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Wednesday, November 5, 2008

एक मुलाकात कवयित्री, गायिका और चित्रकार सुनीता यादव से

हिंद युग्म ने जिस उद्देश्य से बाल-उद्यान मंच की शुरूआत की थी, वो था बच्चों को सीधे तौर पर इस हिन्दी इंटरनेटिया आयाम से जोड़ने की। आज हम अगर इस उद्देश्य में काफी हद तक सफल हो पाये हैं तो उसका एक बड़ा श्रेय जाता है हमारे सबसे सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ताओं में से एक सुनीता यादव को। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे द्वारा आदर्श शिक्षक पुरस्कार (२००४) और जॉर्ज फेर्नादिज़ पुरस्कार (२००६) से सम्मानित सुनीता ने और भी बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की है जैसे केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा आयोजित हिन्दी नव लेखक शिविरों में कविता पाठ, आकाशवाणी औरंगाबाद से भी कविताओं का प्रसारण, परिचर्चायों में भागीदारी, गायन में अनेक पुरस्कारों से पुरस्कृत, २००५ में कत्थक नृत्यांगना कु.पार्वती दत्ता द्वारा आयोजित विश्व नृत्य दिवस कार्यक्रम का संचालन आदि। अभी पिछले महीने की आकाशवाणी औरंगाबाद के हिन्दी कार्यक्रम में सुनीता यादव का काव्य-पाठ प्रसारित हुआ, जिसे सुनीता ने बहुत ही अलग ढंग से पेश किया। हमें इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग प्राप्त हुई है, आपको भी सुनवाते हैं-



उर्जा से भरपूर सुनीता यादव हैं - हमारी सप्ताह की फीचर्ड आर्टिस्ट, जिनसे हमने की एक खास मुलाकात। पेश है उसी बातचीत के कुछ अंश -


हिंद युग्म - लेखन, गायन, संगीत कला, चित्र कला, तैराकी, आपके तो इतने सारे रचनात्मक रूप हैं, कैसे समय निकाल पाती है सबके लिए ?

सुनीता यादव - जीवन के सभी क्षेत्रों में विचारों, भावनाओं तथा कर्मों की रचना से जुडी आदतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। छोटे-बड़े सभी कार्य एकाग्रता तथा व्यवस्थित रूप से किए जाने पर ही मनुष्य में निपुणता और सहज भाव से सब कुछ करने की क्षमता आती है। जिस तरह एक साइकिल चलानेवाला साइकिल चलाते-चलाते मित्रों से बातें कर सकता है, अपने चारों तरफ़ की सुरम्य दृश्यावली का आनंद उठा सकता है और बिना भय, उलझन या चिंता के अन्य वाहनों तथा पैदल चलनेवालों को बचाते हुए निकल जाता है :-) रुकने की जरूरत हो तो स्वत: ही ब्रेक लग जाते हैं ..

हिंद युग्म- ओडिसा, हैदराबाद,असम और अब औरंगाबाद इन सब मुक्तलिफ़ भाषा व संस्कारों वाले क्षेत्रों में रहने का अनुभव कैसा रहा और इस यायावरी ने आपकी रचनात्मकता को कितना समृद्ध किया ?

सुनीता यादव - ये मेरा सौभाग्य है कि भारत के विभिन्न राज्यों में रहने का आनंद मिला। इन प्रदेशों की भाषा, सामाजिक जीवन तथा संस्कृति से परिचित होने का सुअवसर मिला। मुसाफिरी व यायावरी ने मुझे बहुभाषी बना दिया। रही बात रचनात्मकता की मैं बहुत ही साधारण हूँ। जी हाँ मेरी उपलब्धियां सामान्य हैं, ये बड़ी बात है कि हिंद युग्म ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

हिंद युग्म - एक अध्यापिका होने का कितना फायदा मिलता है ?

सुनीता यादव - बहुत फायदा होता है ...मेरी बुद्धि बहुत सामान्य है. मुझे तो विद्यार्थियों से ही बहुत सारी बातें सीखने को मिलती है :-) मेरी इच्छा है कि जिस प्रकार पदार्थों को ऊर्जा में बदलने के लिए विशेष विधिओं की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मैं उनमें आत्म विश्वास, साहस व बौद्धिक जिज्ञासा भर दूँ ...ताकि वे जीवन में किसी भी क्षण में अपने आप को छोटा न समझें।

बाल-उद्यान के लिए कुछ आयोजन
  1. ऐ शहीदे मुल्को-बाल-कवि सम्मेलन

  2. स्मृति-लेखन तथा चित्रकला प्रदर्शनी

  3. कोचिंग संस्थान में स्मृति प्रतियोगिता

  4. अनाथालय में चित्रकला प्रतियोगिता


हिंद युग्म -हिंद युग्म परिवार में आपके लिए मशहूर है कि आप एक multi dimensional artist हैं, जो कला की हर विधा में निपुण हैं, कैसा रहा युग्म में अब तक का आपका सफर ?

सुनीता यादव - बहुत ही बढिया सफर रहा है। शुरू से विद्यालयीन स्तर पर इन गतिविधिओं से जुडी तो थी पर हिंद युग्म से जुड़ने के बाद यह समझ में आया कि अपने को उन्नत करनेवाले गुणों का विकास सम्भव है :-) प्रथम प्रयास की सफलता ही बाद के प्रयासों के लिए टॉनिक का कार्य करती है, है न ? चाहे जो भी हो हिंद-युग्म से जुड़ने के बाद उसकी रचनात्मक और कला क्षेत्र की सीमा विस्तृत हो जाती है। 'पहला सुर' महज एक प्रयास ही नहीं सारे भारत के संगीत प्रेमियों के लिए एक दिग्दर्शन भी है।

हिंद युग्म - इतना सब कुछ करने के बाद भी आप एक पत्नी हैं, माँ हैं. परिवार का सहयोग किस हद तक मिलता है, क्या कभी आपकी व्यस्तता को लेकर आपके पति या बिटिया ने असहजता जताई है ?

तेरे कितने रूप!
सुनीता यादव - पति और बेटी की तो बात बाद में आती है ...मैं पहले अपनी मम्मी जी की बात कह दूँ ? कोई अपनी बहू का साथ इतना नहीं देती होगी जितनी वे देती हैं। स्कूल की शिक्षिकाएँ हों, राष्ट्रभाषा के सदस्य हों या मेरे मित्र हों सभी के साथ उनका व्यवहार बहुत ही आत्मीय है। मेरे पति के बारे में क्या कहूँ सहृदय को धन्यवाद की आवश्यकता या प्रशंसा के शब्दों का प्रयोजन नहीं होता .. अंधेरे में फूलों का सुगंध भी प्रकाश का कार्य कर सकती है वे तो मुझे...शिला पर स्थिर बैठ कर जलधारा के वेग का सामना करते हुए बहते हुओं को बचाने की प्रेरणा देते हैं ... और मेरी बिटिया ने हिंद-युग्म के सारे गतिविधियों में मेरा साथ दिया...हम दोनों ही थे जब गरमी की छुट्टियों में भिन्न-भिन्न संस्थाओं में जाकर २५० विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगिताओं का आयोजन किए थे. मुझे इस बात का गर्व भी है कि वह self-made है...बाल दिवस के अवसर पर आप उसकी प्रतिभा से परिचित होंगे .

हिंद युग्म - आप युग्म पर बहुतों के लिए प्रेरणा हैं, आपकी प्रेरणा कौन है ?

सुनीता यादव - मेरे लिए मेरे प्रेरणा स्रोत रहे मेरे माता-पिता. महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा के मेरे गुरुजन। वे सारे प्रिय जन जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने में दिशा प्रदान की। पिताजी की कर्मठता मुझमें रच-बस जाए तो अपने-आप को धन्य समझूंगी। अपने जीवन में सबसे महीयसी महिला मैं श्रीमती अनीता सिद्धये को मानती हूँ जिनकी प्रेरणा ही मेरे एक मात्र संबल हैं। आतंरिक गुणों का विकास कैसे किया जाय ये कोई उनसे सीखे.

हिंद युग्म - बच्चों के लिए बाल-उद्यान के माध्यम से आपका योगदान अमूल्य रहा है, आने वाले बाल-दिवस के लिए क्या योजनायें हैं?

सुनीता यादव - बाल- दिवस आने तो दीजिए :-)

हिंद युग्म - बहुत से पुरस्कार और सम्मान आपने पाये....पर वो कौन सा सम्मान है जो सुनीता यादव को सबसे अधिक प्रिय है, या जिसे पाने की तमन्ना है ?

सुनीता यादव - महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा ने जिन पुरस्कारों से सम्मानित किया उसके लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ. सभी के कल्याणार्थ साधारण-सा कार्य भी कर सकूँ यही मेरा लक्ष्य है ..बाकी.. सेवा, प्रसिद्धि या प्रशंसा नहीं चाहती .

सुनीता जी आप इसी उर्जा और लगन से काम करती रहें और जीवन के हर मुकाम पर सफलता आपके कदम चूमें, हम सब की यही कामना है.


सुनीता यादव ने हिन्द-युग्म के पहले इंटरनेटीय एल्बम 'पहला सुर' के एक गीत 'तू है दिल के पास' को स्वरबद्ध भी किया था (साथ में गीत के बोल भी सुनीता ही ने लिखे थे और गाया भी इन्होंने ही था)। साथ-साथ यह गीत दुबारा सुन लें-

Wednesday, October 29, 2008

गीत में तुमने सजाया रूप मेरा

मिलिए संगीत का नया सितारा 'कुमार आदित्य' से

हिन्द-युग्म ने 'आवाज़' का बीज इंटरनेट रूपी जमीन में पिछले वर्ष इसलिए बोया ताकि इससे उपजने वाले वटवृक्ष की छाया तले नई प्रतिभाएँ सुस्ताएँ, कुछ आराम महसूस करें, इसकी घनी छायातले सुर-साधना कर सकें। २७ अक्टूबर को आवाज़ ने अपनी पहली वर्षगाँठ भी मनाई। और पिछले एक साल में जिस तरह इस वृक्ष को खाद-पानी मिलता रहा उससे यह लगने लगा कि इसकी जड़ें बहुत गहरी जायेंगी और छाया भी घनी से अत्यधिक घनी होती जायेगी।

कुमार आदित्य
आज हम आपको एक और नये कलाकार से मिलवाने जा रहे हैं। इस सत्र में आप हमारे अब तक रीलिज्ज़ १७ गीतों के संगीतकारों के अतिरिक्त ग़ज़ल-नज़्म गायक-संगीतकार रफ़ीक़ शेख़, शिशिर पारखी से मिल चुके हैं। आज सुगम संगीत गायक कुमार आदित्य से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं। आदित्य कुमार हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि डॉ॰ महेन्द्र भटनागर के सुपुत्र हैं। संगीत एवं कला की नगरी ग्वालियर के एक सुप्रसिद्ध सुगम संगीत गायक हैं। इनकी ईश्वरीय प्रदत्त मधुर आवाज़ के कारण श्रोताओं और चाहने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अपनी मधुर आवाज़ में गज़ल गायक के रूप में इन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। संगीत के प्रति समर्पित आदित्य जी को नवीन युगीन आर्केस्ट्रा का जन्मदाता और निर्देशक कहा जाता है। स्वाधीनता प्राप्ति के अर्धशताब्दी समारोह में राजमाता विजया राजे सिंधिया जी ने इन्हें इनके विशिष्ट गायन के लिए सम्मानित एवं पुरुस्कृत किया था। ग्वालियर में ख्याति प्राप्त संस्थाओं द्वारा आयोजित संगीत के कार्यक्रमों में गज़ल गायक के रूप में लोकप्रिय रहे हैं। वर्तमान में आपकी मधुर आवाज़ संगीत के ऐतिहासिक नगर ग्वालियर से निकलकर मुम्बई में अपना ज़ादू बिखेर रही है।

आज इन्हीं की आवाज़ और संगीत निर्देशन में कवि डॉ॰ महेन्द्र भटनागर का एक गीत सुनते हैं 'गीत में तुमने सजाया रूप मेरा'



गीत के बोल

गीत में तुमने सजाया रूप मेरा
मैं तुम्हें अनुराग से उर में सजाऊँ

रंग कोमल भावनाओं का भरा
है लहरती देखकर धानी धरा
नेह दो इतना नहीं, सँभलो ज़रा
गीत में तुमने बसाया है मुझे जब
मैं सदा को ध्यान में तुमको बसाऊँ !

बेसहारे प्राण को निज बाँह दी
तप्त तन को वारिदों -सी छाँह दी
और जीने की नयी भर चाह दी
गीत में तुमने जतायी प्रीत अपनी
मैं तुम्हें अपना हृदय गा-गा बताऊँ !


कुमार आदित्य

जन्मतिथि- ४ नवम्बर १९६९
शिक्षा-
परास्तानक ( संगीत/ शास्त्रीय गायन)-इंदिरा कला-संगीत विश्वविद्यालय, खैरगढ़ (म॰प्र॰)
स्नातक (B.Sc.) (गणित)- जिवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म॰ प्र॰)
स्नातक (B.A.) (शास्त्रीय गायन)- जिवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म॰ प्र॰)
संगीत भूषण (तबला)
संगीत विशारद (शास्त्रीय गायन)

कार्य और उपलब्धियाँ-
प्रमाणित गायक (सुगम संगीत/गीत और भजन)- आकाशवाणी केन्द्र, ग्वालियर (१९९४ से)
प्रमाणित संश्लेषक वादक (सिन्थेसाइज़र प्लेयर)- आकाशवाणी केन्द्र, ग्वालियर (१९९८ से)
ग़ज़ल-गायक- ऊषा-किरण पैलेस; ग्वालियर आईटीसी होटेल लिमिटेड और ताज़ होटेल, वेलकम-ग्रुप, ग्वालियर (१९९९ से)
संगीत-निर्देशक- रेडिएण्ट स्कूल, ग्वालियर
संगीत-निर्देशक- न्यू एरा आर्क्रेस्ट्रा, ग्वालियर

संपर्क-
मोबाइल : मुम्बई : 98 198 70192 / 98 928 95148
फोनः ग्वालियर ; 0751-4092908
ईमेल : adityakumar53@gmail.com
विस्तृत परिचय- http://adityakumar53.blogspot.com/

Thursday, October 23, 2008

सच्चे सुरों की दुनिया का बाशिंदा है कृष्णा पंडित

निरंतर नई प्रतिभाओं को जब हम इस मंच पर लाते हैं और जब उनके गीत आपके मन के गीत बन जाते हैं वो क्षण हमारे लिए सफलता के होते हैं. भोपाल, मध्य प्रदेश के एक बेहद प्रतिभाशाली गायक संगीतकार कृष्णा पंडित और उनकी पूरी टीम का तैयार किया गया गीत "सूरज चाँद और सितारे..." पिछले सप्ताह आवाज़ पर हम लेकर आए थे जिसे हमारे श्रोताओं ने पसंद किया और सराहा. आज हम आपको मिलवा रहे हैं इसी सूफी ग्रुप के शीर्ष कृष्णा पंडित से, जो हैं हमारे इस हफ्ते के फीचर्ड आर्टिस्ट.

हिंद युग्म - भोपाल जैसे शहर में कैसे बना ये संगीत ग्रुप ?

कृष्णा पंडित : भोपाल शहर में बहुत से कलाकार हैं, हम सब मिलकर और व्यक्तिगत भी काम करते ही रहते थे मैं उस समय ग्रुप में नहीं था. लगभग चार साल पहले चैतन्य दादा के मन में यह विचार आया कि हम जो कुछ भी सोच रहे हैं, कर रहे हैं वह कोई आम कार्य नहीं है और दादा ने इसे अंजाम दे दिया ......


हिंद युग्म- सूफी ही चुना आप सब ने अपने संगीत का माध्यम ?

कृष्णा पंडित : सूफी का मर्म रब की निष्पक्ष इबादत करना है, इसको समझना ही एक परम सुख है फिर निभाने में तो जन्नत का आनंद है, सुगम संगीत भी करते है लेकिन सूफी जान है.



हिंद युग्म- सूरज चाँद और सितारे ...कुछ बताइए हमें इस गीत के बनने की कहानी.

कृष्णा पंडित : यह हमारा पहला गीत नहीं था, दिमाग में कुछ उलझन थी जो यह कह रही थी कि लोग रब को कैसे कैसे पाना चाहते हैं वह केवल पूजा, अर्चना, मस्जिद में या मंदिर में नहीं, रब तो कुछ और ही है वो प्यार है, वो हर जगह है , खुशी में ,जंगल में , हम में, आप में बस यह विचार कई महीनो तक पनपता रहा फिर संजय ने इसे शब्द दिए और बन गया "मैं इबादत करूँ या मोहब्बत करूँ ..............."

हिंद युग्म - क्या आपने अपने ग्रुप का कोई नाम नही सोचा अब तक ?

कृष्णा पंडित : जी बिलकुल "मार्तण्डया बैंड".

हिंद युग्म - वाह हम दुआ करेंगे कि अपने नाम के अनुरूप आपका ये संगीत गठबंधन आने वाले समय में सूरज के मानिंद चमके. अच्छा अपने बारे में कुछ विस्तार में बताइए.

कृष्णा पंडित : मेरा जन्म २५ अक्टूबर १९८३ फरीदाबाद जिले के मंद्कोला ग्राम में एक सामान्य परिवार में हुआ मेरे पिता श्री जीवनलाल शर्मा मेरे जन्म के बाद मुझे, मेरे बड़े भाई हरीश और मेरी माँ श्री मति पुष्पलता को लेकर भोपाल आगये, मेरी १२ वीं तक शिक्षा यहीं मंडीदीप में हुई, इसके बाद मैंने २००३ में हरदा से डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग किया, फिर २००५ में मैंने बॉम्बे जाकर काम की तलाश की, एडिटिंग सीखी, मेरी रूचि बचपन से ही संगीत में थी मैंने २००१ से विधिवत शिक्षा लेनी शुरू की, मेरे गुरु श्री पं.मुकेश सावनेर, श्री पं. सजन लाल भट्ट हैं. मैंने कुछ सालो तक घर पर ही काम किया फिर मुंबई ,चैतन्य भट्ट जी के साथ कर रहा हूँ.

हिंद युग्म - हिंद युग्म से जुड़कर कैसा लग रहा है.

कृष्णा पंडित : हिंद युग्म से जुड़कर एक नया उत्साह मिला है जिन्दगी में हर स्टेज पर कुछ न कुछ मिलता है पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो बहुत कुछ दे जाते है हिंद युग्म कोई सामान्य कार्य नहीं महज़, नए युग की एक नई सोच एक महा प्रयास है. हम बहुत आभारी हैं कि उन्होंने हमें यह अमूल्य सम्मान दिया....

हिंद युग्म - ये तो शुरुआत हुई आगे के लिए क्या क्या योजनायें हैं.

कृष्णा पंडित : आगे वहुत कुछ मिलेगा. एक फिल्म के लिए बात चल रही है, २०१० सुखद होगा, नए और अच्छे लोगों के लिए सदैव तत्पर हूँ. हम हिंद युग्म से निरंतर जुड़े रहेंगे. आशा है सबका सहयोग मिलेगा ...........

संगीत की दुनिया को लक्ष्य कर अपनी मंजिल की तलाश में निकले सुरों के नए मुसाफिर हैं कृष्णा पंडित. इनकी प्रतिभा से हमारे श्रोता भी अब परिचित हो चुके हैं. आने वाले समय के इन सुरीले योद्धाओं का आज हम अभिषेक करें. हिंद युग्म परिवार की तरफ़ से कृष्णा पंडित और उनके तमाम संगीत संगियों को ढेरों शुभकामनायें. आप सब सफलता की नई बुलंदियां इजाद करें इसी कामना के साथ आईये सुनें एक बार फ़िर मस्तियों में डुबो देने वाला ये ताज़ा गीत "सूरज चाँद और सितारे..."




आप भी इसका इस्तेमाल करें

संपर्क :
कृष्णा पंडित
मोब.
+91 9977400522,
+91 9977220043.
ईमेल :
kisna.world@yahoo.com,
kisna.world@gmail.com,
www.krishnapandit.blogspot.com

Thursday, October 16, 2008

कोशिश जब तेरी हद से गुज़र जायेगी...मंजिल ख़ुद ब ख़ुद तेरे पास चली आएगी

पिछले लगभग एक हफ्ते से हम आपको सुनवा रहे हैं एक ऐसे गायक को जिसने अपनी खनकती आवाज़ में संगीतमय श्रद्धाजंली प्रस्तुत की अजीम ओ उस्ताद शायरों को,जिसे आप सब ने सुना और बेहद सराहा भी. ,

लीजिये आज हम आपके रूबरू लेकर आये हैं उसी जबरदस्त फनकार को जिसकी आवाज़ में सोज़ भी है और साज़ भी और जिसका है सबसे मुक्तलिफ़ अंदाज़ भी. आवाज़ की खोजी टीम निरंतर नई और पुरकशिश आवाजों की तलाश में जुटी है, और हमें बेहद खुशी और फक्र है की हम कुछ नायाब आवाजों को आपके समक्ष लाने में सफल रहे हैं. आवाज़ की टीम आज गर्व के साथ पेश कर रही है गायन और संगीत की दुनिया का एक बेहद चमकता सितारा - शिशिर पारखी. इससे पहले कि हम शिशिर जी से मुखातिब हों आईये जान लें उनका एक संक्षिप्त परिचय.

एक संगीतमय परिवार में जन्में शिशिर को संगीत जैसे विरासत में मिला था. उनकी माँ श्रीमती प्रतिमा पारखी संगीत विशारद और बेहद मशहूर संगीत अध्यापिका होने के साथ साथ पिछले ३५ वर्षों से आल इंडिया रेडियो की ग्रेडड आर्टिस्ट भी हैं. स्वर्गीय पिता श्री शरद पारखी बोकारों के SAIL प्लांट में चीफ आर्किटेक्ट होने के साथ साथ एक बेहतरीन संगीतकार और संगीत प्रेमी थे, दोनों ने ही बचपन से शिशिर को संगीत सीखने के लिए प्रेरित किया जिसका परिणाम ये हुआ कि मात्र ६ साल की उम्र में उन्होंने गायन और तबला सीखना शुरू किया, स्कूल प्रतियोगिताओं में रंग ज़माने के बाद उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाल वर्ष के दौरान आल इंडिया रेडियो पर गाने के लिए आमंत्रित किया गया, १५ वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला स्टेज परफॉर्मेंस (solo ghazal concert) पेश किया. आज वो ख़ुद भी दूरदर्शन और AIR के ग्रेडड आर्टिस्ट हैं और बहुत बार आपने इन्हे दूरदर्शन पर अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते हुए देखा भी होगा, अगर नही तो कुछ क्लिपिंग यहाँ से आप देख सकते हैं -

http://in.youtube.com/user/ghazalsingershishir



चाहे वो ग़ज़ल हो, या फ़िर भजन, सुगम संगीत हो या फ़िर हिन्दी फिल्मी गीत, शास्त्रीय गायन हो या फ़िर क्षेत्रीय लोक गीत, शिशिर की महारत गायन की हर विधा में आपको मिलेगी. आज उनके खाते में २००० से भी अधिक लाइव शो दर्ज हैं, विभिन्न विधाओं में उनकी लगभग १०० के आस पास कासेस्ट्स, ऑडियो CDS और VCDs टी सीरीज़ और वीनस बाज़ार में ला चुकी है. "एहतराम" उनकी सबसे ताज़ी और अब तक कि सबसे दमदार प्रस्तुति है जिसकी पीछे बहुत उनकी पूरी टीम ने बहुत मेहनत से काम किया है, यह एक कोशिश है उर्दू अदब के अजीम शायरों को एक tribute देने की, इन ग़ज़लों को आप आवाज़ पर सुन ही चुके हैं. इस खूबसूरत से संकलन से यदि आप अपने सगीत संग्रहालय को और समृद्ध बनाना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर इस ACD को हमेशा के लिए अपना बना सकते हैं -

http://webstore.tseries.com/product_details.php?type=acd&pid=1985

आवाज़ के लिए विश्व दीपक "तन्हा" ने की शिशिर जी से एक खास मुलाकात, पेश है उसी बातचीत के अंश -

शिशिर जी आपके लगभग १०० से ज्यादा कैसेट्स रीलिज हो चुके हैं। संगीत की दुनिया में आप अपने आप को कहाँ पाते हैं?

संगीत एक महासागर है.इसकी गहराई और विशालता में कौन कहाँ है ये समझ पाना नामुमकिन है.
बस यही कह सकता हूँ .....

अपनी ऊँचाइओं का ज़िक्र मैं क्या करूँ
सामने हूँ मैं, और ऊपर आस्मां है

हालाँकि संगीत के भरोसे अपनी उपजीविका अर्जन करना साधना है, उपासना है, तपस्या है .... मेरी हर एक कैसेट या सीडी मेरेलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र में जो स्थिरता मुझे मिली है वह मैं नाज़रंदाज़ नहीं कर सकता. प्रत्येक एल्बम में मेरा समर्पण और मुझे सुनने वालों की बढ़ती चाहत, यही मेरी संपत्ति है.

गज़ल, भजन, सुगम संगीत , हिंदी फिल्मी संगीत और क्षेत्रीय (रीजनल) संगीत में आप किसे ज्यादा तवज्जो देते हैं और क्यों?

जैसा कि मैंने कहा संगीत तो महासागर है. चाहे भजन हो, गीत हो, ग़ज़ल हो या फिर लोक संगीत, हर एक का अपना ख़ास अंदाज़ व महत्व है यह सारे अंदाज़ अत्मसाद करके सही तरीके से प्रस्तुत करना यही एक कलाकार की असल कला का मापदंड होता है. इसलिए किसी एक गायन पद्धति या शैली को तवज्जो देना मेरी नज़र में ज्यादती होगी. इनके अलावा भी संगीत के जो प्रकार हैं, उनकी नवीनता स्वीकार करने के लिए सदैव मैं तत्पर रहूँगा. हाँ लेकिन यह कह सकता हूँ कि मैं गा रहा हूँ और सामने श्रोता बैठे हों यानी जब मैं लाइव कंसर्ट करता हूँ तो उसका आनंद और अंदाज़ ही कुछ निराला होता है. मैं ग़ज़ल, भजन व हिन्दी फिल्मी गीतों के लाइव प्रोग्राम्स अक़्सर करता रहता हूँ.

"एहतराम" आपकी जानीमानी गज़लों की एलबम है। इस एलबम के बारे में अपने कुछ अनुभव बताएँ।

एहतराम मेरा ' ड्रीम प्रोजेक्ट ' है. जिन महान शायरों के दम पर उर्दू शायरी का आधार टिका है, उनका एहतराम लाज़मी ही है. मैं पिछले २० वर्षों से लाइव ग़ज़ल कंसर्ट्स करता आ रहा हूँ. मैं चाहता था की मेरे ग़ज़ल अल्बम्स का आगाज़ इन महान शायरों के एहतराम से ही हो. इसके निर्माण की कल्पना के साथ ही मुझे हर जगह से काफी प्रोत्साहन मिला.टी-सीरीज़ के लिए मैंने पिछले कुछ वर्षों में करीब बीस devotional अल्बम्स किए हैं. इस पहले ग़ज़ल अल्बम के लिए भी टी-सीरीज़ के श्री अजीत कोहली जी ने काफी सहयोग दिया व प्रोत्साहित किया और इस ग़ज़ल सीडी को worldwide रिलीज़ किया गया. यह टी-सीरीज़ के webstores पर भी उपलब्ध है.

लोगों की फरमाइश पर एहतिराम की सभी ग़ज़लों को Nairobi, Kenya के १०६.३ ईस्ट फम पर कई बार बजाया गया व विदेशों में भी इसे worldspace Radio पर सुना गया.इसके अलावा दुनियाँ भर की कई जगहों से लगातार e- mails आते रहते हैं.विदेशों में लाइव ग़ज़ल कंसर्ट्स के लिए भी काफी लोग पूछ रहे हैं. इन प्रतिक्रियाओं से यह लगता है की लोगों को ये ग़ज़लें काफी पसंद आ रही है. इन शुरवाती अनुभवों के बाद देखते हैं आगे आगे और क्या क्या अनुभव आते हैं. 'एहतराम' सही मायने में एहतराम के काबिल महसूस हो रहा है ये निश्चित है.

जी सही कहा आपने इन्हे आवाज़ पर भी काफी पसंद किया गया है. "अहतराम" में संजोई गई सारी गज़लें सुप्रसिद्ध शाइरों की है। गज़लों को देखकर महसूस होता है कि गज़लों को चुनने में अच्छी खासी स्टडी की गई है। गज़लों का चुनाव आपने किया है या फिर किसी और की सहायता ली है?

जब तक गानेवाला किसी भी ग़ज़ल के लफ्जों से अच्छी तरह वाकिफ़ न हो वह सही भाव प्रस्तुत नही कर सकता और इसलिए यह सारी मशक्कत मैने ही की है और तहे दिल से की है. अगर आप उर्दू शायरी का इतिहास देखें तो मीर से लेकर दाग़ तक का काल उर्दू शायरी का स्वर्णकाल कहलाता है. उस समय के हर नामचीन शायरों की रचनाओं को पढ़ना, समझना और ख़ास अदा से प्रस्तुत करना यह एक लंबा दौर मैंने गुज़ारा है.काफी सालों से अध्ययन करते करते मेरे पास ग़ज़ल और शायरी से सम्बंधित कई किताबों का अच्छा खासा संग्रह तैयार हो गया है.कुल मिलकर एहतिराम मेरा एक सफल प्रयत्न है यह चाहनेवालों के प्रतिसाद से साबित हो रहा है.

यकीनन शिशिर जी, गज़लों को संगीत से सजाना आप कितना कठिन मानते हैं? चूँकि गज़लें खालिस उर्दू की हैं, तो क्या गज़लों में भाव जगाने के लिए आपके लिहाज से उर्दू की जानकारी नितांत जरूरी है।

निश्चित ही ग़ज़ल की खासिअत यही है की उसके नियमो के आधार पर ही वह खरी उतरती है.किसी शायर ने कहा है-

खामोशी से हज़ार ग़म सहना
कितना दुश्वार है ग़ज़ल कहना

दूसरे शायर कहते हैं -

शायरी क्या है, दिली जज़्बात का इज़हार है
दिल अगर बेकार है तो शायरी बेकार है

ग़ज़ल की बहर के आधार पर और ख़ास लफ्जों के आधार पर तर्ज़ का होना ज़रूरी है. यह निश्चित रूप से थोड़ा कठिन है. अब जिन्हें उर्दू भाषा की जानकारी न हो वह ग़ज़ल के साथ न्याय कैसे कर सकता है? उर्दू भाषा का उच्चारण भी सही होना अनिवार्य है और साथ ही उसके अर्थ को समझना भी. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी ख़ास भाव प्रस्तुत करने के लिए ख़ास रागों का व सुरों का प्रावधान है. उन्ही सुरों में वह प्रभावी भी होता है. इसलिए ग़ज़ल गाने के लिए पुरी तरह उस ग़ज़ल का हो जाना ज़रूरी है ऐसा मैं मानता हूँ. इस सब के बावजूद किसी शायर ने सच कहा है-

ग़ज़ल में बंदिशे-अल्फाज़ ही नहीं सब कुछ
जिगर का खून भी कुछ चाहिए असर के लिए

मराठी पृष्ठभूमि (background) के होने के कारण आपको हिंदी और उर्दू की रचनाओं में संगीत देने और गाने में कोई दिक्कत महसूस होती है?

जैसा कि मैने कहा की ग़ज़ल गाने के लिए उसके प्रति पुरी तरह समर्पित होना ज़रूरी है दरअसल शुरू से हिन्दी व उर्दू मेरी पसंद रही है और मेरा कार्यक्षेत्र रहा है.आज भी हमारे देश में ऐसे कई सफल ग़ज़ल गायक है जिनकी मातृभाषा हिन्दी या उर्दू नहीं है.भाषा किसी की बपौती नहीं है बशर्ते आप उसके प्रति पुरी तरह समर्पित हों. मेरी ग़ज़लों को सुनने वाले कुछ जानकार लोग ही यह तय करें की मै उन ग़ज़लों के साथ न्याय कर पाया हूँ या नहीं.

आपको एक और उदाहरण देना चाहूँगा की कुछ वर्ष पहले मैं गल्फ टूर पर गया था. टीम में अकेला गायक था और वहां तो सभी भाषाओँ के गीत गाने पड़ते थे. मराठी ही क्या, मलयाली, तमिल, तेलगु व पंजाबी सभी श्रोताओं को मैने संतुस्ट किया.

बिल्कुल सही कहा आपने शिशिर जी, भाषा किसी कि बपौती बिल्कुल नही है, ये बतायें आपने सुरेश वाडेकर, अनुराधा पौंडवाल और साधना सरगम जैसे नामी फ़नकारों के साथ भी काम किया है। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

अनुभव अच्छा ही रहा. वे सभी बहुत अच्छे कलाकार हैं उनसे प्रोत्साहन भी मिला. आगे भी मेरे स्वरबद्ध किए हुआ गाने वो ज़रूर गायेंगे ऐसी उम्मीद है.

बतौर संगीतकार हिंदी फिल्मों में संगीत देने के बारे में आप क्या सोचते हैं?

दरअसल इस क्षेत्र में अपनी सोच ही काफी नहीं होती पर फ़िल्म में संगीत देना कौन नहीं चाहेगा? मुझे अलग अलग प्रकार के गीत, भजन, ग़ज़ल, क्षेत्रीय संगीत को स्वरबद्ध करने का या संगीत देने का अनुभव रहा है. ग़ज़ल, भजन के अलावा फिल्मी गीतों पर आधारित नए पुराने गानों के लाइव प्रोग्राम्स भी कई सालों से करता आ रहा हूँ. लोगों की पसंद मैं काफी हद तक समझता हूँ. इसके अलावा कई टेलिविज़न सेरिअल्स में भी संगीत दिया व प्लेबैक किया है. इसलिए मौका मिला तो फ़िल्म संगीत में भी पुरा न्याय करूँगा ये मेरा विश्वास है.


संगीत की दुनिया में संघर्ष का क्या स्थान है? चूँकि आप एक मुकाम हासिल कर चुके हैं, इस क्षेत्र में नए लोगों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

संघर्ष जीवन का अविभाज्य अंग है. जीवन के हर क्षेत्र में संघर्ष ज़रूरी है जितने भी बड़े कलाकार है वो संघर्ष के बिना ऊपर नहीं आए हैं.पर हाँ किस्मत भी अपनी जगह महत्व रखती है पर सबसे ज़रूरी है लगन और लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष की तैयारी. प्रातियोगिता आज सर चढ़ कर बोल रही है. हर नए कलाकार को इस प्रवाह में ख़ुद को प्रवाहित करना ज़रूरी है और जब प्रवाहित होना ही है तो तैरना सीख लेना फायदेमंद होगा . मतलब यह कि पहले संपूर्ण संगीत का ज्ञान और बाद में बदलते समय के साथ संगीत के प्रति समर्पण और न्याय. अर्जुन की तरह बस आँख देखते रहे और निशाना लगते रहे क्योंकि-

कोशिश जब तेरी हद से गुज़र जायेगी
मंजिल ख़ुद ब ख़ुद तेरे पास चली आएगी

भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

फिलहाल तो लाइव प्रोग्राम्स ख़ास कर ग़ज़लों की महफिलों में व्यस्त हूँ. अगले ग़ज़ल एल्बम की तैयारी चल रही है एक बिल्कुल नए शायर के साथ. और बहुत से प्लान्स हैं आगे आपको बताते रहूँगा. हिंद युग्म के साथ एक लम्बी पारी की उम्मीद कर रहा हूँ, कुछ योजनाओं पर बात चल रही है देखते हैं कहाँ तक बात पहुँचती है.

बहुत से नए कलाकारों को आवाज़ एक मंच दे चुका है. ये सब अभी अपने शुरुवाती दौर में हैं. और आप बेहद अनुभवी. इन नए कलाकारों के लिए आप क्या सदेश देना चाहेंगे ?

चाहे शायर हो,गायक या संगीतकार उनके अवश्यकता के अनुसार उचित मार्गदर्शन व सहयोग देने के लिए मै सदा तैयार हूँ. किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप हिंद युग्म या मुझे shishir.parkhie@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

आप संगीत के क्षेत्र में यूँ हीं दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें हिंद युग्म परिवार यही दुआ करता हैं.

शिशिर पारखी जी का संपर्क सूत्र -

Shishir parkhie
Singer & Music Composer
13, Kasturba Layout, Ambazari, Nagpur
Mahashtra, India. Zip- 440033
Cell:00919823113823
Land: 91-712-2241663

Tuesday, September 30, 2008

मिलिए ग़ज़ल गायकी की नई मिसाल रफ़ीक़ शेख से

कर्नाटक के बेलगाम जिले में जन्मे रफ़ीक़ शेख ने मरहूम मोहम्मद हुसैन खान (पुणे)की शागिर्दी में शास्त्रीय गायन सीखा तत्पश्चात दिल्ली आए पंडित जय दयाल के शिष्य बनें. मखमली आवाज़ के मालिक रफ़ीक़ के संगीत सफर की शुरुवात कन्नड़ फिल्मों में गायन के साथ हुई, पर उर्दू भाषा से लगाव और ग़ज़ल गायकी के शौक ने मुंबई पहुँचा दिया जहाँ बतौर बैंक मैनेजर काम करते हुए रफ़ीक़ को सानिध्य मिला गीतकार /शायर असद भोपाली का जिन्होंने उन्हें उर्दू की बारीकियों से वाकिफ करवाया. संगीत और शायरी का जनून ऐसा छाया कि नौकरी छोड़ रफ़ीक़ ने संगीत को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया.

आज रफ़ीक़ पूरे भारत में अपने शो कर चुके हैं. वो जहाँ भी गए सुनने वालों ने उन्हें सर आँखों पर बिठाया. २००४ में औरंगाबाद में हुए अखिल भारतीय मराठी ग़ज़ल कांफ्रेंस में उन्होंने अपनी मराठी ग़ज़लों से समां बाँध दिया, भाषा चाहे कन्नड़ हो, हिन्दी, मराठी या उर्दू रफ़ीक़ जानते हैं शायरी /कविता का मर्म और अपनी आवाज़ के ढाल कर उसे इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि सुनने वालों पर जादू सा चल जाता है, महान शायर अहमद फ़राज़ को दी गई अपनी दो श्रद्धांजली स्वरुप ग़ज़लों को सुनने के बाद आवाज़ के श्रोताओं ने भी इस बात को महसूस किया. हिंद युग्म पर मिली इस सफलता ने रफ़ीक़ को प्रेरित किया कि हिन्दी/उर्दू ग़ज़लों के एक एल्बम पर काम शुरू करें.


आल इंडिया रेडियो द्वारा सत्यापित कलाकार रफ़ीक़ चंदन टी वी और डी डी ०१ पर लाइव परफॉर्मेंस दे चुके हैं.अब तक उनकी एक मराठी एल्बम 'पाउस पहिला" और एक कन्नड़ एल्बम "नेने" बाज़ार में धूम मचा चुकी है. लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसे दिग्गजों के साथ गाने का इन्हे मौका मिला है जिसे रफ़ीक़ अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं.

हिंद युग्म से जुड़ कर रफ़ीक़ बेहद खुश हैं, उन्हें विश्वास है युग्म के साथ उन्हें अपने पहले उर्दू ग़ज़ल एल्बम के सपने को साकार करने में मददगार साबित होगा. बीते शुक्रवार आवाज़ पर ओपन हुई उनकी ग़ज़ल "सच बोलता है" बेहद सराही गई. युग्म परिवार इस बेहद प्रतिभाशाली और संगीत के प्रति समर्पित कलाकार को अपनी समस्त शुभकामनायें दे रहा है. रफ़ीक़ जल्दी ही कमियाबी की नई मंजिलें पायें, इसी कामना के साथ आईये एक बार फ़िर सुनें उनकी बारीक, सुरीली और सधी हुई आवाज़ में उन्ही के द्वारा स्वरबद्ध ये शानदार ग़ज़ल.

(सुनने के लिए नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें. इस नए उभरते कलाकार को अपना प्रोत्साहन अवश्य दें)




आप भी इसका इस्तेमाल करें

देखिये रफ़ीक़ शेख का सफर इन चित्रों में -
(आशा जी के साथ रफ़ीक़)


(बप्पी लहरी के साथ)


(संगीतकार राम लक्ष्मण के साथ)


(और ये हैं आज के रफ़ीक़)

Wednesday, September 24, 2008

एक गीत मेरी जीवन संगिनी के लिए - जे एम सोरेन

किशोर कुमार के जबरदस्त फैन जे एम सोरेन ख़ुद को एक गायक पहले मानते हैं, उनके अपने शब्दों में अगर कहें तो संगीत उनका पहला प्यार, पहला जनून है और संगीत ही उनकी आत्मा उनकी सांसें और जीवन का ओक्सिजेन है. सोरेन गीटार सिखाते हैं साथ ही सीखना भी जारी है. आज कल CAC कोच्ची से पाश्चात्य संगीत में ग्रेड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. फ़िल्म जगत में बतौर गायक / संगीतकार अपनी पहचान बनाने के इच्छुक सोरेन आर डी बर्मन उर्फ़ पंचम को अपना गुरु मानते हैं.
हमने की ओ मुनिया के रचेता जे एम् सोरेन से कुछ ख़ास बातें -

हिंद युग्म - सम्मोहन और ओ मुनिया दोनों बिल्कुल अलग अलग फ्लेवर के गीत है सोरेन, क्या ये एक सोची समझी कोशिश थी मुक्तलिफ़ अंदाज़ में ख़ुद को परोसने की...?

सोरेन -नहीं ऐसी कोई बात नहीं है की ये एक सोची समझी कोशिश थी. हाँ ये बात ज़रूर है की सम्मोहन और मुनिया दोनों अलग अलग किस्म के गाने हैं. चाहें जिस फ्लेवर के गाने हों ये दोनों अपने को प्रिय हैं. क्योंकि गाने की डिमांड थी इसलिए गाना ऐसा बनाया मैंने. पहले वैसे मैंने किसी डांस गीत पर उतना ज़्यादा काम नहीं किया था. हाँ इच्छा ज़रूर थी और मैं सोचता हूँ कि मेरी कोशिश कामयाब हुई.

हिंद युग्म- आपके बारे में हमारे श्रोता अक्सर confuse रहते हैं, कभी हम बताते हैं की आप लखनऊ से हैं कभी वो देखते हैं कि कोची में रिकॉर्डिंग हो रही है, मूल रूप से आप कहाँ से हैं, कुछ अपने बारे में बताएं ?

सोरेन - मैं वैसे झारखण्ड से हूँ. परवरिश मेरी लखनऊ में हुई चूँकि मेरे पिताजी वहां रेलवे में कार्यरत थे. पढ़ाई पूरी करने के उपरांत मेरी नौकरी बैंक में लग गई. चूँकि मैं ऑफिसर हूँ इसलिए मेरा इस वक्त कोच्ची में पोस्टिंग है. कोच्ची में आने की वजह ये है कि मुझे हिन्दुस्तानी में रूचि तो है लेकिन पाश्चात्य संगीत में थोड़ा ज़्यादा है. मैं वैसे गिटारिस्ट हूँ और पाश्चात्य संगीत में शिक्षा के उद्देश्य से ही मैंने कोच्ची में पोस्टिंग मांगी और ईश्वर की कृपा से मिल भी गई..

हिंद युग्म - ज्योति मुन्ना सोरेन, उर्फ़ मार्टिन सोरेन इन नामों के पीछे सोरेन के कितने चेहरे हैं ?

सोरेन -ज्योति मुन्ना सोरेन और मार्टिन सोरेन एक ही हैं. हकीक़त ये है की मैंने ऑरकुट प्रोफाइल पहले मार्टिन क नाम से बनाया था. मैं ज़्यादा सीरियस नहीं था ऑरकुट में लेकिन जब देखा की मेरे जानने वाले मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं तो मुझे अपना असली नाम सामने रखना पड़ा. वैसे भी नाम में क्या रखा हैं . Shakespeare ने कहा है की अगर गुलाब को आप गुलाब नहीं कहोगे तो भी वो गुलाब की तरह ही महकेगा.

हिंद युग्म - आने वाले सालों के लिए संगीत को लेकर क्या योजनायें हैं ?

सोरेन -बहुत सी हैं भाई. अभी बहुत काम करना है. समय निकालना है करने के लिए. अब क्योंकि मेरा परिवार मेरे साथ है तो समय ही समय है. अभी मेरे म्यूजिक बैंक में काफी tracks मैंने save करके रखे हैं. उनको थोड़ा सा पोलिश करके श्रोताओं के सामने परोसना है. और सजीव का साथ तो रहेगा ही रहेगा. क्योंकि मैं कुछ और दुसरे प्रोजेक्ट से कोन्नेक्टेद हूँ इसीलिए कुछ व्यस्त ज़रूर हूँ. हिन्द युग्म के लिए वैसे समय ही समय है. कुछ नया करने की ख्वाहिश है. कुछ बड़ा प्रोजेक्ट मिलने की उम्मीदें भी हैं. एक पर काम भी चल रहा है.. वक्त आने पर मैं ज़रूर बताऊँगा

हिंद युग्म - हिंद युग्म आवाज़ के साथ अब तक का अनुभव कैसा रहा आपका, आपको लगता है क्या की आवाज़ संगीत की दिशा में एक सही पहल है ?

सोरेन -बहुत ही अच्छा अनुभव है और हमेशा याद रहेगा. पहले लोग जहाँ पर मैं रहता था वहां जानते थे परन्तु अब देश के कोने कोने में लोग जानने लगे हैं. एक सपना सच होते हुए दिख रहा है. हर चीज़ का एक वक्त होता है. सबका समय आयेगा. और हाँ आवाज़ एक बहुत ही अच्छी पहल है. किसी ने सोचा नहीं और आप लोगों ने कर दिखाया. IT' S DIFFERENT. अगर आपको जिंदगी में कुछ करना है तो आपको कुछ अलग करना पड़ेगा. तभी आप SUCCESSFUL कहलायेंगे. हिंद युग्म एक SUCCESS है लोगों की प्रतिभा लोगों के सामने लाने का पहला कदम और वो भी सफल प्रयास. HATS OFF TO हिंद युग्म

हिंद युग्म - चलते चलते युग्म के श्रोताओं के लिए कुछ ख़ास हो जाए सोरेन.

सोरेन - I remember when I was in the 1st standard, everybody was getting a prize for something or the other on the final day of our school. I also wished that I should get something and lo my name was called and I got the first prize for singing. Sorry to say I lost that prize but I still treasure those moments.

Because of music only I fell in love with a girl who too fell in love with me Today i am a happily married man and ya friends she is my wife now. We share the same interests. She is not so good at singing becoz she is not confident although she can sing, but nonetheless she is a good listener and this is what I want. Today is 24th of September, My wife's birthday. So I am going to present a song for my wife.

हिंद युग्म - अरे वाह सोरेन ये तो बहुत ही खूबसूरत इत्तेफाक है, सुनाईये -

सोरेन - इसे मैंने ख़ुद लिखा, स्वरबद्ध किया और गाया भी है ( जाहिर है ) और मुझे लगता है कि ये गीत मेरी अर्धागिनी और जीवन संगिनी के लिए एक PERFECT तोहफा होगा उनके जन्मदिन पर. सुनिए -



God bless हिंद युग्म and all those who are directly or indirectly connected to it.

शुक्रिया सोरेन, इसी बात पर दोस्तों एक बार फ़िर से सुनें सोरेन का ये नया गीत "ओ मुनिया"(नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें)और अपने विचार देकर इस उभरते हुए बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार /गायक को प्रोत्साहित करें -



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Wednesday, September 17, 2008

जैसे ही देखा मोहिंदर कुमार जी का गीत, लगा कि धुन मिल गयी...

हिंद युग्म की नयी खोज हैं, संगीतकार और गायक कृष्ण राज कुमार, जो हैं आवाज़ पर इस हफ्ते के उभरते सितारे. २२ वर्षीय कृष्ण राज दक्षिण भारत के कोच्ची केरल से हैं, अभी अभी अपनी पढ़ाई पूरी की है इन्होने. संगीत का शौक बचपन से है और पिछले १४ सालों से कर्णाटक संगीत में दीक्षा ले रहे हैं. आवाज़ पर इनका पहला स्वरबद्ध किया और गाया हुआ गीत "राहतें सारी" इस शुक्रवार को ओपन हुआ था और बेहद सराहा भी गया, जिससे कृष्ण कुमार के हौसले यकीनन बढ़े हैं और हमारे श्रोता आने वाले दिनों में उनसे और बेहतर गीतों की उम्मीद रख सकते हैं. दरअसल हर गीत की तरह इस गीत की भी एक कहानी है. आईये जानते हैं ख़ुद कृष्ण कुमार से की कैसे बना ये सुमधुर गीत. (कृष्ण हिंद युग्म से हिन्दी टंकण अभी सीख रहे हैं, पर यहाँ प्रस्तुत उनका यह अनुभव अभी मूल रूप में ही आपके सामने है)

First of all I thank God for blessing me, second I thank sajeev ji for giving me an opportunity to showcase my talent and last but not the least I thank Mohinder kumar ji for providing such a wonderful lyrics without which I wouldn’t be able to compose the song.


My name is Krishna Raj Kumar. I am from cochin, kerala. I just completed my Btech. Basically I am a singer and I have been learning classical music for 14 years. My interest in composing music started when I was in my 10th. From there onwards I was more interested in composing music.

My introduction to hindyugm was made by Niran kumar of "pehla sur" fame. It was through him that I got to meet Sajeev sarathie ji. First when I visited hindyugm site I saw an ad calling for singers. I thought why not compose a song and also sing the song in my voice. So the next thing that came in my mind was what to compose??? While browsing the site suddenly I saw the poetry section and I browsed through all the poems in that section. To be frank all were poems!!!!! I mean I knew I was in the poetry section but to me it was like oh!! I don’t think I can compose tune for poems….But then I saw mohinder kumar ji’s "Raahate saari aagayi…" Hmmmm…..ok I think I got a tune…then there was no looking back actually….i composed the first stanza and then I send it to sajeev ji…..He liked the tune and my voice. He said to compose the whole song and also suggested me to sing the whole song in one flow as it’s a poem it would be better to sing it in one flow. He also suggested that let the last stanza “dhosto ne nibha di dushmani pyaar se” be repeated.. I did the composing according to what he suggested. It took me sometime to compose the song and also the orchestration as all the work was done by me.And the song was born…

I thank all of you for taking time in listening to this song and also thank all of you for posting your valuable comments. I have your valuable comments and I will improve on it the next time.

Also thank mohinder kumar ji for his beautiful lyrics and once again Sajeev ji and the whole hindyugm team for putting up a blog where people like me are able to showcase their talents. It’s a wonderful thing because we are able to find hidden talents.

All the best hindyugm team.

God bless you!!!!

-Krishna Raj Kumar

दोस्तों, तो ये थे संगीत की दुनिया के नए सुरबाज़, कृष्ण राज कुमार. आईये एक फ़िर आनंद लें उनके इस पहले पहले गीत का और इस प्रतिभावान गायक/संगीतकार को अपना प्रोत्साहन देकर हौंसलाअफजाई करें.
(गीत को सुनने के लिए नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें)



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Wednesday, September 10, 2008

कुछ बातें गौरव सोलंकी से

आवाज़ पर हमारे इस हफ्ते के सितारे गौरव सोलंकी का सपना है - "ऑस्कर"

7 जुलाई, 1986 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के 'जिवाना गुलियान' गाँव में जन्मे गौरव के मन में इंजीनियर बनने की लगन के साथ-साथ एक नन्हे से कवि की कोमल कल्पनायें भी बचपन से पलती रहीं। एक दिन हाथों ने लेखनी को थाम ही लिया और लेखन शुरू हो गया। 15 वर्ष की आयु में काव्य-लेखन आरंभ किया।

आई.आई.टी. रुड़की में प्रवेश के बाद शौक अधिक गति से बढ़ने लगा और कवि के शब्दों में अब वे अधिक 'परिपक्व' कविताएँ लिखने लगे हैं। साहित्य पढ़ते समय रुचि अब भी गद्य में ही रही और एक कहानीकार भी भीतर करवट लेने लगा। कहानियाँ लिखनी शुरू की और फिर उपन्यास भी। युग्म के ताज़ा गीत "खुशमिज़ाज मिटटी" के गीतकार गौरव से हमने की एक संक्षिप्त सी बातचीत -


हिंद युग्म- गौरव सोलंकी, पहले एक इंजीनियर या एक कवि?

गौरव- पहले कवि और बाद में भी :)

हिंद युग्म - माँ का स्वेटर, पिता के साथ चाँद तक जाने की तमन्ना, प्रियसी के लिए एक तरफा प्यार, किस कविता ने सबसे ज्यादा संतोष दिया?


गौरव- सभी ने अपने अपने वक़्त पर लगभग उतना ही संतोष दिया। शायद चुनकर नहीं बता सकता कि कब ज्यादा संतोष मिला। जब भी लिखा, इसी उद्देश्य से लिखा कि आत्मसंतुष्टि तो हो ही।

हिंद युग्म- हिन्दी ब्लॉगिंग और हिंद-युग्म, कैसा रहा ये सफर लगभग दो सालों का?

गौरव- बहुत अच्छा सफ़र रहा। हिन्द-युग्म से ही कितने सारे पढ़ने वाले लोग मिले। हिन्दी ब्लॉगिंग फल-फूल रही है, लेकिन इसके अंदाज़ से मैं बहुत ज़्यादा संतुष्ट नहीं हूं। और अच्छा हो सकता है।

हिंद युग्म- खुशमिज़ाज मिटटी, क्या है इस गीत की कहानी?

गौरव- एक दिन पार्क में घूमते घूमते शुरुआती दो पंक्तियाँ दिमाग में आईं और फिर उसी शाम पूरा गीत जुड़ता चला गया। पहली दो पंक्तियाँ अब भी मुझे काफ़ी पसंद हैं। अब भी लगता है कि शायद पूरा गीत उस स्तर का बनता तो कुछ और ही बात होती। सुबोध की आवाज़ बहुत अच्छी है। अब मैं भी गुनगुनाता हूं तो उसी धुन में। जिस धुन को सोच कर लिखा था, वह अब भूल ही गया।

हिंद युग्म - युग्म का पहला गीत जिसका वीडियो भी बना, आप ख़ुद भी फ़िल्म निर्देशन में रूचि रखते हैं, इस वीडियो को आप किस तरफ़ रेट करेंगे?

गौरव -वीडियो मुझे पसंद नहीं आया। किसी गाने का अच्छा वीडियो बनाने के लिए उसमें एक कहानी भी चले तो बेहतर रहता है। नहीं तो बोझिल सा लगने लगता है। हर एक दृश्य के लिए आपके पास एक जवाब होना चाहिए कि कोई इसे क्यों देखे?

हिंद युग्म - अगले ५ सालों में गौरव ख़ुद को क्या करते हुए देखना चाहेगा?

गौरव - ऑस्कर जीतते हुए। कोशिश तो करूंगा ही। :)

हिंद युग्म - और जाते जाते कुछ अपने ही अंदाज़ में "आवाज़" के लिए कुछ ख़ास हो जाए

गौरव - क्या इतना काफ़ी नहीं है? :)

आपको पढ़ना और सुनना कभी काफ़ी नहीं हो सकता गौरव, हिंद-युग्म परिवार को आपसे बहुत सी उम्मीदें हैं, हम सब आपको ओस्कर जीतते हुए देखना चाहेंगे. युग्म पर गौरव का काव्य संग्रह आप यहाँ पढ़ सकते हैं, फिलहाल सुनते हैं एक बार फिर गौरव का लिखा और सुबोध का गाया ये बेहद खूबसूरत सा गीत "खुशमिज़ाज मिटटी"




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Wednesday, September 3, 2008

मैं अमर के शब्दचित्र में उतरी एक छोटी-सी कविता हूँ...

मैं अमर के शब्दचित्र में उतरी एक छोटी-सी कविता हूँ,
है फख्र कि मैं भी उस जैसा कई लोकों का रचयिता हूँ।
कहना है विश्व दीपक "तन्हा" का.

विश्व दीपक "तन्हा",एक कवि के रूप में इन्टरनेट पर एक ऐसा नाम है जो किसी परिचय का मोहताज नही है,अपनी कविताओं और कहानियो से एक उभरते हुए साहित्यकर्मी के रूप में अपनी पहचान बनने वाले "तन्हा",का लिखा पहला स्वरबद्ध गीत "
मेरे सरकार",पिछले हफ्ते आवाज़ पर ओपन हुआ,और बेहद सराहा गया,आईये मिलते हैं,कवि कथाकार और गीतकार विश्व दीपक तन्हा से,जो हैं इस हफ्ते हिंद युग्म,आवाज़ के उभरते सितारे -

अपने बारे में ज्यादा क्या बताऊँ? एक संक्षिप्त परिचय यानि कि intro दे देता हूँ बस । जन्म बिहार के सोनपुर में हुआ, दिनांक २२ फरवरी १९८६ को। अब मैं अपने सोनपुर से आप सब को अवगत करा देता हूँ। मेरा/हमारा सोनपुर हरिहरक्षेत्र के नाम से विख्यात है, जहाँ हरि और हर एक साथ एक हीं मूर्त्ति में विद्यमान है और जहाँ एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। पूरा क्षेत्र मंदिरों से भरा हुआ है। इसलिए बचपन से हीं धार्मिक माहौल में रहा। लेकिन मैं कभी भी पूर्णतया धार्मिक न हो सका। पूजा-पाठ के श्लोकों और दोहों को मैं कविता की तरह हीं मानता था। पर मेरे परिवार में कविता, कहानियों का किसी का भी शौक न था। आश्चर्य की बात है कि जब मैं आठवीं में था, तब से पता नहीं कैसे मुझे कविता लिखने की आदत लग गई । फिर तो चूहा, बिल्ली, चप्पल, छाता किसी भी विषय पर लिखने लगा। मेरे परिवार में पढाई के अलावा कुछ भी करना पढाई से आँख और नाक चुराने जैसा माना जाता था। इसलिए घरवालों से छिपाकर लिखता था।


पहली कविता कौन-सी थी याद नहीं लेकिन पहली कविता जिसे मेरे पिताजी ने स्वीकार किया, वो याद है। जब मैं दसवीं में था, तो मेरी छोटी बहन को १५ अगस्त के अवसर पर अपने स्कूल में एक कविता सुनानी थी। मैने अपनी लिखी एक कविता "तिरंगा के तीन रंग" अपनी बहन को दी और कहा कि पापा से पूछ लेना कि इसे कैसे गाना है। मेरे पिताजी ने मेरी बहन को कहा कि कवि से हीं पूछो ;) । अपनी कविता की स्वीकृति सुनकर मुझे बेहद अच्छा लगा। फिर जब मैं १२वीं में था पिताजी के कार्यालय में होली के अवसर पर एक कविता की आवश्यकता थी। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा जब मेरे पिताजी ने खुद मुझसे कविता लिखने के लिए कहा। यह अलग बात है कि वह कविता कार्यालय में पढी नहीं जा सकी , क्योंकि कुछ बड़े कवि आए हुए थे, लेकिन मुझे जो चाहिए था, वह मैने पा लिया था।
इसतरह शनै:शनै: कविता-लेखन का मेरा सफ़र चलता रहा।

१२वीं के बाद आई०आई०टी० जे०ई०ई० की तैयारी के लिए पटना चला गया।माहौल बदला, मूड बदला, उमर बदली तो प्यार-मोहब्बत की कविताएँ लिखने लगा। कभी महसूस होता था कि कहीं मेरी कविताएँ मेरे भविष्य को बर्बाद न कर दे, क्योंकि हर समय कुछ न कुछ लिखता हीं रहता था , तैयारी अधोगति पर थी। फिर भी कुछ दुआओं और सदबुद्धि आने के बाद बहुत सारी मेहनत के बलबूते मैं आई०आई०टी० में प्रवेश पाने में सफल हुआ। नामांकन संगणक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग(Computer science and Engineering Department) में हुआ। बिहार बोर्ड का छात्र होने के कारण मुझे कम्पूटर की कुछ भी जानकारी न थी। इसलिए नामांकन के बाद मुझे बाकी छात्रों के लेवेल में आने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ी। लेखन का दौर धीरे-धीरे खत्म होने लगा।

इंजीनियरिंग के प्रथम और द्वितीय वर्षों में मैने नाम-मात्र की कविताएँ लिखीं। हास्टल मैगजीन और इन्स्टीच्युट मैगजीन के लिए एक-दो कविताएँ लिखता रहा बस। फिर तृतीय वर्ष में आरकुट पर "गिरीराज जोशी" ,"शैलेश भारतवासी" और "राजीव रंजन प्रसाद" से मुलाकात हुई। इन लोगों के माध्यम से हिन्द-युग्म के संपर्क में आया। दिसंबर २००६ में मैं हिन्द-युग्म का नियमित सदस्य हो गया। अब तो हर सप्ताह कविताएँ, मुझे लगा जैसे मैने खुद को वापस पा लिया। तकनीकी दुनिया और साहित्यिक दुनिया के बीच का पुल मैने पा लिया था। पहली कविता जो मैने युग्म पर प्रकाशित की थी , वो थी "याद" । आज भी मुझे याद है कि जब इस कविता पर सकारात्मक टिप्पणियाँ आई थीं तो दिल कितना खुश हुआ था। कुछ महीनों के पश्चात काव्य-पल्लवन की शुरूआत हुई। एक दिए गए विषय पर लिखना एक नया हीं अनुभव था। युग्म के अन्य मित्रों के सहयोग से धीरे-धीरे मैं भी अनुभवी होता गया।

फरवरी २००७ के यूनिकवि विजेता "गौरव सोलंकी" के प्रयास से युग्म ने एक नया अभियान शुरू किया , जिसका नाम था "कहानी-कलश" । युग्म बस कविताओं तक हीं सीमित नहीं रहना चाहता था , उसके पास कहानिकारों की भी एक उम्दा फौज थी। इसलिए कहानी-कलश भी चल निकला। मैने कभी पहले कोई कहानी नहीं लिखी थी, लेकिन मित्र गौरव के कहने पर मुझमे भी कहानी-लेखन की जिज्ञासा जगी। कुछ कच्चे शब्दों को जोड़कर मैने भी एक कहानी रच डाली "तुलसी की छांव" । कुछ सुधि पाठकों ने मेरी प्रथम कहानी को सराहा । फिर २-३ महीनों के अंतराल पर मैने कहानी लिखने का प्रण किया। ३-४ कहानियाँ लिख डालीं, लेकिन अब भी मुझे कहानी लेखन बड़ा हीं मेहनत का काम लगता है, इसलिए ज्यादा लिख नहीं पाता।

इसी तरह "राजीव रंजन प्रसाद" की कड़ी निष्ठा के बदौलत युग्म ने बाल-साहित्य पर भी काम करने का वचन लिया। इसी दिशा में "बाल-उद्यान" नाम का एक नया मंच तैयार किया गया। मैने भी अपनी कुछ कविताएँ वहाँ प्रेषित की , जो मैने आठवीं से दसवीं के बीच लिखी थी। जब लिखी थी, तब मुझे वो रचनाएँ बचकानी नहीं लगती थी, लेकिन अब वे बचकानी के अलावा कुछ नहीं लगतीं ;) बाल-उद्यान अभी भी अपने कार्य में सफलतापूर्वक तल्लीन है।

कुछ महीनों के बाद युग्म पर "सजीव सारथी" का पदार्पण हुआ और उन्होंने युग्म को एक नई दिशा हीं दे दी। कविताएँ, कहानियाँ अब बस लिखी हीं नई जाने लगीं, बल्कि उनमें आवाज रूपी जान भी पैदा की गई। गीत बनने लगें, गज़लें तैयार होने लगीं, नए-नए संगीतकार,गीतकार और गायकों का युग्म पर आगमन शुरू हो गया।शुरू-शुरू में हर महीने एक नया गीत युग्म की शोभा बढाने लगा, फिर हर पंद्रह दिनों पर और अब हर सप्ताह। मैने भी सोचा कि अपनी प्रतिभा का इम्तीहान लिया जाए। मैने अपना एक गीत सुभोजित को भेज दिया। २ हफ्तों की माथापच्ची के बाद गीत के बोल में ढेर सारे परिवर्त्तन किए गए । २-३ महीनों की मेहनत के पश्चात सुभोजित ने इसे फाईनल लूक और टच दिया और १-२ हफ्तों की कलाकारी और गलाकारी लगाकर बिस्वजीत ने इसे अपनी आवाज से एक नया हीं रंग दे दिया। आखिरकार वह गीत पिछले सप्ताह आवाज़ के मंच पर रीलिज हो गया। उम्मीद है कि सभी पाठको और श्रोताओं ने उस गीत का रसास्वादन किया होगा।

"मेरे सरकार" इस गीत के पीछे की कहानी कुछ खास नहीं है। आज सबके समक्ष मैं उस कहानी का पर्दाफाश कर रहा हूँ। दर-असल सुभोजित ( हमारे प्यारे संगीतकार साहब) , जो कि अभी ११वीं में पढते हैं, को एक ऎसे गाने की जरूरत थी, जो वे अपनी भावी प्रेमिका को सुना सकें और उसे मोहित कर सकें। भावी इसलिए क्योंकि वो सौभाग्यशाली लड़की अभी तक उनकी प्रेमिका बनी नहीं थी, एकतरफा प्यार था। मैने उसे जो गाना दिया था, उसमें कुछ बांग्ला के भी शब्द थे। मैने सोचा था कि लड़की बंगाली हीं होगा, इसलिए "बोलबो आमि सोना, तुमाके भालो बासि"(मैं तुमसे कहूँगा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ) जैसे वाक्य मैने जानकर डाले थे। लेकिन न जाने क्यों सुभोजित ने वह गाना स्वीकार नहीं किया। शायद लड़की बंगाली नहीं होगी :) । उसने कहा कि एक हिंदी गाना लिखकर दो। तो मैने "मेरे सरकार" लिखा। और वाह............सुभोजित ने वह गाना स्वीकार कर लिया। उसने कहा कि बहुत हीं मीठे बोल हैं, मैं इसपर कुछ क्लासिकल टाईप का म्युजिक दूँगा। मैं हैरान.....इस गाने पर क्लासिकल म्युजिक। मरता क्या न करता....आखिर मेरा पहला गाना था। मैने बोला कि तुम जो भी बनाओगे , अच्छा हीं बनाओगे, तुम्हारी मर्जी क्लासिकल हीं दो। और उसने जो म्युजिक(संगीत) दिया, मैने उसकी आशा भी नहीं की थी। बहुत हीं खूबसूरत.....मजा आ गया।

तो ये रही "मेरे सरकार" के पीछे की कहानी..............। अब पता नहीं सुभोजित अपने सरकार को अपनी प्रेयसी बना पाए कि नहीं ;)

जब मैं युग्म का सदस्य बना था, तो बमुश्किल १० लोग हीं हमारे साथ थे। लेकिन हम सबों के प्रयास से युग्म की सदस्य-संख्या बढती गई। अब तो ५० से भी ज्यादा लोग हमारे कारवां में शामिल हैं। इसलिए युग्म की प्रगति में हम सबका बराबर का सहयोग अपेक्षित है। मैं बस यही दुआ करता हूँ कि हर कोई निस्वार्थ भाव से यूँ हीं युग्म की सेवा करते रहे और युग्म अपने हरेक मंच पर सफलता का परचम लहराए।

- विश्व दीपक "तन्हा"

युग्म परिवार की तरफ़ से भी "तन्हा" जी को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनायें. इसी बात पर क्यों न एक बार फ़िर आनंद लें सप्ताह के गीत "मेरे सरकार" का, और हौंसलाअफजाई करें आवाज़ की इस नयी संगीत टीम का -




आप भी इसका इस्तेमाल करें

Tuesday, September 2, 2008

मिलिए बर्ग वार्ता वाले स्मार्ट इंडियन से

'पढ़ने' की बजाय 'सुनने' को ज्यादा प्राकृतिक मानने वाले अनुराग

दोस्तो,

पिछले २ सप्ताहों से आप एक आवाज़ को हिन्द-युग्म पर खूब सुन रहे हैं। और आवाज़ ही क्या, इंटरनेट पर हिन्दी की जहाँ उपस्थिति है, वहाँ ये उपस्थित दिखाई देते हैं। हमारे भी हर मंच पर ये दिखते हैं। इन्होंने आवाज़ पर ऑडियो-बुक का बीज डाला। इनका मानना है कि भारत में ऑडियो बुक्स में अभी बहुत सम्भावनाएँ हैं। ये हिन्दी साहित्य को किसी भी तरह से जनप्रिय बनाना चाहते हैं। इसीलिए अपनी आवाज़ में प्रसिद्ध कहानियाँ वाचने का सिलसिला शुरू कर दिया है।

अनुराग शर्मा
अनुराग विज्ञान में स्नातक तथा आईटी प्रबंधन में स्नातकोत्तर हैं। एक बैंकर रह चुके हैं और वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका में एक स्वास्थ्य संस्था में ऍप्लिकेशन आकिर्टेक्ट हैं। उत्तरप्रदेश में जन्मे अनुराग भारत के विभिन्न राज्यों में रह चुके हैं । फिलहाल पिट्सबर्ग में रहते हैं। लिखना, पढ़ना, बात करना यानी सामाजिक संवाद उनकी हॉबी है। शायद इसीलिए वे कविता, कहानी, लेख आदि विधाओं में सतत् लिखते रहे हैं। वे दो वर्ष तक एक इन्टरनेट रेडियो (PittRadio) चला चुके है। पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति पर वे सृजनगाथा पर एक शृंखला लिख रहे हैं। एक हिन्दी काव्य संग्रह "पतझड़ सावन वसंत बहार" प्रकाशनाधीन है। आजकल अपने उपन्यासों “बांधों को तोड़ दो”"An Alien Among Flesh Eaters" पर काम कर रहे हैं। उन्हें Friends of Tibet (भारत) एवं United Way (संयुक्त राज्य अमेरिका) जैसे समाजसेवी संगठनों से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त है। वे सन् 2005 में लगभग एक लाख डॉलर की सहायता राशि जुटाने वाली त्सुनामी समिति के सदस्य भी रहे हैं। आप उन्हें स्मार्ट इंडियन पर भी मिल सकते हैं।

आइए इनसे कुछ बाते हैं करते हैं।

सवाल- आप इतना सबकुछ करते हैं, कहीं आपका २४ घण्टा ४८ का तो नहीं होता! :)

अनुराग: मेरा दिन सिर्फ़ १५-१६ घंटे का होता है क्योंकि और कुछ हो न हो ८-९ घंटे की नींद मेरी सबसे ज़रूरी खुराक है. काम शुरू करने से पहले जहाँ तक सम्भव हो उसकी योजना मन में बना लेता हूँ, याददाश्त अच्छी है और मन शांत रहता है इसलिए थोड़ी आसानी हो जाती है. समय का सदुपयोग करता हूँ. मेरा काम ऐसा है जिसमें नयी तकनीक से हमेशा रूबरू होना पड़ता है और मैं आजन्म विद्यार्थी हूँ. किताबें पढने के बजाय जहाँ तक सम्भव हो ऑडियो बुक्स को सुनता हूँ. ड्राइव करते समय रेडियो पर खबरें और CD पर किताबें व संगीत सुनता हूँ. दफ्तर व घर में काम करते समय भी अपने काम से जुड़े हुए पॉडकास्ट सुनता हूँ.

सवाल:- जबकि भारत में इंटरनेट गति की बहुत अच्छी हालत नहीं है, फिर आप कैसे मान रहे हैं कि हमारा कहानियों, उपन्यासों, नाटकों को आवाज़ देने का प्रोजेक्ट सफल होगा?

अनुराग- पता नहीं इसका उत्तर मैं ठीक से (express) समझा पाऊँगा कि नहीं, मगर कुछ उदाहरणों से कोशिश करता हूँ:

क) सुनना प्राकृतिक है, पढ़ना नहीं.

ख) आज इन्टरनेट धीमा हो सकता है मगर कल उसे तेज़ ही होना है.

ग) ८० के दशक में भारतीय बैंकों ने कंप्यूटर लगाने की कोशिश की थी. एक लाख रुपये में बिना हार्ड डिस्क के १२८ MB रैम के कंप्यूटर आये तो कुछ लोगों ने कहा कि पैसे की बर्बादी है. वामपंथी दलों ने तो बहुत पुरजोर विरोध इस बिना पर किया कि कंप्यूटर आने से सारा भारत बेरोजगार हो जायेगा. एक दशक के अन्दर न सिर्फ़ कंप्यूटर सुधरे, उनसे जुडी हुई नई तकनीक, इन्टरनेट, मोबाइल आदि छा गए. बेरोजगारी तो दूर, आज भारतीयों को सारी दुनिया में रोज़गार मिला कंप्यूटर की बदौलत. यह घटना बताने का तात्पर्य यह है कि दृष्टा आज को नहीं आगत कल और परसों को देखता है - यहीं पर वह अन्य लोगों से भिन्न होता है.

घ) धीमी गति में डाउनलोड होने पर भी वह डाउनलोड दूसरा काम करते हुए - मसलन आप नहायिये तब तक डाउनलोड हो जाता है - कपड़े पहनिए तब तक सुना भी जा सकता है. पढ़ने में कहीं अधिक समय लगता है.

प) वृद्ध लोग, कमज़ोर आँखों वाले, या मेरे जैसे जो आँखें बंद करके बेहतर ध्यान दे पाते हैं - ऐसे लोगों के लिए तो ऑडियो-बुक्स वरदान के समान हैं. मैं कितना भी थका हुआ हूँ, भले ही पढ़ न सकूँ, सुन तो सकता ही हूँ.

फ) नाद ब्रह्म है. कागज़ आया और चला गया - श्रुतियाँ उससे पहले भी थीं और उसके बाद भी रहेंगी - सरस्वती वाक्-देवी हैं. संस्कृत का पूरा नाम संस्कृत-वाक् है. हमारी संस्कृति में कथा का पाठ नहीं वाचन होता है.

भ) टीवी आया तो सबने कहा कि रेडियो के दिन पूरे हुए - मगर हुआ क्या? AM से हम FM में आ गए और आगे शायद कहीं और जाएँ मगर निकट भविष्य में सुनना आउट ऑफ़ फैशन नहीं होने वाला है यह निश्चित है.

सवाल- क्या आप अपने वाचन से संतुष्ट हैं या इसमें परिमार्जन के पक्षधर हैं?

अनुराग- मैं अपने वाचन से कतई भी संतुष्ट नहीं हूँ मगर मेरा विश्वास है कि - लैट परफेक्शन नॉट बी दि एनेमी ऑफ़ द गुड. मेरे शब्दों में -
बात तो आपकी सही है यह, थोडा करने से सब नहीं होता
फ़िर भी इतना तो मैं कहूंगा ही, कुछ न करने से कुछ नहीं होता


इस प्रक्रिया में मेरा वाचन भी सुधरेगा - दूसरे जब यह काम शुरू हो जायेगा, तो दूसरी बहुत अच्छी आवाजें सामने आयेंगी. जब हम एक टीम बना पायेंगे, तो कथा-संकलन संगीत, आवाज़ व रिकार्डिंग तकनीक के श्रेष्ठ पक्ष सामने आयेंगे।

सवाल- भारत से दूर रहकर खुद को भारत से जोड़ना ब्लॉगिंग के कारण कुछ आसान नहीं हो गया है?

अनुराग- भारत से दूर रहकर भी खुद को भारत से जोड़ना ब्लॉगिंग के कारण आसान हुआ है - मैं इसका श्रेय यूनीकोड और ट्रांसलिट्रेशन को दूंगा जिन्होंने हम जैसों में लिखना आसान कर दिया.

सवाल- आवाज़ पर आपकी भावी योजनाएँ क्या हैं?

अनुराग- आवाज़ की भावी योजनाएँ तो सारी टीम को मिलकर लोकतांत्रिक (पारंपरिक शब्दों में याज्ञिक) रूप से ही तय होनी चाहिए।

Tuesday, August 26, 2008

हिंद युग्म ने मेरे सपनों को रंग और पंख दिये...

आवाज़ पर हमारे इस हफ्ते के सितारे हैं, शायरा शिवानी सिंह और संगीतकार / गायक रुपेश ऋषि. हिंद युग्म के पहला सुर एल्बम में इस जोड़ी ने मशहूर ग़ज़ल "ये जरूरी नही" का योगदान दिया था, नए सत्र में एक बार फ़िर इनकी ताज़ी ग़ज़ल "चले जाना" को श्रोताओं का भरपूर प्यार मिला... शिवानी जी दिल्ली में रह कर सक्रिय लेखन करती है, साथ ही एक NGO, जो कैंसर पीडितों के लिए काम करती है, के लिए अपना समय निकाल कर योगदान देती है, युग्म से इनका रिश्ता बहुत पुराना है, चलिए पहले जानते हैं शिवानी जी से, कि कैसा रहा हिंद युग्म में उनका अब तक का सफर -

शिवानी सिंह - नमस्कार, मेरा प्रसिद्द नाम शिखा शौकीन है, परन्तु काव्य जगत में, मैं शिवानी सिंह के नाम से जानी जाती हूँ ! अब तक मैं करीब ३७० कविताएं लिख चुकी हूँ ! मेरा ९० कविताओं का एक संग्रह `यादों के बगीचे से' नाम से छप चुका है और दूसरा `कुछ सपनो की खातिर' प्रकार्शनार्थ तैयार है ! मैंने बी.ए, एस.सी मिरांडा हाउस , दिल्ली विश्वविद्यालय से की है और बी.एड, हिन्दू कालेज सोनीपत से !


मेरी ग़ज़लों के संग्रह में से "चले जाना" मेरी पसंदीदा ग़ज़ल है ! ये ग़ज़ल मैंने १९८२ में लिखी थी, और इतने सालों बाद जब इसकी रिकार्डिंग हो रही थी तो अचानक हमारे गायक और संगीतकार रुपेश जी ने मुझसे अंतिम दो नयी लाइन लिखने को कहा ! मैं असमंजस में पड़ गयी ! मुझे लगा जैसे मैं संगीत की परीक्षा दे रही हूँ ! करीब ५ मिनट में ही मैंने इस ग़ज़ल की अंतिम लाइने लिख कर दे दी ! अपनी इस संगीत की परीक्षा का परीक्षाफल जब ग़ज़ल के रूप में मिला तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई की शायद मैंने ये परीक्षा पास कर ली है !

मेरे सपनो को रंग और पंख हिंद युग्म से मिले ! मैं हिंद युग्म की बहुत बहुत शुक्रगुजार हूँ, क्योंकि हिन्दयुग्म के माध्यम से मुझे अपनी बात और जज़्बात दुनिया भर के श्रोताओं तक पहुंचाने का अवसर मिला है ! ये मेरा सौभाग्य है कि मेरी एक ग़ज़ल `ये ज़रूरी नहीं' हिन्दयुग्म ने अपनी पहली एल्बम `पहला सुर' में शामिल कर मुझे कृतार्थ किया है ! हिंद युग्म के अन्य क्षेत्रों में भी मैंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है जैसे यूनिकवि प्रतियोगिता, ऑनलाइन कवि सम्मलेन तथा कहानियों के पॉडकास्ट में भाग ले कर !

कहते हैं कोई भी काम अकेले संभव नहीं होता ! मेरे शब्दों को अपनी पूरी मेहनत ,लगन ,निष्ठा, अपनी गंभीर, मधुर आवाज़ और कर्णप्रिय संगीत दे कर रुपेश जी ने ग़ज़ल को सुन्दर रूप दिया है ! रुपेश जी अपने काम के प्रति बहुत ही समर्पित हैं ,यही वजह है कि मैं अपनी समस्त गज़लें इन्हीं की आवाज़ और संगीत में स्वरबद्ध कराना पसंद करती हूँ ! मैं उनके उज्व्वल भविष्य के लिए इश्वर से प्रार्थना करती हूँ ! मैं जगजीत सिंह जी की फैन हूँ ,और तलत अज़ीज़ जी की गज़लें सुनना भी बहुत पसंद करती हूँ ! हिंद युग्म में मुझे यहाँ तक पहुंचाने में सजीव जी, निखिल जी, शैलेश जी व रंजना जी का हाथ है। अपने इन मित्रों के सहयोग देने के लिए मैं इनकी तहे दिल से शुक्र गुजार हूँ।

शुक्रिया शिवानी जी, पूछते हैं रुपेश जी से भी, कि अपनी इस ताज़ी ग़ज़ल को मिली आपर सफलता के बाद उन्हें कैसा लग रहा है, रुपेश जी दिल्ली में "सुकंठ" नाम से एक स्टूडियो चलाते हैं, और अपनी एक टीम के साथ व्यावसायिक रूप से संगीत के क्षेत्र में कार्यरत हैं. -

रुपेश ऋषि - हिंद युग्म के बारे में मुझे शिवानी जी से पता चला था, जब इन्होंने बताया कि उनकी ग़ज़ल `पहला सुर' में सम्मिलित होने जा रही है। इसी दौरान मेरी मुलाक़ात सजीव जी व शैलेश जी से हुई। उनकी बातों ने मुझे बहुत प्रभावित किया और जब उन्होंने मुझ से अपने अल्बम कि समस्त कविताओं को मेरी आवाज़ देने का निवेदन किया तो मैंने उनका ये निवेदन सहर्ष स्वीकार कर लिया !

शिवानी जी जब पहली बार मेरे पास अपने गीत व ग़ज़ल लेकर आई तो मैंने देखा कि उनकी लिखी गज़लें बहुत ही सरल और दिल से लिखी हुई थी। इनके लेखन में मुझे विविधता भी देखने को मिली। इनकी हर ग़ज़ल अपने अलग अंदाज़ में है। इनके लेखन की इसी विशेषता से मुझे इनकी ग़ज़ल तैयार करने में अलग ही आनंद आया। मैं शुक्रगुजार हूँ अपने उन सभी श्रोताओं का जिन्होंने मेरी गज़लें “ये ज़रूरी नहीं” और "चले जाना" सुनी और सराही।

अंत में ,मैं यही उम्मीद करता हूँ कि हिंद युग्म परिवार यूँ ही स्नेह बनाये रखे और नए कलाकारों की कला को इस मंच पर ला कर पूरी दुनिया को दिखाए और उनका मनोबल बढाए.

जरूर रुपेश जी, यही हिंद युग्म, आवाज़ का मकसद भी है, हम कोशिशें जारी रखेंगे, आप यूँ ही स्नेह और सहयोग बनाये रखें.
दोस्तो, आइए एक बार फ़िर सुनें और आनंद लें रुपेश जी की गाई और शिवानी जी की लिखी इस ताज़ा ग़ज़ल का -




Wednesday, August 20, 2008

गा के जियो तो गीत है जिंदगी...

"जीत के गीत" गाने वाले बिस्वजीत हैं, आवाज़ पर इस हफ्ते के उभरते सितारे.

यह संयोग ही है कि उनका लघु नाम (nick name) भी जीत है, और जो पहला गीत उन्होंने गाया हिंद युग्म ले लिए, उसका भी शीर्षक "जीत" ही है. जैसा कि हम अपने हर फीचर्ड आर्टिस्ट से आग्रह करते हैं कि वो अपने बारे में हिन्दी में लिखें, हमने जीत से भी यही आग्रह किया, और आश्चर्य कि जीत ने न सिर्फ़ लिखा बल्कि बहुत खूब लिखा, टंकण की गलतियाँ भी लगभग न के बराबर रहीं, तो पढ़ें कि क्या कहते हैं बिस्वजीत अपने बारे में -


मैं उड़ीसा राज्य के एक छोटे शहर कटक से वास्ता रखता हूँ. मेरा जन्म यहीं हुआ और बचपन इसी शहर में बीता. मैं हमेशा से ही पढ़ाई में उच्च रहा और मुझे कभी नहीं पता था कि मुझ में गायन प्रतिभा है. एक बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मैंने बिना सोचे अपने स्कूल के गायन प्रतियोगिता में भाग लिया और अपने सभी अध्यापको से सराहा गया. तभी से मुझ में गायन की जैसे मानो लहर सी चल गई. और जब में अपने कॉलेज के दौरान ड्रामाटिक सेक्रेटरी चुना गया तो मुझे अलग अलग तरह के कार्यक्रमों में गाने का अवसर प्राप्त हुआ और तभी मैं कॉलेज का चहेता गायक बन गया. मैं अपने कॉलेज के दौरान किशोर कुमार, कुमार सानू,हरिहरन, एस पी बालासुब्रमन्यम के गानों को गाकर प्यार बटोरा करता था.

मैं व्यवसाय में सॉफ्टवेर इंजिनियर हूँ और मैं इसको भगवान का आशीर्वाद मानता हूँ. मेरे व्यवसाय ने मुझे कभी गायन में मदद तो नहीं की, पर हमेशा ऐसे लोगो से मिलवाया है जो संगीत से ताल्लुक रखते है और इससे हमेशा मेरे व्यक्तित्व में उन्नति हुई है. मैं हमेशा से ही किशोर कुमार जी का प्रशंसक रहा हूँ. नए दौर के गायकों में सोनू निगम, केके और शान को पसंद करता हूँ.

संगीत मेरी चाह है. अच्छे संगीत से मैं हमेशा उत्सुक रहता हूँ. मैं समझता हूँ की संगीत ईश्वरीय है और इसमें संसार को बदलने की परिपूर्णता है .किसी ने बोला है 'गाके जियो तो गीत है ये जिंदगी'. अगर संगीत हमारे जीवन का एक हिस्सा हो, जीवन एक गीत की तरह सुंदर बन जाता है. मैं गायक की निर्मलता और शुद्धता में विश्वास रखता हूँ. जैसे ताजगी फूलो को असामान्य बना देती है वैसे ही सादगी गायकी को ईश्वरीय बना देती है. आनेवाले सालो में, मैं हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखना चाहूँगा.

मैं और हिंद युग्म

हिंद युग्म के साथ मेरी मुलाक़ात एक अचम्भे की तरह हुई. समाज मे बहुत कम ऐसी वेबसाइट्स है, जो हिन्दुस्तानी संगीत की संस्कृति और हिन्दी भाषा को बढ़ावा देते है,यही हिंद युग्म की सबसे बड़ी विशेषता है. इसके साथ जब मुझे जीत के गीत गाने का मौका मिला, मेरी खुशी दुगनी हो गयी. हिंद युग्म के माध्यम से मुझे अर्थपूर्ण गायन का मौका मिला जो हमेशा से मेरा सपना रहा है. मुझे गर्व है की मेरा गाया हुआ गीत "जीत के गीत" सभी को प्रेरित करने योग्य है.

रिषीजी और सजीवजी के साथ काम करना मेरे सौभाग्य की बात है जिनके संगीत और शब्दों में जादू है.

पाठको के लिए संदेश

भगवान ने दुनिया की रचना की शुरूवात नाद और संगीत के माध्यम से की थी. नदी की बहाव में, बादलों की गरज में और प्रकर्ति के हर सौंदर्य में नाद और संगीत कहीं न कहीं छिपे हुए है. यही कारण है कि हमेशा नाद और संगीत हमें शान्ति की और ले जाते है और मानें तो भगवान के करीब ले जाते है. तो चलिए अपने जीवन को हिंद युग्म के द्वारा नाद और संगीत से परिपूर्ण कर दे.

जितना सुंदर गायन है, उतने ही सुंदर विचार हैं, बिस्वजीत के, तो लीजिये एक बार फ़िर सुनिए उनका गाया ये पहला गीत, और इस बेहद प्रतिभावान गायक को, अपना मार्गदर्शन दे, प्रोत्साहन दें.

Wednesday, August 13, 2008

और दिल जुनून पर है...

राख हो जायेंगे हम, आग का हुस्न फुनून पर है,
मोहब्बत बे-इन्तहा है, और दिल जुनून पर है.

Love or material needs, whatever you may want is not what you will get. Life moves on & so does your soul. But somewhere deep inside you, there is a place where that vacancy always exists forever & its irreplaceable.

ये कहना है सुदीप यशराज का, जो हैं आवाज़ पर इस हफ्ते के, उभरते सितारे. हमने कोशिश की, कि सुदीप भी हमें अपने बारे में हिन्दी में ही लिख कर दें, पर अतिव्यस्तता के चलते वो ऐसा नही कर पाये. तो हमने उनके कथन मूल रूप में ही आपके सामने रख रहे हैं.

दिल्ली में जन्मे और पढ़े बढ़े सुदीप इन दिनों मुंबई में हैं. हिंद युग्म पर अपने पहले गीत "बेइंतेहा प्यार..." को मिले प्रोत्साहन से सुदीप बेहद संतुष्ट हैं. उनका मानना है -

Business or music is creative outburst of mind which should achieve satisfaction, life is just a memory if not lived the way you want to.



I am not a trained musician & make music for personal satisfaction.

I have been lucky to be in the company of some of the great musicians of Varanasi, anything that i learnt or i know is a gift of my stay at Reeva Kothi on Assi Ghat in Varanasi. Born & bought up in a modest Brahmin family of Delhi, I have played with many popular bands in Delhi & I am now a veteran in that circuit.

I have actively composed ad jingles, musical shows for many producers in India.

Professionally I m a CRM consultant & work with one of India's biggest loyalty company in marketing domain. Whenever get free time I love spending it with my 9 months old daughter.

My music is highly influenced by my life where each songs denote moments of what I call as living. I write, compose & sing for the simple reason that the journey called life is much better with ones own creative expression.

If I ever go missing, I would be found on top of a hill along with my Guitar. Just follow the voice & you will find me.

मेरी आवाज़ ही पहचान है.... बिल्कुल ठीक है सुदीप, हम आपके संगीत के पीछा करते करते आप तक पहुँच ही जायेंगे.

सुदीप जल्द ही संगीत की दुनिया में अपनी एक नई पहचान लेकर उतरेंगे, हिंद युग्म की टीम अपनी समस्त शुभकामनायें सुदीप को देती है. सुदीप के संगीत की ताज़गी को एक बार फ़िर से महसूस कीजिये यह गीत सुनकर.

Wednesday, August 6, 2008

हमेशा लगता है, कि यह गीत और बेहतर हो सकता था....

दोस्तो,
आवाज़ पर इस हफ्ते के "फीचर्ड कलाकार" है, युग्म के संगीत खजाने को पाँच गीतों से सजाने वाले ऋषि एस. संगीतकार ए आर रहमान के मुरीद, ऋषि हमेशा ये कोशिश करते हैं कि वो हर बार पहले से कुछ अलग करें. उनके हर गीत को अब तक युग्म के श्रोताओं ने सर आँखों पे बिठाया है, कभी मात्र शौकिया तौर पर वोइलिन बजाने वाले ऋषि, अब बतौर संगीतकार भी ख़ुद को महत्त्व देने लगे हैं, युग्म ने की ऋषि एस से एक ख़ास बातचीत.


(ऋषि मूल रूप से हिन्दी भाषी नही हैं, पर उन्होंने हिन्दी में अपने जवाब लिखने की कोशिश की है, तो हमने उनकी भाषा में बहुत अधिक संशोधन न करते हुए, यहाँ रखा है, ऋषि हिन्दी को शिखर पर देखने की, हिंद युग्म की मुहीम के पुरजोर समर्थक है, और युग्म के लिए वार्षिक अंशदान भी देते हैं)


हिंद युग्म - स्वागत है ऋषि, "मैं नदी..." आपका ५ वां गीत है, कैसे रहा अब तक का सफर युग्म के संगीत के साथ ?

ऋषि -सबसे पहले मैं हिंद युग्म को शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, मेरे जैसे "amateur" संगीतकारों को अपना "talent" प्रदर्शन करने का मौका दिया है. हर गाने का "feedback" पढ़कर न सिर्फ़ प्रोत्साहन मिलता है बल्कि यह भी पता चलता है की गाने मे क्या कमियां है. इन गानों का एल्बम बनाकर उसे एक "larger audience" तक पहुंचने का कष्ट जो हिंद युग्म उठता है, मैं इसके लिये बहुत शुक्रगुजार हूँ. इस अवसर पर मे सजीव जी और अलोक जी और मेरे सभी सिंगेर्स, सुबोध साठे, मानसी पिम्पले और जयेश शिम्पी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. "They have added soul to my songs".

हिंद युग्म -कुछ अपने बारे में बताईये, हमारे श्रोता आपके बारे में बहुत कम जानते हैं ?

ऋषि द्वारा कम्पोज्ड गीत
मैं नदी
बढ़े चलो
सुबह की ताज़गी (पहला सुर)
वो नर्म सी (पहला सुर)
झलक (पहला सुर)
ऋषि - मै हैदराबाद से हूं और "by profession software engineer" का काम करता हूँ.संगीत रात मे और weekends पे इस दुनिया से कुछ समय दूर रहने के लिये compose करता हूँ. मैने वोइलिन पे कार्नाटिक शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लिया है. western हार्मोनी, orchestration/अर्रंजेमेंट , audio mixing की शिक्षा मैने " self study" करके सिखा हैं.अभी सीखना जारी है. मुझे नही लगता कभी ख़तम होगी ये प्रक्रिया. Music compose करते समय थोड़ा सा कीबोर्ड बजा लेता हूँ.Guitar सीखने के कोशिश किया था एक समय, लेकिन software profession के कारण continue नही कर पाया.

हिंद युग्म - संगीत किस तरह का पसंद है आपको सुनना, अगर आप अपनी एल्बम प्लान करेंगे तो वो किस तरह की होगी ?

ऋषि -मै अपने mood और महौल के हिसाब से अलग अलग style का संगीत सुनना पसंद करता हूँ. खासकर इन्डियन classical, western classical, इंडियन film music, कुछ तरह के fusion, world music, सुनना पसंद करता हूँ.कभी कभी पॉप, रॉक, R&बी, रैप, Jazz जैसे western फोरम्स भी सुन लेता हूँ.
मेरे एल्बम का संगीत के बारे में कुछ नही जानता, क्यों की मै प्लान कर compose नही करता. I compose what ever comes to me from my heart. लेकिन एक सपना है ज़रूर है कि कुछ ऐसा एल्बम बनाऊं जिसमे सिर्फ़ संगीत का मज़ा ही नही बल्कि समाज के लिए कोई स्ट्रोंग मेसेज हो.फिलहाल ऐसे कोई थीम की खोज में हूँ.

हिंद युग्म - आप एक बड़ी कंपनी में कार्यरत हैं, कैसे समय निकाल पाते हैं अपने संगीत कार्यों के लिए ?


ऋषि -If someone asks you how you make time for having breakfast, lunch, dinner, sleep everyday when you have to work for a company, what would you say? I don't make any special efforts to make time for music. I compose only when it comes naturally to me.It has become a daily habit now.

हिंद युग्म - अब तक आपके रचे गए गीतों में आपका सबसे पसंदीदा गीत कौन सा है ?

ऋषि - अब तक के मेरे compose किये हुए गीतों से मैं संतुष्ट नही हूँ. मै गाना पुरा ख़तम कर जब प्रोजेक्ट बंद कर देता हूँ तो उसके बाद् उस गाने को बहुत कम सुनता हूँ. इसका कारण यह है की मुझे उस गाने की कमियां नज़र आती हैं और गाने का मज़ा नही ले पाता. यही लगता है कि यह गाना इससे भी अच्छा हो सकता है. लेकिन समय की पाबन्दी और गाने को ज्यादा manipulate करने से उसकी natural flow ख़राब होने के डर से अगले गाने में कुछ बेहतर करने का उम्मीद लेकर आगे बढता हूँ.

हिंद युग्म - "बढ़े चलो..." में आपको सबसे अधिक समय लगा, उस गीत के बारे में कुछ बताईये ?

ऋषि -"बढ़े चलो..." ख़तम करने में हमे करीब ५ मैने लग गये. कोम्पोसिशन में मुझे ज्यादा वक्त नही लगा लेकिन delay के कई कारण थे. जब इस गाने का concept सजीव जी ने मुझे बताया था तब मै official काम पर विदेश में था. गाना record कर mix करने के लिये मुझे India वापिस आने तक इंतज़ार करना पड़ा. India आकर मुझे अपने होम स्टूडियो मै कुछ changes करने थे. इसमे कुछ वक्त निकल गया. गाने में तीन आवाजों की जरुरत थी. हमे गायकों को खोज कर उनके availability के हिसाब से record करने में और वक्त लग गया. हमे दूसरा मेल गायक नही मिल रहा था, गाना का काफ़ी delay हो जाने के कारण मुझे ख़ुद आवाज़ देनी पड़ी.

हिंद युग्म - अक्सर पहले गीत लिखा जाता है या फ़िर धुन पर बोल पिरोये जाते हैं, आप को कौन सी प्रक्रिया बेहतर लगती है ?


ऋषि - मै गाना बनाना या तो धुन से शुरू कर सकता हूँ या फिर कविता से. मै यह मानता हूँ कि दोनों तरीकों में अपनी अपनी pros and cons है. मेरे "सुबह की ताजगी", "झलक" और "बढ़े चलो" गाने पहले लिखे गये. उनका धुन बाद मे बनाया गया. "मैं नदी .." और "वो नर्म सी मदहोशी" गानों का धुन पहले बनाए थे. It is challenging for the poet to write meaningfully to the tune.


हिंद युग्म - इस इन्टरनेट jamming के माध्यम से संगीत रचना कठिन काम है, मगर आप इस आईडिया के मूल बीज कहे जा सकते हैं युग्म के लिए, इस पर कुछ कहें ?

ऋषि- IT industry मे होने के कारण मुझे internet के द्वारा गाने बनाने मे ऐसा नही लगा की कुछ नई चीज़ कर रहा हूँ. हम दफ्तर मे दुनिया के opposite कोने के लोगों के साथ रोज़ काम करते हैं. गायकों के साथ आमने सामने बात नही होने के कारण गाने के vocals पे बहुत असर पड़ा है. मेरे गानों मे vocals हमेशा ही weak रहे हैं और इसका कारण गायक और संगीतकार remote है.मुझे इस बात का अफ़सोस है और आशा करता हूँ की मुझे गायकों को face-to-face record करने का मौका मिले और उनके singing abilities का फ़ायदा उठा सकूं .

हिंद युग्म - साल में लगभग ४-५ महीने आप विदेश यात्रा पर होते हैं, उस दौरान क्या आप संगीत से अलगाव महसूस करते हैं ? इस वक्त भी आप शिकागो में हैं.


ऋषि -I make use of of my time outside India to listen to new music and to learn about the new developments in music technology. In India, the resources are less on one hand and I m too busy composing so I don't find time to sit and read books. I also record tunes when I get the inspiration. I work on some song concepts as well.

हिंद युग्म - शुक्रिया ऋषि आप जल्दी से स्वदेश वापस आयें और नए गीतों पर काम शुरू करें, युग्म के श्रोता आपके अगले गीत का बेसब्री से इन्तेज़ार करेंगे.

ऋषि - Thanks once again to Hind Yugm for giving me the opportunity to compose for it. I look forward to do better music for yugm audience.

दोस्तों एक बार फ़िर ढेर सारी शुभकामनायें देते हुए, बतौर संगीतकार उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए, सुनते हैं, ऋषि एस का स्वरबद्ध किया, ये ताज़ा और मधुर गीत.


Wednesday, July 30, 2008

तेज़ बारिश में कबड्डी खेलना अच्छा लगता है ...

दिल्ली के अनुरूप कुकरेजा हैं, आवाज़ पर इस हफ्ते का उभरता सितारा.

इस बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार की ताज़ा स्वरबद्ध ग़ज़ल "तेरे चेहरे पे" बीते शुक्रवार आवाज़ पर आयी और बहुत अधिक सराही गयी. ग़ज़लों को धुन में पिरोना इनका जनून है, और संगीत को ये अपना जीवन समर्पित करना चाहते हैं. फरीदा खानम, मुन्नी बेगम और जगजीत सिंह इन्हे बेहद पसंद हैं, अपने भाई निशांत अक्षर, जो ख़ुद एक उभरते हुए ग़ज़ल गायक हैं, के साथ मिलकर एक एल्बम भी कर चुके हैं. संगीत के आलावा अनुरूप को दोस्तों के साथ घूमना, बेड़मिन्टन, लॉन टेनिस, बास्केट बोंल और क्रिकेट खेलना अच्छा लगता है, मगर सबसे ज्यादा भाता है, तेज़ बारिश ( जो हालाँकि दिल्ली में कम ही नसीब होती है ) में कबड्डी खेलना. जिंदगी को अनुरूप कुछ इन शब्दों में बयां करते हैं -

Life always creates new and BIG troubles through which i pass learning new and BIGGER things.
Even A failure is a success if analyzed from the other side of it.


हमने अनुरूप से गुजारिश की, कि वो हिंद युग्म के साथ उनके पहले संगीत अनुभव के बारे में, यूनि कोड का प्रयोग कर हिन्दी में लिखें, तो उन्होंने कोशिश की, और इस तरह उन्होंने हिन्दी टंकण का ज्ञान भी ले लिया, अब हो सकता है जल्द ही वो अपना ख़ुद का हिन्दी ब्लॉग भी बना लें.....तो लीजिये पढिये, क्या कहते हैं अनुरूप, अपने और अपने संगीत के बारे में -

नमस्कार दोस्तों, सबसे पहले तो में हिंद युग्म का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि मुझे अपना संगीत प्रस्तुत करने का मौका दिया. उन सभी श्रोतागणों का आभार, जिन्होंने इस ग़ज़ल को सुना और अपने विचार प्रकट किए.

मेरा संगीत का सफर बचपन से ही शुरू हुआ, पिताजी को तबला व् हारमोनियम बजाते देख मैं भी इसी ओर खिंचा चला आया. शुरू से ही मुझे गाने का शौक नही रहा बल्कि संगीत का शौक रहा, जैसे जैसे उम्र बढ़ी, मेरी रूचि संगीत में बढती गई और मैंने गिटर बजाना शुरू किया. ११ वि कक्षा में मुझे एक होम स्टूडियो सेट अप करने का मौका मिला जिसको मैंने पलक झपकते ही पूरा किया. १२वि कक्षा के अंत तक मेरे भाई (निशांत अक्षर) और मैंने मिलकर एक ग़ज़ल एल्बम को पूरा किया जिसका नाम है "चुप की आवाज़ ", जिसका उदघाटन समारोह दिल्ली के हिन्दी भवन में किया गया, और जिसके बोल लिखे विज्ञान व्रत ने.

सफर आगे बढ़ा और मैं दिल्ली विश्व विद्यालय के रेडियो से जुड़ा.

रेडियो पर एक दिन इंटरव्यू देते वक्त मैंने हिंद युग्म के बारे में सुना, जो मुझे बेहद अच्छा लगा. सजीव जी से मेरी मुलाक़ात डी यू रेडियो के मैनेजर के द्वारा हुई, जो कि उस वक्त इंटरव्यू ले रहे थे. बात करने के कुछ हफ्तों बाद ही उन्होंने मुझे कुछ कवियों से ऑनलाइन मिलवाया जिन्होंने मुझे अपनी रचनायें भेजी. काफ़ी समय बाद, मनुज जी की रचना मुझे और मेरे भाई, निशांत अक्षर, को पसंद आयी और हमने इस पर काम शुरू कर दिया, और उसके बाद कि कहानी आपके सामने है.

अंत में एक बार फ़िर से सभी श्रोतागणों, मनुज जी,सजीव जी और हिंद युग्म की पूरी टीम का धन्येवाद, आगे भी आप सब मेरी कोशिशों को युहीं प्रोत्साहित करते रहेंगे इस आशा के साथ -

अनुरूप

मुझसे संपर्क करें -

Web : http://anuroop.in

iLike : http://ilike.com/artist/anuroop

Blog : http://www.anuroopsmusic.blogspot.com

अनुरूप को, आवाज़ और हिंद युग्म की ढेरों शुभकामनायें...अगर आप ने, अब तक नही सुना तो अब सुनिए, इस युवा संगीतकार की स्वरबद्ध की ये खूबसूरत ग़ज़ल, और अपना प्रोत्साहन/मार्गदर्शन दें.

Wednesday, July 16, 2008

लता मंगेशकर को अपना रोल मॉडल मानती हैं, गायिका -मानसी पिम्पले, आवाज़ पर इस हफ्ते का उभरता सितारा

आवाज़ पर इस हफ्ते की हमारी "फीचर्ड आर्टिस्ट" हैं - मानसी पिम्पले, हिंद युग्म पर अपने पहले गीत "बढ़े चलो" से चर्चा में आयीं मानसी रमेश पिम्पले, मूल रूप से महाराष्ट्र से हैं, और इन्हे हिंद युग्म से जोड़ने का श्रेय जाता है, युग्म की बेहद सक्रिय कवयित्री सुनीता यादव को. मानसी इन्हीं की शिष्या थीं कभी, और तभी से सुनीता ने इनके हुनर को परख लिया था. मानसी ने अभी-अभी ही अपनी बारहवीं की पढ़ाई पूरी की है, और अब अपने कैरियर से जुड़ी दिशा की तरफ़ अग्रसर है. संगीत को अपना जनून मानने वाली मानसी, लता जी को अपना रोल मॉडल मानती हैं, तथा आज के दौर के, श्रेया घोषाल और शान इनके सबसे पसंदीदा गायिका/गायक हैं. Zee tv के कार्यक्रम Hero Honda सा रे गा मा पा, के लिए भी मानसी का चुनाव हुआ था,जहाँ हिमेश रेशमिया भी बतौर जज़ मौजूद थे, पर नियति ने शायद पहले ही, उनकी कला को दुनिया तक पहुँचने का माध्यम, हिंद युग्म को चुन लिया था. चित्रकला और टेबल टेनिस का भी शौक रखने वाली मानसी, युग्म को एक शानदार प्लेटफोर्म मानती हैं, नए कलाकारों के लिए. जब हमने उनसे बात की तो वो अपने पहले गीत को मिली आपार सराहना से बेहद खुश नज़र आयीं. "I saw a means of pursuing my passion through Hind Yugm, which is a very good platform for new talent and art" - ये कथन थे मानसी के.

नीचे पेश है, हिंद युग्म की मानसी से हुई बातचीत के कुछ अंश, आप भी मानसी की आवाज़ में ये दमदार गीत "बढ़े चलो" अवश्य सुनें और इस उभरती हुई प्रतिभावान गायिका को अपना स्नेह दे.

हिंद युग्म - मानसी स्वागत है एक बार फ़िर, ये बताइए कि संगीत आपके जीवन में क्या महत्त्व रखता है ?

मानसी - संगीत मेरा जनून है, और ये मेरे जीवन में विशेष स्थान रखता है, मेरा मानना है शब्द जब संगीत में ढल कर आते हैं तो हर व्यक्ति तक अपनी पहुँच बना पाते हैं, संगीत वो कड़ी है जो आपको इश्वर से जोड़ती है.

हिद युग्म - आप zee tv के सा रे गा मा पा शो के लिए भी चुनी गई थीं, उसके बारे में बताइए.

मानसी - मैं २००४ में चुनी गई थी पहले राउंड के लिए मगर १८ वर्ष से कम उम्र होने के कारण प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बन पायी, उसके बाद कभी कोशिश नही की, फ़िर पढ़ाई की तरफ फोकस बदल गया.

हिंद युग्म - क्या आपके अभिभावक आपके इस जनून को बढ़ावा देते हैं ?

मानसी - जी बिल्कुल, ये उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन ही है जो मैं आज यहाँ हूँ, वो मेरे सबसे अच्छे समीक्षक है, जब भी मुझे कुछ गाना होता है, सब से पहले उन्हें ही सुनाती हूँ, ध्यान से सुनकर वो मेरी कमियों को दुरुस्त करते हैं, अगर मैंने कुछ अच्छा गाया है तो ये उन्ही की बदौलत है .

हिंद युग्म - अब आप B Pharma की पढ़ाई करने जा रही हैं, पढ़ाई के साथ-साथ अपने शौक को कैसे प्लान किया है आपने ?

मानसी - अभी तो सारा ध्यान दाखिले और पढ़ाई की तरफ़ ही है, पर संगीत तो हमेशा ही दिनचर्या का हिस्सा रहेगा, मेरी कोशिश रहेगी की इस दौरान अपने रियाज़ के लिए और अधिक समय निकालूं और ख़ुद को इतना काबिल कर लूँ कि किसी भी नए गीत और उन्दा तरीके से निभा पाऊं.

हिंद युग्म - आप हिंद युग्म के लिए एक खोज हैं, हमारे संगीतकार ऋषि एस के साथ काम करना कैसा रहा ?

मानसी - मैं सुनीता मेम की शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे हिंद युग्म और ऋषि एस से मिलवाया, ऋषि जी के संगीत के एक आत्मा है, वो हर गीत पर बहुत मेहनत करते हैं, और गायक को अपनी बात बड़े अच्छे तरीके से समझाते हैं, वो आपको हमेशा सहज महसूस कराते हैं, उनके साथ काम करना बेहद बढ़िया अनुभव रहा.

हिंद युग्म - "बढे चलो" में आपकी गायकी की बहुत तारीफ हुई है, आप कैसा महसूस कर रही हैं ?

मानसी - मैं बहुत खुश हूँ, साथ ही धन्येवाद देना चाहूंगी ऋषि जी और सजीव जी को, जिन्होंने मुझे इस गीत को गाने का मौका दिया, और अलोक शंकर जी का जिन्होंने बहुत सुंदर लिखा इस गीत को, और अपने तमाम समीक्षकों /श्रोताओं का जिन्होंने अपनी टिप्पणियों से मुझे प्रोत्साहित किया, मेरा सोलो गीत "मैं नदी" भी सब को पसंद आएगा, ऐसी मुझे आशा है.

हिंद युग्म - बहुत बहुत शुक्रिया मानसी, आपके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनायें, संगीत का जनून बरकरार रहे और आप इसी तरह मधुर गीत गाती रहें, यही हमारी कामना है ...

मानसी - जी शुक्रिया, मैं हर गाने में अपना बेस्ट देने की कोशिश करूंगी, और उम्मीद करती हूँ कि हिंद युग्म परिवार भी मुझे यूँ ही प्रोत्साहित करता रहेगा .


मूल इंटरव्यू ( original interview )

Hind Yugm - Hi Manasi, Welcome once again, first of all tell us, what place music has in your life, how you connect with music?

Manasi - Music is my passion. It is very close to my heart and it holds a very high place in my life. Music has the power to convey every human feeling which words alone cannot do. And I feel that music is a form of worship, too.

Hind Yugm - You also got selected for ZEE TV, sa re ga ma pa, what was that story?

Manasi- I gave the auditions for Sa Re Ga Ma in 2004 and I just got short-listed in the preliminary round when they informed me that I was under-age (below 18) and so could not participate in the competition. So there was no further development in that and I haven’t tried to participate again after that as studies became my priority.

Hind Yugm - Do your parents support your interest?

A patriotic SongManasi - Oh yes, of course. Without their support and guidance I couldn’t have been whatever I am today. They are my biggest and best critics. If I have to perform or sing, they personally hear the song and point out all the mistakes and make me correct them before I give my performance. Their guidance and support is of extreme importance in my life.

Hind Yugm - Now you are going to study B Pharma, what plan you have, to manage your interest of singing in the coming days ?

Manasi - Right now I am concentrating mainly on my admission and studies. But that doesn’t mean I’ll put a full stop to my passion. I would try to train my voice in this period of my studies so that I can sing even better and be prepared to face any sort of challenge, i.e., to be able to sing any song flawlessly and with the same ease. I would try to continue my ‘riyaaz’ so that I stay in touch with music.

Hind Yugm - You are a found to hind yugm ( thanks to sunita yadav ) how was the experience of working with Rishi S. the composer ?

Manasi - Definitely, I myself wish to thank Sunita ma’am for introducing me to Hind Yugm and Rishi S Balaji. It was really a pleasant experience working on these two songs with Rishi Sir. He is an excellent upcoming composer and his music is definitely the soul of his songs. He makes it a point that the singer understands whatever he wants them to sing and is ready to explain it until it is understood. I consider myself very fortunate to have worked with such a talented person.

Hind Yugm - We are looking forward to hear your first solo song “main nadi",”badhe chalo“ is also well received by the audience, how is the feeling?

Manasi - I am feeling elated and at the same time I wish to thank Rishi sir and Sajeev sir for giving me an opportunity to sing these two songs. and Alok Shankar ji for providing such excellent lyrics, I also wish to thank all our critics who have given their precious comments which will help us to eliminate our flaws and present something much better. I only wish to request all of them to always give their support and encouragement. I am myself looking forward to the release of ‘Main Nadi’ and I hope it gets a good response.

Hind Yugm - Thank you very much manasi, and all the best for your future plans.....keep this passion for music, and keep singing such beautiful songs always ...

Manasi - Thanks for everything. I’ll try my best to give my best to each song I sing and I hope my association with Hind Yugm continues…

बिल्कुल मानसी, हम भी यही उम्मीद करेंगे, कि आप युहीं अपनी आवाज़ का जादू अपने हर गीत में बिखेरती रहें, हिंद युग्म कि समस्त टीम की तरफ़ से आपके उज्जवल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनायें.

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