Showing posts with label p l santoshi. Show all posts
Showing posts with label p l santoshi. Show all posts

Wednesday, February 17, 2010

मार कटारी मर जाना ये अखियाँ किसी से मिलाना न....अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज़ में एक अनूठा गाना

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 348/2010/48

१९४७ का साल भारत के इतिहास का शायद सब से महत्वपूर्ण साल रहा होगा। इस साल के महत्व से हम सभी वाकिफ हैं। १५ अगस्त १९४७ को इस देश ने पराधीनता की सारी ज़ंजीरों को तोड़ कर एक स्वाधीन वातावरण में सांस लेना शुरु किया था। एक नए भारत की शुरुआत हुई थी इस साल। हालाँकि आज़ादी की ख़ुशी १५ अगस्त के दिन आई थी, लेकिन इस साल की शुरुआत एक बेहद दुखद घटना से हुई थी। और यह दुखद घटना थी हिंदी सिनेमा के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल का निधन। १८ जनवरी १९४७ को वो चल बसे और एक पूरा का पूरा युग उनके साथ समाप्त हो गया। उनके अकाल निधन से फ़िल्म संगीत को जो क्षति पहुँची, उसकी भरपाई हो सकता है कि अगली पीढ़ी ने कर दी हो, लेकिन दूसरा सहगल फिर कभी नहीं जन्मा। एक तरफ़ सहगल का सितारा डूब गया, तो दूसरी तरफ़ से एक ऐसी गायिका का उदय हुआ इस साल जो फ़िल्म संगीत का सब से उज्वल सितारा बनीं और ६ दशकों तक इस इंडस्ट्री पर राज करती रहीं। लता मंगेशकर। जी हाँ, १९४७ में ही लता जी का गाया पहला एकल प्लेबैक्ड सॊंग् "पा लागूँ कर जोरी रे" फ़िल्म 'आप की सेवा में' में सुनाई दी थी। १९४७ में ही देश का बंटवारा हो गया और यह देश हिंदुस्तान और पाक़िस्तान में विभाजित हो गया। लाखों की तादाद में लाशें गिरी, सरहद के दोनों तरफ़ साम्प्रदायिक दंगे, मार काट और लूट मच गई, पाक़िस्तान से हिंदू भाग कर हिंदुस्तान आने लगे, तो यहाँ से मुसलमान अपनी जान बचाकर उधर को दौड़ पड़े। फ़िल्म इंडस्ट्री भी इस अफ़रा-तफ़री से बच नहीं पाई। नतीजा यह हुआ कि यहाँ के कई बड़े बड़े कलाकार हमेशा के लिए पाक़िस्तान चले गए, और लाहौर फ़िल्म उद्योग के कई कलाकार भारत आ गए। जानेवालों में शामिल थे नूरजहाँ, ख़ुरशीद, मास्टर ग़ुलाम हैदर, फ़िरोज़ निज़ामी, उस्ताद अमानत अली ख़ान, रोशनारा बेग़म, जी. ए. चिश्ती, वगेरह। एक तरफ़ इन कलाकारों का इस देश को छोड़ कर जाना, और दूसरी तरफ़ नई पीढ़ी के कलाकारों का आगमन, इन दोनों के एक साथ घटने से फ़िल्म संगीत ने करवट लिया और ४० के दशक के आख़िर से फ़िल्मी गीतों के स्वरूप में, गायकी में, ऒर्केस्ट्रेशन में बहुत से बदलाव आए, और ५० के दशक के आते आते फ़िल्म संगीत पर जैसे उसका यौवन आ गया।

५० के दशक की बातें तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चलती ही रहती है, आज केवल १९४७ की बातें होंगी। दोस्तों, क्यों ना १९४७ के साल को रिप्रेज़ेंट करने के लिए एक ऐसे किसी फ़िल्म के गीत को चुना जाए जो १५ अगस्त के दिन ही रिलीज़ हुई थी! जी हाँ, फ़िल्म 'शहनाई' १५ अगस्त १९४७ को बम्बई के 'नोवेल्टी थिएटर' में रिलीज़ हुई थी जब पूरा देश आज़ादी के जश्न मना रहा था। शहनाई की मंगल ध्वनियाँ इस देश की हवाओं में मिठास घोल रही थी और साथ ही शामिल था इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "हमारे अंगना आज बजे शहनाई"। पी. एल. संतोषी निर्देशित और रेहाना, नज़ीर ख़ान, इंदुमती, मुमताज़ अली, दुलारी अभिनीत यह फ़िल्म असल में एक म्युज़िकल कॊमेडी फ़िल्म थी, जो एक ट्रेरंडसेटर फ़िल्म साबित हुई। निर्देशक-गीतकार पी. एल. संतोषी और संगीतकार सी. रामचन्द्र की जोड़ी ने फ़िल्मी गीतों का एक नया ट्रेंड चालू किया इस फ़िल्म से जो बाद के कई सालों तक चलती रही। "आना मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे" गीत ख़ूब बजा, जिसे हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बहुत पहले ही सुनवा चुके हैं। इसी फ़िल्म में गायिका अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज़ में एक गीत था जिसने भी शोहरत की बुलंदियों को छुआ। आज इसी गीत को हम यहाँ बजा रहे हैं और गीत है "मार कटारी मर जाना, ये अखियाँ किसी से मिलाना ना"। अमीरबाई के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीतों में इस गीत का शुमार होता है। मशहूर अदाकारा गौहर कर्नाटकी की बहन अमीरबाई 'कन्नड़ कोकिला' के नाम से जानी जाती थीं। १९ फ़रवरी १९१९ को कर्नाटक के बीजापुर ज़िले के बिल्गी गाँव में एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मीं अमीरबाई ने माध्यमिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और १५ वर्ष की आयु में ही बम्बई आ गईं। उनकी किसी क़व्वाली से प्रभावित होकर एच. एम. वी ने उस क़व्वाली का ग्रामोफ़ोन रिकार्ड निकाला। गौहर की मदद से उन्हे ओरिएंटल टॊकीज़ की फ़िल्म 'विष्णु भक्ति' में काम करने का मौका मिला सन् १९३४ में। उसके बाद अनिल बिस्वास ने उन्हे नोटिस किया और ईस्टर्ण आर्ट्स व दर्यानी प्रोडक्शन्स की फ़िल्मों में मौके दिलवाए। १९३७ के आते आते अमीरबाई ने कई फ़िल्मों में अभिनय व गायन कर ली, जिनमें शामिल थे 'भारत की बेटी', 'यासमीन', 'फ़िदा-ए-वतन', 'प्रतिमा', 'प्रेम बंधन', 'दुखियारी', 'जेन्टलमैन डाकू', और 'ईंसाफ़'। इन सभी फ़िल्मों में अनिल दा का ही संगीत था। आगे की दास्तान हम फिर किसी दिन बताएँगे, आइए अब आज का गीत सुना जाए जिसमे अखियाँ ना मिलाने की सलाह दे रही हैं अमीरबाई कर्नाटकी।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

बिक गए बिन मोल ही,
चले सब बीते दिन बिसार,
कोई जादू था जीवन,
जिसके सम्मोहन में, बीत गए जन्म हज़ार...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. एक कमचर्चित गायिका ने इस गीत में रफ़ी साहब का साथ दिया था, उनका नाम ?- सही जवाब को मिलेंगें 3 अंक.
3. ये फिल्म का शीर्षक गीत है, फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
4. इस गीत के गीतकार कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
मनु जी, बहुत दिनों बाद आपकी आमद हुई, बेहद अच्छा लगा
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, September 27, 2009

मैं हूँ कली तेरी तू है भँवर मेरा, मैं हूँ नज़र तेरी तू है जिगर मेरा...लता का एक दुर्लभ गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 215

ता मंगेशकर के गाए कुछ भूले बिसरे और दुर्लभ गीतों पर आधारित हमारी विशेष शृंखला आप इन दिनों सुन रहे हैं 'मेरी आवाज़ ही पहचान है'। अब तक आप ने कुल ४ गानें सुने हैं जो ४० के दशक की फ़िल्मों से थे। आइए आगे बढ़ते हुए प्रवेश करते हैं ५० के दशक में। सन् १९५१ में एक फ़िल्म आयी थी 'सौदागर'। 'वेस्ट हिंद पिक्चर्स' के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नासिर ख़ान और रेहाना। पी. एल. संतोषी के गीत थे और सी. रामचन्द्र का संगीत। दोस्तों, इससे पहले हम ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पी. एल. संतोषी और सी. रामचन्द्र के जोड़ी की बातें भी कर चुके हैं और 'शिन शिना की बबला बू' फ़िल्म के गीत "तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोये" सुनवाते वक़्त संतोषी साहब और रेहाना से संबंधित एक क़िस्सा भी बताया था। अगर आप ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में हाल ही में क़दम रखा है तो उस आलेख को यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। इस गीत के अलावा पी. एल. संतोषी, सी. रामचन्द्र और लता जी की तिकड़ी का जो एक और गीत हमने आप को यहाँ सुनवाया है वह है फ़िल्म 'सरगम' का "वो हम से चुप हैं हम उनसे चुप हैं"। ये दोनों ही गीत अपने ज़माने के बेहद मशहूर गीतों मे से रहे हैं। लेकिन आज इस तिकड़ी के जिस गीत को हम पेश कर रहे हैं वह इन गीतों से अलग हट के है। 'सौदागर' फ़िल्म के इस गीत के बोल हैं "मैं हूँ कली तेरी तू है भँवर मेरा, मैं हूँ नज़र तेरी तू है जिगर मेरा"। लता और सखियों की आवाज़ों में इस गीत को सुनते हुए, इसके रीदम को सुनते हुए आप को सी. रामचन्द्र का वह मशहूर गीत "भोली सूरत दिल के खोटे" ज़रूर याद आ जायेगा, इन दोनों गीतों के बीट्स एक जैसे ही हैं। गोवन लोक संगीत की छटा इस गीत में बिखेरी है चितलकर साहब ने।

लता जी ने सी. रामचन्द्र के संगीत में ५० के दशक में बेशुमार गानें गाए हैं। लेकिन पता नहीं किसकी नज़र लग गई कि इन दोनों में कुछ ग़लतफ़हमी सी हो गई और दोनों ने एक दूसरे के साथ काम करना बंद कर दिया कई सालों के लिए। चलिए आज वही दास्तान आप को बताते हैं ख़ुद लता जी के शब्दों में जिन्हे उन्होने अमीन सायानी के एक इंटरव्यू में कहा था।

"मेरा दुश्मन कोई नहीं है, ना ही मैं किसी की दुश्मन हूँ। पर इतने सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स के साथ जब हम काम करते हैं, इतने लोग मिलते हैं रोज़, तो कहीं ना कहीं छोटी मोटी बात हो जाती है। उनके (सी. रामचन्द्र) साथ क्या हुआ था कि एक रिकार्डिस्ट थे जो मेरी पीठ पीछे कुछ बात करते थे। मुझे मालूम हुआ था और वो जिसने मुझे बताया था वो आदमी मुझे बहुत ज़्यादा प्यार करता था, कहता था 'मैं सुन नहीं सकता हूँ लता जी, वो आप के बारे में बात ऐसी करते हैं'। और मेरी रिकार्डिंग थी सी. रामचन्द्र की जो उसी स्टुडियो में। अन्ना को कहा कि 'अन्ना, मैं इस रिकार्डिस्ट के पास रिकार्डिंग नहीं करूँगी क्योंकि ये मेरे लिए बहुत ख़राब बात करता है। जब मैं गाउँगी मेरा मन नहीं लगेगा यहाँ और मैं जब गाती हूँ मेरे दिमाग़ को अच्छा लगना चाहिए, सुकून मिलना चाहिए कि भई जो गाना मैं गा रही हूँ, अच्छा लग रहा है, तभी गाना अच्छा बन सकता है।' उनको पता नहीं क्या हुआ, उन्होने कहा कि 'लता, तुम अगर नहीं गाओगी तो मैं भी अपने दोस्त को नहीं छोड़ सकता हूँ, मैं तुम्हारी जगह किसी और को लाउँगा'। मैने कहा कि 'बिल्कुल आप ला सकते हैं, किसी को भी ले आइए'। और मैने वह काम छोड़ दिया, पर मेरा उनका झगड़ा ऐसा नहीं हुआ। मैने वह गाना, मतलब रिहर्सल किया हुआ, मैं छोड़ के चली आई और उन्होने फिर किसी और से वह गाना लिया, और वह एक मराठी गाना था। तो वह गाना होने के बाद, उस समय उनके पास काम भी बहुत कम था, और फिर बाद में मेरी उनकी बात नहीं हुई, मुलाक़ात नहीं हुई, कुछ नहीं। और फिर अगर उनका मेरा इतना झगड़ा हुआ होता तो फिर वो मेरे पास दोबारा "ऐ मेरे वतन के लोगों" लेकर आते? तो झगड़ा तो था ही नहीं। "ऐ मेरे वतन के लोगों" के लिए वो मेरे घर आए बुलाने के लिए, वो और प्रदीप जी, दोनों ने आ कर कहा कि 'यह गाना तुमको गाना ही पड़ेगा'। मैने कहा 'मैं गाउँगी नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं, रिहर्सल करना पड़ेगा, दिल्ली जाना पड़ेगा'। पर उस गाने के लिए प्रदीप जी ने बहुत ज़ोर लगाया। प्रदीप जी ने यहाँ तक कहा कि 'लता, अगर तुम यह गाना नहीं गाओगी तो फिर मैं यह गाना दूँगा ही नहीं।' तो उनका दिल नहीं तोड़ सकी मैं।"

तो दोस्तों, ये बातें थीं लता जी की कि किस तरह से उनके और अन्ना के बीच में दूरियाँ बढ़ी और किस तरह से "ऐ मेरे वतन के लोगों" ने सुलह भी करवा दिया। तो आइए अब लता और अन्ना की सुरीली जोड़ी के नाम सुनते हैं आज का यह गीत, जिसके लिए हम विशेष रूप से आभारी हैं अजय देशपाण्डे जी के जिन्होने इस गीत को हमें उपलब्ध करवाया, सुनिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. संगीतकार रोशन के लिए गाया लता ने ये गीत..बूझने वाले को मिलेंगें २ के स्थान पर ३ अंक.
२. इस फिल्म में कलाकार थे नासिर खान और नूतन.
३. मुखड़े में शब्द है -"सिंगार".

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह पराग लगातार २ सही जवाब और आपका स्कोर पहुंचा है ३६ पर...बधाई...हमारे और धुरंधर सब कहाँ चले गए भाई....सभी को नवमी, दुर्गा पूजा और दशहरे की ढेरों बधाईयाँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, March 7, 2009

तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोये...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 16

किसी ने ठीक ही कहा है कि दर्दीले गीत ज़्यादा मीठे लगते हैं. और वो गीत अगर स्वर-कोकिला लता मंगेशकर की आवाज़ में हो और उसका संगीत सी रामचंद्र ने तैयार किया हो तो फिर कहना ही क्या! आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम ऐसा ही एक सदाबहार नगमा लेकर आए हैं सन 1952 की फिल्म "शिन शिनाकी बबला बू" से. संतोषी प्रोडक्शन के 'बॅनर' तले पी एल संतोषी ने इस फिल्म का निर्माण किया था. "शहनाई" और "अलबेला" जैसी 'म्यूज़िकल कॉमेडीस' बनाने के बाद सी रामचंद्रा और पी एल संतोषी एक बार फिर "शिन शिनाकी बबला बू" में एक साथ नज़र आए. लेकिन इस फिल्म का जो गीत सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुआ वो एक दर्द भरा गीत था "तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोये, रैन गुज़ारी तारे गिन गिन चैन से जब तुम सोए". और यही गीत आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में. इस गीत में सारंगी का बेहद खूबसूरत इस्तेमाल हुया है जिसे इस गीत में बजाया है प्रख्यात सारंगी वादक पंडित राम नारायण ने. उन दिनों सारंगी का इस्तेमाल ज़्यादातर मुजरों में होता था. लेकिन कुछ संगीतकार जैसे सी रामचंद्र और ओ पी नय्यर ने इस साज़ को कोठे से निकालकर 'रोमॅन्स' में ले आए.

पी एल संतोषी के लिखे इस गीत के पीछे भी एक कहानी है. दोस्तों, मुझे यह ठीक से मालूम नहीं कि यह सच है या ग़लत, मैने कहीं पे पढा है कि संतोषी साहब अभिनेत्री रेहाना की खूबसूरती पर मर-मिटे थे. और रहाना इस फिल्म की 'हेरोईन' भी थी. संतोषी साहब ने कई बार रहना को अपनी भावनाओं से अवगत करना चाहा. यहाँ तक कि एक बार तो सर्दी के मौसम में सारी रात वो रहाना के दरवाज़े पर खडे रहे. लेकिन रहाना ने जब उनकी भावनाओं पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया तो संतोषी साहब अपने टूटे हुए दिल को लेकर घर वापस चले गये और घर पहुँचते ही उनके कलम से इसी गीत के बोल फूट पडे कि "तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोए". दोस्तों, इस गीत की एक और खासियत यह भी है कि इस गीत को राग भैरवी में संगीतबद्ध सबसे धीमी गति के गीतों में से एक माना जाता है. आप भी ज़रा अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालिए और कोई दूसरा ऐसा गीत याद करने की कोशिश कीजिए जो राग भैरवी पर आधारित हो और इससे भी धीमा है. लेकिन फिलहाल सुनिए "शिन शिनाकी बबला बू" से यह अमर रचना.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. "आल इन वन" किशोर की आवाज़ में उन्ही के द्वारा संगीतबद्ध एक सुपर हिट गीत.
२. मधुबाला इस फिल्म में उनकी नायिका थी.
३. यही फिल्म का शीर्षक गीत है.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार सिर्फ उज्जवल जी ने कोशिश की और वो सफल भी हुए. नीलम जी, आचार्य सलिल जी, और संगीता जी का भी आभार, इससे पिछली पहेली का सही जवाब उदय जी और सुदेश तैलंग ने भी दिया था. उन्हें भी बधाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, February 28, 2009

वो हमसे चुप हैं...हम उनसे चुप हैं...मनाने वाले मना रहे हैं...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 09

"तुम्हारी महफ़िल में आ गये हैं, तो क्यूँ ना हम यह भी काम कर लें, सलाम करने की आरज़ू है, इधर जो देखो सलाम कर लें". दोस्तों, सन 2006 में फिल्म "उमरावजान" की 'रीमेक' बनी थी, जिसका यह गीत काफ़ी लोकप्रिय हुआ था. अनु मलिक ने इसे संगीतबद्ध किया था, याद है ना आपको यह गीत? अच्छा एक और गीत की याद हम आपको दिलाना चाहेंगे, क्या आपको सन् 2002 में बनी फिल्म "अंश" का वो गीत याद है जिसके बोल थे "मची है धूम हमारे घर में" जिसके संगीतकार थे नदीम श्रवण? चलिए एक और गीत की याद आपको दिलवाया जाए. संगीतकार जोडी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर और साथियों ने राज कपूर की 'हिट फिल्म' सत्यम शिवम सुंदरम में एक गीत गाया था जिसके बोल थे "सुनी जो उनके आने की आहट, गरीब खाना सजाया हमने". इन तीनो गीतों पर अगर आप गौर फरमाएँ तो पाएँगे की इन तीनो गीतों के मुख्डे की धुन करीब करीब एक जैसी है. अब आप सोच रहे होंगे कि इनमें से किस गीत को हमने चुना है आज के 'ओल्ड इस गोल्ड' के लिए. जी नहीं, इनमें से कोई भी गीत हम आपको नहीं सुनवा रहे हैं. बल्कि हम वो गीत आपको सुनवाना चाहेंगे जिसके धुन से प्रेरित होकर यह तीनो गाने बने. है ना मज़े की बात!

तो अब उस 'ओरिजिनल' गीत के बारे में आपको बताया जाए! यह गीत है सन् 1950 में बनी फिल्म "सरगम" का जिसे लता मंगेशकर और चितलकर ने गाया था. जी हाँ, यह वही चितलकर हैं जिन्हे आप संगीतकार सी रामचंद्र के नाम से भी जानते हैं. फिल्मीस्तान के 'बॅनर' तले बनी इस फिल्म में राज कपूर और रेहाना थे, और इस फिल्म के गाने लिखे थे पी एल संतोषी ने. उन दिनों पी एल संतोषी और सी रामचंद्र की जोडी बनी हुई थी और इन दोनो ने एक साथ कई 'हिट' फिल्मों में काम किया. तो अब आप बेक़रार हो रहे होंगे इस गीत को सुनने के लिए. हमें यकीन है कि इस गीत को आप ने एक बहुत लंबे अरसे से नहीं सुना होगा, तो लीजिए गुज़रे दौर के उस ज़माने को याद कीजिए और सुनिए सी रामचंद्रा का स्वरबद्ध किया हुया यह लाजवाब गीत सिर्फ़ और सिर्फ़ आवाज़ के 'ओल्ड इस गोल्ड' में.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. हेलन पर फिल्माए गए इस क्लब सोंग में जोड़ी है ओ पी नैयर और आशा की.
२. गीतकार हैं शेवन रिज़वी.
३. मुखड़े में शब्द है -"कातिल"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
पहली बार तन्हा जी ने जवाब देने की कोशिश की और परीक्षा में खरे उतरे. मनु जी और दिलीप जी दोनों ने भी एक बार फिर सही गीत पकडा. आप सभी को बधाई.

प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ