गीत एक छोटा खयाल के रूप में शामिल किया था, जिसे उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी ने राग बागेश्री में गाया था। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग बागेश्री : ‘कैसे कटे रजनी...’ : उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी : फिल्म क्षुधित पाषाण




संगीत पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक पुरानी एक लोकप्रिय हिन्दी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के संगीतकार कौन हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 30 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 222वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ की 218वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ। इस बार पहेली में हमारे एक नये श्रोता-पाठक, बड़ोदरा, गुजरात के केतनकुमार पताडिया की भी सहभागिता रही। केतन जी के तीनों उत्तर सही रहे। इनके अलावा हमारे नियमित प्रतिभागियों, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, रायपुर, छत्तीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। दिया हैं। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात  

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। इसके अन्तर्गत हम प्रत्येक अंक में भारतीय संगीत के प्रचलित दस थाट और उनके आश्रय रागों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही थाट से जुड़े अन्य रागों पर आधारित फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आगामी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित होगा। यदि आपने वर्षा ऋतु के रागों पर कोई आलेख तैयार किया है या इन रागों की कोई रचना आपको पसन्द है, तो हमें swargoshthi@gmail.com पर शीघ्र भेजें। हम उसे आपके नाम और परिचय के साथ प्रकाशित / प्रसारित करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, December 14, 2014

‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’ : SWARGOSHTHI – 198 : RAG BAGESHRI


 
स्वरगोष्ठी – 198 में आज


शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 7 : राग बागेश्री


उस्ताद अमीर खाँ ने गाया बाँग्ला फिल्म में राग बागेश्री के स्वरों में खयाल- ‘कैसे कटे रजनी...’







‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। छठें दशक के फिल्म संगीत में इस प्रकार के गीतों की संख्या अधिक थी। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के सातवें अंक में आज हम आपसे 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक गीत पर चर्चा करेंगे। फिल्म का यह गीत राग बागेश्री कामोद के स्वरों में पिरोया गया है। सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ और बाँग्ला गीतों की सुप्रसिद्ध गायिका प्रतिमा बनर्जी ने इस गीत को स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार मैहर घराने के संवाहक उस्ताद अली अकबर खाँ थे। राग बागेश्री के स्वरूप का एक अलग रंग का अनुभव कराने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में द्रुत खयाल की एक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



उस्ताद अमीर खाँ 
विगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथाओं पर कई नाटकों और फिल्मों की रचना हुई है। वर्ष 1960 में उनकी एक कथा पर विख्यात फिल्म-शिल्पी तपन सिन्हा के निर्देशन में फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ का निर्माण किया गया था। फिल्म की मुख्य भूमिका में सौमित्र चटर्जी और अरुन्धति देवी ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी के केन्द्र में एक शापित हवेली है, जिसमें एक सरकारी कारिन्दा उलझ जाता है। इस फिल्म का सर्वाधिक उललीखनीय पक्ष इसका संगीत है। मैहर परम्परा के उस्ताद अली अकबर खाँ फिल्म के संगीतकार थे। फिल्मी संगीत-नृत्य से अलग हटकर संगीत के मौलिक शास्त्रीय स्वरूप को बनाए रखा गया था। इससे पूर्व विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रॉय 1958 की बाँग्ला फिल्म ‘जलसाघर’ में भी ऐसा ही प्रयोग कर चुके थे, जिसके संगीतकार सुप्रसिद्ध सितारवादक उस्ताद विलायत खाँ थे।

उस्ताद अली अकबर खाँ 
तपन सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के संगीतकार उस्ताद अली अकबर खाँ बाबा अलाउद्दीन खाँ के सुपुत्र थे। उनका जन्म तो हुआ था त्रिपुरा में, किन्तु जब वे एक वर्ष के हुए तब बाबा अलाउद्दीन खाँ सपरिवार मैहर जाकर बस गए। उनके संगीत की पूरी शिक्षा-दीक्षा मैहर में हुई थी। बाबा के कठोर अनुशासन में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना और अपने चाचा फकीर आफताबउद्दीन से अली अकबर को पखावज और तबला वादन की शिक्षा मिली। नौ वर्ष की आयु में उन्होने सरोद वाद्य को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया और साधनारत हो गए। एक दिन अली अकबर बिना किसी को कुछ बताए मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) चले गए। बाबा से उन्हें सरोद वादन की ऐसी उच्चकोटि की शिक्षा मिली थी कि एक दिन रेडियो से उनके सरोद वादन का कार्यक्रम प्रसारित हुआ, जिसे मैहर के महाराजा ने सुना और उन्हें वापस मैहर बुलवा लिया। 1936 के प्रयाग संगीत सम्मेलन में अली अकबर खाँ ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उनके द्वारा प्रस्तुत राग ‘गौरी मंजरी’ को विद्वानों ने खूब सराहा। इसमें राग नट, मंजरी और गौरी का अनूठा मेल था। कुछ समय तक आप आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र पर भी कार्यरत रहे। इसके अलावा कई वर्षों तक महाराजा जोधपुर के दरबार में भी रहे। उस्ताद अली अकबर खाँ ने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भरपूर ख्याति अर्जित की। उदयशंकर की नृत्य-मण्डली के साथ उन्होने पूरे भारत के साथ-साथ पश्चिमी देशों का भ्रमण किया। 1956 में उन्होने ‘अली अकबर खाँ कॉलेज ऑफ म्यूजिक’ की स्थापना की थी, जिसकी शाखाएँ विदेशों में आज भी सक्रिय हैं। खाँ साहब की भागीदारी फिल्म संगीत के क्षेत्र में भी रही। कई हिन्दी और बांग्ला फिल्मों में उन्होने संगीत रचनाएँ की, जिनमें 1952 की हिन्दी फिल्म ‘आँधियाँ’ और 1960 की बांग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ संगीत की दृष्टि से बेहद सफल फिल्में थीं। फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ में उन्होने एक गीत छोटा खयाल के रूप में शामिल किया था, जिसे उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी ने राग बागेश्री में गाया था। आइए, पहले वही गीत सुनते है-


राग – बागेश्री : ‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’ : उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी : फिल्म - क्षुधित पाषाण





उस्ताद राशिद खाँ 
राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त होना चाहिए। इस राग को काफी थाट से अन्तर्गत माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ के साथ पंचम स्वर भी वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्यति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग बागेश्री में यदि पंचम और कोमल निषाद का प्रयोग न किया जाए तो यह राग आभोगी की अनुभूति कराता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर विशेष रूप से मध्यरात्रि में इस राग का सौन्दर्य खूब निखरता है। इस राग में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ भली लगती है। अब हम आपको राग बागेश्री की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ। संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक हैं और इस घराने के संस्थापक उस्ताद इनायत हुसैन खाँ के प्रपौत्र हैं। उन्होने अपने नाना उस्ताद निसार हुसैन खाँ से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की है। आइए, प्रतिभा के धनी गायक उस्ताद राशिद खाँ से सुनते हैं, राग बागेश्री की यह श्रृंगार रस से अभिमंत्रित, आकर्षक रचना। द्रुत एकताल में निबद्ध इस खयाल रचना के बोल हैं- ‘अपनी गरज पकर लीन्ह बइयाँ मोरी....’। आप राग बागेश्री का आनन्द लीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – बागेश्री : ‘अपनी गरज पकर लीन्ह बइयाँ मोरी....’ : उस्ताद राशिद खाँ : द्रुत एकताल






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 198वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको अस्सी के दशक में बनी एक फिल्म के राग आधारित युगलगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की झलक मिल रही है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 20 दिसम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 196वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपकोफिल्म ‘रागिनी’ के लिए उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ के युगल स्वरों में एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कामोद और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के क्षेत्र में किये गए योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, June 15, 2014

हेमन्त कुमार : शास्त्रीय, लोक और रवीन्द्र संगीत के अनूठे शिल्पी



स्वरगोष्ठी – 172 में आज

व्यक्तित्व – 2 : हेमन्त कुमार मुखोपाध्याय उपाख्य हेमन्त मुखर्जी

‘जाग दर्द-ए-इश्क जाग, दिल को बेकरार कर..’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की दूसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ में हम आपसे संगीत के कुछ ऐसे साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने मंच अथवा विभिन्न प्रसारण माध्यमों पर प्रदर्शन से इतर संगीत के प्रचार, प्रसार, शिक्षा, संरक्षण या अभिलेखीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है। इस श्रृंखला में हम फिल्मों के ऐसे संगीतकारों की भी चर्चा करेंगे जिन्होंने लीक से हट कर कार्य किया। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, बांग्ला और हिन्दी फिल्म के यशस्वी गायक और संगीतकार, हेमन्त कुमार मुखोपाध्याय जिन्हें हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में हम हेमन्त कुमार के नाम से जानते और याद करते है। बांग्ला और हिन्दी फिल्म संगीत जगत पर पूरे 45 वर्षों तक छाए रहने वाले हेमन्त कुमार ने अपने राग आधारित संगीत, लोक और रवीन्द्र संगीत की रचनाओं से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। आज के अंक में हम उनके शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं के सन्दर्भ में उनकी गायक और संगीतकार की भूमिका को रेखांकित करेंगे। यह भी सुखद संयोग है कि कल ही अर्थात 16 जून को हेमन्त कुमार का 95वाँ जन्मदिवस भी है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की ओर से इस महान संगीत साधक की स्मृतियों को सादर नमन है।





भारतीय फिल्म संगीत के बहुआयामी कलासाधकों की सूची में पार्श्वगायक और संगीतकार हेमन्त कुमार का नाम शिखर पर अंकित है। बाँग्ला और हिन्दी के गीतों के गायन और संगीतबद्ध करने में समान रूप से दक्ष हेमन्त कुमार का जन्म 16 जून, 1920 को बनारस स्थित उनके ननिहाल में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा बंगाल में हुई। परिवार में संगीत का शौक तो था, किन्तु इसे व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए कोई भी सहमत नहीं था। बालक हेमन्त के स्कूल से प्रायः यह शिकायत मिलती थी कि उनकी रुचि पढ़ाई की ओर कम और गाने में अधिक है। पिता के एक मित्र सुभाष मुखर्जी की सहायता से मात्र 13 वर्ष की आयु में रेडियो के बाल कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलने लगा। कुछ बड़े होने पर हेमन्त कुमार को कोलम्बिया कम्पनी के लिए रवीन्द्र संगीत रिकार्ड करने का अवसर मिला। कम्पनी के संगीत निर्देशक शैलेन दासगुप्त को उनका गायन इतना पसन्द आया कि एक वर्ष में हेमन्त कुमार के बारह रिकार्ड प्रकाशित किये। आगे चल कर हेमन्त कुमार, संगीतकार शैलेन दासगुप्त के सहायक बने और पहली बार बाँग्ला फिल्म ‘निमाई संन्यास’ में उन्हे पार्श्वगायन का अवसर मिला। वर्ष 1944 में उन्हें पं. अमरनाथ के संगीत निर्देशन में पहली बार हिन्दी फिल्म ‘इरादा’ में दो गीत गाने का अवसर मिला। अगले वर्ष ही हेमन्त कुमार को बाँग्ला फिल्म ‘पूर्वराग’ में संगीत निर्देशन का दायित्व मिल गया। इसके बाद उन्होने अनेक छोटी-बड़ी बाँग्ला फिल्मों का संगीत निर्देशन किया। परन्तु 1951 में हेमेन गुप्ता की बाँग्ला फिल्म ‘आनन्दमठ’ में हेमन्त कुमार का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। फिल्म की सफलता से उत्साहित होकर इसी वर्ष ‘आनन्दमठ’ का हिन्दी संस्करण भी बनाया गया। इस संस्करण में भी हेमन्त कुमार का संगीत था। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना ‘वन्देमातरम्’ की विलक्षण धुन और गायन के कारण हेमन्त कुमार की हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में पार्श्वगायक के रूप में धाक जम गई। सचिनदेव बर्मन, सी. रामचन्द्र जैसे प्रतिष्ठित संगीतकारों के निर्देशन में हेमन्त कुमार के गाये अनेक गीत लोकप्रियता और गुणबत्ता की दृष्टि से शिखर पर रहे। आइए, अब हम आपको संगीतकार सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में हेमन्त कुमार का गाया एक सदाबहार गीत सुनवाते हैं। 1953 में प्रदर्शित, सी. रामचन्द्र के राग आधारित गीतों से सुसज्जित फिल्म ‘अनारकली’ में हेमन्त कुमार ने राग बागेश्री पर आधारित एक मनमोहक गीत गाया था। दादरा ताल में निबद्ध यह एक युगलगीत है, जिसमें हेमन्त कुमार का साथ लता मंगेशकर ने दिया है।


राग बागेश्री, दादरा ताल : ‘जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग...’ हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर : संगीत – सी. रामचन्द्र : गीत – राजेन्द्र कृष्ण : फिल्म - अनारकली  




हिन्दी फिल्मों में पार्श्वगायक के रूप में अपनी पहचान बना लेने के बावजूद हेमन्त कुमार को एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में स्वयं को स्थापित करना अभी बाकी था। ‘आनन्दमठ’ का संगीत उत्कृष्ट स्तर का होने के बावजूद काफी समय तक उन्हें कोई ऐसी फिल्म नहीं मिली जिसके माध्यम से वे अपनी प्रतिभा दिखा सकें। इस बीच उन्हें फिल्मिस्तान की ‘शर्त’ और ‘सम्राट’ तथा हेमेन गुप्ता द्वारा निर्देशित फिल्म ‘फेरी’ के लिए संगीत निर्देशन का अवसर मिला, किन्तु ये फिल्में कुछ विशेष चली नहीं, यद्यपि फिल्म ‘शर्त’ के गीत उत्कृष्ट स्तर के थे। निराशा के इन क्षणों में 1954 में उन्हें फिल्मिस्तान की फिल्म ‘नागिन’ का संगीत तैयार करने का अवसर मिला। इस फिल्म के गीत जनसामान्य के बीच इतना लोकप्रिय हुआ कि हेमन्त कुमार फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान हो गए। फिल्म ‘नागिन’ के संगीत के लिए हेमन्त कुमार को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया था। इसके बाद उनकी एक और सफलतम फिल्म ‘जागृति’ आई, जिसमें गीतकार प्रदीप के गाये गीत ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की...’ सहित अन्य गीतों ने गली-गली में धूम मचा दी थी। इन दो फिल्मों की आशातीत सफलता से संगीत निर्देशक के रूप में हेमन्त कुमार की माँग बढ़ गई थी। सामाजिक सरोकार की फिल्मों के साथ कुछ धार्मिक फिल्मों के संगीत निर्देशन का अवसर उन्हें मिलने लगा। वर्ष 1955 में शक्ति सामन्त निर्देशित ‘बहू’, सत्येन बोस निर्देशित ‘बन्दिश’, ‘लगन’ के साथ फिल्मिस्तान की भक्ति फिल्म ‘भागवत महिमा’ में उनके संगीत को सराहा गया। इसी प्रकार 1956 में हेमन्त कुमार ने ‘अनजान’, एस.डी. नारंग निर्देशित ‘अरब का सौदागर’, ‘बन्धन’, ‘ताज’ और ‘एक ही रास्ता’ फिल्मों में संगीत दिया था। अभी तक उन्होने अपने गीतों को भारतीय मेलोडी, बंगाल व उत्तर प्रदेश की लोकधुनों और भक्तिसंगीत की प्रचलित धुनों से सजाया था। हेमन्त कुमार के कुछ गीतों में भारतीय संगीत के रागों का स्पर्श भले ही परिलक्षित होता हो किन्तु सप्रयास राग का आधार देकर किसी गीत की धुन को तैयार करने की प्रवृत्ति 1956 की फिल्म ‘एक ही रास्ता’ में नज़र आती है। बी.आर. चोपड़ा ने अपनी इस फिल्म में संगीतकार के रूप में हेमन्त कुमार को चुना। फिल्म में अभिनेत्री मीना कुमारी पर द्रुत लय का एक नृत्य फिल्माना था। इस नृत्यगीत की रचना मजरूह सुल्तानपुरी ने की और हेमन्त कुमार ने भैरवी राग के स्वरों का आधार देकर गीत की धुन बनाई। द्रुत लय के कहरवा ताल का लोच गीत को द्विगुणित बनाता है। गीत को स्वयं हेमन्त कुमार ने स्वर दिया था। यह गीत हेमन्त कुमार के सदाबहार गीतों का सिरमौर है। आइए , अब आप हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया और गाया यह गीत आप भी सुनिए।


राग भैरवी, कहरवा ताल : ‘चली गोरी पी के मिलन को चली...’ स्वर और संगीत – हेमन्त कुमार : गीत – मजरूह सुल्तानपुरी : फिल्म - एक ही रास्ता




हेमन्त कुमार के सांगीतिक जीवन में छठाँ दशक सर्वाधिक उल्लेखनीय रहा है। इस पूरे दशक में फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों का सहज अध्ययन उनके संगीत के माध्यम से किया जा सकता है। उनके शुरुआती दौर के संगीत में भारी-भरकम वाद्यों की भीड़ नहीं थी। फिल्म ‘नागिन’ की सफलतम धुनों में भी बाँसुरी, वायलिन, इसराज, और सारंगी के अलावा बीन की ध्वनि के विकल्प के तौर पर क्लेवायलिन का मोहक प्रयोग हुआ है। आगे चल कर आनन्द जी के साथ संगीतकार जोड़ी बनाने वाले कल्याण जी उन दिनों हेमन्त कुमार के सहायक थे और क्लेवायलिन से बीन की ध्वनि का वादन उन्होने ही किया था। हेमन्त कुमार के सांगीतिक जीवन का पहला पड़ाव यदि फिल्म ‘आनन्दमठ’ को माना जाए तो ‘नागिन’ इस यात्रा का दूसरा सुखद पड़ाव है। ‘नागिन’ के बाद काफी समय तक उनके गीतों की धुनों में नृत्यात्मक तत्त्व बने रहे। थिरकन से युक्त लय गीत के भावों की अनुगूँज उनके अधिकतर गीतों में उपस्थित है। इसी दशक में वह आधुनिक वाद्यवृन्द का उपयोग भी अपने गीतों में करने लगे थे। पियानो का सुंदर उपयोग उनके इस दौर के गीतों में मिलता है। गायक और संगीतकार के रूप में न केवल हिन्दी फिल्मों में बल्कि बाँग्ला फिल्मों में भी वे समान रूप से व्यस्त रहे। कभी-कभी तो उनकी सुबह मुम्बई में तो शाम कोलकाता में बीतती थी। कुछेक गीतों में पाश्चात्य धुनों की नकल भी परिलक्षित होती है, किन्तु आदि से अन्त तक के प्रायः सभी गीतों में हेमन्त कुमार की विशेष शैली उपस्थित मिलती है। उन्होने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण नहीं की, किन्तु अनेक गीतों में उनका रागों का ज्ञान स्पष्ट रूप से झलकता है। इस कड़ी के अन्त में हम आपको हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया एक ऐसा गीत सुनवाते है जिसमें नृत्यत्मकता है, प्रकृति अर्थात लोक का स्पर्श है, रागानुकूल तानों का समावेश है, ताल का लोच है और इन सब विशेषताओं के साथ ठुमरी अंग का मोहक स्पर्श भी है। 1957 में प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था ए.वी.एम. की फिल्म ‘मिस मेरी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में हेमन्त कुमार का संगीत एकदम अनूठा था और उपरोक्त सभी गुणों से अलंकृत था। इसी फिल्म का एक गीत हमने आपके लिए चुना है। गीत के बोल हैं- ‘सखि री सुन बोले पपीहा उस पार...’। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे गीत को हेमन्त कुमार ने तीनताल में निबद्ध किया है। गीत लता मंगेशकर और आशा भोसले के युगल स्वरों में है। इस गीत में राग मिश्र खमाज की छाया है। इस रचना में ठुमरी अंग का स्पर्श भी किया गया है। कुल मिला कर इस गीत में हेमन्त कुमार के प्रायः सभी सांगीतिक गुणों का समावेश नज़र आता है। आप यह मधुर गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र खमाज, तीनताल : ‘सखि री सुन बोले पपीहा उस पार...’ लता मंगेशकर और आशा भोसले : संगीत – हेमन्त कुमार : गीत – राजेन्द्र कृष्ण : फिल्म - मिस मेरी





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 172वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – इस गीत के गायक कलाकार को पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 174वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 170वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे की आवाज़ में गायी ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ठुमरी शैली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मिश्र खमाज। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। यह हमारी 170वीं कड़ी की पहेली का परिणाम था। इसी के साथ वर्ष 2014 की दूसरी श्रृंखला का परिणाम भी स्पष्ट हो गया है। इस श्रृंखला के विजेता और उनके प्राप्तांक इस प्रकार रहे।

1- डी. हरिणा माधवी, हैदराबाद – 20 अंक प्रथम

2- क्षिति तिवारी, जबलपुर – 20 अंक प्रथम

3- हरकीरत सिंह, चंडीगढ़ – 16 अंक द्वितीय

4- विजया राजकोटिया, पेंसिलवानिया, अमेरिका – 8 अंक तृतीय

आप सभी श्रृंखला विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सम्पादक मण्डल की ओर से हार्दिक बधाई।





अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार हेमन्त कुमार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की। अगले अंक में भी हम एक और फिल्म संगीत के विख्यात संगीतकार की सांगीतिक कृतियों की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, June 8, 2014

संगीत के प्रचार, प्रसार और संरक्षण में संलग्न एक साधक



स्वरगोष्ठी – 171 में आज

व्यक्तित्व – 1 : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे 

‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आपके प्रिय स्तम्भ की आज से एक नई लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ आरम्भ हो रही है। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे जिन्होंने मंच अथवा विभिन्न प्रसारण माध्यमों पर प्रदर्शन से इतर संगीत के प्रचार, प्रसार, शिक्षा, संरक्षण या अभिलेखीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम भारतीय संगीत के उच्चकोटि के कलाकार होने के साथ ही संगीत के शास्त्रीय और प्रायोगिक पक्ष के विद्वान पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। वर्ष 1983 से 1993 तक उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में सचिव पद पर रहते हुए उन्होने भारतीय संगीत के प्रचार-प्रसार के साथ ही अभिलेखीकरण का उल्लेखनीय कार्य किया था। आज 80 वर्ष की आयु में भी वे संगीत विषयक विभिन्न कार्यों में सक्रिय हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठकों के लिए सुपरिचित, इसराज और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने श्रीखण्डे जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का उल्लेख किया है। यह भी सुखद संयोग है कि श्रीखण्डे जी दो दिन बाद ही अर्थात 10 जून को अपनी आयु के 80 वर्ष पूर्ण कर 81वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीखण्डे जी को उनके 81वें जन्मदिवस पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करता है।

 


ह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच से शास्त्रीय गायन के उच्चकोटि के कलाकार, संगीत के शास्त्रीय एवं प्रायोगिक पक्ष के मूर्धन्य विद्वान, संगीत के अभिलेखीकरण के विशेषज्ञ और संगीत संस्थाओं के योग्य प्रशासनिक अधिकारी पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व के उल्लेख करने का अवसर मिला। मेरे लिए यह भी सौभाग्य का विषय है कि उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी मे 10 वर्षों तक श्रीखण्डे जी के साथ कार्य करने का अवसर भी मिला। इस अवधि में संगीत के इस बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में जो कुछ भी जान सका उसे आप सबके बीच बाँट रहा हूँ।

पं. श्रीखण्डे जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद स्थित उरई नामक एक छोटे नगर में 10 जून, 1934 को हुआ था। इनके पिता श्री विश्वास राव श्रीखण्डे ने इनकी सांगीतिक प्रतिभा को पहचान कर उरई के ही शिक्षक पं. प्रभुनाथ मिश्र से संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दिलाई। इसके बाद इन्हें गायन की विविध विधाओं और क्लिष्ट रचनाओं की शिक्षा इलाहाबाद के प्रख्यात संगीतज्ञ पं. भोलानाथ भट्ट से प्राप्त हुई। शास्त्रीय गायन की उच्च शिक्षा विश्वविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ (इन्दौर) से इन्हें प्राप्त हुई। उस्ताद अमीर खाँ की रागानुसार सटीक सुरलगाव, मीड़, कण, गमक, मुर्की आदि से युक्त स्वर प्रस्तार एवं अन्यान्य कलात्मक विशेषताओं को इन्होंने अपनी गायकी में आत्मसात किया। युवावस्था में ही अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर आपके गायन की भरपूर प्रशंसा हुई। वर्ष 1958 से 1967 तक आकाशवाणी के दिल्ली, नागपुर और हैदराबाद केन्द्रों पर प्रोड्यूसर के रूप में कार्य किया। 1967 से 1972 तक जम्मू कश्मीर के इन्स्टीच्यूट आफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट में प्रधानाचार्य रहे। 1975 से 1982 के बीच भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की ओर से फीजी के सांस्कृतिक केन्द्र में और फिर उसके बाद मारीशस के महात्मा गाँधी संस्थान में निदेशक पद पर कार्य किया। 1983 में श्रीखण्डे जी ने उतार प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव पद पर कार्यभार ग्रहण किया और 1993 में यहीं से सेवानिवृत्त हुए। यहाँ प्रशासनिक दायित्व का निर्वहन करते हुए उन्होने अकादमी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलायी। इस अवधि में उन्होने संगीत, नाटक और कथक नृत्य के प्रचार, प्रसार और विकास के अनेक नए कार्यक्रमों को मूर्तरूप दिया। इससे भी बढ़कर कम प्रचलित या लुप्तप्राय संगीत शैलियों का सर्वेक्षण, वैज्ञानिक ढंग से उनका संग्रह और अभिलेखीकरण करा कर अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध बनाने में श्रीखण्डे जी का योगदान स्तुत्य है।

आगे बढ्ने से पहले आइए, श्रीखण्डे जी के बहुआयामी व्यक्तित्व के शास्त्रीय गायक पक्ष का अवलोकन करते चलें। वर्तमान में श्रीखण्डे जी की आयु 80 वर्ष हो चुकी है। लगभग दो वर्ष पूर्व संगीत-प्रेमियों की एक बैठक में उन्होने राग बागेश्री का गायन प्रस्तुत किया था। अब हम आपको उसी प्रस्तुति का एक अंश सुनवाते हैं। पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे द्वारा प्रस्तुत राग बागेश्री के खयाल की इस प्रस्तुति में तबला संगति अनिल खरे ने और वायलिन संगति श्रीपाद तिलक ने की है।


राग बागेश्री : खयाल तीनताल : ‘बलमा मोरी तोरे संग लागली प्रीत...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे





श्रीखण्डे जी ने अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध करने के लिए शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक, सभी विधाओं के वरिष्ठ संगीतज्ञों को आमंत्रित कर उनकी रिकार्डिंग कराई। श्रीखण्डे जी ऐसे अन्वेषक हैं जो महासागर की अथाह गहराई में प्रवेश करके रत्नों को प्राप्त कर लेते हैं। शास्त्रीय और लोक संगीत के वाद्यों के विविध पक्षों से जुड़ी जानकारियों एवं दुर्लभ, पारम्परिक रचनाओं की खोज व उनकी रिकार्डिंग कराई और भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ कराया। ध्रुवपद क्षेत्र में स्व. बालजी चतुर्वेदी, स्व. रामचतुर मलिक, स्व. सियाराम तिवारी, स्व. जिया मोहिउद्दीन डागर (रुद्रवीणा), खयाल गायन के क्षेत्र में स्व. काशीनाथ बोडस, स्व. हरिशंकर मिश्र, स्व. मल्लिकार्जुन मंसूर, स्व. जी.एन. नातू, स्व. के.जी. गिण्डे, स्व. रामाश्रय झा आदि, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत के दिग्गज कलाकारों की रिकार्डिंग से अकादमी समृद्ध है। इसी प्रकार श्रीखण्डे जी ने वाद्य संगीत के वरिष्ठ कलाकारों को आमंत्रित कर उनकी वार्ता और प्रस्तुतियों की रिकार्डिंग कराई। अकादमी में संग्रहीत सांगीतिक सामग्री का अध्ययन कर अनेक शोधछात्र और अध्येता लाभान्वित हो चुके हैं। श्रीखण्डे जी ने अपने कार्यकाल में लगभग 3000 घण्टे की गुणात्मक महत्त्व की विविध पारम्परिक व दुर्लभ सामग्री का संग्रह कराया था।

अभिलेखागार को समृद्ध बनाने के अलावा श्रीखण्डे जी ने कई नए कार्यक्रमों का सूत्रपात और पहले से जारी कई कार्यक्रमों को विस्तार भी दिया था। इनमें अकादमी की सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना, सम्भागीय व प्रादेशिक संगीत प्रतियोगिता, कथक समारोह, नाट्य समारोह, कठपुतली समारोह, अवध संध्या आदि के आयोजन में उनकी दृष्टि की सराहना कलाप्रेमी आज भी करते हैं। कलाप्रेमियों से सीधे संवाद के लिए उन्होने कलामित्र योजना का आरम्भ भी किया था। कलासाधकों और कलाप्रेमियों के बीच उन्होने सेतु बनाने का सफल प्रयास किया। आइए, अब श्रीखण्डे जी की आवाज़ में एक ठुमरी सुनी जाए। पूरब अंग की मिश्र खमाज की इस ठुमरी में तबला संगति सतीश तारे ने और हारमोनियम संगति विवेक दातार ने की है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी मिश्र खमाज : ‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 171वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म के बेहद लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमें उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस गीतांश में आपको किस राग का आधार दिख रहा है? राग का नाम लिखिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 169वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको तंत्रवाद्य सारंगी के लोक स्वरूप में वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थानी सारंगी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थान। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से एक नवीन श्रृंखला आरम्भ हुई है। इस श्रृंखला में हम शास्त्रीय संगीत के कुछ ऐसे कलाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने मंच प्रदर्शन के अलावा अन्य क्षेत्रों में यश पाया है। अगले अंक में हम आपसे एक ऐसे संगीतकार की चर्चा करेंगे जिन्होंने फिल्म संगीत को रागों से सुसज्जित कर अपना योगदान किया है। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



आलेख : श्रीकुमार मिश्र  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


Wednesday, January 15, 2014

रागमाला गीत – 1 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



 


प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 1


राग बहार, बागेश्री, यमन कल्याण, केदार, भैरव और मेघ मल्हार के रंग बिखेरता रागमाला गीत

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’


फिल्म : संगीत सम्राट तानसेन 
संगीतकार : एस.एन. त्रिपाठी 
गायक : पूर्णिमा सेठ, पंढारीनाथ कोल्हापुरे और मन्ना डे

आलेख : कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन







Sunday, December 22, 2013

मीरा का एक और पद : विविध धुनों में


स्वरगोष्ठी – 147 में आज


रागों में भक्तिरस – 15


‘श्याम मने चाकर राखो जी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पन्द्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री के एक पद- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम मीराबाई के साहित्य और संगीत पर चर्चा जारी रखते हुए एक और बेहद चर्चित पद- ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ सुनवाएँगे। इस भजन को विख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी, वाणी जयराम, लता मंगेशकर और चौथे दशक की एक विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। इन चारो गायिकाओं ने मीरा का एक ही पद अलग-अलग धुनों में गाया है। आप इस भक्तिगीत के चारो संस्करण सुनिए और स्वरों के परिवर्तन से गीत के भाव में होने वाले आंशिक बदलाव का प्रत्यक्ष अनुभव कीजिए। 


तिहासकारों के अनुसार भक्त कवयित्री मीराबाई का जन्म विक्रमी संवत 1561 अर्थात 1504 ई. के श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि को हुआ था। अजमेर के लेखक श्री ओमप्रकाश ने अपनी पुस्तक ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ की भूमिका में मीरा की भक्ति रचनाओं का विवेचन करते हुए लिखा है- “सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों में मुगल आक्रमणकारियों से भयाक्रान्त समाज को मीरा ने भक्ति का सम्बल दिया। पूरे भारतवर्ष के कोने-कोने में भक्ति आन्दोलन चल रहे थे। मीरा ने भी उसी संस्कृति के भक्ति-प्रवाह को परिपुष्ट किया। ‘नारी भोग्या नहीं, माँ है’ की जीवन-दृष्टि देकर नारी को नव प्रतिष्ठा दी। समाज की सुव्यवस्था हेतु कुरीतियों का उन्मूलन कर, चिर विद्रोहिणी की भूमिका निभाते हुए समाज-सुधार का कर्तव्य निभाया।”

आज के अंक में हमने मीरा का वह पद चुना है जिसमें वह अपने आराध्य श्रीकृष्ण से आग्रह कर रही हैं कि ‘हे श्याम मुझे अपना चाकर बना लो’। सबसे पहले आप यह भक्तिगीत सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनेगे। मीरा के व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन दर्शन पर 1947 में चन्द्रप्रभा मूवीटोन द्वारा निर्मित फिल्म ‘मीरा’ के गीतों में उन्होने स्वयं अपना स्वर दिया था। यह फिल्म पहले तमिल में और फिर हिन्दी में भी बनी थी। विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी ने इस फिल्म में न केवल गीत गाये, बल्कि मीरा की भूमिका में अभिनय भी किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक एस.वी. वेंकटरमन, जी. रामनाथन् और नरेश भट्टाचार्य थे। फिल्म में मीरा का यह पद एक अप्रचलित राग बिहारी के स्वरों में निबद्ध है। मीरा-भजन के इस संस्करण के बाद आप इसका दूसरा संस्करण भी सुनेगे। भजन- ‘मने चाकर राखो जी...’ का यह संस्करण चौथे दशक में सक्रिय किन्तु वर्तमान में विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। गायिका सती देवी चर्चित पार्श्वगायक किशोर कुमार की पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता (गांगुली) की माँ थीं। चौथे और पाँचवें दशक में गाये गए इस मीरा-भजन के इन दोनों संस्करणों का आप रसास्वादन कीजिए।


मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : एम.एस. शुभलक्ष्मी : फिल्म मीरा (1947)




मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : सती देवी : गैर फिल्मी भजन



भक्त कवयित्री मीरा के पद ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ पर हमारी यह चर्चा जारी है। मीरा के जीवन दर्शन पर एक और फिल्म ‘मीरा’ 1979 में गीतकार गुलजार के निर्देशन में बनी थी। इस फिल्म में भी मीरा के अन्य पदों के साथ-साथ ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ भी शामिल था, जिसे वाणी जयराम ने अपना स्वर दिया था। फिल्म के संगीत निर्देशक विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर थे। उन्होने इस भजन को राग भैरवी के स्वर दिये। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले कई अंकों में हम राग भैरवी की चर्चा करते रहे हैं। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। मीरा का यह पद पहले आप राग भैरवी के स्वरो में सुनेगे और फिर उसके बाद यही पद राग बागेश्री के स्वरो पर आधारित प्रस्तुत करेंगे। यह संस्करण हमने 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘तूफान और दीया’ से लिया है। भजन के स्थायी की पंक्ति में श्याम के स्थान पर गिरधारी शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे और इस भजन को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। गीत में राग बागेश्री की स्पष्ट झलक मिलती है। बेहद लोकप्रिय राग है, बागेश्री। कुछ लोग इसे बागेश्वरी नाम से भी सम्बोधित करते हैं, किन्तु वरिष्ठ गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के अनुसार इस राग का सही नाम बागेश्री ही होना चाहिए। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग कर्नाटक संगीत के नटकुरंजी राग से काफी मिलता-जुलता है। राग बागेश्री में पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग होता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। कुछ विद्वान आरोह में पंचम का प्रयोग न करके औड़व-सम्पूर्ण रूप में इस राग को गाते-बजाते हैं। इसमें गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राधा का सर्वप्रिय राग माना जाता है। आप मीरा के पद- ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ को पहले राग भैरवी और फिर राग बागेश्री के स्वरों में सुनिए और मुझे श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : वाणी जयराम : फिल्म मीरा (1979)




राग बागेश्री : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म तूफान और दीया




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 149वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रविशंकर द्वारा स्वरबद्ध और वाणी जयराम की आवाज़ में प्रस्तुत मीरा के एक भजन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सात मात्रा का रूपक ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। क्षिति जी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर भक्त कवयित्री मीरा के एक और पद पर चर्चा की। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि महात्मा कबीर की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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