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Sunday, February 16, 2014

बसन्त ऋतु और राग बसन्त बहार SWARGOSHTHI – 155


स्वरगोष्ठी – 155 में आज

ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन राग बसन्त बहार से

‘माँ बसन्त आयो री...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, पिछली दो कड़ियों से हम आपसे बसन्त ऋतु के रागों की चर्चा कर रहे हैं। बसन्त ऋतु में मुख्य रूप से राग बसन्त और राग बहार गाया-बजाया जाता है। परन्तु इन दोनों रागों के मेल से एक तीसरे राग ‘बसन्त बहार’ की सृष्टि भी होती है, जिसमें राग का स्वतंत्र अस्तित्व भी रहता है और दोनों रागों की छाया भी परिलक्षित होती है। दोनों रागों के सन्तुलित प्रयोग से राग ‘बसन्त बहार’ का वास्तविक सौन्दर्य निखरता है। कभी-कभी समर्थ कलासाधक प्रयुक्त दोनों रागों में से किसी एक को प्रधान बना कर दूसरे का स्पर्श देकर प्रस्तुति को एक नया रंग दे देते हैं। आज के अंक में हम पहले इस राग का एक अप्रचलित तंत्रवाद्य विचित्र वीणा पर वादन प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद अनूठे समूहगान के रूप में 2750 गायक-गायिकाओं के समवेत स्वर में राग बसन्त बहार की प्रस्तुति होगी। आज की इस कड़ी के अन्त में राग बसन्त बहार पर आधारित एक ऐतिहासिक फिल्मी गीत की प्रस्तुति भी की जाएगी जिसे पण्डित भीमसेन जोशी और मन्ना डे ने स्वर दिया था। 



ज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम राग बसन्त बहार पर चर्चा करेंगे। यद्यपि बसन्त ऋतु के मुख्य राग बसन्त और बहार हैं, किन्तु इन दोनों रागों के मेल से सृजित राग बसन्त बहार भी ऋतु का परिवेश रचने में समर्थ है। आज सबसे पहले हम आपको एक प्राचीन और लुप्तप्राय तंत्रवाद्य विचित्रवीणा पर राग ‘बसन्त बहार’ सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत किया है, बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलासाधक, शिक्षक और शोधकर्त्ता डॉ. लालमणि मिश्र ने। कृतित्व से पूर्व इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व को रेखांकित करना आवश्यक है।

डॉ. लालमणि मिश्र का जन्म 11 अगस्त, 1924 को कानपुर के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पाँच वर्ष की आयु में उन्हें स्कूल भेजा गया किन्तु 1930 में कानपुर के भीषण दंगों के कारण न केवल इनकी पढ़ाई छूटी बल्कि इनके पिता का व्यवसाय भी बर्बाद हो गया। परिवार को सुरक्षित बचाकर इनके पिता कलकत्ता (अब कोलकाता) आ गए। कोलकाता में बालक लालमणि की माँ को संगीत की शिक्षा प्रदान करने कथावाचक पण्डित गोबर्धन लाल घर आया करते थे। एक बार माँ को सिखाए गए 15 दिन के पाठ को यथावत सुना कर उन्होने पण्डित जी को चकित कर दिया। उसी दिन से लालमणि की विधिवत संगीत शिक्षा आरम्भ हो गई। पण्डित गोबर्धन लाल से उन्हें ध्रुवपद और भजन का ज्ञान मिला तो हारमोनियम वादक और शिक्षक विश्वनाथप्रसाद गुप्त से हारमोनियम बजाना सीखा। ध्रुवपद-धमार की विधिवत शिक्षा पण्डित कालिका प्रसाद से खयाल की शिक्षा रामपुर सेनिया घराने के उस्ताद वज़ीर खाँ के शिष्य मेंहदी हुसेन खाँ से मिली। बिहार के मालिक घराने के शिष्य पण्डित शुकदेव राय से सितार वादन की तालीम मिली। मात्र 16 वर्ष की आयु में मुंगेर, बिहार के एक रईस परिवार के बच्चों के संगीत-शिक्षक बन गए। 1944 में कानपुर के कान्यकुब्ज कालेज में संगीत-शिक्षक नियुक्त हुए। इसी वर्ष सुप्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक उस्ताद अब्दुल अज़ीज खाँ (पटियाला) के वाद्य विचित्र वीणा से प्रभावित होकर उन्हीं से शिक्षा ग्रहण की और 1950 में लखनऊ के भातखण्डे जयन्ती समारोह में इस वाद्य को बजा कर विद्वानो की प्रशंसा अर्जित की। लालमणि जी 1951 में उदयशंकर के दल में बतौर संगीत निर्देशक नियुक्त हुए और 1954 तक देश-विदेश का भ्रमण किया। 1951 में कानपुर के गाँधी संगीत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य बने। 1958 में पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के आग्रह पर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय में वाद्य विभाग के रीडर पद पर सुशोभित हुए और यहीं डीन और विभागाध्यक्ष भी हुए। संगीत की हर विधा में पारंगत पण्डित लालमणि मिश्र ने अपनी साधना और शोध के बल पर अपनी एक अलग शैली विकसित की जिसे ‘मिश्रवाणी’ के नाम से स्वीकार किया गया। 17 जुलाई, 1979 को मात्र 55 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था। आइए अब पण्डित लालमणि मिश्र से सुनते हैं, राग बसन्त बहार-


राग बसन्त बहार : विचित्र वीणा : डॉ. लालमणि मिश्र



बसन्त ऋतु का अत्यन्त मोहक राग ‘बसन्त बहार’ दो रागों के मेल से बना है। कुछ विद्वान इसे ‘छायालग राग’ कहते हैं। आम तौर पर इस राग के आरोह में बहार और अवरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यदि आरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो इसे पूर्वांग प्रधान रूप देना आवश्यक है। षडज से मध्यम तक दोनों रागों के स्वर समान होते हैं, तथा मध्यम के बाद के स्वर दोनों रागों में अन्तर कर देते हैं। राग ‘बसन्त बहार’ दो प्रकार से प्रचलन में है। यदि बसन्त को प्रमुखता देनी हो तो इसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत लेना चाहिए। ऐसे में वादी स्वर षडज और संवादी पंचम हो जाता है। काफी थाट के अन्तर्गत लेने पर राग बहार प्रमुख हो जाता है और वादी मध्यम और संवादी षडज हो जाता है। अन्य ऋतुओं में इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु बसन्त ऋतु में इसका प्रयोग किसी भी समय किया जा सकता है।

आज की इस संगीत-गोष्ठी में हम आपको राग ‘बसन्त बहार’ की एक और अनूठी प्रस्तुति सुनवा रहे हैं। दो वर्ष पूर्व पुणे में एक महत्वाकांक्षी सांगीतिक अनुष्ठान आयोजित हुआ था। सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी के सान्निध्य में देश भर से आमंत्रित 2750 शास्त्रीय गायक कलासाधकों ने जाने-माने गायक बन्धु पण्डित राजन और साजन मिश्र के नेतृत्व में राग ‘बसन्त बहार’ और तीनताल में निबद्ध एक बन्दिश समवेत स्वर में प्रस्तुत किया गया था। यह प्रस्तुति ‘अन्तर्नाद’ संस्था की थी, जिसके लिए 27,000 वर्गफुट आकार का मंच बनाया गया था। आकाश तक गूँजती यह रचना बनारस के संगीतज्ञ पण्डित बड़े रामदास की है। आइए इसी अनूठी प्रस्तुति का रसास्वादन करते हैं।


राग बसन्त बहार : ‘माँ बसन्त आयो री...’ : पण्डित राजन-साजन मिश्र व 2750 स्वर 



राग बसन्त बहार पर आधारित आज का फिल्मी गीत हमने 1956 में प्रदर्शित, राग के नाम पर ही रखे गए शीर्षक अर्थात फिल्म ‘बसन्त बहार’ से लिया है। यह एक संगीत-प्रधान फिल्म थी, जिसके संगीतकार शंकर-जयकिशन थे। राग आधारित गीतों की रचना फिल्म के कथानक की माँग भी थी और उस दौर में इस संगीतकार जोड़ी के लिए चुनौती भी। शंकर-जयकिशन ने शास्त्रीय संगीत के दो दिग्गजों- पण्डित भीमसेन जोशी और सारंगी के सरताज पण्डित रामनारायण को यह ज़िम्मेदारी सौंपी। पण्डित भीमसेन जोशी ने फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र को राग बसन्त की एक पारम्परिक बन्दिश गाकर सुनाई और शैलेन्द्र ने 12 मात्रा के ताल पर शब्द रचे। पण्डित जी के साथ पार्श्वगायक मन्ना डे को भी गाना था। मन्ना डे ने जब यह सुना तो पहले उन्होने मना किया, लेकिन बाद में राजी हुए। इस प्रकार भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास इतिहास में एक अविस्मरणीय गीत दर्ज़ हुआ। शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में फिल्म के शीर्षक के अनुरूप यह गीत राग 'बसन्त बहार' पर आधारित है। गीतकार शैलेन्द्र की यह रचना है। इस फिल्म में उस समय के सर्वाधिक चर्चित और सफल अभिनेता भारतभूषण नायक थे और निर्माता थे आर. चन्द्रा। संगीतकार शंकर-जयकिशन ने फिल्म के अधिकतर गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित रखे थे। इससे पूर्व भारतभूषण की कई फिल्मों में मोहम्मद रफ़ी उनके लिए सफल गायन कर चुके थे। शशि भारतभूषण के भाई शशिभूषण इस फिल्म में मोहम्मद रफ़ी को ही लेने का आग्रह कर रहे थे, जबकि फिल्म निर्देशक मयप्पन मुकेश से गवाना चाहते थे। यह बात जब शंकर जी को मालूम हुआ तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि राग आधारित इन गीतों को मन्ना डे के अलावा और कोई गा ही नहीं सकता। यह विवाद इतना बढ़ गया कि शंकर-जयकिशन को इस फिल्म से हटने की धमकी तक देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी। फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के गाये गीत 'मील के पत्थर' सिद्ध हुए। आइए सुनते है, इस फिल्म का एक गीत ‘केतकी गुलाब जुही चम्पक बन फूले...’। यह गीत पण्डित भीमसेन जोशी और मन्ना डे की आवाज में प्रस्तुत है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म बसन्त बहार : ‘केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूलें...’ : पं. भीमसेन जोशी और मन्ना डे 




आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ की 155वीं संगीत पहेली में हम आपको वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – यह रचना सुन कर क्या आप वाद्य यंत्र को पहचान रहे हैं? यदि हाँ तो तत्काल हमें उसका नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 157वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ की 153वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित वी.जी. जोग के वायलिन वादन के एक पुराने रिकार्ड का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बहार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज का हमारा यह अंक बसन्त ऋतु के रागों पर केन्द्रित था। यह सिलसिला आगामी अंक में भी जारी रहेगा। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, July 21, 2013

पण्डित राजन-साजन मिश्र से सुनिए मियाँ की मल्हार

  
स्वरगोष्ठी – 129 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 9

राग मियाँ मल्हार पर आधारित एक अनूठा गीत-  
‘नाच मेरे मोर जरा नाच...’


इन दिनों ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक मंच ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’। इस श्रृंखला की नौवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस संगोष्ठी में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जो छः दशक से भी पूर्व के हैं। रागों के आधार के कारण ये गीत आज भी सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का हमारा उद्देश्य यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम उन भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपके लिए वर्षाकालीन राग मियाँ की मल्हार पर आधारित लगभग लुप्तप्राय एक फिल्मी गीत, इस गीत के विस्मृत संगीतकार शान्ति कुमार देसाई का परिचय और राग मियाँ की मल्हार में निबद्ध एक खयाल पण्डित राजन-साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। 


ल्हार अंग के रागों में राग मियाँ की मल्हार में वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने में भी यह राग समर्थ होता है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ की मल्हार’ कहा जाने लगा। फिल्मों के अनेक संगीतकारों ने इस राग में बेहद मनमोहक गीत रचे हैं। इन्हीं में से आज के अंक के लिए हमने 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘तेरे द्वार खड़ा भगवान’ का एक लगभग लुप्तप्राय गीत चुना है। फिल्म के संगीतकार शान्ति कुमार देसाई भी आज विस्मृत हो चुके हैं।

इस राग पर आधारित और वर्षाकालीन परिवेश का कल्पनाशील चित्रण करता आज का गीत हमने 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘तेरे द्वार खड़ा भगवान’ से चुना है। इस फिल्म की संगीत रचना शान्ति कुमार देसाई नामक एक ऐसे संगीतकार ने की थी, जिनके बारे में आज की पीढ़ी प्रायः अनजान ही है। 1934 में चुन्नीलाल पारिख द्वारा निर्देशित फिल्म ‘नवभारत’ से संगीतकार शान्ति कुमार देसाई का फिल्मों में पदार्पण हुआ था। उनके संगीत निर्देशन में कई देशभक्ति गीत अपने समय में बेहद लोकप्रिय हुए थे। शान्ति कुमार देसाई ने अधिकतर स्टंट और धार्मिक फिल्मों में संगीत रचनाएँ की थी। पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में नई धारा के वेग में उखड़ जाने वाले संगीतकारों में श्री देसाई भी थे। लगभग एक दशक तक गुमनाम रहने के बाद 1964 में फिल्म ‘तेरे द्वार खड़ा भगवान’ के गीतों में फिर एक बार उनकी प्रतिभा के दर्शन हुए। अभिनेता शाहू मोदक और अभिनेत्री सुलोचना अभिनीत इस फिल्म में शान्ति कुमार देसाई ने राग ‘मियाँ कि मल्हार’ के स्वरों में बेहद कर्णप्रिय गीत- ‘नाच मेरे मोर जरा नाच...’ की संगीत रचना की थी। वर्षाकालीन प्रकृति का मनमोहक चित्रण करते पण्डित मधुर के शब्दों को श्री देसाई ने सहज-सरल धुन में बाँधा था। पूरा गीत दादरा ताल में निबद्ध है, किन्तु अन्त में द्रुत लय के तीनताल का टुकड़ा गीत का मुख्य आकर्षण है। मींड और गमक से परिपूर्ण मन्नाडे के स्वर तथा सितार, ढोलक और बाँसुरी का प्रयोग भी गीत की गुणबत्ता को बढ़ाता है। आइए; सुनते हैं, राग ‘मियाँ की मल्हार’ पर आधारित फिल्म ‘तेरे द्वार खड़ा भगवान’ का यह गीत-


राग मियाँ मल्हार : फिल्म तेरे द्वार खड़ा भगवान : ‘नाच मेरे मोर जरा नाच...’ : संगीत शान्ति कुमार देसाई



राग मियाँ मल्हार काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इस राग के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। यह काफी थाट का और षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात; आरोह में छह और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह-अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है। राग ‘मियाँ की मल्हार’ के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की तथा विरह-पीड़ा हर लेने की अद्भुत क्षमता है। आइए, अब हम आपको विश्वविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में इसी राग में निबद्ध एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं। यह रचना द्रुत एकताल में है। आप इस भावपूर्ण गायन की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मियाँ मल्हार : ‘घनन घोर घोर घिर आए बदरवा...’ : पण्डित राजन-साजन मिश्र




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 129वीं संगीत पहेली में हम आपको तंत्र वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – यह एक ऐसे महान तंत्र वाद्य संगीतज्ञ की रचना है, जो वादन करते-करते प्रायः स्वयं गाने भी लगते थे। क्या आप हमें उस संगीतज्ञ का नाम बता सकते हैं?

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 131वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 127वीं संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद शाहिद परवेज़ द्वारा प्रस्तुत सितार पर झाला वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भूपाली और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- द्रुत तीनताल। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के अगले अंक में हम आपको एक और भूले-बिसरे संगीतकार का परिचय देते हुए उनका संगीतबद्ध एक मोहक गीत लेकर उपस्थित होंगे। आप भी हमारी आगामी कड़ियों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, November 18, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – ७


स्वरगोष्ठी – ९६ में आज
लौकिक और आध्यात्मिक भाव का बोध कराती ठुमरी


‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’


चौथे से लेकर छठें दशक तक की हिन्दी फिल्मों के संगीतकारों ने राग आधारित गीतों का प्रयोग कुछ अधिक किया था। उन दिनों शास्त्रीय मंचों पर या ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से जो बन्दिशें, ठुमरी, दादरा आदि बेहद लोकप्रिय होती थीं, उन्हें फिल्मों में कभी-कभी यथावत और कभी अन्तरे बदल कर प्रयोग किये जाते रहे। चौथे दशक के कुछ संगीतकारों ने फिल्मों में परम्परागत ठुमरियों का बड़ा स्वाभाविक प्रयोग किया था। फिल्मों में आवाज़ के आगमन के इस पहले दौर में राग आधारित गीतों के गायन के लिए सर्वाधिक यश यदि किसी गायक को प्राप्त हुआ, तो वह कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल ही थे। उन्होने १९३८ में प्रदर्शित ‘न्यू थियेटर’ की फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ गाकर उसे कालजयी बना दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में आप संगीत-प्रेमियों के बीच, मैं कृष्णमोहन मिश्र, भैरवी की इसी ठुमरी से जुड़े कुछ तथ्यों पर चर्चा करूँगा।

वध के नवाब वाजिद अली शाह संगीत-नृत्य-प्रेमी और कला-संरक्षक के रूप में विख्यात थे। नवाब १८४७ से १८५६ तक अवध के शासक रहे। उनके शासनकाल में ही ठुमरी एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी। नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की रचनाएँ भी की थी। इसके अलावा ‘अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी। राग खमाज का सादरा –‘सुध बिसर गई आज अपने गुनन की...’ तथा राग बहार का ख़याल –‘फूलवाले कन्त मैका बसन्त...’ उनकी बहुचर्चित रचनाएँ हैं। उनका राग खमाज का सादरा संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने राग हेमन्त में परिवर्तित कर फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में प्रयोग किया था। ७ फरवरी, १८५६ को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी –‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ में अभिव्यक्त हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को न गाया हो। १९३६ के लखनऊ संगीत सम्मलेन में जब उस्ताद फैयाज़ खाँ ने इस ठुमरी को गाया तो श्रोताओं की आँखों से आँसू निकल पड़े थे। इसी ठुमरी को पण्डित भीमसेन जोशी ने अनूठे अन्दाज़ में गाया, तो विदुषी गिरिजा देवी ने बोल-बनाव से इस ठुमरी का आध्यात्मिक पक्ष उभारा है। फिल्मों में भी इस ठुमरी के कई संस्करण उपलब्ध हैं। १९३८ में बनी फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' में कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी भैरवी सर्वाधिक लोकप्रिय हुई। आज सबसे हम प्रस्तुत कर रहे है, पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में यह ठुमरी।

ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी



चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत की उन रचनाओं को शामिल करने का चलन था जिन्हें संगीत के मंच पर अथवा ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से लोकप्रियता मिली हो। फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में इस ठुमरी को शामिल करने का उद्येश्य भी सम्भवतः यही रहा होगा। परन्तु किसे पता था कि लोकप्रियता की कसौटी पर यह फिल्मी संस्करण, मूल पारम्परिक ठुमरी की तुलना में कहीं अधिक चर्चित होगी। इस ठुमरी का साहित्य दो भावों की सृष्टि करता है। इसका एक लौकिक भाव है और दूसरा आध्यात्मिक। ठुमरी के लौकिक भाव के अन्तर्गत विवाह के उपरान्त बेटी की विदाई का प्रसंग और आध्यात्मिक भाव के अन्तर्गत मानव का नश्वर शरीर त्याग कर परमात्मा में विलीन होने का भाव स्पष्ट होता है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी ने इस ठुमरी के गायन में दोनों भावों की सन्तुलित अभिव्यक्ति दी है। आइए, सुनते हैं, उनके स्वर में यह भावपूर्ण ठुमरी।

ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : विदुषी गिरिजा देवी




फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में सहगल द्वारा प्रस्तुत इस ठुमरी को जहाँ अपार लोकप्रियता मिली, वहीं उन्होने इस गीत में दो बड़ी ग़लतियाँ भी की है। इस बारे में उदयपुर के ‘राजस्थान साहित्य अकादमी’ की पत्रिका ‘मधुमती’ में श्री कलानाथ शास्त्री का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसके कुछ अंश हम यहाँ अपने साथी शरद तैलंग के सौजन्य से प्रस्तुत कर रहे हैं। 

“बहुधा कुछ उक्तियाँ, फिकरे या उदाहरण लोककण्ठ में इस प्रकार समा जाते हैं कि कभी-कभी तो उनका आगा-पीछा ही समझ में नहीं आता, कभी यह ध्यान में नहीं आता कि वह उदाहरण ही गलत है, कभी उसके अर्थ का अनर्थ होता रहता है और पीढी-दर-पीढी हम उस भ्रान्ति को ढोते रहते हैं जो लोककण्ठ में आ बसी है। ‘देहरी भई बिदेस...’ भी ऐसा ही उदाहरण है जो कभी था नहीं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायक कुन्दनलाल सहगल द्वारा गायी गई कालजयी ठुमरी में भ्रमवश इस प्रकार गा दिये जाने के कारण ऐसा फैला कि इसे गलत बतलाने वाला पागल समझे जाने के खतरे से शायद ही बच पाये।


पुरानी पीढी के वयोवृद्ध गायकों को तो शायद मालूम ही होगा कि वाजिद अली शाह की सुप्रसिद्ध शरीर और आत्मा के प्रतीकों को लेकर लिखी रूपकात्मक ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ सदियों से प्रचलित है जिसके बोल लोककण्ठ में समा गये हैं– ‘चार कहार मिलि डोलिया उठावै मोरा अपना पराया छूटो जाय...’ आदि। उसमें यह भी रूपकात्मक उक्ति है– ‘देहरी तो परबत भई, अँगना भयो बिदेस, लै बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस...’। जैसे पर्वत उलाँघना दूभर हो जाता है वैसे ही विदेश में ब्याही बेटी से फिर देहरी नहीं उलाँघी जाएगी, बाबुल का आँगन बिदेस बन जाएगा। यही सही भी है, बिदेस होना आँगन के साथ ही फबता है, देहरी के साथ नहीं, वह तो उलाँघी जाती है, परबत उलाँघा नहीं जा सकता, अतः उसकी उपमा देहरी को दी गई। हुआ यह कि गायक शिरोमणि कुन्दनलाल सहगल किसी कारणवश बिना स्क्रिप्ट के अपनी धुन में इसे यूँ गा गये ‘अँगना तो पर्वत भया देहरी भई बिदेस...’ और उनकी गायी यह ठुमरी कालजयी हो गई। सब उसे ही उद्धृत करेंगे। बेचारे वाजिद अली शाह को कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि बीसवीं सदी में उसकी उक्ति का पाठान्तर ऐसा चल पड़ेगा कि उसे ही मूल समझ लिया जाएगा। सहगल साहब तो ‘चार कहार मिल मोरी डोलिया सजावैं...’ भी गा गये जबकि कहार डोली उठाने के लिए लगाये जाते हैं, सजाती तो सखियाँ हैं। हो गया होगा यह संयोगवश ही अन्यथा हम तो कालजयी गायक सहगल के परम- प्रशंसक हैं।”


और अब हम यही ठुमरी प्रस्तुत कर रहे सुविख्यात युगल गायक बन्धु पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में। मिश्र बन्धुओं ने इस ठुमरी के आध्यात्मिक पक्ष को बड़े ही प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया है।

ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित राजन और साजन मिश्र



वर्ष १९३८ में ‘न्यू थियेटर’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ के निर्देशक फणी मजुमदार थे। फिल्म के संगीत निर्देशक रायचन्द्र (आर.सी.) बोराल ने अवध के नवाब वाजिद अली खाँ की इस कृति के लिए कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ को चुना। फिल्म में सहगल साहब ने अपनी गायी इस ठुमरी पर स्वयं अभिनय किया है। उनके साथ अभिनेत्री कानन देवी हैं। हालाँकि उस समय पार्श्वगायन की शुरुआत हो चुकी थी, परन्तु फिल्म निर्देशक फणी मजुमदार ने गलियों में पूरे आर्केस्ट्रा के साथ इस ठुमरी की सजीव रिकार्डिंग और फिल्मांकन किया था। एक ट्रक के सहारे माइक्रोफोन सहगल साहब के निकट लटकाया गया था और चलते-चलते यह ठुमरी और दृश्य रिकार्ड हुआ था। सहगल ने भैरवी के स्वरों का जितना शुद्ध रूप इस ठुमरी गीत में किया है, फिल्म संगीत में उतना शुद्ध रूप कम ही पाया जाता है। आप सुनिए, कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी और इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : फिल्म – स्ट्रीट सिंगर : कुन्दनलाल सहगल




आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक पूरब अंग की सुविख्यात गायिका के स्वर में एक पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१- यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

२- इस ठुमरी का प्रयोग सातवें दशक की एक फिल्म में किया गया था। क्या आप उस फिल्म का नाम हमें बता सकते हैं?
 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९८वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ९४वें अंक की पहेली में हमने आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में भैरवी की पारम्परिक ठुमरी ‘बाजूबन्द खुल खुल जाए...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘भैरवी’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका गिरिजा देवी। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। लखनऊ से प्रकाश गोविन्द ने दूसरे प्रश्न के उत्तर में गायिक को सही नहीं पहचाना, उन्हें इस बार एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी गीत के रूप में प्रयोग की चर्चा करेंगे। आपकी स्मृतियों में यदि किसी मूर्धन्य कलासाधक की ऐसी कोई पारम्परिक ठुमरी या दादरा रचना हो जिसे किसी भारतीय फिल्म में भी शामिल किया गया हो तो हमें अवश्य लिखें। आपके सुझाव और सहयोग से इस स्तम्भ को अधिक सुरुचिपूर्ण रूप दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९:३० बजे हम और आप इसी मंच पर पुनः मिलंगे। आप अवश्य पधारिएगा।


कृष्णमोहन मिश्र



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