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Thursday, August 12, 2010

फिर छिड़ी रात बात फूलों की......तलत अज़ीज़ और खय्याम से सुनिए इस गज़ल के बनने की कहानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 460/2010/160

ये महकती ग़ज़लें इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर लघु शृंखला 'सेहरा में रात फूलों की' के तहत। 'सेहरा में रात फूलों की, जैसा कि आप में से बहुतों को मालूम ही होगा मशहूर शायर मख़्दूम महिउद्दिन की एक मशहूर ग़ज़ल के एक शेर का हिस्सा है, जिसे हमने इस शृंखला के शीर्षक के लिए चुना। क्यों चुना, शायद यह हमें अब बताने की ज़रूरत नहीं। ८० के दशक के संगीत का जो चलन था, उस लिहाज़ से ये ग़ज़लें सेहरा में फूलों भरी रात की तरह ही तो हैं। ख़ैर, आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी में मख़्दूम के इसी ग़ज़ल की बारी, जिसे फ़िल्म 'बाज़ार' के लिए स्वरबद्ध किया था ख़य्याम साहब ने। और यह ख़य्याम साहब के संगीत में इस शृंखला की चौथी ग़ज़ल भी है, जैसा कि हमने आप से वादा किया था। फ़िल्म 'बाज़ार' के सभी ग़ज़लें कंटेम्पोररी शायरों की ग़ज़लें हैं। ऐसा कैसे संभव हुआ आइए जान लेते हैं ख़य्याम साहब से जो उन्होने विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में कहे थे। "वो हमारी फ़िल्म आपको याद होगी, 'बाज़ार'। उसमें ये सागर सरहदी साहब हमारे मित्र हैं, दोस्त हैं, तो ऐसा सोचा सागर साहब ने कि 'ख़य्याम साहब, आजकल का जो संगीत है, उस वक़्त भी, 'बाज़ार' के वक़्त भी, हल्के फुल्के गीत चलते थे। तो उन्होने कहा कि कुछ अच्छा आला काम किया जाए, अनोखी बात की जाए। तो सोचा गया कि बड़े शायरों के कलाम इस्तेमाल किए जाएँ फ़िल्म संगीत में। तो मैं दाद दूँगा कि प्रोड्युसर डिरेक्टर चाहते हैं कि ऊँचा काम हो। हो सकता है कि शायद लोगों की समझ में ना आए। लेकिन उन्होने कहा कि आप ने बिलकुल ठीक सोचा है। तो जैसे मैं आपको बताऊँ कि मीर तक़ी मीर ("दिखाई दिए युं के बेख़ुद किया"), मिर्ज़ा शौक़ ("देख लो आज हमको जी भर के"), बशीर नवाज़ ("करोगे याद तो हर बात याद आएगी"), इन सब को इस्तेमाल किया। फिर मख़्दूम मोहिउद्दिन, "फिर छिड़ी रात बात फूलों की", यह उनकी बहुत मशहूर ग़ज़ल है, और मख़्दूम साहब के बारे में कहूँगा कि बहुत ही रोमांटिक शायर हुए हैं। और हमारे हैदराबाद से ताल्लुख़, और बहुत रेवोल्युशनरी शायर। जी हाँ, बिलकुल, अपने राइटिंग में भी, और अपने किरदार में भी। वो एक रेवोल्युशनरी, वो चाहते थे कि हर आम आदमी को उसका हक़ मिले" तो दोस्तों, इसी ग़ज़ल को आज हम आपको सुनवा रहे हैं जिसे युगल आवाज़ें दी हैं लता जी और मशहूर ग़ज़ल गायक तलत अज़ीज़ ने। फूलों पर लिखी गई ग़ज़लों में मेरे ख़याल से इससे ख़ूबसूरत ग़ज़ल कोई और नहीं।

फ़िल्म 'बाज़ार' की तमाम जानकारियाँ हमने आपको 'दस गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में दी थी और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की रवायत है कि यहाँ हर अंक नया होता है, किसी दोहराव की कम से कम अब तक कोई गुंजाइश नहीं हुई है। तो ऐसे में यहाँ आपको इसी ग़ज़ल के बारे में कुछ और बातें बता दी जाए। ये बातें कही है ख़ुद तलत अज़ीज़ साहब ने फ़ौजी जवानों के लिए प्रसारित 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में। "ख़य्याम साहब का नाम तो आपने सुना ही होगा। बहुत ही बड़े संगीतकार हैं। एक बार उन्होने मुझे मुंबई के एक प्राइवेट महफ़िल में गाते हुए सुना और उन्होने कहा कि मैं आपको जल्द से जल्द फ़िल्म में गवाउँगा। मैंने सोचा कि ऐसे ही उन्होने कह दिया होगा, कहाँ मुझे फ़िल्म में गाने देंगे! लेकिन उन्होने मुझे जल्द ही बुलाया और मैंने उनके लिए गाया और वो गीत काफ़ी मक़बूल हुआ। लेकिन अब मैं आपको वो गीत नहीं सुनवाउँगा। मैं आपको अब फ़िल्म 'बाज़ार' का वो डुएट ग़ज़ल सुनवाउँगा जिसे मैंने लता जी के साथ गाया था। मुझे याद है जब मैं इस गाने की रेकॊर्डिंग् के लिए स्टुडियो पहुँचा तो लता जी वहाँ ऒलरेडी पहुँच चुकी थीं। मैं इतना नर्वस हो गया कि पूछिए मत। उनके साथ यह मेरा पहला गीत था। मैंने उनसे कहा कि लता जी, अगर मुझसे कोई ग़लती हो जाए तो माफ़ कर दीजिएगा। लता जी ने कहा कि क्या बात कर रहे हैं, आप तो बहुत अच्छा गाते हैं। मैंने पूछा कि आपने मुझे सुना है, तो वो बोलीं कि हाँ, मैंने आपकी गाई हुई ग़ज़ल सुनी है। तब जाकर मुझमें कॊन्फ़िडेन्स आया और यह ग़ज़ल रेकॊर्ड हुआ।" तो दोस्तों, आपको यह बताते हुए कि इस ग़ज़ल और इस अंक के साथ इस लघु शॄंखला का समापन हो रहा है, आपको यह शृंखला कैसी लगी हमें ज़रूर लिखिएगा oig@hindyugm.com के पते पर। रविवार से एक नई लघु शृंखला के साथ हम फिर से हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, और आप सुनिए इस महकती हुई फूलों भरी ग़ज़ल को जिसके शेर हम नीचे लिख रहे हैं। चलते चलते शायराना अंदाज़ में यही कहते चलेंगे कि "अब तो जाते हैं मयक़दे से मीर, फिर मिलेंगे गर ख़ुदा लाया तो", ख़ुदा हाफ़िज़!

फिर छिड़ी रात, बात फूलों की,
रात है या बारात फूलों की।

फूल के हार, फूल के गजरे,
शाम फूलों की, रात फूलों की।

आपका साथ, साथ फूलों का,
आपकी बात, बात फूलों की।

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में,
रोज़ निकलेगी बात फूलों की।

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं,
मिल रही हैं हयात फूलों की।

ये महकती हुई ग़ज़ल मख़्दूम,
जैसे सेहरा में रात फूलों की।



क्या आप जानते हैं...
कि तलत अज़ीज़ के सब से पसंदीदा संगीतकार हैं मदन मोहन। उन्होने यह 'जयमाला' कार्यक्रम ना केवल ये बात बताई बल्कि उनके स्वरबद्ध जिन दो गीतों को उसमें शामिल किया वो थे "वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गई" (संजोग) और "जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई आप क्यों रोये" (वो कौन थी)।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. जिस गीतकार पर हमारी आगामी शृंखला है उनका जन्मदिन इसी माह में है, नाम बताएं - १ अंक.
२. आजादी से पूर्व घटी एक दुखद एतिहासिक घटना पर है फिल्म का शीर्षक, नाम बताएं- २ अंक.
३. आर डी बर्मन के संगीतबद्ध किये इस गीत में किस गायक की प्रमुख आवाज़ है - २ अंक.
४. मुखड़े में शब्द है "आफताब", इस फिल्म में गीतकार ने पठकथा और संवाद भी लिखे थे, निर्देशक बताएं- ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, शरद जी, प्रतिभा जी और किशोर जी, सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, November 11, 2009

मन धीरे धीरे गाए रे, मालूम नहीं क्यों ...तलत और सुरैया का रेशमी अंदाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 259

१९५८ में गायक तलत महमूद कुल तीन फ़िल्मों में बतौर अभिनेता नज़र आए थे। ये फ़िल्में थीं 'सोने की चिड़िया', 'लाला रुख़' और 'मालिक'। जहाँ पहली दो फ़िल्में 'फ़िल्म इंडिया कॊर्पोरेशन' की प्रस्तुति थीं, 'मालिक' फ़िल्म का निर्माण किया था एस. एम युसूफ़ ने अपनी 'सनी आर्ट प्रोडक्शन्स' के बैनर तले। फ़िल्म की नायिका थीं सुरैया। दोस्तों, १९५८ तक पार्श्वगायन पूरी तरह से अपनी शबाब पर था। ३० और ४० के दशकों के 'सिंगिंग्‍ स्टार्स' फ़िल्म जगत के आसमान से ग़ायब हो चुके थे, कुछ देश विभाजन की वजह से, कुछ बदलते दौर और तकनीक की वजह से। लेकिन कुछ ऐसे कलाकार जिनकी गायन प्रतिभा उनके अभिनय की तरह ही पुख़्ता थी, वो ५० के दशक में भी लोकप्रिय बने रहे। इसका सीधा सीधा उदाहरण है तलत महमूद और सुरैया। ये सच है कि तलत साहब एक गायक के रूप में ही जाने जाते हैं, लेकिन अभिनय में रुचि और नायक जैसे दिखने की वजह से वो चंद फ़िल्मों में बतौर नायक काम किया था। और सुरैया के तो क्या कहने! अभिनय और गायन, दोनों में लाजवाब! लेकिन दूसरी अभिनेत्रियों के लिए पार्श्वगायन ना करने की सोच ने उन्हे पीछे धकेल दिया था ५० के दशक में। ज़्यादातर फ़िल्मकार उनसे गीत गवाना चाहते थे लेकिन दूसरी अभिनेत्रियों के लिए, जो उन्हे कतई मंज़ूर नहीं था। १९५८ की फ़िल्म 'मालिक' में ये दोनों कलाकार एक साथ नज़र आए और इस तरह से इस फ़िल्म को मिले दो 'सिंगिंग्‍ स्टार्स'। अब ज़ाहिर सी बात है कि इन दोनों ने ही इस फ़िल्म के गाने गाए होंगे। आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा रहे हैं इस फ़िल्म से एक बहुत ही प्यारा युगल गीत "मन धीरे धीरे गाए रे, मालूम नहीं क्यों"। फ़िल्म तो बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हुई लेकिन तलत साहब और सुरैया के गाए और गीतकार शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को ख़ूब सुना गया।

'मालिक' के संगीतकार थे ग़ुलाम मोहम्मद। ऐए आज ग़ुलाम साहब की कुछ बातें की जाए। उन्हे संगीत विरासत में ही मिली थी। उनके पिता नवीबक्श एक तबला वादक थे। अपने पिता के साथ वो भी जलसों में जाया करते थे। ऐल्बर्ट थियटर में ये जलसे हुआ करते थे। तबले के साथ साथ ग़ुलाम मोहम्मद का अभिनय में भी रुचि थी। २५ रुपय प्रति माह के वेतन पर वे ऐल्बर्ट थियटर में शामिल हो गए। कुछ समय तक वहाँ रहे, लेकिन जब थियटर की माली हालात ख़राब हो गई तो उन्हे दूसरे दरवाज़ों पर दस्तक देनी पड़ी। काफ़ी जद्दोजहद के बाद एक कंपनी में उन्हे ४ आने प्रति रोज़ के वेतन पर रख लिया गया। वह कंपनी घूमते घामते जब जुनागढ़ पहुँची तो वहाँ जलसे में एक नामी मंत्री महोदय भी दर्शकों में शामिल थे। ग़ुलाम साहब की कला से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्हे एक रत्न जड़ित तलवार भेंट में दे दी। १९२४ में वे बंबई आए और ८ सालों तक संघर्ष करते रहे। १९३२ में सरोज मूवीटोन में उन्हे बतौर तबला वादक रख लिया गया। 'राजा भार्थहरि' फ़िल्म में उनके तबले की बहुत तारीफ़ हुई। उसके बाद उन्होने संगीतकार अनिल बिस्वास और नौशाद के साथ काम किया। नौशाद साहब के साथ उनकी अच्छी ट्युनिंग्‍ जमती थी। फिर तो नौशाद साहब के गीतों में उनके तबले और ढोलक के ठेके एक ख़ासीयत बन गई। स्वतंत्र संगीतकार बनने के बाद भी ग़ुलाम साहब के ठेके बरक़रार रहे जिसका एक अच्छा उदाहरण है आज का प्रस्तुत गीत। इस गीत का रीदम मुख्य तौर पर मटके के ठेकों पर ही आधारित है। आइए सुनते हैं गुज़रे ज़माने के इस अनमोल गीत को।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये उन संगीतकार का गीत है जिन्होंने ने सहगल से सूरदास के भजन गवा कर इतिहास रचा था.
२. इस युगल गीत में पुरुष स्वर है जी एम् दुर्रानी का.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"कसम".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी आपका क्या कहना.....बस कमाल है, दूसरी बार भी आप ४० के अन्कदें तक पहुच गए हैं, लगता है बाकी सब लोग हथियार डाल चुके हैं, रोहित राजपूत और दिलीप जी सब कहाँ है भाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, September 11, 2009

आज के बाद कोई खत न लिखूँगा तुझको.... "अश्क़" के हवाले से चेता रहे हैं "चंदन दास"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४४

गर पिछली कड़ी की बात करें तो उस कड़ी की प्रश्न-पहेली का हमारा अनुभव कुछ अच्छा नहीं रहा। "सीमा" जी जवाबों के साथ सबसे पहले हाज़िर तो हुईं लेकिन उन्होंने फिर से डेढ सवालों का हीं सही जवाब दिया। हमें लगा कि इस बार भी हमें वही करना होगा जो हमने पिछली बार किया था यानि कि उधेड़बुन का निपटारा, लेकिन "सीमा" जी की खेल-भावना ने हमें परेशान होने से बचा लिया। यह तो हुई अच्छी बात लेकिन जिस बुरे अनुभव का हम ज़िक्र कर रहे हैं वह है शरद जी का देर से महफ़िल में हाज़िर होना (मतलब कि पुकार लगाने के बाद) और शामिख जी का शरद जी के जवाबों को हुबहू छाप देना। शामिख जी, यह बात हमने वहाँ टिप्पणी करके भी बता दी थी कि सही जवाबों के बावजूद आपको कोई अंक नहीं मिलेगा। हमारे प्रश्न इतने भी मुश्किल न हैं कि आपको ऐसा करना पड़े। और हाँ, आपने शायद नियमों को सही से नहीं पढा है। हर सही जवाब देने वाले को कम से कम १ अंक मिलना तो तय है। इसलिए आपका यह कहना कि चूँकि सीमा जी ने जवाब दे दिया था इसलिए मैने कोशिश नहीं की, का कोई मतलब नहीं बनता। शरद जी, आपको भी मान-मनव्वल की जरूरत आन पड़ी। आप तो हमारे नियमित पाठक/श्रोता/पहेली-बूझक रहे हैं। खैर पिछली कड़ी के अंकों का हिसाब कुछ यूँ बनता है- सीमा जी: ३ अंक , शरद जी: २.५ अंक (.५ अंक बोनस, बाकी बचे आधे सवाल का सही जवाब देने के लिए)। अब बारी है आज के प्रश्नों की| तो ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) "कमाल अमरोही" के शहर में अंतिम साँसें लेने वाला एक शायर जो उनकी एक फ़िल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर भी था। उस शायर का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि महफ़िल-ए-गज़ल में हमने उनकी जो नज़्म पेश की थी उसे आवाज़ से किसने सजाया था?
२) एक फ़नकार जिसने महेश भट्ट के लिए "डैडी" में गाने गाए तो "खय्याम" साहब के लिए "उमराव जान" में। उस फ़नकार के नाम के साथ यह भी बताएँ कि उनकी सर्वश्रेष्ठ १६ गज़लों से लबरेज एलबम का नाम क्या है?


आज हम जिस फ़नकार जिस गायक की नज़्म लेकर इस महफ़िल में हाज़िर हुए हैं उसकी ताज़ातरीन एलबम का नाम है "जब दिल करते हैं, पीते हैं"। इस एलबम में संगीत है "जयदेव कुमार" का तो फ़ैज़ अनवर, प्याम सईदी, इसरार अंसारी और नसिम रिफ़त की नज़्मों और गज़लों को इस एलबम में स्थान दिया गया है। १२ मार्च १९५६ को जन्मे इस फ़नकार ने ८ साल की छोटी-सी उम्र में गाना शुरू कर दिया था। इन्होंने उस्ताद मूसा खान से गज़ल और पंडित मणी प्रसाद से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली है। २६ साल की उम्र में इनकी गज़लों की पहली एलबम रीलिज हुई थी जिसमें इनका परिचय स्वयं तलत अज़ीज़ साहब ने दिया था। १९८३ में इन्हें "बेस्ट न्यु गज़ल सिंगर" के अवार्ड से नवाज़ा गया। १९९३ में इनकी एलबम "दीवानगी" के लिए "एस०यु०एम०यु०" की तरफ़ से इन्हें "बेस्ट गज़ल" और "बेस्ट गज़ल सिंगर" के दो अवार्ड मिले। आज भी इनकी गज़लों की रुमानियत और इनकी आवाज़ में बसी सच्चाई बरकरार है। अब तो आप समझ हीं गए होंगे कि हम किनकी बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं "चंदन दास" की, जिन्होंने "दिल की आवाज़", "सदा", "पिया नहीं जब गाँव में", "इनायत", "एक महफ़िल", "तमन्ना", "अरमान", "जान-ए-गज़ल", "सितम", "चाहत", "ऐतबार-ए-वफ़ा" और "गुजारिश" जैसे न जाने कितने एलबमों में न सिर्फ़ गायन किया है, बल्कि इन्हें संगीत से भी सजाया है। चंदन दास से जब यह पूछा गया कि उनके पास अपने संगीत सफ़र की कैसी यादें जमा हैं तो उनका कहना था: पिताजी नहीं चाहते थे कि मैं संगीत के क्षेत्र को अपनाऊं। वो चाहते थे कि मैं उनका मूर्शिदाबाद का व्यापार संभालूँ। घर में खूब विरोध हुआ और संगीत के लिए मैंने घर छोड़ दिया और ग्यारहवीं कक्षा के बाद अपने चाचा के पास पटना आ गया। १९७६ में फिर मैं दिल्ली चला गया जहाँ ओबराय होटल में काम करने लगा। वहीं पर काफ़ी संघर्ष के बाद जब मुझे दिल्ली दूरदर्शन में गजल पेश करने का मौका मिला तो उस कार्यक्रम को देखकर पिताजी मुझसे मिलने दिल्ली आए थे। उस वक्त लगभग १४ साल बाद पिताजी से मुलाकात हुई थी।

गज़ल पेश करने भोपाल गए "चंदन दास" से "भास्कर" की खास मुलाकात में उन्होंने आजकल के संगीत के बारे में भी ढेर सारी बातें की थी। प्रस्तुत है उनसे किए गए कुछ प्रश्न और उनके बेहतरीन जवाब: फिल्मों से गजलें एकदम गायब सी हैं? आजकल की फिल्मों में वैसी सिचुएशन नहीं रहती कि गजले शामिल हो सकें। पहले की फिल्मों में गजलों को खासी जगह मिलती थी, अब तो फिल्मों में गजलों का नामो-निशान तक नहीं रह गया है। गजल गायकी की वर्तमान हालत से संतुष्ट हैं? गजल पर फ्यूजन हावी हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि इसके मूल स्वरूप से खिलवाड़ होने लगा है। गाने वालों को उर्दू की समझ ही नहीं। क्या गजलों से श्रोताओं की दूरी बन रही है? यह सही है कि पश्चिम के संगीत की वजह से गजलों से श्रोताओं की दूरी बनी है। गजल एक गंभीर विधा है। इसे समझने, जानने वाले श्रोता हमेशा विशिष्ट होते हैं। गजल गायकी की चाहत रखने वालों को इस विधा को सीखने में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए। इसके लिए पहले अच्छे गुरु से तालीम हासिल करनी चाहिए और निपुण होने के बाद ही गायकी प्रारंभ करनी चाहिए। गजलों के लिए भी रिएलिटी शो होना चाहिए? गजल एक विशिष्ट विधा है। यदि गजलों के लिए रिएलिटी शो होंगे तो इसकी अहमियत खत्म हो जाएगी। फिर सभी गजल गाने लगेंगे और इसकी महत्ता खत्म हो जाएगी, इसलिए गजलों को रिएलिटी शो से नहीं जोड़ना चाहिए। आपकी पसंदीदा गजल? १९८२ में मेरा पहला एलबम आया था और मेरी पहली गजल थी ‘इस सोच में बैठा हूं, क्या गम उसे पहुंचा है..’ लेकिन मुझे पहचान ‘न जी भर के देखा, न कुछ बात की..’ से मिली। आज इसके बिना कोई कार्यक्रम पूरा नहीं होता। चंदन दास के बारे में इतनी सारी बातें करने के बाद अब वक्त है आज की नज़्म के शायर से मुखातिब होने का। शायद हीं कोई ऐसा होगा जिसने "कहो ना प्यार है", "कोई मिल गया" या फिर "क्रिश" के गाने न सुने हो और अगर सुने हों तो उन गानों ने उसे छुआ न हो और अगर छुआ हो तो वह उन्हें जानता न हो। वैसे हम अपनी महफ़िल में उस मँजे हुए गीतकार की एक गज़ल पहले हीं पेश कर चुके हैं। याद न आ रहा हो तो ढूँढ लें नहीं तो कभी न कभी उनसे जुड़ा कोई सवाल हमारी "प्रश्न-पहेली" में ज़रूर हाज़िर हो जाएगा। तो हमारी आज़ की नज़्म के गीतकार/शायर जनाब इब्राहिम अश्क़ साहब हैं। अब चूँकि आज की कड़ी हमने "चंदन दास" के हवाले कर दी है, इसलिए अश्क़ साहब की बातें आज भी नहीं हो सकती। लेकिन उनका यह शेर तो देख हीं सकते हैं। वैसे जानकारी के लिए बता दें कि यह शेर जिस गज़ल से है, उस गज़ल को भी स्वरबद्ध "चंदन दास" ने हीं किया है। ज़रा अपने जेहन पर जोर देकर यह पता लगाएँ कि वह गज़ल कौन-सी है:

इस दौर में जीना मुश्किल है, ऐ अश्क़ कोई आसान नहीं,
हर एक कदम पर मरने की अब रश्म चलाई लोगों ने।


"गज़ल उसने छेड़ी" एलबम से ली गई इस नज़्म की मिठास तब तक समझ नहीं आ सकती जब तक कि आपकी श्रवणेन्द्रियाँ खुद इसका भोग न लगा लें। इसलिए देर न करें और आनंद लें इस नज़्म का:

फिर मेरे दिल पे किसी दर्द ने करवट ली है,
फिर तेरी याद के मौसम की घटा छाई है,
फिर तेरे नाम कोई खत मुझे लिखना होगा,
तेरा खत बाद-ए-सबा लेके अभी आई है।

आखिरी खत है मेरा, जिसपे है नाम तेरा,
आज के बाद कोई खत न लिखूँगा तुझको।

भूल जाऊँगा तुझे, ये तो नहीं कह सकता,
दिल पे चलता है कहाँ जोर, मोहब्बत करके,
फिर भी इस बात की लेता हूँ कसम ऐ हमदम,
मैं न तड़पाऊँगा तुझको कभी नफ़रत करके,
बेवफ़ा तू है कभी मैं न कहूँगा तुझको,
आज के बाद कोई खत न लिखूँगा तुझको।

याद भी गए हुई लम्हों की सताएगी अगर,
आप अपने से कहीं दूर निकल जाऊँगा,
इत्तेफ़ाक़न हीं अगर तुझसे मुलाकात हुई,
अजनबी बनके तेरी राह से चल जाऊँगा,
दिल तो चाहेगा पर आवाज़ न दूँगा तुझको,
आज के बाद कोई खत न लिखूँगा तुझको।

ये तेरा शहर, ये गलियाँ, दरो-दीवार, ये घर,
मेरे टूटे हुए ख्वाबों की यही जन्नत है,
कल ये सब छोड़कर जाना है बहुत दूर मुझे,
जिस जगह धूप है, सहरा है, मेरी किस्मत है,
याद मत करना मुझे, अब न मिलूँगा तुझको,
आज के बाद कोई खत न लिखूँगा तुझको।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मेरा दिल बारिशों में फूल जैसा,
ये ___ रात में रोता बहुत है ...


आपके विकल्प हैं -
a) पागल, b) बच्चा, c) दीवाना, d) बन्दा

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "बस्ती" और शेर कुछ यूं था -

बस्ती की हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोया...

"साहिर लुधियानवी" के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "सीमा" जी ने। सीमा जी ने "बस्ती" शब्द पर कुछ ज्यादा हीं शेर और उससे भी ज्यादा गज़लें पेश की। हम उनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत किए देते हैं:

आँसूओं की जहाँ पायमाली रही
ऐसी बस्ती चराग़ों से ख़ाली रही (बशीर बद्र)

चूल्हे नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ (गुलज़ार) (इस शेर को आपने दो बार पेस्ट किया है। बस यह शेर हीं नहीं आपने पूरी गज़ल दुहरा दी है। क्या अर्थ निकालें इसका? :) )

छा रहा हैं सारी बस्ती में अंधेरा
रोशनी को घर जलाना चाहता हूं (क़तील शिफ़ाई)

दिल की उजड़ी हुई बस्ती,कभी आ कर बसा जाते
कुछ बेचैन मेरी हस्ती , कभी आ कर बहला जाते... (यह आपकी पंक्तियाँ... वैसे अगर आप इतनी गज़लें डालेंगी तो हम कोई भी गज़ल पूरा नहीं पढ पाएँगे और हो सकता है कि आपकी अपनी पंक्तियाँ हीं हमारी नज़रों से छूट जाएँ।)

सीमा जी के बाद इस महा-दंगल में उतरे शामिख साहब। आपने भी वही किया जो सीमा जी ने किया मतलब कि शेरों और गज़लों की बौछार। ये रहे आपकी पेशकश से चुने हुए कुछ शेर:

अब नए शहरों के जब नक्शे बनाए जाएंगे
हर गली बस्ती में कुछ मरघट दिखाए जाएंगे (आपका पसंदीदा शेर)

बस्ती के सजीले शोख जवाँ, बन-बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे (साहिर)

कुलदीप जी दो पहलवानों के बीच फ़ँसे हुए-से प्रतीत हुए। कोई बात नहीं आपने कैसे भी करके जगह और समय निकाल हीं लिया। ये रहे आपके शेर:

सूझ रहा ना कोई ठिकाना हर बस्ती में रुसवाई है
हर हिन्दू यहाँ का कातिल है हर मुस्लिम बलवाई है (स्वरचित)

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलने में (बशीर बद्र)

अंत में मंजु जी ने भी अपने स्वरचित शेर पेश किए। यह रही आपकी पेशकश:

उम्मीदों की बस्ती जलाकर
बेवफा का दिल न जला

अब कुछ ज़रूरी बात.... यूँ तो हरेक मंच अपने यहाँ लोगों की उपस्थिति देखकर खुश होता है और हम भी उन्हीं मंचों में से एक हैं और यह भी है कि हमने यही सोचकर अपने यहाँ "शब्द-पहेली" की शुरूआत की थी ताकि लोगों की आमद ज्यादा से ज्यादा हो,लेकिन हमने कुछ नियम भी बना रखे हैं, जो लगता है कि धीरे-धीरे हमारे पाठकों/श्रोताओं के मानस-पटल से उतरते जा रहे हैं।

तो नियम यह था कि महफ़िल में वही शेर(बस शेर, गज़ल नहीं) पेश किए जाएँ, जिसमें उस दिन की पहेली का शब्द आता हो। गज़लों को पेश करने से दिक्कत यह आती है कि न आप उस गज़ल को समझ(पढ) पाते हैं और ना हम हीं। फिर इसका क्या फ़ायदा। एक बात और.. अगर आप २५-३० गज़लें या शेर लेकर महफ़िल में आएँगे तो सोचिए बाकियों का क्या हाल होगा। बाकी लोग तो अपनी झोली खाली देखकर निराश होकर लौट जाएँगे। हम ऐसा भी तो नहीं चाहते। इसलिए आज हम एक और नियम जोड़ते हैं कि महफ़िल में आया हरेक रसिक ज्यादा से ज्यादा १० हीं शेर पेश करे, उससे ज्यादा नहीं। उम्मीद करते हैं कि आप सभी सुधी पाठकजन हमारी इस मिन्नत का बुरा नहीं मानेंगे।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, August 25, 2009

खुद-बखुद नींद आ जाएगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे...... तलत अज़ीज़ साहब की एक और फ़रियाद

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३९

ज का अंक शुरू करने से पहले हम पिछले अंक में की गई एक गलती के लिए माफ़ी माँगना चाहेंगे। यह माफ़ी सिर्फ़ एक इंसान से है और उस इंसान का नाम है "शरद जी"। दर-असल पिछले अंक में हमने आपको जनाब अतर नफ़ीस की लिखी जो नज़्म सुनाई थी, वह है तो यूँ बड़ी हीं खुबसूरत, लेकिन उसकी फ़रमाईश शरद जी ने नहीं की थी। हुआ यूँ कि शरद जी की पसंद की तीन गज़लें/नज़्में और "आज जाने की ज़िद न करो" एक हीं जगह संजो कर रखी हुई थी, अब उस फ़ेहरिश्त से दो गज़लें हम आपको पहले हीं सुना चुके थे तो तीसरे के रूप में हमारी नज़र "आज जाने की ज़िद न करो" पर पड़ी और जल्दीबाजी में आलेख उसी पर तैयार हो गया। चलिए माना कि हमने इस नाम से नज़्म पोस्ट कर दी कि यह शरद जी की पसंद की है, लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि खुद शरद जी ने इस गलती की शिकायत नहीं की। शायद वो कहीं अन्यत्र व्यस्त थे या फिर वो खुद हीं भूल चुके थे कि उन्होंने किन गज़लों की फ़रमाईश की थी। जो भी हो, लेकिन यह गलती हमारी नज़र से छिप नहीं सकी और इसलिए हमने यह फ़ैसला किया है कि महफ़िल-ए-गज़ल की ४०वीं कड़ी (जो यूँ भी फ़रमाईश की गज़लों की अंतिम कड़ी होनी थी) में हम शरद जी की पसंद की अंतिम गज़ल/नज़्म पेश करेंगे। तो यह तो हुई पिछली और अगली कड़ी की बात, अब हम आज की कड़ी की ओर रूख करते हैं। आज की कड़ी सुपूर्द है दिशा जी की पसंद की आखिरी गज़ल के। आज हम जो गज़ल लेकर यहाँ पेश हुए हैं,उसे इस गज़ल के फ़नकार अपनी श्रेष्ठ १६ गज़लों में स्थान देते हैं। उस गज़ल की बात करने से पहले हम उस एलबम की बात करते हैं जिसमें "तलत अज़ीज़" साहब(जी हाँ, आज की गज़ल को अपनी सुमधुर आवाज़ और दिलकश संगीत से इन्होंने हीं सजाया है) की श्रेष्ठ १६ गज़लों का समावेश किया गया है। उस एलबम का नाम है "इरशाद" । हम यहाँ इस एलबम की सारी गज़लों के नाम तो पेश नहीं कर सकते लेकिन दो गज़लें ऐसी हैं, जिसके साथ तलत साहब की कुछ विशे्ष यादें जुड़ी हीं, वो बातें हम आपके साथ जरूर शेयर करना चाहेंगे।

उसमें से पहली गज़ल है क़तील शिफ़ाई साहब की लिखी हुई "बरसात की भींगी रातों में"। खुद तलत साहब के शब्दों में: १९८३ की बात है, मैं एक प्राईवेट पार्टी में यह गज़ल गा रहा था। जब मेरा गाना खत्म हुआ तो एक शख्स मेरे पास आए और मुझसे लिपट कर रोने लगे। इस गाने ने उनके अंदर छुपे शायद किसी दर्द को छु लिया था। जब वो चले गए तो मैने किसी से उनके बारे में पूछा तो पता चला कि वो चर्चित फिल्म निर्देशक महेश भट्ट थे। उस घटना के कुछ दिनों बाद हम एक फ़्लाईट में मिलें तो उन्होंने बताया कि यह उनकी बेहद पसंदीदा गज़ल है। उसके बाद हमारा रिश्ता कुछ ऐसा बन गया कि उन्होंने हीं मेरी होम प्रोडक्शन फिल्म "धुन" डाइरेक्ट की और उनकी फिल्म "डैडी" का मैं एकमात्र मेल सिंगर था। मैने उनके लिए "गुमराह" में भी गाया है। इस गज़ल के बाद चलिए अब बात करते हैं आज की गज़ल की। आज की गज़ल के बारे में तलत साहब की राय इसलिए भी लाजिमी हो जाती है क्योंकि उनके कुछ वाक्यों के अलावा इस गज़ल के गज़लगो के बारे में कहीं भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। तलत साहब अपने इन वाक्यों के सहारे हमें उस शख्स से रूबरू कराते हैं जो उनका फ़ैन भी है तो एक शायर भी, फ़ैन शायद बहुत बड़ा है, लेकिन शायर छोटा-मोटा। आप खुद देखिए कि तलत साहब क्या कहते हैं। यह गज़ल "खुबसूरत हैं आँखें तेरी" मेरी एलबम "शाहकार" के माध्यम से लोगों के सामने पहली मर्तबा हाज़िर हुई थी। अदब, अदीबों और नवाबों के शहर लखनऊ का एक बांका छोरा था, जिसका नाम था "हसन काज़मी" और जो अपने आप को मेरा बहुत बड़ा फ़ैन कहता था, शौकिया शायरी भी किया करता था। जब भी मैं लखनऊ किसी मुशायरे के लिए जाता तो वह वहाँ जरूर मौजूद होता था, मुझसे मिलता भी था और कभी-कभार अपनी लिखी नज़्मों और गज़लों को मुझे सुना जाता। मैने उसकी गज़ल "खुबसूरत हैं आँखें तेरी" के लिए एक धुन भी तैयार की थी लेकिन आगे चलकर यह बात मेरे जहन से उतर गई थी। कई साल बाद जब हम "शाहकार" पर काम कर रहे थे तो मैने "वीनस" के "चंपक जी" से इस गज़ल का जिक्र किया। "चंपक जी" को यह गज़ल बेहद पसंद आई और उन्होंने इस गज़ल को न सिर्फ़ लीड में रखने का फ़ैसला किया बल्कि इस गज़ल का विडियो भी तैयार किया गया। इस तरह यह गज़ल मेरे पसंदीदा गज़लों में शुमार हो गई।

वैसे तो हमने आपसे यह कहा था कि "इरशाद" एलबम से ली गई दो गज़लों से जुड़ी मजेदार बातें आपसे शेयर करेंगे लेकिन अगर तीसरी की भी बात हो जाए तो क्या बुरा है। हाँ तो जिस तीसरी गज़ल की हम बात कर रहे हैं उसे संगीत से सजाया है खैय्याम साहब ने। गज़ल के बोल हैं "ज़िंदगी जब भी"। इस गज़ल के बारे में तलत साहब कहते हैं: खैय्याम साहब एक पर्फ़ेंक्शनिस्ट हैं। यह गज़ल जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, वह उमराव जान फिल्म की बड़ी हीं मासूम गज़ल है। इस गाने की एक पंक्ति "सुर्ख फूलों से महक उठती हुई" में खैय्याम साहब खालिस लखनवी अंदाज की तलब रखते थे और मैं ठहरा हैदराबादी। नहीं चाहते हुए भी हर बार "फूलों" हैदराबादी अंदाज़ में ही आ रहा था। बड़ी कोशिशों के बाद मैं लखनवी अंदाज हासिल कर पाया। फिर भी आज तक मुझे इस गज़ल में अपनी गायकी अपने स्तर से कम की लगती है, जबकि खैय्याम साहब कहते हैं कि कोई गड़बड़ नहीं है। खैय्याम साहब यूँ हीं तो यकीं नहीं रखते, कुछ तो है इस गज़ल में कि आज भी यह गज़ल बड़ी हीं प्रचलित है और लोगों के जुबान पर ठहरी हुई है। जानकारी के लिए बता दूँ कि खैय्याम साहब का १९९० में निधन हो चला है। और इससे यह भी जाहिर होता है जो भी बातें हमने यहाँ पेश की है, वो सब बीसियों साल पुरानी है। चूँकि हमारे पास आज की गज़ल के गज़लगो के बारे में कोई भी खास जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए उनका लिखा कोई दूसरा शेर (जो इस गज़ल में मौजूद न हो) हम पेश नहीं कर सकते। इसलिए अच्छा यह होगा कि हम सीधे आपको आज की गज़ल से मुखातिब करा दें। तो लीजिए पेश है आज की गज़ल.....सुनिए और डूब जाईये शब्दों की मदहोशी में। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

खुबसूरत हैं आँखें तेरी, रात को जागना छोड़ दे,
खुद-बखुद नींद आ जाएगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे।

तेरी आँखों से कलियाँ खिलीं, तेरी आँचल से बादल उड़ें,
देख ले जो तेरी चाल को, मोर भी नाचना छोड़ दे।

तेरी अंगड़ाईयों से मिलीं जहन-ओ-दिल को नई रोशनी,
तेरे जलवों से मेरी नज़र किस तरह खेलना छोड़ दे?

तेरी आँखों से छलकी हुई जो भी एक बार पी ले अगर,
फिर वो मैखार ऐ साकिया, जाम हीं माँगना छोड़ दे।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

क्यों डरें ज़िंदगी में क्या होगा,
कुछ न होगा तो ______ होगा....


आपके विकल्प हैं -
a) करिश्मा, b) तजुर्बा, c) क्या मज़ा, d) बेमज़ा

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "गिलास" और शेर कुछ यूं था -

मुझे पिला रहे थे वो कि खुद ही शम्मा बुझ गयी,
गिलास गुम, शराब गुम, बड़ी हसीन रात थी....

इस शेर को सबसे पहले सही पहचना सीमा जी ने और उन्होंने कुछ शेर भी पेश किए:

जो रंग भरदो उसी रंग मे नज़र आए
ये ज़िंदगी न हुई काँच का गिलास हुआ

ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें
चटके हुए गिलास को ज्यादा न दाबिए।

यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम करे दे

छिलेगा हाथ तुम्हारा ज़रा-सी ग़फ़लत पर
कि घर में काँच का टूटा गिलास मत रखना.

शामिख साहब हर बार की तरह उस गज़ल को ढूँढ लाए जिससे यह शेर लिया हुआ था। उसके बाद उन्होंने "गिलास" शब्द से जुड़े कई सारे शेर पेश किए। बानगी देखिए:

जो रंग भरदो उसी रंग मे नज़र आए
ये ज़िंदगी न हुई काँच का गिलास हुआ

यहाँ लिबास, की क़मीत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

मैखाने की मस्ती में हम डूबते कैसे
नज़रों के नशे से भरा गिलास नहीं था

एक त्रिवेणी भी:
धौंकते सीनो से, पेशानी के पसीनो से
लड़ -लड़कर सूरज से जो जमा किया था

एक गिलास मे भरकर पी गया पूरा दिन।

मंजु जी स्वरचित दो शेरों के साथ महफ़िल में हाज़िर हुईं। उनके शेर कुछ यूँ थे:

१-मधुशाला में जब टकराते गिलास .
सारा जमाना होता कदमों के पास .
२-जब पिए थे गिलास भुला दिया था तुझे .
झूम रहा था मयखाना अफसाना बने .

नीलम जी ने जहाँ शामिख साहब की टिप्पणी से उठाकर शेर पेश किया तो वहीं सुमित जी थोड़े पशोपेश में नज़र आए। कोई बात नहीं महफ़िल में आप दोनों की उपस्थिति हीं पर्याप्त है।
चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, August 4, 2009

कैसे छुपाऊँ राज़-ए-ग़म...आज की महफ़िल में पेश हैं "मौलाना" के लफ़्ज़ और दर्द-ए-"अज़ीज़"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३५

पिछली महफ़िल में किए गए एक वादे के कारण शरद जी की पसंद की तीसरी गज़ल लेकर हम हाज़िर न हो सके। आपको याद होगा कि पिछली महफ़िल में हमने दिशा जी की पसंद की गज़लों का ज़िक्र किया था और कहा था कि अगली गज़ल दिशा जी की फ़ेहरिश्त से चुनी हुई होगी। लेकिन शायद समय का यह तकाज़ा न था और कुछ मजबूरियों के कारण हम उन गज़लों/नज़्मों का इंतजाम न कर सके। अब चूँकि हम वादाखिलाफ़ी कर नहीं सकते थे, इसलिए अंततोगत्वा हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि क्यों न आज अपने संग्रहालय में मौजूद एक गज़ल हीं आप सबके सामने पेश कर दी जाए। हमें पूरा यकीन है कि अगली महफ़िल में हम दिशा जी को निराश नहीं करेंगे। और वैसे भी हमारी आज़ की गज़ल सुनकर उनकी नाराज़गी पल में छू हो जाएगी, इसका हमें पूरा विश्वास है। तो चलिए हम रूख करते हैं आज़ की गज़ल की ओर जिसे मेहदी हसन साहब की आवाज़ में हम सबने न जाने कितनी बार सुना है लेकिन आज़ हम जिन फ़नकार की आवाज़ में इसे आप सबके सामने पेश करने जा रहे हैं, उनकी बात हीं कुछ अलग है। आप सबने इनकी मखमली आवाज़ जिसमें दर्द का कुछ ज्यादा हीं पुट है, को फिल्म डैडी के "आईना मुझसे मेरी पहली-सी सूरत माँगे" में ज़रूर हीं सुना होगा। उसी दौरान की "वफ़ा जो तुमसे कभी मैने निभाई होती", "फिर छिड़ी बात रात फूलों की", "ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में" या फिर "ना किसी की आँख का" जैसी नज़्मों में इनकी आवाज़ खुलकर सामने आई है। मेहदी हसन साहब के शागिर्द इन महाशय का नाम पंकज़ उधास और अनूप जलोटा की तिकड़ी में सबसे ऊपर लिया जाता है। ९० के दशक में जब गज़लें अपने उत्तरार्द्ध पर थी, तब भी इन फ़नकारों के कारण गज़ल के चाहने वालों को हर महीने कम से कम एक अच्छी एलबम सुनने को ज़रूर हीं नसीब हो जाया करती थीं।

जन्म से "तलत अब्दुल अज़ीज़ खान" और फ़न से "तलत अज़ीज़" का जन्म १४ मई १९५५ को हैदराबाद में हुआ था। इनकी माँ साजिदा आबिद उर्दू की जानीमानी कवयित्री और लेखिका थीं, इसलिए उर्दू अदब और अदीबों से इनका रिश्ता बचपन में हीं बंध गया था। इन्होंने संगीत की पहली तालीम "किराना घराना" से ली थी, जिसकी स्थापना "अब्दुल करीम खान साहब" के कर-कलमों से हुई थी। उस्ताद समाद खान और उस्ताद फ़याज़ अहमद से शिक्षा लेने के बाद इन्होंने मेहदी हसन की शागिर्दगी करने का फ़ैसला लिया और उनके साथ महफ़िलों में गाने लगे। शायद यही कारण है कि मेहदी साहब द्वारा गाई हुई अमूमन सारी गज़लों के साथ इन्होंने अपने गले का इम्तिहान लिया हुआ है। हैदराबाद के "किंग कोठी" में इन्होंने सबसे पहला बड़ा प्रदर्शन किया था। लगभग ५००० श्रोताओं के सामने इन्होंने जब "कैसे सुकूं पाऊँ" गज़ल को अपनी आवाज़ से सराबोर किया तो मेहदी हसन साहब को अपने शागिर्द की फ़नकारी पर यकीन हो गया। स्नातक करने के बाद ये मुंबई चले आए जहाँ जगजीत सिंह से इनकी पहचान हुई। कुछ हीं दिनों में जगजीत सिंह भी इनकी आवाज़ के कायल हो गए और न सिर्फ़ इनके संघर्ष के साथी हुए बल्कि इनकी पहली गज़ल के लिए अपना नाम देने के लिए भी राज़ी हो गए। "जगजीत सिंह प्रजेंट्स तलत अज़ीज़" नाम से इनकी गज़लों की पहली एलबम रीलिज हुई। इसके बाद तो जैसे गज़लों का तांता लग गया। तलत अज़ीज़ यूँ तो जगजीत सिंह के जमाने के गायक हैं, लेकिन इनकी गायकी का अंदाज़ मेहदी हसन जैसे क्लासिकल गज़ल-गायकी के पुरोधाओं से मिलता-जुलता है। आज की गज़ल इस बात का साक्षात प्रमाण है। लगभग १२ मिनट की इस गज़ल में बस तीन हीं शेर हैं, लेकिन कहीं भी कोई रूकावट महसूस नहीं होती, हरेक लफ़्ज़ सुर और ताल में इस कदर लिपटा हुआ है कि क्षण भर के लिए भी श्रवणेन्द्रियाँ टस से मस नहीं होतीं। आज तो हम एक हीं गज़ल सुनवा रहे हैं लेकिन आपकी सहायता के लिए इनकी कुछ नोटेबल एलबमों की फ़ेहरिश्त यहाँ दिए देते हैं: "तलत अज़ीज़ लाईव" , "इमेजेज़", "बेस्ट आफ़ तलत अज़ीज़", "लहरें", "एहसास", "सुरूर", "सौगात", "तसव्वुर", "मंज़िल", "धड़कन", "शाहकार", "महबूब", "इरशाद", "खूबसूरत" और "खुशनुमा"। मौका मिले तो इन गज़लों का लुत्फ़ ज़रूर उठाईयेगा... नहीं तो हम हैं हीं।

चलिए अब गुलूकार के बाद शायर की तरफ़ रूख करते हैं। इन शायर को अमूमन लोग प्रेम का शायर समझते हैं, लेकिन प्रोफ़ेसर शैलेश ज़ैदी ने इनका वह रूप हम सबके सामने रखा है, जिससे लगभग सभी हीं अपरिचित थे। ये लिखते हैं: भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में हसरत मोहानी (१८७५-१९५१) का नाम भले ही उपेक्षित रह गया हो, उनके संकल्पों, उनकी मान्यताओं, उनकी शायरी में व्यक्त इन्क़लाबी विचारों और उनके संघर्षमय जीवन की खुरदरी लयात्मक आवाजों की गूंज से पूर्ण आज़ादी की भावना को वह ऊर्जा प्राप्त हुई जिसकी अभिव्यक्ति का साहस पंडित जवाहर लाल नेहरू नौ वर्ष बाद १९२९ में जुटा पाये. प्रेमचंद ने १९३० में उनके सम्बन्ध में ठीक ही लिखा था "वे अपने गुरु (बाल गंगाधर तिलक) से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी का डंका बजाया, जब कांग्रेस का गर्म-से-गर्म नेता भी पूर्ण स्वराज का नाम लेते काँपता था. मुसलमानों में गालिबन हसरत ही वो बुजुर्ग हैं जिन्होंने आज से पन्द्रह साल क़ब्ल, हिन्दोस्तान की मुकम्मल आज़ादी का तसव्वुर किया था और आजतक उसी पर क़ायम हैं. नर्म सियासत में उनकी गर्म तबीअत के लिए कोई कशिश और दिलचस्पी न थी" हसरत मोहानी ने अपने प्रारंभिक राजनीतिक दौर में ही स्पष्ट घोषणा कर दी थी "जिनके पास आँखें हैं और विवेक है उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि फिरंगी सरकार का मानव विरोधी शासन हमेशा के लिए भारत में क़ायम नहीं रह सकता. और वर्त्तमान स्थिति में तो उसका चन्द साल रहना भी दुशवार है." स्वराज के १२ जनवरी १९२२ के अंक में हसरत मोहनी का एक अध्यक्षीय भाषण दिया गया है. यह भाषण हसरत ने ३० दिसम्बर १९२१ को मुस्लिम लीग के मंच से दिया था- "भारत के लिए ज़रूरी है कि यहाँ प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली अपनाई जाय. पहली जनवरी १९२२ से भारत की पूर्ण आज़ादी की घोषणा कर दी जाय और भारत का नाम 'यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया' रखा जाय." ध्यान देने की बात ये है कि इस सभा में महात्मा गाँधी, हाकिम अजमल खां और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे दिग्गज नेता उपस्थित थे. सच्चाई यह है कि हसरत मोहानी राजनीतिकों के मस्लेहत पूर्ण रवैये से तंग आ चुके थे. एक शेर में उन्होंने अपनी इस प्रतिक्रिया को व्यक्त भी किया है-

लगा दो आग उज़रे-मस्लेहत को
के है बेज़ार अब इस से मेरा दिल

हसरत मोहानी का मूल्यांकन भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में अभी नहीं हुआ है. किंतु मेरा विश्वास है कि एक दिन उन्हें निश्चित रूप से सही ढंग से परखा जाएगा.
जनाब हसरत मोहानी का दिल जहाँ देश के लिए धड़कता था, वहीं माशुका के लिए भी दिल का एक कोना उन्होंने बुक कर रखा था तभी तो वे कहते हैं कि:

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।


उन्नाव के पास मोहान में जन्मे "सैयद फ़ज़ल उल हसन" यानि कि मौलाना हसरत मोहानी ने बँटवारे के बाद भी हिन्दुस्तान को हीं चुना और मई १९५१ में लखनऊ में अपनी अंतिम साँसें लीं। ऐसे देशभक्त को समर्पित है हमारी आज़ की महफ़िल-ए-गज़ल। मुलाहज़ा फ़रमाईयेगा:

कैसे छुपाऊं राजे-ग़म, दीदए-तर को क्या करूं
दिल की तपिश को क्या करूं, सोज़े-जिगर को क्या करूं

शोरिशे-आशिकी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूं

ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूं बसर
सब ये कुबूल है मगर, खौफे-सेहर को क्या करूं

हां मेरा दिल था जब बतर, तब न हुई तुम्हें ख़बर
बाद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

अपनी तबाहियों का मुझे कोई __ नहीं,
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी...


आपके विकल्प हैं -
a) दुःख, b) रंज, c) गम, d) मलाल

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "रूह" और शेर कुछ यूं था -

रुह को दर्द मिला, दर्द को ऑंखें न मिली,
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं।

इस शब्द पर सबसे पहले मुहर लगाई दिशा जी ने, लेकिन सबसे पहले शेर लेकर हाज़िर हुए सुजाय जी। सुजाय जी आपका हमारी महफ़िल में स्वागत है, लेकिन यह क्या रोमन में शेर...देवनागरी में लिखिए तो हमें भी आनंद आएगा और आपको भी।

अगले प्रयास में दिशा जी ने यह शेर पेश किया:

काँप उठती है रुह मेरी याद कर वो मंजर
जब घोंपा था अपनों ने ही पीठ में खंजर

शरद जी का शेर कुछ यूँ था:

हरेक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे,
ए ज़िन्दगी तू कोई बददुआ लगे है मुझे।

हर बार की तरह इस बार भी शामिख जी ने हमें शायर के नाम से अवगत कराया। इसके साथ-साथ मुजफ़्फ़र वारसी साहब की वह गज़ल भी प्रस्तुत की जिससे यह शेर लिया गया है:

मेरी तस्वीर में रंग और किसी का तो नहीं
घेर लें मुझको सब आ के मैं तमाशा तो नहीं

ज़िन्दगी तुझसे हर इक साँस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझको मगर इतना तो नहीं

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिली
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा
ज़हन की तह में 'मुज़फ़्फ़र' कोई दरिया तो नही.

शामिख साहब, आपका किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ! गज़ल के साथ-साथ आपने ’रूह’ शब्द पर यह शेर भी हम सबके सामने रखा:

हम दिल तो क्या रूह में उतरे होते
तुमने चाहा ही नहीं चाहने वालों की तरह

’अदा’ जी वारसी साहब के रंग में इस कदर रंग गईं कि उन्हें ’रूह’ लफ़्ज़ का ध्यान हीं नहीं रहा। खैर कोई बात नहीं, आपने इसी बहाने वारसी साहब की एक गज़ल पढी जिससे हमारी महफ़िल में चार चाँद लग गए। उस गज़ल से एक शेर जो मुझे बेहद पसंद है:

सोचता हूँ अब अंजाम-ए-सफ़र क्या होगा
लोग भी कांच के हैं राह भी पथरीली है

रचना जी, मंजु जी और सुमित जी का भी तह-ए-दिल से शुक्रिया। आप लोग जिस प्यार से हमारी महफ़िल में आते है, देखकर दिल को बड़ा हीं सुकूं मिलता है। आप तीनों के शेर एक हीं साँस में पढ गया:

नाम तेरा रूह पर लिखा है मैने
कहते हैं मरता है जिस्म रूह मरती नहीं।
रूह काँप जाती है देखकर बेरुखी उनकी
अरे! कब आबाद होगी दिल लगी उनकी।
रूह को शाद करे,दिल को जो पुरनूर करे,
हर नज़ारे में ये तन्जीर कहाँ होती है।

मनु जी, आप तो गज़लों के उस्ताद हैं। शेर कहने का आपका अंदाज़ औरों से बेहद अलहदा होता है। मसलन:

हर इक किताब के आख़िर सफे के पिछली तरफ़
मुझी को रूह, मुझी को बदन लिखा होगा

कुलदीप जी ने जहाँ वारसी साहब की एक और गज़ल महफ़िल-ए-गज़ल के हवाले की, वहीं जॉन आलिया साहब का एक शेर पेश किया, जिसमें रूह आता है:

रूह प्यासी कहां से आती है
ये उदासी कहां से आती है।

शामिख साहब के बाद कुलदीप जी धीरे-धीरे हमारी नज़रों में चढते जा रहे हैं। आप दोनों का यह हौसला देखकर कभी-कभी दिल में ख्याल आता है कि क्यों न महफ़िल-ए-गज़ल की एक-दो कड़ियाँ आपके हवाले कर दी जाएँ। क्या कहते हैं आप। कभी इस विषय पर आप दोनों से अलग से बात करेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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