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रविवार, 22 अप्रैल 2018

राग पूर्वी और पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 366 : RAG PURVI & PURIYA DHANASHRI




स्वरगोष्ठी – 366 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 5 : पूर्वी थाट

राग पूर्वी में ध्रुपद और पूरिया धनाश्री में फिल्म संगीत की रचना





उस्ताद अमीर खाँ
पण्डित अजय चक्रवर्ती
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पाँचवाँ थाट पूर्वी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे पूर्वी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में निबद्ध एक ध्रुपद रचना पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही पूर्वी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग पूरिया धनाश्री के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आधुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाट पद्धति पर हम पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित उन दस थाटों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके माध्यम से रागों का वर्गीकरण किया जाता है। उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत की दोनों पद्धतियों में संगीत के सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल बारह स्वरों के प्रयोग में समानता है। दक्षिण भारत के ग्रन्थकार पण्डित व्यंकटमखी ने सप्तक में 12 स्वरों को आधार मान कर 72 थाटों की रचना गणित के सिद्धान्तों पर की थी। भातखण्डे जी ने इन 72 थाटों में से केवल उतने ही थाट चुन लिये, जिनमें उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण होना सम्भव हो। इस विधि से वर्तमान उत्तर भारतीय संगीत को उन्होने पक्की नींव पर प्रतिस्थापित किया। साथ ही उन सभी विशेषताओं को भी, जिनके आधार पर दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्धति पृथक होती है, उन्होने कायम किया। भातखण्डे जी ने व्यंकटमखी के 72 थाटों में से 10 थाट चुन कर प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण किया। थाट सिद्धान्त पर भातखण्डे जी ने ‘लक्ष्य-संगीत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की थी।

आज हम पूर्वी थाट के विषय में थोड़ी जानकारी प्राप्त करेंगे। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि। इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र और ऋषभ तथा धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। पूर्वी थाट का आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सा, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), नि, सां और अवरोह के स्वर- सां, नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग ‘पूर्वी’ का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। आज हमारी चर्चा में थाट और राग पूर्वी है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे पंडित अजय चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने राग पूर्वी की इस रचना को ध्रुपद के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग पूर्वी की यह रचना। इस प्रस्तुति में सारंगी पर भारतभूषण गोस्वामी ने और पखावज पर माणिक मुण्डे ने संगति की है। कुछ विद्वान इस ध्रुपद को तानसेन की रचना मानते हैं।

राग पूर्वी : ‘कर कपाल लोचन त्रय...’ पण्डित अजय चक्रवर्ती


इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), प, नि, सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल), नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, म॑(तीव्र), रे(कोमल), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। आइए, अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ ने गाया है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - बैजू बावरा




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 366वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 368वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 364वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जोगिया, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – कमल बारोट और महेन्द्र कपूर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध अपने पता के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की पाँचवीं कड़ी में आपने पूर्वी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में पिरोया भक्तिरस से परिपूर्ण एक ध्रुपद सुविख्यात गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही पूर्वी थाट के जन्य राग पूरिया धनाश्री पर आधारित एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पूर्वी और पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 366 : RAG PURVI & PURIYA DHANASHRI : 22 Apr., 2018 

रविवार, 29 नवंबर 2015

रुद्रवीणा और उस्ताद असद अली खाँ : SWARGOSHTHI – 246 : RUDRAVEENA & USTAD ASAD ALI KHAN



स्वरगोष्ठी – 246 में आज

संगीत के शिखर पर – 7 : उस्ताद असद अली खाँ

वैदिक तंत्रवाद्य रुद्रवीणा के साधक उस्ताद असद अली खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की सातवीं कड़ी में हम आज हम वैदिककालीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा अनन्य साधक उस्ताद असद अली खाँ की संगीत साधना के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद असद अली खाँ द्वारा रुद्रवीणा पर बजाया ध्रुपद अंग में राग आसावरी और आभोगी की रचनाएँ सुनवाएँगे।


वैदिककालीन वाद्य रूद्रवीणा को परम्परागत रूप से आधुनिक संगीत जगत में प्रतिष्ठित कराने वाले अप्रतिम कलासाधक उस्ताद असद अली खाँ जयपुर बीनकार की बारहवीं पीढ़ी के कलासाधक थे। यह घराना जयपुर के सेनिया घराने का ही एक हिस्सा है। असद अली खाँ का जन्म 1937 में अलवर रियासत (राजस्थान) में हुआ था। परन्तु उनके संगीत की शिक्षा-दीक्षा रामपुर में हुई। उनके पिता उस्ताद सादिक अली खाँ रामपुर दरबार में रूद्रवीणा के प्रतिष्ठित वादक थे। उनके प्रपितामह उस्ताद रज़ब अली खाँ जयपुर घराने के दरबारी वीणावादक थे तथा रूद्रवीणा के साथ-साथ सितार और दिलरुबावादन में भी दक्ष थे। असद अली खाँ के पितामह उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ को भी जयपुर के दरबारी वीणावादक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

आज हम जिसे संगीत का जयपुर घराना के नाम से पहचानते हैं, उसकी स्थापना में असद अली खाँ के प्रपितामह (परदादा) उस्ताद राजब अली खाँ का योदान रहा है। उस्ताद रजब अली खाँ जयपुर दरबार के केवल संगीतज्ञ ही नहीं; बल्कि महाराजा मानसिंह के गुरु भी थे। महाराजा ने उन्हें जागीर के साथ ही एक विशाल हवेली दे रखी थी तथा उन्हें किसी भी समय बेरोक-टोक महाराजा के महल में आने-जाने की स्वतन्त्रता थी। असद अली खाँ के दादा जी उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ ने भी जयपुर दरबार में वही प्रतिष्ठा प्राप्त की। वीणावादकों का यह घराना ध्रुवपद संगीत के खण्डहार वाणी में वादन करता रहा है; जिसका पालन उस्ताद असद अली खाँ ने भी किया और अपने शिष्यों को भी इसी वाणी की शिक्षा दी। ध्रुवपद संगीत में चार वाणियों का वर्गीकरण तानसेन के समय में ही हो चुका था। ‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ में यह वर्गीकरण शुद्धगीत, भिन्नगीत, गौड़ीगीत और बेसरागीत नामों से हुआ है; जिसे आज गौड़हार वाणी, डागर वाणी, खण्डहार वाणी और नौहार वाणी के नाम से जाना जाता है। उस्ताद असद अली खाँ और उनके पूर्वजों का वादन खण्डहार वाणी का था। इसके अलावा खाँ साहब दूसरी वाणियों की विशेषताओं को प्रदर्शित करने से नहीं हिचकते थे। ध्रुवपद अंग में वीणावादन का चलन कम होने के बावजूद उन्होंने परम्परागत वादन शैली से कभी समझौता नहीं किया। आइए, उनकी वादन शैली की सार्थक अनुभूति करते हैं। इस प्रस्तुति में उस्ताद असद अली खाँ ने ध्रुवपद अंग में राग आसावरी के स्वरों में लयबद्ध किन्तु तालरहित झाला और फिर चौताल में एक बन्दिश का वादन किया है। नाथद्वारा परम्परा के पखावज वादक पण्डित डालचन्द्र शर्मा ने पखावज पर संगति की है।


राग आसावरी : रुद्रवीणा पर झाला और चौताल में बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ





उस्ताद असद अली खाँ ने अपने पिता उस्ताद सादिक अली खाँ से रामपुर दरबार में लगभग 15 वर्षों तक रूद्रवीणा के वादन की शिक्षा ग्रहण की, और फिर प्रतिदिन कई घण्टों तक निरन्तर रियाज करके उन्होंने इस वैदिककालीन वाद्य को सिद्ध कर लिया। उन्होंने ध्रुवपद अंग में रूद्रवीणा की ‘खान दरबारी’ शैली विकसित की और उस शैली को यही नाम दिया। खाँ साहब 17 वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में संगीत के प्रोफ़ेसर रहे। वे आजन्म अविवाहित रहे। अपने भतीजे अली जाकी हैदर को उन्होंने दत्तक पुत्र बना लिया था और उन्हें रूद्रवीणा वादन में प्रशिक्षित किया था। अली जाकी के अलावा अन्य कई शिष्यों को भी उन्होंने संगीत शिक्षा दी है; जो इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रचार-प्रसार करने में संलग्न संस्था ‘स्पीक मैके’ के साथ जुड़ कर खाँ साहब ने स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों के बीच रुद्रवीणा से नई पीढ़ी को परिचित कराने का अभियान चलाया था, जो खूब सफल रहा। नई पीढी को रूद्रवीणा की वादन शैली से परिचित कराने के साथ-साथ उस्ताद असद अली खाँ उन्हें यह बताना नहीं भूलते थे कि यह तंत्रवाद्य विश्व का सबसे प्राचीन वाद्य है और ध्वनि के वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आज भी खरा उतरता है। वे भगवान शिव को रूद्रवीणा का निर्माता मानते थे। उस्ताद असद अली खाँ को अनेक सम्मान और पुरस्कार से नवाज़ा गया था; जिनमें 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2008 में पद्मभूषण सम्मान, तानसेन सम्मान आदि प्रमुख हैं। 14 जून, 2011 को उनके निधन से भारतीय संगीत जगत में रिक्तता तो आई है; किन्तु यह विश्वास भी है कि उनके शिष्यगण रुद्रवीणा वादन की वैदिककालीन परम्परा को आगे बढ़ाएँगे। इस आलेख को विराम देने से पहले लीजिए सुनिए, उस्ताद असद अली खाँ का रूद्रवीणा पर बजाया राग आभोगी में एक ध्रुवपद बन्दिश। पखावज संगति वरिष्ठ पखावजी पण्डित गोपाल दास ने की है। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग आभोगी : ध्रुपद बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ






संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 246वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्रवाद्य पर वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग की झलक प्रस्तुत करता है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप संगीत वाद्य को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उस वाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 248वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 244 की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत दादरा का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- पहली बार ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में भाग लेने वाले प्रतिभागी, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल। प्रफुल्ल जी, संगीत प्रेमियों की इस महफिल में हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह सातवाँ अंक था। इस अंक में हमने प्राचीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ के व्यक्तित्व और उनके वादन पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





रविवार, 10 मई 2015

पूर्वी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 218 : PURVI THAAT



स्वरगोष्ठी – 218 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 5 : पूर्वी थाट

राग पूर्वी की मनोहारी रचना - 'कर कपाल लोचन त्रय...'  



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे पूर्वी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही पूर्वी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग पूरिया धनाश्री के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



धुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाट पद्धति पर केन्द्रित श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ में हम पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित उन दस थाटों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके माध्यम से रागों का वर्गीकरण किया जाता है। उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत की दोनों पद्धतियों में संगीत के सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल बारह स्वरों के प्रयोग में समानता है। दक्षिण भारत के ग्रन्थकार पण्डित व्यंकटमखी ने सप्तक में 12 स्वरों को आधार मान कर 72 थाटों की रचना गणित के सिद्धान्तों पर की थी। भातखण्डे जी ने इन 72 थाटों में से केवल उतने ही थाट चुन लिये, जिनमें उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण होना सम्भव हो। इस विधि से वर्तमान उत्तर भारतीय संगीत को उन्होने पक्की नींव पर प्रतिस्थापित किया। साथ ही उन सभी विशेषताओं को भी, जिनके आधार पर दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्धति पृथक होती है, उन्होने कायम किया। भातखण्डे जी ने पं॰ व्यंकटमखी के 72 थाटों में से 10 थाट चुन कर प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण किया। थाट सिद्धान्त पर भातखण्डे जी ने ‘लक्ष्य-संगीत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की थी।

पण्डित अजय चक्रवर्ती 
आइए, अब हम आज के थाट ‘पूर्वी’ के विषय में थोड़ी जानकारी प्राप्त करते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि। इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र और ऋषभ तथा धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। पूर्वी थाट का आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सारे, ग, म॑प, , निसां और अवरोह के स्वर- सांनिप, म॑ ग, रेसा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग ‘पूर्वी’ का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। आज हमारी चर्चा में थाट और राग पूर्वी है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे पंडित अजय चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने राग पूर्वी की इस रचना को ध्रुपद के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग पूर्वी की यह रचना। इस प्रस्तुति में सारंगी पर भारतभूषण गोस्वामी ने और पखावज पर माणिक मुंडे ने संगति की है। कुछ विद्वान इस ध्रुपद को तानसेन की रचना मानते हैं।


राग पूर्वी : ‘कर कपाल लोचन त्रय...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती 



उस्ताद अमीर खाँ 
इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- निरे गम॑प प निसां और अवरोह के स्वर- रे निप म॑ग म॑रेगरेसा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। आइए, अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ ने गाया है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म बैजू बावरा





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 218वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पाँच दशक से भी अधिक पुरानी ऐतिहासिक हिन्दी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है।

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के पार्श्वगायक के स्वर को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 16 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 218वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 216वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल खेमटा (6 मात्रा) और कहरवा (8 मात्रा) तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका कमल बारोट (और महेन्द्र कपूर)। इस बार पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया हैं। तीन में से दो प्रश्न के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। इसके अन्तर्गत हम प्रत्येक अंक में भारतीय संगीत के प्रचलित दस थाट और उनके आश्रय रागों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही थाट से जुड़े अन्य रागों पर आधारित फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आगामी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित होगा। यदि आपने वर्षा ऋतु के रागों पर कोई आलेख तैयार किया है या इन रागों की कोई रचना आपको पसन्द है, तो हमें swargoshthi@gmail.com पर शीघ्र भेजें। हम उसे आपके नाम और परिचय के साथ प्रकाशित / प्रसारित करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

रुद्रवीणा और पखावज : SWARGOSHTHI – 206 : RUDRA VEENA AND PAKHAWAJ RECITAL




स्वरगोष्ठी – 206 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 4

रुद्रवीणा पर आसावरी के और पखावज पर चौताल के स्वर गूँजे




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ियों में हमने आपके लिए ध्रुपद और धमार का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया है। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के संगीत से अभिन्न रूप से जुड़ा प्राचीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा और ताल के लिए उपयोगी वाद्य पखावज की चर्चा करेंगे और विश्वविख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत राग आसावरी का और राजा छत्रपति सिंह द्वारा पखावज पर प्रस्तुत चौताल का रसास्वादन भी कराएँगे।  



उस्ताद असद अली खाँ
र्तमान में भारतीय संगीत के जितने भी प्रकार की शैलियाँ प्रचलित हैं, यह सभी पारम्परिक रूप से विकसित और परिमार्जित होकर हमारे बीच उपस्थित हैं। प्राचीन ग्रन्थों और उपलब्ध पुरावशेषों का विश्लेषण करने पर यह निष्कर्ष भी निकलता है की वैदिक युग में भारतीय संगीत की समृद्ध परम्परा रही है। आधुनिक संगीत शैलियों में ध्रुपद अथवा ध्रुवपद सबसे प्राचीन संगीत शैली है। ग्वालियर नरेश मानसिंह तोमर (1486-1516) ने प्राचीन प्रबन्ध गीत शैली को परिमार्जित कर ध्रुपद संगीत को विकसित किया था। उन्हें मध्ययुगीन पदशैली का प्रवर्तक भी माना जाता है। राजा मानसिंह तोमर स्वयं संगीतज्ञ थे और प्राचीन शास्त्रों को आधार मान कर ध्रुपद शैली को स्थापित किया था। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंकों में हमने ध्रुपद के आलाप, जोड़, झाला, निबद्ध गीत और धमार गीत पर चर्चा की है। आज हम ध्रुपद शैली के वाद्यों के विषय में चर्चा करेंगे। वैदिक युग से परम्परागत रूप में विकसित वीणा के कई प्रकार आज भी ध्रुपद संगीत से जुड़े हुए हैं। प्राचीन वीणा का एक प्रकार है, “रुद्रवीणा”। ऐसी मान्यता है की इस तंत्रवाद्य का सृजन स्वयं देवाधिदेव शिव ने माता पार्वती के रंजन के लिए किया था। यह “तत्” श्रेणी का वाद्य है। अर्थात धातु के तारों पर आघात कर स्वरोत्पत्ति की जाती है। रुद्रवीणा की बनावट में मुख्य भाग एक बेलनाकार दण्ड होता है, जिसकी लम्बाई 54 से 62 इंच तक होती है। दण्ड पर स्वर परिवर्तन के लिए 24 परदे होते हैं। दोनों सिरों पर दो तुम्बे लगे होते हैं। इस वाद्य में चार स्वर के मुख्य तार और तीन चिकारी के तार होते हैं। आज हम आपको विश्वविख्यात वीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ का रुद्रवीणा वादन सुनवा रहे हैं। आज हम जिसे संगीत का जयपुर घराना के नाम से पहचानते हैं, उसकी स्थापना में असद अली खाँ के प्रपितामह (परदादा) उस्ताद रजब अली खाँ का योगदान रहा है। उस्ताद रजब अली खाँ जयपुर दरबार के केवल संगीतज्ञ ही नहीं; बल्कि महाराजा मानसिंह के गुरु भी थे। महाराजा ने उन्हें जागीर के साथ ही एक विशाल हवेली दे रखी थी तथा उन्हें किसी भी समय बेरोक-टोक महाराज के महल में आने के स्वतन्त्रता थी। असद अली खाँ के दादा जी उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ ने भी जयपुर दरबार में वही प्रतिष्ठा प्राप्त की। वीणावादकों का यह घराना ध्रुवपद संगीत के खण्डहार वाणी में वादन करता रहा है; जिसका पालन उस्ताद असद अली खाँ ने किया और अपने शिष्यों को भी इसी वाणी की शिक्षा दी। ध्रुवपद संगीत में चार वाणियों का वर्गीकरण तानसेन के समय में ही हो चुका था। "संगीत रत्नाकर” ग्रन्थ में यह वर्गीकरण शुद्धगीत, भिन्नगीत, गौड़ीगीत और बेसरागीत नामों से हुआ है; जिसे आज गौड़हार वाणी, डागर वाणी, खण्डहार वाणी और नौहार वाणी के नाम से जाना जाता है। उस्ताद असद अली खाँ और उनके पूर्वजों का वादन खण्डहार वाणी का था। इसके अलावा खाँ साहब दूसरी वाणियों की विशेषताओं को प्रदर्शित करने से भी हिचकते नहीं थे। ध्रुवपद अंग में वीणावादन का चलन कम होने के बावजूद उन्होंने परम्परागत वादन शैली से कभी समझौता नहीं किया। आइए, अब हम उनकी वादन शैली की सार्थक अनुभूति करते हैं। इस प्रस्तुति में उस्ताद असद अली खाँ ने ध्रुवपद अंग से राग आसावरी के चौताल में एक बन्दिश का वादन किया है। नाथद्वारा परम्परा के पखावज वादक पण्डित डालचन्द्र शर्मा ने पखावज संगति की है।


राग आसावरी : चौताल में रुद्रवीणा वादन : उस्ताद असद अली खाँ



राजा छत्रपति सिंह 

ध्रुपद संगीत में ताल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त वाद्य पखावज अथवा मृदंग है। यह खोखली बेलनाकार लकड़ी का बना हुआ होता है, जिसके दोनों सिरों पर चमड़े से मढ़ा होता है। यह अत्यन्त श्रमसाध्य वाद्य है। ध्रुपद संगीत में इस तालवाद्य की संगति से अनूठी गम्भीरता और भव्यता आती है। गायन और वादन में संगति के साथ-साथ शास्त्रीय नृत्य शैलियों में भए इसका उपयोग होता है। समर्थ कलासाधक पखावज का स्वतंत्र अर्थात एकल वादन भी कुशलता से करते हैं। आम तौर पर पखावज पर चौताल, तीव्रा, धमार, सूल आदि लघु तथा ब्रह्म, रुद्र, लक्ष्मी, सवारी, मत्त, शेष आदि दीर्घ ताल बजाए जाते हैं। आज के अंक में हम आपको स्वतंत्र अर्थात एकल पखावज वादन सुनवा रहे हैं। बीती शताब्दी के प्रमुख संगीतज्ञों में राजा छत्रपति सिंह (1919-1998) की गणना की जाती है। आज के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच स्थित तत्कालीन बिजना राज परिवार में उनका जन्म हुआ था। इनके पितामह राजा मुकुन्ददेव सिंह जूदेव और पिता राजा हिम्मत सिंह जूदेव का नाम भारतीय संगीत के संरक्षकों में शुमार किया जाता है। राजा छत्रपति सिंह जूदेव ने बचपन से ही पखावज सीखना आरम्भ कर दिया था। अपने युग के जाने-माने दिग्गज पखावजी कुदऊ सिंह और स्वामी रामदास से उनकी ताल शिक्षा हुई। प्रस्तुत रिकार्डिंग में विद्वान पखावजी राजा छत्रपति सिंह पखावज पर चौताल प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस वादन का आनन्द लीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


स्वतंत्र पखावज वादन : ताल - चौताल : राजा छत्रपति सिंह





संगीत पहेली 

'स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।



आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 14 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 204वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको चर्चित युगल ध्रुपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा प्रस्तुत धमार गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल धमार (14 मात्रा)। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। इस बार हमारे एक नये प्रतिभागी ने भी पहेली में हिस्सा लेकर एक अंक अर्जित किया है। इन्होने उत्तर के साथ अपना नाम और स्थान का नाम नहीं लिखा है। इनके ई-मेल आई डी के आधार पर अनुमान है कि सम्भवतः प्रेषक का नाम पार्थ सोदानी है। आपसे अनुरोध है कि अपना पूरा नाम और स्थान का नाम हमे शीघ्र भेज दें। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी नई लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। अभी तक आप ध्रुपद शैली का परिचय प्राप्त कर रहे थे। अगले अंक से हम खयाल शैली की चर्चा करेंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर सहर्ष देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

धमार के रंग : राग केदार के संग : SWARGOSHTHI – 205 : DHAMAR



स्वरगोष्ठी – 205 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 3

‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की तीसरी कड़ी मे मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद बन्दिश के विषय में चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के अन्तर्गत धमार गीत पर चर्चा करेंगे और सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक राग केदार का एक रसपूर्ण धमार प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा पार्श्वगायक मन्ना डे का गाया एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद अंग की गायकी में निबद्ध गीतों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। निबद्ध गीतों के विषयवस्तु में ईश्वर की उपासना, साकार और निराकार, दोनों प्रकार से की गई है। इसके अलावा ध्रुपद गीतों में आश्रयदाता राजाओं और बादशाहों की प्रशस्ति, पौराणिक आख्यान, प्रकृति चित्रण और विविध पर्वों और सामाजिक उत्सवों का उल्लेख भी खूब मिलता है। सुप्रसिद्ध संगीत चिन्तक और दार्शनिक ठाकुर जयदेव सिंह ने ‘भारतीय संगीत के इतिहास’ विषयक पुस्तक में यह भी उल्लेख किया है कि सोलहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक तक ध्रुपद गीतों के साथ नृत्य और अभिनय का चलन भी था। इस उल्लेख का सीधा सा अर्थ है कि उस काल में ध्रुपद शैली लोकजीवन से गहराई तक जुड़ी हुई थी। ध्रुपद शैली के अन्तर्गत ही गीत का एक प्रकार है, जिसे आज हम ‘धमार’ के नाम से जानते हैं। धमार नाम का उल्लेख ‘संगीत शिरोमणि’ में मिलता है। इस ग्रन्थ में ‘धम्माली’ नाम का उल्लेख है। धमाल, धम्माल अथवा धम्माली शब्द से उल्लास से परिपूर्ण नृत्य का स्पष्ट आभास होता है। इस गीत शैली के साहित्य में आज भी होली पर्व के उमंग और उल्लास की अभिव्यक्ति की जाती है। लोक शैली का स्पर्श होने और पर्व विशेष के परिवेश का यथार्थ चित्रण होने के कारण ‘धमार’ या ‘धमाल’ नामकरण इस गीत शैली के लिए सार्थक है। ब्रज के गोप-गोपिकाओं के साथ कृष्ण के होली खेलने का प्रसंग धमार गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। यह गीत शैली चौदह मात्रा के ताल में गायी जाती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला १४ मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली और फाल्गुनी परिवेश का चित्रण होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको चर्चित युगल गायक रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा राग केदार में प्रस्तुत धमार सुनवा रहे हैं। पखावज पर अखिलेश गुण्डेचा ने धमार ताल में संगति की है। हमारे अनुरोध पर ‘स्वरगोष्ठी’ के श्रोताओं के लिए गुण्डेचा बन्धुओं ने इस धमार गीत को स्वयं हमे उपलब्ध कराया है।


धमार राग केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा




धमार गीतों में उपज का काम अधिक होता है। यह लय-प्रधान शैली है। इसके विपरीत ध्रुपद बन्दिश की गायकी ध्रुपद बन्दिश में गम्भीरता होती है, जबकि धमार गायकी में चंचलता होती है। पिछले अंक में हमने आपको 1943 की फिल्म ‘तानसेन’ में शामिल किये गए एक प्राचीन ध्रुपद का गायन प्रसिद्ध गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वर मे सुनवाया था। तानसेन के गुरु और प्रसिद्ध सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास की यह रचना 1962 में बनी फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में भी शामिल किया गया था। दोनों फिल्मों के इस गीत का स्थायी तो समान है, किन्तु अन्तरे के शब्दों में थोड़ा परिवर्तन किया गया है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के संगीतकार थे एस.एन. त्रिपाठी और यह गीत पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में है। फिल्म का यह ध्रुपद गीत राग यमन कल्याण की अनुभूति कराता है। आप इस फिल्मी ध्रुपद गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ध्रुपद राग यमन कल्याण : “सप्तसुरन तीन ग्राम...’ : मन्ना डे : फिल्म – संगीत सम्राट तानसेन






संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 205वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – यह कौन सा वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

2 – संगीत वाद्य पर यह कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 
 


आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 207वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 203वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक ध्रुपद बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भूपाली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सूल ताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला पहले हिस्से में हम ध्रुपद शैली का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रविवार, 25 जनवरी 2015

राग भूपाली और कल्याण में ध्रुपद गीत : SWARGOSHTHI – 204 : DHRUPAD BANDISH



स्वरगोष्ठी – 204 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 2

गुण्डेचा बन्धुओं और सहगल से सुनिए ध्रुपद के निबद्ध गीत



 


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र नई लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैली परिचय’ की दूसरी कड़ी मे हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की मौजूदा शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद शैली के परिचय से श्रृंखला की शुरुआत की थी और इस कड़ी में आपको ध्रुपद आलाप से परिचित कराया था। आज के अंक में हम आपके लिए ध्रुपद शैली में निबद्ध गीत अर्थात ध्रुपद बन्दिश का रसास्वादन कराएंगे। सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धु राग भूपाली में निबद्ध बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा विख्यात गायक कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद के आलाप में राग के स्वरों का बिना लय के क्रमशः विस्तार किया जाता है। विलम्बित से आरम्भ करते हुए क्रमशः द्रुत गति की ओर बढ़ते जाते हैं। आलाप का यह भाग वीणा के आलाप, जोड़ और अन्त में झाला की भाँति की जाती है। कुशल गायक इसी भाग में रागानुकूल भाव और रस की सृष्टि करने में समर्थ होते हैं। द्रुत लय में आलाप के सम्पन्न होने के बाद बारी आती है, बन्दिश की। इस भाग में एक पद रचना को राग के स्वरों में ढाल कर विलम्बित मध्य लय में प्रस्तुत किया जाता है। स्वरों से उपजने वाले रस और भाव को जब साहित्य का आश्रय मिल जाता है तब प्रस्तुति का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है। बन्दिश का स्थायी स्थापित करने के बाद कलासाधक अपनी लयकारी का पक्ष प्रदर्शित करते हैं। यह लयकारी दुगुन, तिगुन। चौगुन, से लेकर अठगुन और आड़, कुवाड़ सहित अनेक क्लिष्ट लय में की जाती है। इस क्रिया में विभिन्न मात्राओं से आरम्भ करके सीधी या तिहाई के साथ लयकारी की जाती है। यह प्रदर्शन कलाकार अपनी क्षमता, प्रतिभा और रियाज़ के बल पर करते हैं। बन्दिश के अगले भाग में उपज का काम किया जाता है। इस भाग में रचना के शब्दों को विभिन्न प्रकार के बोलबाँट से सुसज्जित करते हुए प्रदर्शित किया जाता है। उपज बोलबाँट का कलात्मक कार्य श्रोताओं के लिए आनन्ददायक होता है। इस प्रकार स्वर, लय, ताल और पद के साहित्य के समन्वय से ध्रुपद बन्दिश की संरचना की जाती है। गायन के दौरान ताल देने के लिए पखावज की संगति की जाती है। आम तौर पर ध्रुपद रचनाएँ चौताल, तीव्रा, सूल, धमार आदि तालों में गायी जाती है। समर्थ कलासाधक लम्बी मात्राओं के क्लिष्ट ताल, जैसे- ब्रह्म, रुद्र, लक्ष्मी, मत्त, शेष आदि तालों में भी गायन प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान ध्रुपद गायकी के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं युगल गायक गुण्डेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा), जिन्हें संगीत की शिक्षा विख्यात साधक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर और रुद्रवीणा के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर से प्राप्त हुई। ध्रुपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से आज सुनिए, राग भूपाली, सूल ताल में निबद्ध एक ध्रुपद रचना।


राग भूपाली ध्रुपद : ‘शंकरसुत गणेश विघ्नविनाशन गौरीनन्दन...’ : गुण्डेचा बन्धु : सूल ताल




फिल्मों में ध्रुपद संगीत का उपयोग लगभग नहीं के बराबर मिलता है। काफी छानबीन के बाद 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ का एक गीत उपलब्ध हुआ है, जो ध्रुपद शैली के अनुकूल है। यह फिल्म बादशाह अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन के जीवन पर आधारित थी। तानसेन के जीवन के बारे में उपलब्ध कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ किंवदन्तियों के आधार पर रचे गए फिल्म के कथानक पर फिल्म का निर्माण किया गया था। प्रमुख भूमिकाओं में कुन्दनलाल सहगल और खुर्शीद प्रस्तुत किये गए थे। नायक और नायिका दोनों ही अभिनय के साथ-साथ गायन में भी कुशल थे। चूँकि यह फिल्म एक महान संगीतज्ञ के जीवन पर केन्द्रित थी, अतः फिल्म के सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश ने इन्हीं गीतों में एक गीत ध्रुपद शैली के अनुकूल रखा था। ऐसी मान्यता है कि तानसेन अपने समय की ध्रुपद गायकी में सर्वश्रेष्ठ थे। कुन्दनलाल सहगल के गाये इस गीत में परम्परागत भारतीय संगीत की कुछ विशेषताओ को इंगित किया गया है। ऐसी मान्यता है कि ध्रुपद अंग का यह गीत तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास की रचना है। यह अनूठा गीत राग कल्याण और ताल चौताल में निबद्ध किया गया है। आप फिल्म ‘तानसेन’ का यह ध्रुपद गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग कल्याण ध्रुपद : ‘सप्तसुरन तीन ग्राम गाओ सब गुणीजन...’ : कुन्दनलाल सहगल : चौताल





संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 204वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ध्रुपद अंग के ही एक गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।
 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 31 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 202वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको ध्रुपद अंग में पण्डित उदय भवालकर द्वारा प्रस्तुत आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ध्रुपद शैली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पखावज अथवा मृदंग। वाद्य शहनाई और सितार। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी नई लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


रविवार, 18 जनवरी 2015

ध्रुपद शैली : एक परिचय : SWARGOSHTHI – 203 : DHRUPAD AALAP



स्वरगोष्ठी – 203 में आज

भारतीय संगीत शैली परिचय श्रृंखला – 1

राग श्री में ध्रुपद का आलाप




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र एक नई लघु श्रृंखला मे हार्दिक स्वागत करता हूँ। हमारे अनेक पाठकों और श्रोताओं ने आग्रह किया है कि वर्तमान में भारतीय संगीत की जो शैलियाँ मौजूद हैं, उनका परिचय ‘स्वरगोष्ठी’ पर प्रस्तुत किया जाए। आपके आग्रह को स्वीकार करते हुए आज से हम यह लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसका शीर्षक है- ‘भारतीय संगीत शैली परिचय श्रृंखला’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम परम्परागत रूप से विकसित कुछ संगीत शैलियों का परिचय प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। इस संगीत परम्परा में जड़ता नहीं है। यह तो गोमुख से निरन्तर निकलने वाली वह पवित्र धारा है जिसके मार्ग में अनेक धाराएँ मिलती है और इस मुख्य धारा में विलीन हो जाती हैं। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। आज हम धूपद शैली पर एक दृष्टिपात कर रहे हैं। श्रृंखला के पहले अंक में हम आपको राग श्री में ध्रुपद का आलाप भी सुनवाएँगे। 


ज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। भारतीय संगीत की परम्परा सामवेद से जुड़ी हुई है। वैदिक काल से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक के संगीत का स्वरूप पूर्णतः आध्यात्मिक था और यह देवालयों से जुड़ा हुआ था। मुगल शासनकाल में यह संगीत देवालयों से निकाल कर राज दरबारों तक पहुँचा, जहाँ से इस संगीत की श्रृंगार रस की धारा विकसित हुई। वर्तमान में उत्तर भारत की उपलब्ध पारम्परिक शास्त्रीय शैलियों में सबसे प्राचीन संगीत शैली है, ध्रुवपद अथवा ध्रुपद। प्राचीन ग्रन्थों में प्रबन्ध गीत का उल्लेख है। इन ग्रन्थों में लगभग एक सौ प्रकार के प्रबन्ध गीतों का वर्णन है, जिनमें एक प्रकार ‘ध्रुव’ है। ध्रुपद अथवा ध्रुवपद इसी ‘ध्रुव’ नामक प्रबन्ध गीत शैली का विकसित रूप है। प्राचीन प्रबन्ध गीत को दो भाग में बाँटा जा सकता था- अनिबद्ध और निबद्ध। वर्तमान प्रचलित ध्रुवपद शैली में आलाप का भाग अनिबद्ध गीत और अन्य सभी गीत, जिनमें तालों का प्रयोग किया जा सकता है, निबद्ध गीतों के श्रेणी में आते हैं। आधुनिक ध्रुपद परम्परा का सूत्रपात ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (1486 – 1516) के काल से माना जाता है। उन्हें मध्ययुग की गीत शैली का प्रवर्तक माना जाता है। राजा मानसिंह स्वयं कुशल संगीतज्ञ और मर्मज्ञ थे। प्राचीन शास्त्रों का आधार लेकर उन्होने तत्कालीन प्रचलित संगीत शैली के अनुरूप एक नई संगीत शैली विकसित की। प्रबन्ध संगीत के पद काफी लम्बे-लम्बे हुआ करते थे। राजा मानसिंह तोमर ने इसे संक्षिप्त किया। गीत के साहित्य में दैवी आराधना, आश्रयदाता राजाओ व बादशाहों की प्रशस्ति, पौराणिक आख्यान, प्रकृति वर्णन, सामाजिक उत्सवों आदि की प्रधानता थी। गीतों में ब्रजभाषा का अधिकांश प्रयोग मिलता है। 

उदय भवालकर
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि ध्रुपद का आलाप अनिबद्ध गीत की श्रेणी में आता है। ध्रुपद का आलाप आरम्भ में लयविहीन होता है। राग के निर्धारित स्वरों को ठहराव देते हुए क्रमशः विकसित किया जाता है। आलाप करते समय शब्दो पर नहीं बल्कि स्वरों का महत्त्व होता है और लम्बी मीड़ों का प्रयोग होता है। आरम्भ में लयविहीन आलाप क्रमशः गति पकड़ता जाता है और स्वर लयबद्ध रूप लेते जाते हैं। इसे जोड़ कहा जाता है। आलाप में स्वरोच्चार के लिए कुछ निरर्थक से लगने वाले शब्द प्राचीन प्रबन्ध गीतों से लिए गए है। इसे ‘नोम-तोम’ का आलाप कहा जाता है। दरअसल प्रबन्ध गीतों में आलाप के लिए सार्थक शब्दों का प्रयोग होता था, जैसे- ॐ अनन्त श्री हरि नारायण’ आदि। आज भी कई संगीतसाधक आलाप में इन्हीं सार्थक शब्दों के प्रयोग करते हैं। ध्रुपद के आलाप पक्ष का उदाहरण देने के लिए हमने आज के अंक में युवा ध्रुपद गायक पण्डित उदय भवालकर की आवाज़ का चयन किया है। उदय जी का जन्म उज्जैन में एक संगीत-प्रेमी परिवार में 1966 में हुआ था। बचपन में उनकी बड़ी बहन ने उन्हें संगीत की शिक्षा दी। बाद में उन्नीस पीढ़ियों से ध्रुपद के संरक्षक और सुप्रसिद्ध ‘डागरवाणी’ परम्परा के संवाहक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर और उन्हीं के बड़े भाई उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत विधिवत शिक्षा ग्रहण की। आज के इस अंक में हम आपको उदय भवालकर के स्वरों में राग श्री का आलाप सुनवा रहे हैं। आप इस कलात्मक आलाप और जोड़ के सौन्दर्य का अनुभव कीजिए और मुझे आज यही विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग श्री : ध्रुपद आलाप और जोड़ : पण्डित उदय भवालकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 203वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक ध्रुपद गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस गीतांश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 205वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 201वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर राग भैरवी की रचना सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- आभासित धुन भजन ‘मत जा मत जा मत जा जोगी...’ की है और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- भक्त कवयित्री मीराबाई। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक से हमने एक नई लघु श्रृंखला, ‘भारतीय संगीत शैली परिचय’ शुरू की है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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