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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

"आज फिर जीने की तमन्ना है..." - क्यों शुरू-शुरू में पसन्द नहीं आया था देव आनन्द को यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 72
 

'आज फिर जीने की तमन्ना है...' 


 रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 72-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की फ़िल्म ’गाइड’ के गीत "आज फिर जीने की तमन्ना है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सचिन देव बर्मन का। 


हर फ़िल्मी गीत का निश्चित स्वरूप होता है, पहले मुखड़े से पहले का प्रस्तावना या कुछ शब्द, फिर मुखड़ा, फिर अन्तराल संगीत, फिर अन्तरा। शुरू से लेकर अब तक अधिकांश फ़िल्मी गीत इसी स्वरूप को मानते चले आए हैं। फिर भी कभी कभार कुछ गीतकारों और संगीतकारों ने नए प्रयोग किए और इस स्वरूप से हट कर गीत बनाए। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले" इस स्वरूप को नहीं मानता। इस गीत में कोई अन्तरा नहीं है, बल्कि हर अन्तरा मुखड़े की धुन पर ही आधारित है। इसी तरह से एक गीत ऐसा भी है जो शुरू होता है अन्तरे से और मुखड़ा अन्तरे के बाद आता है। सचिन देव बर्मन की धुन पर शैलेन्द्र का लिखा हुआ यह गीत है फ़िल्म ’गाइड’ का - "आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है" जो शुरू होता है "काँटों से खींच के यह आँचल" जो अन्तरा है। पिता के इस नवीन प्रयोग को पुत्र पंचम ने भी एक बार अपने एक गीत में प्रयोग किया। फ़िल्म ’बेताब’ का वह गीत था "तेरी तसवीर मिल गई" जो शुरू होता है "यह मेरी ज़िन्दगी बेजान लाश थी" से। ख़ैर, आज हम चर्चा करेंगे "आज फिर जीने की तमन्ना है" का। अपने ज़माने का सुपर-डुपर हिट गीत और आज तक आए दिन रेडियो पर सुनने को मिल जाता है। गीत के 50 वर्ष बाद भी यह उतना ही लोकप्रिय है। और यही नहीं आमिर ख़ान की अगली फ़िल्म का शीर्षक भी ’आज फिर जीने की तमन्ना है’ होने जा रहा है, ऐसी ख़बर मीडिया में आई है। इसी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस जुमले में कितनी शक्ति है! लेकिन जब यह गीत बना था तब देव आनन्द को यह गीत बिल्कुल बकवास लगा था।

"आज फिर जीने की तमन्ना है" गीत फ़िल्म की कहानी के हिसाब से भी बेहद ज़रूरी और सार्थक था क्योंकि इसी गीत से परिवर्तन होता है फ़िल्म की हीरोइन रोज़ी के चरित्र का। यही गाना बताता है कि अब रोज़ी अपने पति के चंगुल से आज़ाद है और निकल पड़ी है एक नए सफ़र पर, ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत के लिए। जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, तब सबसे पहले यही गाना लोगों के ज़बान पर चढ़ गया था। मगर यही लोकप्रिय गाना देव आनन्द के गले नहीं उतर रहा था। वो इस गाने को शूट करना तो दूर, वो इसे दूसरे किसी म्युज़िक डिरेक्टर से दोबारा बनवाना चाहते थे। इतना ना-पसन्द था उन्हें यह गाना। वहीदा रहमान ने अपनी किताब में इस घटना का ज़िक्र किया है कि एक दिन शूटिंग के वक़्त जब इस गाने को शूट करने की बारी आई तो देव आनन्द साहब बहुत अपसेट थे। उन्होंने फ़िल्म के निर्देशक विजय आनन्द, जो उनके भाई थे, से कहा कि "ये बर्मन दादा को क्या हो गया है, ऐसा गाना बना दिया है, मज़ा नहीं आ रहा है। I just can't take it. मुझे दादा से बात करनी पड़ेगी कि गाने में बिल्कुल मज़ा नहीं आ रहा है, किसी और कम्पोज़र से गाना बनवानी पड़ेगी।" देव साहब की यह बात सुन कर गोल्डी को अजीब लगा। पूरी युनिट ने भी यह बात सुनी, सब ने कहा कि "आपको यह गाना बुरा लगा है, कम से कम एक बार यह गाना हमको तो सुनवा दें। शूटिंग् तो उसी दिन करनी है हमको।" देव आनन्द ने बड़े अनमने मन से कहा कि अच्छा नागरे के उपर लगा दो, और सुनो। नागरा एक स्पूल वाली मशीन हुआ करती थी उस ज़माने में, जिस पर गाना लगा देते थे। गाना लगाया गया, गाना सबने सुना, और सब उछल पड़े गाने के बाद। लता जी की बेहतरीन आवाज़, एस. डी. बर्मन का बेहतरीन संगीत, शैलेन्द्र का बेहतरीन गीत, सबको बहुत अच्छा लगा, आपको पसन्द क्यों नहीं आ रहा है? लेकिन देव साहब के उपर कोई असर ही नहीं हुआ। अब सबने सोचा कि शूटिंग् का टाइम आ रहा है, कैसे देव साहब को मनायें? तब भाई विजय आनन्द के दिमाग़ में एक विचार आया। उन्होंने भाई से कहा, "हम सब आपकी जज़्बात की इज़्ज़त करते हैं कि आपको गाना पसन्द नहीं आ रहा है, मगर फिर भी एक हमारी अनुरोध है कि गाना शूट कर लेते हैं, शूट करने के बाद जब आप देखेंगे कि गाना पसन्द नहीं आ रहा है, तो निकाल देंगे।" देव आनन्द मान गए। और इस गीत को राजस्थान के अलग अलग स्थानों पे पाँच दिनों में शूट किया गया। इसी शूटिंग् के दौरान एक बहुत अहम बात हो गई जिसने देव आनन्द के फ़ैसले को बदल दिया। हर दिन शूट के बाद फ़िल्म के कर्मी दल के सदस्य जब होटल लौटते तो सभी की ज़बान पर यही गाना होता था। जहाँ देखो जिसे देखो हर कोई यही गाना गुनगुनाता हुआ नज़र आता था। लोगों की ज़ुबान पर गाना चढ़ गया। तब देव साहब को यह एहसास हुआ कि उनका फ़ैसला हो सकता है कि ग़लत हो। पाँचवे दिन जब वो सेट पे पहुँचे, तो उन्होंने पूरे कर्मी दल से कहा कि "Sorry, I made a mistake, सचमुच यह गाना बहुत अच्छा है और अब यही गाना इस फ़िल्म का हिस्सा भी बनेगा। मैं रखूँगा इस गाने को।" और उसके बाद फिर क्या हुआ, इतिहास गवाह है। 

फिल्म - गाइड : 'काँटों से खींच कर ये आँचल....' : लता मंगेशकर




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




शनिवार, 12 सितंबर 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 06 - जैकी श्रॉफ़


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 06
 
जैकी श्रॉफ़ 

इस तरह जयकिशन काकुभाई श्रॉफ़ बन गए जैकी श्रॉफ़


’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है फ़िल्म जगत के जाने माने अभिनेता जैकी श्रॉफ़ पर।
  


यकिशन काकुभाई श्रॉफ़ का जन्म मुंबई के तीन बत्ती इलाके में एक ग़रीब परिवार में हुआ था। पिता काकुभाई श्रॉफ़ पेशे से एक ज्योतिषी और माँ रीता एक गृहणी थीं। रोज़ी-रोटी की तलाश में पिता को अक्सर बाहर घूमना पड़ता था। इसलिए नन्हे जयकिशन अपनी माँ और बड़े भाई हेमन्त के ज़्यादा क़रीब था। दोनो भाइयों की पढ़ाई-लिखाई भी ख़ास हो नहीं पा रही थी क्योंकि ज्योतिष पिता की कमाई से यह संभव नहीं हो पा रहा था। किसी तरह से जयकिशन नाना चौक के Master's Tutorial High-School में भर्ती हुए। कॉलेज शिक्षा का तो सवाल ही नहीं था। जयकिशन जिस इलाके में रहते थे, वह कोई अच्छा इलाका नहीं था। वहाँ अक्सर मार-पीट, गुंडा-गर्दी लगी रहती थी। बालावस्था में जब जयकिशन को मोहल्ले के दूसरे बच्चे तंग करते या मारने आते तो वो अपने बड़े भाई हेमन्त को आगे कर देते, और हर बार हेमन्त जयकिशन को बचा लेते। लेकिन दो भाइयों का साथ बहुत ज़्यादा दिनों तक भगवान को मंज़ूर नहीं था। एक दिन ज्योतिष पिता ने हेमन्त से कहा कि आज का दिन तुम्हारे लिए ठीक नहीं है, आज तुम घर से बाहर मत निकलना। यह कह कर पिता काम पर निकल गए। तभी एकाएक खबर आई कि कोई बच्चा पानी में डूब रहा है। सुनते ही हेमन्त भागा और नदी में कूद गया। उस बच्चे को तो उसने बचा लिया पर हेमन्त की आँखें हमेशा के लिए बन्द हो गईं। जयकिशन उस समय मात्र 10 वर्ष का था। उसके लिए जैसे सबकुछ ख़त्म हो गया। बड़े भाई का हाथ सर से उठते ही मोहल्ले के बच्चे और गुंडे जयकिशन को पीटने लगे। बात बे-बात पे झगड़ा और हाथापाई शुरू हो जाया करता। स्ट्रीट-फ़ाइट जैसे जयकिशन की ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन चुका था। फिर धीरे धीरे जयकिशन को समझ आया कि जब तक वह चुपचाप मार खाता रहेगा, लोग उसे मारते रहेंगे। और एक दिन ऐसा आया जब उसने भी पलट वार करना शुरू किया। ख़ुद मार खाता और दूसरों को भी मारता। एक आवारा लड़के की तरह बड़ा होने लगा जयकिशन।


कुछ समय बाद जयकिशन को यह अहसास हुआ कि अब वक़्त आ गया है कि जीवन में कुछ उपार्जन करना चाहिए। होटलों और एयरलाइनों में उसने नौकरी की अर्ज़ियाँ दी पर सभी जगहों से "ना" ही सुनने को मिली। अन्त में ट्रेड विंग्स ट्रैवल अजेन्सी में टिकट ऐसिस्टैण्ट की एक नौकरी उसे मिली। कुछ दिनों बाद एक दिन जब वह सड़क पर से गुज़र रहा था तो एक मॉडेलिंग् एजेन्सी के एक महाशय ने उसकी कदकाठी को देखते हुए उसे मॉडेलिंग् का काम ऑफ़र कर बैठे। और इसी से जयकिशन के क़िस्मत का सितारा थोड़ा चमका। ख़ाली जेब में कुछ पैसे आने लगे। इसी मॉडेलिंग् के चलते उन्हें देव आनन्द की फ़िल्म ’स्वामी दादा’ में छोटा रोल निभाने का अवसर मिला। इस छोटे से सीन को सुभाष घई ने जब देखा तो उन्हें लगा कि इस लड़के में दम है और उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’हीरो’ में उसे हीरो बनाने का निर्णय ले लिया। और इस तरह से जयकिशन काकुभाई श्रॉफ़ बन गए जैकी श्रॉफ़। And rest is history!!!  जैकी श्रॉफ़ जिस परिवार और समाज से निकल कर एक स्थापित अभिनेता बने हैं, उससे हमें यही सीख मिलती है कि ज़िन्दगी किसी पर भी मेहरबान हो सकती है, सही दिशा में बढ़ने का प्रयास करना चाहिए और बस सही समय का इन्तज़ार करना चाहिए। जैकी श्रॉफ़ के जीवन की इस कहानी को जानने के बाद यही कहा जा सकता है कि जैकी, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

"क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...", क्यों आँखें भर आईं सुरैया की इस गीत को फ़िल्माते हुए?


एक गीत सौ कहानियाँ - 43
 

‘क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...






'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 43-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'मोतीमहल' के गीत "क़िस्मत ने हमें रोने के लिये दुनिया में अकेला छोड़ दिया" के बारे में।




फ़िल्मों में कलाकार अपना अपना किरदार निभाते हैं, कई रिश्तों को पर्दे पर साकार करना होता है, जैसे कि पति-पत्नी, माँ-बेटा, पिता-पुत्री, भाई-बहन, दो बहनें आदि। पर्दे पर भले दो कलाकारों के बीच का रिश्ता बिल्कुल पक्का दिखाई दे, पर यह तो हक़ीक़त नहीं। शूटिंग ख़त्म होते ही सब अपनी अपनी राह पर आगे बढ़ निकलते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ कि फ़िल्मों में एक साथ अभिनय करते-करते दो कलाकार असली ज़िन्दगी में भी बहुत क़रीब आ गये हों। जी नहीं, मैं उन कलाकारों की बात नहीं कर रहा जिन्होंने एक दूसरे से शादी कर ली। बल्कि मेरा इशारा है उन दो अभिनेत्रियों की तरफ़ है, जिनका एक साथ अभिनय करते हुए आपस में बहनों जैसा रिश्ता बन गया था। बल्कि यूँ कहें कि वो दो बहनें बन चुकी थीं। ज़िक्र हो रहा है सिंगिंग स्टार सुरैया और प्यारी सी बेबी तबस्सुम का। सन् 1950 की फ़िल्म 'बड़ी बहन' और 1952 की फ़िल्म 'मोती महल' में बेबी तबस्सुम और सुरैया जी ने एक साथ काम किया। इसमें तबस्सुम ने सुरैया की छोटी बहन का रोल निभाया था। और यह दोनो किरदार निभाते-निभाते हक़ीक़त में एक दूसरे से बहनों जैसा प्यार करने लगीं। बेबी तबस्सुम सुरैया को आपा कह कर बुलाने लगी। एक अजीब सा अपनापन दोनो एक दूसरे में महसूस करने लगीं। फ़िल्म 'मोती महल' की कहानी ऐसी थी कि जिसमें तबस्सुम के किरदार को मरना होता है। यह जानकर सुरैया काँप उठीं; उनके हाथ-पाँव ठंडे हो गये यह सोच कर कि यह सीन वो कैसे करेंगी। वो ऐसा हक़ीक़त में तो दूर फ़िल्म की कहानी में भी नहीं सोच सकती थी कि तबस्सुम की बेजान शरीर उनके सामने रखी है। उस पर से फ़िल्म के निर्देशक रवीन्द्र दवे ने सुरैया को बताया कि तबस्सुम के किरदार के मरने वाले सीन में एक गाना रखा गया है जो उन्हें गाना है। और वह गीत था "क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया, "। सुरैया सोच में पड़ गईं कि 3 मिनट तक तबस्सुम के मरने के इस सीन को वो कैसे झेल पायेंगी?

असद भोपाली व हंसराज बहल
ख़ैर, फ़िल्म की कहानी और निर्देशक के फ़ैसले को ध्यान में रखते हुए सुरैया ने अपनी निजी परेशानी का ज़िक्र किसी से नहीं किया और यह सीन करने के लिए तैयार हो गईं और प्रोफ़ेशन के साथ अन्याय नहीं होने दिया। इस सीन के शूटिंग का दिन आ ही गया। इस ईमोशनल सीन के लिए जब सुरैया जी को ग्लिसरीन दी गई आँखों में डालने के लिए, तो सुरैया जी ने आँखों में ग्लिसरीन डालने से मना कर दिया। बेबी तबस्सुम की तरफ़ देखते हुए उससे कहा, "बस इस गाने में शॉट के समय तुम मेरे सामने रहना। तुम मेरी बहन की तरह हो, तुम्हे देख कर सच में मुझे लगेगा कि मेरी बहन मेरे सामने है और मुझे अपने आप ही रोना आ जायेगा। ग्लिसरीन की कोई ज़रूरत नहीं है"। गाना शुरू हुआ, गीतकार असद भोपाली ने ऐसे दिल को छू लेने वाले बोल लिखे और संगीतकार हंसराज बहल ने ऐसी करुण धुन बनाई कि सुरैया की आँखें भर आईं और सीन बिल्कुल जीवन्त लगने लगा। यह एक ग़ज़लनुमा गीत था जिसके अन्तरों के शेर थे "सुख चैन लुटा दुख दर्द मिला बेचैन है दिल मजबूर है हम, दुनिया ने हमारे जीने का हर एक सहारा तोड़ दिया" और "बेदर्द ख़िज़ाँ की नज़रों से मासूम बहारें बच ना सकीं, लो आज चमन में आँधी ने डाली से कली को तोड़ दिया"। गाने की शूटिंग्‍ के दौरान सुरैया जी के सामने तबस्सुम रहीं और सुरैया जी बस तबस्सुम को देखतीं गईं और ज़ार-ज़ार रोती रहीं। और इस तरह से अपनी छोटी बहन के मरने के सीन को सुरैया ने पर्दे पर निभाया।

सुरैया व तबस्सुम
फ़िल्म 'मोती महल' में ही सुरैया और तबस्सुम पर फ़िल्माया हुआ एक और गाना था जिसके बोल थे "छी छी छी रोना नहीं..."। सुरैया के साथ गीत में आवाज़ थी शमशाद बेग़म की जिन्होंने तबस्सुम के लिए गाया। तबस्सुम जी के अनुसार इस फ़िल्म के बाद वो सुरैया जी के और भी ज़्यादा क़रीब आ गईं। जैसा कि सभी को मालूम है कि सुरैया और देव आनन्द के बीच एक प्रेम का रिश्ता बना था और वो दोनों एक दूसरे से शादी भी करना चाहते थे, पर सुरैया की नानी को इस रिश्ते से ऐतराज़ होने की वजह से सुरैया और देव आनन्द का आपस में मिलना-जुलना तक बन्द हो गया था। ऐसी स्थिति में वह तबस्सुम ही थीं जो इन दोनो के बीच की कड़ी बनी। यानी कि तबस्सुम के माध्यम से ही सुरैया और देव आनन्द एक दूसरे को ख़ैर-ख़बर पहुँचाया करते थे। तबस्सुम जी ने सुरैया जी को बहुत क़रीब से जाना है। देव आनन्द ने तो शादी कर ली, पर सुरैया आजीवन अविवाहित ही रहीं और अपनी नानी के आगे नहीं झुकीं। उन्होंने अपनी नानी को साफ़ कह दिया था कि आपने देव आनन्द के साथ रिश्ते को स्वीकारा नहीं, इसलिए मैं भी किसी और रिश्ते को नहीं स्वीकार करूँगी। सुरैया की यह सफल प्रेम की दास्तान इतनी सशक्त है कि किसी फ़िल्मकार की आज तक हिम्मत नहीं हुई इसे पर्दे पर साकार करने की। सुरैया जी के अन्तिम दिनों में उन्होंने सबसे खु़द को अलग कर लिया था, किसी से वो मिलती नहीं थीं। तब ये तबस्सुम जी ही थीं जो उनके सम्पर्क में रहीं। वो बताती हैं कि सुरैया ने अपने आप को जैसे घर में क़ैद कर लिया हो। किसी के लिए दरवाज़ा तक नहीं खोलती थीं। जब जब तबस्सुम उनसे मिलने जाती तो बाहर रखे दूध के पैकेट और बहुत दिनों के अख़बार उठाकर अन्दर ले जाती। फोन पर अपनी आपा से हुई आख़िरी बातचीत को याद करते हुए तबस्सुम कहती हैं कि उन्होंने जब पूछा सुरैया जी से "आपा आप कैसी हैं?", तो सुरैया जी का जवाब था "कैसी गुज़र रही है सब पूछते हैं मुझसे, कैसे गुज़ारती हूँ कोई नहीं पूछता"। और इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद आपा इस दुनिया से चली गईं। सुरैया जैसी स्टार का अन्त भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था। कोई सोच सकता था कि एक ज़माने में सारी दुनिया की चहेती, सारी दुनिया से घिरी रहने वाली सुरैया का आख़िरी वक़्त तनहा बीतेगा? उनके पास कोई नहीं होगा, न उनका कोई अपना, न पराया। सुरैया का इन्तकाल हुआ था साल 2004 में। और इससे 52 साल पहले सुरैया ने पर्दे पर तबस्सुम के किरदार के मरने पर गीत गाया था "क़िस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया", और 52 साल बाद जब सुरैया हक़ीक़त में इस फ़ानी दुनिया को अल्विदा कह गईं तब जाकर तबस्सुम जी को अहसास हुआ कि 52 साल पहले अपनी बहन के मरने के सीन को करते हुए सुरैया जी को कितनी तक़लीफ़ हुई होगी।

फिल्म - मोती महल - 1952 : 'किस्मत ने हमें रोने के लिए दुनिया में अकेला छोड़ दिया...' : गायिका - सुरैया : गीत - असद भोपाली : संगीत - हंसराज बहल 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 





अपना मनपसन्द स्तम्भ पढ़ने के लिए दीजिए अपनी राय



नए साल 2015 में शनिवार के नियमित स्तम्भ रूप में आप कौन सा स्तम्भ पढ़ना सबसे ज़्यादा पसन्द करेंगे?

1.  सिने पहेली (फ़िल्म सम्बन्धित पहेलियों की प्रतियोगिता)

2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


अपनी राय नीचे टिप्पणी में अथवा cine.paheli@yahoo.com या radioplaybackindia@live.com पर अवश्य बताएँ।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

क़दम के निशां बनाते चले...सचिन दा के सुरों में देव आनंद


यह सच है कि कई अन्य संगीतकारों नें भी देव आनन्द के साथ काम किया जैसे कि शंकर जयकिशन, सलिल चौधरी, मदन मोहन, कल्याणजी-आनन्दजी,राहुल देव बर्मन, बप्पी लाहिड़ी और राजेश रोशन, लेकिन सचिन दा के साथ जिन जिन फ़िल्मों में उन्होंने काम किया, उनके गीत कुछ अलग ही बने। आज न बर्मन दादा हमारे बीच हैं और अब देव साहब भी बहुत दूर निकल गए, पर इन दोनों नें साथ-साथ जो क़दमों के निशां छोड़ गए हैं, वो आनेवाली तमाम पीढ़ियों के लिए किसी पाठशाला से कम नहीं।

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

जाएँ तो जाएँ कहाँ....तलत की आवाज़ में उठे दर्द के साथी बने साहिर और बर्मन दा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 245

१९५४ की फ़िल्म 'आर पार' की कहानी टैक्सी ड्राइवर कालू (देव आनंद) की थी। फ़िल्म में दो नायिकाएँ हैं, जिनमें से एक के पिता अंडरवर्ल्ड से जुड़ा हुआ है और वो चाहता है कि कालू भी उसके साथ मिल जाए ताकि वो जल्दी अमीर बन जाए। कालू भी ख़ुद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है, लेकिन सही रास्तों पर चलकर या ग़लत राह पकड़कर? यही थी 'आर पार' की मूल कहनी। गुरु दत्त साहब ने अपनी प्रतिभा से इस साधारण कहानी को एक असाधारण फ़िल्म में परिवर्तित कर चारों ओर धूम मचा दी। और इसी कामयाबी से प्रेरित होकर आनंद भाइयों ने इसी साल १९५४ में अपने 'नवकेतन' के बैनर तले इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए एक और फ़िल्म के निर्माण का निश्चय किया। और इस बार फ़िल्म का शीर्षक भी रखा गया 'टैक्सी ड्राइवर'। चेतन आनंद ने फ़िल्म का निर्देशन किया, विजय आनंद ने कहानी लिखी, और देव साहब नज़र आए टैक्सी ड्राइवर मंगल के किरदार में। नायिका बनीं कल्पना कार्तिक। गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार सचिन देव बर्मन की जोड़ी ने एक बार फिर से अपना जादू दिखाया और इस फ़िल्म के लिए बने कुछ यादगार सदाबहार नग़में। आज 'जिन पर नाज़ है हिंद को' शृंखला में हम इसी फ़िल्म का एक सुपरहिट गीत लेकर आए हैं तलत महमूद की मखमली आवाज़ में। जी हाँ, "जाएँ तो जाएँ कहाँ"। इस गीत के दो वर्जन हैं, दूसरा वर्ज़न लता जी की आवाज़ में है। लेकिन तलत साहब वाले गीत को ही ज़्यादा बजाया और सुना जाता है। राग जौनपुरी पर आधारित यह गीत बड़ा ही कर्णप्रिय है। बांसुरी की मधुर तानें गीत के इंटर्ल्युड में हमें एक और ही जगत में ले जाती है। साहिर साहब एक बार फिर से अपने उसी दर्दीले अंदाज़ में नज़र आते हैं। "उनका भी ग़म है, अपना भी ग़म है, अब दिल के बचने की उम्मीद कम है, एक कश्ती सौ तूफ़ान, जाएँ तो जाएँ कहाँ"। और सब से बड़ी बात यह कि इस गीत के लिए सचिन देव बर्मन को उस साल के सर्वर्श्रेष्ठ संगीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। और यह उनका पहला फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी था।

'टैक्सी ड्राइवर' का साउंड ट्रैक बहुत ही विविध है। इस फ़िल्म में साहिर साहब ने कुछ आशावादी गीत भी लिखे हैं, जैसे कि लता जी की आवाज़ में "दिल जले तो जले, ग़म पले तो पले" और "ऐ मेरी ज़िंदगी, आज रात झूम ले आसमान चूम ले"। इन दोनों गीतों को दादा ने पाश्चात्य शैली में स्वरबद्ध किया था। किशोर दा का गाया "चाहे कोई ख़ुश हो चाहे गालियाँ हज़ार दे" में जितना साहिर और बर्मन दादा का योगदान है, उससे कहीं ज़्यादा इसमें किशोर दा का अनोखा अंदाज़ सुनाई देता है। इस फ़िल्म के संगीत की एक और ख़ास बात यह है कि इसी फ़िल्म में आशा भोसले ने अपना पहला गीत गाया था बर्मन दादा के निर्देशन मे और वह भी एक कैबरे नंबर "जीने दो और जियो"। आशा और जगमोहन बक्शी का गाया इस फ़िल्म का एक युगलगीत "देखो माने नहीं रूठी हसीना" भी हम आपको सुनवा चुके हैं। इस साल, यानी कि १९५४ में साहिर और सचिन दा की जोड़ी एक बार फिर नज़र आई नासिर ख़ान और नरगिस अभिनीत फ़िल्म 'अंगारे' में, जिसमें भी तलत महमूद ने एक ख़ूबसूरत गीत गाया था "डूब गए आकाश के तारे जाके ना तुम आए, तकते तकते नैना हारे जाके ना तुम आये", लेकिन इस गीत को वह प्रसिद्धि नहीं मिली जितनी "जाएँ तो जाएँ कहाँ" को मिली। इसी फ़िल्म में साहिर साहब ने एक अनोखा गीत लिखा था जिसे लता और तलत ने गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह से थे कि तलत साहब गाते हैं "तेरे साथ चल रहे हैं ये ज़मीं चाँद तारे", और लता जवाब देती है "ये ज़मीं चाँद तारे तेरी एक नज़र पे वारे"। इन दो पंक्तियों में ध्यान दीजिए कि किस तरह से पहली पंक्ति समाप्त होती है "ये ज़मीं चाँद तारे" पे और दूसरी पंक्ति शुरु होती है इसी "ये ज़मीं चाँद तारे" से। तो दोस्तों, हमने 'टैक्सी ड्राइवर' के साथ साथ 'अंगारे' फ़िल्म का भी ज़िक्र किया आज की इस कड़ी में। चलिए अब आनंद उठाया जाए तलत साहब की मख़मली आवाज़ में साहिर साहब व सचिन दा की एक उत्कृष्ट गीत रचना फ़िल्म 'टैक्सी ड्राइवर' से।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. लोक संगीत पर आधारित इस गीत को लिखा साहिर ने.
२. इस युगल गीत की धुन बनायीं सचिनदा ने.
३. मुखड़े में शब्द है -"अकेली".

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी मात्र २ मिनट के अंतर से आपने २ अंक चुरा ही लिए शरद जी से, बधाई अब आप ४८ अंकों पर हैं. पूर्वी जी आपने अपने अनुभव हमसे बांटे अच्छा लगा, दिलीप जी बहुत दिनों बाद आपकी आमद हुई है. कहाँ थे ? राज जी आप बस गीतों का आनंद लीजिये, और रचना जी उदास तो मत रहा कीजिये....:)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बुधवार, 5 अगस्त 2009

एक हजारों में मेरी बहना है...रक्षा बंधन पर शायद हर भाई यही कहता होगा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 162

"कभी भ‍इया ये बहना न पास होगी, कहीं परदेस बैठी उदास होगी, मिलने की आस होगी, जाने कौन बिछड़ जाये कब भाई बहना, राखी बंधवा ले मेरे वीर"। रक्षाबंधन के पवित्र पर्व के उपलक्ष्य पर हिंद युग्म की तरफ़ से हम आप सभी को दे रहे हैं हार्दिक शुभकामनायें। भाई बहन के पवित्र रिश्ते की डोर को और ज़्यादा मज़बूत करता है यह त्यौहार। राखी उस धागे का नाम है जिस धागे में बसा हुआ है भाई बहन का अटूट स्नेह, भाई का अपनी बहन को हर विपदा से बचाने का प्रण, और बहन का भाई के लिए मंगलकामना। इस त्यौहार को हमारे फ़िल्मकारों ने भी ख़ूब उतारा है सेल्युलायड के परदे पर। गानें भी एक से बढ़कर एक बनें हैं इस पर्व पर। क्योंकि इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चल रहा है किशोर कुमार के गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़', जिसके तहत हम जीवन के अलग अलग पहलुओं को किशोर दा की आवाज़ के ज़रिये महसूस कर रहे हैं, तो आज महसूस कीजिए भाई बहन के नाज़ुक-ओ-तरीन रिश्ते को किशोर दा के एक बहुत ही मशहूर गीत के माध्यम से। यह एक ऐसा सदाबहार गीत है भाई बहन के रिश्ते पर, जिस पर वक्त की धुल ज़रा भी नहीं चढ़ पायी है, ठीक वैसे ही जैसे कि भाई बहन के रिश्ते पर कभी कोई आँच नहीं आ सकती। 'हरे रामा हरे कृष्णा' फ़िल्म के इस गीत को आप ने कई कई बार सुना होगा, लेकिन आज इस ख़ास मौके पर इस गीत का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। हमें पूरी उम्मीद है कि आज इस गीत का आप दूसरे दिनों के मुक़ाबले ज़्यादा आनंद उठा पायेंगे।

फ़िल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' सन् १९७१ की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे देव आनंद, ज़ीनत अमान और मुमताज़। दोस्तों, यह फ़िल्म उन गिने चुने फ़िल्मों में से है जिनकी कहानी नायक और नायिका के बजाये भाई और बहन के चरित्रों पर केन्द्रित है। भाई बहन के रिश्ते पर कामयाब व्यावसायिक फ़िल्म बनाना आसान काम नहीं है। इसमें फ़िल्मकार के पैसे दाव पर लग जाते हैं। लेकिन देव आनंद ने साहस किया और उनके उसी साहस का नतीजा है कि दर्शकों को इतनी अच्छी भावुक फ़िल्म देखने को मिली। इस फ़िल्म को देख कर किसी की आँखें नम न हुई हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। माँ बाप के अलग हो जाने की वजह से बचपन में एक दूसरे से बिछड़ गये भाई और बहन। भाई तो ज़िंदगी की सही राह पर चला लेकिन बहन भिड़ गयी हिप्पियों के दल में और डुबो दिया अपने को नशे और ख़ानाबदोशी की ज़िंदगी में। नेपाल की गलियों में भटकता हुआ भाई अपनी बहन को ढ़ूंढ ही निकालता है, लेकिन शुरु में बहन बचपन में बिछड़े भाई को पहचान नहीं पाती है। तब भाई वह गीत गाता है जो बचपन में वह उसके लिए गाया करता था (लता मंगेशकर और राहुल देव बर्मन की आवाज़ों में बचपन वाला गीत है)। भाई किस तरह से ग़लत राह पर चल पड़ने वाली बहन को सही दिशा दिखाने की कोशिश करता है, इस गीत के एक एक शब्द में उसी का वर्णन मिलता है। गीत को सुनते हुए बहन भाई को पहचान लेती है, गीत के इन दृश्यों को आप शायद ही सूखी आँखों से देखे होंगे। बहन अपने भाई को अपना परिचय देना तो चाहती है, लेकिन वो इतनी आगे निकल चुकी होती है कि वापस ज़िंदगी में लौटना उसके लिए नामुमकिन हो जाता है। इसलिए वो अपना परिचय छुपाती है और अंत में ख़ुदकुशी कर लेती है। प्रस्तुत गीत फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है। आनंद बक्शी, राहुल देव बर्मन और किशोर कुमार की तिकड़ी ने एक ऐसा दिल को छू लेनेवाला गीत तैयार किया है कि चाहे कितनी भी बार गीत को सुने, हर बार आँखें भर ही आती हैं। देव आनंद साहब ने ख़ुद इस फ़िल्म की कहानी लिखी और फ़िल्म को निर्देशित भी किया। इस फ़िल्म के लिए देव साहब की जितनी तारीफ़ की जाये कम ही होगी। इसके बाद शायद ही इस तरह की कोई फ़िल्म दोबारा बनी हो! इस फ़िल्म को बहुत ज़्यादा पुरस्कार तो नहीं मिला सिवाय आशा भोंसले के ("दम मारो दम" गीत के लिए फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार), लेकिन असली पुरस्कार है दर्शकों का प्यार जो इस फ़िल्म को भरपूर मिला, और साथ ही इस फ़िल्म के गीत संगीत को भी। तो लीजिए, रक्षाबंधन के इस विशेष अवसर पर सुनिये किशोर दा की आवाज़ में एक भाई के दिल की पुकार। आप सभी को एक बार फिर से रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. किशोर दा के गाये बहतरीन गीतों में से एक.
2. कल के गीत का थीम है - "सपने".
3. मुखड़े की तीसरी पंक्ति में शब्द है -"गाँव".

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित राजपूत जी रूप में हमें मिले एक नए प्रतिभागी...२ अंकों के लिए बधाई रोहित जी, पराग जी अपना ख्याल रखियेगा, सभी श्रोताओं को एक बार फिर इस पावन पर्व की ढेरों शुभकामनायें...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार, 2 अगस्त 2009

तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में....देव साहब ने पुकारा अपने प्यार को और रफी साहब ने स्वर दिए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 159

'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' की नौवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। यूं तो अभिनेता देव आनंद के लिए ज़्यादातर गानें किशोर कुमार ने गाये हैं, लेकिन समय समय पर कुछ संगीतकारों ने ऐसे गीत बनाये हैं जिनके साथ केवल रफ़ी साहब ही उचित न्याय कर सकते थे। इस तरह से देव आनंद साहब पर भी कुछ ऐसे बेहतरीन गानें फ़िल्माये गये हैं जिनमें आवाज़ रफ़ी साहब की है। अगर संगीतकारों की बात करें तो सचिन देव बर्मन एक ऐसे संगीतकार थे जिन्होने देव साहब के लिए रफ़ी साहब की आवाज़ का बहुत ही सफल इस्तेमाल किया। फ़िल्म 'गैम्बलर' के ज़्यादातर गानें किशोर दा के होते हुए भी बर्मन दादा ने एक ऐसा गीत बनाया जो उन्होने रफ़ी साहब से गवाया। याद है न आप को वह गीत? जी हाँ, "मेरा मन तेरा प्यासा"। अजी साहब, प्यासे तो हम हैं रफ़ी साहब के गीतों के, जिन्हे सुनते हुए वक्त कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता और ना ही उनके गीतों को सुनने की प्यास कभी कम होती है। ख़ैर, देव आनंद पर फ़िल्माये, सचिन देव बर्मन की धुनों पर रफ़ी साहब के गीतों की बात करें तो जो मशहूर फ़िल्में हमारे जेहन में आती हैं, वो हैं 'बम्बई का बाबू', 'काला पानी', 'काला बाज़ार', 'जुवल थीफ़', 'नौ दो ग्यारह', 'तेरे घर के सामने', वगेरह। आज देव आनंद पर फ़िल्माया हुआ रफ़ी साहब के जिस गीत को हम ने चुना है वह है 'तेरे घर के सामने' फ़िल्म से "तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में, माने ना मेरा दिल दीवाना"।

देव आनंद निर्मित एवं विजय आनंद निर्देशित फ़िल्म 'तेरे घर के सामने' बनी थी सन् १९६३ में। नूतन इस फ़िल्म की नायिका थीं। राहुल देव बर्मन ने अपने पिता को ऐसिस्ट किया था इस फ़िल्म के गीत संगीत में। इस फ़िल्म के सभी गानें बेहद सफल रहे और यह फ़िल्म बर्मन दादा के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया। "एक घर बनाउँगा तेरे घर के सामने", "देखो रूठा न करो बात नज़रों की सुनो", "दिल का भँवर करे पुकार प्यार का राग सुनो", तथा प्रस्तुत गीत आज भी पूरे चाव से सुने जाते हैं। मजरूह सुल्तानपुरी ने ये सारे गानें लिखे थे। "तू कहाँ ये बता" एक बड़ा ही रुमानीयत और नशे से भरा गाना है जिसे रफ़ी साहब ने जिस नशीले अंदाज़ मे गाया है कि इसका मज़ा कई गुना ज़्यादा बढ़ गया है। इस गीत की एक और खासियत है इस गीत में इस्तेमाल हुए तबले का। दोस्तों, यह तो मैं पता नहीं कर पाया कि इस गीत में तबला किसने बजाया था, लेकिन जिन्होने भी बजाया है, क्या ख़ूब बजाया है, वाह! अगर आप ने कभी ग़ौर किया होगा तो पार्श्व में बज रहे तबले की थापें आप के मन को प्रसन्नता से भर देती हैं। नशीली रात में देव आनंद पर फ़िल्माये हुए इस गीत में मजरूह साहब ने क्या ख़ूब लिखा है कि "आयी जब ठंडी हवा, मैने पूछा जो पता, वो भी कतरा के गयी, और बेचैन किया, प्यार से तू मुझे दे सदा"। गीत के बोल सीधे सरल शब्दों में होते हुए भी दिल को छू जाते हैं। तो दोस्तों, सदाबहार नायक देव आनंद और सदाबहार गायक मोहम्मद रफ़ी साहब के नाम हो रही है आज की यह नशीली शाम, सुनिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. रफी साहब का एक और प्रेम गीत.
2. कलाकार हैं -काका बाबू यानी "राजेश खन्ना".
3. पूरे गीत में नायिका की दो खूबियों का जिक्र है, एक "ऑंखें" और दूसरी...

कौन सा है आपकी पसदं का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.


पिछली पहेली का परिणाम -

दिशा जी ६ अंकों के साथ आप पराग के स्कोर के करीब बढ़ रही हैं. दिलीप जी खूब भावुक होईये आपकी हर टिपण्णी आलेख जितनी ही रोचक होता है श्रोताओं के लिए. अर्श जी शायद पहली बार आये कल आपका भी स्वागत. शरद जी और स्वप्न जी निराश न होयें २०० एपिसोड के बाद जब पहेली को थोडा सा रूप बदला जायेगा तब आप फिर से जारी रख पायेंगें अपना संग्राम.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार, 24 मई 2009

गैरों के शे'रों को ओ सुनने वाले हो इस तरफ भी करम...दर्द में डूबी किशोर की सदा..

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 90

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ९०-वीं कड़ी में हम आप सभी का इस्तकबाल करते हैं। कल इस स्तंभ के अंतर्गत आपने सुना था कवि नीरज की रचना 'नयी उमर की नयी फ़सल' फ़िल्म से। नीरज जैसे अनूठे गीतकार का लिखा केवल एक गीत सुनकर यक़ीनन दिल नहीं भरता, इसीलिए हमने यह तय किया कि एक के बाद एक दो गानें आपको नीरजजी के लिखे हुए सुनवाया जाए। अत: आज भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में गूँजनेवाली है नीरज की एक फ़िल्मी रचना। जैसा कि कल हमने आपको बताया था कि नीरज ने सबसे ज़्यादा फ़िल्मी गीत संगीतकार सचिन देव बर्मन के लिए लिखे हैं। तो आज क्यों ना बर्मन दादा के लिए उनका लिखा गीत आपको सुनवाया जाए! १९७१ में आयी थी फ़िल्म 'गैम्बलर' 'अमरजीत प्रोडक्शन्स' के बैनर तले। देव आनंद और ज़हीदा अभिनीत इस फ़िल्म के गाने बहुत बहुत चले और आज भी चल रहे हैं। ख़ास कर लता-किशोर का गाया "चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है" गीत को चूड़ियों पर बने तमाम गीतों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय माना जाता है। लेकिन आज हम इस गीत को यहाँ नहीं बजा रहे हैं बल्कि इसी फ़िल्म का एक ग़मज़दा नगमा लेकर आये हैं किशोरदा की आवाज़ में। "दिल आज शायर है ग़म आज नग़मा है" किशोरदा के श्रेष्ठ दर्दीले गीतों में गिना जाता है और उनके दर्द भरे गीतों के बहुत से सी.डी, कैसेट और रिकार्ड्स पर इस गीत को शामिल किया गया है।

देव आनंद पर फ़िल्माये गये इस गीत की 'सिचुयशन' बहुत ही साधारण सी था, वही नायक नायिका में ग़लतफ़हमी, और फिर एक 'पार्टी' और उसमें नायक का 'पियानो' पर बैठकर दर्द भरा गीत गाना। लेकिन नीरज, बर्मन दादा और किशोरदा ने इस साधारण 'सिचुयशन' को अपने इस असाधारण गीत के ज़रिए अमर बना दिया है। किशोर कुमार की आवाज़ वह आवाज़ है जो वक़्त को रोक कर इंसान को मजबूर कर देती है उसे सुनने के लिए। यह आवाज़ हँसी तो सबको इतना हँसाया कि पेट में बल पड़ जाए, और जब उदास हुई तो सुननेवालों के जख्मों पर जैसे मरहम लगा दिया। किसी उदास दिल को किसी का कान्धा नहीं मिला तो इसी आवाज़ ने उसे कान्धा देकर उसका ग़म दूर कर दिया। जीवन के हर रंग से रंगी यह आवाज़ सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही हो सकती है, हमारे प्यारे किशोरदा की। हमेशा मुस्कुरानेवाले इस चेहरे के पीछे एक तन्हा दिल भी था जो उनके दर्द भरे गीतों से छलक पड़ता और सुननेवालों को रुलाये बिना नहीं छोड़ता। आज के इस गीत में भी कुछ इसी तरह का रंग है, सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. विमल राय की इस क्लासिक में था ये बेहद मशहूर समूहगान.
२. सावन की आहट पर कान धरे लोक गीतों की मधुर धुन है सलिल दा के संगीत की.
३. मुखड़े में शब्द है -"ढोल".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार मनु जी आपका तुक्का सही ही निकला ...बधाई....शरद जी और तपन जी थोड़े देर से आये पर सही जवाब भी लाये, शोभा जी को गीत पसंद आया जानकार ख़ुशी हुई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


शनिवार, 25 अप्रैल 2009

चल री सजनी अब क्या सोचें...सुनकर मुकेश के इस गीत कौन न रो पड़े...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 61

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ६१-वीं कड़ी में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। हिंदी फ़िल्मों में विदाई गीतों की बात करें तो सब से पहले "बाबुल की दुआयें लेती जा" ज़्यादातर लोगों को याद आती है। लेकिन इस विषय पर कुछ और भी बहुत ही ख़ूबसूरत गीत बने हैं और ऐसा ही एक विदाई गीत आज हम चुन कर ले आये हैं। मुकेश की आवाज़ में यह है फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' का गाना "चल री सजनी अब क्या सोचे, कजरा ना बह जाये रोते रोते"। मेरे ख़याल से यह गाना फ़िल्म संगीत का पहला लोकप्रिय विदाई गीत होना चाहिए। 'बम्बई का बाबू' १९६० की फ़िल्म थी। इससे पहले ५० के दशक में कुछ चर्चित विदाई गीत आये तो थे ज़रूर, जैसे कि १९५० में फ़िल्म 'बाबुल' में शमशाद बेग़म ने एक विदाई गीत गाया था "छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा", १९५४ में फ़िल्म 'सुबह का तारा' में लता ने गाया था "चली बाँके दुल्हन उनसे लागी लगन मोरा माइके में जी घबरावत है", और १९५७ में मशहूर फ़िल्म 'मदर इंडिया' में शमशाद बेग़म ने एक बार फिर गाया "पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली"। लेकिन मुकेश के गाये इस गीत में कुछ ऐसी बात थी कि गीत सीधे लोगों के दिलों को छू गया और आज भी इस गीत को सुनते ही जैसे दिल रो पड़ता है उस बेटी के लिये जो अपने बाबुल का घर छोड़ एक नये संसार में प्रवेश करने जा रही है। "बाबुल पछताए हाथों को मल के, काहे दिया परदेस टुकड़े को दिल के", "ममता का आँचल, गुड़ियों का कंगना, छोटी बड़ी सखियाँ घर गली अँगना, छूट गया रे" जैसे बोलों ने इस गीत को और भी ज़्यादा भावुक बना दिया है। मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत को लिखा था और संगीतकार थे हमारे बर्मन दादा।

'बम्बई का बाबु' के मुख्य कलाकार थे देव आनंद और सुचित्रा सेन। यूँ तो इस फ़िल्म के दूसरे कई गाने भी मशहूर हुए लेकिन इस गीत को सब से ज़्यादा लोकप्रिय इसलिये कहा जा सकता है क्योंकि अमीन सायानी के बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम में इस फ़िल्म के केवल इसी गीत को स्थान मिला था और वह भी पाँचवाँ। फ़िल्म की कहानी के मुताबिक यह गीत फ़िल्म में ख़ास जगह रखता है। सीन ऐसा है कि सुचित्रा सेन की शादी हो जाती है और वो अपने बाबुल का घर छोड़ विदा होती है। यह बात इस गीत को और भी ज़्यादा ग़मगीन बना देती है कि सुचित्रा सेन की शादी फ़िल्म के नायक देव अनंद से नहीं बल्कि किसी और से हो रही होती है। इस फ़िल्म के बाक़ी गीतों में रफ़ी साहब की आवाज़ थी, बस यह एक गीत ही सिर्फ़ मुकेश की आवाज़ में था। इस गीत में बर्मन दादा ने 'कोरस' का इतना बेहतरीन इस्तेमाल किया है कि 'इन्टरल्युड म्युज़िक' केवल शहनाई और कोरल सिंगिंग से ही बनाया गया है। इस गीत के आख़िर में करीब डेढ़ मिनट का संगीत है जो इसी तरह के शहनाई और कोरल सिंगिंग से बना है। यह ऐसा संगीत है जो कानों से सीधे दिल में उतर जाता है। तो लीजिये सुनिये विदा हो रही एक बेटी की व्यथा। हमें उम्मीद है कि गीत को सुनते हुए विदा हो रही किसी बेटी की तस्वीर आपके आँखों के सामने ज़रूर आ जाएगी क्योंकि मजरूह, दादा बर्मन और मुकेश ने मिलकर यही तस्वीर तो बनाई थी!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. चंदामामा को बुला रही है द्वार आशा की आवाज़.
२. बर्मन दा का संगीत, नर्गिस के अभिनय से सजी फिल्म.
३. मुखड़े में शब्द है - "हार"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार बहुत से विजेता रहे. नीरज जी, नीलम जी, मनु जी, सुमित जी, सलिल जी सभी के जवाब सही रहे, नीलम जी और पी एन साहब आपकी पसंद का गीत वाकई बहुत प्यारा है....जल्द ही सुनेंगे बने रहिये ओल्ड इस गोल्ड के साथ. अनिल जी और अवध जी, आपके जानकारी के बाद इन गीतों को सुनना और भी सुखद रहेगा...आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2008

देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं...

सचिन देव बर्मन साहब की ३३ वीं पुण्यतिथि पर दिलीप कवठेकर का विशेष आलेख -

सचिन देव बर्मन एक ऐसा नाम है, जो हम जैसे सुरमई संगीत के दीवानों के दिल में अंदर तक जा बसा है. मेरा दावा है कि अगर आप और हम से यह पूछा जाये कि आप को सचिन दा के संगीतबद्ध किये गये गानों में किस मूड़ के, या किस Genre के गीत सबसे ज़्यादा पसंद है, तो आप कहेंगे, कि ऐसी को विधा नही होगी, या ऐसी कोई सिने संगीत की जगह नही होगी जिस में सचिन दा के मेलोड़ी भरे गाने नहीं हों.

आप उनकी किसी भी धुन को लें. शास्त्रीय, लोक गीत, पाश्चात्य संगीत की चाशनी में डूबे हुए गाने. ठहरी हुई या तेज़ चलन की बंदिशें. संवेदनशील मन में कुदेरे गये दर्द भरे नग्में, या हास्य की टाईमिंग लिये संवाद करते हुए हल्के फ़ुल्के फ़ुलझडी़यांनुमा गीत. जहां उनके समकालीन गुणी संगीतकारों नें अपने अपने धुनों की एक पहचान बना ली थी, सचिन दा हमेशा हर धुन में कोई ना कोई नवीनता देने के लिये पूरी मेहनत करते थे.

इसीलिये, उनके बारे में सही ही कहा है, देव आनंद नें (जिन्होने अपने लगभग हर फ़िल्म में - बाज़ी से प्रेम पुजारी तक सचिन दा का ही संगीत लिया था)- He was One of the Most Cultured & and Sophisticated Music Director,I have ever encountered !
हालांकि गीतकार जावेद अख्त़र नें उनके साथ काम नहीं किया लेकिन वे भी कायल थे सचिन दा की धुनों के रेंज से - चलती का नाम गाड़ी - सुजाता - गाईड़ - अभिमान.

शायद इसीलिये वे फ़िल्मों के चयन को लेकर बेहद चूज़ी थे. वे सिर्फ़ उन्ही के लिये संगीत देते थे जिन्हे संगीत की समझ थी. अपने १९४६ (शिकारी ) से शुरु हुए और त्याग (१९७७) तक के फ़िल्मी संगीत के सफ़र में ८९ फ़िल्मों के लिये लगभग ६६६ गीतों के संगीत रचना करते हुए देव आनंद, गुरुदत्त, हृषिकेश मुखर्जी, विजय आनंद, शक्ति सामंत आदि सशक्त निर्माताओं के साथ काम किया.

गायक के चुनाव करते हुए भी वे उतने ही चूज़ी होते थे. सुना है, जिस दिन उनकी रेकॊर्डिन्ग होती थी, वे सुबह गायक से फोन से बात करते थे और बातचीत के दौरान पता लगा लेते थे कि उस दिन उस गायक या गायिका के स्वर की क्या गुणवत्ता है.

संगीत के कंपोज़िशन के साथ ही वाद्यों के ओर्केस्ट्राइज़ेशन की भी बारीकीयां उन्हे पता थी.एक दिन किसी कारणवश एक की जगह दो वायोलीन वादक रिकॊर्डिन्ग में बजा रहे थे, तो दादा नें कंट्रोल केबिन से साज़ों के हुजूम में से यह बात पकड़ ली.उन्होने कहा, मैं एक ही वायोलीन का इफ़ेक्ट चाहता हूं.

वे इस बात को मानते थे, और अपने बेटे राहुल को भी उन्होने यह बात बडे़ गंभीरता से समझाई थी कि हमेशा कुछ नया सृजन किया करो, ताकि लोगों में यह आतुरता बनी रहे, कि अब क्या. जब तीसरी मंज़िल फ़िल्म के लिये पंचम ने सभी गीत लगभग वेस्टर्न स्टाईल से दिये तो दादा बेहद खुश हुए. वे धोती कुर्ता ज़रूर पहनते थे मगर मन से बडे आधुनिक या मोडर्न थे.

पंचम से वे बेहद प्यार करते थे. एक दिन जब वे कहीं टहल रहे थे तो बच्चों के किसी समूह में से एक ने कहा- देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं. वे उस दिन बडे खुश होकर सब को पान खिलाने लगे (वे जब खुश होते थे तो सब को पान खिलाया करते थे)

किसी कारणवश प्यासा के समय उनकी बातचीत लता से बंद हो गयी थी. तो उन्होने आशा से गाने गवाये, मगर बाद में पंचम की वजह से वह रुठना खत्म हुआ.

सचिन दा से समय तक गीत पहले लिखे जाते थे, बाद में धुन बनाई जाती थी. दादा इतने नैसर्गिक कम्पोज़र थे कि मिनटों में धुन बना लेते थे, और इसीलियी उन्होने यह प्रथा पहली बार डाली कि पहले धुन बनेगी बाद में उसपर बोल बिठाये जायेंगे. साहिर, मजरूह और शैलेंद्र के साथ उनके कई गीत बनें, मगर देव आनंद नें नीरज, हसरत और पं. नरेन्द्र शर्मा से भी कई गीत लिखवाये जो हिन्दी में साहित्यिक वज़न रखते थे. पं. नरेन्द्र शर्मा से तो वे बडे़ खुश रहते थे क्योंकि वे भी मिनटों में कोई भी गीत रच लेते थे, वह भी बहर में, और विषय से बाबस्ता.

प्यासा फ़िल्म में गुरुदत्त नें उनसे एक गीत बिना किसी साज़ के भी बनवाया और रफ़ी से गवाया था. (तंग आ चुके है कश्मकशे जिंदगी से हम- जो बाद में फ़िल्म लाईट हाऊस में एन.दत्ता के निर्देशन में आशा नें भी गाया). साहिर की एक काव्य संग्रह 'परछाईयां' से उन्होने कुछ चुनिंदा रचनायें चुनी और सचिन दा से धुन बनवाई. जैसे जिन्हे -नाज़ है हिन्द पर वो कहां है, जाने वो कैसे लोग थे - फ़िल्म के बाकी गानो में आपको सचिन दा के अंदाज़ के गानें मिले होंगे- सर जो तेरा चकराये, हम आप की आंखों में आदि. मगर आपनें भी सुन ही लिया है, कि दूसरे गीत कितने अलग ढंग से संगीत बद्ध किये दादा नें.

अभी अभी साहिर की भी पुण्यतिथि थी. यह फ़िल्म उनके गुरुदत्त और सचिन दा के जोडी़ का एक काव्यात्मक ऊंचाई प्राप्त करने वाला कमाल ही था, जो प्यासा के बाद दादा और साहिर के मनमुटाव के बाद टूट गया. सचिन दा का बोलबाला तब इतना बढ़ गया था कि गुरुदत्त को कागज़ के फ़ूल फ़िल्म के समय दोनों में से जब एक को चुनना पडा़ तो उन्होने दादा को ही चुना.

किशोर कुमार को एक अलग अंदाज़ में गवाने का श्रेय भी दादा को ही जाता है. उन्होंनें देव आनंद के लिये किशोर कुमार की आवाज़ को जो प्रयोग किया वह इतिहास बन गया. बाद में राजेश खन्ना के लिये भी किशोर की आवाज़ लेकर किशोर को दूसरी इनिंग में नया जीवन दिया, जिसके बाद किशोर नें कभी भी पीछे मुड़ कर नही देखा.

उसके बावजूद, सचिन दा ने देव आनंद के लिये हमेशा ही किशोर से नहीं गवाया, बल्कि रफ़ी साहब से भी गवाया, जैसे जैसे भी गाने की ज़रूरत होती थी. तीन देवियां में - ऐसे तो ना देखो, और अरे यार मेरी तुम भी हो गज़ब, तेरे घर के सामने में तू कहां , ये बता और छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा,गाईड़ में तेरे मेरे सपने और गाता रहे मेरा दिल, आदि.

उनके गीतों में जो लोकगीतों की महक थी वह उत्तर पूर्व भारत के भटियाली, सारी औत धमैल आदि ट्रेडिशन से उपजी थी. उनकी आवाज़ पतली ज़रूर थी मगर दमदार और एक विशिष्ट लहजे की वजह से पृष्ठभूमि में गाये जाने वाले गीतों के लिये बड़ी सराही गयी.

और एक बात अंतिम, सचिन दा के सहायक के रूप में भी जयदेव (वर्मा) जो एक अच्छे सरोद वादक और गिटारिस्ट भी थे, का शास्त्रीय अनुभव भी मिला और पंचम की वजह से गानों में ताल वाद्यों के अलग अलग प्रयोग भी सुनने को मिले, वह एक अलग विषय है.

'बड़ी सूनी सूनी सी है, ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी ' इस गीत के रिकॊर्डिंग के दो दिन बाद ही वे हमें छोड़ कर चले गये और गाने के बोल सार्थक कर गये.

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर

(उपर के चित्र में है दादा अपनी पत्नी मीरा के साथ, मध्य में देव आनंद और आर डी बर्मन के साथ और नीचे है किशोर कुमार के साथ)

सुनते हैं सचिन दा के स्वरबद्ध किए कुछ गीत. हमने कोशिश की है कि इस संकलन में सचिन दा के संगीत खजाने में से हर रंग के कुछ गीत समेटे जायें. काम बेहद मुश्किल था, हम कितने सफल हुए हैं ये आप सुनकर बतायें.



रविवार, 5 अक्तूबर 2008

एवरग्रीन चिरकुमार व्यक्तित्व - देव आनंद

आवाज़ के स्थायी स्तंभकार दिलीप कवठेकर लाये हैं देव आनंद के गीतों से सजा एक गुलदस्ता, साथ में है एक गीत उनकी अपनी आवाज़ में भी, आनंद लीजिये -

देव आनंद के बारे में मशहूर है कि उन्होने अपने अधिकतर गानों के लिए रफी और किशोर कुमार की आवाज़ उधार ली थी, और कभी कभी मन्ना दा (सांझ ढले),हेमंत कुमार (ये रात ये चांदनी फ़िर कहां,याद किया दिल नें, ना तुम हमॆ जानों)और तलत महमूद(जाये तो जाये कहां) की आवाज़ भी इस्तेमाल की थी.

मगर मुकेश के बारे में जहां तक मेरी जानकारी है, सिर्फ़ कुछ ही गीतों तक ही सीमित है.

आज जो गीत में ले कर आया हूँ वह अधिक मकबूल नही है, मगर अनोखा और दुर्लभ ज़रूर है. अनोखे गीत वे होते हैं, जिनमें कोई ख़ास नयी बात है.जैसे, यह गीत देव और मुकेश का दुर्लभ गीत है,जिसमें लता ने भी अपनी कोमल मधुर आवाज़ का जादू बिखेरा है..

सुन कर लुत्फ़ उठायें.

ये दुनिया है.. (फ़िल्म शायर - १९४९ में लता के साथ एक दोगाना)



इस गीत के विडियो में देखें उन दिनों के देव की छवि -



देव आनंद के बारे में एक बात बता दूं, कि इस हर दिल अज़ीज़ कलाकार को चाकलेट हीरो के रूप में मान्यता मिली और उन दिनों में मशहूर हुए तीन सुपरस्टार त्रिमूर्ति के त्रिकोण, दिलीप कुमार और राज कपूर ,का तीसरा कोण थे. तीनों नें अपने अपने अलग मकाम बनाये, और पहचान स्थापित की.

जहां दिलीप कुमार नें सरल सशक्त अभिनय और ट्रेजेडी की पीड़ा का अहसास दर्शकों के भावुक मन में करवाया,वहीं राज कपूर नें चैपलीन के ट्रैंम्प के चरित्र के आम सहृदय इंसान को पेश किया जिसने हास्य और अश्रू के उचित समन्वय से हमारे आपके दिल में जगह बनाई.


देव आनंद नें हमें उस नायक से मिलवाया जो रोमान्स,प्रेम और फंतासी की मन मोहनी दुनिया में हमें ले जाता है, और भावना के नाजुक मोरपंखी स्पर्श से हमारे वजूद में रोमांस को मेनीफेस्ट करता है,चस्पा करता है.यह वह सपनों का राजकुमार था जिसका जन्म ही प्यार करने को हुआ था. एक ऐसा चिरकुमार, "Evergreen" व्यक्तित्व, मन को गुदगुदानेवाला, आल्हादित करने वाला, जिसे सदा ही जवां मोहब्बत का वरदान मिला हुआ है. प्यार,प्यार और प्यार. युवतीयों के फंतासी हिरो और युवकों के रोल मॉडल के रूप में देव बखूबी सराहे गए.साथ में एन्टीहिरो के स्वरुप को प्रस्थापित किया.(अशोक कुमार थे पहले एन्टीहिरो.उन दिनों की माताओं ने भी उन्हें अपने पुत्र के रूप में उनका तसव्वुर किया(लीला चिटनीस याद है?)

ये बात ज़रूर है, की अपने समकालीन नायकों दिलीप कुमार और राज कपूर से अभिनय क्षमता में वे उन्नीस ज़रूर थे, मगर लोकप्रियता (विशेषकर महिलाओं में)और करिश्माई व्यक्तित्व के मामले में इक्कीस थे. सन १९५९ में कालापानी और १९६७ में गाईड के लिए उन्हें फिल्मफेयर के अभिनय के अवार्ड से नवाजा गया.

यह नही के उन दिनों में हिरो मात्र अपने व्यक्तित्व की जादूगरी से चलते थे. साथ में ज़रूरी था वह Ambience of Love,वह रोमांस का मायाजाल जो बुना जाता था मधुर मेलोडियस गीत संगीत से. इसलिए देव आनंद को भी यह साथ मिला गुणी और प्रयोगशील संगीतकारों का - सचिन देव बर्मन, ओ पी नैय्यर,शंकर जय किशन,हेमंत कुमार इत्यादी,और बाद में राहुल देव बर्मन,लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि.

बानगी स्वरुप कुछ मुलाहिज़ा फरमाएं ;

ये दिल ना होता बेचारा ,
ऐसे तो ना देखो के हमको नशा हो जाए ,
अभी ना जाओ छोड़ कर,
याद किया दिल नें कहां हो तुम,
फूलों के रंग से ,
तेरी जुल्फों से जुदाई,
हम बेखुदी में तुमको,
मैं जिंदगी का साथ,
दुखी मन मेरे

Add evergreen dev anand to your page


१९६१ में आयी साहिर के गीतों से सजी फ़िल्म हम दोनों का यह सदाबहार ग़मदोस्त नगमा.

कभी ख़ुद पे कभी हालत पे रोना आया -

मेरी समझ से इस गीत को तो दर्द के एहसास की अभिव्यक्ति के मान से सर्वकालीन दर्द भरे गीतों की फेहरिस्त में शीर्ष पर रखा जा सकता है. जयदेव के सुरीली धुन और स्वर संयोजन की परिणीती हुई है एक ऐसे कालजयी गीत में ,जो काल और अंतरसंबंधों के परे जाकर मानव संवेदनाओं की चरमसीमा या ऊंचाई को छूता है.

दर्द के इस एहसास में पार्श्व संगीत का वजूद ही उस पीड़ा में समाहित हो जाता है, रफी साहब की आवाज़ उसे कहीं और भी उकेरती है,और कहीं ज़ख्मों पर फूंक का भी काम करती है.

आईये, यह गीत भी सुनें और गम के,संत्रास के एहसास को हम भी जीयें,भोगें :



वैसे देव साहब का सालों पहले गाया एक गीत मैं भी लाया हूँ. मैं गायक नहीं मगर अहसास है .यही कहूंगा कि-

एक दिल मैं भी ले के आया हूँ,
मुझको भी एक गुनाह का हक़ है.


आवाज़ पर मेरे साथी भाईयों के आग्रह पर...




प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

कोई ना रोको दिल की उड़ान को...

लता संगीत उत्सव की नई प्रस्तुति

प्रस्तावना: लता दीदी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ। लता दीदी की प्रसंशा में बहुत कुछ कहा गया है। फिर भी तारीफें अधूरी लगती हैं। मैंने दीदी के लिए सही शब्द ढूँढ़ने की कोशिश की तो शब्दकोष भी सोच में पड़ गया। कहते है, "लोग तमाम ऊँचाइयों तक पहुँचे हैं...पर जिस मुकाम तक लताजी पहुँची हैं...वहाँ तक कोई नहीं पहुँच सकता..." दीदी से रु-ब-रु होने का सौभाग्य तो अब तक प्राप्त नहीं हुआ, पर दीदी के गीत हमेशा साथ रहते है। लता दीदी वो कल्पवृक्ष हैं जो रंग-बिरंगी मीठे मधुर मनमोहक गीत-रूपी फूल बिखीरती रहती है. दीदी के देशभक्ति गीत सुनकर हौसले बुलंद होते हैं, अमर गाथा सुनकर आखों में पानी भर आता है, लोरी सुन कर ममता का एहसास होता है, खुशी के गीत सुनकर दिल को सुकून मिलता है, दर्द-भरे नगमे दिल की गहराई को छू जाते हैं, भजन सुनकर भक्ति भावना अपने शिखर तक पहुँचती है, और प्रेम गीत सुनकर लगता है जैसे प्रेमिका गा रही हो. जब भी लताजी के गीत सुनता हूँ तो मेरा दिल तो कहने लगता है ... "आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है..."


"कोई ना रोको दिल की उड़ान को..."



लता दीदी के साथ वहीदा रहमान
दीदी के हज़ारों गीतों में "...काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल" मेरी रूह को छू जाता है। गीत के बोल शैलेंद्र ने लिखे हैं और संगीत में पिरोया है एस॰ डी॰ बर्मन ने। मन की मुक्ति को और लताजी की महकती हुई आवाज़ को परदे पर बेहतरीन तौर से निभाया है रोजी यानी वहीदा रहमान ने। 1965 में नवकेतन इंटरनेशनल्स के बैनर तले बननी फिल्म गाइड, आर के लक्ष्मण के उपन्यास 'द गाइड' पर आधारित है। राजू यानी देव आनंद की एक साधारण गाइड से जैल तक, फिर एक सन्यासी से जीवन-मुक्ति तक की अजीब कहानी और रोजी का नृत्या-कला का दीवानापन हमें ज़िंदगी के तमाम पहलुओं से मुखातिर करता है.


इस फिल्म में नृत्या-कला की महानता को बड़ी ही सुंदर सरल और सहज तरीके से प्रस्तुत किया है। जब रोजी दुनियादारी के सारे बंधन तोड़कर अपने-आप को आज़ाद महसूस करती है तो झूमते हुए कहती है .. कोई ना रोको दिल की उड़ान को...दिल हो चला.. हा॰॰हा॰॰॰हा॰॰॰॰आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है. रोजी का मन आज़ाद होने का भाव शायद इससे अकचे शब्दों में बयान नहीं हो सकता था। वहीदा रहमान के चेहरे के हाव-भाव इस गीत में रंग भर देते हैं। बर्मन-दा ने इस गीत में ढोलकी का विशेष प्रयोग किया है...जिससे कि गीत की लय और भी सुरीली हो जाती है।


गीत की मिठास, गीत का एहसास, गीत का संदेश, और शब्दों की महत्ता को मुककमल करती है लता दीदी की मखमली आवाज़। दीदी अलाप से शुरू करती है ... "आऽ आ...काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बाँधी पायल

कोई ना रोको दिल की उड़ान को, दिल हो चला
आज फिर जीने की तमन्ना हैं
आज फिर मरने का इरादा है..."


दीदी के आवाज़ की स्पष्टता और उच्चारण शफ़क-पानी की तरह साफ है. यही वजह हो सकती है की लोग दीदी को माँ सरस्वती भी कहते हैं. गीत उसी गति से आगे बढ़ता है..और दीदी गाती है:


गाइड फिल्म का पोस्टर
अपने ही बस में नहीं मैं, दिल हैं कहीं तो हूँ कहीं मैं
जाने क्या पा के मेरी जिंदगी ने, हँस कर कहा
आज फिर ...

मैं हूँ गुबार या तूफान हूँ, कोई बताए मैं कहा हूँ
डर हैं सफ़र में कहीं खो ना जाऊँ मैं, रस्ता नया
आज फिर ...

कल के अंधेरों से निकल के, देखा हैं आँखे मलते-मलते
फूल ही फूल जिंदगी बहार हैं, तय कर लिया
आज फिर ...


गाने के अंतिम स्वर को अलाप का रूप दिया है, जो लताजी की आवाज़ में और भी मीठा लगता है; जैसे:

...दिल वो चला आ आ आ आआ
...हँस कर कहा आ आ आ आआ
...रस्ता नया आ आ आ आआ
...तय कर लिया आ आ आ आआ


ये उन अनकहे शब्दों को दर्शता जो रोजी का मन और शैलेंद्र की कलम दोनों नहीं बता पाते..और फिर तुरंत "आज फिर जीने की तम्मना है, आज फिर मरने का इरादा है..." लता दीदी का मानो जादू है.


बर्मन-दा संगीत तैयार करने से पहले हमेशा उस संगीत को तब तक सुनते थे जब तक कि उब ना जाए. किसी ने पूछा ऐसा क्यूँ, तो दादा ने अपनी बांग्ला-हिन्दी में कहा "...हम तुबतक सुनता है, जब तक हम बोर नहीं होता..अगर बोर हुआ तो हम गाना नही बोनाता" ... यकीन मानिए, हज़ारों बार सुन कर भी बोर होने का ख़याल तक नहीं आता. बल्कि ये गीत और लता दीदी की सुरीली तान, मन को सातवें आसमान तक पहुँचा देती है; मानो इससे अच्छा कुछ नहीं. या अरबी में "सुभान अल्लाह!"

गीत सुनें और वीडियो देखें


फिल्म से जुड़ी कुछ और बातें:

गाइड फिल्म हिन्दुस्तान की 25 महान फ़िल्मो में शामिल है. फिल्म इतनी मशहूर हुई कि इससे हॉलीवुड में फिर बनाया गया; जो कुछ ख़ास नहीं कर पाई. क्यूँकि बर्मन-दा का संगीत, देव आनंद और वहीदा रहमान का अभिनय, और लता दीदी की आवाज़ इस फिल्म से अलग होती है तो ये फिल्म महज़ एक उपन्यास ही बनी रहती है। फ़िल्मफेयर अवॉर्ड्स में इस फिल्म को 7 अवॉर्ड्स मिले. गाइड फिल्म का सदाबहार संगीत, संगीत—जगत में एक मिसाल बन चुका है.


दीदी के लिए दो शब्द:

बड़ा गर्व महसूस होता है ये जानकार की हम उसी धरती पर पैदा हुए जहाँ लताजी है। दीदी की आवाज़ सुनकर लगता है जैसे ज़िंदगी में सबकुछ हासिल हो गया। और मेरा दिल भी गाने लगता है... कोई ना रोको दिल की उड़ान को, दिल हो चला ....हा हा हाऽऽ आ; आज फिर जीने की तम्मना है..ऽ आज फिर मरने का इरादा है..."

लेखक के बारे में-
22 वर्षीय अनूप मनचलवार नागपुर, महाराष्ट्र के रहवासी है. साहित्य, समाज-सेवा, राजनीति, और कला में विशेष रूचि रखते हैं। इनके बारे में इतना कहना काफ़ी है कि ये लता दीदी के फैन है.
ईमेल-: manchalwar@gmail.com
पता- जानकी निवास, कोरदी रोड, मांकपुर, नागपुर – 440 030


अनूप द्वारा अभिकल्पित लता दीदी की स्लाइड

सोमवार, 4 अगस्त 2008

वो खंडवा का शरारती छोरा

किशोर कुमार का नाम आते ही जेहन में जाने कितनी तस्वीरें, जाने कितनी सदायें उभर कर आ जाती है. किशोर दा यानी एक हरफनमौला कलाकार, एक सम्पूर्ण गायक, एक लाजवाब शक्सियत. युग्म के वाहक और किशोर दा के जबरदस्त मुरीद, अवनीश तिवारी से हमने गुजारिश की कि वो किशोर दा पर, "आवाज़" के लिए एक श्रृंखला करें. आज हम सब के प्यारे किशोर दा का जन्मदिन है, तो हमने सोचा क्यों न आज से ही इस श्रृंखला का शुभारम्भ किया जाए. पेश है अवनीश तिवारी की इस श्रृंखला का पहला अंक, इसमें उन्होंने किशोर दा के फिल्मी सफर के शुरूवाती दस सालों पर फोकस किया है, साथ में है कुछ दुर्लभ तस्वीरें भी.

किशोर कुमार ( कालावधी १९४७ - १९६० )- वो खंडवा का शरारती छोरा

यह एक कठिन प्रश्न है कि किशोर कुमार जैसे हरफनमौला व्यक्तित्व के विषय में जिक्र करते समय कहाँ से शुरुवात करें आइये सीधे बढ़ते है उनके पेशेवर जीवन ( प्रोफेसनल करिअर ) के साथ , जो उनकी पहचान है बात करते है उनके शुरू के दशक की, याने १९४७ - १९६० तक की बड़े भाई अशोक कुमार के फिल्मों में पैर जमाने के बाद छोटे भाई आभास यानी हमारे चहेते किशोर और मझले भाई अनूप बम्बई ( मुम्बई ) आ गए आभास की उम्र १८ बरस थी छुटपन से ही कुंदन लाल सहगल का अनुसरण ( follow up ) कर उनके गीतों को गाने में माहीर किशोर को पहला मौका पार्श्व गायक ( play back singer ) के रूप में मिला फ़िल्म "जिद्दी" में और गाना था - "मरने की दुआएं क्या मांगू " देव आनद पर फिल्माए इस गीत में कुछ भी नया नही था और के. एल. सहगल की नक़ल जैसी थी इसके पहले किशोर ने एक समूह गीत में भी भाग लिया था उन्ही दिनों आभास ने अपना नाम बदल कर किशोर रख लिया कहा जाता है कि नाम में बहुत कुछ होता है तभी तो यह नाम आज तक याद किया जा रहा है

अदाकारी में कामयाबी की मंजिलों को चुमते दादा मुनी याने अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर भी अभिनय (acting) में ही मन लगाये लेकिन मन मौजी किशोर को यह दिखावे कि दुनिया कम भाती रही बड़े भाई के दबाव से अभिनय शुरू किया साथ - साथ अपने लिए गीत भी गाये लेकिन शुरुवाती दौर का यह सफर इतना मशहूर नही हो पा रहा था " शिकारी" नाम की एक फ़िल्म में उन्होंने अपना पहला अभिनय किया

इन बरसों की कुछ यादगार फिल्में -

१९५१ - आन्दोलन - अभिनय किया

१९५४ - नौकरी - सफल निर्देशक बिमल रॉय की फ़िल्म में किशोर ने अभिनय किया और गाया भी
एक मीठा गीत है - " छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में ...." ख्याल आया ?

१९५६ - नयी दिल्ली का गाना - " नखरेवाली ..."

१९५६ - फंटूस - इसका एक गीत " दुखी मन मेरे ..." आज भी मन को भाव विभोर करता है यह एक ऐसा गीत है जो सच में किशोर के उन दिनों की जदोजहत को बयान करता है ध्यान से सुनने पर मुझे ऐसा लगा जैसे सहगल और किशोर दोनों कि आवाज़ मिली है इसमे किशोर अपने माने गुरु सहगल को सुनते और सीखते अपनी पहचान बनाने में लगे थे यह उसी बदलाव का एक बेहतरीन नमूना है जगजीत सिंह जैसे गायकों ने भी यह गीत दोहराया है अपनी आवाज में

१९५७ - नौ दो ग्यारह - सदाबहार गीत " आंखों में क्या जी ...."

१९५७ - मुसाफिर

१९५८ - दिल्ली का ठग - अभिनेत्री नूतन और किशोर की एक सौगात - " हम तो मोहब्बत करेगा ..."

किशोर की आवाज़ में उनके इस दशक का मेरा सबसे पसंदीदा गीत "दुखी मन मेरे", ज़रूर सुनें -



अशोक कुमार के घर आए संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन ( S. D. Burman) ने किशोर को बाथरूम में गाते सूना और उनकी तारीफ़ करते हुए उन्हें आपने आवाज़ में गाने की सलाह दी दो गुणों का मेल किसी नए कृति का सृजक होता है बर्मन दा और किशोर मिले और शुरू हुया एक ऐसा सफर जो हिन्दी फ़िल्म जगत का एक सुनहरा इतिहास बन गया बर्मन जी ने किशोर को और निखारा और दोनों ने उस दशक में कई अच्छे गीत दिए

दोनों के कुछ सफल प्रयोग -

१९५४ - मुनीमजी ,

१९५६ - फंटूस - पहले ही बताया इस के बारे में ,

१९५७ - Paying Guest ,

१९५८- फ़िल्म चलती का नाम गाडी के गीत ह्म्म्म... इस फ़िल्म के सभी गानों में तो किशोर ने आवाज़ दी थी
इस फ़िल्म के लिए क्या कहा जाए - superb

दशक में किशोर ने मेहनत कर अपनी पहचान तो लगभग बना ली थी लेकिन अभी तक आवाज़ से ज्यादा अभिनय के लिए ही मशहूर हुए थे १९५१ में रुमा गुहा के साथ शादी की लेकिन यह केवल ८ बरस तक ही कामयाब रही रुमा खास कर बंगला की अभिनेत्री और गायिका है इस दंपत्ति ने हमे अमित कुमार के नाम से एक नया कलाकार दिया

इस तरह शुरूवात के दशक में किशोर की आवाज देव आनंद के लिए पहचान बनी , आशा और लता जी का संग हुया और एस. डी. बर्मन जैसे गुरु का हाथ मिला

ये कुछ दुर्लभ तस्वीरें है पहला किशोर और देव जी का है



दूसरे में किशोर और रफी जी के साथ हैं कुछ और बड़े धुरंधर भी, खोजिये और बताएं ये कौन कौन हैं.



किशोर कुमार के शुरुवात के दिनों की कहानी को मै अपने इन शेरों से रोकता हूँ -

अभिनय - गायकी, कला में वो लाजवाब था ,
सिने जगत में आया एक नया आफताब था ,
आया बोम्बे वो खंडवा का शरारती छोरा ,
जैसे राजकुमार चला कोई बनने नवाब था ,
वक्त की रफ़्तार में गिरते - संभलते रहा ,
नया मुकाम हासील करना उसका ख्वाब था


धन्यवाद

बाबू अब तो चलते हैं,
अगले माह मिलेंगे
पम्प पम्प पम्प .....



(जारी...)

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