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Sunday, July 4, 2010

ओ वर्षा के पहले बादल...सावन की पहली दस्तक को आवाज़ सलाम इस सुमधुर गीत के माध्यम से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 431/2010/131

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी चाहने वालों का एक बार फिर से हार्दिक स्वागत है इस स्तंभ में। अगर आप हम से आज जुड़ रहे हैं, तो आपको बता दें कि आप इस वक़्त शामिल हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ है 'हिंद-युग्म' के साज़-ओ-आवाज़ विभाग, यानी कि 'आवाज़' का एक हिस्सा। हर हफ़्ते रविवार से लेकर गुरुवार तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजती है और हर अंक में हम आपको सुनवाते हैं हिंदी सिनेमा के गुज़रे ज़माने का एक अनमोल नग़मा। कभी ये नग़में कालजयी होते हैं तो कभी भूले बिसरे, कभी सुपर हिट तो कभी कमचर्चित। लेकिन हर एक नग़मा बेमिसाल, हर एक गीत नायाब। तभी तो इस स्तंभ को हम कहते हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। तो उन सभी भाइयों और बहनों का, जो हम से आज जुड़ रहे हैं, हम एक बार फिर से इस महफ़िल में हार्दिक स्वागत करते हैं। दोस्तों, भारत में इस साल के मानसून का आगमन हो चुका है। देश के कई हिस्सों में बरखा रानी छम छम बरस रही हैं इन दिनों, तो कई प्रांत ऐसे भी हैं जो अभी भी भीषण गरमी से जूझ रहे हैं। उनके लिए तो हम यही कामना करते हैं कि आपके वहाँ भी जल्द से जल्द फुहारें आरंभ हो। दोस्तों, बारिश के ये दिन, सावन का यह महीना, रिमझिम की ये फुहारें, काले बादलों की गर्जन करती हुई फ़ौज, नई कोंपलें, चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली, किसे नहीं अच्छा लगता होगा। प्रकृति के इस अनुपम वातावरण का मानव हृदय पर असर होना लाजमी है। तभी तो सावन की ॠतु पर असंख्य कविताएँ और गीत लिखे जा चुके हैं और अब भी लिखे जाते हैं। सावन को मिलन का मौसम भी कहा जाता है। जो प्रेमी अपनी प्रेमिका से इस समय दूर होते हैं, उनके लिए यह मौसम बड़ा कष्ट दायक बन जाता है। तभी तो जुदाई के दर्द को और भी ज़्यादा पुर असर तरीके से चित्रित करने के लिए हमारे फ़िल्मकार बरसात का सहारा लेते हैं। "सावन के झूले पड़े तुम चले आओ", "अब के सजन सावन में, आग लगेगी बदन में", "सावन आया बादल छाए, आने वाले सब आए हैं बोलो तुम कब आओगे", और भी न जाने कितने ऐसे गीत हैं जिनमें सावन के साथ जुदाई के दर्द को मिलाया गया है। ख़ैर, यह तो एक पहलु था। सावन और बरसात का आज हमने इसलिए ज़िक्र छेड़ा क्योंकि आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हम शुरु कर रहे हैं इसी सुहाने मौसम को समर्पित हमारी नई लघु शृंखला 'रिमझिम के तराने'। यानी कि इस भीगे भीगे मौसम को और भी ज़्यादा रोमांटिक, और भी ज़्यादा सुहावना बनाने के लिए अगले दस कड़ियों में सुनिए बारिश के नग़में, कभी टिप टिप, कभी रिमझिम, तो कभी टापुर टुपुर के ताल पर सवार हो कर।

इस शृंखला की शुरुआत किसी ऐसे गीत से होनी चाहिए जो हमारे इतिहास से जुड़ा हुआ हो, हमारी प्राचीन संस्कृति से जुड़ी हुई हो। तो फिर ऐसे में कालीदास रचित 'मेघदूत' से बेहतर शुरुआत और क्या हो सकती है भला! 'मेघदूत' कालीदास की सुविख्यात काव्य कृति है। यह एक लिरिकल पोएम है जिसका ना केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्व है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी बेहद महत्व रखता है। इसमें मानसून का वर्णन मिलता है और मध्य भारत में मानसून के गति पथ और दिशाओं का भी उल्लेख मिलता है जो आज के वैज्ञानिकों के शोध कार्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कालीदास के अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हैं 'शकुंतला', 'विक्रम-उर्वषी', 'कुमारसंभवा', 'रघुवंशम' आदि। इन सभी पर फ़िल्में बन चुकी हैं। 'मेघदूत' पर सन् १९४५ में देबकी बोस ने इसी शीर्षक से फ़िल्म निर्देशित की जिसका निर्माण कीर्ति पिक्चर्स के बैनर तले हुआ था। ऐतिहासिक व काव्यिक होने की वजह से इस फ़िल्म के संगीतकार के रूप में किसी विशिष्ट संगीतकार को ही चुनना ज़रूरी था। ऐसे में कमल दासगुप्ता को चुना गया जो उन दिनों ग़ैर फ़िल्मी गीतों को मनमोहक धुनों में प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते थे। गायक जगमोहन ने भी इस फ़िल्म के गीतों में महत्वपूर्ण योगदान दिया, ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत "ओ वर्षा के पहले बादल, मेरा संदेसा ले जा वहाँ"। जगमोहन उन गिने चुने कलाकारों में से थे जिन्होने रबीन्द्र संगीत शैली को फ़िल्म संगीत में लाने की कोशिश की। ६ सितंबर १९१८ को जनमे जगन्मय मित्र (जगमोहन) कलकत्ते के एक ज़मीनदार परिवार से तालुख़ रखते थे। उन्होने शास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत की तालीम पॊण्डिचेरी के दिलीप कुमार राय से प्राप्त की। मैट्रिक की परीक्षा के बाद वो रेडियो पर गाने लगे। हालाँकि उन्होने हिंदी फ़िल्मों के लिए ज़्यादा नहीं गाए, उनके ग़ैर फ़िल्मी रचनाएँ बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे उस ज़माने में। और उनका गाया सब से लोकप्रिय ग़ैर फ़िल्मी गीत है "यह ना बता सकूँगा मैं तुमसे है मुझे प्यार क्यों"। जगमोहन की तरह कमल दासगुप्ता भी हिंदी फ़िल्मों में कम ही नज़र आए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कमल बाबू ने हिंदी की जिन १६ फ़िल्मों में संगीत दिया था उनके नाम हैं - जवाब ('४२), हास्पिटल ('४३), रानी ('४३), मेघदूत ('४५), अरेबियन नाइट्स ('४६), बिंदिया ('४६), कृष्ण लीला ('४६), पहचान ('४६), ज़मीन आसमान ('४६), फ़ैसला ('४७ - अनुपम घटक के साथ), गिरिबाला ('४७), मनमानी ('४७), चन्द्रशेखर ('४८), विजय-यात्रा ('४८), ईरान की एक रात ('४९), फुलवारी ('५१)। और आइए दोस्तों, अब इस साल के मानसून का स्वागत-सत्कार किया जाए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जगमोहन के गाए फ़िल्म 'मेघदूत' के इस गाने से। गीत लिखा है फ़ैय्याज़ हाशमी ने। जी हाँ, वोही फ़य्याज़ हशमी जिन्होने कमल दासगुप्ता के लिए तलत महमूद का पहला पहला मशहूर गीत "तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला ना सकेगी" लिखा था। इस गीत को हम कभी आपको संभव हुआ तो ज़रूर सुनवाएँगे, फ़िल्हाल सुनते हैं फ़िल्म 'मेघदूत' का गीत, जिसकी अवधि है कुल ६ मिनट और ६ सेकण्ड्स, जो कि उस ज़माने के हिसाब से बहुत ही लम्बा था।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार कमल दासगुप्ता धुन बनाते समय हारमोनियम या पियानो के बजाय कलम लेकर बैठते थे। जैसे जैसे उनके दिमाग में सुर आकार लेते थे, वे सीधे उसके नोटेशन्स कापी में लिखते जाते थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. कल इस गीतकार की पुण्यतिथि है, नाम बताएं -३ अंक.
२. इस गीतकार संगीतकार जोड़ी ने एक से बढ़कर एक नगमें दिए हैं हमें, संगीतकार बताएं - २ अंक.
३. लता के गाये सावन के इस गीत को हमने किस फिल्म से लिया है - १ अंक.
४. १९६७ में आई थी ये फिल्म, किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
क्या बात है कोई शरद जी और अवध जी को टक्कर देने मैदान में नहीं उतर रहा, अरे भाई मैदान छोड़ के भागिए मत, चार सवाल हैं...कोशिश कीजिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, September 6, 2009

देखो माने नहीं रूठी हसीना....रूठी आशा जी को मनाने की कोशिश कर रहे हैं गायक जगमोहन बख्शी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 194

'१० गायक और एक आपकी आशा' की चौथी कड़ी में आज एक कमचर्चित गायक की बारी। ये गायक भी हैं और संगीतकार भी। बद्‍क़िस्मती से ये ना तो गायक के रूप में मशहूर हो सके और ना ही संगीतकार के रूप में। आशा जी के साथ आज अपनी आवाज़ मिला रहे हैं गायक जगमोहन बक्शी जिन्होने सपन सेनगुप्ता के साथ मिलकर बनाई संगीतकार जोड़ी सपन-जगमोहन की। दोस्तों, १९५४ में एक फ़िल्म आयी थी 'टैक्सी ड्राइवर' जिसमें आशा भोंसले और जगमोहन बक्शी का गाया हुआ एक छेड़-छाड़ भरा युगल गीत था, जो काफ़ी मशहूर भी हुआ था। वही गीत आज यहाँ पेश है। गुरु दत्त की फ़िल्म 'आर पार' कहानी थी एक टैक्सी ड्राइवर कालू की जो अमीर बनने के लिए अंडरवर्ल्ड से जुड़ जाता है। 'आर पार' की सफलता से प्रेरित हो कर नवकेतन फ़िल्म्स के आनंद भा‍इयों ने 'टैक्सी ड्राइवर' के शीर्षक से ही एक और फ़िल्म बना डालने की ठानी। फ़िल्म को निर्देशित किया चेतन आनंद ने, कहानीकार थे विजय आनंद, और मुख्य भूमिका में थे देव आनद, जिन्होने मंगल, टैक्सी ड्राइवर की भूमिका निभाई। कल्पना कार्तिक उनकी नायिका थीं इस फ़िल्म में। इस फ़िल्म के गीत "जाएँ तो जाएँ कहाँ" के लिए सचिन देव बर्मन को उस साल के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार मिला था। जहाँ तक इस फ़िल्म में आशा जी के गाए गीतों का सवाल है, यह बताना ज़रूरी है कि यही वह फ़िल्म है जिसमें आशा जी ने पहली बार बर्मन दादा के लिए गाया था। और पहला ही गीत था एक कैब्रे नंबर "जीने दो और जियो"। जगमोहन के साथ उनका गाया प्रस्तुत गीत एक 'रोमांटिक कामेडी नंबर' है। झूठ-मूठ के रूठने मनाने पर बनने वाले गीतों में यह शुरुआती गीतों में से एक है।

गायक जगमोहन बक्शी ने भले ही यह गीत सन् १९५४ में गाया था, सपन सेनगुप्ता के साथ मिल कर सपन-जगमोहन की संगीतकार जोड़ी बनाने के लिए उन्हे करीब करीब १० सालों की प्रतीक्षा करनी पड़ी। सन्‍ १९६३ में बनी फ़िल्म 'बेगाना' से इस जोड़ी का बतौर फ़िल्म संगीतकार पदार्पण हुआ इस उद्योग में। ४५ साल की अवधी में इस जोड़ी ने लगभग ५० फ़िल्मों में संगीत दिया। उनके संगीत की अंतिम फ़िल्म 'अंबर' १९९६ में आयी थी। २६ फ़रबरी १९९९ को हृदय गति रुक जाने की वजह से ६५ वर्ष की आयु में जगमोहब बक्शी का निधन हो गया। सपन जगमोहन का स्वरबद्ध किया फ़िल्म 'दोराहा' का आशा जी का ही गाया हुआ गीत तो आप को याद है न? गीत कुछ इस तरह था "तुम ही रहनूमा हो मेरी ज़िंदगी के"। इसे लिखा था इंदीवर जी ने। यह गीत इंदीवर जी को बहुत पसंद था, तभी तो विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में इसे उन्होने शामिल किया था यह कहते हुए - "हमारी फ़िल्मों में आजकल कैब्रे बहुत आता है। संगीतकार भी लकीर के फ़कीर की तरह उसी तरह का संगीत, वही अन्ग्रेज़ी स्टाइल का डांस और सेक्सी रोमांस ले आते हैं। एक बार मुझे भी कैब्रे गीत लिखने का मौका मिला। अगर मैं कोई साधारण सा गीत लिख देता तो जो हीरोइन है, वो लोगों की नज़र से गिर जाती। तो मैने सोचा, क्यों ना कुछ ऐसा लिखा जाए जिससे हीरोइन हीरोइन ही बनी रहे, लोगों की नज़रों से गिरे नहीं। और मुझे ख़ुशी हुई जब मैने संगीतकार सपन जगमोहन को यह गीत सुनाया, और उन्होने कहा कि वाकई कुछ अलग है। और फिर उन्होने तर्ज़ बनाई, तर्ज़ भी बहुत अच्छी बनाई।" तो दोस्तों, यह तो था जगमोहन बक्शी और आशा जी का साथ जिसमें एक संगीतकार थे और दूसरी गायिका। लेकिन आज का जो हमारा प्रस्तुत गीत है, उसमें दोनों ही गायक का हैसीयत रखते हैं। सुनते हैं साहिर लुधियानवी का लिखा और बर्मन दादा का स्वरबद्ध किया हुआ फ़िल्म 'टैक्सी ड्राइवर' का यह युगल गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल के गीत में आशा के साथ होंगे महेंद्र कपूर.
२. चोपडा कैम्प की एक फिल्म का है ये गीत.
३. इस लम्बे गीत में अमर प्रेमियों की दास्तानें है.

पिछली पहेली का परिणाम -
कल की पहेली कुछ मुश्किल थी, मगर इसी कोशिश में हमें मिले एक नए प्रतिभागी...रमन जी दो अंकों से आपका खाता खुला है. आशा है आगे भी आप जम कर मुकाबला करेंगें. मंजू जी आप तो कहीं के कहीं पहुँच जाती हैं :) "दुख यही है, कि मैने हिमाकत कर उनकी नाराज़गी मोल ली थी, जो अभी भी खलती है" दिलीप जी क्या आप आशा जी की बात कर रहे हैं....यदि हाँ तो हम सब के साथ भी बांटिये वो वाकया. शरद जी ऐसे सरप्राईस तो आपको मिलते ही रहेंगे :) रमना जी यदि आप गीत के बोल लिखना चाहें तो हिंदी में लिखा करें...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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