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Saturday, November 12, 2016

"या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो"


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 18
 
सोनू निगम



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक सोनू निगम पर।  
  

सोनू निगम का जन्म फ़रिदाबाद में हुआ था, परवरिश उनकी दिल्ली में, और बाद में मुम्बई में हुई। पिता
माता-पिता के साथ बालक सोनू एक शादी के शो में गाते हुए
अगम कुमार निगम और माँ शोभा निगम भी गायक थे पर फ़िल्म जगत में दाखिल नहीं हो सके, और दोनों की गायिकी स्टेज शोज़, शादी और जागरण तक ही सीमित रह गई। सोनू के पिता अगम जी शुरु शुरु में मुंबई फ़िल्मी पार्श्वगायक बनने आए ज़रूर थे, जेब में पैसे नहीं, रेल्वे प्लैटफ़ॉर्म पर सोया किए। अगम कुमार निगम गायक बनने के लिए वो सब नहीं कर सके जो सोनू ने किया। लोगों के पीछे भागना, स्टुडियो के बाहर घंटों इन्तज़ार करना, चपरासी तक के पाँव छूना और ऐसे लोगों के पाँव पकड़ना जो उन जगहों पर विराजमान थे जहाँ होने की उनकी काबलियत ही नहीं थी, ये सब ना कर पाने की वजह से अगम कुमार निगम को किसी ने नहीं पूछा, और हार मान कर वो दिल्ली वापस चले गए और स्टेज शोज़, जागरण और शादी-व्याह में गाने लगे। इसी दौरान स्टेज शोज़ करते हुए गायिका शोभा से उनकी जान-पहचान बढ़ी, दोनों में प्यार हो गया और घर से भाग कर दोनों ने शादी कर ली। जल्दी ही सोनू का जन्म हुआ; और चार वर्ष की आयु से सोनू भी अपने माता-पिता के साथ शोज़ में गाने लगे। 7 से 10 वर्ष की उम्र में सोनू ने कुछ फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार अभिनय किया जैसे कि ’प्यारा दुश्मन’, ’उस्तादी उस्ताद से’, ’हमसे है ज़माना, ’तक़दीर’ और ’बेताब’। सोनू एक होनहार बच्चा था, अपनी कक्षा में वो अव्वल आता था। कक्षा दसवीं तक अव्वल आने के बाद उनके मन में एक वैज्ञानिक बनने की चाह जागृत हुई। लेकिन होनी को कुछ और मंज़ूर थी। 15 वर्ष की आयु में सोनू की आवाज़ खुल गई और उनकी गाती हुई आवाज़ बेहद सुन्दर सुनाई देने लगी, बिलकुल एक फ़िल्मी गायक जैसी।


जब सोनू 15 वर्ष के थे, तब माता, पिता और उनके द्वारा प्रस्तुत शो के लिए कुल 50 रुपये मिला करते थे।
धीरे धीरे राशि बढ़ी और 175 रुपये तक पहुँची। सोनू मुंबई जाकर संघर्ष करने के लिए पैसे बचाने लगे। उनकी दृष्टि लक्ष्य पर थी। बारहवीं उत्तीर्ण करते ही सोनू ने पढ़ाई से किनारा कर लिया और अपने पिता के साथ 18 वर्ष की आयु में 1991 में मायानगरी मुंबई चले आए। सोनू ने संगीत ऑडियो कैसेट्स सुन सुन कर ही सीखा था, पर मुंबई में लोग उनकी तालीम के बारे में सवाल ना खड़ा कर सके, सिर्फ़ इस वजह से उन्होंने दिल्ली में रहते चार महीनों का एक कोर्स किया जिसमें राग और ताल की प्राथमिक शिक्षा उन्हें मिली। पिता अगम कुमार निगम को फ़िल्म-इंडस्ट्री का सबकुछ पता था, इसलिए उनकी दूर-दृष्टि से उन्होंने अपने बेटे की हर क़दम पर मदद की, उन्हें गाइड किया। पिता ने उन्हें चेतावनी दी कि चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे कितने भी पैसे मिले, पार्श्वगायक बनने से पहले मुंबई में कभी स्टेज शोज़ या शादी में नहीं गाना। अगम जी को पता था कि अगर एक बार सोनू शोज़ करते हुए पैसे कमाने लग गया तो पार्श्वगायक बनने का जुनूं ख़त्म हो जाएगा और वो भी उन जैसा नाकामयाब गायक बन कर रह जाएगा। मुम्बई में पिता-पुत्र शुरु-शुरु में उनके किसी रिश्तेदार के घर पर ठहरे हुए थे। बाद में उन्होंने दिल्ली का अपना मकान बेच दिया और मुंबई के अन्धेरी में एक कमरे का एक फ़्लैट ख़रीद कर मुंबई शिफ़्ट हो गए। माँ अभी भी दिल्ली में ही थीं क्योंकि उनके शोज़ वहाँ हुआ करते थे। पिता-पुत्र अन्धेरी के एक कमरे वाले फ़्लैट में रहने लगे। सोनू ही खाना पकाते, झाडू लगाते, कपड़े धोते, बरतन माँजते, घर की तमाम साफ़-सफ़ाई करते। आलम यह था कि वहाँ आस-पड़ोस के कुछ लोग उन्हें घर का नौकर समझ बैठे थे!

सोनू के पिता ने उन्हें यह सीख दी थी कि या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो। यह सीख सोनू ने सदा याद रखी। अन्धेरी के फ़्लैट में उनका कोई टेलीफ़ोन नहीं था, उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन नहीं आया था, इसलिए सोनू को PCO जाकर सारे म्युज़िक कंपनियों और संगीतकारों को फ़ोन लगा कर उनसे समय माँगना पड़ता था। कई बार दूसरी तरफ़ से बिना कोई जवाब दिए ही फ़ोन काट दिया जाता, कभी कोई ग़लत तरीक़े से जवाब दे देता। पर सोनू ने हिम्मत
नहीं हारी। इन सब बातों को नज़रन्दाज़ करते हुए अपनी नज़र को सिर्फ़ अपनी मंज़िल की तरफ़ रखा, बाक़ी सब भूल गए। संघर्षरत सोनू सुबह से ही संगीतकारों के दफ़्तरों में जाकर बैठ जाते थे, कि आप आओ और मुझे सुनो। सात-आठ घंटे बिना खाये पीये रेकॉर्डिंग् स्टुडिओज़ के बाहर बैठे रहते इस उम्मीद से कि शायद आज मुझे कोई सुन ले। थकने का सवाल ही नहीं था। और अगर जुनून सवार है सर पे कुछ बनने की तो थकावट तो आती ही नहीं। इन्डस्ट्री में सोनू का कोई Godfather नहीं था, उन्हें ख़ुद अपना रास्ता बनाना था, तमाम चुनौतियों का ख़ुद ही मुक़ाबला करना था। सोनू ने एक इन्टरव्यू में यह बताया कि ट्रेन से उतर कर पिता के साथ वो सीधे बान्द्रा के उसी कॉकरोच वाले मानसरोवर होटल में ठहरने के लिए गए जहाँ धर्मेन्द्र ठहरे थे जब वो पहली बार मुंबई आए थे। धर्मेन्द्र की तरह उनकी क़िस्मत का सितारा भी चमका दे यह होटल, क्या पता! पिता-पुत्र ने होटल के कमरे में सामान रखा और सीधे सचिन पिलगाँवकर के पास चल दिए। सचिन ने सोनू को दिल्ले के एक प्रतियोगिता में सुन सुन रखा था और सोनू के पिता को उस समय यह कहा भी था कि जब ये बड़ा हो जाए तो उनके पास ले आएँ। सचिन पिता-पुत्र से बहुत अच्छी तरह से मिले। फिर वो गए अनु मलिक के पास जिन्होंने सोनू को दिल्ली के ही एक अन्य प्रतियोगिता में सुना था। जब सोनू ने उन्हें याद दिलाया कि वो वही लड़का है जिसनी टूटीघुई टाँग के साथ गाना गाया था, तब अनु मलिक को याद आ गया। हालाँकि अनु मलिक के पास सोनू के लिए कोई काम नहीं था उस समय, पर वो अच्छी तरह से मिले।

सचिन और अनु मलिक के बाद सोनू और अगम साहब पहुँचे उषा खन्ना के पास। उन्हें ख़बर थी कि उषा जी
नए कलाकारों को ब्रेक देती हैं। सात घंटे इन्तज़ार करने के बाद सोनू को उषा खन्ना के दर्शन हुए और अपना गीत सुनाने का मौक़ा भी मिल गया। उषा खन्ना को सोनू की आवाज़ बहुत अच्छी लगी और जल्दी ही उनके संगीत में सोनू से उनका पहला गाना गवाया। लेकिन यह गीत सोनू के करीअर में कोई कमाल नहीं दिखा
सका। पिता-पुत्र पूरे मुंबई शहर में बसों में और बाद में एक टू-व्हीलर पर घूमा करते काम की तलाश में। उसके बाद 1992 में सोनू को एक डमी गीत गाने का मौका मिला जो एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम् द्वारा गाया जाने वाला था। शूटिंग् डमी वर्ज़न से हुई और इस तरह से फ़िल्म के सेट पर गाना बार बार बजने की वजह से गुल्शन कुमार के दिल-ओ-दिमाग़ पर सोनू की आवाज़ रच बस गई। गुल्शन कुमार को संगीत की समझ थी, हीरा परखना जानते थे, और उन्होंने सोनू को बुलवा भेजा। सोनू को देख कर गुल्शन कुमार बोले, "ओय, कोहली तो कह रहा था कि आप छोटे हो, लेकिन आप तो बहुत छोटे हो!" लेकिन गुलशन कुमार ने सोनू वाला डमी वर्ज़न को ही अप्रूव कर दिया और "ओ आसमाँ वाले" गीत सोनू का पहला ब्रेक सिद्ध हुआ। गुल्शन कुमार ने सोनू से यह वादा लिया कि चाहे वो बाहर कितने भी मूल गीत गाए, लेकिन कवर वर्ज़न सिर्फ़ उन्हीं के लिए गाए। टी-सीरीज़ की कुछ फ़िल्मों में गाने बावजूद सोनू को किसी महत्वपूर्ण फ़िल्म में गाने का मौक़ा नहीं मिला। उस समय कुमार सानू, उदित नारायण और अभिजीत शीर्ष पर चल रहे थे। सोनू ने इसी दौरान टेलीविज़न पर ’अन्ताक्षरी’ में हिस्सा लिया और फिर ’सा रे गा मा’ को होस्ट कर ख़ूब लोकप्रियता हासिल की और घर-घर वो पहचाने जाने लगे। और फिर 1997 में उन्होंने गाया वह गीत जिसके बाद फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। "संदेसे आते हैं, हमें तड़पाते हैं" गीत ने उन्हें बतौर पार्श्वगायक फ़िल्म जगत में स्थापित कर दिया। सोनू के माता-पिता ने अपने बेटे का साथ देते हुए अपने बेटे के ज़रिए वह मुकाम हासिल किया जो मुकाम वो दोनों हासिल न कर सके। माँ-बाप के लिए इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात भला और क्या हो सकती है!  ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से हम सोनू निगम को ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं, साथ ही सलाम करते हैं उनके माता-पिता शोभा निगम और अगम कुमार निगम को। 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Saturday, June 11, 2016

’बेबी डॉल’ की गायिका कनिका कपूर के संघर्ष की मार्मिक दास्तान


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 13
 
कनिका कपूर 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है इस ज़माने की जानी-मानी गायिका कनिका कपूर पर।


"बेबी डॉल मैं सोने दी" गाने वाली गायिका कनिका कपूर की रातों रात कामयाबी को देख कर आप यह ना समझ बैठें कि उन्हें इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिए किसी भी तरह का संघर्ष नहीं करना पड़ा। आज कनिका कपूर की कहानी ख़ुद उन्हीं की ज़ुबानी।

"मेरा जन्म लखनऊ के एक खाते-पीते अच्छे खत्री परिवार में हुआ। छह साल की उम्र से शास्त्रीय संगीत सीखती हुई बड़ी हुई हूँ। 11 साल की उम्र में मैं आकाशवाणी पर शुद्ध शास्त्रीय संगीत गाया करती थी। 12 साल की उम्र में मैं भजन-सम्राट अनूप जलोटा जी के साथ शोज़ करने लगी। वो मेरे पिता के दोस्त हैं और मेरे लिए पिता समान हैं। लखनऊ के हमारे घर के गराज को मैंने अपने स्टुडिओ में तब्दिल कर दिया था जहाँ मैं गाती और रेकॉर्ड करती थी। 17 साल की उम्र में मैं मुंबई गई संगीतकार ललित सेन के साथ एक ऐल्बम करने और अपने आप को एक गायिका के रूप में स्थापित करने। मैंने संगीत में स्नातकोत्तर (Masters) किया है, जिस वजह से मैं शास्त्रीय संगीत सिखा-पढ़ा सकती हूँ। शादी करने का कोई विचार उस समय मेरे मन में नहीं था। पर मुझे राज नाम के एक पंजाबी युवक से प्यार हो गया और हमने शादी कर ली। मेरी माँ उस शादी से ख़ुश थी सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राज पढ़ा-लिखा और अमीर परिवार से था, बल्कि इसलिए भी कि मेरा अब मुंबई फ़िल्म जगत से नाता टूट जाएगा। इस तरह से मैं एक गृहणी बन गई, राज से शादी कर लंदन जा कर बस गई। मात्र 18 साल की उम्र में मैं पापड-अचार डालने वाली बहू बन गई, फिर एक एक कर तीन बच्चों की माँ भी बनी। संगीत जैसे कहीं पीछे छूट गया। पर मैं अपने परिवार और घर-संसार को लेकर बहुत ख़ुश थी। राज ने मुझे दुनिया भर की सैर कराई।

पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। राज मुझे धोखा देने लगा। एक अन्य शादीशुदा लड़की से उसका संबंध हुआ। हम दोनों में मनमुटाव और झगड़े शुरू हो गए। मुझे मेरा घर संसार उजड़ता हुआ साफ़ दिखाई दे रहा था। हमारी शादी की दसवीं सालगिरह पर मैंने उससे एक उपहार माँगा। मैंने कहा कि मुझे कोई ज़ेवर-गहने नहीं चाहिए, मुझे अपनी आवाज़ में एक ऐल्बम रेकॉर्ड करवाना है, यह मेरा एक सपना है। वो मान गया और हमने एक प्रोड्युसर की तलाश करनी शुरू कर दी। हमारी मुलाक़ात हुई बलजीत सिंह पदम उर्फ़ Dr. Zeus से जो 5000 पाउण्ड प्रति गीत के दर से आठ गीतों का ऐल्बम बनाने के लिए मान गया। राज ने उसे पैसा दे दिया और मैं बिर्मिंघम में हफ़्ते में एक दिन गाना रेकॉर्ड करने के उद्येश्य से जाने लगी। एक साल बीत गया पर अब तक कोई भी गाना वो लोग नहीं बना सके। इधर मेरा वैवाहिक जीवन बद से बदतर होता चला गया। दो तीन महीने मैं स्टुडिओ भी नहीं गई। फिर एक दिन मेरे एक दोस्त ने मेरा परिचय "जुगनी" नामक गीत से करवाया जो पाक़िस्तानी गायक आरिफ़ लोहर का गाया हुआ गाना था। हमने Dr. Zeus के ज़रिए इस गीत का एक सस्ता रीमिक्स बना कर इन्टरनेट पर फ़्री डाउनलोड के लिए डाल दिया। यह जनवरी 2012 की बात थी। विडिओ बेहद सफल रहा और इसे तीस लाख हिट्स मिले। जुलाई 2012 को मैं और राज अलग हो गए, और अक्टुबर में मुझे ’ब्रिटिश एशिअन अवार्ड’ मिला "जुगनी" के लिए। 

जैसे ही Dr. Zeus को पता चला कि मेरा पति अब मेरे साथ नहीं है, उसने हमारे पूरे 40,000 पाउण्ड (जो हमने उसे दिए थे ऐल्बम बनाने के लिए) खा गया और दोष डाल दिया अपने मैनेजर विवेक नायर पर कि वो पैसे लेकर भाग गया है। ऐल्बम का सपना सपना ही बन कर रह गया। इधर समाज में लोग मेरे बारे में गंदी-गंदी बातें करने लगे। मैं अपनी नज़रों में ही जैसे गिर चुकी थी और आत्महत्या का ख़याल आने लगा था। आस पड़ोस से लोगों ने मेरे बारे में अफ़वाहें उड़ानी शुरू कर दी कि मैंने अपने पति को छोड़ कर किसी और के साथ संबंध बना लिया, मैं वेश्या बन गई हूँ, वगेरह वगेरह। ये सब झूठ था। लोगों ने मेरे साथ बात करना बन्द कर दिया और मुझे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। इन सब हालातों ने मुझे आज एक मज़बूती प्रदान की है, इसमें कोई शक़ नहीं। ये सब कुछ होने के बाद 2013 के शुरु में मुझे मनमीत (मीत ब्रदर्स अनजान), जो मेरा राखी भाई है और जिसे मैं लखनऊ के छुटपन से जानती हूँ, का फ़ोन आया कि एकता कपूर ने मेरी आवाज़ "जुगनी" में सुनी है, उन्हें पसन्द आया है, और वो मुझे "बेबी डॉल" के एक ट्रायल के लिए मिलना चाहती हैं। और फ़ाइनली इस "बेबी डॉल" को गाकर मुझे मिला फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड। वही औरतें जो मुझे कॉल-गर्ल बुलाती थी पीछे से, अब मेरे साथ सेल्फ़ी खींचवा कर फ़ेसबूक में पोस्ट करती हैं। अब मैं ख़ुश हूँ, मेरी माँ मेरे साथ अब लंदन में रहती हैं, और हम दोनों मिल कर मेरे तीन बच्चों की परवरिश कर रहे हैं।" 


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Saturday, May 14, 2016

"भूखा मरना है तो मुंबई में जाकर मरूँ..." - नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 12
 
नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी 

"भूखा मरना है तो मुंबई में जाकर मरूँ..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है जाने माने अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी पर।


  
फ़िल्म इंडस्ट्री के इस युग में बहुत से अभिनेता स्टार कलाकारों की संताने हैं जिन्हें फ़िल्मों में आने के लिए कोई ख़ास संघर्ष नहीं करना पड़ा। लेकिन कुछ ऐसे सशक्त अभिनेता भी हुए हैं जिन्हें यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। ऐसे अभिनेताओं को दीर्घ संघर्ष करना पड़ा और अपना रास्ता ख़ुद बनाते हुए सफलता के क़दम चूमे। ऐसे कलाकारों में एक नाम है नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी का जिनकी कहानी को पढ़ कर इस भ्रम को हमेशा हमेशा के लिए तोड़ा जा सकता है कि केवल भाग्यशाली लोगों को ही सफलता मिलती है। उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले में जन्मे नवाज़ुद्दीन का ज़मीनदार परिवार नंबरदारों का परिवार था। आठ भाई बहनों में सबसे बड़े थे नवाज़ुद्दीन। रसायन शास्त्र में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद बड़ोदा में केमिस्ट की नौकरी में लग गए। कुछ समय बाद बेहतर नौकरी की तलाश में वो दिल्ली चले गए। दिल्ली में एक बार उन्होंने एक नाटक क्या देख लिया कि उनके अन्दर अभिनय की तीव्र इच्छा जागृत हुई। तीव्रता इतनी थी कि उन्होंने National School of Drama (NSD) में दाख़िला लेने की ठान ली। उसमें भर्ती की शर्तों में एक शर्त थी कम से कम दस नाटकों में अभिनय का अनुभव। इसके चलते नवाज़ुद्दीन अपने कुछ दोस्तों के साथ उतर गए नाटकों के संसार में। हो गए भर्ती NSD में। अपनी पढ़ाई चलाने के लिए उन्होंने वाचमैन की नौकरी कर ली। NSD से पास करने के बाद उनके पास कोई नौकरी नहीं थी। उन्हें लगा कि भूखा मरना है तो मुंबई में जाकर मरूँ। वो मुंबई चले तो गए पर रहने के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी। NSD के अपने एक सीनियर से अनुरोध किया कि क्या वो उनके साथ रह सकते हैं? अनुमति मिली इस शर्त पर कि उन्हें खाना बनाना पड़ेगा। केमिस्ट और वाचमैन के बाद अब बारी थी बावर्ची बनने की। 

'बजरंगी भाईजान’ फ़िल्म का दृश्य
खाना बनाने के साथ-साथ नवाज़ुद्दीन टीवी सीरियल्स में रोल मिलने की कोशिशें करने लगे। पर उस समय सास-बहू

वाले सीरिअल्स का ज़माना था; गोरे, चिकने और "जिम-फ़िट" शरीर वाले लड़कों को ही मौके मिलते थे। उनके अभिनय की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया, उनके चेहरे और रंग-रूप को देख कर दरवाज़े से ही उन्हें विदा कर दिया जाता। उनका मज़ाक उड़ाया जाता। किसी ने यह कहा कि वो एक कृषक जैसे दिखते हैं, इसलिए वापस लौट कर खेती-बारी सम्भाले। नवाज़ुद्दीन को कि इस तरह की जातिवाद (racism) हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री की जड़ों तक फैल चुकी है जिसका कोई इलाज नहीं। और वो यह भी समझ गए कि नायक बनना उनके लिए संभव नहीं, इसलिए वो चरित्र अभिनेता बनने की तरफ़ ध्यान देने लगे। उनकी सूरत और रंग-रूप के हिसाब से उन्हें फ़िल्म ’शूल’ में वेटर का रोल मिला, ’सरफ़रोश’ में 61 सेकण्ड का एक गुंडे का रोल, ’मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.’ में पाकिटमार और ’दि बाइपास’ में एक डाकू का रोल मिला। ये सभी रोल मिनटों की नहीं, सेकण्ड्स की थी। इन फ़िल्मों के बाद उन्हें काम मिलना बन्द हो गया। अगले पाँच साल तक उनके पास एक भी काम नहीं था। फिर 2004 में एक फ़िल्म आई ’ब्लैक फ़्राइडे’ जिसमें भी उनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया। ’सरफ़रोश’ के बाद पूरे बारह साल तक निरन्तर मेहनत और कोशिशें करने के बाद साल 2010 में उन्हें मिला ’पीपली लाइव’ जिसने उन्हें दिलाई अपार लोकप्रियता। अगर 2004 में वो हार कर फ़िल्म जगत को छोड़ देते तो यह दिन उन्हें कभी देखने को नहीं मिलता। उनका जस्बा, उनकी शख़्सियत, अपने आप पर भरोसा, ये सब उन्हें खींच ले गई उनकी मंज़िल की तरफ़। एक व्यर्थ केमिस्ट से लेकर राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त करने की नवाज़ुद्दीन की कहानी किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं। नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का सलाम!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Saturday, March 12, 2016

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 10: दुर्गा खोटे


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 10
 
दुर्गा खोटे 




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है भारतीय सिनेमा में महिलाओं की मार्ग निर्माता व सशक्त अभिनेत्री दुर्गा खोटे पर।

  

भारतीय सिनेमा में महिलाओं में अग्रदूत, अभिनेत्री दुर्गा खोटे, जो मराठी और हिन्दी फ़िल्मों में जानदार अभिनय के लिए प्रसिद्ध रहीं, 22 सितंबर 1991 को 86 वर्ष की आयु में इस दुनिया से चल बसी थीं। 50 वर्षों से भी अधिक समय तक का उनका शानदार फ़िल्मी सफ़र रहा जिसमें थिएटर के साथ-साथ लगभग 200 फ़िल्मों में अभिनय किया। उनका जीवन बहुतों के लिए प्रेरणा-स्रोत बना, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उन्होंने सिनेमा में महिलाओं का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने अपने जीवन को दृढ़ता से आगे बढ़ाया, अपने उसूलों पर चल कर, समाज की परवाह किए बग़ैर। 14 जनवरी 1905 को मुंबई के एक महाराष्ट्रीय परिवार में जन्मी दुर्गा खोटे की शिक्षा-दीक्षा कैथेड्रल हाइ स्कूल और सेन्ट ज़ेवियस कॉलेज में हुई जहाँ से उन्होंने बी.ए. में स्नातक की। अच्छे खाते-पीते बड़े संयुक्त परिवार में उनकी परवरिश हुई। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उनका विवाह एक बहुत अच्छे करोड़पति व्यापारी परिवार में कर दिया गया। मकेनिकल इन्जिनीयर विश्वनाथ खोटे के साथ दुर्गा का विवाह सम्पूर्ण हुआ। जल्दी ही दुर्गा खोटे ने एक के बाद एक दो बेटों को जन्म दिया, बकुल और हरिन। हँसता-खेलता सुखी परिवार, कहीं किसी चीज़ की कमी नहीं। पर सुख-शान्ति को नज़र लगते देर नहीं लगती। और दुर्गा खोटे के साथ भी यही हुआ। मात्र 26 वर्ष की आयु में दुर्गा विधवा हो गईं। विश्वनाथ खोटे की असामयिक मृत्यु होने के बाद ससुराल में दुर्गा के प्रति रिश्तेदारों का रवैया बदल गया। पर दुर्गा उन लड़कियों में शामिल नहीं थीं जो घर बैठे चुपचाप अत्याचार सहे। वो तो दुर्गा थी। वो अपने दोनों बेटों की परवरिश के लिए किसी के उपर निर्भर नहीं रहना चाहती थीं। इसलिए वो काम की तलाश में निकल पड़ीं।


दुर्गा खोटे को मराठी थिएटर जगत के बारे में मालूमात थी, और इस क्षेत्र में उनके कुछ जानकार मित्र भी थे, जिनकी सहायता से उन्होंने इस अभिनय के क्षेत्र में क़दम रखने का फ़ैसला लिया। यहाँ यह बताना अत्यन्त आवश्यक है कि यह वह दौर था 30 के दशक का जब अच्छे घर की महिलाओं का फ़िल्मों से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। फ़िल्म तो क्या संगीत और नृत्य सीखना भी कोठेवालियों का काम समझा जाता था। फ़िल्मों और नाटकों में महिलाओं के चरित्र या तो पुरुष कलाकार निभाते या फिर कोठों से महिलाओं को बुलाया जाता। ऐसे में दुर्गा खोटे का इस अभिनय क्षेत्र में क़दम रखने के निर्णय से उनके परिवार और समाज में क्या प्रतिक्रिया हुई होगी इसका अनुमान लगाना ज़्यादा मुश्किल काम नहीं है। समाज और "लोग क्या कहेंगे" की परवाह किए बग़ैर दुर्गा खोटे उतर गईं अभिनय जगत में, सिने-संसार में, और पहली बार वो नज़र आईं 1931 की ’प्रभात फ़िल्म कंपनी’ की मूक फ़िल्म ’फ़रेबी जाल’ में। उसके बाद 1932 में ’माया मछिन्द्र’ में अभिनय करने के बाद उसी साल उन्हें मुख्य नायिका का किरदार निभाने के लिए फ़िल्म ’अयोध्या च राजा’ (मराठी व हिन्दी में निर्मित) में लिया गया। इस फ़िल्म में उनके अभिनय की इतनी तारीफ़ें हुईं कि फिर इसके बाद कभी उन्हें फ़िल्म अभिनय के क्षेत्र में पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। इस फ़िल्म में उनके द्वारा निभाए गए रानी तारामती के रोल को आज तक याद किया जाता है।


दुर्गा खोटे ने न केवल सिनेमा में अभिनय के क्षेत्र में महिलाओं के लिए पथ-प्रशस्त किया, बल्कि फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी वो प्रथम महिलाओं में से थीं। 1937 में उन्होंने फ़िल्म ’साथी’ का निर्माण किया और इसका निर्देशन भी उन्होंने ही किया। यही नहीं दुर्गा खोटे ने "स्टुडियो सिस्टम" की परम्परा को तोड़ कर "फ़्रीलान्सिंग्" पर उतर आईं। उनकी शख़्सीयत और प्रतिभा के आगे फ़िल्म कंपनियों और निर्माताओं को उनके सारे शर्तों को मानना पड़ा। प्रभात के साथ-साथ न्यु थिएटर्स, ईस्ट इण्डिया फ़िल्म कंपनी, और प्रकाश पिक्चर्स जैसे बड़े बैनरों की फ़िल्मों में काम किया। 40 के दशक में भी उनकी सफल फ़िल्मों का सिलसिला जारी रहा और कई पुरस्कारों से उन्हें नवाज़ा गया। उम्र के साथ-साथ दुर्गा खोटे माँ के चरित्र में बहुत सी फ़िल्मों में नज़र आईं और इस किरदार में भी वो उतना ही सफल रहीं। जोधाबाई के चरित्र में ’मुग़ल-ए-आज़म’ में उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। दुर्गा खोटे ने दूसरी शादी भी की थी मोहम्मद राशिद नामक व्यक्ति से, पर दुर्भाग्यवश यह शादी टिक नहीं सकी। उनके पुत्र हरिन के असामयिक मृत्यु से भी उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा। लेकिन ज़िन्दगी के वारों का उन्होंने हर बार सामना किया और हर तूफ़ान से अपने आप को बाहर निकाला। भारत सरकार ने फ़िल्म क्षेत्र के सर्वोच्च सम्मान ’दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से दुर्गा खोटे को सम्मानित किया। आज दुर्गा खोटे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वो हमे सिखा गईं हैं कि किस तरह से ज़िन्दगी को जीना चाहिए, किस तरह से ज़िन्दगी के लाख तूफ़ानों में भी डट कर खड़े रहना चाहिए। दुर्गा खोटे रूप है शक्ति का, दुर्गा का। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से हम करते हैं उन्हें विनम्र नमन।



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Saturday, June 13, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 03 : गुलशन बावरा


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 03

 
गुलशन बावरा



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है गीतकार गुलशन बावरा को। 



गुलशन कुमार मेहता का जन्म 12 अप्रैल 1937 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रोविन्स के शेख़ुपुरा में हुआ था। यह अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता श्री रूप लाल मेहता का कन्स्ट्रक्शन का कारोबार था। रूप लाल मेहता और उनके भाई चमन लाल मेहता के परिवार साथ में उनके पिता श्री लाभ चन्द मेहता की हवेली में रहते थे। रूप लाल मेहता के दो बेटे (एक गुलशन) और एक बेटी थी। बेटी का विवाह जयपुर के एक परिवार में हो गया। दो बेटों और भाई के परिवार के साथ रूप लाल मेहता की ज़िन्दगी हँसी-ख़ुशी गुज़र रही थी। गुलशन भी बड़े लाड और प्यार से पल रहे थे परिवार में सबसे छोटा होने की वजह से। स्कूल जाते, अपने बड़े भाई और चचेरे भाई-बहनों के साथ खेलते-कूदते। 6 वर्ष की उम्र से वो कविताएँ भी लिखने लगे थे। कुल मिलाकर एक हँसता-खेलता परिवार, कहीं कोई कमी नहीं, सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। और तभी जैसे एक भयानक बिजली गिरी। 1947 का वर्ष आया। अगर एक तरफ़ स्वाधीनता की ख़ुशियाँ थीं तो दूसरी तरफ़ बटवारे का भयानक मंज़र था। सरहद के दोनों तरफ़ साम्प्रदायिक दंगों ने विकराल रूप धारण कर लिया था। और इसका शिकार हो गया लाभ चन्द मेहता का पूरा परिवार। गुलशन और उनके भई-बहनों की आँखों के सामने उनके माता-पिता को बड़ी ही बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। मातम मनाने का भी समय नहीं मिला उन बच्चों को। किसी तरह से अपनी-अपनी जान बचा कर वो बच्चे रात के अन्धकार का फ़ायदा उठा कर हवेली से बाहर भाग गए। 10 साल के गुलशन का हाथ पकड़ कर उनका बड़ा भाई भाग रहा था उस रात जिसकी सुबह दूर-दूर तक होती नज़र नहीं आ रही थी। पलक झपकते ही पूरा परिवार बिखर गया, सब कुछ एक ही पल में ख़त्म हो गया। सारे सपने बिखर गए, बचपन बिखर गया। इस अकल्पनीय त्रासदी का नन्हे गुलशन के मन-मस्तिष्क पर उस समय क्या असर पड़ा होगा इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। उन दो भाइयों के लिए अब अन्तिम सहारा था जयपुर में उनकी बड़ी बहन का परिवार। दोनों उसी राह पर चल निकले।

बड़ी बहन और उसके परिवार ने दोनों भाइयों को अपना लिया। रात के बाद जैसे आख़िरकार भोर हुई। गुलशन जयपुर में ही बड़े हुए। शिक्षा वहीं पे हुई। इसके बाद जब बड़े भाईसाहब की नौकरी दिल्ली में लग गई तब गुलशन बड़े भाई के साथ दिल्ली शिफ़्ट हो गए और दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही स्नातक की डिग्री ली। कॉलेज में जा कर गुलशन का कविताएँ लिखना जारी रहा। वो हमेशा से ही एक गीतकार बन कर फ़िल्मी दुनिया में नाम कमाना चाहते थे। उनकी चाहत को रास्ता तब मिला जब रेल्वे में उन्हें क्लर्क की नौकरी मिल गई और पोस्टिंग् हुई बम्बई। ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। नौकरी करने के साथ-साथ स्टुडियोज़ के चक्कर भी लगाया करते थे गुलशन बावरा। गुलशन कुमार मेहता उर्फ़ गुलशन बावरा को उनके जीवन का पहला ब्रेक दिया कल्याणजी वीरजी शाह ने, फ़िल्म थी ’चन्द्रसेना’। और गीत के बोल "मैं क्या जानूं कहाँ लागे ये सावन मतवाला रे"। गायिका लता मंगेशकर। असली ब्रेक मिला ’सट्टा बाज़ार’ में जिसमें उन्होंने कल्याणजी-आनन्दजी के लिए लिखा "तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे"। कल्याणजी-आनन्दजी और राहुल देब बर्मन के लिए गुलशन बावरा ने सर्वाधिक व सफलतम काम किया। "यारी है इमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी", "दीवाने हैं दीवानो को ना घर चाहिए", "हमें और जीने की चाहत न होती अगर तुम न होते", "कितने भी तू कर ले सितम, हँस हँस के सहेंगे हम", "वादा कर ले साजना, तेरे बिना मैं ना रहूँ...", "क़समें वादे निभाएँगे हम", "जीवन के हर मोड़ पे मिल जाएँगे हमसफ़र", "पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए", "तू तू है वही दिल ने जिसे अपना कहा", "आती रहेंगी बहारें, जाती रहेंगी बहारें" और भी न जाने कितने ऐसे सुपरहिट गीत इन्होंने लिखे। और "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती" ने तो गुल्शन बावरा को अमर बना दिया। जिस भयानक त्रासदी से वो गुज़रे थे, वहाँ से लेकर जीवन के अन्त तक जाकर जिस मुकाम पे वो पहुँचे, हम उन्हें यही कह सकते हैं कि तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। गुलशन बावरा की कहानी से हमें यही सबक मिलती है कि दुर्घटना हर एक के जीवन में घटती है, दर्दनाक हादसे सभी के ज़िन्दगी में आती है, पर निरन्तर चलते रहने का नाम ही जीवन है, और हर रात के बाद एक सुबह ज़रूर आती है। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से गुलशन बावरा को सलाम।


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Saturday, May 9, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 02: : कमल सदाना


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 02

 
कमल सदाना



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है अभिनेता और निर्देशक कमल सदाना को। 



21 अक्तूबर 1990 की शाम की घटना है। 20 वर्षीय कमल सदाना की सालगिरह के पार्टी का आयोजन चल रहा है। कमल के पिता थे बृज सदाना जो एक फ़िल्म निर्माता थे और ’दो भाई’, ’यह रात फिर ना आएगी’, ’विक्टोरिया नंबर 203', 'उस्तादों के उस्ताद’, ’नाइट इन लंदन’, ’यकीन’, और ’प्रोफ़ेसर प्यारेलाल’ उनके द्वारा निर्मित चर्चित फ़िल्में थीं। तो उस शाम बृज सदाना और उनकी पत्नी सईदा ख़ान बेटे के जनमदिन की पार्टी की देख-रेख करने उस होटल में पहुँचे जहाँ पार्टी होनी थी। मिया-बीवी में अक्सर झगड़ा हुआ करता था, और उस दिन भी किसी बात को लेकर दोनों में मनमुटाव हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि होटल में लगभग तमाशा खड़ा हो गया। दोनों घर वापस आए और जम कर बहस और लड़ाई होने लगी। बृज सदाना शराब के नशे में थे और बीवी के साथ गरमा-गरमी इतनी ज़्यादा हो गई कि उन्होंने अपना रिवॉल्वर  निकाला और बीवी पर गोली चला दी। सईदा ख़ान पल भर में गिर पड़ीं और उनकी मौत हो गई। बगल के कमरे में बेटी नम्रता पार्टी में जाने के लिए तैयार हो रही थीं। गोली की आवाज़ सुन कर वह दौड़ी आईं और नज़ारा देख कर ज़ोर ज़ोर से चीख पड़ीं। पिता ने पुत्री को भी नहीं बख्शा। रिवॉल्वर का निशाना बेटी पर लगाया और एक  बार फिर गोली चला दी। बेटी की भी पल भर में जीवन लीला समाप्त हो गई। बीवी और बेटी के बेजान शरीर को देख कर बृज सदाना के होश वापस आ गए। शराब का पूरा नशा उतर गया। पर बहुत देर हो चुकी थी। उनके पास बस एक ही रास्ता बचा था और उन्होंने वही किया। रिवॉल्वर अपने सर पर तान कर तीसरी गोली चला दी।

जन्मदिन की ख़ुशियाँ दोस्तों के साथ मनाने के बाद युवा कमल सदाना घर वापस पहुँचे। अपने माता-पिता और बहन की लाशों का नज़ारा देख कर वो पत्थर हो गए। पलक झपकते ही उनका पूरा हँसता-खेलता परिवार बिखर चुका था, सब तहस-नहस हो गया था। जन्मदिन पर माँ-बाप और बहन की मृत्यु के दर्द को सह पाना कोई आसान काम नहीं था। बृज सदानाह अपने बेटे को जल्द ही फ़िल्म में लौन्च करने वाले थे। उससे पहले ही सब ख़त्म हो गया। परिवार के जाने का ग़म तो एक बोझ था ही उनके दिल पर, साथ ही उनका भविष्य, उनका करीयर भी अंधकारमय हो गया। ग़लत राह पर चल निकलना बहुत आसान था एक बीस वर्षीय युवक के लिए। पर ऐसा नहीं हुआ। जो सपना पिता ने अपने बेटे के लिए देखा था, बेटा उसी राह पर चल निकला और पूरी जान लगा दी फ़िल्मों में मौका पाने के लिए। जब 1992 में राहुल रवैल निर्देशित फ़िल्म ’बेख़ुदी’ से सैफ़ अली ख़ान किसी कारणवश निकल गए तो नायक के रोल के लिए कमल सदाना को मौका मिल गया और यहीं से उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हो गया। ’बेख़ुदी’ के बाद ’रंग’, ’बाली उमर को सलाम’, ’हम हैं प्रेमी’, ’हम सब चोर हैं’, ’अंगारा’, ’निर्णायक’, ’मोहब्बत और जंग’, ’करकश’, और ’विक्टोरिया नं 203' जैसी फ़िल्मों में वो नज़र आए। ’विक्टोरिया नं 203’ का उन्होंने ही निर्माण किया 2007 में अपने पिता को श्रद्धांजलि स्वरूप। हाल ही में उन्होंने निर्देशित की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’Roar - Tigers of the Sundarbans’, जिसे दुनिया भर से वाह-वाही मिली। कमल सदाना बिना किसी सहारे के अपने करीयर को निखारते चले जा रहे हैं। बीस साल के जन्मदिन की उस भयानक दुर्घटना के दर्द पर काबू पा कर अपनी ज़िन्दगी को आगे बढ़ाया और आज एक ऐसे मुकाम पर आ गए हैं कि हम वाक़ई यह कहते हैं कि कमल जी, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। रेडियो प्लेबैक इण्डिया की तरफ़ से कमल सदाना को झुक कर सलाम। 

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Saturday, April 11, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01 (रवीन्द्र जैन)


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01
 

मन की आँखें हज़ार होती हैं...!’
रवीन्द्र जैन




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। आज से हम इसी शीर्षक से एक नई शृंखला शुरू कर रहे हैं जिसमें हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किए हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है गीतकार, संगीतकार, कवि और गायक रवीन्द्र जैन को।


28 फ़रवरी 1944 के दिन पंडित इन्द्रमणि ज्ञान प्रसाद जी के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार में ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। पर जल्द ही यह पता चला कि उस बच्चे की आँखें बन्द हैं। डॉ. मोहनलाल ने जन्म के अगले दिन एक ऑपरेशन किया, उन्होंने उस बच्चे की आँखें खोली। पर जाँच करने के बाद उन्होंने ज्ञान प्रसाद जी को यह कठोर सत्य बता ही दिया कि भले आँखों की रोशनी धीरे धीरे आ सकती है, पर पढ़ना मुनासिब नहीं रहेगा क्योंकि ऐसा करने पर नुकसान होगा। परिवार में जैसे अन्धेरा छा गया। इस नवजात शिशु का नाम रखा गया रवीन्द्र। उनके पिता ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए यह निर्णय लिया था कि अपने पुत्र के जीवन का लक्ष्य संगीत ही होगा और संगीत में ही उसकी पहचान बनेगी। और यही हुआ। अपनी इस कमी को रवीन्द्र जैन ने भी कभी अपने उपर हावी नहीं होने दिया और अपनी लगन और बुद्धि के सहारे वो ना केवल एक गायक-संगीतकार बने बल्कि काव्य और साहित्य के भी विद्‍वान बने। 80 के व्यावसायिक दशक में भी उन्होंने अर्थपूर्ण गीत लिखे और कभी पैसे के पीछे भाग कर सस्ते गीत नहीं लिखे। रवीन्द्र जैन का नाम सुनते ही दिल श्रद्धा से भर जाता है, उन्हें प्रणाम करने को जी चाहता है।

रवीन्द्र जैन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें कभी भी अपने नेत्रहीनता पर अफ़सोस नहीं हुआ। उन्हीं के शब्दों में, "मैं जानता हूँ कि दुनिया में हर आदमी किसी ना किसी पहलू से विकलांग है, चाहे वो शरीर से हो, मानसिक रूप से हो या कोई अभाव जीवन में हो। विकलांगता का मतलब यह नहीं कि शारीरिक असुविधा है, कहीं ना कहीं लोग मोहताज हैं, अपाहिज हैं, और उसी पर विजय पाना है। उससे निराश होने की ज़रूरत नहीं है। disability can be your ability also, उससे आपकी क्षमता दुगुनी हो जाती है।"

और यही संदेश उन्होंने एक बार अंध-विद्यालय के छात्रों को भी दिया। उन्हें एक बार एक ब्लाइन्ड स्कूल में मुख्य अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया गया। जब उन्हें बच्चों को संबोधित करने को कहा गया, तो उन्होंने संदेश के रूप में यह कविता पढ़ी...

तन की आँखें तो दो ही होती हैं
मन की आँखें हज़ार होती हैं
तन की आँखें तो सो ही जाती हैं
मन की आँखें कभी ना सोती हैं।

चाँद सूरज के हैं जो मोहताज
भीख ना माँगो उन उजालों से,
बन्द आँखों से तुम वो काम करो
आँख खुल जाए आँख वालों की।

हैं अन्धेरे बहुत सितारे बनो
दूसरों के लिए किनारे बनो,
है ज़माने में बेसहारे बहुत
तुम सहारे ना लो, सहारे बनो।

’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ रवीन्द्र जैन जी को दिल से करती है सलाम!




खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

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