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रविवार, 23 जून 2019

राग जयजयवन्ती : SWARGOSHTHI – 423 : RAG JAYJAYVANTI






स्वरगोष्ठी – 423 में आज

खमाज थाट के राग – 4 : राग जयजयवन्ती

पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष से राग जयजयवन्ती में एक रचना और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। इस श्रृंखला में हम खमाज थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में खमाज थाट के जन्य राग “जयजयवन्ती” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष के स्वरों में प्रस्तुत राग जयजयवन्ती की एक रचना के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग जयजयवन्ती के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिक उपयोग किया गया है। इस राग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म “सीमा” से शंकर जयकिशन का स्वरबद्ध किया एक गीत –“मनमोहना बड़े झूठे...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग जयजयवन्ती का सम्बन्ध खमाज थाट से माना जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर के उत्तरार्द्ध में किए जाने की परम्परा है। राग जयजयवन्ती को परमेल-प्रवेशक राग कहा जाता है। इसका कारण यह है कि यह रात्रि के दूसरे प्रहर के अन्तिम समय में गाया-बजाया जाता है। इस राग के बाद काफी थाट के रागों का समय प्रारम्भ हो जाता है। राग जयजयवन्ती में खमाज और काफी दोनों थाट के स्वर लगते हैं। शुद्ध गान्धार खमाज थाट का और कोमल गान्धार काफी थाट का सूचक है। कोमल गान्धार स्वर का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो ऋषभ स्वरों के बीच किया जाता है। रात्रि के दूसरे प्रहर के रागों में राग जयजयवन्ती के अलावा कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- राग नीलाम्बरी, खमाज, आसा, खम्भावती, गोरख कल्याण, जलधर केदार, मलुहा केदार, श्याम केदार, झिंझोटी, तिलक कामोद, तिलंग, दुर्गा, देस, नट, नारायणी, नन्द, रागेश्री, शंकरा, सोरठ, हेम कल्याण आदि। राग जयजयवन्ती के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आइए सुनते हैं, इस राग की मोहक बन्दिश। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष।

राग जयजयवन्ती : “मेरो मन मोहन सों अटक्यो...” : पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष



जयजयवन्ती राग, खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इसमें भी दोनों गान्धार और दोनों निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग जयजयवन्ती का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर के अन्तिम भाग में किया जाता है। आरोह में पंचम के साथ शुद्ध निषाद और धैवत के साथ कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अवरोह में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग होता है। इस राग की प्रकृति गम्भीर है और चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होती है। इस राग में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना आदि गाये जाते है। इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। यह राग दो अंगों, देस और बागेश्री, में प्रयोग होता है। देस अंग की जयजयवन्ती, जिसमें कभी-कभी बागेश्री अंग भी दिखाया जाता है, प्रचार में अधिक है। लीजिए, अब आप सुनिए, राग जयजयवन्ती के स्वरों में पिरोया मनमोहक फिल्मी गीत। इसे हमने 1955 में बनी फिल्म ‘सीमा’ से लिया है। सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने इसे गाया है। यह गीत एकताल में निबद्ध है। गीत के संगीतकार शंकर जयकिशन हैं। आप भी यह गीत सुनिए और आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।

राग जयजयवन्ती : “मनमोहना बड़े झूठे...” : लता मंगेशकर : फिल्म सीमा




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 423वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 जून, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 425 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 421वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आजम” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – गारा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल एवं दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और साथी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और किसी अज्ञात स्थान से शिल्पी सिंह। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, मेरी पारिवारिक व्यस्तता के कारण विगत दो सप्ताह तक “स्वरगोष्ठी” का प्रकाशन बाधित हुआ। इस कारण आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने खमाज थाट के जन्य राग “जयजयवन्ती” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष के स्वरों में प्रस्तुत एक रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म “सीमा” से एक मनमोहक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में सुनवाया। संगीतकार शंकर जयकिशन ने इस गीत को राग जयजयवन्ती के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग जयजयवन्ती : SWARGOSHTHI – 423 : RAG JAYJAYVANTI : 23 जून, 2019



शनिवार, 5 नवंबर 2016

"मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ...”, इस गीत का मुखड़ा हसरत जयपुरी ने नहीं बल्कि जयकिशन ने लिखा था।


एक गीत सौ कहानियाँ - 98
 

'मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 98-वीं कड़ी में आज जानिए 1969 की फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ के मशहूर गीत "मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता...” के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।  

1968 में शंकर जयकिशन को भारत सरकार द्वारा प्रदत्त पद्मश्री पुरस्कार से समानित किए
From right to left - Rajaram, a guest, Satish Wagle, O P Ralhan, Dharmendra, Jaikshan, Bhappi Soni (in goggles) 
जाने की घोषणा हुई। इस वर्ष फ़िल्म और संगीत के क्षेत्र में जिन कलाकारों को यह सम्मान दिया गया था उनमें शामिल थे बेगम अख़तर, सुनिल दत्त, दुर्गा खोटे, एन. टी. रामाराव, और वैजयन्तीमाला। उन्हीं दिनों फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ की प्लानिंग चल रही थी। फ़िल्म के निर्माता थे सतीश वागले और राजाराम। निर्देशक थे भप्पी सोनी और संगीत निर्देशक थे शंकर-जयकिशन। पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण करने शंकर-जयकिशन और इसी फ़िल्म की नायिका वैजयन्तीमाला दिल्ली पहुँच गए। तो साथ में सतीश वागले भी दिल्ली चले आए। वागले साहब शंकर-जयकिशन के साथ ही ओबरोय होटल में रुके थे। फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ की कहानी जयकिशन सुन चुके थे और उन्हें पता थी कि फ़िल्म में नायक की भूमिका में धर्मेन्द्र का नाम विजय और नायिका वैजयन्तीमाला का नाम कविता है। “कविता” नाम जयकिशन के मन-मस्तिष्क पर जैसे छा गया था और अंजाने में ही इस नाम का जाप उनके मन में चल रहा था। और इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय के अन्दर “कविता” पर एक पंक्ति उनके दिमाग़ में आ गया। सुबह नाशते के समय जयकिशन गुनगुना रहे थे, केवन धुन ही नहीं बल्कि शब्दों के साथ कुछ गुनगुना रहे थे। वो गुनगुना रहे थे “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता”। सतीश वागले को धुन भी पसन्द आई और बोल भी बहुत भा गए। वो जयकिशन से बोले कि यह तो कमाल का गाना है यार! जयकिशन ने कहा कि धुन भी मेरी है और बोल भी मेरे ही हैं। अगर आपको पसन्द है तो यह तोहफ़ा है आपके लिए मेरी तरफ़ से, यह आपकी फ़िल्म का एक गाना होगा। और वापस पहुँचते ही हम इसे रेकॉर्ड करेंगे। बम्बई पहुँच कर हसरत जयपुरी साहब से अन्तरे लिखवा कर गाना पूरा करवाया गया। हसरत जयपुरी ने मुखड़े को ज़रा सा भी नहीं छेड़ा और ना ही कोई दूसरी लाइन जोड़ी। जैसा जयकिशन ने लिखा था “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता”, वैसा ही ज्यों का त्यों रखा गया मुखड़ा। यही नहीं अन्तरे से मुखड़े पर आने वाला कनेक्टिंग्‍लाइन भी नहीं रखा गया। सीधे सीधे तीन अन्तरे लिख डाले –

“तुझे दिल के आइने में मैंने बार बार देखा,
तेरी अखड़ियों में देखा तो झलकता प्यार देखा,
तेरा तीर मैंने देखा तो जिगर के पार देखा”;

“तेरा रंग है सलौना तेरे अंग में लचक है,
तेरी बात में है जादू तेरे बोल में खनक है,
तेरी हर अदा मोहब्बत तू ज़मीन की धनक है”;

“मेरा दिल लुभा रहा है तेरा रूप सादा सादा,
ये झुकी झुकी निगाहें करे प्यार दिल में ज़्यादा,
मैं तुझ ही पे जान दूँगा है यही मेरा इरादा।“

Jaikishan & Rafi
रफी साहब की आवाज़ में गाना रेकार्ड हो गया। पर एक समस्या आ गई। 'प्यार ही प्यार' फिल्म के निर्माता, यानी सतीश वागले साहब के पार्टनर राजाराम जी को गाना ज़रा सा भी पसन्द नहीं आया। और तो और फ़िल्म के वितरक ताराचन्द बरजात्या ने भी गाने को सीधा रीजेक्ट कर दिया और इस मुद्दे पर कोई भी बहस करने से मना कर दिया। सतीश वागले को बहुत बुरा लगा। उड़ते-उड़ते ख़बर जयकिशन के कानों तक भी पहुँच ही गई कि गाना कई लोगों को बेकार लगा है। जयकिशन जी को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ताराचन्द बरजात्या ने ’दाग़’ फ़िल्म के गाने को भी रीजेक्ट कर दिया था, पर वही गाना जो उन्होंने रीजेक्ट किया था आज भी लोगों को याद है, और वह गाना था “ऐ मेरे दिल कहीं और चल, ग़म की दुनिया से जी भर गया”। जयकिशन ने यह भी कहा कि बरजात्या को संगीत की कोई समझ नहीं है, इसलिए मेरी बात मानो, गाना अच्छा है और ख़ूब चलेगा। लिहाज़ा जयकिशन की बात मान ली गई और जो बात मान ली गई थी वह सच भी हो गई। आज भी यह गाना फ़िल्म के बाक़ी गीतों से ज़्यादा याद किया जाता है। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 









शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

‘जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...’ - एक दिन के अन्दर बन कर तैयार हुआ था यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 53
 

जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 53वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आम्रपाली' के मशहूर गीत "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे" से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 



फ़िल्म संगीत जगत में कुछ संगीतकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने करिअर के शुरुआत में धार्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में संगीत देने की वजह से "टाइप-कास्ट" हो गए और जिसकी वजह से सामाजिक और पॉपुलर फ़िल्मों में संगीत कभी नहीं दे सके। पर ऐसा भी नहीं कि इन संगीतकारों को धार्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में बड़ी सफलता प्राप्त हुई हो। तब इन संगीतकारों ने यह तर्क दिया कि इन जौनरों के गीतों को सफलता नहीं मिलती है। इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता क्योंकि संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने यह कई बार साबित किया है कि फ़िल्म चाहे सामाजिक हो या धार्मिक, या फिर ऐतिहासिक, अगर संगीतकार में काबिलियत है तो उसे सफलता की बुलन्दी तक पहुँचा सकता है। 'हलाकू', 'यहूदी' और 'आम्रपाली' आदि ऐसी फ़िल्में हैं जो ऐतिहासिक और पौराणिक जौनर के होते भी अपने गीत-संगीत की वजह से बेहद कामयाब रहीं। 'आम्रपाली' लेख टंडन की फ़िल्म थी जिसमें वैजयन्तीमाला और सुनील दत्त मुख्य किरदारों में थे। फ़िल्म की कहानी 500 BC काल के वैशाली राज्य की नगरवधू आम्रपाली पर केन्द्रित थी। मगध साम्राज्य के राजा अजातशत्रु आम्रपाली से प्यार करने लगता है और उसे पाने के लिए वैशाली को तबाह कर देता है। पर तब तक आम्रपाली गौतम बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर बुद्ध के शरण में चली जाती है। इस फ़िल्म को लेख टंडन ने इतनी ख़ूबसूरती के साथ परदे पर उतारा कि इस फ़िल्म को उस साल ऑस्कर के लिए भारत की तरफ़ से 'Best Foreign Language Film' के लिए भेजा गया। फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस पर भले बहुत ज़्यादा कामयाबी न मिली हो पर इसे एक क्लासिक फ़िल्म का दर्जा दिया गया है। फ़िल्म के गीत-संगीत ने भी फ़िल्म को चार-चाँद लगाए। शंकर-जयकिशन के शास्त्रीय-संगीत पर आधारित इस फ़िल्म की रचनाएँ आज भी कानों में शहद घोलती है। फ़िल्म में कुल पाँच गीत थे, जिनमें से चार गीत लता मंगेशकर की एकल आवाज़ में थे ("नील गगन की छाँव में...", "तड़प ये दिन रात की...", "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...", "तुम्हे याद करते करते जायेगी रैन सारी...") और पाँचवाँ गीत "नाचो गाओ धूम मचाओ..." एक समूह गीत था। इनमें से केवल एक गीत "नील गगन की छाँव में" हसरत जयपुरी का लिखा हुआ था, और बाक़ी चार गीत शैलेन्द्र के थे।

और अब बारी एक मज़ेदार क़िस्से की। गीत बन रहा था "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे"। रेकॉर्डिंग स्टूडियो में शंकर, जयकिशन, शैलेन्द्र और लता मंगेशकर इस गीत का रिहर्सल कर रहे थे। संयोग से राज कपूर भी किसी काम से उस स्टूडियो में उस समय मौजूद थे। इस गीत की धुन उनके कानों में पड़ते ही वो उठ खड़े हुए और रिहर्सल के जगह पर पहुँच गए। उन्होंने शंकर-जयकिशन से कहा कि यह धुन तो मेरी है, इसे तुम लोग किसी और की फ़िल्म में कैसे इस्तेमाल कर सकते हो? दरसल बात ऐसी थी कि जिस धुन पर "जाओ रे जोगी तुम..." को बनाया गया था, वह धुन इससे पहले शंकर जयकिशन ने राज कपूर की किसी फ़िल्म के लिए बनाई थी जिसका इस्तेमाल राज कपूर ने उस फ़िल्म में नहीं किया था। इसलिए शंकर-जयकिशन यह समझ बैठे कि राज साहब को वह धुन नहीं चाहिए। पर राज कपूर उस धुन का इस्तेमाल अपनी आनेवाली किसी फ़िल्म में करना चाहते थे। तो उस रिहर्सल रूम में राज कपूर से यह ऐलान कर दिया कि वो इस धुन का इस्तेमाल 'मेरा नाम जोकर' के किसी गीत में करना चाहते हैं, इसलिए "जाओ रे जोगी" के लिए शंकर-जयकिशन कोई और धुन बना ले। यह कह कर राज कपूर वहाँ से चले गए। एक पल के लिए जैसे रूम में सन्नाटा हो गया। लेख टंडन एक समय राज कपूर के सहायक हुआ करते थे और राज कपूर से उन्होंने फ़िल्म निर्माण के महत्वपूर्ण पहलू सीखे थे; ऐसे में वो राज कपूर के ख़िलाफ़ कैसे जाते या उनसे बहस करते, पर अब इस उलझन से कैसे निकले?

लेख टंडन
स्टूडियो की चुप्पी को तोड़ा लता मंगेशकर ने। उन्होंने हारमोनियम को अपनी तरफ़ खींचा और ऐलान किया कि चलिए हम एक और गीत बनाते हैं! शंकर-जयकिशन ने मिनटों में मुखड़े की धुन बना दी, और शैलेन्द्र के मुख से भी तुरन्त मुखड़े के बोल निकल पड़े "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे, यह प्रेमियों की नगरी, यहाँ प्रेम ही है पूजा"। लता जी के मुख से इस मुखड़े की अद्भुत अदायगी को सुन कर सब ख़ुशी से उछल पड़े। पर अभी भी उलझन खतम नहीं हुई, मुखड़ा तो बन गया, पर अन्तरे इतनी जल्दी कैसे बनेंगे! तब शैलेन्द्र ने यह ऐलान कर दिया - "इस वक़्त 10 बज रहे हैं, सभी को 3 बजे वापस बुलाओ, मेरा गाना पूरा हो जाएगा"। यह कह कर शैलेन्द्र ने लेख टंडन को अपनी कार में बिठाया और 'आरे मिल्क कॉलोनी' ले गए। जाते हुए बीअर की कुछ बोतलें भी साथ ले लिए। आरे कॉलोनी की सुन्दर गलियों में टहलते हुए शैलेन्द्र मुखड़े को गुनगुनाए जा रहे थे, पर लाख कोशिशें करने के बावजूद अन्तरे का कुछ भी उन्हें सूझ नहीं रहा था। टहलते टहलते घड़ी के काँटें भी आगे बढ़ते चले जा रहे थे। घड़ी में 3 बजने में जब कुछ ही समय बाक़ी थे, तब लेख टंडन घबराते हुए शैलेन्द्र से पूछा कि अब क्या होगा? शैलेन्द्र ने सीधे सीधे उनसे माफ़ी माँग ली और कहा कि आज की रेकॉर्डिंग रद्द करनी पड़ेगी। वापसी में गाड़ी में लेख टंडन और शैलेन्द्र की बीच कोई भी बातचीत नहीं हुई। शायद लेख साहब शैलेन्द्र जी से ख़फ़ा हो गए थे। स्टूडियो के बाहर पहुँचते ही जब दोनों ने लता जी की गाड़ी को खड़ा देखा तो लेख साहब डर गए और शैलेन्द्र से कहा, "अब आप ही उन्हें सम्भालिएगा, हमने उनका पूरा दिन खराब कर दिया, वो बहुत नाराज़ होंगी"। शैलेन्द्र सिर्फ़ मुस्कुराए।

स्टूडियो के अन्दर पहुँच कर दोनों ने देखा कि लता मंगेशकर काँच से घिरे सिंगर के केबिन में पहुँच चुकी हैं। लेख टंडन ने मॉनिटर रूम में जाते हुए शैलेन्द्र जी से कहा कि वो जाकर लता जी से बात करे। शैलेन्द्र और लता के बीच क्या बातचीत हो रही थी यह लेख साहब को पता नहीं चला, वो सिर्फ़ शीशे से देख रहे थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर इतनी क्या बातें हो रही हैं दोनों में जबकि गाना लिखा ही नहीं गया है। अपनी उत्सुकता को काबू में न रख पाते हुए लेख टंडन ने रेकॉर्डिस्ट से कहा कि वो सिंगर का माइक्रोफ़ोन ऑन कर दे ताकि वो वहाँ क्या चल रहा है उसे सुन सके। जैसे ही माइक्रोफ़ोन ऑन हुआ तो जो शब्द उनके कान में गए वो थे - "शैलेन्द्र जी, बस... दो ही अन्तरे काफ़ी हैं इस गाने के लिए... बहुत अच्छे हैं!" लेख टंडन चकित रह गए। उन्हें ज़रा सा भी पता नहीं चला कि कविराज शैलेन्द्र ने किस समय ये अन्तरे बना लिए थे। शायद आरे कॉलोनी से वापस आते समय गाड़ी में जो चुप्पी साधे दोनो बैठे थे, उस वक़्त वो असल में अन्तरे ही रच रहे थे। क्या लिखा है शैलेन्द्र ने, राग कामोद के सुरों का आधार लेकर क्या कम्पोज़ किया है शंकर जयकिशन ने और क्या गाया है लता मंगेशकर ने। आप भी सुनिए।


फिल्म आम्रपाली : 'जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...' : लता मंगेशकर : शंकर जयकिशन : शैलेन्द्र 


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

रविवार, 16 नवंबर 2014

‘केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूले...’ : SWARGOSHTHI – 194 : RAG BASANT BAHAR



स्वरगोष्ठी – 194 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 3 : राग बसन्त बहार

पार्श्वगायक मन्ना डे ने जब पण्डित भीमसेन जोशी को राज-दरबार में पराजित किया 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनो हमारी नई लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’ जारी है। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के तीसरे अंक में आज हम आपसे 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘बसन्त बहार’ के एक गीत- ‘केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूलें...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग ‘बसन्त बहार’ के स्वरों का उपयोग किया गया है। विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी ने इस गीत को स्वर दिया था और संगीत रचने में भी अपना योगदान किया था। इस युगल गीत में पण्डित जी के साथ जाने-माने पार्श्वगायक मन्ना डे ने भी अपना स्वर दिया है। इसके साथ ही राग ‘बसन्त बहार’ के यथार्थ स्वरूप को अनुभव करने के लिए हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ डॉ. लालमणि मिश्र का विचित्र वीणा पर बजाया राग ‘बसन्त बहार’ की एक रचना भी प्रस्तुत करेंगे।
 


मन्ना डे : रेखांकन - सुवायु नंदी
भीमसेन जोशी : रेखांकन - उदय देव
फिल्म-संगीत-जगत में समय-समय पर कुछ ऐसे गीतों की रचना हुई है, जो आज हमारे लिए अनमोल धरोहर बन गए हैं। एक ऐसा ही गीत 1956 में प्रदर्शित फिल्म 'बसन्त बहार' में रचा गया था। यूँ तो इस फिल्म के सभी गीत अपने समय में हिट हुए थे, किन्तु फिल्म का एक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' कई कारणों से फिल्म-संगीत-इतिहास के पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। इस गीत की मुख्य विशेषता यह है कि पहली बार किसी वरिष्ठ शास्त्रीय गायक (पण्डित भीमसेन जोशी) और फिल्मी पार्श्वगायक (मन्ना डे) ने मिल कर एक ऐसा युगल गीत गाया, जो राग बसन्त बहार के स्वरों में ढला हुआ था। यही नहीं, फिल्म के प्रसंग के अनुसार राज-दरबार में आयोजित प्रतियोगिता में नायक गोपाल (भारतभूषण) को गायन में दरबारी गायक के मुक़ाबले में विजयी होना था। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि दरबारी गायक के लिए भीमसेन जी ने और नायक के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। फिल्म से जुड़ा तीसरा रेखांकन योग्य तथ्य यह है कि फिल्म की संगीत-रचना में सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पण्डित रामनारायण का उल्लेखनीय योगदान था।

1949 की फिल्म 'बरसात' से अपनी हलकी-फुलकी और आसानी से गुनगुनाये जाने वाली सरल धुनों के बल पर सफलता के झण्डे गाड़ने वाले शंकर-जयकिशन को जब फिल्म 'बसन्त बहार' का प्रस्ताव मिला तो उन्होने इस शर्त के साथ इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया कि फिल्म के राग आधारित गीतों के गायक मन्ना डे ही होंगे। जबकि फिल्म के नायक भारतभूषण के भाई शशिभूषण सभी गीत मोहम्मद रफी से गवाना चाहते थे। मन्ना डे की प्रतिभा से यह संगीतकार जोड़ी, विशेष रूप से शंकर, बहुत प्रभावित थे। शंकर-जयकिशन ने फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के स्थान पर किसी और पार्श्वगायक को लेने से साफ मना कर दिया। फिल्म के निर्देशक राजा नवाथे मुकेश की आवाज़ को पसन्द करते थे, परन्तु वो इस विवाद में तटस्थ बने रहे। निर्माता आर. चन्द्रा भी पशोपेश में थे। मन्ना डे को हटाने का दबाव जब अधिक हो गया तब अन्ततः शंकर-जयकिशन को फिल्म छोड़ देने की धमकी देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी।

फिल्म 'बसन्त बहार' में शंकर-जयकिशन ने 9 गीत शामिल किए थे, जिनमें से दो गीत- 'बड़ी देर भई...' और 'दुनिया न भाए मोहे...' मोहम्मद रफी के एकल स्वर में गवा कर उन्होने शशिभूषण की बात भी रख ली। इसके अलावा उन्होने मन्ना डे से चार गीत गवाए। राग मियाँ की मल्हार पर आधारित 'भयभंजना वन्दना सुन हमारी...' (एकल), राग पीलू पर आधारित 'सुर ना सजे...' (एकल), लता मंगेशकर के साथ युगल गीत 'नैन मिले चैन कहाँ...' और इन सब गीतों के साथ शामिल था राग बसन्त बहार के स्वरों में पिरोया वह ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जूही...', जिसे मन्ना डे ने पण्डित भीमसेन जोशी के साथ जुगलबन्दी के रूप में गाया है। इस आलेख की आरम्भिक पंक्तियों में हम फिल्म के उस प्रसंग की चर्चा कर चुके हैं, जिसमें यह गीत फिल्माया गया था। आइए, अब कुछ चर्चा इस गीत की रचना-प्रक्रिया के बारे में करते हैं। संगीतकार शंकर-जयकिशन फिल्म के इस प्रसंग के लिए एक ऐतिहासिक गीत रचना चाहते थे। उन्होने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित भीमसेन जोशी और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण को आमंत्रित किया और यह दायित्व उन्हें सौंप दिया। इसके आगे की कहानी आप स्वयं पण्डित भीमसेन जोशी की जुबानी सुनिए, इस रिकार्डिंग के माध्यम से। पण्डित भीमसेन जोशी पर निर्मित वृत्तचित्र का यह एक अंश है, जिसमें गीतकार गुलज़ार, पण्डित जी से सवाल कर रहे हैं।


पण्डित भीमसेन जोशी से की गई गीतकार गुलज़ार की बातचीत का एक अंश



 पण्डित जी ने बातचीत के दौरान जिस 'गीत लिखने वाले' की ओर संकेत किया है, वो कोई और नहीं, बल्कि गीतकार शैलेन्द्र थे। दूसरी ओर शंकर-जयकिशन ने जब इस जुगलबन्दी की बात मन्ना डे को बताई तो वे एकदम भौचक्के से हो गए। मन्ना डे ने यद्यपि कोलकाता में उस्ताद दबीर खाँ और मुम्बई आकर उस्ताद अमान अली खाँ और उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ से संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया था, किन्तु पण्डित जी के साथ जुगलबन्दी गाने का प्रस्ताव सुन कर उनकी हिम्मत जवाब दे गई। मन्ना डे की उस समय की मनोदशा को समझने के लिए लीजिए, प्रस्तुत है- उनके एक साक्षात्कार का अंश-


मन्ना डे के एक साक्षात्कार का अंश



इस गीत को गाने से बचने के लिए मन्ना डे चुपचाप पुणे चले जाने का निश्चय कर चुके थे, लेकिन पत्नी के समझाने पर उन्होने इस प्रकार पलायन स्थगित कर दिया। पंकज राग द्वारा लिखित पुस्तक 'धुनों की यात्रा' में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि- मन्ना डे अपने संगीत-गुरु उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ के पास मार्गदर्शन के लिए भी गए थे। इसके अलावा मन्ना डे के गाये हिस्से में राग बसन्त के साथ राग बहार का स्पर्श दिया गया और लय भी थोड़ी धीमी की गई थी। पण्डित रामनारायण ने मन्ना डे को कुछ ऐसी तानें सीखा दी, जिससे फिल्म का नायक विजयी होता हुआ नज़र आए। साक्षात्कार में मन्ना डे ने स्वीकार किया है कि उनके साथ गाते समय पण्डित जी ने अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं किया था। अन्ततः पण्डित भीमसेन जोशी, पण्डित रामनारायण, मन्ना डे और शैलेन्द्र के प्रयत्नों से फिल्म 'बसन्त बहार' का ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' की रचना हुई और फिल्म संगीत के इतिहास में यह गीत सुनहरे पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। लीजिए, अब आप पूरा गीत सुनिए।


फिल्म – बसन्त बहार : ‘केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...’ : पण्डित भीमसेन जोशी और सुर गन्धर्व मन्ना डे



बसन्त ऋतु का अत्यन्त मोहक राग ‘बसन्त बहार’ दो रागों के मेल से बना है। कुछ विद्वान इसे ‘छायालग राग’ कहते हैं। आम तौर पर इस राग के आरोह में बहार और अवरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यदि आरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो इसे पूर्वांग प्रधान रूप देना आवश्यक है। राग बसन्त और बहार में मुख्य अन्तर यह है कि बहार में कोमल गान्धार और दोनों निषाद तथा बसन्त में कोमल ऋषभ व कोमल धैवत के साथ शुद्ध गान्धार का प्रयोग होता है। राग ‘बसन्त बहार’ दो प्रकार से प्रचलन में है। यदि बसन्त को प्रमुखता देनी हो तो इसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत लेना चाहिए। ऐसे में वादी स्वर षडज और संवादी पंचम हो जाता है। काफी थाट के अन्तर्गत लेने पर राग बहार प्रमुख हो जाता है और वादी मध्यम और संवादी षडज हो जाता है। अन्य ऋतुओं में इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु बसन्त ऋतु में इसका प्रयोग किसी भी समय किया जा सकता है।

डॉ. लालमणि मिश्र 
अब हम आपको एक प्राचीन और लुप्तप्राय तंत्रवाद्य विचित्रवीणा पर राग ‘बसन्त बहार’ सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत किया है, बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलासाधक, शिक्षक और शोधकर्त्ता डॉ. लालमणि मिश्र ने। कृतित्व से पूर्व इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व पर एक दृष्टिपात करते चलें।

डॉ. लालमणि मिश्र का जन्म 11 अगस्त, 1924 को कानपुर के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पाँच वर्ष की आयु में उन्हें स्कूल भेजा गया किन्तु 1930 में कानपुर के भीषण दंगों के कारण न केवल इनकी पढ़ाई छूटी बल्कि इनके पिता का व्यवसाय भी बर्बाद हो गया। परिवार को सुरक्षित बचाकर इनके पिता कलकत्ता (अब कोलकाता) आ गए। कोलकाता में बालक लालमणि की माँ को संगीत की शिक्षा प्रदान करने वाले कथावाचक पण्डित गोवर्द्धन लाल घर आया करते थे। एक बार माँ को सिखाए गए 15 दिन के पाठ को यथावत सुना कर उन्होने पण्डित जी को चकित कर दिया। उसी दिन से लालमणि की विधिवत संगीत शिक्षा आरम्भ हो गई। पण्डित गोवर्द्धन लाल से उन्हें ध्रुवपद और भजन का ज्ञान मिला तो हारमोनियम वादक और शिक्षक विश्वनाथप्रसाद गुप्त से हारमोनियम बजाना सीखा। ध्रुवपद-धमार की विधिवत शिक्षा पण्डित कालिका प्रसाद से, खयाल की शिक्षा रामपुर सेनिया घराने के उस्ताद वज़ीर खाँ के शिष्य मेंहदी हुसेन खाँ से मिली। बिहार के मलिक घराने के शिष्य पण्डित शुकदेव राय से सितार वादन की तालीम मिली। मात्र 16 वर्ष की आयु में मुंगेर, बिहार के एक रईस परिवार के बच्चों के संगीत-शिक्षक बन गए। 1944 में कानपुर के कान्यकुब्ज कालेज में संगीत-शिक्षक नियुक्त हुए। इसी वर्ष सुप्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक उस्ताद अब्दुल अज़ीज खाँ (पटियाला) के वाद्य विचित्र वीणा से प्रभावित होकर उन्हीं से शिक्षा ग्रहण की और 1950 में लखनऊ के भातखण्डे जयन्ती समारोह में इस वाद्य को बजा कर विद्वानो की प्रशंसा अर्जित की। लालमणि जी 1951 में उदयशंकर के दल में बतौर संगीत निर्देशक नियुक्त हुए और 1954 तक देश-विदेश का भ्रमण किया। 1951 में कानपुर के गाँधी संगीत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य बने। 1958 में पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के आग्रह पर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय में वाद्य विभाग के रीडर पद पर सुशोभित हुए और यहीं डीन और विभागाध्यक्ष भी हुए। संगीत की हर विधा में पारंगत पण्डित लालमणि मिश्र ने अपनी साधना और शोध के बल पर अपनी एक अलग शैली विकसित की जिसे ‘मिश्रवाणी’ के नाम से स्वीकार किया गया। 17 जुलाई, 1979 को मात्र 55 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था। आइए अब पण्डित लालमणि मिश्र से सुनते हैं, राग बसन्त बहार।


राग – बसन्त बहार : विचित्र वीणा पर एक ताल में निबद्ध रचना : डॉ. लालमणि मिश्र 



आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 194वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार फिर लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 22 नवम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 196वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 192वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायक पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ के युगल स्वरों में गाये, फिल्म बैजू बावरा के गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग देसी अथवा देसी तोड़ी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल विलम्बित तीनताल। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

रविवार, 4 मई 2014

अनूठा तालवाद्य नक्कारा अथवा नगाड़ा



स्वरगोष्ठी – 166 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 4

'नक्कारखाने में तूती की आवाज़'- अब तो इस मुहावरे का अर्थ ही बदल चुका है 

'तूती के शोर में गुम हुआ नक्कारा'  





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे तालवाद्य की चर्चा करेंगे जिसका लोकसंगीत और लोकनाट्य में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता रहा है। नक्कारा अथवा नगाड़ा नामक यह वाद्य अपनी ऊँची आवाज़ और विशिष्ट वादन शैली के कारण पिछली शताब्दी का सर्वाधिक लोकप्रिय तालवाद्य रहा है। आज भी कभी-कभी नक्कारा का उपयोग नज़र आ जाता है, परन्तु धीरे-धीरे यह लुप्तप्राय होता जा रहा है।  


ज के अंक में हम आपके साथ एक ऐसे लोक ताल वाद्य के बारे में चर्चा कर रहे हैं जो भारतीय ताल वाद्यों में सबसे प्राचीन है, किन्तु आज इस वाद्य के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मँडरा रहे हैं। एक मुहावरा है- ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज़’, जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं और समय-समय पर इसका प्रयोग भी करते रहते हैं। ऐसे माहौल में जहाँ अपनी कोई सुनवाई न हो या बहुत अधिक शोर-गुल में अपनी आवाज़ दब जाए, वहाँ हम इसी मुहावरे का प्रयोग करते हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आने वाले समय में यह मुहावरा ही अर्थहीन हो जाएगा, क्योंकि ऊँचे सुर वाला तालवाद्य नक्कारा या नगाड़ा ही नहीं बचेगा तो तूती (एक छोटे आकार और ऊँचे स्वरों वाला सुषिर वाद्य) की आवाज़ भला क्यों दबेगी?

नाथूलाल सोलंकी 
'नक्कारा' अथवा 'नगाड़ा' अतिप्राचीन घन वाद्य है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख 'दुन्दुभी' नाम से किया गया है। देवालयों में इस घन वाद्य का प्रयोग ‘नौबत’ के अन्तर्गत प्राचीन काल से ही किया जा रहा है। नौबतखाना में नौ वाद्यों का समूह होता है, जिसमें अन्य वाद्यों- दमामा, कर्णा, सुरना, नफीरी, श्रृंगी, शंख, घण्टा और झाँझ के साथ नक्कारा का प्रयोग भी किया जाता है। परन्तु मन्दिरों में नक्कारा की भूमिका ताल वाद्य के रूप में नहीं, बल्कि प्रातःकाल मन्दिर के कपाट दर्शनार्थ खुलने की अथवा सांध्य आरती आदि की सूचना भक्तों अथवा दर्शनार्थियों को देने के रूप में होती रही है। अधिकांश मन्दिरों में यह परम्परा आज भी कायम है। मन्दिरों के अलावा नक्कारे का प्रयोग प्रचीनकाल में युद्धभूमि में भी किया जाता था| परन्तु यहाँ भी नक्कारा तालवाद्य नहीं, बल्कि सैनिकों के उत्साहवर्धन के लिए प्रयोग किया जाने वाला वाद्य ही था। ताल वाद्य के रूप में नक्कारा अथवा नगाड़ा लोक संगीत और लोक नाट्य का अभिन्न अंग रहा है। हिमांचल प्रदेश से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक के विस्तृत क्षेत्र के लोक संगीत में इस ताल वाद्य का प्रयोग किया जाता रहा है। अब हम प्रस्तुत कर रहे है, स्वतंत्र नक्कारा वादन। वादक है, राजस्थान के चर्चित लोक कलाकार नाथूलाल सोलंकी। यह प्रस्तुति आठ मात्रा के कहरवा ताल में की गई है।



स्वतंत्र नक्कारा वादन : आठ मात्रा कहरवा ताल : वादक – नाथूलाल सोलंकी





मुबारक बेगम 
कव्वाली गायक शंकर और शम्भू 
पौराणिक काल में दो भिन्न ध्वनियों वाले अवनद्ध वाद्य का उल्लेख मिलता है, जिसे ‘सम्बल’ नाम से जाना जाता था। वर्तमान नक्कारा अथवा नगाड़ा इसी वाद्य का विकसित रूप है। यह धातु अथवा लकड़ी के दो खोखले अर्द्धगोलाकार आकृति पर चर्म मढ़ कर बनाया जाता है। नक्कारा के बड़े हिस्से अर्थात बाएँ हिस्से का व्यास 75 से लेकर 120 सेंटीमीटर तक होता है। यह निचले स्वरों की उत्पत्ति करता है। वादन के दौरान वादक प्रायः पानी से भीगे कपड़े इसके सतह पर फेरते रहते हैं। इस क्रिया से इसकी ध्वनि ऊँची नहीं होती और इसकी गूँज बनी रहती है। नक्कारा के दाएँ हिस्से को ‘झील’ या ‘डुग्गी’ कहा जाता है। इसका व्यास 25 से लेकर 40 सेंटीमीटर तक होता है। इसका स्वर काफी ऊँचा होता है। वादक प्रायः इस हिस्से पर मढ़े चमड़े को आग से सेंक कर बजाते हैं। इससे टंकार उत्पन्न होता है। यह वाद्य लकड़ी के दो चोब के प्रहार से बजाया जाता है। जब कुशल वादक नक्कारा वादन करते हैं तो बिना माइक्रोफोन के इसकी आवाज़ दूर-दूर तक पहुँचती है। लोकगीतों के साथ तालवाद्य के रूप में आमतौर पर ढोलक और नक्कारा का प्रयोग होता रहा है। शहनाई या सुन्दरी वाद्य के साथ नक्कारा की संगति बेहद कर्णप्रिय होती है। अठारहवीं शताब्दी से हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अत्यन्त लोकप्रिय लोकनाट्य शैली ‘नौटंकी’ का तो यह अनिवार्य संगति वाद्य होता है। लोकनाट्य शैली नौटंकी को विभिन्न क्षेत्रों में सांगीत, स्वांग, रहस, भगत आदि नामों से भी पुकारा जाता है। नौटंकी संगीत प्रधान नाट्य शैली है जिसका कथानक पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा लोकगाथाओं पर आधारित होता है। अधिकतर संवाद गेय और छन्दबद्ध होते हैं। नौटंकी के छन्द दोहा, चौबोला, दौड़, बहरेतबील, लावनी आदि के रूप में होते हैं। नौटंकी का ढाँचा पूरी तरह छन्दबद्ध होता है और इसके कलाकार काफी ऊँचे स्वर में गायन करते हैं, इसीलिए ऊँचे स्वर वाला नक्कारा ही इन छन्दों के लिए अनुकूल संगति वाद्य है। आइए अब हम आपको प्रसिद्ध नौटंकी ‘लैला मजनूँ’ के कुछ छंदों का रसास्वादन कराते है। इन अंशों में नक्कारे की आकर्षक संगति की गई है। इन प्रसंगों को हमने 1966 की फिल्म ‘तीसरी कसम’ से लिया है। चर्चित गीतकार शैलेन्द्र की यह महत्वाकांक्षी फिल्म थी जिसमें संगीतकार शंकर जयकिशन ने लोकगीतों की मौलिकता को बरक़रार रखा। इसी फिल्म के एक प्रसंग में ग्रामीण मंच पर नौटंकी ‘लैला मजनूँ’ का मंचन हो रहा है। अभिनेत्री वहीदा रहमान नौटंकी की नायिका हैं। नौटंकी के दोहा, चौबोला, दौड़ और बहरेतबील छंदों के उदाहरण इस अंश में उपस्थित है। अपने समय के चर्चित कव्वाली गायक शंकर व शम्भू तथा पार्श्वगायिका मुबारक बेगम ने इन अंशों में अपने स्वर दिये हैं। नौटंकी लोकनाट्य में नक्कारा एक संगति वाद्य के रूप में कितना महत्त्वपूर्ण है, इसका स्पष्ट अनुभव आपको यह संगीत अंश सुन कर सहज ही होगा। आप इन छंदों का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



नक्कारा संगति: नौटंकी – लैला मजनूँ : फिल्म – तीसरी कसम : स्वर – शंकर, शम्भू और मुबारक बेगम : संगीत – शंकर जयकिशन






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 166वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक कम प्रचलित वाद्य पर राग रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत रचना के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 168वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 164वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको परदे वाले अप्रचलित गज-तंत्र वाद्य मयूर वीणा के वादन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। इस जाति के वाद्य- इसराज, दिलरुबा, तार शहनाई, ताऊस और मयूर वीणा की बनावट और इनके स्वर निकास में काफी समानता होती है। पहले प्रश्न के रूप में हमने वाद्ययंत्र का नाम पूछा था, जिसका सही उत्तर है- मयूर वीणा। परन्तु जिन प्रतिभागियों ने इसके समान वाद्यों का उल्लेख किया है, उनके उत्तर को भी हमने सही माना है। पहेली के दूसरे दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी (इसराज), हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी (तार शहनाई/दिलरुबा) तथा हमारी एक नई संगीतसाधिका पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने (दिलरुबा) दिया है। चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह ने और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने केवल दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के आज के अंक में हमने एक लुप्तप्राय अवनद्ध वाद्य नक्कारा अथवा नगाड़ा के बारे में चर्चा की। अगले अंक में हम एक अप्रचलित तंत्रवाद्य पर चर्चा करेंगे। इस प्राचीन किन्तु कम प्रचलित वाद्य की बनावट, इसके गुण और इसकी वादन शैली हमारी चर्चा के केन्द्र में होगा। आप भी अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

कभी आपने सुना है फ़िल्म 'संगम' के इस कमचर्चित गीत को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 28
 

आई लव यू...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 28-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'संगम' के एक कमचर्चित गीत के बारे में ... 

 'संगम', 1964 की राज कपूर की महत्वाकांक्षी फ़िल्म। बेहद कामयाब। यह राज कपूर की पहली रंगीन फ़िल्म भी थी। फ़िल्म की कामयाबी में इसके गीत-संगीत का महत्वपूर्ण योगदान था। फ़िल्म के सात गीत थे - "बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं", "ओ महबूबा, तेरे दिल के पास", "दोस्त दोस्त न रहा", "हर दिल जो प्यार करेगा", "ओ मेरे सनम", "मैं का करूँ राम मुझे बुढ्ढा मिल गया", "यह मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर" - एक से बढ़ कर एक, सुपर-डुपर हिट, यह बताना मुश्किल कि कौन सा गीत किससे उपर है लोकप्रियता में। लेकिन बहुत कम लोगों को यह पता है कि इन सात गीतों के अलावा भी एक और गीत इस फ़िल्म में मौजूद है, जिसे पार्श्व-संगीत के रूप में फ़िल्म में प्रयोग किया गया है। विविअन लोबो की आवाज़ में यह गीत है "आइ लव यू"। यह गीत 'संगम' के मूल 'Long Play' और '78 RPM' पर उपलब्ध है। यह गीत अपने आप में अनूठा है, कारण, इस गीत का स्वरूप किसी आम हिन्दी फ़िल्मी गीत जैसा नहीं है; बल्कि एक ही बात और एक ही पंक्ति को कई विदेशी भाषाओं में दोहराया गया है। ऐसी कौन सी सिचुएशन थी 'संगम' में कि राज कपूर को इस तरह के एक गीत की ज़रूरत महसूस हुई? दरसल 'संगम' में एक सिचुएशन था कि जब राज कपूर और वैजयन्तीमाला अपने हनीमून के लिए यूरोप के टूर पर जाते हैं, वहाँ अलग अलग देशों की सैर कर रहे होते हैं, और क्योंकि यह हनीमून ट्रिप है, तो प्यार तो है ही। तो यूरोप में फ़िल्माये जाने वाले इन दृश्यों के लिए एक पार्श्व-संगीत की आवश्यकता थी।

पर राज कपूर हमेशा एक क़दम आगे रहते थे। उन्होंने यह सोचा कि पार्श्व-संगीत के स्थान पर क्यों न एक पार्श्व-गीत रखा जाये, जो बिल्कुल इस सिचुएशन को मैच करता हो! उन्होंने अपने दिल की यह बात शंकर- जयकिशन को बतायी। साथ ही कुछ सुझाव भी रख दिये। राज कपूर नहीं चाहते थे कि यह किसी आम गीत के स्वरूप में बने और न ही इसके गायक कलाकार लता, मुकेश या रफ़ी हों। शंकर और जयकिशन सोच में पड़ गये कि क्या किया जाये! उन दिनों जयकिशन चर्चगेट स्टेशन के पास गेलॉर्ड होटल के बोम्बिलि रेस्तोराँ में रोज़ाना शाम को जाया करते थे। उनकी मित्र-मंडली वहाँ जमा होती और चाय-कॉफ़ी की टेबल पर गीत-संगीत की चर्चा भी होती। शम्मी कपूर उनमें से एक होते थे। उसी रेस्तोराँ में जो गायक-वृन्द ग्राहकों के मनोरंजन के लिए गाया करते थे, उनमें गोवा के कुछ गायक भी थे। उन्हीं में से एक थे विविअन लोबो। ऐसे ही किसी एक दिन जब जयकिशन 'संगम' के इस गीत के बारे में सोच रहे थे, विविअन लोबो वहाँ कोई गीत सुना रहे थे। जयकिशन को एक दम से ख़याल आया कि क्यों न लोबो से इस पार्श्व गीत को गवाया जाये! लोबो की आवाज़ में एक विदेशी रंग था, जो इस गीत के लिए बिल्कुल सटीक था। बस फिर क्या था, विविअन लोबो की आवाज़ इस गीत के लिए चुन ली गई। विविअन लोबो की आवाज़ में यह एकमात्र हिन्दी फ़िल्मी गीत है। इसके बाद उनकी आवाज़ किसी भी फ़िल्मी गीत में सुनाई नहीं दी। पर कहा जाता है कि उन्होंने कोंकणी गायिका लोरना के साथ कुछ कोंकणी गीत रेकॉर्ड किये हैं।

अब अगला सवाल यह था कि गीत के बोल क्या होंगे! पार्श्व में बजने वाले 3 मिनट के सीक्वेन्स के लिए एक ऐसे गीत की आवश्यकता थी जिसमें कम से कम बोल हों पर संदेश ऐसा हो कि जो सिचुएशन को न्याय दिला सके। तब राज कपूर ने यह सुझाव दिया कि हनीमून के दृश्य के लिए सबसे सटीक और सबसे छोटा मुखड़ा है "आइ लव यू"। तो क्यों न अलग अलग यूरोपियन भाषाओं में इसी पंक्ति का दोहराव करके 3 मिनट के इस दृश्य को पूरा कर दिया जाये! सभी को यह सुझाव ठीक लगा, और पूरी टीम जुट गई "आइ लव यू" के विभिन्न भाषाओं के संस्करण ढूंढने में। अंग्रेज़ी के अलावा जर्मन ("ich liebe dich"), फ़्रेन्च ("j’ vous t’aime") और रूसी ("ya lyublyu vas"/ "Я люблю вас") भाषाओं का प्रयोग इस गीत में हुआ है, और साथ ही "इश्क़ है इश्क़" को भी शामिल किया गया है। इस तरह से गीत का मुखड़ा कुछ इस तरह का बना:

वैयनतीमाला के साथ राज कपूर और शंकर जयकिशन
ich liebe dich, 
I love you.
j’ vous t’aime,
I love you.
ya lyublyu vas (Я люблю вас),
I love you.
ishq hai ishq,
I love you.

यह मुखड़ा बनने के बाद इसका एक अन्तरा भी बना। 

come shake my hand
and love each other
let’s bring happiness
in this world together
this is the only truth
remember my brother
this is the only truth
remember my brother

गीत के संगीतकार के रूप में शंकर जयकिशन का नाम दिया गया है। संगीत संयोजन को सुन कर इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह शंकर जयकिशन का ही कम्पोज़िशन है। पर इसके गीतकार के लिए किसे क्रेडिट मिलना चाहिये? शैलेन्द्र? हसरत? राज कपूर? शंकर-जयकिशन? या फिर विविअन लोबो? जी हाँ, कुछ लोगों का कहना है कि इस गीत को दरसल विविअन लोबो ने ही लिखा था, पर इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। और ना ही विविअन लोबो के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध है। कुछ लोगों का कहना है कि शंकर जयकिशन के ऑरकेस्ट्रा में वायलिन और बास प्लेअर के लिए एक नाम V.V.N. Lobo का आता रहा है, शायद ये वही हो! यह अफ़सोस की ही बात है कि विविअन लोबो 'संगम' जैसी सफल और यादगार फ़िल्म के संगीत से जुड़े होने के बावजूद गुमनामी के अन्धेरे में ही रह गये। आज अगर वो जीवित हैं, तो कहाँ रहते होंगे? शायद गोवा में? या फिर क्या पता मुंबई में ही। अपने इस एक गीत से यह गायक ख़ुद गुमनामी में रह कर पूरी दुनिया को प्यार करना सिखा गया।

'संगम' के अन्य लोकप्रिय गीतों की तरह यह गीत लोकप्रिय तो नहीं हुआ, क्योंकि रेडियो पर इसे बजता हुआ कभी सुनाई नहीं दिया। पर राज कपूर सालों बाद भी इस गीत के असर से बाहर नहीं निकल सके। इस गीत के बनने के ठीक 20 साल बाद, जब उन्होंने फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली' की योजना बनाई, तो उन्होंने इस फ़िल्म के संगीतकार रवीन्द्र जैन को कुछ-कुछ ऐसी ही धुन पर एक गीत कम्पोज़ करने का अनुरोध किया। उनके इस अनुरोध को सर-माथे रख रवीन्द्र जैन बना लाये "सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन"। इन दोनों गीतों को ध्यान से सुनने पर दोनों की धुनों में समानता साफ़ सुनाई पड़ती है। बस इतनी सी है फ़िल्म 'संगम' के इस अनूठे अनसुने गीत की दास्तान!

फिल्म संगम : 'आई लव यू...' : विवियन लोवो : संगीत - शंकर जयकिशन 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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