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Wednesday, February 12, 2014

'काली घोड़ी द्वारे कड़ी...' : एक रोचक रागमाला गीत









प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 5



 राग काफी, मालकौंस और भैरवी के माध्यम से क्रमशः विकसित होते प्रेम की अनुभूति कराता रागमाला गीत

‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ से लेकर ‘काली घोड़ी दौड़ पड़ी...’ तक

फिल्म : चश्मेबद्दूर (1981)
गायक : येशुदास और हेमन्ती शुक्ला
गीतकार : इन्दु जैन
संगीतकार : राजकमल


आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव से हमें radioplaybackindia@live.com पर अवश्य अवगत कराएँ। 

Sunday, May 5, 2013

रागमाला गीत- ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’




स्वरगोष्ठी – 119 में आज



रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 5


विकसित होते प्रेम की अनुभूति कराता गीत ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’


संगीत-प्रेमियों की साप्ताहिक महफिल ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक का साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः उपस्थित हूँ। छठें और सातवें दशक की हिन्दी फिल्मों में कई उल्लेखनीय रागमाला गीतों की रचना हुई थी। नौवें दशक की फिल्मों में रागमाला गीतों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। ‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ से लिये गए रागमाला गीत का रसास्वादन कराया था। आज का रागमाला गीत इसी दशक अर्थात 1981 में ही बनी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया गया है। इस गीत में मुख्य रूप से राग काफी का अत्यन्त आकर्षक आधार है। जबकि गीत के दूसरे अन्तरे में मालकौंस और तीसरे में भैरवी के स्वरों का भी प्रयोग किया गया है।

येसुदास
रागमाला गीतों में रागों का चयन और उनका क्रम एक निश्चित उद्देश्य से किया जाता है। लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीतों के संग’ के अन्तर्गत अब तक हम आपको ऐसे गीत सुनवा चुके हैं, जिनमें प्रहर के क्रम में अथवा ऋतु परिवर्तन के क्रम में रागों का चयन किया गया था। परन्तु आज हम आपको जो गीत सुनवा रहे हैं, उसमें रागो का चयन फिल्म के प्रसंग के अनुसार किया गया है। आज हम आपको 1981 में प्रदर्शित, मनोरंजक फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया गया एक रागमाला गीत सुनवाएँगे। सई परांजपे द्वारा निर्देशित यह लोकप्रिय कामेडी अपने परिवार से दूर, छात्रावास में रह कर पढ़ाई कर रहे तीन नौजवानों की कहानी है। इस फिल्म के गीत इन्दु जैन ने लिखे और इन्हें राजकमल ने संगीतबद्ध किये थे। ‘राजश्री’ की फिल्मों में अपने स्तरीय संगीत से पहचाने जाने वाले संगीतकार राजकमल ने फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ के गीतों में रागों का स्पर्श देकर उन्हें स्मरणीय बना दिया। अपने विद्यार्थी-जीवन में राजकमल एक कुशल तबला वादक थे। इसके अलावा लोक संगीत का भी उन्होने गहन अध्ययन किया था। लोक संगीत के अध्ययन के लिए उन्हें सरकारी छात्रवृत्ति भी मिली थी। ‘दोस्त और दुश्मन’ (1971) से अपने फिल्म संगीत के सफर की शुरुआत करने वाले राजकमल को पहली भव्य सफलता ‘राजश्री’ की फिल्म ‘सावन को आने दो’ (1979) में मिली। इस फिल्म के संगीत में पर्याप्त विविधता थी और गीतों में पारिवारिक अभिरुचि का समावेश भी था। रागों का सरल रूपान्तरण भी इनके संगीत के एक विशेषता रही है। फिल्म संगीत में रागों का ग्राह्य प्रयोग उन्होने 1981 की फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में किया। इस फिल्म के अन्य मधुर गीतों के साथ एक रागमाला गीत- ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ भी था, जिसे येसुदास और हेमन्ती शुक्ला ने स्वर दिया। कवयित्री इन्दु जैन ने इस गीत में चुहलबाजी से युक्त हास्य बुना है।

हेमन्ती शुक्ला
संगीतकार राजकमल ने इस गीत में मुख्य रूप से राग काफी का आधार दिया है। गीत के आधे से अधिक भाग अर्थात गीत का स्थायी और प्रथम दो अन्तरे राग काफी पर आधारित है। गीत के इस भाग का फिल्मांकन ‘सरगम संगीत विद्यालय’ की कक्षा में किया गया है, जहाँ नायिका (दीप्ति नवल) अपने संगीत-गुरु (विनोद नागपाल) से संगीत-शिक्षा प्राप्त कर रही है। स्थायी की पंक्ति में ‘काली घोड़ी’ शब्द का संकेत नायक (फारुख शेख) की दुपहिया (काले रंग की बाइक) की ओर है। इस पंक्ति के अर्थ है कि नायक अब नायिका के निकट आ चुका है। गीत के तीसरे अन्तरे की शुरुआत पहले सरगम और फिर ‘काली घोड़ी पे गोरा सैयाँ चमके...’ पंक्तियों से होती है। इस अन्तरे में राग मालकौंस के स्वरों का प्रयोग है। दृश्य के अनुसार नायिका सड़क पर बस के इन्तजार में खड़ी है, तभी नायक अपनी काली घोड़ी (बाइक) से आता है और उसे बैठा कर चल देता है। इस अन्तरे में ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी’ के स्थान पर ‘काली घोड़ी दौड़ पड़ी...’ शब्दावली का प्रयोग हुआ है। गीत का चौथा अन्तरा- 'लागी चुनरिया उड़ उड़ जाए...' राग भैरवी पर आधारित है। इस अन्तरे में नायक-नायिका के प्रेम को और प्रगाढ़ होते दिखाया गया है। इस प्रकार संगीतकार राजकमल ने प्रसंग के अनुकूल क्रमशः विकसित होते प्रेम सम्बन्धों की अनुभूति कराने के लिए राग काफी, मालकौंस और भैरवी रागों का प्रयोग किया है। फिल्मों के रागमाला गीतों में फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ का यह गीत बेहद मधुर और रोचक भी है। अब आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

रागमाला गीत : फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ : ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ : येसुदास और हेमन्ती शुक्ला



आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ की 119वीं संगीत पहेली में हम आपको सातवें दशक की एक फिल्म के रागमाला गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको केवल इसी अंश से सम्बन्धित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 121वें अंक में हम सही उत्तर और विजेताओं के नामों की घोषणा करेंगे। 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता 122वें अंक में घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीतांश किस राग पर आधारित है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 121वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 117वें अंक में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ाइबो' के शीर्षक गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार चित्रगुप्त। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ का आगामी अंक श्रृंखला का समापन अंक होगा। इस रागमाला गीत में चार रागों की उपस्थिति है और यह एक युगलगीत है। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, July 8, 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग


स्वरगोष्ठी – ७८ में आज

‘घन छाए गगन अति घोर घोर...’


‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब रसिकजनों का, स्वरों की रिमझिम फुहारों के बीच स्वागत करता हूँ। इन दिनों आप प्रकृति-चक्र के अनुपम वरदान, वर्षा ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। तप्त, शुष्क और प्यासी धरती पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है। ऐसे ही मनभावन परिवेश में आपके उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए हम लेकर आए हैं यह नई श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग’। इस श्रृंखला में वर्षा ऋतु में गाये-बजाये जाने वाले रागों पर आपसे चर्चा करेंगे और इन रागों में निबद्ध वर्षा ऋतु के रस-गन्ध में पगे गीतों को प्रस्तुत भी करेंगे।

भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ हैं; बसंत और पावस। संगीत शास्त्र के अनुसार मल्हार के सभी प्रकार पावस ऋतु की अनुभूति कराने में समर्थ हैं। इसके साथ ही कुछ सार्वकालिक राग; वृन्दावनी सारंग, देस और जैजैवन्ती भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। वर्षाकालीन रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। आज के अंक में हम राग मेघ अथवा मेघ मल्हार की ही चर्चा करेंगे। इस राग पर चर्चा आरम्भ करने से पहले आइए सुनते हैं, राग मेघ में निबद्ध दो मोहक रचनाएँ। पटियाला (कसूर) गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में पहले मध्यलय झपताल की रचना- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’ और उसके बाद द्रुत लय तीनताल में निबद्ध पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष की रचना- ‘घन छाए गगन अति घोर घोर...’ की रसानुभूति आप भी कीजिए।

राग मेघ मल्हार : गायक - पण्डित अजय चक्रवर्ती



राग मेघ काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग का सर्वाधिक प्रचलित रूप औड़व-औड़व जाति का होता है। अर्थात आरोह-अवरोह में ५-५ स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ के अनुसार उस्ताद सलामत और नज़ाकत अली खाँ मेघ मल्हार गाते समय गांघार और धैवत का अनूठा प्रयोग करते थे। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है।

इस राग के माध्यम से मेघों की प्रतीक्षा, काले मेघों से आच्छादित आकाश और उमड़-घुमड़ कर वर्षा के आरम्भ होने के परिवेश की सार्थक अनुभूति होती है। आइए, अब हम आपको सितार पर राग मेघ सुनवाते है। सितार वाद्ययंत्र पर राग मेघ मल्हार की अवतारणा एक अलग ही इन्द्रधनुषी रंग बिखेरता है। सुविख्यात सितार-वादक पण्डित निखिल बनर्जी ने अपने तंत्र-वाद्य पर राग मेघ की अत्यन्त आकर्षक अवतारणा की है। आरम्भ में थोड़ा आलाप और उसके बाद झपताल में निबद्ध गत आप सुनेंगे। इस आकर्षक सितार-वादन को सुनते समय आप थोड़ा ध्यान दीजिएगा, तबला-संगत आरम्भ होने से ठीक पहले एक स्थान पर पण्डित जी ने धैवत स्वर का प्रयोग किया है। परन्तु केवल एक ही बार, रचना के शेष भाग में कहीं भी इस स्वर का दोबारा प्रयोग नहीं किया है। लीजिए, सुनिए सितार पर राग मेघ मल्हार-


सितार पर राग मेघ : वादक – पण्डित निखिल बनर्जी



स्वरों के माध्यम से वर्षा ऋतु के परिवेश की सार्थक सृष्टि रच देने में समर्थ राग मेघ के आधार पर फिल्मों के कई संगीतकारों ने गीत रचे हैं। इस सन्दर्भ में संगीतकार बसन्त देसाई का स्मरण प्रासंगिक है। वे ऐसे संगीतकार थे, जिन्होने मल्हार के लगभग सभी प्रकारों में फिल्मी गीत स्वरबद्ध किये हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों में हम आपको उनके स्वरबद्ध गीत सुनवाएँगे। आज हम आपको संगीतकार राजकमल का राग मेघ मल्हार पर आधारित स्वरबद्ध गीत सुनवा रहे हैं। उन्होने भी इस गीत में धैवत का प्रयोग किया है। यह गीत हमने १९८१ में प्रदर्शित, सईं परांजपे की फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया है। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत को येशुदास और हेमन्ती शुक्ला ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म चश्मेबद्दूर : ‘कहाँ से आए बदरा...’ : येशुदास और हेमन्ती शुक्ला


आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, राग आधारित एक फिल्मी गीत का अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – गीत की गायिका कौन है?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८०वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के उत्तर

‘स्वरगोष्ठी’ के ७६वें अंक की पहेली में हमने आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि और दूसरे का सही उत्तर है- ताल सितारखानी या पंजाबी तीनतान। इस बार की पहेली में हमारे एक नए पाठक, मुम्बई से अखिलेश दीक्षित जुड़े हैं। अखिलेश जी ने दोनों प्रश्नों के सही उत्तर देने के साथ ही १६ मात्रा के सितारखानी ताल के बारे में विस्तृत जानकारी भी दी है। इनके साथ ही दोनों प्रश्नों का सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने भी दिया है। दोनों प्रतियोगियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक से हमने मल्हार अंग के रागों का सिलसिला शुरू किया है। अगले अंक में भी हम आपसे मल्हार के एक अन्य प्रकार पर चर्चा करेंगे। वर्षा ऋतु से सम्बन्धित कोई राग अथवा रचना आपको प्रिय हो और आप उसे सुनना चाहते हों तो आज ही अपनी फरमाइश हमें swargoshthi@gmail.com पर मेल कर दें। इसके साथ ही यदि आप इनसे सम्बन्धित आडियो ‘स्वरगोष्ठी’ के माध्यम से संगीत प्रेमियों तक पहुँचाना चाहते हों तो वह क्लिप MP3 रूप में भेज दें। हम आपकी फरमाइश को और आपके भेजे आडियो क्लिप को ‘स्वरगोष्ठी’ में शामिल करने का हर-सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप भी हमारे सहभागी बनिए।

कृष्णमोहन मिश्र 

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