Thursday, December 15, 2011

वो सुबह कभी तो आएगी...उम्मीद के दीयों को जला के रखें, खय्याम के सुरों में



लता मंगेशकर ने एक बार राज कपूर को एक तानपूरा भेंट किया था। ख़ैयाम के साथ हुई बैठक में राज कपूर ने वही तानपूरा ख़ैयाम की ओर बढ़ाते हुए कुछ सुनाने का आग्रह किया। ख़ैयाम ने उस नये तानपूरा के तारों को छेड़ते हुए राग पूरिया धनाश्री की एक बन्दिश सुनाई। राज कपूर ख़ैयाम की गायकी से प्रभावित हुए और उन्हें फिल्म के शीर्षक गीत की धुन बनाने को कहा। ख़ैयाम इस फिल्म का संगीत तैयार करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। राज कपूर की सहमति मिल जाने के बाद उन्होने फिल्म के शीर्षक गीत की पाँच अलग- अलग धुनें बनाईं।

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 810/2011/250

‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ पर जारी श्रृंखला ‘आधी हकीकत आधा फसाना’ की समापन कड़ी में कृष्णमोहन मिश्र और ‘प्लेबैक’ परिवार की ओर से आपका हार्दिक स्वागत है। इस श्रृंखला में हमने आपके लिए राज कपूर द्वारा निर्मित तीन फिल्मों और केवल अभिनीत सात फिल्मों के ऐसे गीतों को चुना, जिन पर या तो राज कपूर का प्रभाव था या उन गीतों से वे स्वयं प्रभावित हुए थे। गीतों को चुनते समय हमने इस बात का ध्यान भी रखा कि ये फिल्में राज कपूर के प्रारम्भिक एक दशक की हो और फिल्म ‘बरसात’ से लेकर ‘मेरा नाम जोकर’ तक की सर्वाधिक फिल्मों के संगीतकार शंकर-जयकिशन की न होकर अन्य संगीतकारों की हो। आज श्रृंखला की समापन कड़ी में हम एक ऐसे गीत पर चर्चा करेंगे, जिस पर राज कपूर की साम्यवादी विचारधारा का पूरा प्रभाव अंकित हुआ है।

कल के अंक में हमने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राज कपूर की समान विचारधारा पर चर्चा की थी। जिस प्रकार नेहरू जी तत्कालीन सोवियत रूस और चीन मे लोकप्रिय थे, ठीक उसी प्रकार राज कपूर और उनकी फिल्में इन देशों में लोकप्रिय थीं। १९५८ में निर्माता-निर्देशक रमेश सहगल की फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ प्रदर्शित हुई थी। यह फिल्म रूसी उपन्यासकार फ़्योडोर दोस्तोएव्स्की की विश्वविख्यात कृति ‘क्राइम एण्ड पनिशमेंट’ पर आधारित थी। रमेश सहगल ने इस फिल्म में नायक की भूमिका के लिए राज कपूर को और गीतकार के रूप में साहिर लुधियानवी को शामिल कर चुके थे। राज कपूर फिल्म के कथानक से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। फिल्म के संगीतकार का चयन अभी बाकी था। साहिर लुधियानवी ने एक दिन रमेश सहगल को संगीतकार ख़ैयाम का नाम सुझाया। रमेश सहगल को उम्मीद थी कि राज कपूर शंकर-जयकिशन के नाम का सुझाव देंगे, परन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया। रमेश सहगल ने राज कपूर और ख़ैयाम की एक बैठक करा दी।

लता मंगेशकर ने एक बार राज कपूर को एक तानपूरा भेंट किया था। ख़ैयाम के साथ हुई बैठक में राज कपूर ने वही तानपूरा ख़ैयाम की ओर बढ़ाते हुए कुछ सुनाने का आग्रह किया। ख़ैयाम ने उस नये तानपूरा के तारों को छेड़ते हुए राग पूरिया धनाश्री की एक बन्दिश सुनाई। राज कपूर ख़ैयाम की गायकी से प्रभावित हुए और उन्हें फिल्म के शीर्षक गीत की धुन बनाने को कहा। ख़ैयाम इस फिल्म का संगीत तैयार करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। राज कपूर की सहमति मिल जाने के बाद उन्होने फिल्म के शीर्षक गीत की पाँच अलग- अलग धुनें बनाईं। अगली बैठक में राज कपूर ने जब गीत की पाँचो धुनें सुनी तो वे ख़ैयाम की प्रतिभा से प्रभावित हुए और फिल्म के अन्य गीतों की धुनें बनाने की पूरी स्वतन्त्रता दे दी। इस प्रकार राज कपूर, ख़ैयाम, साहिर लुधियानवी और रमेश सहगल के अनूठे समागम से फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। फिल्म सफल नहीं हुई किन्तु श्रृंगार प्रधान गीतों के उस दौर में यथार्थवादी गीत एक नई ताजगी लेकर आए थे, अतः गीत खूब चले। (राज कपूर और खैयाम के भेंट प्रसंग को हमने पंकज राग की पुस्तक 'धुनों की यात्रा' से साभार उद्धृत किया है)

फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ में ख़ैयाम ने राज कपूर पर फिल्माए गए गीतों को मुकेश से गवाया था। मुख्य शीर्षक गीत- ‘वो सुबह कभी तो आएगी...’ के दो संस्करण हैं, एक संस्करण में केवल मुकेश का और दूसरे में मुकेश के साथ आशा भोसले का स्वर है। मुकेश की आवाज़ में एक अन्य गीत ‘आसमाँ पे है खुदा, और ज़मीं पे हम...’ तत्कालीन फिल्मी गीतों की बनी छवि तोड़ने में सफल हुआ था। फिल्म-संगीत-प्रेमियों ने इस गीत के नयेपन को खूब सराहा था। फिल्म के अन्य गीत- ‘चीन-ओ-अरब हमारा...’, ‘फिर ना कीजे मेरी गुस्ताख़ निगाहों का गिला...’ आदि भी अपनी सहज धुनों के कारण खूब सराहे गए। आज की समापन कड़ी में हम आपको फिल्म के शीर्षक गीत का वह संस्करण सुनवाते हैं, जिसे मुकेश और आशा भोसले ने स्वर दिया था। लीजिए, साहिर लुधियानवी का गीत, ख़ैयाम का संगीत, मुकेश और आशा भोसले के युगल स्वरों से युक्त फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ का यह गीत सुनिए, और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। महान फ़िल्मकार राज कपूर की ८७ वीं जयन्ती पर उन्हीं के १० गीतों की यह माला हमने उन्हीं की स्मृति में अर्पित किया है।



क्या आप जानते हैंमुकेश और आशा भोसले के स्वरों में फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ का यह गीत राज कपूर और माला सिन्हा पर फिल्माया गया है। इस दृश्य में माला सिन्हा राज कपूर की बाहों में हैं और गीत के आरम्भ से अन्त तक दोनों इसी मुद्रा में रहते हैं।

पहचानें अगला गीत -आज विराम लेते हैं और सोचते हैं उन गीतों के बारे में जो इस महान फिल्मकार की फिल्मों ने हमें दिए.

पिछले अंक में - इंदु जी आखिरकार आप के हिस्से में एक शृंखला का ताज आ ही गया, इस बार प्लेबैक टीम को आपकी तरफ से पार्टी बनती है

खोज व आलेख-
कृष्णमोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें +91-9871123997 (सजीव सारथी) या +91-9878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

6 comments:

Amit said...

बधाइयाँ इंदू जी.

कृष्णमोहन said...

इन्दु जी, श्रृंखला-विजय के लिए बहुत-बहुत बधाई! अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए और ‘ऐसिच....’ ही बनी रहिए।

इन्दु पुरी said...

थेंक्स कृष्ण भैया और अमित बाबु!
पार्टी जरूर बनती है जी.कौन दे रहा है? :P
मैं तो खाऊ हूँ हा हा हा
ऐसिच हूँ मैं तो सच्ची हा हा हा

इन्दु पुरी said...

raj kapoor साहब की पुरानी फिल्म्स मे बहुत ही खूबसूरत गाने थे.एक ....... 'महताब तेरा चेहरा जिस रोज से देखा है' बहुत ही पसंद है मुझे. उसमे शायद वायलिन का प्रयोग किया है.बीच बेच मे उस का प्रयोग....उफ़ ! जैसे भीतर तक चीर कर रख देता है.इस प्यारे से गाने को सुनकर जिसमे दर्द निराशा दूर दूर तक कहीं नही.फिर भी मेरे आंसू रोके नही रुकते.
क्यों?नही मालूम. बस
ऐसिच हूँ मैं तो

कृष्णमोहन said...

ठीक कहा आपने, इन्दु जी! 1962 की फिल्म ‘आशिक’ का यह गीत है। दोनों अंतरे शुरू होने से ठीक पहले आपको प्रभावित करने वाला संगीत का यह टुकड़ा वास्तव में आकर्षक है। चूँकि यह 1962 की फिल्म है और मुझे राज कपूर के पहले दशक की फिल्मों से ही गीतों को चुनना था, अतः इस गीत को नहीं शामिल कर पाया। आपकी फरमाइश मैंने नोट कर लिया है। भविष्य में अवसर मिलने पर यह गीत आपको अवश्य सुनवाएँगे।

AVADH said...

'वोह सुबह कभी तो आएगी" हमेशा से मेरा एक बेहद पसंदीदा गीत रहा है.
जब भी मैं इसे सुनता हूँ,(इस वक्त भी) हमेशा मेरे रोयें खड़े हो जाते हैं.
अवध लाल

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