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Sunday, September 6, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और यादें गीतकार गुलशन बावरा की (१५)

सच कहा गया है कि कल्पना की उडान को कोई नहीं रोक सकता. कल्पनाएँ इंसान को सारे जहान की सैर करा देती हैं. ये इंसान की कल्पना ही तो है की वो धरती को माँ कहता है, तो कभी चाँद को नारी सोंदर्य का प्रतीक बना देता है. आसमान को खेल का मैदान, तो तारों को खिलाड़ियों की संज्ञा दे देता है. तभी तो कहते है कल्पना और साहित्य का गहरा सम्बन्ध है. जिस व्यक्ति की सोच साहित्यिक हो वो कहीं भी कोई भी काम करे, पर उसकी रचनात्मकता उसे बार-बार साहित्य के क्षेत्र की और मोड़ने की कोशिश करती है. गुलशन बावरा एक ऐसा ही व्यक्तित्व है जो अपनी साहित्यिक सोच के कारण ही फिल्म संगीत से जुड़े. हालांकि पहले वो रेलवे में कार्यरत थे, लेकिन उनकी कल्पना कि उड़ान ने उन्हें फिल्म उद्योग के आसमान पर स्थापित कर दिया, जहाँ उनका योगदान ध्रुव तारे की तरह अटल और अविस्मर्णीय है.

१२ अप्रैल १९३८ पकिस्तान(अविभाजित भारत के शेखुपुरा) में जन्मे गुलशन बावरा जी का असली नाम गुलशन मेहता है. उनको बावरा उपनाम फिल्म वितरक शांति भाई पटेल ने दिया था. उसके बाद सभी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे. हिंदी फिल्म उद्योग के ४९ वर्ष के सेवाकाल में बावरा जी ने २५० गीत लिखे. गुलशन बावरा ने अपना पहला गीत १९५९ में फिल्म 'चंद्रसेना' के लिए लिखा था. फिल्म 'सट्टा बाजार' के लिए लिखा गीत 'चांदी'के चंद टुकडे के लिए 'उनका हिट गीत था. उन्होनें 'सनम तेरी कसम', 'अगर तुम न होते', सत्ते पे सत्ता' ,'ये वादा रहा', हाथ की सफाई' और 'रफूचक्कर' आदि फिल्मों को अपने गीतों से सजाया है. फिल्म उपकार के गीत 'मेरे देश की धरती सोना उगले' को कौन भूल सकता है. यह गीत भी बावरा जी की ही कलम और कल्पना का अनूठा संगम है. फिल्म 'उपकार' के इस गीत ने उनके कैरियर को नई ऊँचाई दी. अपनी सादी शैली के लिए पहचाने जाने वाले बावरा जी का यह शायद सबसे चर्चित गीत रहा . अगर आज की तारीख में भारतवासी 'जय हो' गीत गाकर अपनी देशभक्ति को अभिव्यक्त करते हैं तो ६० के दशक में ये सम्मान 'मेरे देश की धरती सोना उगले'को प्राप्त था. हम इसे था नहीं कह सकते. देश प्रेम से ओतप्रोत यह गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस जैसे आयोजनों पर मुख्य रूप से रेडियो तथा टी.वी. स्टेशनों पर बजाया जाता है. 'मेरे देश की धरती' गीत तथा 'यारी है ईमान मेरा' गीत के लिए उन्हें 'फिल्म फेयर पुरूस्कार' से नवाजा गया था.

बावरा ने जीवन के हर रंग के गीतों को अल्फाज दिए. उनके लिखे गीतों में 'दोस्ती, रोमांस, मस्ती, गम' आदि विभिन्न पहलू देखने को मिलते हैं. 'जंजीर' फिल्म का गीत 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी' दोस्ती की दास्तान बयां करता है, तो 'दुग्गी पे दुग्गी हो या सत्ते पे सत्ता' गीत मस्ती के आलम में डूबा हुआ है. उन्होंने बिंदास प्यार करने वाले जबाँ दिलों के लिए भी 'खुल्ल्म खुल्ला प्यार करेंगे', 'कसमें वादे निभाएंगे हम', आदि गीत लिखे हैं. बावरा के पास हर मौके के लिए गीत था. पाकिस्तान से आकर बसे बावरा ने अपने फ़िल्मी कैरियर की तुलना में यूं तो कम गीत लिखे लेकिन उनके द्वारा लिखे सादे व अर्थपूर्ण गीतों को हमेशा पसंद किया गया. उन्होंने संगीतकार 'कल्याण जी आनंद जी' के संगीत निर्देशन में ६९ गीत लिखे और आर.डी. बर्मन के साथ १५० गीत लिखे. पंचम दा गुलशन बावरा जी के पडोसी थे. पंचम दा के साथ उनकी कई यादें जुडी हुई थीं. इन यादों को गुलशन बावरा जी ने 'अनटोल्ड स्टोरीज' नाम की एक सीडी में संजोया था. इसमें उन्होंने पंचम दा की आवाज रिकार्ड की थी और कुछ गीतों के साथ जुड़े किस्से-कहानियां भी प्रस्तुत किये.

गुलशन बावरा दिखने में दुबले -पतले शरीर के थे. उनका व्यक्तित्व हंसमुख था. हांलाकि बचपन में विभाजन के समय, उन्होंने जो त्रासदी झेली थी, वो अविस्मर्णीय है लेकिन उनके व्यक्तित्व में उसकी छाप कहीं दिखाई नहीं देती थी. वो कवि से ज्यादा कॉमेडियन दिखाई देते थे. इस गुण के कारण कई निर्माताओं ने उनसे अपनी फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं भी अभिनीत करवायीं. विभाजन का दर्द उन्होंने कभी जाहिर नहीं होने दिया. राहुल देव बर्मन उनके करीबी मित्र थे. राहुल जी के संगीत कक्ष में प्राय: सभी मित्रों की बैठक होती थी और खूब ठहाके लगाये जाते थे. गुलशन बावरा उस सर्कस के स्थायी 'जोकर' थे. यहीं से उनकी मित्रता किशोर कुमार जी से हुई.फिर क्या था अब तो दोनों लोग मिलकर हास्य की नई-नई स्तिथियाँ गढ़ते थे. गुलशन बावरा को उनके अंतिम दिनों में जब 'किशोर कुमार' सम्मान के लिए चुना गया तो उनके चहरे पर अद्भुद संतोष के भाव उभरते दिखाई दिए. उनके लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षण था. एक तरफ यह पुरूस्कार उनके लिए विभाजन की त्रासदी से लेकर जीवन पर्यंत किये गए संघर्ष का इनाम था. दूसरी ओर अपने पुराने मित्र की स्मृति में मिलने वाला पुरुस्कार एक अनमोल तोहफे से कम नहीं था. पिछले सात वर्षों से वह 'बोर्ड ऑफ परफार्मिंग राइट सोसायटी' के निदेशक पद पर कार्यरत थे.

विगत ७ अगस्त २००९ को लम्बी बीमारी के चलते गुलशन बावरा जी का देहांत हो गया और गुलशन जी की इच्छानुसार उनके मृतशरीर को जे.जे. अस्पताल को दान कर दिया गया. हिंदी सिनेमा ही नहीं हिंदी साहित्य भी गुलशन बावरा जी के अद्भुद योगदान को कभी नहीं भूल पायेगा. आज गुलशन जी शारीरिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं तो क्या हुआ उनके लिखे अनमोल गीत हमेशा फिजाओं में गूँजकर उनके होने का एहसास कराते रहेंगे. एक गीतकार कभी नहीं मरता उसकी कल्पना उसके विचार धरोहर के रूप में लोगों को आनंदित करने के साथ-साथ एक दिशा भी प्रदान करते रहते हैं. आइये हम सभी एक उत्कृष्ट और उम्दा कल्पना के सृजनकार को श्रद्धांजलि दें. आज रविवार सुबह की कॉफी में सुनते हैं गुलशन बावरा के लिखे और किशोर दा के गाये कुछ मस्ती भरे तो कुछ दर्द भरे गीत -

हमें और जीने की चाहत न होती (अगर तुम न होते)


प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया (सत्ते पे सत्ता)


दिल में जो मेरे (झूठा कहीं का)


तू मइके मत जईयो (पुकार)


लहरों की तरह यादें (निशाँ)


प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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